Wednesday, 24 September 2014

धर्म : पुल या खाई?


 इन दिनों भारतीय जनता पार्टी एवं उसके भ्रातृसंगठनों के कार्यकर्ता स्वाभाविक रूप से अत्यन्त उत्साहित हैं। वे अपने मनोभावों को खुलकर अभिव्यक्त कर रहे हैं और उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि देश के सामाजिक ढांचे पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व उनके राजनाथ सिंह जैसे वरिष्ठ सहयोगी राजनीतिक संतुलन बनाने की दृष्टि से यदा-कदा जो वक्तव्य देते हैं उनका कोई खास असर होते दिखाई नहीं देता। अभी जैसे प्रधानमंत्री ने भारतीय मुसलमानों की देशभक्ति को रेखांकित करते हुए एक बयान दिया, लेकिन वह मीडिया में चर्चा तक ही सीमित रहा। कारण शायद यही है कि अभी कल तक तो स्वयं श्री मोदी और अन्य तमाम नेता उसी तरह के उद्गार व्यक्त कर रहे थे, जो आज दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं के मुंह से सुनने मिल रहे हैं। इस तरह एक विरोधाभासी अथवा समानांतर स्थिति उत्पन्न होने का आभास होता है, लेकिन हमारा मानना है कि यह आभास एकदम ऊपरी सतह पर है और वास्तविकता में संघ परिवार की पुरानी सोच बरकरार है। पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह कहते थे कि अन्तर्विरोधों को साधना ही राजनीति है तो श्री मोदी अभी यही साधना कर रहे हैं।

पाठकगण योगी (अब महंत) आदित्यनाथ व साक्षी महाराज इत्यादि के ताजा बयानों से परिचित हैं। उन्हें दोहराने की आवश्यकता नहीं है। इस बीच इंदौर की एक भाजपा विधायक सुश्री उषा ठाकुर ने दो ऐसे वक्तव्य दिए हैं जिनको लेकर बहस छिड़ गई है। हमारी राय में उनके बयानों का व्यापक संदर्भों में  परीक्षण करने की आवश्यकता है। पहले तो उन्होंने यह कहा कि मुसलमान युवकों को नवरात्रि पर होने वाले रास गरबा में शामिल न होने दिया जाए। फिर इसमें संशोधन करते हुए उन्होंने कहा कि अगर वे आना चाहते हैं तो अपने माताओं, बहनों को साथ लेकर आएं। उन्होंने यह भी कहा कि गरबा स्थल के प्रवेश द्वार पर उनकी आईडी देखी जाए। सुना है कि इंदौर के प्रशासन ने इसकी व्यवस्था कर ली है!

भाजपा विधायक के इस वक्तव्य का समर्थन एक तरफ कुछेक मुस्लिम धर्मगुरुओं ने किया है तो गैरभाजपाई या गैरसंघी हिन्दुओं का भी एक वर्ग इस प्रतिबंध में कोई बुराई नहीं देखता। मुस्लिम धर्मगुरुओं का तर्क  है कि रास गरबा एक धार्मिक उत्सव है और किसी को भी दूसरे धर्म के उत्सव में क्यों जाना चाहिए। इस तर्क का अनुमोदन उदारवादी हिन्दू भी करते हैं कि सब अपने-अपने धर्म के अनुसार आचरण करें। एकबारगी यह तर्क अपील कर सकता है, लेकिन इससे बहुत सारे नए प्रश्न खड़े होते हैं। हमने भारत की उदार व बहुलतावादी सामाजिक परंपरा के बारे में जो कुछ जाना है, उसके अनुसार यहां एक लंबे समय से विभिन्न धार्मिक समुदायों द्वारा एक-दूसरे के अनुष्ठानों में भाग लेने की न सिर्फ परंपरा रही है, बल्कि उसे सदैव सराहा भी गया है। आज भी ईद, दीवाली और क्रिसमस जैसे पर्वों पर नागरिक एक-दूसरे से मिलते ही हैं। हमने हिन्दुओं के द्वारा मोहर्रम के समय ताजिये उठाने के किस्से भी अपने बड़े-बूढ़ों से सुने हैं।

मैं कैसे भूल जाऊं कि 1968 में प्रेस के कठिन समय में दीपावली पर मेरे दोस्त जमालुद्दीन ने अपनी दुकान के गल्ले से पांच रुपए निकाले थे, हम लोगों ने उससे मोम के दीये खरीदकर नहरपारा में प्रेस में दीये जलाए थे और जब जमाल की बेटी का विवाह हुआ तो उसने विवाह की पत्रिका में निमंत्रणकर्ता के रूप में बाबूजी का नाम उनसे बिना पूछे छपवाया था। ऐसी सत्यकथाएं बहुतों के पास होंगी। खैर! हाल के समय में शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने शिरडी के साईं बाबा की पूजा का जो निषेध किया है वह भी तो स्मरण कराता है कि एक मुसलमान फकीर को किस तरह देश के बहुसंख्यक समाज ने अपने देवता के रूप में स्वीकार कर लिया। इसका विलोम रामदेवड़ा (राज.) के रामदेव बाबा के रूप में उपस्थित है जिनकी इबादत रामसा पीर के नाम से भी उसी श्रद्धा से की जाती है।

भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती संभवत: इसी तथ्य में है कि यहां विभिन्न धार्मिक विश्वासों के बीच परस्पर विनिमय का सिलसिला शताब्दियों से चला आ रहा है। इसमें बीच-बीच में व्यवधान और अपवाद देखने मिले हैं, लेकिन वे लंबे समय तक नहीं चल सके। देश का बहुसंख्यक समाज, जिसे सुविधा के लिए हम हिन्दू कहते हैं, में भी सगुण और निर्गुण धाराएं एवं उनके भीतर अनेक उपधाराएं प्रचलित रही हैं। देश ने शैव और वैष्णवों के द्वंद्व भी देखे हैं और यह भी देखा है कि तत्कालीन प्रचलित पद्धति से अलग हटकर बौद्ध मत स्थापित करने वाले गौतम बुद्ध को अवतार के रूप में मान्यता देने में बहुसंख्यक समाज ने कोई कोताही नहीं की। जैन, बौद्ध और सिख स्वयं को धार्मिक अल्पसंख्यक मानते हैं, किन्तु वृहत्तर समाज उनके साथ कोई भेदभाव सामान्य तौर नहीं करता।

गोस्वामी तुलसीदास के बारे में एक रोचक प्रसंग की चर्चा कभी-कभी की जाती है। वे कभी मथुरा गए तब कृष्ण प्रतिमा के सामने सिर झुकाते हुए उन्होंने कहा-
''बलिहारी प्रभु आपकी, भले बने हो नाथ।
तुलसी मस्तक नवत है, धनुष बाण लो हाथ।।

कहते हैं कि तुलसीदास की इस चातक-भक्ति से मुग्ध होकर कृष्ण ने बांसुरी छोड़कर धनुष-बाण धारण कर लिए। परम रामभक्त तुलसी को जो कृष्णभक्त नीचा दिखाना चाहते थे, ईश्वरी लीला के आगे उनकी कुछ न चली। इस दृष्टांत का अर्थ पाठकगण अपने अनुसार निकाल सकते हैं। हमारा बस इतना कहना है कि यह प्रथमत: बहुसंख्यक समाज की जिम्मेदारी है कि वह धार्मिक मान्यताओं को लेकर सहिष्णुता व सद्भाव का वातावरण बनाने में मदद करें। उषा ठाकुर इत्यादि को ऋग्वेद का अनुवाद करने वाले बशीर अहमद मयूख से लेकर धमतरी के रामायणी दाऊद खान तक के बारे में यदि पता हो तो कितना अच्छा हो।

