Thursday, 27 December 2012

दूसरी चीन यात्रा: कुछ नए अनुभव




चीन 
जैसे महाकाय देश को छह दिन के संक्षिप्त प्रवास में समझ लेना और कोई निर्णायक राय बना लेना कठिन ही नहीं असंभव है। फिर भी चीन के बारे में लंबे समय से जितना कुछ पढ़ा और सुना था उसके आधार पर अपनी दूसरी यात्रा के दौरान जो कुछ देखा उसकी कुछ छवियां पाठकों के साथ साझा करने में शायद कोई हर्ज नहीं है। मेरी पहली चीन यात्रा अक्टूबर 2005 में अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन के शिष्ट मंडल के साथ हुई थी जिसमें भारत से हम छह सदस्य थे। इस बार मैं विश्व शांति परिषद के डैलिगेशन का सदस्य बनकर गया था और भारत से मैं अकेला ही था। चीन की प्राचीन चार राजधानियों में से दो बीजिंग व शियान पहली यात्रा में देख ली थी। इस बार तीसरी प्राचीन राजधानी नानजिंग देखने का भी अवसर मिल गया।

चीन में पिछले सात सालों के दौरान कुछ बदलाव आए हैं, लेकिन मैंने जो बदलाव सबसे पहले अनुभव किया वह मौसम का था। अक्टूबर में देश का मौसम खुशगवार था, जबकि अभी दिसम्बर मध्य में वहां कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। शंघाई, नानजिंग, बीजिंग- तीनों ही शहरों में कभी शून्य, कभी शून्य से थोड़े ऊपर के तापमान के बीच बादल भी जब-तब बरस कर मौसम को और ठंडा कर रहे थे। हमारे बीजिंग पहुंचने के एक दिन पहले तक वहां बर्फ भी गिर रही थी। और जब हम पहुंचे तब जगह-जगह बर्फ हटाने का काम चल रहा था। नानजिंग से बीजिंग की हमारी ट्रेन राजधानी के कुछ किलोमीटर पहले ही रोक दी गई और बहुत सावधानी से धीमी रफ्तार के साथ आगे बढ़ाई गई ताकि कोई अनहोनी न हो जाए। बीजिंग से पचास-साठ किलोमीटर पर बादालिंग नामक स्थान है: अमूमन चीन की दीवार देखने पर्यटक यहीं आते हैं, लेकिन हमारे प्रवास के दौरान यह रास्ता बर्फ से ढंका होने के कारण बंद था और मैं चीन की दीवार दुबारा देखने से वंचित हो गया। 

2005 में शंघाई एक विकसित होता हुआ शहर था, लेकिन इन सात सालों के दरम्यान उसकी शक्ल पूरी तरह बदल गई है। नए शहर का एक हिस्सा ऐसा है, जिसकी तुलना स्वयं चीन के लोग न्यूयार्क के मैनहट्टन से करते हैं याने समृध्दि का द्वीप। शंघाई का पुराना शहर भी काफी कुछ अपने पुराने रूप में कायम है। लेकिन अब वहां भी पुरानी इमारतों को जमींदोज कर गगनचुंबी अट्टालिकाएं खड़ी हो रही हैं। बीजिंग, नानजिंग, शंघाई- सभी जगह जमीनों के भाव भी उसी अनुपात में गगनचुंबी हो चले हैं। जिन लोगों ने अपनी पुश्तैनी जमीनें रीयल एस्टेट वालों को बेच दी है, वे फिलहाल करोड़पति तो बन ही गए हैं। यह पढ़कर आपको गुड़गांव या नोएडा का खयाल आ सकता है। मैंने शंघाई में ऐसे दो स्थान देखे जिनका निर्माण 2005 के आसपास प्रारंभ हो चुका था। पहला- पुडोंग में नया विमानतल। मुझे दिल्ली का टी-3 उसके मुकाबले बेहतर प्रतीत हुआ। दूसरा- टीवी टॉवर जिसमें 259 मीटर तक ऊपर जाने की अनुमति थी। वहीं से सामने एक और इमारत दिखाई देती है, जो संभवत: 362 मीटर ऊंची है। और उसके बगल में ही चार सौ मीटर से ऊंची एक मीनार खड़ी हो रही है। 

शंघाई में होनपु नामक नदी है, जो शहर के भीतर यू आकार में बहती है और इस तरह महानगर को तीन हिस्सों में बांटती है। बीच में एक जगह नदी तट पर कोई दो किलोमीटर लंबा घाट विकसित किया गया है, जो सैलानियों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र है। पास में ही वाहनों के लिए प्रतिबंधित एक सड़क है, जिस पर चहलकदमी करते हुए आप आजू-बाजू के मॉल व मैगा स्टोर्स में और कुछ नहीं तो विंडो शॉपिंग कर सकते हैं। इस बाजार में दुनिया के हर प्रसिध्द ब्राण्ड का माल आपको मिल जाएगा। चीन विश्व की दूसरी आर्थिक महाशक्ति बन चुका है और उसे न तो केएफसी या मेकडोनाल्ड से डर लगता है और न वालमार्ट से। इस सड़क पर घूमते हुए मन में सवाल उठा कि यहां जो महंगे-महंगे सामान बिक रहे हैं इनको आखिर खरीदता कौन है। समझ आया कि देश में निश्चित रूप से ऐसा धनिक वर्ग तैयार हो चुका है, जिसके पास यह सामर्थ्य है।  दूसरे-नौजवानों को भी यह बाजार लुभा रहा है।

शंघाई से हम नानजिंग के लिए बुलेट ट्रेन में रवाना हुए। यह एकदम नया अनुभव था। शंघाई, बीजिंग और नानजिंग तीनों शहरों में हमने रेल्वे स्टेशन देखे। हर जगह चार या उससे यादा रेल्वे स्टेशन है, जो अलग-अलग दिशाओं की सेवा करते हैं। हर रेलवे स्टेशन विमानतल की तर्ज पर बना है। तलघर में या दूर कहीं पार्किंग, फिर स्वचालित सीढ़ी या एस्केलेटर से ऊपर, प्रवेश द्वार पर एक्स-रे मशीन की सामान की जांच, यात्रियों की खानातलाशी, फिर दूसरी स्वचालित सीढी से और ऊपर लंबा गलियारा पार कर अपने बोर्डिंग गेट पर, ट्रेन आने के पन्द्रह मिनट पहले बोर्डिंग गेट खुलता है, नीचे उतरकर प्लेटफार्म पर आओ, टिकट पर बोगी नंबर लिखा है, अपने निर्धारित स्थान पर खड़े हो जाओ, ट्रेन का दरवाजा वहीं खुलेगा, दो या तीन मिनट रेलगाड़ी रुकती है। सैकड़ों यात्री, लेकिन कोई भगदड़ नहीं। प्लेटफार्म पर यात्रियों के अलावा कोई नहीं आ सकता। बूढ़े या अशक्त लोगों को किस तरह संभाला जाता है यह मैं नहीं देख पाया। शंघाई से नानजिंग चलने वाली बुलेट ट्रेन में मात्र एक घंटा बीस मिनट में तीन सौ किलोमीटर से अधिक का सफर तय कर लिया। ट्रेन यादातर समय दो सौ नब्बे किलोमीटर की औसतन रफ्तार से दौड़ती रही। इसी तरह नानजिंग से बीजिंग का एक हजार किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करने में ट्रेन ने महज चार घंटे लिए गो कि बर्फ के कारण ट्रेन आधा घंटा लेट हो गई। हमारे साथ चल रहे चीनी शांति संगठन के साथी शर्मिंदा होकर सफाई दे रहे थे, यद्यपि उसकी कोई जरूरत नहीं थी। 

मुझे शंघाई से नानजिंग के बीच यह देखकर अचरज हुआ कि पूरे रास्ते में जितने भी गांव पड़े कहीं भी एक व्यक्ति न तो सड़क पर नजर आया और न घरों के बाहर लोग सुस्ताते, गपियाते नजर आए। क्या इसलिए कि अपरान्ह का समय था और सब कारखाने या दफ्तर में अपने-अपने काम में मशगूल थे? इस पूरे रास्ते पर जगह-जगह हमें विद्युत संयंत्र व अन्य कारखाने देखने मिले। नानजिंग से बीजिंग के लिए हम सुबह सवा सात बजे रवाना हुए थे। इस लंबे रास्ते पर भी कुछ वैसा ही दृश्य था। आधे रास्ते तक तो खेत दिखते रहे, लेकिन उसके बाद का नजारा एकदम अलग था। चारों तरफ बर्फ की चादर बिछी हुई थी। ट्रेन में हमने यह भी देखा कि लगभग सभी ट्रेन कर्मी महिलाएं ही थीं। और दूसरी बात यह नोटिस की कि दोनों यात्राओं में कोई भी टिकट चेक करने नहीं आया। शायद इसलिए कि प्लेटफार्म पर आने के पहले स्वचालित मशीन से पहले ही टिकट चेकिंग हो जाती है। मुझे ट्रेन यात्रा के दौरान  बातचीत में यह भी पता चला कि चीन में अभी भी औरतों को पचास वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त कर दिया जाता है ताकि वे अपने घर-परिवार की जिम्मेदारियां संभाल सकें।  संभवत: नौजवानों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए भी ऐसा किया जाता है।

बहरहाल अपनी इस दूसरी यात्रा में मेरा ध्यान इन दो बातों पर विशेषकर गया। एक तो मैंने यह अनुभव किया कि चीन में धनिकों का एक नया वर्ग तैयार हो जाने के बावजूद जाहिरा तौर पर वहां सामाजिक व्यवहार के स्तर पर गैर-बराबरी नहीं है। नानजिंग रेलवे स्टेशन के बोर्डिंग गेट पर पैरों से लाचार एक युवा भिक्षा मांग रहा था। थोड़ी देर में ही वह उचक कर अन्य यात्रियों के बीच कुर्सी पर बैठ गया और उस पर किसी ने भी आपत्ति नहीं की, नाक-भौं नहीं सिकोडे। रेल्वे स्टेशन पर भीख मांगी जा रही है यह एक वास्तविकता थी, और दूसरी वास्तविकता थी उस याचक का सबके साथ बराबरी के साथ बैठना। यही नहीं, छह दिनों के दौरान और भी कहीं ऐसा नहीं लगा कि सामान्य स्थिति के लोग कहीं हीनभावना से ग्रस्त हैं। दूसरी बात ये मुझे समझ आई कि युवा वर्ग की आकांक्षाओं को वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व ने भलीभांति समझा है। आज की बदलती दुनिया में नौजवान जिस तरह का जीवन जीना चाहते हैं वह उन्हें अपने देश में काफी हद तक उपलब्ध है। कम से कम तीनों शहरों में तो मुझे यही प्रतीत हुआ।

मेरे चीन पहुंचने के कुछ दिन पहले ही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का अठारहवां महाधिवेशन सम्पन्न हुआ था। एक नया नेतृत्व सामने आ गया है। चीन के नए राष्ट्रपति ने पहला निर्देश यह जारी किया है कि वी.आई.पी. के लिए ट्रैफिक दो या तीन मिनट से ज़्यादा न रोका जाए। उन्होंने औपचारिक स्वागत आदि के लिए भी मनाही की है। इसके साथ-साथ उन्होंने यह भी कहा है कि भ्रष्टाचार से लड़ना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। यह सब तो हम अपने यहां भी सुनते आए हैं। आने वाले दिनों में चीन में क्या परिवर्तन आते हैं इसे जानने में हमारी रुचि होगी। आखिरी दिन हम सब  चेयरमैन माओ की समाधि पर भी गए: उसी शाम यह खबर भी मालूम पड़ी कि चूंकि माओ व्यक्ति पूजा के खिलाफ थे इसलिए उनके पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि किए जाने पर भी गंभीरता से विचार चल रहा है।

 देशबंधु में 27 दिसम्बर 2012 को प्रकाशित 

Thursday, 20 December 2012

विधानसभा नतीजों के संकेत



गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के बहुप्रतीक्षित नतीजे आ गए हैं। इन्हें समग्रता में देखा जाए तो स्पष्ट संकेत मिलता है कि न तो नरेन्द्र मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं और न ही भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय विकल्प बन पाने की कोई संभावना है।

गुजरात में भाजपा ने लगातार पांचवीं बार जीत दर्ज की है, लेकिन इस तथ्य को कैसे भुला दिया जाए कि जिन नेताओं ने प्रदेश में भाजपा का जनाधार तैयार किया, उनमें से एक पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला आज कांग्रेस में हैं तथा दो अन्य भूतपूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल व सुरेश मेहता ने अपने लिए अलग रास्ता चुन लिया है। नि:संदेह नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने गुजरात में लगातार तीसरी बार चुनाव जीते हैं, लेकिन देश के चुनावी इतिहास में यह कोई अनोखी घटना नहीं है। कांग्रेस के मोहनलाल सुखाड़िया लगातार अट्ठारह वर्षों तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे, मार्क्सवादी योति बसु पांच बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने और आज भी ओडिशा में बीजद के नवीन पटनायक व दिल्ली में कांग्रेस की शीला दीक्षित की चुनावी सफलताएं मोदी के समकक्ष ही ठहरती हैं।

हां, कोई फर्क है तो इस बात का कि नरेन्द्र मोदी की एक विराट छवि इस बीच गढ़ने की निरंतर कोशिशें हुईं जिसमें कारपोरेट घरानों व पूंजीमुखी मीडिया ने भी बढ़-चढ़ कर भूमिका निभाई। श्री मोदी को अपराजेय, लौहपुरुष, विकास पुरुष, कृष्ण, विवेकानंद जैसे विशेषणों से नवाजा गया। उनकी अशिष्टता की हद को छूती वाचालता, प्रकट नस्लवादी मानसिकता, व्यक्तिवादी अहंकार, पार्टी के ऊपर स्वयं को रखने की एक तरह की दृष्टता व प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा- इन सबको उनके गुणों के रूप में प्रचारित किया गया। ऐसा हिटलर के उदय के समय जर्मनी में भी हुआ था। आज भी इस तथ्य को सहजता से भुला दिया गया कि 182 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए नरेन्द्र मोदी को एक भी अल्पसंख्यक उम्मीदवार उपयुक्त न जान पड़ा। पिछले चुनाव के दौरान उन्होंने जहां बार-बार मुख्य चुनाव आयुक्त का पूरा नाम लेकर उनके ईसाई होने को रेखांकित किया था, इस बार उन्होंने अहमद पटेल को सप्रयोजन बार-बार अहमद 'मियां' पटेल कहकर पुकारा। इससे नरेन्द्र मोदी के अल्पसंख्यक द्वेष का प्रमाण तो मिलता ही है, भाजपा का राष्ट्रीय पार्टी होने का दावा भी कमजोर पड़ता है।

