Thursday, 20 September 2018

विश्व बाजार में विदेश नीति!


                                             

 अमेरिकी पत्रकार थॉमस फ्रीडमैन की पुस्तक 'द वर्ल्ड इज फ्लैट' सन् 2005 में प्रकाशित हुई थी। देखते ही देखते लाखों प्रतियां बिक गई थीं। भारत में भी इस पुस्तक की खूब चर्चा हुई थी। थॉमस फ्रीडमैन के लेख हमारे कुछ अंग्रेजी अखबारों में नियमित रूप से छपने लगे थे। मोटे अर्थों में यह पुस्तक अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद और वैश्वीकरण की वकालत में लिखी गई थी। हम भारतीयों को पुस्तक शायद इसलिए कुछ अधिक अच्छी लगी थी कि इसकी शुरूआत फ्रीडमैन के बंगलौर दौरे, इंफोसिस के कारपोरेट दफ्तर के भ्रमण, और नंदन निलेकणी के साथ वार्तालाप से हुई थी। पुस्तक के शीर्षक से ध्वनित होता है कि दुनिया गोल न रहकर चपटी या सपाट हो गई है यानि यहां से वहां तक संबंधों के तार जोड़ना आसान हो गया है और यह कि विश्व समाज का व्यवहार इस संपर्क-सघनता पर ही आधारित होगा।