इस विषय पर चर्चा करते हुए किसी रूढि़वादी व्यक्ति ने टिप्पणी कि कि जब मक्का-मदीना में दूसरे धर्म के लोग नहीं जा सकते तो हमारे धार्मिक स्थलों पर मुसलमान क्यों आएं। ऐसे सज्जनों को शायद यह भी पता हो कि जगन्नाथपुरी के अलावा देश में ऐसे अनेक हिन्दू मंदिर हैं जहां गैर-हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है। दक्षिण भारत के अनेक मंदिरों में तो हिन्दू भी भीतर नहीं जा सकते जब तक उन्होंने धोती न पहनी हो। वहां पैंट-पाजामा नहीं चलते। ऐसी व्यवस्थाओं से धर्म की रक्षा कैसे होती है मुझे समझ में नहीं आता। बेहतर होगा कि धर्म विशेषज्ञ ही इस पर विचार करें। मैं अपने बारे में जानता हूं कि मैं यदि किसी देवालय में जाऊंगा तो सिर झुकाकर विनम्रता के साथ अपने अहंकार को विलीन करके ही जाऊंगा। मैं ऐसी ही उम्मीद अन्यों से भी करता हूं। मैं समझता हूं कि हमारी कुछ रूढिय़ों के पीछे ऐतिहासिक कारण हैं, लेकिन पांवों में अगर बेड़ी जकड़ी रहेगी तो आगे कैसे बढ़े जाएगा?

सुश्री उषा ठाकुर का दूसरा बयान वंदे मातरम् के बारे में है। उनका आरोप है कि मुसलमान इसे पूरा नहीं गाते। इस वक्तव्य को सुनकर मैं हैरान हूं क्योंकि एक विधानसभा सदस्य से इस अज्ञान की उम्मीद मुझे नहीं है। यह सर्वविदित है कि वंदे मातरम् के प्रथम दो पदों को लेकर ही राष्ट्रगीत की मान्यता दी गई है एवं उतने को ही आधिकारिक तौर पर गाया जाता है। जन गण मन को राष्ट्रगान एवं वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत की मान्यता कैसे दी गई, इस पर हरिवंश राय बच्चन का एक सुदीर्घ लेख है, जिसमें तार्किक ढंग से पूरी बात समझाई गई है। उसे पढ़ लेने से उत्साहीजनों का भ्रम निवारण हो सकेगा।
देशबन्धु में 25 सितम्बर 2014 को प्रकाशित

Wednesday, 17 September 2014

कांग्रेस के शुभचिंतक (!)




कांग्रेस की वरिष्ठ नेता व दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के एक ताजा बयान ने बैठे -ठाले की एक बहस के लिए खासा मसाला जुटा दिया। दिल्ली में सरकार बनाने के लिए भाजपा द्वारा की जा रही कलाबाजी पर उन्होंने कहा कि यदि भाजपा के पास बहुमत है तो उसे सरकार बना लेना चाहिए। पहली निगाह में यह एक सीधा-सादा वक्तव्य जान पड़ता है। लेकिन इसे लेकर तरह-तरह के अर्थ निकाले जाने लगे। उनके कथन का यह विश्लेषण तक किया गया कि वे कांग्रेस नेतृत्व के विरुद्ध जा रही हैं। कांग्रेस के एक-दो प्रवक्ताओं ने अपनी प्रतिक्रिया इस रूप में दी कि यह शीलाजी की निजी राय है। याने उनके बयान से दूरी बनाने की कोशिश की गई। शीला दीक्षित के वक्तव्य में जो 'यदि' प्रत्यय है उसका संज्ञान टीका करनेवालों ने नहीं लिया। या तो वे 'यदि' का महत्व समझे ही नहीं या फिर जानबूझ कर उसे छोड़ दिया। हमारी समझ कहती है कि यह 'यदि' शब्द अर्थ-गंभीर है। यदि भाजपा के पास बहुमत नहीं है तो वह सरकार नहीं बना सकती यह ध्वनि भी इस वाक्य से निकलती है। ऐसा कहकर शीलाजी ने भाजपा पर व्यंग्य कसा है या उसे चुनौती दी है यह भी माना जा सकता है। दूसरे शब्दों में इसे हम एक वरिष्ठ नेता के चतुराई भरे कथन के रूप में भी ले सकते हैं।

हमने तो टीवी पर जो बाइट आई सिर्फ उससे ही बात समझने की कोशिश की है। अगर शीला दीक्षित ने टीवी पत्रकार को विश्वास में लेकर कोई अतिरिक्त जानकारी दी हो, जिससे कांग्रेस हाईकमान से उनकी दूरी का संकेत मिलता हो तो बात अलग है। दरअसल मुझे यह बात कुछ अजीब लगती है कि कांग्रेस पार्टी की चिंता जितनी उसके नेताओं को स्वयं नहीं है उससे ज्यादा विरोधियों और मीडिया को हो रही है। जिस पार्टी को तीन-साढ़े तीन माह पूर्व आम चुनावों में मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से नकार दिया हो, उसके भविष्य को लेकर लोगों को अपना माथा क्यों खराब करना चाहिए? 1984 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को मात्र दो सीटें मिली थीं, किन्तु उस वक्त तो किसी ने भी न भाजपा का अंत होने की भविष्यवाणी की थी और न ही सुबह-शाम उस पर बहसें हुई थीं। भाजपा को अपने आंतरिक ढांचे में जो भी परिवर्तन करने की आवश्यकता महसूस हुई होगी, वे उसने भीतर ही भीतर किए होंगे। अपनी रीति-नीति पर भी खामोशी से पुनर्विचार किया होगा और तब जाकर उसने नए सिरे से ऊर्जा हासिल की जिसकी परिणति आज हमारे सामने है।

यह संभव है कि कांग्रेस में भी इसी तरह से पुनर्विचार और आत्ममंथन चल रहा हो। स्वाभाविक रूप से यह एक दीर्घकालीन प्रक्रिया होगी। कांग्रेस को अपनी रीति-नीति और सांगठनिक ढांचे में जहां भी परिवर्तन करना होंगे वह आगे-पीछे करेगी इसकी उम्मीद की जा सकती है। अभी इसके लिए बहुत समय बाकी है। भारतीय जनता पार्टी व संघ परिवार कांग्रेस को नीचा दिखाने, उसकी हंसी उड़ाने और उस पर वार करने का कोई मौका न छोड़े, यह उससे अनपेक्षित नहीं था। किन्तु राजनीतिक विश्लेषकों एवं पत्रकारों को ऐसी क्या जल्दी है? फिर भी अगर वे कांग्रेस का चुनावोत्तर आकलन करना चाहते हैं, तो उन्हें उत्तराखंड के उपचुनावों में पार्टी को मिली सफलता का नोटिस अपने विश्लेषण के लिए लेना चाहिए। उन्हें इस तथ्य पर भी ध्यान देना चाहिए कि बिहार में जदयू के साथ गठजोड़ करने में कांग्रेस ने काफी तत्परता दिखाई, जिसका लाभ उपचुनाव में एक सीट हासिल करने के रूप में मिला। फिर लोकसभा में विपक्ष का नेता पद भले ही कांग्रेस को न मिला हो, लेकिन मल्लिकार्जुन खडग़े को दलनेता बनाकर क्या पार्टी ने सही संकेत नहीं दिया? (इस कॉलम के प्रेस में जाते तक राजस्थान-गुजरात उपचुनावों में कांग्रेस की सफलता की खबर भी आ चुकी है)।