हिमाचल प्रदेश में भाजपा को पांच साल बाद फिर बेदखल होना पड़ा है। उत्तराखण्ड के बाद यह भाजपा की दूसरी पराजय है। कर्नाटक में भाजपा के बीच जो कशमकश चल रही है, उसके बारे में यादा कहने की आवश्यकता नहीं है बल्कि यह तुलना करने का लोभ होता है कि जिस तरह श्री येदियुरप्पा को पार्टी ने छोड़ दिया वैसा ही सलूक आने वाले दिनों में श्री मोदी के साथ हो सकता है। पंजाब में भाजपा अकाली दल की बैसाखियों पर है, बिहार में नीतीश कुमार के बलबूते और झारखण्ड में उसके गठबंधन की पवित्रता के बारे में कुछ भी कहना बेमानी है। कुल मिलाकर भाजपा के पास लड़खड़ाते कर्नाटक के अलावा अब सिर्फ तीन राय हैं- गुजरात, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़। गुजरात में भाजपा की जीत में बड़ा योगदान अहमदाबाद, बड़ौदा, सूरत और जामनगर जैसे बड़े शहरों का रहा है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में उसे वैसी सफलताएं नहीं मिलीं। 2013 में जिन प्रांतों में विधानसभा चुनाव होना है उसमें यह तथ्य कितना प्रासंगिक होगा, इसका विश्लेषण दोनों पार्टियों ने शुरू कर दिया होगा।

इन चुनावों के बाद 2014 में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम थम पाएगी या नहीं, मैं नहीं जानता। हो सकता है कि 'कारपोरेट इंडिया' अब किसी नए घोड़े पर दांव लगाए, लेकिन भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का समय है कि आने वाले दिनों में वह किस तरह से लोकहितकारी एजेंडे पर काम कर सकती है।

 देशबंधु में 21 दिसम्बर 2013 को प्रकाशित सम्पादकीय 

Wednesday, 19 December 2012

नानजिंग नरसंहार : 75वीं बरसी





चीन 
का उदय विश्व की दूसरी महाशक्ति के रूप में हो चुका है, लेकिन अपने तीन हजार साल से ज्यादा के इतिहास में इस महादेश को एक के बाद एक राजनैतिक झंझावातों से गुजरना पड़ा है जिसका एक साक्ष्य विश्व के सात आश्चर्यों में से एक चीन की दीवार के रूप में हमारे सामने है। पश्चिम से निरंतर हो रहे आक्रमणों से देश को बचाने के लिए इस दीवार का निर्माण दो हजार साल पहले किया गया था। आधुनिक इतिहास में भी चीन को बहुत से संघर्षों का सामना करना पड़ा, जिनमें ब्रिटिश अगुवाई में चलाया गया अफीम युध्द प्रमुख है। एक के बाद एक राजवंशों द्वारा शासित चीन में जनतांत्रिक राजनीति का उदय 1912 में हुआ जब डॉ. सन यात-सेन पहले चीनी गणराय के राष्ट्रपति बने।

जैसा कि हम जानते हैं 1949 में चीन में माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट शासन स्थापित हुआ, लेकिन इसके पहले के कुछ दशकों में भी देश राजनीतिक अस्थिरता भोगने के लिए बाध्य रहा। चीन के प्रमुख व्यवसायिक नगर शंघाई को विभिन्न विदेशी ताकतों ने अपने-अपने हिस्से में बांट लिया था। एक हिस्से में अंग्रेज, दूसरे में अमेरिकन, तीसरे में जापानी आदि। उन्नीसवीं सदी के अंत में जापान ने चीन पर आक्रमण कर एक तरह से उसे कुछ समय के लिए अपने अधीनस्थ कर लिया था। 1931-32 में चीन की राजनैतिक अस्थिरता को देखते हुए साम्राज्यवादी जापान ने एक बार फिर चीन पर कब्जा करने का मंसूबा बनाया। सन यात-सेन की मृत्यु हो चुकी थी व देश में अमेरिकापरस्त राष्ट्रवादी च्यांग काई शेक और माओ के नेतृत्व में उभरती साम्यवादी ताकत के बीच घमासान चल रहा था।

इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए जापान ने शंघाई के आगे अपने पैर फैलाना शुरू किया और फिर आया 13 दिसम्बर 1937 का काला दिन। देश की तत्कालीन राजधानी दक्षिण में अवस्थित नानजिंग पर जापान की साम्राज्यवादी फौज ने  उस रोज भयानक हमला किया और करीब-करीब दो महीने तक भीषण लड़ाई चलती रही। इस लड़ाई में चीन के तीन लाख से  ज्यादा निर्दोष नागरिक मार डाले गए। इनमें बड़े, बूढ़े, औरत, बच्चे किसी को भी नहीं बख्शा गया। औरतों के साथ बलात्कार की भी अनगिन वारदातें हुर्इं। जापानी सैनिकों में इस बात की होड़ लग रही थी कि कौन कितने यादा लोगों को मार सकता है। इसके लिए घरों में घुस-घुसकर लोगों को मारा गया। किसी को सोते में मार डाला गया, तो किसी औरत को खाना बनाते हुए, तो किसी बच्चे को पढ़ाई करते हुए।

यह विश्व के सामरिक इतिहास की इतनी बड़ी त्रासद कथा है, जिसकी मिसाल ढूंढ पाना मुश्किल है। सामान्य तौर पर लड़ाई सेनाओं के बीच होती है और सैनिक ही युध्दबंदी बनाए जाते हैं। पराजित सैनिक को मारा नहीं जाता, लेकिन यहां तो निर्दोष आबादी को ही मार डालने का पैशाचिक खेल चल रहा था। अगर छोटे पैमाने पर भारत में इसकी कोई मिसाल देखना हो तो नादिरशाह द्वारा दिल्ली में किए गए कत्लेआम या जनरल डायर द्वारा 1919 में बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग में किए गए नरसंहार में देखी जा सकती है। इस साल नानजिंग नरसंहार की 75वीं बरसी थी, जिसके लिए नानजिंग नरसंहार स्मृति एवं संग्रहालय के निमंत्रण पर विश्व शांति परिषद ने अपना एक प्रतिनिधि मंडल नानजिंग भेजा था। विश्व शांति परिषद के इस पांच सदस्यीय दल में मैं अखिल भारतीय शांति एकता परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में शामिल था। अन्य साथी थे पुर्तगाल के शांति संगठन की अध्यक्ष एवं योरोपियन संसद की पूर्व सदस्य इल्डा, ग्रीक शांति संगठन के अध्यक्ष प्रोफेसर स्टॉवरोस, नेपाल शांति संगठन के महासचिव रवीन्द्र अधिकारी व विश्व शांति परिषद के सचिव इराक्लीज। हमारे दल की इस छह दिवसीय चीन यात्रा में तीन दिन के कार्यक्रम नानजिंग में ही थे। 12 दिसम्बर की शाम को नानजिंग नरसंहार स्मृतिस्थल पर एक प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। 13 की सुबह वहीं एक सार्वजनिक सभा का आयोजन था और उसी अपरान्ह नानजिंग पर एक अन्तरराष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया था। इसके अलावा नानजिंग के महापौर के साथ तथा अन्य भेंट मुलाकातों के कार्यक्रम भी थे।

12 दिसम्बर की शाम जब हम स्मृतिस्थल पर प्रार्थना सभा व दीप प्रवलन के लिए पहुंचे तब तक वहां अंधेरा छा चुका था। चीन में इस वक्त भारी ठंड का मौसम है। तापमान शून्य के आसपास पहुंच गया था, कुछ बारिश भी हो रही थी और तीखी ठंडी हवा चल रही थी। प्रार्थना सभा का प्रारंभ बौध्द भिक्षुओं द्वारा समवेत प्रार्थना से हुआ उसके बाद एक-एक कर सब लोगों ने वहां दीपदान किया और वापिस लौट आए। अगली सुबह मुख्य कार्यक्रम के समय उस परिसर को कंपकंपाती धूप के बीच देखने का मौका मिला। परिसर के बाहर स्थापित वह प्रस्तर प्रतिमा अनायास ही मन में करुणा जगाती है जिसमें एक मां अपने बच्चे की मृत देह को बांहों में उठाए हुए है। दो सौ एकड़ से यादा क्षेत्र में फैले इस परिसर की संरचना ही अपने आप में अद्भुत है। 
एक सिरे पर खुला हुआ प्रार्थनास्थल है जहां दस-ग्यारह हजार लोग समा सकते हैं। बीच में संग्रहालय और शोध केन्द्र है, जिसके चारों तरफ जलाशय, जगह-जगह पर उस त्रासदी की याद दिलाते भावपूर्ण प्रस्तर शिल्प हैं।  एक कोने पर श्वेत वस्त्रधारी शांति की देवी की विशालकाय प्रतिमा स्थापित है और जगह-जगह पर दीवार पर या पृथक फलकों पर अंकों में तीन लाख की संख्या उत्कीर्ण है जो दर्शाती है कि 1937 के दिसम्बर और 1938 के जनवरी में इस नगर ने अपनी तीन लाख संतानों को खो दिया था। 75वीं बरसी पर आयोजित कार्यक्रम में नौ अन्य देशों के प्रतिनिधियों सहित नौ हजार से अधिक लोग उपस्थित थे। अन्य देशों से आए लोगों में जापान का भी एक बड़ा जत्था था: ये वे लोग थे जिन्हें साम्राज्यवादी  दौर में अपने देश द्वारा किए गए इस अमानुषिक अत्याचार की ग्लानि थी और वर्तमान में विश्वशांति के लिए काम कर रहे हैं।

13 दिसम्बर की सुबह दस बजे आयोजित सार्वजनिक कार्यक्रम कुल मिलाकर एक घंटे का था। नानजिंग के महापौर, नानजिंग में कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव के संक्षिप्त भाषण मुख्य थे। इनके अलावा इस नरसंहार के साक्षी नब्बे वर्षीय एक वृध्द के संस्मरण व एक स्कूली बच्चे द्वारा विश्व शांति के लिए संकल्प पाठ भी  कार्यक्रम के हिस्सा थे। ठीक दस बजे तीन बार सायरन बजा और कार्यक्रम प्रारंभ हो गया था। कार्यक्रम के अंत में शोक के प्रतीक सफेद फूल चढ़ाकर नानजिंग के शहीदों को अपनी श्रध्दांजलि दी। यह एक व्यवस्थित कार्यक्रम था, लेकिन मुझे इस बात की हैरानी हुई कि 75वीं बरसी जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर चीन के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या अन्य कोई बड़ा राष्ट्रीय नेता शामिल क्यों नहीं हुए। इसके बाद ही हम लोगों ने संग्रहालय का अवलोकन किया। जापान की सरकार आज तक यह नरसंहार होने से ही इंकार करती रही है, लेकिन संग्रहालय में चीनी, जापानी, अमेरिकी, ब्रिटिश अखबारों के पुराने अंकों सहित ऐसे अनेक साक्ष्य मौजूद थे, जो इसकी पुष्टि करते हैं। इस भीषण समय में चीनी जनता ने अपना आत्मबल कैसे बचाए रखा, नानजिंग में मौजूद विदेशी नागरिकों ने लोगों की मदद करने के लिए क्या कदम उठाए और क्या-क्या उस दौरान हुआ- इस सबके विवरण, साक्ष्य व दस्तावेज संग्रहालय में प्रदर्शित है।

मुझे देश-विदेश में अनेक तरह के संग्रहालयों को देखने का अवसर मिला है, लेकिन नानजिंग का यह संग्रहालय कई तरह से अनूठा था। उसकी भावभूमि तो स्पष्ट है, लेकिन प्रादर्शों को संयोजित करने में व घटनाओं को पुन: सृजित करने में जिस कल्पनाशीलता का परिचय दिया गया व वास्तुशिल्प का जैसा प्रयोग किया गया वह मैंने अन्यत्र कहीं नहीं पाया। संग्रहालय के कक्षों से गुजरते हुए पहले मन में दहशत होती है, ऐसी क्रूरता भी संभव है यह विचार मन को दहलाता है, हिंसा व युध्द के खिलाफ वितृष्णा उपजती है और अंत में यही लगता है कि अब ऐसा नहीं होना चाहिए।

देशबंधु में 20 दिसम्बर 2012 को प्रकाशित 

 

Tuesday, 18 December 2012

एफडीआई : विरोध का पाखंड







देश की अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजी की भूमिका किस हद तक स्वीकार्य हो, यह निश्चित रूप से अहम् मुद्दा है जिससे न सिर्फ अर्थनीति, बल्कि राजनीति, सांस्कृतिक मूल्य, सामाजिक परिवेश, राष्ट्रीय सुरक्षा इत्यादि अनेक सवाल जुड़े हुए हैं। इसे देखते हुए आवश्यक है कि इस पर व्यापक तौर पर सार्वजनिक बहस हो। इसके पहले यह स्मरण कर लेना बेहतर होगा कि भारत में विदेशी पूंजी निवेश की ताजा स्थिति क्या है। किसी भी देश में विदेशी पूंजी मुख्यत: दो तरीकों से आती है जिन्हें प्रत्यक्ष (एफडीआई) और संस्थागत (एफआईआई) कहा जाता है। संस्थागत निवेश में जो पूंजी आती है वह दर्शनी हुंडी की शक्ल में होती है। पूंजी लगाने वाला जब चाहे तब अपनी रकम वापिस निकाल सकता है। किसी कवि ने लिखा है-''मेरा श्याम सकारे मेरी हुंडी आधी रात को।'' ऐसा निवेश बैंक खातों में सीधे जमा हो सकता है या शेयर बाजार में और जब भी विदेशी निवेशक रकम निकालता या जमा करता है तो उससे पूंजी बाजार में फेरबदल आता है। इसलिए हमारे यहां एफआईआई को पारंपरिक दृष्टि से गैर-भरोसेमंद और अवांछनीय माना जाता रहा है।

दूसरी ओर प्रत्यक्ष निवेश अथवा एफडीआई का मतलब है कि विदेशी निवेशक कल-कारखानों में, प्रतिष्ठानों में, स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण में अपनी पूंजी लगाएगा। इसमें स्वाभाविक रूप से निवेशक के लिए जोखिम है। एक तो निवेश पर उसे तुरंत कोई लाभ नहीं होता।  कारखाना हो या मेगास्टोर- उसे मुनाफे के लिए प्रतीक्षा करना पड़ती है। यह जरूरी नहीं कि धंधे में फायदा ही हो, फिर भी निवेश तो मुनाफे की उम्मीद से ही किया जाता है। अतिथि देश को इसमें यह फायदा है कि देश के भीतर स्थायी परिसंपत्तियां निर्मित होती हैं तथा पहले दिन से रोजगार के छोटे-बड़े अवसर सृजित होने लगते हैं। इसका यह अर्थ हुआ कि ऐसे एफडीआई को ही अनुमति दी जाए जो सचमुच नया रोजगार लेकर आए और मौजूदा रोजगार को कोई नुकसान न पहुंचे। इसका एक पहलू यह भी है कि देश अपने बलबूते जो निर्माण कर सकता है उसमें अनावश्यक रूप से विदेशी मेहमानों को न बुलाया जाए। यह भी देखने की जरूरत है कि जो मेहमान आना चाहते हैं उनका इतिहास-भूगोल क्या है। क्या उन पर एतबार किया जा सकता है।