फ्रांसीस फुकुयामा की बहुचर्चित पुस्तक 'द एंड ऑफ हिस्ट्री' भी किन्हीं अर्थों में इसी अवधारणा पर लिखी गई थी। एक तरह से देखें तो अमेरिका में रीगन और इंग्लैंड में थैचर के आने के बाद वैश्विक संबंधों में एक नए युग की शुरुआत हुई थी। ये दोनों तथा इन जैसी अनेक पुस्तकें इस नए दौर की कथित उपलब्धियों का गुणगान करने के लिए लिखी गईं। द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने तथा उपनिवेशवाद से तीसरी दुनिया के अनेक देशों की मुक्ति के बाद दुनिया में जो नया माहौल बन रहा था उनका निषेध रीगन-थैचर युग में होना शुरू हो गया था। यह समय था जब न तो तीसरी दुनिया में जवाहरलाल नेहरू जैसा कोई नेता था, न अमेरिका में न्यू डील लाने वाला रूजवेल्ट जैसा राष्ट्रपति, और न रूस में ख्रुश्चेव जैसा संतुलन साधने वाला जनरल सेक्रेटरी, न इंग्लैंड में नेशनल हेल्थ सर्विस लाने वाला एन्युरिन बेवन जैसा दूरदर्शी मंत्री।
इस बीच तकनालॉजी में कल्पनातीत प्रगति हो रही थी। जनता को समझाया जा रहा था कि प्रौद्योगिकी के विकास के साथ-साथ हमारा यह विराट संसार एक विश्व ग्राम में बदल जाएगा और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर हम अपने लिए एक बेहतर संसार रच सकेंगे। कुछ अंशों में तकनालॉजी का विकास एक वरदान था, लेकिन हमें न तब समझ आया और न आज समझ आ रहा है कि आम आदमी तो सिर्फ उपभोक्ता है। तकनालॉजी का मालिकाना हक जिनके पास है वे अपने लिए एक नए संसार की रचना कर रहे हैं; जिसमें हमारे लिए तो कुछ हद तक झुनझुने हैं, और बाकी कभी न पूरे होने वाले सपने। इस तरह भारत ही नहीं, अनेकानेक देश एक व्यामोह में जकड़कर रह गए हैं। 
भारत ने 1991 में पी.वी. नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्री और डॉ. मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने के साथ ही सपनों की उस राह पर चलना शुरू कर दिया था जिसे रीगन-थैचर के समय में बिछाया गया था। लगभग तीन दशक पहले के उस वातावरण को याद करूं तो समझ आता है कि इस नए रास्ते को चुनने के दो कारण थे। एक तो शायद यह विश्वास था कि इस पर चलने से ही देश की आर्थिक प्रगति होगी और दूसरा शायद यह कि हमारे नीति निर्धारकों को कोई अन्य विकल्प दिखाई नहीं दे रहा था। जो भी हो, उस समय से लेकर अब तक वैश्विक स्तर पर ऐसी आर्थिक नीतियां बनाई जा रही हैं जो जनता के बिल्कुल पल्ले नहीं पड़तीं। तथापि भारत सहित अनेक देश इन नीतियों को लागू करने के लिए वचनबद्ध व एक हद तक मजबूर दिखाई देते हैं। 
वर्तमान की चर्चा करें तो दिखाई देता है कि हम अमेरिका और चीन इन दोनों की प्रतिस्पर्द्धा और महत्वाकांक्षा के बीच फंस गए हैं। यह अजीब विडंबना है कि एक ओर हम विश्व की चौथी-पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दंभ कर रहे हैैं और दूसरी ओर हमें समझ नहीं आ रहा कि अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्द्धा के बीच अपनी स्वाधीन हैसियत को कैसे बचाकर रखा जाए। वैश्विक राजनीति में नए-नए समीकरण बन रहे हैं जो दुनिया दो ध्रुवों में बंटी थी वह एकध्रुवीय हुई और फिर देखते ही देखते एक नया दूसरा ध्रुव उभर गया। पुराने वक्त में की गई संधियां अप्रासंगिक हो गईर्ं और जो नई संधियां बन रही हैं वे अनेक तरह की पेंचीदगियों से भरी हुई है। एक नई दिक्कत यह भी पेश आ रही है कि सार्वभौम सत्ताओं के बीच हुई संधियों का भी तिरस्कार किया जा रहा है। 