पिछले तीन माह के दौरान कांग्रेस के अनेक नेताओं ने परस्पर विरोधी बयान दिए। उनसे अनुमान होता है कि पार्टी के वर्तमान हालात में कई नेता स्वयं को असुरक्षित और असहज महसूस कर रहे हैं। इनमें से अधिकतर वे हैं जो पहले से ही अपनी वाचालता एवं अतिशयोक्तिपूर्ण बयानों के लिए विख्यात या कुख्यात रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि कांग्रेस की दुर्गति के लिए ये लोग कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं। आज यदि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इन नेताओं से अप्रसन्न है और उन्हें पहले की तरह भाव नहीं दे रहा है तो इसे देर आयद दुरुस्त आयद ही मानना होगा। हां! यदि ये स्वनामधन्य नेता किसी तरह बाहर जाने का रास्ता खोज रहे हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है। आखिरकार यह उनके राजनीतिक भविष्य का प्रश्न है।

यह तो उन नेताओं की बात हुई जो फिलहाल पार्टी में रुके हुए हैं, लेकिन ऐसे पार्टी सदस्यों की भी कमी नहीं है, जो या तो दलबदल कर रहे हैं या उसकी धमकी दे रहे हैं।  इसमें भी न तो कोई आश्चर्य की बात है और न सुख-दुख मनाने की। भारत में एक राजनीतिक कला के रूप में दलबदल का प्रारंभ 1967 के आम चुनावों के बाद हुआ था एवं इसमें बरस-दर-बरस निखार आते गया है। राजीव गांधी के समय में दल-बदल विरोधी कानून बना, जिसमें एक तिहाई विधायकों की न्यूनतम सीमा निर्धारित कर दी गई। उससे बात नहीं बनी तो सीमा बढ़ाकर पचास प्रतिशत कर दी गई लेकिन दल-बदल करने वाले भी नए-नए उपाय खोजते गए। कहीं-कहीं तो विधानसभा के अध्यक्ष तक इस खेल में शामिल हो गए। अभी दिल्ली में सरकार बनने की जो कोशिश सरकार कर रही है वह इस कला में नवाचार का संकेत देती है। कुल मिलाकर जो भी नेता दल-बदल कर रहे हैं वे अपनी राजनीतिक होशियारी पर अपनी पीठ खुद ठोंक सकते हैं, लेकिन जहां तक जनता की बात है वह तो इन्हें घृणा की निगाह से ही देखती है। मैं नहीं जानता कि मीडिया को ऐसे अवसरवादी सत्तालोलुप राजनेताओं के गुणों का बखान क्यों करना चाहिए।

बहरहाल कांग्रेस के भविष्य को लेकर जो भी चर्चाएं हो रही हैं, वे घूम-फिर कर एक बिन्दु पर केन्द्रित हो जाती हैं कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी को पार्टी का नेतृत्व छोड़कर नए लोगों के हाथ में कमान दे देना चाहिए। इन टीकाकारों का निशाना सोनिया से कहीं ज्यादा राहुल पर है। सोनिया-राहुल को इन शुभचिन्तकों की सलाह की पता नहीं कितनी आवश्यकता है। इतना तो अवश्य प्रतीत होता है कि राहुल गांधी की दिलचस्पी सत्ता की राजनीति में नहीं है। यह युवक यदि चाहता तो 2004 में मंत्री बन सकता था या उसके बात कभी भी। 2010 के आसपास राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की मांग भी अनेक हलकों से उठी थी, किन्तु ऐसे हर मौके को राहुल गांधी ने ठुकरा दिया। हमारा ख्याल है कि यह तो राहुल गांधी को ही तय करना है कि वे राजनीति में किस हद तक, कितनी दूर तक और कितना डूब कर  हिस्सा लेना चाहते हैं। यदि सोनिया गांधी उन्हें आगे लाना चाहती हैं और वे स्वयं नहीं चाहते तब भी इस संबंध में दो टूक निर्णय तो उनको ही लेना होगा।

सोनिया गांधी निर्विवाद रूप से कांग्रेस की एकछत्र नेता हैं। 1998 से लेकर अभी तक उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया है। कांग्रेस ने दो आमचुनाव उनकी अगुवाई में जीते हैं और दस साल सरकार चलाई है। 2014 के चुनावों में हार का नैतिक दायित्व वे अपने ऊपर ले ही चुकी हैं। अत: यह मानना भूल होगी कि राजनीति में उनका समय समाप्त हो चुका है। इस साल और अगले साल जो विधानसभा चुनाव होंगे उनसे पता चलेगा कि राजनीति में उनकी पकड़ कितनी मजबूत या कमजोर है। यह अपेक्षा तो हर पार्टी से की जाती है कि वह समय के अनुरूप अपनी रणनीति में फेरबदल करे। सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस से भी इसकी उम्मीद करना गलत नहीं होगा। वे अगर कांग्रेसजनों से, मीडिया से और आम जनता से अपना संपर्क बढ़ाएं, विभिन्न प्रदेशों और वर्गों के लोगों से संवाद स्थापित करें तो उससे उन्हें लाभ ही होगा।

हमारी आखिरी बात उनके लिए जो पार्टी नेतृत्व को बदल देना चाहते हैं। ऐसा होना मुमकिन नहीं है।  इंदिरा गांधी ने जो परंपरा स्थापित कर ली, सोनिया उस पर ही चल रही हैं। उन्होंने पंडित नेहरू का समय नहीं देखा है। इस स्थिति में जो लोग पार्टी नेतृत्व को ही पराजय का दोषी ठहरा रहे हैं उनके लिए क्या यह बेहतर नहीं होगा कि वे थोड़ी हिम्मत दिखाएं और अपनी कोई नई कांग्रेस पार्टी बना लें? यह रास्ता तो इंदिराजी ने ही दिखाया था, फिर मूपनार, चिदंबरम्, नारायणदत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, माधवराव सिंधिया, शरद पवार, ममता बनर्जी- इन सबने भी समानांतर कांग्रेस बनाने के प्रयत्न किए ही थे। एक बार फिर यह प्रयोग कर लिया जाए!
देशबन्धु में 17 सितम्बर 2014 को प्रकाशित

Thursday, 11 September 2014

आत्मकथा लिखना आसान नहीं



भारत में इन दिनों आत्मकथाओं की बहार आई हुई है। बहार की जगह बौछार लिखूं तो भी शायद गलत नहीं होगा। आप समझ रहे होंगे कि मैं हाल के चंद महीनों में प्रकाशित उन आत्मकथाओं की बात कर रहा हूं जो सत्ता के गलियारों में दखल रखने वाले प्राणियों द्वारा लिखी गई हैं। ये सारी किताबें अंग्रेजी में हैं और ऐसा मौका देखकर बाजार में लाई गई हैं, जब उनकी अधिक से अधिक बिक्री की जा सके। इसके लिए सबसे पहले तो देश के उन प्रकाशन गृहों की तारीफ की जानी चाहिए जो जानते हैं कि पुस्तकें बेचकर मुनाफा कैसे कमाया जाता है। अगर ये आत्मकथाएं सालभर पहले या सालभर बाद प्रकाशित होतीं तो इनकी शायद एक चौथाई प्रतियां  भी नहीं बिकती, न इन पर अखबारों में चर्चा होती और न अंग्रेजी टीवी पर ''पैनल डिस्कशन" होते। यह भी नोट करना चाहिए कि इन पुस्तकों के लेखक वे हैं जो पहले कभी चंद्रमा की तरह प्रकाशमान थे और सौरमंडल से बाहर होते ही अंधेरे में खो गए थे। सो उन्हें एक बार फिर मीडिया की मेहरबानी से प्रकाश में आने का मौका मिल गया है।