सारी बातों पर विचार करें तो ध्यान आता है कि भारत ने नीतिगत तौर पर एफडीआई का विरोध कभी नहीं किया। देश में सार्वजनिक क्षेत्र में बुनियादी उद्योगों को खड़ा करने में विदेशी पूंजी निवेश और विदेशी टेक्नालॉजी ने महती भूमिका निभाई है। अगर पचास, साठ और सत्तर के दशक में मित्र देशों से यह सहायता नहीं मिलती तो भारत आज जहां है वहां नहीं पहुंच पाता। जो ताकतें उन दशकों में हासिल धीमी प्रगति का उपहास उड़ाते हुए आज जीडीपी बढ़ाने के बारे में ऊंची उडान भर रहे हैं, वे इस तथ्य को सुविधापूर्वक भुला देती हैं कि नींव पुख्ता करने में यादा समय लगता है और धीरज की मांग करता है। उसके बाद दीवारें खड़ी करने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है। अपनी हड़बड़ी में उन्हें इस बात का भी ध्यान नहीं है कि पंडित नेहरू के समय में देश की आर्थिक प्रगति की जो बुनियाद रखी गई थी उसका मकसद देश में गैर-बराबरी को मिटाना और सामाजिक न्याय स्थापित करने का था।

आज खुदरा बाजार में एफडीआई को लेकर हो-हल्ला तो खूब मचाया जा रहा है, लेकिन उससे किसी परिणाम की आशा रखना व्यर्थ है, क्योंकि सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जो हो रहा है वह छाया युध्द से अधिक कुछ नहीं है। लोकसभा व राज्यसभा में चाहे जितने आरोप-प्रत्यारोप लगाए गए हों, टी.वी. पर चाहे जितने दावे-प्रतिदावे किए गए हों, यह स्पष्ट है कि इस मुद्दे पर सभी पार्टियों का नजरिया लगभग एक समान है और एफडीआई को रोकने की मंशा किसी की भी नहीं है। अगर कोई फर्क है तो इस बात का कि जहां कांग्रेस व कुछ अन्य दल सीधे किसान, मजदूर की हित की बात कर सकते हैं, वहीं भाजपा के पार्टीहित व्यापारी वर्ग के साथ जुड़े हुए हैं। वे ही उसके वोटर हैं, वे ही उसके फंड दाता हैं और वे ही छोटे-छोटे कस्बों तक संघ की गतिविधियों को चलाने में मददगार होते हैं। जब सुषमा स्वराज ने जोर देकर कहा कि आढ़तिए किसान के लिए एटीएम होते हैं,  तब वे अपनी पार्टी व छोटे-मंझोले व्यापारियों के बीच के रिश्ते को ही रेखांकित कर रही थीं। यही नहीं, भाजपा स्वयं लंबे समय से आर्थिक उदारीकरण की पक्षधर रही है। सार्वजनिक क्षेत्र की कारखानों का विनिवेश उसी से शुरू किया था तथा अन्य बहुत से मुद्दों पर उसकी नीतियां वैश्विक विश्वपूंजीवाद के समर्थन में रही हैं। 

दूसरे, खुदरा बाजार में एफडीआई का प्रवेश अपने आप तक सीमित नहीं है। वह एक व्यापक नीति का हिस्सा है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद से ही भारत में आर्थिक उदारीकरण की नीतियां धीरे-धीरे लागू करना प्रारंभ हो गया था। राजीव गांधी के कार्यकाल में छोटी सी पहल हुई। वी.पी. सिंह के समय में उसे बढ़ावा मिला और पी.वी. नरसिम्हाराव के समय में तो कांग्रेस ने नेहरू की नीतियों को पूरी तरह से तिलांजलि ही दे दी। जो नई नीतियां अमल में आना शुरू हुईं, उनसे भाजपा की कोई असहमति नहीं थी। समाजवादियों को भी उनसे कोई खास तकलीफ नहीं थी और तो और वामदलों ने भी इन नीतियों का कोई ठोस विरोध नहीं किया।

हम याद करना चाहेंगे कि पिछले बीस सालों में शायद ही कोई मुख्यमंत्री ऐसा हुआ हो, जिसने विदेशी निवेशकों को आमंत्रित करने के नाम पर विदेश यात्रा न की हो। जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री जॉन मेजर भारत आए तो वामपंथी सरकार ने कलकत्ता की सड़कों से फेरीवालों और गुमटीवालों को रातोंरात हटा दिया था। कांग्रेस और भाजपा के तमाम मुख्यमंत्री अपने प्रदेश के विकास के लिए विदेशी पूंजी निवेश का झुनझुना बजाते रहे हैं। सोचने की बात है कि नरेन्द्र मोदी की जापान यात्रा का इतना ढिंढोरा क्यों पीटा गया और ब्रिटिश राजदूत के गुजरात प्रवास पर भाजपा ने इतनी खुशियां क्यों जाहिर कीं।

ऐसा भी क्यों है कि बिल गेट्स और वॉरेन बफेट भारतीय कारपोरेट जगत की आँखों के सितारे बने हुए हैं? ऐसा भी क्यों है कि भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में रोजगारोन्मुख पाठयक्रम खोलने पर इतना जोर दिया जा रहा है? एमबीए की इतनी मांग क्यों हो रही है और जब बच्चे एमबीए कर लेंगे तो उन्हें नौकरी कहां मिलेगी? क्या उन्हें इन्हीं सुपर बाजारों में नौकरी करने के लिए तैयार नहीं किया जा रहा है? आज के भारतीय युवाओं के सामने इंदिरा नुई और विक्रम पंडित आदि को रोल मॉडल बनाकर पेश किया जाता है। ऐसे में एफडीआई का विरोध क्या एक पाखंड बन कर नहीं रह जाता? इस तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी गौर करना चाहिए। दलित समाजचिंतक चन्द्रभान प्रसाद और मिलिंद कांबले इत्यादि वालमार्ट आदि के आगमन का उत्साहपूर्वक स्वागत कर रहे हैं। उनका मानना है कि इससे दलित युवाओं को बिना भेदभाव के रोजगार मिलेगा और जातिप्रथा टूटने में मदद मिलेगी।

संसद में इस मुद्दे पर सरकार को जीत मिली, लेकिन मैं कहूंगा कि भाजपा के लिए यह एक बड़ी हार थी। वोटिंग की मांग उन्होंने ही की थी। हारने के बाद नैतिकता का प्रश्न उठाना अपने आप में अनैतिक है क्योंकि आपने अपनी शर्तों पर मोर्चा खोला था। वामदल इस मुद्दे पर भाजपा का साथ देकर अपनी स्थिति और कमजोर कर रहे हैं। मुलायम सिंह और मायावती ने अपने पत्ते ठीक से खेले। वे उत्तरप्रदेश में भाजपा को पैर जमाने का मौका नहीं देना चाहते। कुल मिलाकर आज के आर्थिक- राजनैतिक माहौल में खुदरा बाजार हो या अन्य कोई गतिविधि विदेशी पूंजी निवेश रोकना संभव नहीं है। इसके लिए जिस राजनीतिक सोच व लंबी लड़ाई की जरूरत है उसके लिए कोई भी पार्टी तैयार नहीं दिखती।


 देशबंधु में 13 दिसम्बर 2012 को प्रकाशित 

Thursday, 6 December 2012

आई.के. गुजराल : कुछ निजी यादें






मास्को  31 जनवरी, 1978। इन्द्रकुमार गुजराल सोवियत संघ में भारत के राजदूत थे। भारत-सोवियत मैत्री संघ का एक शिष्टमंडल सोवियत संघ की सद्भावना यात्रा पर था। विभिन्न गणरायों का भ्रमण करने के बाद यात्रीदल उस सुबह मास्को पहुंचा था और राजदूत महोदय ने दल को रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया था। मैं दल का सबसे युवा सदस्य था। गुजराल साहब से जब औपचारिक परिचय करवाया गया और मैंने उन्हें बताया कि मैं मायाराम सुरजन का पुत्र हूं तो गुजरालजी ने प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा अच्छा, वे तो हमारे मित्र हैं। मैं यद्यपि गुजराल साहब को और भी पहले से जानता था, लेकिन उनसे ठीक-ठीक परिचय पाने का यह पहला मौका था।

इसके पहले का एक प्रसंग याद आता है।  अखिल भारतीय समाचारपत्र संपादक सम्मेलन में लघु और मध्यम समाचारपत्रों की स्थिति का आंकलन करने के लिए एक कमेटी बनाई। बाबूजी सम्मेलन के उपाध्यक्ष थे। वे ही इस अध्ययन कमेटी के अध्यक्ष बने। एक साल की मेहनत के बाद रिपोर्ट बनकर तैयार हुई। 1972 में जालंधर में सम्मेलन का त्रिवार्षिक अधिवेशन हुआ, जिसमें श्री गुजराल केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री होने के नाते बतौर मुख्य अतिथि  आमंत्रित थे। बाबूजी ने यह रिपोर्ट उन्हें औपचारिक रूप से सौंपी। गुजराल साहब ने पहले तो नाखुशी जाहिर की: संपादक सम्मेलन में अखबारों को दीगर समस्याओं पर बात क्या? बाबूजी ने स्पष्ट किया कि अधिकतर भाषायी समाचारपत्र मध्यम अथवा लघु हैं तथा उनमें अधिकतर में संपादक ही पत्र के संचालक हैं। उनकी व्यवहारिक अड़चनों पर सरकार को ध्यान देना ही चाहिए।  इस तर्क को उन्होंने स्वीकार किया और उनके कार्यकाल में समस्याओं को दूर करने के लिए कुछ प्रयत्न भी किए गए।

बहरहाल, गुजराल साहब से मेरी दूसरी मुलाकात तब हुई जब वे सोवियत संघ से भारत वापस आ चुके थे और राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका एक तरह से स्थगित थी। मैं उनसे संभवत: संसद के सेंट्रल हॉल में मिला होऊंगा।  मैंने जब अपना परिचय दिया तो उन्होंने कहा कि आपको मैं पहचानता हूं। यह बात उनकी विनम्रता की द्योतक थी या उन्होंने मुझे सचमुच याद रखा था, यह मैं नहीं समझ पाया। यद्यपि अपने अनुभव से मैं जानता हूं कि राजनीति या अन्य कोई क्षेत्र सफल व्यक्तियों की याददाश्त बहुत तेज होती है और वे हजारों लोगों के नाम याद रख सकते हैं। जो भी हो, गुजराल साहब मुझसे बहुत स्नेहपूर्वक मिले और काफी देर तक राजनीतिक मसलों पर मेरे पास चर्चा करते रहे। मैंने उनसे इस तरह संसद में मिलना जारी रखा और ऐसे अवसर भी आए जब उन्होंने मुझे महारानी बाग स्थित अपने निवास पर आमंत्रित किया।  उनके परिवार में वैवाहिक प्रसंगों पर निमंत्रण पत्र भी मुझे बदस्तूर भेजे जाते रहे।

गुजराल साहब के साथ इस परिचय का एक लाभ मैंने 1987-88 में उठाया। कटक के गोविन्दचन्द्र सेनापति (रिटायर्ड डीजी पुलिस) रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3260 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे। इसके अंतर्गत उड़ीसा और पूर्वी मध्यप्रदेश (छत्तीसगढ़ सहित) का समावेश था। हम लोग दिल्ली में रोटरी इंटरनेशनल के एक कार्यक्रम में साथ-साथ थे, जिसमें डॉ. कर्णसिंह व्याख्यान देने आए थे।  सेनापतिजी ने डॉ. कर्णसिंह के वक्तव्य से प्रभावित हो अपनी डिस्ट्रिक्ट कांफ्रेंस में मुख्य अतिथि के नाते आमंत्रित करने का विचार किया, लेकिन डॉ. कर्णसिंह निर्धारित तिथियों पर उपलब्ध नहीं थे। फिर मैंने गुजराल साहब से सम्पर्क स्थापित किया और मेरे अनुरोध की रक्षा करते हुए वे हमारे कार्यक्रम में कटक आने को राजी हो गए। जनवरी 1988 में श्री एवं श्रीमती गुजराल दोनों कटक आए व गुजराल साहब ने अपने विद्वतापूर्ण भाषण से सबको बेहद प्रभावित किया।

इसी तरह का एक मौका 1995 में दोबारा लगा। रोटरी की डिस्ट्रिक्ट कांफ्रेंस संबलपुर में होना था। डिस्ट्रिक्ट गवर्नर घनश्याम रथ वहीं के निवासी थे। उनके आग्रह पर मैंने एक बार पुन: गुजराल साहब से सम्पर्क किया और वे संबलपुर आने के लिए राजी हो गए।  कार्यक्रम इस तरह बना कि वे हवाई जहाज से रायपुर आएंगे तथा मैं उन्हें साथ लेकर कार से संबलपुर जाऊंगा। दुर्भाग्य से 31 दिसम्बर 1994 को बाबूजी का निधन हो गया। जबलपुर में कांफ्रेंस पांच-छह दिन बाद ही होना था, जिसमें अब मेरे शामिल होने का सवाल ही नहीं था। मेरे एक रोटरी बंधु पी.एस. बहल ने रायपुर में गुजराल साहब की अगवानी की और उनके साथ संबलपुर गए। दिल्ली वापस जाने के पहले गुजराल साहब रायपुर हमारे घर आए और इस पारिवारिक दुख की घड़ी में हम लोगों को ढाढस बंधाया।

इसके पूर्व गुजराल साहब कांग्रेस छोड़कर जनमोर्चा में शामिल हो चुके थे। 1989 में वी.पी. सिंह के मंत्रिमण्डल में वे विदेशमंत्री बने। जुलाई 1990 में वी.पी. सिंह सोवियत संघ की यात्रा पर गए।  प्रधानमंत्री के यात्रीदल में एक पत्रकार के रूप में मैं भी शामिल था। इस चार-पांच दिन की यात्रा के दौरान प्रतिदिन गुजराल साहब के साथ बातचीत करने का कोई न कोई मौका निकल ही आता था। यह कहने की जरूरत नहीं कि विश्व राजनीति और खासकर सोवियत संघ के बारे में उनकी जानकारी अथाह थी। प्रधानमंत्री की इस सोवियत यात्रा के क्या आयाम व क्या महत्व हैं, यह समझने में मुझे स्वाभाविक ही गुजराल साहब के साथ चर्चाओं में मदद मिली। उनके विदेश मंत्री रहते हुए कभी साउथ ब्लाक के दफ्तर में, तो कभी संसद के केन्द्रीय कक्ष में मुलाकातों का यह सिलसिला जारी रहा। 

गुजराल साहब जब सोवियत संघ में राजदूत के पद से निवृत्त होकर भारत लौटे और उसके बाद जब मेरी पहली भेंट हुई, तभी शायद मैंने उनसे देशबन्धु के लिए लिखने का आग्रह किया।  उनके लेख अंग्रेजी अखबारों में तो छपते ही थे। उसकी कॉपी साथ-साथ देशबन्धु को भी मिलने लगी और उनका हिन्दी अनुवाद कर देशबन्धु में प्रकाशन प्रारंभ हो गया। यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा। उनकी सहधर्मिणी श्रीमती शीला गुजराल की कविताएं व लेख भी देशबन्धु व अक्षर पर्व में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे।  1997 में गुजराल साहब प्रधानमंत्री बने। मैं अगले दिन ही दिल्ली पहुंचा।  वे तब महारानी बाग के निजी निवास पर ही थे। मैंने बधाई दी तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया और अंग्रेजी में कहा कि - ''ललित जी, आई वैल्यू योर फे्रण्डशिप।'' यह दिल को छू लेने वाली बात उनके स्वभावगत सौजन्य का ही परिचायक थी।