पिछले तीस-चालीस साल के दौरान सत्ता प्रतिष्ठान में यह सोच मजबूत हुई है कि विदेश नीति सिर्फ राजनीतिक भलमनसाहत से नहीं चलती, देशों के बीच आर्थिक संबंधों पर ध्यान देना अधिक आवश्यक है। अमेरिका और चीन दोनों की विदेश नीति में इसे देखा जा सकता है। अपने अध्ययन से हम अमेरिका के बारे में जानते हैं कि उसने हमेशा अपने देश के पूंजीपति वर्ग को ध्यान में ही अन्य देशों के साथ संबंध बनाए या तोड़े। शीतयुद्ध के दिनों में सोवियत संघ की नीति इसके बिल्कुल विपरीत थी, वह बहुत पुरानी बात हो गई है। चीन कहने को साम्यवादी देश है, किन्तु वैदेशिक संबंध निभाने में उसका रवैया अमेरिका नीति से बहुत अलग नहीं है।
भारत की दुविधा यह है कि वह किसके साथ जाए और कितनी दूर तक जाए। हमारे प्रभुत्वशाली वर्ग की मानसिकता अमेरिकापरस्त है और इस वजह से हमारे सत्ताधीश आंख मूंदकर अमेरिका का अनुसरण करना चाहते हैं। ऐसा करने से देश को क्या लाभ-हानि होगी इसकी चिंता भी वे नहीं करते। इसलिए हम फिलीस्तीन का साथ देना छोड़ देते हैं, इजराइल को सगे भाई से बढ़कर मान देते हैं, इरान के साथ किए गए समझौतों का उल्लंघन करने में संकोच नहीं करते, फिर बीच-बीच में संतुलन साधने के लिए नए-नए उपाय खोजते हैं। इस अमेरिकापरस्त विदेश नीति का नुकसान हमें घरेलू मोर्चे पर कई तरह से उठाना पड़ता है। जैसे अगर आज हम इरान से कच्चा तेल लेना बंद कर दें जैसा कि अमेरिका चाहता है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह अभी समझ नहीं आ रहा है।
चीन के साथ संबंधों का निर्वाह कैसे किया जाए यह एक जटिल प्रश्न है। 1962 की कड़वी यादों से हम अभी तक उबर नहीं पाए हैं। चीन का वैभव हमें लुभाता है। उसने जो आर्थिक तरक्की की है उससे हम चकित हैं। दूसरी तरफ चीन को लेकर एक संशय हमेशा बना रहता है। हमारे पड़ोसी देशों के साथ, फिर एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों के साथ चीन ने जो व्यापारिक रिश्ते कायम किए हैं वे भी हमें परेशान करते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि चीन हमारा पड़ोसी देश है जबकि अमेरिका हमसे सात समंदर पार है। यह तथ्य रेखांकित करना चाहिए कि दो सौ साल की गुलामी में भारत हर तरह से कमजोर हुआ जबकि चीन में प्रारंभ से उद्यमशीलता का वातावरण था जिसके कारण वह देश हमसे कभी भी पीछे नहीं था। 
आज की स्थिति यह है कि कुछ ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच है जिन पर हम अमेरिका के साथ हैं, तो कुछ ऐसे भी मंच हैं जहां भारत और चीन साथ बैठते हैं याने संतुलन साधने की कोशिश तो है, लेकिन एक अस्पष्टता बनी हुई है। मुझे मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद का ध्यान आता है। जब 1997 में दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई थी तब अकेला मलेशिया ही उस संकट से बच सका था। महातिर मोहम्मद प्रधानमंत्री थे और उन्होंने मलेशियाई मुद्रा पर सट्टेबाजी नहीं होने दी थी। अब जब वे दुबारा प्रधानमंत्री बने हैं तो उन्होंने चीन से भारी-भरकम योजनाओं के लिए कर्ज लेने से इंकार कर दिया है। आशय यह कि हमारे नीति-निर्धारकों को खासकर विदेश नीति बनाने वालों को निर्णय लेने  में साहस और स्पष्टवादिता का परिचय देना चाहिए।
देशबंधु में 20 सितम्बर 2018 को प्रकाशित 