मैंने इनमें से कुछ पुस्तकें पढ़ ली हैं, कुछ को पढऩा बाकी है। एकबारगी ही समझ आता है कि इनकी विषयवस्तु किसी हद तक खीज एवं हताशा से उपजी है और इन लेखकों के मन में कहीं क्षीण आशा है कि सत्ता केन्द्र में उनका पुनर्वास हो जाएगा। अगर यह आशा नहीं है तब भी इतना स्पष्ट है कि जीवन में जिन नैतिक मूल्यों का पालन करने की सहज अपेक्षा किसी व्यक्ति से की जाती है, उसे इन्होंने जरूरी नहीं समझा है। मोटे तौर पर ये पुस्तकें बहुत अधिक व्यक्ति केन्द्रित हैं। इनमें आत्मप्रशंसा का भाव कूट-कूटकर भरा है और उसी अनुपात में परनिंदा मानो उफनकर बाहर आ रही है। यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि उसे अफवाहों, चुगलखोरी, दूसरों की बुराई जैसी बातों में रस आता है। इस वजह से इनको पढ़ा तो जा रहा है, लेकिन छुटपुट प्रसंगों को छोड़कर ऐसा कुछ भी नहीं है जो सारगर्भित हो। प्रकाशक बिक्री से खुश, लेखक रॉयल्टी से और ''मजा चखाया" के आनंद से अभिभूत। सिर्फ पाठक हैं जो अपने को छले जाने से दुखी हैं कि पुस्तक में वैसा कुछ भी नहीं है जैसा प्रचारित किया गया था।

मैंने अपनी बात की शुरूआत सत्ता से जुड़े व्यक्तियों की आत्मकथाओं से की है। जीवन के अन्य क्षेत्रों से संबंधित जनों ने भी अपनी कहानियां लिपिबद्ध करने के प्रयत्न किए हैं। इन सबको एक साथ रखकर देखें तो समझ आ जाता है कि आत्मकथा लिखना किसी भी तरह से आसान नहीं है। यूं तो हर व्यक्ति के पास कहने के लिए कुछ न कुछ तो होता है और हरेक को एक छोटे दायरे में पाठक या श्रोता मिल जाते हैं, लेकिन अधिकतर आत्मकथाओं के अंत में हासिल आया शून्य की स्थिति ही बनती है। कहने के लिए आत्मकथा एक व्यक्ति के निज जीवन की कथा होती है, लेकिन कुएं के मेंढक के जीवन के बारे में किसी की भी दिलचस्पी भला क्यों होना चाहिए? मेरे कहने का आशय है कि किसी व्यक्ति की जीवनगाथा का महत्व तभी है जब एक विराट फलक पर उसे उकेरने के लिए थोड़ी सी जगह मिल गई हो या मिलने की संभावना हो। आकाश की नि:सीमता में सूर्य तो एक ही होता है, लेकिन एक छोटे से तारे की टिमटिमाहट के बिना आकाश का काम नहीं चलता। अगर आत्मकथा में वह क्षीण चमक भी न हो तो निरर्थक है।

मुझे ध्यान आता है चार दशक पुरानी घटना का। मेरे हमउम्र किसी लेखक ने मात्र 32 वर्ष की आयु में अपनी आत्मकथा प्रकाशित कर ली। मुझे तब आश्चर्य हुआ था कि इस उम्र में उनमें ऐसा क्या था जो वे पुस्तक के माध्यम से समाज के साथ बांटना चाहते थे। वे बंधु हिन्दी जगत में अपनी पहचान बना रहे थे, लेकिन उनकी रचनात्मक क्षमता मानो उस दौर में ही पूरी तरह छीज गई थी और आज उनका नाम भी कहीं सुनाई नहीं देता। तो क्या यह कहना उचित होगा कि आत्मकथा लिखने वाले अधिकतर लोग आत्ममुग्ध होते हैं और वे अपने व्यक्तित्व का तटस्थ भाव से विश्लेषण करने में असमर्थ होते हैं? मेरी दृष्टि में आत्मकथा की पहली और अनिवार्य शर्त यही है कि वह पाठक के मन में उदात्तता का संचरण करने में समर्थ हो और उसे बौद्धिक रूप से झकझोर सके। ऐसी क्षमता हर व्यक्ति के पास नहीं होती और कई बार ऐसा भी होता है कि जिसके पास अनुभव और विचारों की पूंजी है उसके पास भाषा की पूंजी नहीं है।

इस तरह एक आत्मकथा में समृद्ध अनुभव, सघन विचार और समर्थ अभिव्यक्ति से मिलकर वह आकर्षण होना चाहिए जो दूर-दूर तक प्रभावित कर सके। यह भी तभी कारगर होगा जब जीवनीकार पारदर्शी सच्चाई के साथ अपनी कहानी कहने के लिए तैयार हो। उसमें मानसिक बाधा या संकोच होगा तो वह कभी भी पाठक का ध्यान बांधकर नहीं रख पाएगी। आत्मकथा एक आईना है, जिससे लेखक स्वयं को देख सकता है, लेकिन वह शायद एक ऐसा शीशा भी है जिसके पार खड़ा व्यक्ति भी लेखक के अंतर्मन में झांक सकता है। जो जीवनीकार यह सोचे कि वह पूरी-पूरी सच्चाई सामने रखे बिना भी काम चला सकता है वह अपने आपको भरम में रखता है। इसीलिए ज्यादातर आत्मकथाएं प्रकाशन के बाद बहुत जल्दी भुला दी जाती हैं; भले ही उसकी बिक्री के लिए बढ़-चढ़कर प्रचार क्यों न किया गया हो। हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती, यह पुरानी कहावत यहां लागू होती है।

मेरे ध्यान में आता है कि हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा का पहला खंड ''क्या भूलूं क्या याद करूं" जब प्रकाशित हुआ, तो उसकी बेहद चर्चा हुई। समीक्षकों ने टिप्पणी की कि ऐसी आत्मकथा हिन्दी में पहले कभी नहीं लिखी गई। लेखक की बेबाक स्वीकारोक्तियों की बेहद तारीफ हुई। मैं नहीं जानता कि अब उसे कितने लोग पढ़ रहे हैं, लेकिन मेरी नजर में वह एक ईमानदार आत्मकथा नहीं थी। उसमें ऐसे सच्चे-झूठे प्रसंग थे, जो सनसनी फैला सकें। ऐसा करते हुए लेखक ने यह नहीं सोचा कि उससे कहीं-कहीं अन्यों के चरित्र हनन जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो गई थी। बच्चन मेरे अत्यंत प्रिय कवि हैं, और उनकी आत्मकथा पर प्रतिकूल टिप्पणी करने का मुझे दु:ख है, किन्तु इस बहाने मैं यह बिन्दु उठाना चाहता हूं कि आत्मकथा में एकतरफ यदि आत्मश्लाघा वर्जित है तो दूसरी ओर परपीडऩ भी।

मैं जब हिन्दी में प्रकाशित आत्मकथाओं की तरफ देखता हूं तो कुछ पुस्तकों का ध्यान अनायास हो आता है। इनमें बेशक सबसे ऊपर राहुल सांकृत्यायन की ''मेरी जीवन यात्रा" है। पांच खंडों में विभक्त यह पुस्तक एक व्यक्ति विशेष के जीवन का लेखा-जोखा मात्र नहीं है बल्कि इसमें तत्कालीन समाज व्यवस्था, राजनैतिक उथल-पुथल, वैश्विक घटनाचक्र, लेखक के राजनीतिक विश्वासों का निर्माण व उसकी कारक स्थितियां जैसे बहुविध विषयों से पाठक परिचय पाते हैं। यह ऐसी कथा है जो पढऩे वाले को भरपूर तृप्ति देती है।