हमने जब देशबन्धु लाइब्रेरी को सार्वजनिक पुस्तकालय में परिवर्तित किया तब मैंने गुजराल साहब से इस लाइब्रेरी के लिए अपनी निजी लाइब्रेरी से पुस्तकें देने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया।  आज देशबन्धु लाइब्रेरी में विशेष रूप से स्थापित आई.के. गुजराल खण्ड है, जिसमें उनके द्वारा भेंट की गई लगभग एक हजार पुस्तकें हैं।  वे हमेशा नई से नई और बढ़िया पुस्तकें निकालकर अलग रखते।  कभी हमारे दिल्ली कार्यालय के मार्फत भिजवा देते या मैं जाता तो मेरी गाड़ी में रखवा देते।

बहुत सी यादें हैं। लिखने के लिए बहुत कुछ है। उनके कृतित्व, व्यक्तित्व, राजनीतिक योगदान सब पर बहुत कुछ लिखा गया है, बहुत कुछ लिखा जाएगा। वे जब प्रधानमंत्री बने थे तब सुप्रसिध्द इतिहासवेत्ता अर्नाल्ड टॉयनबी को उद्धृत करते हुए मैंने लिखा था कि - ''राजनीति को अपनी प्रामाणिकता सिध्द करने के लिए ऐसे व्यक्तियों की जरूरत होती है।'' मैं इस कथन को ही दोहराना चाहता हूं।  गुजराल साहब जिन गुणों के धनी थे उनका प्रत्यक्ष अभाव आज की राजनीति में दिखाई देता है।  ऐसे में गुजराल साहब की याद बार-बार आती रहेगी।

देशबंधु में 6 दिसम्बर 2012 को प्रकाशित 








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Lalit Surjan
Chief Editor
DESHBANDHU
RAIPUR 492001
C.G. India

Wednesday, 28 November 2012

कसाब को फांसी के बाद




यह भारत के किसी गांव की कहानी है। एक ही परिवार की दो शाखाओं में खेती की जमीन पर मिल्कियत को लेकर झगड़ा होता है और बढ़ते-बढ़ते खून-खराबे तक पहुंच जाता है। कुछ लोग मारे जाते हैं और कुछ को कड़ी सजा भुगतना पड़ती है। इनमें से एक पुरुष कई साल जेल में बिताने के बाद घर लौटता है, तो उसकी पत्नी उससे मांग करती है कि तू मुझे फिर एक बेटा दे दे ताकि वह बड़े होकर अपने परिवार में हुई हत्याओं का बदला ले सके। अगर मेरी याददाश्त सही है तो जगदीशचन्द्र के उपन्यास ''कभी न छोड़े खेत'' का अंत इसी वार्तालाप के साथ होता है। अगर लेखक और उपन्यास का नाम मुझे सही-सही याद न भी हो तब भी इस कहानी के पीछे जो सच्चाई छिपी है, क्या उससे इंकार किया जा सकता है!

भारत उपमहाद्वीप में यह कथा न जाने कितने हजार सालों से बार-बार दोहराई जाती रही है। ऐसा कोई प्रसंग छिड़ने पर मुझे हमेशा राजमोहन गांधी की मूल अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ''रिवेन एण्ड रिकन्सीलिएशन'' का ध्यान हो आता है। भारत के सामाजिक इतिहास की बहुत सटीक व्याख्या उन्होंने इस पुस्तक में की है। फिलहाल वह हमारी विवेचना का विषय नहीं है। मुझे लगता है कि इस कहानी को अगर  थोड़ा विस्तार दें तो इसे शायद भारत के विभिन्न प्रांतों के बीच संबंधों पर लागू किया जा सकता है। मसलन, बेलगांव को लेकर महाराष्ट्र व कर्नाटक के बीच विवाद या ऐसे और तमाम प्रकरण। अगर थोड़ा और विस्तार करें तो हमें गांव और प्रदेश की जगह हम शायद दो पड़ोसी देश को देख सकेंगे: भारत-पाकिस्तान, भारत-बंगलादेश या फिर भारत-श्रीलंका। बुनियादी सवाल यही है कि अंतत: प्रतिशोध का पलड़ा भारी बैठता है या सद्भाव व साहचर्य्य का। 

26-11-2008 को मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले में जीवित पकड़े गए एकमात्र आतंकवादी युवक आमिर अजमल कसाब को फांसी तामील हो जाने के बाद दोनों देश की जनता इस बुनियादी सवाल पर नए सिरे से विचार कर सकती है। कसाब जब जिंदा पकड़ लिया गया था, यह तो उस वक्त ही तय हो गया था कि उसे आगे-पीछे मृत्युदंड मिलेगा ही। यह भारत के जनतंत्र की खूबी है कि आम जनता में उमड़े तीव्र आक्रोश, मृतकों के परिजनों की पीड़ा तथा तत्काल चौराहे पर फांसी पर लटका देने की मांग- इन सबके बीच भी देश का न्यायतंत्र निर्धारित प्रणाली के अनुसार अपना काम कर सका। यह शिकायत किसी को नहीं हो सकती कि कसाब को सुनवाई का उचित मौका दिए बिना फांसी दे दी गई।

21 नवंबर को फांसी देने के बाद से अनेक तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। इसमें पाकिस्तान के किसी सरकारी प्रवक्ता का यह बयान गौरतलब है कि  कसाब को फांसी देने का कोई प्रभाव सरबजीत के मामले पर नहीं पड़ेगा, वह अपनी तरह से चलता रहेगा। इसके अलावा यह भी कहा गया कि जिस तरह भारत में कानून अपना काम करता है उसी तरह पाकिस्तान में भी अदालती प्रक्रिया अपने ढंग से चलती है और इसलिए हाफिज सईद के मामले में भारत को पाकिस्तान पर भरोसा करना चाहिए। इस प्रतिक्रिया का पहला हिस्सा किसी हद तक आश्वस्त करता है कि सरबजीत की रिहाई शायद अभी भी मुमकिन है। दूसरे हिस्से का जहां तक सवाल है यह जगजाहिर है कि पाकिस्तान की चुनी सरकार का कोई नियंत्रण आतंकवाद पर नहीं है, कि उन्हें सेना के एक प्रभावशाली वर्ग का संरक्षण मिला हुआ है और उसके इस आश्वासन पर विश्वास करना कठिन है।

जहां तक अपने देश की बात है, सामान्य तौर पर फांसी दिए जाने का स्वागत ही किया गया है, लेकिन गौर करना चाहिए कि इसमें प्रसन्नता व्यक्त होने के बजाय चार साल के लम्बे अध्याय के पटाक्षेप हो जाने का संतोष ही था। चूंकि फांसी बहुत गुपचुप तरीके से दी गई इसलिए उसे लेकर किसी भी तरह का वातावरण बनाने का अवसर किसी को भी नहीं मिल सका। भारतीय जनता पार्टी ने बाद में वही प्रतिक्रिया दी जो कि अपेक्षित थी कि अफजल गुरु को फांसी कब दी जाएगी। सत्तारूढ़ कांग्रेस को परेशान करने के लिए यह प्रश्न उपयोगी हो सकता है, लेकिन अफजल गुरु प्रकरण में ऐसे कुछ पेचीदे बिन्दु हैं जिनसे भाजपा अनभिज्ञ नहीं है। इस नाते उचित होगा कि वह इस मामले को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश न करे। दो दशक पूर्व जेकेएलएफ नेता मकबूल बट को फांसी देने पर जो प्रतिक्रिया हुई थी वह राजनीति के जानकारों को याद होना चाहिए। दूसरे, जिस तरह सरबजीत के बेगुनाह होने का लोगों को भरोसा है उसी तरह अफजल गुरु के अपराध को लेकर भी कानूनी बिरादरी एकमत नहीं है। 

यह गौरतलब है कि कसाब को फांसी देने के बाद भारत में न्यायविदों तथा राजनैतिक टीकाकारों के बीच से कुछेक नए बिन्दु उभरकर आए हैं। एक न्यायवेत्ता ने तो लिखा है कि कसाब को कानून के तहत अपनी सजा पर सुप्रीम कोर्ट में अंतिम पुनर्विचार याचिका दायर करने का अवसर नहीं दिया गया और इस तरह संविधान और दंड संहिता का उल्लंघन किया गया। एक सेवानिवृत्त उच्च सैन्य अधिकारी जनरल वी.एस. पाटणकर ने एक नए दृष्टिकोण से इस पर अपनी राय दी है। श्री पाटणकर जम्मू-काश्मीर क्षेत्र में भारतीय सेना के प्रमुख थे और वहां की स्थितियों को निश्चित ही बेहतर जानते होंगे। उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान में जो आतंकवाद पनपा है उसके पीछे कोई धार्मिक कारण नहीं है। पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर गरीबी है, बड़ी संख्या में नौजवान बेरोजगार हैं, इसलिए उन्हें पैसों का लालच देकर खरीद लेना आसान होता है। परिवार के लोग भी सोचते हैं कि गुरबत की जिंदगी से मौत भली। जनरल के अनुसार कसाब के घरवालों को पैसा देकर उसे आतंकी अभियान में शामिल कर लिया गया था। कुछ इसी तरह की बात चर्चित लेखिका शोभा डे ने भी की है। 

ये टिप्पणियां भारत-पाक संबंध, धार्मिक कट्टरता, जेहाद इन सारे मसलों पर पुनर्विचार का रास्ता खोलती है। इधर एक टीवी चर्चा में 2611 से सबक लेने के मुद्दे पर किसी विद्वान वार्ताकार ने कहा कि  911 के बाद अमेरिका पर दुबारा कोई आक्रमण नहीं हुआ जबकि भारत ने 2611 से कुछ नहीं सीखा। ये वार्ताकार भूल गए कि अमेरिका की भौगोलिक स्थिति भारत के मुकाबले बहुत अलग और कहीं ज्यादा महफूा है। इसके अलावा और भी बहुत से कारणों से भारत और अमेरिका के बीच तुलना करने की कोई तुक नहीं है। बहरहाल भारत और पाकिस्तान सहित सारे पड़ोसी मुल्कों को मिलकर अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करना चाहिए कि हरेक देश में जनतंत्र कैसे पुष्ट हो, गरीबी और गैर-बराबरी कैसे दूर हो तथा नागरिकों को सम्मानपूर्वक जीने का हक कैसे मिले। सुखद, निरापद व शांतिमय भविष्य की शर्ते यही हैं।

देशबंधु में 29 नवम्बर 2012 को प्रकाशित 





 

Saturday, 24 November 2012

बाल ठाकरे का निधन





बाल ठाकरे के निधन से शिवसैनिक अनाथ हो गए हैं और फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि उध्दव और राज ठाकरे अलग-अलग या मिलकर भी इस रिक्त स्थान को भर पाएंगे या नहीं। आखिरकाल बाल ठाकरे शिवसेना के जन्मदाता थे और उनके बेटे व भतीजे उनके द्वारा खड़ी की गई राजनीतिक हैसियत के सही वारिस तो तभी कहलाएंगे जब वे शिवसेना को आज वह जहां हैं उससे आगे ले जा सकें। इस बारे में सोचते हुए ध्यान आना स्वाभाविक है कि बाल ठाकरे ने अपने बेटे उध्दव को ही युवराज बनाया था जबकि भतीजे राज ने इससे नाराज हो अपनी स्वतंत्र हैसियत बनाने के लिए न सिर्फ विद्रोह किया, बल्कि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) की स्थापना की और थोड़े ही समय में शिवसेना के वर्चस्व को चुनौती दे सकने लायक ताकत बटोर ली। इसे देखते हुए बड़ा सवाल तो यह है कि क्या दोनों भाईयों के बीच शिवसेना और मनसे का विलय या कम से कम साझा मोर्चा आने वाले दिनों में बन सकेगा।

बाल ठाकरे के निधन पर स्वाभाविक है कि उनके समर्थकों, प्रशंसकों और भक्तों ने अश्रुपूरित श्रध्दांजलि अर्पित की है। लता मंगेशकर ने 'हिन्दू हृदय सम्राट' कहकर उनका स्मरण किया है और इस तरह से एक सच्चाई बयान कर दी है। लताजी की अपनी राजनीति का अनुमान भी लगे हाथ हो जाता है। सुषमा स्वराज ने उन्हें 'शेर' कहकर याद किया है। मुम्बई का सिनेजगत तो लंबे समय से बाल ठाकरे का कायल ही रहा है; अगर कहा जाए कि श्री ठाकरे अनेक अर्थों में बालीवुड के संरक्षक और अभयदाता थे तो गलत नहीं होगा। प्रीतिश नंदी जैसे बुध्दिजीवी जिनको उन्होंने रायसभा में भेजा या अन्य तरह से उपकृत किया उनका शोकग्रस्त होना भी सहज है। एक बड़ी संख्या उन लोगों की भी है, जो बाल ठाकरे और उनकी सेना को मुसलमानों के खिलाफ उग्र और कटु विचारों के लिए सराहते थे। उनकी चिंता है कि अब मुम्बई का क्या होगा!

बाल ठाकरे भारत के राजनीतिक मंच पर एक प्रमुख अभिनेता थे, इसलिए उनके निधन पर श्रध्दांजलि तो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष, कांग्रेसी मंत्रियों व अन्य राजनीतिक दलों ने भी दी है, लेकिन इसमें भावोच्छ्वास नहीं है और इसमें कुछ गलत भी नहीं है। वे लोग जो बाल ठाकरे की राजनीति से न सिर्फ असहमत थे, बल्कि उसके खिलाफ लंबे समय तक लड़ते रहे, उनसे औपचारिकता निर्वाह की ही अपेक्षा की जा सकती है।  इसकी बड़ी वजह यह भी थी कि बाल ठाकरे राजनीतिक मर्यादा की परवाह करने वाले खिलाड़ी नहीं थे। कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी, साम्यवादी सभी मोटे तौर पर स्थापित परम्पराओं के अनुरूप अपनी राजनीति संचालित करते हैं और वहां परस्पर संवाद चलते रहने के कारण निजी तौर पर जो सौहार्द्र स्थापित होता है वह ऐसे अवसर को भी निजता का रंग दे देता है। श्री ठाकरे के राजनैतिक स्तर पर संबंध बहुत सीमित थे।

दरअसल बाल ठाकरे ने ताउम्र सड़क की राजनीति ही की। यद्यपि उन्होंने शिवसेना के रूप में राजनीतिक दल का गठन किया, लेकिन संसदीय राजनीति में  उनका विश्वास नहीं था। भारतीय जनता पार्टी ने शिवसेना के साथ भले ही जोड़ी बनाई हो, लेकिन शिवसेना की राजनीति सदैव सड़कों पर ही देखने मिली तथा तमाम कोशिशों के बावजूद महाराष्ट्र के बाहर पार्टी का विस्तार नहीं हो सका। मनोहर जोशी के लोकसभा अध्यक्ष बनने व सुरेश प्रभु के केन्द्रीय मंत्री बनने से भी शिवसेना की बुनियादी सोच में कोई परिवर्तन नहीं आया। बाल ठाकरे जैसा कि सब जानते हैं एक अच्छे व्यंग्य चित्रकार थे। उन्होंने व आर.के. लक्ष्मण ने कभी साथ-साथ काम भी किया था; फिर बाल ठाकरे ने पहले 'मार्मिक' बाद में 'सामना' निकालकर अपनी संपादन क्षमता का परिचय भी दिया, लेकिन अपनी पत्रकार कलम का उपयोग भी उन्होंने कभी व्यापक सामाजिक, राजनैतिक प्रश्नों की मीमांसा में नहीं किया। जिस तरह राजनीति में उन्होंने कोई लक्ष्मणरेखा स्वीकार नहीं की, वैसा ही उनकी कलम के साथ भी हुआ।