मैं दो अन्य पुस्तकों का भी उल्लेख करना चाहता हूं जिनमें से एक है विश्वनाथ त्रिपाठी की ''नंगातलाई का गांव" और दूसरी है बेबी हालदार की ''आलो आंधारी"। दो अलग-अलग जीवन चरित्र, भिन्न व्यक्तित्व, भिन्न जीवन परिस्थितियां और भिन्न अनुभव। विश्वनाथ त्रिपाठी अपनी वृद्धावस्था के प्रथम चरण में अपने बाल्यकाल की कथा लिखते हैं। वे अपने गांव लौटते हैं और वहां के जीवन, व्यक्ति और दृश्य- इन सबको पाठक के सामने जीवंत उपस्थित कर देते हैं। त्रिपाठी जी को हमने व्याख्यान देते कई बार सुना है। वे ठहर-ठहर कर और सोच-सोचकर यद्यपि प्रफुल्लचित्त होकर भाषण देते हैं किन्तु उनकी लेखनी में एक ऐसी तरलता है, जो बिना रुके पाठक को अपने साथ ले चलती है। भाषा पर उनका अद्भुत नियंत्रण है। कुछ ऐसे भी प्रसंग हैं जो सामान्यत: जुगुप्सापूर्ण हो सकते हैं। किन्तु वहां भी त्रिपाठी जी उन पर शब्दों की ऐसी सजावट कर देते हैं कि पढऩे में कहीं कुछ बुरा नहीं लगता। एक वरिष्ठ लेखक से आप और क्या अपेक्षा कर सकते हैं।

बेबी हालदार की आत्मकथा 2003 में जब प्रकाशित हुई थी, मैंने इसी स्तंभ में उसकी चर्चा की थी। उसके बाद तो ''आलो आंधारी" का अंग्रेजी के अलावा भारत की तमाम भाषाओं में रूपांतरण हुआ। शायद ही किसी अन्य पुस्तक का इतने बड़े पैमाने पर अनुवाद हुआ होगा। बेबी हालदार की कथा बेहद कारुणिक है और वह एक संवेदनहीन भारतीय समाज को झकझोरने का यत्न करती है। दुर्भाग्य है कि जब पुस्तक लिखी तब बेबी एक घरेलू नौकरानी थी और आज भी वही है। रॉयल्टी से मिला पैसा उसकी पारिवारिक जिम्मेदारियों में ही उठ जाता है। हरियाणा के जिस गुडग़ांव में वह रहती है, न तो वहां  मुख्यमंत्री ने कभी उसे कोई पुरस्कार या संबल देने की बात सोची, न पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने और न किसी अन्य ने। बहरहाल सवा सौ पन्नों की यह आत्मकथा एक बेबस चीख के रूप में पाठक के सामने है।

मैं अब वापिस लौटता हूं राजनीतिक आत्मकथाओं की ओर। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि पी.सी. पारख, संजय बारू एवं नटवरसिंह की आत्मकथाएं आम चुनाव के चढ़ते और उतरते बुखार के बीच प्रकाशित हुईं। ये पुस्तकें आत्मप्रशंसा में पगी हुई हैं और परनिंदा का भाव इनमें प्रबल है। मुझे इन्हें पढ़कर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। पिछले तीन दशक में इसी तर्ज पर बहुत सी आत्मकथाएं लिखी गई थीं। बी.के.नेहरू, पी.सी. अलेक्जेंडर और बिशन टण्डन जैसे अपने समय के दमदार लोग इनके लेखक हैं। इनमें से लगभग हरेक ने कम ज्यादा मात्रा में अपनी काबिलियत, बुद्धिमता एवं उपलब्धियों का बखान किया है और देश के प्रशासन में जहां कोई कमी या गड़बड़ी दिखी है तो उसका दोष बड़ी आसानी से नेहरू, इंदिरा, राजीव या सोनिया गांधी पर डाल दिया है। एक औसत बुद्धि का पाठक भी तुरंत समझ जाता है कि लेखक ने अपनी कोई अपेक्षा आकांक्षा पूरी होते न देखकर शीर्ष व्यक्ति पर जानबूझकर निशाना साधा है। इन्हें पढऩे से निंदारस की प्राप्ति तो होती है, लेकिन फिर वही रस थोड़ी देर बाद कड़वा लगने लगता है। इस श्रेणी में एक पुस्तक एक जानी-मानी पत्रकार की भी है, वह है तवलीन सिंह की ''दरबार"। इसमें लेखिका राजीव-सोनिया के साथ अपनी अंतरंग मित्रता का उल्लेख करती हैं और बाद में मोहभंग का भी। इन तमाम पुस्तकों के बारे में मैं जो सोचता हूं, उसे एक प्रचलित शेर से बेहतर व्यक्त किया जा सकता है-
''वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोडऩा अच्छा।"इस फिल्मी गीत की पहली पंक्ति है- ''चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों।"
जीवन में संबंध बनते और बिगड़ते हैं, यह एक सच्चाई है। इसे स्वीकार कर नई स्लेट पर इबारत लिखना शुरू करना बेहतर होता है बजाय इसके अतीत को लेकर कुढ़ते रहें और बदला चुकाने के भाव से इस तरह के किस्से लिखें। खैर! इन किताबों को पढ़ते हुए मुझे एक अन्य पुस्तक ध्यान में आई। पी.वी. नरसिंहराव के प्रेस सलाहकार रहे पी.वी.आर.के. प्रसाद की पुस्तक का शीर्षक है ''Wheels Behind The Veil: Pms, Cms and Beyond" श्री प्रसाद किसी समय रायपुर के शासकीय विज्ञान महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे वे सेवानिवृत्ति के उपरांत हैदराबाद में रहते हैं और शायद इसीलिए दिल्ली के तौर-तरीके नहीं सीख पाए। उनकी पुस्तक दो साल पहले हैदराबाद से छपी और उसकी कोई चर्चा नहीं हुई। इसमें श्री प्रसाद ने श्री राव की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वे धीरूभाई अंबानी से भी अभिभूत हैं। इसका उल्लेख मैंने इसलिए किया कि देश के राजनीतिक इतिहास की एक अहम् कड़ी को हम बिल्कुल ही भूल न जाएं।

यूं तो पुस्तकें और भी हैं- जैसे जाविद चौधरी की ''The Insider's View: Memories Of A Public Servant"। श्री चौधरी गुजरात कैडर के अफसर थे। उनकी आत्मकथा देश के प्रशासनिक ढांचे और निर्णय प्रक्रिया आदि को समझने में वस्तुगत तरीके से मदद करती है। एक समय विदेश सचिव रहे जगत मेहता की जीवनी भी विदेश नीति एवं कूटनीतिक मसलों को समझने के लिए उपयोगी है, यद्यपि उनके अनेक विचारों से मेरी असहमति है। ये सब अभी दो-तीन वर्षों के भीतर प्रकाशित आत्मकथात्मक पुस्तकें हैं। यह देखना दिलचस्प है कि जिन किताबों में नेहरू, गांधी परिवार पर व्यक्तिगत आक्षेप किए गए हैं, उनका प्रचार और उनकी चर्चा कहीं अधिक हुई है। पाठक स्वयं समझ सकते हैं कि इसके क्या कारण हैं।

एक विधा के रूप में आत्मकथा पर चर्चा करते हुए दो पुस्तकें ऐसी हैं जिनका उल्लेख किए बिना बात पूरी नहीं हो सकती। ये पुस्तकें पन्ने रंगने के लिए नहीं लिखी गईं। उनका उद्देश्य न तो अपनी धाक जमाना था और न किसी को नीचे गिराना। ये ऐसी पुस्तकें हैं जो जीवन यात्रा में जगह-जगह पर हमारा मार्गदर्शन करती हैं। ये निष्कपट मन से लिखी गई हैं। इनमें बहुविध एवं प्रामाणिक अनुभव हैं और है विचारों की गहराई। महात्मा गांधी की ''सत्य के प्रयोग" तथा जवाहरलाल नेहरू की ''मेरी कहानी" ऐसी दो पुस्तकें हैं जो हर व्यक्ति को पढऩा चाहिए।
अक्षर पर्व सितम्बर 2014 में प्रकाशित प्रस्तावना

प्राकृतिक आपदा, गंगा और नदी जोड़




जम्मू कश्मीर प्रदेश विगत साठ वर्षों की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है। 2500 गांवों में बाढ़ का पानी भर गया है। साढ़े चार सौ गांव पूरी तरह डूब चुके हैं और एक सौ साठ व्यक्ति मौत के मुंह में जा चुके हैं। यह खबर रविवार को कॉलम लिखते वक्त की है। इसके प्रकाशित होने तक क्या स्थिति होगी अनुमान ही किया जा सकता है। इस बीच जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग तो बंद हैं ही, रेल सेवा भी आंशिक रूप से स्थगित कर दी गई है तथा वैष्णो देवी तीर्थयात्रा को भी रोक दिया गया है। कुल मिलाकर स्थिति चिंताजनक है। कुछ दिन पूर्व महाराष्ट्र में पहाड़ी धसकने से एक गांव लगभग पूरा ही खत्म हो गया, इसकी याद पाठकों को होगी। एक अकेले गांव पर आई इस आपदा ने भी कोई दो सौ जनों की प्राणों की आहुति ले ली थी। जम्मू-कश्मीर की बात करें तो कुछ वर्ष पूर्व पाक अधिकृत कश्मीर में आई बाढ़ और तूफान का सहसा ध्यान आ जाता है, जिसने बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी थी।

अभी पिछले साल ही हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड में प्रकृति ने जो तांडव किया उसके स्मरण मात्र से रोंगटे खड़े होने लगते हैं। कुछ वैसा ही अनुभव दो वर्ष पूर्व कोसी में आई बाढ़ के कारण बिहार को भी झेलना पड़ा था। कुल मिलाकर ऐसा महसूस होने लगा है कि प्राकृतिक आपदाएं अब बहुत तेजी के साथ अपवाद की बजाय नियम बनती जा रही हैं। अकेले अपने देश की बात क्या करें, सारी दुनिया में कुछ ऐसा ही सिलसिला चला हुआ है। मौसमविज्ञानी और पर्यावरणविद् चेतावनियां दे रहे हैं कि विश्व में ऋतु चक्र और जलवायु में लगातार परिवर्तन हो रहा है। आर्कटिक क्षेत्र में पाए जाने वाले धु्रवीय सफेद भालुओं के सामने जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित हो गया है क्योंकि जमी हुई बर्फ के नीचे सील मछली के रूप में मिलने वाले उनके आहार में हिमखंड पिघलने के कारण निरंतर कमी आती जा रही है। लंदन जैसे शहरों  में अब गर्मी के दिनों में आग बरसने लगी है और केलिफोर्निया में भीषण सूखे की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

ऐसा वातावरण क्यों कर निर्मित हो रहा है? सामान्य बुद्घि उत्तर देती है कि मनुष्य ने प्रकृति के साथ साहचर्य का रिश्ता खत्म कर लिया है। पहले मनुष्य प्रकृति से उतना ही लेता था, जितने  कि उसे आवश्यकता होती थी। लेकिन अब मनुष्य समाज पहले के मुकाबले ज्यादा आक्रामक और हिंसक हो गया है।  उसने वैज्ञानिक खोजों के माध्यम से जो तकनीकी विकास किया है उसके चलते मनुष्य को लगने लगा है कि वह प्रकृति पर विजय हासिल कर उसके साथ मनचाहा व्यवहार कर सकता है। इस मनोविकार के उदाहरण दैनंदिन जीवन में देखे जा सकते हैं। पुराने समय में किसी भी वस्तु का मूल्य उसकी दीर्घजीविता से निर्धारित होता था। अब हमें हर दिन, हर पल नया और नए से नया चाहिए। ''इस्तेमाल करो और फेंको" का मंत्र हमने दिन प्रतिदिन के जीवन में अपना लिया है। लालच में यह महत्वपूर्ण तथ्य भुला दिया गया है कि प्रकृति के पास जो कुछ भी है, वह असीमित व अशेष नहीं है।

एक दूसरा वर्ग उन लोगों का है जो यह मानकर चलता है कि घबराने की कोई बात नहीं है, अगर कोई एक संसाधन समाप्त हो जाए तो उसका विकल्प तैयार होते देर नहीं लगेगी। जैसे कोयले के भंडार समाप्त हो रहे हैं तो जैविक ऊर्जा, सौर ऊर्जा व परमाणु ऊर्जा की बात होने लगी है। गनीमत है कि ऐसे लोग अल्पमत में हैं। हमें कई बार शक भी होता है कि नए-नए विकल्पों का दावा करने वाले ये लोग किसके इशारे पर बात कर रहे हैं! जैविक ऊर्जा के उदाहरण से बात समझें। ब्राजील ने गन्ने से इथनॉल  निकालकर पेट्रोल में परिवर्तित करने का काम बड़े पैमाने पर किया। लेकिन इससे अंतत: क्या हासिल हुआ? यही कि जहां लोगों का पेट भरने के लिए अनाज उगाया जाता था, वहां मोटरयानों की टंकी भरने के लिए गन्ने की खेती होने लगी। भारत में भी बड़े पैमाने पर रतनजोत से पेट्रोल निकालने की बात की गई है, लेकिन अरबों रुपया खर्च करने के बाद कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। ऐसे प्रयोगों से राजनेता, अफसर और उद्योगपतियों को जो कमाई करना थी वह उन्होंने कर ली।

विज्ञान में नित नए अनुसंधान अच्छी बात है। उनसे मनुष्य का जीवन बेहतर बनाने के उपकरण मिलते हैं तो वह भी स्वागत योग्य है। इसके बावजूद मनुष्य और प्रकृति के बीच में एक संतुलित संबंध बने रहना परम आवश्यक है। यह मनुष्य के अपने हित में है कि वह अपनी इच्छाओं को बेलगाम न छोड़े। यह सच है कि आदिम जंगलों की गिरि कंदराओं से निकल कर वर्तमान में कांक्रीट के जंगलों में अपना डेरा जमाने तक मनुष्य जाति ने हजारों सालों का सफर तय किया है, लेकिन वह प्रकृति ही थी जिसने उसे हर तरह से हर समय साथ दिया। एक समय माओत्से तुंग ने बीजिंग में चिडिय़ों को खत्म करने का फरमान जारी कर दिया था। आज भी बीजिंग का पक्षी रहित आकाश बहुत सूना लगता है। क्या हम बिना पशु-पक्षियों के और बिना हरियाली के रहने की कल्पना कर सकते हैं? अगर हां, तो फिर न तो राष्ट्रीय उद्यानों की आवश्यकता है और न उनकी सरहद पर बसे पांच सितारा होटलों की।