यह तो तय है कि आधुनिक भारत के राजनैतिक इतिहास में बाल ठाकरे का स्थान सुरक्षित है किंतु उनकी भूमिका को किस रूप में याद रखा जाएगा इसकी विवेचना करना अभी संभव नहीं है।  एक यह तथ्य ध्यान आता है कि वे संभवत: पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने व्यक्ति-केन्द्रित राजनीति की। याने उनके जो विचार थे वही उनकी रणनीति में प्रथम और अंतिम थे। इसके आगे-पीछे उन्हें और कोई सरोकार नहीं था। इसकी शुरुआत जून 1966 में शिवसेना के गठन के साथ हुई। बाद के वर्षों में राजनीतिक क्षितिज पर ऐसी राजनीति करने वाले अन्य लोग भी उभरे, लेकिन उनमें से भी न तो कोई श्री ठाकरे की हद तक जाकर उग्र हो सका और न किसी की राजनीति इतने लंबे समय तक चल सकी।  इसकी एक वजह शायद यह रही होगी कि ऐसे तमाम लोग पारंपरिक राजनीति से स्वकेन्द्रित राजनीति तक आए जिसमें समझौते की गुंजाइश कहीं न कहीं बनी रही। बाल ठाकरे की अपूर्व सफलता की दूसरी वजह शायद यह भी हो सकती है कि उन्होंने खुद के लिए सत्ता-सुख कभी नहीं चाहा, जिसके चलते उन्हें कभी समझौता करने की आवश्यकता महसूस ही नहीं हुई। राजसत्ता में पद संभालने के बाद बहुत सी व्यवहारिक स्थितियों से जूझना पड़ता है जिससे बाल ठाकरे हमेशा मुक्त रहे। उन्होंने स्वयं मुख्यमंत्री बनने के बजाय अपने अनुयायी को मुख्यमंत्री बनाया ताकि वे अपने तरीके से निर्बाध राजनीति कर सकें।

आज यह स्मरण कर लेना उचित होगा कि बाल ठाकरे ने अपनी राजनीति संयुक्त महाराष्ट्र आन्दोलन से प्रारंभ की थी, लेकिन वे चर्चा में तब आए जब उन्होंने 1965 में तत्कालीन बंबई से दक्षिण भारतीयों को बेदखल करने का आन्दोलन चलाया।  वे उग्र मराठी अस्मिता के प्रतिनिधि बनकर उभरे।  उनकी मांग थी कि बम्बई मराठीजनों के लिए ही रहना चाहिए तथा बाकी का उसमें कोई स्थान नहीं था। कालांतर में उन्होंने अपनी इस सोच को विस्तार दिया। पहले सिर्फ दक्षिण भारतीय उनके निशाने पर थे तो आगे चलकर उन्होंने उत्तर भारतीयों पर भी आक्रमण किए। बाल ठाकरे की परिभाषा में मुम्बई और महाराष्ट्र मराठीभाषियों के लिए तो थे लेकिन उसमें जन्मना मराठी मुसलमानों के लिए भी कोई जगह नहीं थी। ऐसे तमाम समुदाय समय-समय पर उनकी आक्रामक सोच का शिकार होते रहे। इस संकीर्ण नीति के कारण उन्हें महाराष्ट्र में एक तबके का भारी समर्थन मिला, लेकिन अपने तमाम दावों और नारों के बावजूद वे अल्पमत में ही रहे आए। एक छोटी अवधि में जरूर शिवसेना को महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ होने का अवसर मिला, लेकिन यह भाजपा के साथ गठबंधन के कारण ही संभव हो पाया।

बाल ठाकरे ने सदैव भावना की राजनीति की। उन्होंने बेरोजगार मराठीभाषी नौजवानों को प्रभावित किया। उन्हें यह विश्वास दिलाया कि जब महाराष्ट्र मराठियों का हो जाएगा, तो उनके दुख-दर्द दूर हो जाएंगे। चार दशक से लंबी राजनीतिक यात्रा में उनकी पालकी मुख्यत: ये बेरोजगार नौजवान ही उठाते रहे। उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन शिवसैनिक बनकर वे अपने गली, मुहल्ले में किसी न किसी रूप में अपना रुतबा कायम कर सके थे। विश्व राजनीति में बेचैन युवाशक्ति का इस तरह से उपयोग पहले भी किया गया और उसकी भारी कीमत विश्व समुदाय को चुकानी पड़ी है। हिटलर की जर्मनी का उदाहरण हमारे सामने है।  बाल ठाकरे की बौध्दिक क्षमता के बारे में भी काफी कुछ कहा गया है, लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि पुर्तगाल का तानाशाह सालाजार तो अर्थशास्त्र का विद्वान था। जो भी हो, बाल ठाकरे के निधन से महाराष्ट्र की राजनीति में क्या परिवर्तन आएगा अब उसी पर राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर रहेगी।


देशबंधु में 22 नवम्बर 2012 को प्रकाशित 

 

Thursday, 15 November 2012

जेम्स बॉन्ड की राजनीति





एजेंट 007 याने जेम्स बॉन्ड को रजतपट पर अवतरित हुए एक अर्धशती पूरी हो चुकी है। 1962 में जेम्स बॉन्ड की पहली फिल्म आई थी। यह विश्व सिनेमा की एक अतुलनीय घटना है। जब से सिनेमा का आविष्कार हुआ तब से अब तक फिल्में तो हजारों बनी हैं, सैकड़ों फिल्मों ने भांति-भांति के रिकार्ड तोड़े हैं और ऐसी फिल्मों की एक लंबी सूची है जिन्होंने दर्शकों व समीक्षकों दोनों को बेइंतहा प्रशंसा बटोरी है; किंतु जेम्स बॉन्ड की फिल्मों ने जो विशेष रिकार्ड बनाया है वह बरकरार है और उसके टूटने  की दूर-दूर तक कोई संभावना नजर नहीं आती। सोचकर देखिए कि एक फिल्म चरित्र को लेकर दो दर्जन फिल्में बनें, चलें, खूब चलें और पचास साल तक दर्शकों की तीन पीढिय़ों को लुभाने में लगातार कामयाब होती रहें- क्या यह एक अनूठा रिकार्ड नहीं है!

इन तमाम फिल्मों का प्रमुख किरदार याने हीरो तो एक ही है- जेम्स बॉन्ड। लेकिन उसे परदे पर पेश करने वाले अभिनेता समय-समय पर बदलते रहे हैं- शॉन कोनेरी से लेकर डेनियल क्रैग तक। वह जिस गुप्तचर संस्था के लिए काम करता है अर्थात् ब्रिटिश विदेशी खुफिया एजेंसी एमआई-6 वह भी फिल्मों में बदस्तूर कायम है। भले ही रहस्यमय खुफिया प्रमुख 'एम' का रोल करने वाले अभिनेता या अभिनेत्री बदलते रहे हों तथा इसी तरह गुप्तचरी के औजारों का निर्माण अथवा विकास करने वाले वैज्ञानिक 'क्यू' का अभिनेता भी। गौरतलब है कि 1962 से 2012 के दरम्यान इस पांच दशकों में एक देश के रूप में ब्रिटेन और उसकी संस्था एमआई-6 के वैश्विक राजनीति में प्रभाव में कमी आने की वास्तविकता का भी कोई असर इन फिल्मों पर नहीं पड़ सका है। 

जैसा कि अधिकतर पाठक वाकिफ हैं, ब्रिटिश लेखक इयान फ्लेमिंग ने जेम्स बॉन्ड को नायक बनाकर कुछ रहस्य रोमांचपूर्ण उपन्यास लिखे थे जो अपने समय में खासे लोकप्रिय हुए। फ्लेमिंग स्वयं ब्रिटिश नौसेना के खुफिया विभाग में लंबे समय तक काम कर चुके थे। इस नाते वे गुप्तचरी की दुनिया में होने वाले घात-प्रतिघातों से अच्छी तरह वाकिफ थे और उनके उपन्यासों में यदि पाठक प्रामाणिकता का कोई अनुभव करते हैं तो उसका श्रेय लेखक के वास्तविक अनुभवों को दिया जा सकता है। मैंने इनमें से कोई भी उपन्यास नहीं पढ़ा बावजूद इसके कि जासूसी उपन्यास पढऩे में मेरी रुचि है, लेकिन जेम्स बॉन्ड की अधिकतर फिल्में मैंने देखी है सिनेमाघरों में कम, टीवी पर ज्यादा। उन फिल्मों में जो गतिशीलता और चपलता है वह दर्शक को बांधे रखती है और डेढ़-दो घंटे अच्छे से मन बहलाव हो जाता है। मैं जब जेम्स बॉन्ड की दो दर्जन फिल्मों को निर्माण के क्रम में रखकर देखता हूं तो उनमें विश्व के बदलते हुए राजनैतिक परिदृश्य के संदर्भ जैसे अपने-आप उभरकर सामने आने लगते हैं। 1962 में बनी पहली फिल्म का निर्माण उस समय हुआ था जब शीतयुद्ध अपनी चरमसीमा पर था। इसी साल अमेरिका ने क्यूबा पर 'बे ऑफ पिग्ज़' के आक्रमण की योजना बनाई थी और ऐसे किसी आक्रमण की आशंका को ध्यान में रख सोवियत संघ की नौसेना क्यूबा से लगभग बारह सौ किलोमीटर की दूरी पर तैयार खड़ी थी। ऐसा डर लग रहा था कि कहीं तीसरा विश्व युद्ध न छिड़ जाए, लेकिन कैनेडी और ख्रुश्चेव दोनों ने संयम व समझदारी का परिचय दिया और आसन्न संकट समाप्त हो गया।

मुझे फिल्मों के शीर्षक उनके निर्माण क्रम में याद नहीं है, लेकिन मोटे तौर पर कह सकता हूं कि शॉन कोनेरी अभिनीत सारी फिल्में शीतयुद्ध की भावभूमि पर ही बनी थी, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन और पश्चिमी खेमा एक तरफ है तथा दुश्मन के रूप में सोवियत संघ सामने है। कहने की जरूरत नहीं कि फिल्म परम्परा के अनुसार अंतत: नायक की ही विजय होती है। जेम्स बॉन्ड अकेला ही अप्रतिम साहस, त्वरित बुद्धि और देशभक्ति का परिचय देते हुए 'स्वतंत्र विश्व' पर आए खतरे को दूर करने में कामयाब होता है तथा ''लौह आवरण'' वाले साम्यवादी सोवियत संघ के मंसूबे नाकाम हो जाते हैं। समय बदला, शीत युद्ध समाप्त हुआ, बर्लिन की दीवार टूटी, सोवियत संघ का विघटन हुआ। ऐसे और भी परिवर्तन अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर हुए। आने वाले दिनों में हम देखते हैं कि चीन को शत्रु के रूप में पेश किया जाता है तो कभी उत्तर कोरिया को और कभी पश्चिम एशिया के किसी इस्लामी देश को। इन सारी फिल्मों में अमेरिका और इंग्लैण्ड को जनतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता का संरक्षण बनाकर पेश किया गया तथा रूस, चीन, क्यूबा, उत्तर कोरिया, आदि को ऐसे देशों के रूप में जहां किसी तरह की कोई स्वतंत्रता नहीं है और जिनकी सरकार में बैठे लोग युद्ध पिपासु हैं। फिर एक दौर ऐसा आया जब किसी एक देश को सीधे-सीधे निशाना बनाना छोड़ दिया गया।

जेम्स बॉन्ड की परवर्ती फिल्मों में हम पाते हैं कि अब दुश्मन कोई एक देश नहीं, बल्कि वहां के ध्वस्त सत्तातंत्र के कुछ ऐसे नुमाइंदे हैं, जो बदलती हुई दुनिया की वास्तविकताओं को स्वीकार करने से इंकार करते हैं। वे तथाकथित स्वतंत्र विश्व के प्रति अपनी नफरत को दबा नहीं पाते। वे एटमबम और मिसाइलें चोरी करते हैं तथा दुस्साहसपूर्ण तरीके से अपने हिसाब से दुनिया को बदल डालने के षडय़ंत्र रचते हैं। इसके बाद फिर कथा को एक नया मोड़ दिया जाता है। ऐसे खलनायक भी हमारे सामने आते हैं जो साम्यवादी नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों से आते हैं और हिटलर की तरह विश्व विजय का सपना देखते हैं। अंतिम फिल्म 'स्काई फॉल' का खलनायक जो जेम्स बॉन्ड का ही पुराना साथी है, जो खुफिया प्रमुख 'एम' से कभी प्रताडि़त होने के कारण बदला लेने पर उतारू हो जाता है।

यह विश्लेषण मैंने सूत्र रूप में ही किया है। मुझे लगता है कि जेम्स बॉन्ड की फिल्मों की निरंतर लोकप्रियता का रहस्य इन सूत्रों में खोजा जा सकता है। एक तो चूंकि नायक लगातार बदलते रहे हैं इसलिए दर्शकों को यह उत्कंठा बनी रहती है कि देखें, यह नया हीरो पुराने हीरो के मुकाबले कहां ठहरता है! फिर इसी को लेकर बहस होती है कि कोनेरी ज्यादा अच्छा हीरो था या रोज़र मूर या पियर्स ब्रेसनान। जब 'एम' के रोल में पुरुष के बजाय एक स्त्री याने जूडी डेंच आ गई तो उससे भी फिल्म की संरचना पर काफी असर पड़ा। 'एम' की सचिव मनी पैनी का चरित्र भी अभिनेत्री के साथ-साथ बदलता गया है। एक तरफ फिल्म की पटकथा राजनीतिक घटनाचक्र को ध्यान में रखकर बदलती रही है तो दूसरी तरफ जासूसी के उपकरण भी समय के साथ बदल गए हैं। शुरू का जेम्स बॉन्ड अपनी पिस्तौल और कम जटिल उपकरणों के साथ मिशन पर चल पड़ता है। वहीं बाद की फिल्मों में एक से एक अजूबे देखने मिलते हैं। एक फिल्म में तो ऐसी कार है जो किसी को दिखाई नहीं देती। स्वयं जेम्स बॉन्ड ऐसे हैरतअंगेज कारनामे करता है, जो सामान्यबुद्धि, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टि किसी पर भी ठीक नहीं उतरते, लेकिन इनसे फिल्म का रोमांच निश्चित रूप से बना रहता है।