दरअसल यह पांच सितारा संस्कृति ही है, जो बड़ी हद तक पर्यावरण के विनाश के लिए दोषी हैं। इनकी शिनाख्त करने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। इन्हें हम जानते-पहचानते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि अपने तात्कालिक स्वार्थ के लिए मनुष्य और प्रकृति दोनों के विरुद्ध जो अपराध हो रहे हैं उन्हें कैसे रोका जाए। एक-दो छोटे-छोटे उदाहरणों पर गौर कीजिए। इधर कुछ सालों से बद्रीनाथ, केदारनाथ, अमरनाथ, वैष्णो देवी जैसे तीर्थों के लिए हेलिकाप्टर सेवाएं शुरू हो गई हैं। इसी तरह श्रीनगर, शिमला, नैनीताल, दार्जिलिंग आदि तमाम स्थानों पर, और उसी तर्ज पर समुद्र तटीय स्थानों पर विलासितापूर्ण जीवन शैली के लिए भांति-भांति के प्रबंध किए जाने लगे हैं। इन सबसे पर्यावरण को जो नुकसान होता है उसकी ओर ध्यान देने की आवश्यकता कोई नहीं समझता। यह सिर्फ अपने देश की बात नहीं, अन्यत्र भी कमोबेश ऐसी ही स्थितियां हैं।

इस सिलसिले में अपने प्रधानमंत्री के एक संकल्प की बात करना प्रासंगिक होगा। उन्होंने गंगा को नए सिरे से निर्मल करने का अभियान छेड़ा है। गंगा और यमुना को स्वच्छ करने की कवायद पिछले कई साल से चली आ रही है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में इन नदियों में प्रदूषण के लिए कारखानों और नगरीय निकायों को दोषी ठहराया जाता है। वह तो ठीक है, लेकिन गंगा और यमुना जहां से अवतरित होती हैं वहां से लेकर मैदान में उतरने तक की स्थिति क्या है? अनियंत्रित पर्यटन के कारण, जलविद्युत परियोजनाओं के कारण जो नुकसान हो रहा है, उसके बारे में कोई बात ही नहीं करना चाहता। यह भी गौरतलब है कि हिमालय की पर्वतमाला में अब पहले के मुकाबले बर्फ कम गिर रही है तथा वे हिमखंड भी तीव्रगति से पिघल रहे हैं, जिनसे इन सरिताओं का जल संवर्धन होता था। अगर इस वास्तविकता से मुंह मोड़ा गया तो नदियों का प्रदूषण तो दूर, उनका अस्तित्व ही समाप्त होने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

मुश्किल यह है कि एक तरफ तो हम अपने पारंपरिक ज्ञान को भूल रहे हैं और दूसरी तरफ अनुभवों से भी सीखने में हमारी रुचि नहीं है। हमें सिर्फ वे महत्वाकांक्षी योजनाएं पसंद आती हैं, जिनमें अरबों-खरबों रुपयों का निवेश हो और जिससे भारत के सामाजिक पिरामिड के ऊपर बैठे कुछ प्रतिशत लोगों की सात पीढिय़ां तर जाएं। पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम बहुत भले व्यक्ति हैं, लेकिन उनकी नदी जोड़ योजना की अव्यवहारिकता को दरकिनार कर एक बार फिर उसे लागू करने की बात होने लगी है। कोई बताए कि जब ग्लेशियर पिघलेंगे और हिमालय से उतरती नदियों में पानी कम हो जाएगा तब उनके पास दक्षिण की नदियों को देने के लिए अतिरिक्त पानी कहां से आएगा? इसी तरह और भी बहुत से प्रश्न हैं।

जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड, बिहार तथा अन्य प्राकृतिक विपदाओं का स्मरण करते हुए हम कहना चाहेंगे कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए, पर्यावरण की रक्षा के लिए व जन-धन की हानि होने के लिए सामाजिक सहयोग से प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। कथित विकास के नाम पर कानूनी प्रावधानों की अवज्ञा करना सही नहीं है। राष्ट्रीय हरित अभिकरण (एनजीटी) जैसी संस्था को कमजोर करना सरकार का अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोडऩा है। प्रकृति और समाज के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए इस पर तार्किक विचार नहीं होगा तो प्रकृति अपने हिसाब से बदला लेती रहेगी।
 देशबन्धु में 11 सितम्बर 2014 को प्रकाशित

Wednesday, 3 September 2014

उन्होंने बुखारा में तरबूज खरीदे


 वे दोनों पत्रकार थे। उम्र में साठ के आसपास, इसलिए कहना होगा वरिष्ठ। दोनों दिल्ली के थे। प्रधानमंत्री के साथ पहले भी विदेश यात्राएं कर चुके थे। बुखारा से आए जहाज से उतरकर ताशकंद में दिल्ली के लिए जब वे विमान में चढऩे लगे तो एक रोचक दृश्य देखने मिला। दोनों के हाथों में दो बड़े-बड़े तरबूज थे, जिन्हें वे किसी तरह संभाल पा रहे थे। किसी ने पूछा- यह क्या भई! जवाब था- बुखारा के तरबूज बहुत मीठे होते हैं। हम लोग चार दिन की सोवियत संघ की यात्रा के बाद स्वदेश वापिस लौट रहे थे। यह प्रसंग है जुलाई 1990 का। वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री थे। इस यात्रा में हम मास्को के अलावा ताशकंद, समरकंद और बुखारा भी गए थे। हम कोई तीस-पैंतीस पत्रकार उनके साथ चल रही प्रेस पार्टी के सदस्य थे। प्रधानमंत्री के लगातार एक के बाद एक कार्यक्रम थे।  इन दोनों सज्जनों के अलावा  अनेक अन्य पत्रकारों को भी मैंने भारतीय प्रधानमंत्री के किसी भी कार्यक्रम में नहीं देखा।

अधिकतर साथी क्रैमलिन में गोर्बाच्योव-वी.पी. सिंह भेंट के बाद अपने-अपने हिसाब से घूमने निकल गए थे। दो अन्य पत्रकार ऐसे भी थे, जो पहले दिन के बाद कहीं दिखे ही नहीं। लौटते वक्त जब उन्हें विमान में लाकर बैठा दिया गया तब ख्याल आया कि अरे! ये भी तो साथ थे। ये दोनों मास्को में किसी गोरखधंधे में उलझ गए थे और उन्हें पुलिस ने रोक लिया था। प्रधानमंत्री के साथ गए थे इसलिए वापिस लौटने की अनुमति मिल गई। मेरी किसी प्रधानमंत्री के साथ यह पहली यात्रा थी इसलिए मैं कुछ अतिरिक्त उत्साह के साथ कार्यक्रमों का कवरेज करने में जुटा हुआ था। मुझे साथ ही साथ यह हैरानी भी हो रही थी कि बाकी पत्रकार क्या कर रहे हैं। यूं कहने को तो हम प्रधानमंत्री के साथ गए थे, लेकिन वे हमसे सिर्फ एक बार ही मिले, लौटते समय जब विमान में ही एक संक्षिप्त पत्रवार्ता हुई। बाकी तो उनके कार्यक्रमों की और यात्रा की रिपोर्टिंग हमें उसी तरह करना चाहिए थी जिसकी अपेक्षा सामान्यत: हर रिपोर्टर से की जाती है। इतना जरूर था कि आते-जाते पूरे समय खातिरदारी अच्छी हुई: मास्को में होटल के हमारे कमरों में हरेक के लिए में ब्लैक लेबल की एक-एक बोतल भी रखी हुई थी।

मुझे मार्च 1994 में दूसरी बार प्रधानमंत्री के साथ यात्रा का अवसर मिला। पी.वी. नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री थे। इस यात्रा में भी पत्रकारों का हालचाल वैसा ही था, जो मैं पहले देख चुका था। जब भी प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर जाते हैं अमूमन तीन दर्जन पत्रकारों को साथ ले जाते हैं। यात्रा दल में कुछ मंत्री, कुछ अफसर और कुछ विषय-विशेषज्ञ भी होते हैं। इसका मकसद शायद यही होता हो कि यात्रा के दौरान अनौपचारिक तौर पर विचार-विमर्श हो, जो देश-विशेष के साथ संबंध विकसित करने में कुछ काम आए। लेकिन मैंने देखा कि अधिकतर सहयात्रियों की इसमें रुचि नहीं होती। इसके बावजूद अनेक पत्रकार इस जोड़-तोड़ में लगे रहते हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री या अन्य किसी वीवीआईपी के साथ विदेश यात्रा का मौका कैसे मिले। फिर भले ही उस देश के बारे में उनकी जानकारी शून्य ही क्यों न हो।

मुझे इंग्लैण्ड यात्रा में एक ऐसे साथी पत्रकार मिले जिन्हें इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री का नाम तक मालूम नहीं था। हमने यह भी देखा कि कई बार पत्रकारों की जगह अखबार के मालिक यात्रा पर चले गए और अपने कार्यालय को निर्देश दे गए कि वार्ता या भाषा से जो खबर आए उसे प्रतिदिन उनकी बाइलाइन के साथ छाप दिया जाए। एक बड़े प्रतिष्ठित  हिन्दी अखबार में तो बात यहां तक पहुंची कि पत्र के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख को जो कि स्वयं एक अतिसम्मानित पत्रकार थे पत्रस्वामी से निर्देश मिला कि वे स्वयं न जाकर मालिक के बेटे का नाम प्रेस पार्टी में शामिल करवा दें। उन वरिष्ठ पत्रकार ने क्षुब्ध होकर अखबार ही छोड़ दिया। ये कुछ उदाहरण हैं जिनसे प्रकट होता है कि प्रधानमंत्री के साथ यात्रा करने का लक्ष्य यही होता है कि उन्हें दो-चार दिन खुद पर इठलाने का मौका मिल जाए। जब ऐसा अवसर नहीं मिलता तो भाई लोग नाराज हो जाते हैं। नरसिंह राव के प्रेस सलाहकार पी.वी.आर.के. प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में वर्णन किया है कि एक अंग्रेजी अखबार के संपादक ने उनके खिलाफ मुहिम छेड़ दी क्योंकि संपादक महोदय की पत्रकार पत्नी को वे प्रेस पार्टी में शामिल नहीं कर सके।

दरअसल भारतीय समाज में विदेश यात्रा के प्रति एक अजीब तरह का आकर्षण है। जिस देश में पोंगा पंडितों ने विदेश यात्रा पर कभी पाबंदी लगा दी थी और भूले-भटके चले गए तो लौटने पर शुद्धिकरण करना होता था, उस देश में यह आकर्षण क्यों है यह तो समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक बता पाएंगे। इसलिए अगर किसी को विदेश यात्रा का अवसर मिल जाए तो वह शुभचिंतकों के लिए प्रसन्नता का एवं अन्यों के लिए ईष्र्या का सबब बन जाता है। इस मनोवृत्ति में इधर काफी कमी आई है, लेकिन जब देश के प्रधानमंत्री के साथ ऐसा अवसर मिले, तो फिर कहना ही क्या है। मैंने स्वयं ऐसे अवसर जुटाने की कोशिश की कि इससे अपने प्रसार क्षेत्र में अखबार की धाक कुछ और ज्यादा जम जाएगी।

अखबार की प्रतिष्ठा बढऩे के साथ-साथ अखबारनवीस को भी गर्व का अहसास होता ही है। लोग समझने लगते हैं कि देखो इस पत्रकार की पहुंच कितनी ऊंची है। हम भी कुछ ऐसा भाव जतलाते हैं गोया प्रधानमंत्री के साथ रोज सुबह चाय पीते हैं। लेकिन अवसर पाना आसान नहीं होता। अक्सर तो दिल्ली वालों के खाते में ही यह मौका जुड़ता है। क्षेत्रीय और भाषायी अखबारों को कोई न कोई सीढ़ी ढूंढना पड़ती है। मैं जब वी.पी. सिंह के साथ गया तब प्रसिद्ध पत्रकार प्रेमशंकर झा उनके प्रेस सलाहकार थे। मेरे सुयोग्य सहयोगी व मैत्री-प्रवीण गिरिजाशंकर का उनसे अच्छा परिचय था। गिरिजा ने प्रेमजी से बात की और मेरा नाम जुड़ गया। दूसरी बार पी.वी.आर.के. प्रसाद प्रेस सलाहकार थे, वे रायपुर में साइंस कॉलेज में व्याख्याता रह चुके थे। रायपुर के महापौर रह चुके (स्व.) एस.आर. मूर्ति ने मेरा उनसे परिचय करवाया था।

मैंने यह सारा खुलासा इसलिए किया क्योंकि वर्तमान  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी विदेश यात्राओं में प्रेस पार्टियों के लिए कोई जगह नहीं रखी। ऐसा करने वाले वे पहले प्रधानमंत्री हैं। यद्यपि इसके पूर्व ऐसे अवसर आए हैं जब प्रेस की खुली मेहमाननवाजी नहीं की गई है। मैंने जब यात्राएं की थीं तब पूरी यात्रा सरकारी खर्चे पर होती थीं। इधर कई सालों से एयर इंडिया-1 में यात्रा तो मुफ्त हो जाती थी, लेकिन होटल का किराया पत्रकार या उसके संस्थान को वहन करना पड़ता था। अभी भी शायद कुछ ऐसा इंतजाम किया गया है कि मीडिया संस्थान अपना प्रतिनिधि भेजना चाहे तो संपूर्ण व्यय यात्रा उसे वहन करना पड़ेगा। मुझे ध्यान आता है कि अमेरिका की रिपोर्टर गिल्ड जैसी संस्था ने अपने सदस्यों पर नियम लागू कर रखा है कि यदि वे राष्ट्रपति के साथ दौरे पर जाते हैं तो उसका पूरा खर्च उन्हें स्वयं उठाना होगा। मैंने न्यूयार्क टाइम्स के विख्यात पत्रकार जेम्स रैस्टन की पुस्तक में बरसों पहले यह बात पढ़ी थी।

प्रधानमंत्री के साथ विदेश यात्रा करने के बारे में मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री को पत्रकारों से परहेज नहीं करना चाहिए। पत्रकारों के चयन के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था बने और उन पत्रकारों को मौका मिले जो मेजबान देश के बारे में कुछ जानते-समझते हों तथा प्रधानमंत्री की यात्रा का राजनीतिक विश्लेषण करने में सक्षम हों। विशेष विमान में जब कूटनयिक, विषय-विशेषज्ञ एवं पत्रकार साथ बैठेंगे तो उनकी चर्चाओं में ऐसे बिन्दु उभर कर आने की संभावना ऐसे बनी रहेगी जिनसे सरकार को अपने संवाद की दिशा निर्धारित करने में सहायता मिल सकेगी। सजग पत्रकारों का उपयोग दुनिया भर की सरकारों ने ट्रेक-2 डिप्लोमेसी के लिए समय-समय पर किया है। ऐसी यात्राएं इस दिशा में भी भविष्य के लिए उपयोगी हो सकती हैं। बाकी तो मोदीजी प्रधानमंत्री हैं, वे जो चाहें सो करें!
देशबन्धु में 04 सितम्बर 2014 को प्रकाशित