1 नवम्बर को भारत सहित विश्व के तमाम देशों में 'स्काय फॉल' का उद्घाटन हआ। मीडिया में इस पर खूब चर्चाएं हुईं। लंबे-लंबे लेख लिखे गए। किंतु मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इयान फ्लेमिंग के उपन्यासों का जो राजनैतिक संदर्भ था, जिसे इन फिल्मों से व्यक्त किया गया, उस पर कोई चर्चा नहीं हुई। फ्लेमिंग के मूल उपन्यासों में संशोधन कर नई पटकथाएं भी लिखी गईं। उनके राजनीतिक निहितार्थों पर भी शायद गौर नहीं किया गया। ''स्काय फॉल'' में 'एम' अपने ही एक भूतपूर्व एजेंट के हाथों मारी जाती है तथा जेम्स बॉन्ड स्कॉटलैण्ड में अपनी पुश्तैनी घर ''स्काय फॉल'' में ही आखरी लड़ाई लड़ता है। इसे लेकर ही अनेक टिप्पणियां की गईं जिनका प्रमुख स्वर एक ही था कि जेम्स बॉन्ड अपने घर लौट रहा है या नहीं और कि इंग्लैण्ड अपने आपको नए सिरे से खोज रहा है। जाहिर है कि ये टिप्पणियां अधिकतर ब्रिटिश समीक्षकों ने ही की है।

भारत में फिल्मों के समाजशास्त्र को लेकर पर्याप्त चर्चा हुई है। जैसा कि हम जानते हैं आमिर खान की फिल्म 'लगान' को तो भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद (आईआईएएम) ने अपने किसी पाठ्यक्रम में भी शामिल किया। देश में ऐसे अनेक सुधी समालोचक हैं जिन्होंने भारतीय फिल्मों के आयामों पर अकादमिक अध्ययन किया है। मेरी राय में इसी कड़ी में जेम्स बॉन्ड की फिल्मों का भी एक नए दृष्टिकोण से विश्लेषण किया जाना अभीष्ट है। प्रसिद्ध समाजचिंतक नोम चॉम्स्की की एक प्रसिद्ध पुस्तक है- 'मैन्युफैक्चरिंग कंसेन्ट'। इसका हिन्दी अनुवाद 'आम राय का निर्माण' किया जा सकता है। चॉम्स्की अपनी पुस्तक में उन तमाम तौर-तरीकों की समीक्षा करते हैं जो पूंजीवादी दुनिया के बाकी हिस्सों में अपना दबदबा कायम करने के लिए प्रयुक्त किए हैं। उनकी पुस्तक में अखबारों, पुस्तकों व टीवी के कार्यक्रमों का प्रचुर उल्लेख है। इसी संदर्भ में जेम्स बॉन्ड जैसी फिल्मों को भी देखा जाना चाहिए।

अंग्रेजी में ऐसे अनेक उपन्यास लिखे गए हैं तथा मुख्यत: हॉलीवुड में ऐसी अनेक फिल्मों का निर्माण हुआ है जो येन-केन-प्रकारेण पूंजीवादी विचारधारा की न सिर्फ श्रेष्ठता स्थापित करती है बल्कि उसे विश्व के उद्धारक के रूप में भी प्रस्तुत करती हैं। ऐसी पुस्तकों व फिल्मों में गैर-पूंजीवादी देशों की खिल्ली उड़ाई जाती है, उन्हें कमजोर व कमअक्ल सिद्ध किया जाता है तथा हर तरह से उन्हें नीचा दिखाया जाता है। केन फॉलेट के उपन्यास हों या महाबली रैम्बो की फिल्में या फिर डॉमिनिक लॉपियर व लैरी कॉलिन्स का जासूसी उपन्यास द ''फिफ्थ हॉर्समेन'' ही क्यों न हो। ये दोनों वही लेखक हैं जिन्हें हम 'फ्रीडम एट मिडनाइट' व 'कैलकटा: द सिटी ऑफ जॉय' जैसी पुस्तकों के लेखक के नाते जानते हैं। ऐसे में मैं उम्मीद करना चाहूंगा कि फिल्मों का कोई गंभीर अध्येता या फिर अंग्रेजी साहित्य अथवा मास मीडिया का कोई शोधार्थी जेम्स बॉन्ड की फिल्मों का विधिवत अध्ययन कर हमें बताएगा कि इन फिल्मों ने हमारा सिर्फ मनोरंजन किया या ब्रेन वाशिंग भी की!!

देशबंधु में 15 नवम्बर 2012 को प्रकाशित 


 

Wednesday, 7 November 2012

संसाधनों का राष्ट्रीयकरण!




एक सप्ताह पूर्व एक एसएमएस मिला जिसका हिन्दी अनुवाद कुछ इस तरह होगा- ''प्राकृतिक एवं खनिज संसाधनों में एक के बाद एक घोटाले उजागर होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी, अन्य राजनैतिक दल, संवेदी समाज (सिविल सोसायटी) और मीडिया अब तक के सारे आबंटनों को रद्द करने और इन तमाम संसाधनों का राष्ट्रीयकरण करने की मांग क्यों नहीं कर रहे हैं?'' मुझे यह संदेश पाकर थोड़ी हैरानी हुई, वह इसलिए कि संदेश दिल्ली निवासी अनुज अग्रवाल ने भेजा था, जो अपने अन्य कामों के अलावा गत दो-तीन वर्षों से 'डॉयलाग इंडिया' नामक मासिक पत्रिका प्रकाशित कर रहे हैं। अपनी पत्रिका में अनुज मेरा एक न एक लेख हर माह छापते हैं, लेकिन मैं जानता हूं कि राजनीतिक रूप से वे संघ परिवार के निकट हैं। उनके संदेश का पहला हिस्सा तो ठीक है, लेकिन वे प्राकृतिक संसाधनों के राष्ट्रीयकरण की मांग कर सकते हैं, यह मेरे लिए आश्चर्य की बात थी।

हम अगले सप्ताह देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन मनाएंगे।  इस अवसर पर यह ध्यान अपने आप आता है कि राष्ट्रीयकरण का यह विचार मुख्यत: पंडित नेहरू ने ही दिया था जिसे बाद में इंदिराजी ने बढ़ाया।  आज़ादी के बाद भारत आर्थिक एवं अन्य कई दृष्टियों से बदहाल था। देश के नवनिर्माण की भारी चुनौती उस समय के राजनीतिक नेतृत्व पर थी। पंडितजी और उनके साथियों ने एक ओर जहां संसदीय जनतंत्र की राजनीतिक प्रणाली को मूर्तरूप दिया, वहीं दूसरी ओर आर्थिक मोर्चे पर भी एक नई पहल की गई। उन्होंने देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पंचवर्षीय योजना की अवधारणा को लागू किया। उनका मानना था कि एक दीर्घकालीन दृष्टि विकसित  कर कदम-दर कदम बढ़ाते हुए ही देश को आर्थिक बदहाली से उबारा जा सकता है।

 सर्वविदित है कि भारत में उस समय औद्योगिक गतिविधियां नाममात्र को थीं। देश का एकमात्र स्टील प्लांट कोई चालीस साल पहले टाटानगर में निजी क्षेत्र में स्थापित हुआ था। उसके बाद भारी उद्योग लगाने की कोई पहल अंग्रेजी राज के दौरान नहीं हुई थी। मुंबई, अहमदाबाद व कानपुर में कपड़ा मिलें थीं, कलकत्ता में जूट मिलें और इसी तरह अलग-अलग जगहों पर कुछ और औद्योगिक इकाईयां। आर्थिक प्रगति के लिए जो बुनियादी ढांचा चाहिए था, वह जैसे था ही नहीं। अपनी अनेकानेक जरूरतों के लिए देश को आयात पर निर्भर रहना पड़ता था। यूं अनेक कारखाने अंग्रेजी स्वामित्व में थे, लेकिन वे प्राथमिक क्षेत्र में नहीं थे।

इस पृष्ठभूमि में नेहरू सरकार के सामने बड़ी चुनौती थी कि प्राथमिक क्षेत्र या कि बुनियादी उद्योग कैसे स्थापित किए जाएं। देश को पेट्रोलियम, इस्पात, बिजली इन सबकी जरूरत थी, क्योंकि औद्योगिक विकास व आर्थिक प्रगति की नींव इन्हीं से रखी जा सकती थी। सरकार ने इंग्लैंड व अन्य पश्चिमी देशों से इसमें सहायता मांगी, लेकिन उन्होंने कोई खास उत्साह नहीं दिखाया। देश में तेल भंडारों के अन्वेषण के लिए आई पश्चिमी कंपनियों ने तो साफ-साफ कह दिया कि भारत में तेल है ही नहीं। यही वह समय था जब भारत और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच सुदृढ़ मैत्री संबंधों की शुरुआत हुई। सोवियत संघ व कम्युनिस्ट ब्लॉक के अन्य देशों इस्पात, तेल, बिजली, इंस्ट्रुमेंटेशन जैसे उपक्रम स्थापित करने के लिए दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया। 

हमारे छत्तीसगढ़ का भिलाई इस्पात संयंत्र इस तरह से देश को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने की दिशा में एक प्रारंभिक व ज्वलंत उदाहरण है। इसके बाद भोपाल में हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, बंगलौर में हिन्दुस्तान मशीन टूल्स व इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज आदि स्थापित हुए। इसी दौरान भाखड़ा नांगल व हीराकुंड जैसे बांध भी स्थापित हुए। ये सारे के सारे कारखाने और प्रकल्प सार्वजनिक क्षेत्र में ही थे। नेहरूजी ने इन्हें आधुनिक भारत के तीर्थ की संज्ञा यूं ही नहीं दी थी। वे जानते थे कि ये प्रकल्प देश की जनता की बेहतरी के लिए वरदान सिध्द होंगे। यह पंडित नेहरू की उदारवादी और व्यवहारिक सोच भी थी कि जब पश्चिमी शक्तियों ने भी इन सार्वजनिक उद्योगों में सहयोग की मंशा दर्शाई तो सरकार ने उसे स्वीकार करने में संकोच नहीं किया।

पंडित नेहरू साम्यवादी नहीं थे। वे साम्यवाद के अच्छे पहलुओं को स्वीकार करने के लिए तैयार रहते थे, लेकिन साम्यवाद के तौर-तरीकों से उन्हें कुछ बुनियादी आपत्तियां थीं और देश के भीतर साम्यवादी दल की रीति-नीति को लेकर उन्हें बहुत से संदेह भी थे। वे एक खुले विचारों वाले व्यक्ति थे और देश के नव-निर्माण में सबसे यथायोग्य योगदान की अपेक्षा करते थे। जब देशी उद्योगपतियों ने उन्हें बॉम्बे प्लान दिया तो उसको उन्होंने बिना देखे खारिज नहीं किया। किन्तु उनकी दृढ़ मान्यता थी कि स्वतंत्र भारत में सार्वजनिक क्षेत्र प्रमुख भूमिका निभाएगा। आर्थिक गतिविधि का कोई भी आयाम हो, वे मानते थे कि उसकी कमान केन्द्र सरकार के पास होना चाहिए।

इस तरह हम पाते हैं कि उन्होंने देश में औद्योगिक प्रगति के लिए आधारभूत ढांचा तैयार करना प्रारंभ किया। सार्वजनिक क्षेत्र को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। उद्योग के साथ कृषि संवर्धन के लिए भी नई नीतियां बनाई गईं। उन्होंने सहकारी कृषि की भी कल्पना की, जिसकी शुरुआत राजस्थान के सूरतगढ़ से हुई। पशुपालन व दुग्ध व्यवसाय में भी डॉ. कुरियन के नेतृत्व में सहकारी क्षेत्र को बढ़ावा दिया गया। विज्ञान व तकनीकी विकास के लिए आईआईटी जैसे संस्थान खुले।  आणविक ऊर्जा आयोग, अंतरिक्ष आयोग, सीएसआईआर आदि की स्थापना की गई। इन सबकी परिकल्पनाएं योजना आयोग में की गई, जिसके अध्यक्ष वे स्वयं थे।
पंडित नेहरू के इस ऐतिहासिक अवदान की चर्चा अब शायद ही कोई करता है। इंदिराजी के समय में जरूर न सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र को प्रोत्साहित किया गया, बल्कि निजी क्षेत्र के बीमार उद्योगों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा भी सरकार ने उठाया। लेकिन उनके बाद से देश के राजनैतिक नेतृत्व में बौध्दिक क्षमता का अभाव निरंतर परिलक्षित हो रहा है। कांग्रेस पार्टी ने भी नेहरू के रास्ते को एक तरह से छोड़ दिया है। आज के शासक जनता की सामर्थ्य विकसित करने के बजाय उसे याचक बनने पर मजबूर कर रहे हैं। देश व प्रदेश, कांग्रेस और भाजपा और बाकी सब इसमें बराबर के भागी हैं। अब एक हाथ से राष्ट्र के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन मुनाफाखोर औद्योगिक घरानों को दिए जा रहे हैं और दूसरी ओर गरीबों को सस्ता चावल व दोपहर के भोजन के नाम पर खुश करने की कोशिशें हो रही हैं। 

मैं अनुज की भावना से सहमत हूं कि प्राकृतिक संसाधनों का नियंत्रण सरकार के पास होना चाहिए और बेहतर होगा कि सार्वजनिक उद्यमों के माध्यम से ही उन्हें उत्पादन प्रक्रिया में प्रयुक्त किया जाए, लेकिन इसके लिए तैयार कौन होगा? भारतीय जनता पार्टी तो जनसंघ के दिनों से ही व्यापारिक हितों की पार्टी रही है, वह इसे क्यों मानने चली? कांग्रेस से भी कोई उम्मीद कैसे की जाए? रही बात मीडिया की तो वह तो पहले ही कारपोरेट जगत के हाथों बिक चुका है; फिर भी एक विचार उठा है, तो वह जीवित रहेगा, यह उम्मीद करना चाहिए।

 देशबंधु में 08 नवम्बर को प्रकाशित 

Wednesday, 31 October 2012

दा याने राजनारायण मिश्र




दा चले गए हैं और मेरे मन का एक कोना सूना हो गया है। दा याने राजनारायण मिश्र। छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार राजनारायण मिश्र इस प्यार भरे संबोधन से ही जाने जाते थे। दा को प्यार करने वालों की कमी नहीं थी और न उनके साथ महफिल सजाने वालों की। ऐसे लोग भी बड़ी संख्या में हैं, जो या तो दा को अपना गुरु मानते हैं या जिन्हें दा ने अपना शिष्य होने का गौरव प्रदान किया था। किन्तु दा के साथ मेरा रिश्ता कुछ अलग ही था। वे 1959 में देशबन्धु (तब नई दुनिया रायपुर) में काम करने आए थे। इस नाते वे मेरे वरिष्ठ सहयोगी थे। 1988 में उन्होंने देशबन्धु से विदा ले ली थी। इसके बाद वे मेरे लिए एक भूतपूर्व सहयोगी मात्र रह जाते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और वे मेरे लिए अंत तक दा ही बने रहे, संबोधन की पूरी गहराई से। उन्होंने जब देशबन्धु में काम करना प्रारंभ किया तब मैं ग्वालियर में हाईस्कूल का विद्यार्थी था। छुट्टियों में घर आते-जाते उनके साथ परिचय तो हो चुका था, लेकिन वह एक रस्मी परिचय था। 1961-62 में जब उन्होंने पत्र के साहित्य पृष्ठ पर मेरी रचनाएं छापना प्रारंभ किया तथा जबलपुर की साहित्यिक संस्था संगम का रायपुर अध्याय प्रारंभ किया तब यह परिचय कुछ और बढ़ा, लेकिन उनके साथ मेरे आत्मीय संबंधों की शुरुआत 1963 में उस वक्त हुई जब वे नवस्थापित जबलपुर समाचार में काम करने के लिए रायपुर से जबलपुर आए।  ममता भाभी संभवत: अपने मायके में थीं और अगस्त 1963 के अंत में एक माह की बेटी रिमझिम को लेकर जबलपुर आ गई थीं। उन दिनों दा के साथ मैंने एक साल तक लगातार संपादकीय विभाग में काम किया और उनसे बहुत कुछ सीखा- रेडियो से समाचार लेना, शीर्षक बनाना, पेज मेकअप करना इत्यादि। उन्हीं दिनों मेरी एक कविता ''जेल का गुलमोहर'' को भी उन्होंने संशोधित किया।

एक साल बाद याने 1964 में हम लोग लगभग साथ-साथ रायपुर लौटे। दा पहले प्रेस के पास सदर बाजार में हरि तिवारी के घर में रहे, फिर क्रमश: कंकालीपारा, बैरनबाजार, डीके अस्पताल के पीछे एक पुराने क्वार्टर में और बाद में चौबे कालोनी में। वे पत्रकारिता में तो मेरे वरिष्ठ थे ही, निजी जीवन में कब, कैसे वे मेरे बड़े भाई बन गए, यह कहना मुश्किल है। इतना जरूर कहूंगा कि दा और भाभी दोनों से मुझे निश्छल स्नेह मिला। दा की आवारगी के बारे में ढेरों किस्से प्रचलित हुए, लेकिन मेरे प्रति उन्होंने वही अनुशासन दिखाया, जिसकी अपेक्षा एक बड़े भाई से की जा सकती है। मैं उन दिनों सिगरेट पीता था, यह बात दा को नागवार गुजरती थी, फिर भी इस पर उन्होंने समझौता कर लिया था। इसके आगे बढ़ने की इजाजत उन्होंने मुझे नहीं दी और हमेशा इस बात का ख्याल रखा कि मैं कहीं बिगड़ न जाऊं !

दा नि:संदेह एक गुणी पत्रकार थे और मुझे इस बात को लेकर उनसे शिकायत बनी रही कि उन्होंने खुद होकर अपने लिए जो सीमा बना रखी थी उसे लांघ कर आगे जाने के बारे में कभी नहीं सोचा। उनकी भाषा सीधी-सपाट न होकर उसमें वह विदग्धता थी, जो एक अच्छे रिपोर्टर या कॉलम लेखक का गुण होता है। उनमें अनजान से अनजान व्यक्ति से भी तुरंत संवाद स्थापित कर लेने की क्षमता थी, जिसके बिना कोई भी अच्छा रिपोर्टर नहीं बन सकता। वे समाजवादी विचारों के थे और उनमें एक प्रतिबध्द पत्रकार के लिए स्वाभाविक, वंचितों के प्रति गहरी हमदर्दी थी। और वे दिन हो या रात जंगल हो या पहाड़ खतरे उठाकर भी काम करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। इतने सारे गुण एक साथ मुश्किल से ही मिलते हैं।

अपनी इन्हीं खूबियों के चलते वे अपनी पहचान कायम कर सके। सन् 1979 में स्टेटमैन ने ग्रामीण पत्रकारिता में उत्कृष्टता के लिए पुरस्कार स्थापित किया था। यह दा की पत्रकारिता का ही कमाल था कि साढ़े तीन सौ से भी ज्यादा प्रविष्टियों के बीच पहले ही वर्ष उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला, जबकि हिन्दी ही नहीं, अंग्रेजी और अनेक भारतीय भाषाओं के पत्रकार स्पर्धा में शामिल थे। 16 सितम्बर 1980 को उन्हें कोलकाता में आयोजित एक भव्य समारोह में यह पुरस्कार मिला और इसके बाद देशबन्धु में एक दर्जन साथियों ने उनका अनुकरण कर एक रिकॉर्ड बनाया। दा की यह रिपोर्ट गरियाबंद इलाके में अवस्थित कुल्हाड़ीघाट के आदिवासियों के शोचनीय हालत पर थी। इस तरह की कितनी ही रिपोर्टें  उन्होंने आगे-पीछे तैयार कीं।

मैं दा के द्वारा की गई कुछ रिपोर्टों का विशेष कर उल्लेख करना चाहता हूं। 1970 के दशक में ही उन्होंने देशबन्धु के कांकेर स्थित संवाददाता बंशीलाल शर्मा के साथ पन्द्रह दिन तक अबूझमाड़ के वर्जित क्षेत्र की पैदल व साइकिल से यात्रा की। ऐसा दु:साहस उनके जैसा पत्रकार ही कर सकता था। अबूझमाड़ का बीहड़ इलाका, दूर-दूर तक बसे गांव, सड़कों का सवाल ही नहीं, पीने का पानी मिलना भी मुश्किल, भोजन की तो कौन कहे और रात में सोने के लिए किसी आदिवासी की झोपड़ी। इसी तरह एक दफे दा ने अचानकमार में जंगल के किनारे बसे गांव की लगातार बारह दिन तक यात्रा की। उस इलाके में कोई डकैती हुई थी और जिसके विवरण लेने दा उस गांव पहुंचे। वहां उन्होंने आगे किसी गांव मे डाका पड़ने की खबर मिली और ऐसा कुछ हुआ कि डाकू आगे-आगे और दा पीछे-पीछे।

कहने का आशय यह कि दा धुन के पक्के थे और खबर जुटाते वक्त अपने आपको भूल जाते थे। 1977 में वे विधानसभा चुनावों की रिपोर्टिंग करने के लिए दुर्ग जिले के खेरथा बाजार विधानसभा क्षेत्र में थे। वहीं उन्हें दल्लीराजहरा में उग्र आंदोलन और पुलिस गोलीबारी की खबर मिली तो वे चुनाव छोड़कर दल्लीराजहरा निकल गए और अगले दिन गोलीकांड की आंखों देखी रिपोर्ट लेकर रायपुर आए। 1979 में बस्तर में  आदिवासी किशोरी यशोदा की हत्या हुई थी, उसमें कानून और प्रशासन से जुड़े बड़े लोगों का हाथ होने का संदेह था। दा उसकी सच्चाई जानने जगदलपुर गए। इसी बीच उन्हें खबर मिली कि किरंदुल में कुछ गड़बड़ है। वे आनन-फानन में बस्तर जिला प्रतिनिधि भरत अग्रवाल को लेकर किरंदुल के लिए चल पड़े। किरंदुल में पुलिस फायरिंग हुई थी, जिसमें ग्यारह मजदूर मारे गए थे। कर्फ्यू लगा दिया गया था। किरंदुल में घुसना आसान नहीं था, लेकिन दा और भरत जुगाड़ लगाकर वहां पहुंचे, तथ्य एकत्र किए और छुपते-छुपाते जगदलपुर पहुंचे। जगदलपुर तारघर से प्रेस को तार भेजना भी मना कर दिया गया था। तब दा किसी ट्रक में बैठकर रायपुर आए और सकलेचा सरकार में हुए इस गोलीकांड की रिपोर्ट छापने वाला देशबन्धु पहला अखबार बन गया।

ये रिपोर्टें अपने आप में पत्रकारिता का बेहतरीन नमूना थीं, लेकिन दा प्रसिध्द हुए ''घूमता हुआ आईना'' के कारण। यूं तो यह कॉलम लिखना मैंने शुरु किया था, लेकिन चार-छह अंकों के बाद ही दा ने इसका जिम्मा अपने ऊपर ले लिया था और इस तरह चमकाया  कि देशबन्धु की ही पहचान बन गया। पाठक उत्सुकता के साथ सोमवार का इंतजार करते थे, जिस दिन यह कॉलम छपता था। दा चुटीले अंदाज में इस स्तंभ में बड़े-बड़े लोगों की ऐसी खबर लेते थे कि वे आह भी नहीं भर सकते थे। दा स्वयं अजातशत्रु थे और अपने कॉलम में भी उन्होंने किसी के साथ निजी हिसाब बराबर नहीं किया, बल्कि जो लिखा वह व्यापक जनहित में।

दा एक अच्छे कहानीकार थे और एक अच्छे कवि। हम लोगों ने साथ-साथ न जाने कितने साहित्यिक कार्यक्रमों में शिरकत की, लेकिन दा का मन इसमें ज्यादा समय नहीं रमा। वे स्वभाव से मनमौजी और उदार थे। उनके पास जो गया भोलेनाथ की तरह उसे आशीर्वाद दे देते थे। उनकी जीवन यात्रा में ममता भाभी चट्टान की तरह उनके साथ रहीं और ध्रुवतारा बनकर उन्हें बार-बार घर की दिशा दिखाती रहीं। इन्हीं स्मृतियों के साथ में दा को अपनी श्रध्दांजलि अर्पित करता हूं।

देशबंधु में 1 नवम्बर 2012 को प्रकाशित 




Sunday, 28 October 2012

पांडिचेरी नहीं, पुडुचेरी


पांडिचेरी नहीं, पुडुचेरी

पुडुचेरी का समुद्र तट पथरीला है, याने वहां बैठकर आप रेत के घरौंदे नहीं बना सकते। प्रकृति की यह लीला अद्भुत है कि मात्र डेढ़ सौ किलोमीटर ऊपर चेन्नई का मीलों तक फैला मैरीना बीच पूरी तरह से रेतीला है। पुडुचेरी की सड़कों पर घूमते हुए इस बात पर ध्यान जाए बिना नहीं रहता कि यहां कदम-कदम पर शराब की दुकानें हैं। मुझे लगता है कि पूरे देश में मदिरालयों की प्रति वर्ग किलोमीटर सघनता में यह नन्हा प्रदेश शायद अव्वल नम्बर पर होगा। शायद इसीलिए बस स्टैण्ड पर तथा फुटपाथ पर मदहोश पड़े शराबियों की ओर कोई ध्यान नहीं देता।

भारत में ऐसे अनेक स्थान हैं जिनके नाम विदेशी शासन के दौरान इसलिए बिगड़ गए क्योंकि अंग्रेज और फ्रांसीसी उनका सही उच्चारण नहीं कर पाते थे। स्वतंत्र भारत में इनके मूल नाम पुर्नस्थापित करने का काम किया गया। त्रिचि अब वापिस तिरुचिरापल्ली है और त्रिवेन्द्रम तिरुअनंतपुरम। अनेक शहरों के अंग्रेजी हिज्जे  भी सुधारे गए हैं। इसके साथ-साथ जातीय अभिमान उमड़ा तो बहुत से नामों को स्थानीय भाषाओं में ढाल दिया गया। इसमें यह भी हुआ कि विदेशियों द्वारा दिए गए मूल नाम भी स्थानीकृत हो गए। कुल मिलाकर नतीजा यह हुआ कि अनेक प्रसिध्द स्थानों को स्थानीय पहचान मिल गई। इसी प्रक्रिया में जिसे हम कल तक पांडिचेरी कहते थे वह अब तमिल भाषा के अनुकूल पुडुचेरी कहलाने लगा है।

यूं तो भारत पर अंग्रेजों ने एक सौ नब्बे साल राज किया, लेकिन यूरोप के कुछ अन्य देश यथा पुर्तगाल, हालैण्ड और फ्रांस ने भी भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी सामरिक और सामुद्रिक शक्ति के बल पर भारत में अपने छोटे-छोटे उपनिवेश स्थापित किए। यह तो इंग्लैण्ड से लड़ाई में फ्रांस हार गया अन्यथा भारत ब्रिटिश राज के बदले फ्रांसीसी राज का हिस्सा बनता! बहरहाल फ्रांसीसी राज के अवशेष अब पांडिचेरी याने पुडुचेरी और उसकी दो अन्य बसाहटों यनम (आंध्र में काकीनाडा के निकट) और माहे (केरल में कोचिन के निकट) तक सीमित हैं। इन तीनों से मिलकर पुडुचेरी का केन्द्रशासित प्रदेश बनता है।  यद्यपि यनम और माहे दोनों का दैनंदिन प्रशासन समीपवर्ती जिला मुख्यालय से देखा जाता है।

हम भारतीयों के हृदय में पुडुचेरी के लिए विशेष स्थान है। यह इसलिए कि अपने समय के प्रखर क्रांतिकारी और साहित्यकार अरविन्द घोष ने ब्रिटिश राज से बचने के लिए पुडुचेरी में ही राजनीतिक शरण ली थी। यहीं आकर क्रांतिकारी अरविन्द का झुकाव आध्यात्मिकता की ओर हुआ और वे कालांतर में महर्षि अरविन्द के नाम से प्रतिष्ठित हुए। श्री अरविन्द के आध्यात्म दर्शन के जो बौध्दिक शिखर हैं उन तक पहुंचना सामान्य मनुष्य के वश की बात नहीं है, लेकिन भारत की धर्मपरायण जनता देश की स्वाधीनता व भारत की चिंतन परम्परा में उनके अनुपम योगदान को स्वीकार करती है और इसीलिए वे जनता के श्रध्दापात्र हैं।

पुडुचेरी में समुद्रतट से कोई सौ मीटर की दूरी पर रयू डी ला मैरीन नामक सड़क पर वह भवन है जिसमें अरविन्द ने अपने जीवन का उत्तरार्ध्द बिताया, उसी को आज अरविन्द आश्रम के नाम से जाना जाता है।अरविन्द आश्रम आजकल के महात्माओं के भव्य आश्रमों से बिलकुल अलग है। जो आश्रम के नाम हरिद्वार और अन्यत्र विकसित, विशाल भवनों की कल्पना करते हैं उन्हें अरविन्द आश्रम पहुंचकर शायद निराशा ही होगी। वह एक बड़े बंगले जैसा दुमंजिला भवन है, जिसमें प्रवेश करने के लिए कोई सिंहद्वार नहीं बल्कि एक साधारण दरवाजा है। इसी परिसर में एक वृक्ष के नीचे श्री अरविन्द की समाधि है। यहां पूरे समय मौन धारण करना पड़ता है, बात करने की बिलकुल मनाही है। एक जगह अंग्रेजी में लिखा हुआ है- '' जब तुम्हारे पास बात करने के लिए कोई मुद्दा न हो तब चुप रहना ही उचित होता है।'' महर्षि की समाधि में एक सादगी है, यद्यपि स्फटिक शिला के ऊपर आश्रमवासी सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रतिदिन पुष्प सज्जा करते हैं। बहुत से श्रध्दालु समाधि पर माथा टेककर बैठते हैं, लेकिन उनके लिए भी निर्देश है कि ''वहां ज्यादा न बैठें।''

पुडुचेरी के साथ भारतीय प्रज्ञा के दो और बड़े नाम जुड़े हैं। एक तमिल महाकवि भारतीदासन और दूसरे स्वाधीनता सेनानी, नवजागरण के नायक महाकवि सुब्रमण्य भारती। हमारी इच्छा सुब्रमण्य भारती का निवास देखने की थी। पुराने शहर के बीच में ईश्वरन् सेल्वी स्ट्रीट पर उनका छोटा सा घर है, जिसे महाकवि भारती अनुसंधान केन्द्र एवं संग्रहालय का स्वरूप दे दिया गया है। इस भवन का संरक्षण भारतीय सांस्कृतिक निधि (इंटैक) के पुडुचेरी अध्याय ने किया था, लेकिन जर्जर घर एक बार फिर मरम्मत के लिए बंद है। हमारे संतोष के लिए यह काफी था कि हम अपनी श्रध्दांजलि निवेदित करने के लिए महाकवि के घर तक पहुंच पाए। दिलचस्प बात तो तब हुई जब हमारे ऑटो रिक्शा वाले ने उलाहना दिया कि आप सुब्रमण्य भारती का घर क्यों कह रहे थे। आपको सीधे कहना था कि महाकवि के घर जाना है।

मैं 1988 में पांडिचेरी आया था, लेकिन नाम बदलने के बाद पुडुचेरी की मेरी यह पहली यात्रा थी। अब इस बात को कहने का कोई मतलब नहीं है कि शहर पूरी तरह बदल गया है। सड़कों पर पहले के मुकाबले कई गुना यादा रेलमपेल है। वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिसके चलते प्रदूषण बढ़ना भी स्वाभाविक है। फ्रांसीसी स्थापत्य में बने पुराने घर एक के बाद एक कर टूट रहे हैं, उनकी जगह नई भव्य इमारतें खड़ी हो रही हैं। पुरानी सड़कों के नाम भी बदल गए हैं। अब वहां कामराज सलाई है, अन्ना सलाई है और है राजीव गांधी के नाम पर बना विशाल औरतों और बच्चों का अस्पताल। 

पुडुचेरी की सड़कों पर घूमते हुए इस बात पर ध्यान जाए बिना नहीं रहता कि यहां कदम-कदम पर शराब की दुकानें हैं। मुझे लगता है कि पूरे देश में मदिरालयों की प्रति वर्ग किलोमीटर सघनता में यह नन्हा प्रदेश शायद अव्वल नम्बर पर होगा। शायद इसीलिए बस स्टैण्ड पर तथा फुटपाथ पर मदहोश पड़े शराबियों की ओर कोई ध्यान नहीं देता।

नगर में अब एक से बढ़कर एक आलीशान होटल खुल गए हैं। लेकिन हम एक मझोले दर्जे के होटल में ठहरे थे। जयराम होटल के मालिक श्री लक्ष्मीनारायण हैं। मैंने देखा कि सुबह-शाम वे रेस्तरां में आकर ग्राहकों के साथ बैठकर बातचीत करते हैं और कभी उनके साथ ही वहां अपना भोजन भी कर लेते हैं। इससे निश्चित ही भोजन की गुणवत्ता बनी रहती है, और स्टाफ भी मुस्तैद रहता है। मैं सैकड़ों होटलों में ठहरा होऊंगा और वहां खाना भी खाया होगा, लेकिन होटल का मालिक इस तरह ग्राहकों की फिक्र करे, यह पहली बार देखा। रेस्तरां से लगी हुई रसोई में भी जो साफ-सफाई देखने में आई वह पांच सितारा होटलों में भी कभी-कभी दुर्लभ होती है।  बस एक ही बात समझ में नहीं आई कि पीने का पानी प्लास्टिक के गिलास में क्यों देते हैं।

हमारा होटल भले ही साफ-सुथरा था, लेकिन चेन्नई और पुडुचेरी दोनों जगह सार्वजनिक स्थानों पर उस साफ-सफाई का अभाव मैंने देखा जिसके लिए साधारणत: दक्षिण भारत की प्रशंसा होती है। चेन्नई और पुडुचेरी के बीच लगातार बसें चलती हैं और समय पर चलती हैं। लेकिन बस के भीतर सफाई पर कोई ध्यान नहीं। शायद इसलिए कि बस आकर रुकी नहीं कि यात्री चढ़ने के लिए बेताब हो उठते हैं। नतीजा गाड़ी के भीतर प्लास्टिक की खाली बोतलें और चिप्स के पैकेट। दोनों नगरों के बस स्टैण्ड नए हैं, लेकिन उनके रखरखाव की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। और तो और चेन्नई के कामराज अन्तरराष्ट्रीय विमानतल के रिटायरिंग रूम की हालत भी बहुत अच्छी नहीं थी।

मैं अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता सम्मेलन के राष्ट्रीय अधिवेशन में भाग लेने के लिए पुडुचेरी गया था। चेन्नई से पुडुचेरी की यात्रा के लिए बस ही सर्वोत्तम विकल्प है। टैक्सी किराया साढ़े तीन हजार रुपए, जबकि एसी वोल्वो बस का किराया मात्र एक सौ नब्बे रुपया, इसमें बस स्टैण्ड तक आने-जाने के लिए ऑटो का किराया और जोड़ लें। लौटते वक्त मैं चेन्नई में एयरपोर्ट के रास्ते पर गिंडी नामक जगह पर उतर गया। वहां खडे ऑटो वाले ने मेरी शक्ल देखकर साफ हिन्दी में कहा, ''एयरपोर्ट के दो सौ रुपए।'' उसकी अनसुनी कर मैं आगे बढ़ लिया। एक दूसरा ऑटो रुका। इस ड्रायवर ने भी साफ हिन्दी में कहा, ''सौ रुपया''। मैं ऑटो पर सवार हो गया। चालक से पूछा- ''तुमने हिन्दी में बात की।'' उसका जवाब था- ''आपका चेहरा देखकर समझ में आ गया कि आप हिन्दी वाले हैं।'' भाषा और रोजगार के बीच कितना गहरा संबंध है, इस वाकये से जान लीजिए।


देशबंधु में 28 अक्टूबर 2012 को प्रकाशित 

 

Wednesday, 17 October 2012

खुर्शीद, खेमका, वाड्रा, मीडिया




मेरे एक मित्र का कहना है कि उन्होंने अब टीवी पर समाचार देखना बंद कर दिया है। वे कहते हैं कि तुम पत्रकार हो, समाचार सुनना तुम्हारी मजबूरी हो सकती है लेकिन मैं क्यों अपना समय और दिमाग व्यर्थ की बातों में बर्बाद करूं।  एक और मित्र झल्लाकर कहते हैं कि वे फिज़ूल की बहसों से ऊबकर अब सन्यास ले लेना चाहते हैं। सचमुच, सुबह-शाम अखबार देखो या टीवी पर समाचार सुनो, ऐसा लगता है मानो भ्रष्टाचार के सिवाय अब इस देश में कोई और मुद्दा बचा ही नहीं है। गोया हमने अपनी बाकी तमाम समस्याओं के समाधान खोज निकाले हैं! यह सच है और उचित भी कि सार्वजनिक जीवन में  शुचिता एक  जरूरी और महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन बाकी तमाम जरूरी सवालात की अनदेखी करने में कौन सी समझदारी है? जो लोग सिर्फ इसी एक काम में जुटे हुए हैं, उनका मकसद आखिरकार क्या है? वे देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं?  और क्या वे सचमुच नहीं जानते कि एक संकीर्ण बिंदु पर चलाये जा रहे आन्दोलन से क्या नफा-नुकसान हो सकता है? इस परिदृश्य में मीडिया की क्या भूमिका है, इस पर भी गौर किये जाने की आवश्यकता है।

सलमान खुर्शीद का मामला ही लें। मेरा मानना है कि देश के कानून मंत्री जैसे बड़े व महत्वपूर्ण  पद पर रहते हुए उन्हें सार्वजनिक जीवन में अन्य कोई  जिम्मेदारी  लेने से बचना चाहिए था। क्या जरूरी था कि वे जाकिर साहब के नाम पर बने ट्रस्ट के अध्यक्ष बनते? इस जगह पर वे अपने किसी विश्वस्त को बैठा सकते थे। लेकिन इस मोहग्रस्तता के वे अकेले उदाहरण नहीं हैं। सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष रहते हुए शान्ति निकेतन-श्रीनिकेतन विकास न्यास के अध्यक्ष बने रहे और प्रणब मुखर्जी ने सरकार में तारनहार मंत्री रहते हुए भी कितने ही छोटे-मोटे अन्य दायित्व किसी अन्य को नहीं सौंपे। इसी तरह अनेक अन्य मंत्री- मुख्यमंत्री क्रिकेट संघ और ओलिंपिक संघ आदि की अध्यक्षता का मोह नहीं छोड़ पाते। आश्चर्य है कि इसका जो नैतिक पहलू है उस पर किसी सुधारक ने आज तक एक शब्द नहीं कहा। बहरहाल, यह तो मानना होगा कि अपनी भाषा व भावों पर संयम न रख पाने के बावजूद श्री खुर्शीद ने विदेश यात्रा से लौटने के कुछ ही घंटों के बाद पत्रवार्ता कर न सिर्फ अपना पक्ष रखा, बल्कि स्वयं होकर जांच करने की मांग भी रख दी। उन्होंने तो एक मीडिया समूह के खिलाफ केस भी दाखिल कर दिया है। इसके बाद क्या अब हमें कानूनी प्रक्रिया के जरिए सच्चाई सामने आने की प्रतीक्षा नहीं करना चाहिए? 

अनेक टीकाकार कानूनी प्रक्रिया की प्रभावशीलता को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। वे तर्क देते हैं कि कानून के रास्ते चलें तो सच्चाई सामने आने में दस-बीस साल लग सकते हैं और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि दोषी को अंतत: सजा मिल पाएगी या नहीं। यह तर्क अपनी जगह पर सही है, लेकिन अगर कोई अपराध हुआ है या अपराध का आरोप है तो आखिरकार उसकी जांच कानून के दायरे के भीतर ही हो सकती है। जनता की अदालत में फैसला करने की बात अक्सर आकर्षित करती है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसा करने में तथ्यों की अनदेखी कर भावावेश के चलते गलत फैसले लिए जा सकते हैं। आश्चर्य तब होता है जब टीवी चर्चाओं में बैठने वाले कानून के बड़े-बड़े जानकार भी निर्धारित प्रक्रिया के बजाय जनभावना के अनुरूप आनन-फानन में फैसला सुना देना चाहते हैं। क्या ऐसा करने के पीछे उनका अपना कोई गोपन एजेंडा है?

इधर हरियाणा के अधिकारी अशोक खेमका के तबादले ने एक बार फिर कांग्रेस विरोधियों की तोपों का मुंह सलमान खुर्शीद से हटाकर राबर्ट वाड्रा की ओर कर दिया है। वाड्रा से हमारी कोई सहानुभूति नहीं है। उनके बारे में अपनी राय मैं 11 अक्टूबर के कॉलम 'रॉबर्ट वाड्रा का तो बहाना है' में व्यक्त कर चुका हूं, किंतु श्री खेमका के तबादले की सच्चाई क्या है? वे एक चैनल पर प्रदेश सरकार के फैसले की तारीफ कर रहे थे तो दूसरे पर अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित नजर आ रहे थे, तीसरे चैनल पर उनके वकील उन्हें मिली हत्या की धमकी का मुद्दा उठा रहे थे, तो चौथे चैनल पर वे रोने-रोने को हो गए थे। सारे चैनल उनकी बहादुरी की तारीफ कर रहे थे। उन्हें आश्वस्त कर रहे थे कि देश उनके साथ है परन्तु किसी ने भी यह नहीं कहा कि श्री खेमका को तत्काल कडी सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए और टेलीफोन पर मिल रही धमकियों की अविलंब जांच की जाए।

श्री खेमका के मुताबिक बीस साल में उनके चालीस बार तबादले हो चुके हैं। इसका अर्थ यह है कि सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या गैर-कांग्रेसी, उनकी पटरी अपने आला-अफसरों अथवा मंत्रियों के साथ कभी नहीं बैठी। इतने वर्षों की सेवा के आधार पर वे सचिव पद के अधिकारी हैं, लेकिन उन्हें वर्तमान सरकार ने विशेष जिलाधीश जैसा नया पद सृजित कर उस पर बैठा दिया था। याने वाड्रा प्रकरण के पहले से ही सरकार उनसे नाखुश चली आ रही थी। फिर उन्होंने किसी मामले में फैसला नहीं लिया, इस पर हाईकोर्ट ने उन्हें अवमानना का आरोपी माना, अपनी सफाई में उन्होंने कहा कि उन्हें मंजूर नहीं कि उनके लिए फैसले की अपील कनिष्ठ अधिकारी करें; इस तर्क को उचित मानते हुए हाईकोर्ट ने उनका तबादला करने का आदेश दिया। अब सवाल उठता है कि जब वे तबादले की प्रतीक्षा में थे, तब एक विवादग्रस्त मामले में उन्हें फैसला क्यों लेना चाहिए था। यही नहीं, तबादला आदेश मिल जाने के बाद भी उन्हें एक और नई जांच का आदेश क्यों  देना चाहिए था। क्या यह बेहतर नहीं होता कि हाईकोर्ट के अनुकूल निर्णय के बाद वे हफ्ते दस दिन की छुट्टी पर चले जाते और वे अपनी वरिष्ठता के आधार पर नई पदस्थापना की प्रतीक्षा करते! सब जानते हैं कि सरकार अधिकारियों के तबादले अपनी खुशी-नाखुशी से करती है। उसमें न हरियाणा अपवाद है, न मुख्यमंत्री हुड्डा, न अधिकारी खेमका। इस पृष्ठभूमि में पाठक तय कर सकते हैं कि श्री खेमका ने साहस का परिचय दिया या सुविचारित किंतु अनावश्यक दुस्साहस का।

इस बीच लोकसभा के दो उपचुनाव सम्पन्न हो गए। इन दोनों सीटों पर कांग्रेस की ओर से पुरखों के पुण्य प्रताप पर भरोसा करने वाले उम्मीदवार थे। एक बमुश्किल तमाम जीते और दूसरे बुरी तरह हारे। इसमें उत्तराखंड का मामला कुछ विचित्र है। वहां विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ले देकर जीत हुई, लेकिन मुख्यमंत्री तय करने की बात हुई तो हरीश रावत की स्वाभाविक प्रबल दावेदारी को दरकिनार कर विजय बहुगुणा को पद सौंप दिया गया। इतने पर भी बात रुक जाती तो गनीमत थी। उनके बेटे को लोकसभा का टिकट देने में कौन सी समझदारी थी? बहुगुणा परिवार ने कांग्रेस की बहुत सेवा की होगी, लेकिन क्या हाईकमान को यह याद नहीं कि विजय और रीता बहुगुणा के पिता हेमवतीनंदन बहुगुणा ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ दिया था! इसी तरह राष्ट्रपति के बेटे अभिजीत मुखर्जी यदि लोकसभा का मोह छोड़ विधानसभा में बने रहते तो मुट्ठी खुलने की नौबत नहीं आती।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अरविंद केजरीवाल का नया खुलासा सामने नहीं आया है। सुनते हैं कि वह नितिन गडकरी के बारे में होगा। इसके पूर्व श्री केजरीवाल ने दिल्ली में अपना अनशन समाप्त कर फरुर्खाबाद कूच करने का ऐलान कर दिया है। यह समझना मुश्किल हो रहा है कि उनका लक्ष्य अंतत: क्या है। जो भी हो, इस सारे माहौल में मीडिया की जो भूमिका है वह लगातार प्रश्नों के घेरे में आ रही है। कल तक मीडिया अपने आपको संसद के विकल्प के रूप में पेश कर रहा था, अब लगता है कि उसने अपने ऊपर न्यायालय का रोल भी ले लिया है। यह व्यस्त स्वार्थों और पूंजीप्रेरित उद्दण्डता भारतीय जनतंत्र के लिए एक नई चुनौती है, जिस पर आज नहीं तो कल प्रबुध्द समाज को पुनर्विचार करना ही होगा।

देशबंधु में 18 अक्टूबर 2012 को प्रकाशित