Wednesday, 12 September 2018

हिंदी : विसंगतियां व विडंबनाएं



कल 14 सितंबर है। हिन्दी दिवस। इस मौके पर मुझे कुछ ऐसे नाम याद आ रहे हैं जिनसे कम से कम छत्तीसगढ़ में पाठकों का  एक बड़ा वर्ग परिचित है। प्रोफेसर वि.गो. वैद्य रायपुर के शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय में रसायनशास्त्र के प्राध्यापक थे। पड़ोसी  थे और अक्सर मुलाकातें होती थीं। एक दिन यूं ही कुछ बात छिड़ी तो उन्होंने देशबन्धु के लिए ''कुछ ज्ञान-कुछ विज्ञान"  शीर्षक से साप्ताहिक स्तंभ लिखना शुरू किया जो कई बरस चला। वे मराठीभाषी थे और उनके कॉलम में मराठी का पुट आने से भाषा और निखर जाती थी। वैद्य साहब बाद में बेटे के पास पुणे चले गए। वहां उन्होंने मराठी से हिन्दी में विज्ञान कथाओं का अनुवाद करना प्रारंभ किया, फिर उन्होंने एनबीटी के लिए मूल हिन्दी में ही एक विज्ञान उपन्यास लिखा।

रायपुर के वास्तुविद् याने आर्किटेक्ट के.एल. बानी के साथ अच्छा संपर्क था। एक दिन उनका लिखा पत्र देखा तो भाषा और लिखावट ने अनायास ही मन मोह लिया। मेरे आग्रह पर श्री बानी ने इस अखबार में तत्व चिंतन पर एक साप्ताहिक कॉलम की शुरूआत की जो पिछले साल उनके असमय निधन तक नियमित प्रकाशित होता रहा। कुछ ऐसा ही किस्सा डॉ. सोमनाथ साहू के साथ हुआ। वे हमारे प्रदेश के वरिष्ठ और सम्मानित चिकित्सक हैं। उन्होंने एक दिन मुंबई में मेडिकल कॉलेज के अपने शिक्षक के पत्र की कापी अपने एक टिप्पणी के साथ मुझे पढ़ने भेजी। सुंदर लिखावट, सुंदर भाषा, और सुंदर अभिव्यक्ति। मैंने डॉ. साहब को उकसाया तो वे अपने आत्मकथात्मक संस्मरण लिखने के लिए काफी ना-नुकुर के बाद राजी हुए और इस तरह उन्होंने एक मुकम्मल पुस्तक लिख डाली।
एक नाम का जिक्र और करूंगा। इंदर सिंह आहूजा बेमेतरा जिले के दाढ़ी नामक गांव से आते हैं। इनका रायपुर में अनाज की आढ़त का कारोबार था। आहूजा जी ने शायद कॉलेज की पढ़ाई भी नहीं की है। लेकिन पिछले दो दशक से वे देशबन्धु में गुरु ग्रंथ साहब पर एक साप्ताहिक स्तंभ लिख रहे हैं। उन्होंने हमारे लिए खालसा पंथ के तीन सौ वर्ष पूर्ण होने पर मनोयोग से एक पुस्तक का संपादन भी किया। इस सिलसिले को विस्तार दें तो हमें दक्षिण भारत के उन हजारों व्यक्तियों का ध्यान आता है जिन्होंने महात्मा गांधी और राजाजी की प्रेरणा से हिन्दी सीखी और फिर अहिन्दी भाषी दक्षिण भारतीयों को हिन्दी सिखाने के मिशन में जुट गए। आज भी दक्षिण के पांचों राज्यों में स्वैच्छिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में इस कार्य में जुटे हुए हैं।  इनके साथ-साथ हमें मुंबई के फिल्म उद्योग का भी ध्यान आता है जिसने हिन्दी को देशव्यापी स्तर पर लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह क्रम यहां समाप्त नहीं होता। फिलहाल मेरा मकसद यह रेखांकित करना है कि जिस हिन्दी को हम राष्ट्रभाषा कहकर इठलाते हैं  उसके उन्नयन का काम कितने जाने-अनजाने लोगों ने बिना किसी प्रत्याशा के किया है। ऐसे तमाम उदाहरण हिन्दी के भविष्य के प्रति आश्वस्त करते हैं। किन्तु दूसरी तरफ निराशा होती है जब हमारा ध्यान हिन्दी जगत में व्याप्त विसंगतियों और विडंबनाओं की ओर जाता है।  हिन्दी भाषी प्रदेशों में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर हिन्दी की जो स्थिति देखते हैं, निराशा से मन वहीं घिर जाता है। प्राथमिक शिक्षा पर 'असर' नामक जो वार्षिक रिपोर्ट आती है उसमें सरकारी स्कूलों की बात होती है, गणित की कमजोरी का उल्लेख होता है; लेकिन जिस भाषा में सारा जीवन व्यवहार होना है, उसकी तरफ कोई तवज्जो नहीं दी जाती। एक ओर जहां पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाने की योजनाएं चल रही हैं वहीं मातृभाषा या राष्ट्रभाषा के प्रति बेरुखी पर क्यों नहीं चिंता होना चाहिए? 
उच्च शिक्षा में तो हाल बेहाल हैं। अधिकतर विद्यार्थी हिन्दी में एम.ए. इसलिए करते हैं कि उन्हें यह विषय स्नातकोत्तर उपाधि पाने का सबसे सरल उपाय लगता है। विषय में उनकी रुचि अक्सर नहीं होती और उपाधिधारी अनेक व्यक्ति हिन्दी में खुद को भलीभांति अभिव्यक्त नहीं कर पाते। एम.ए. ही क्यों, हिन्दी साहित्य में पीएचडी करने वालों की भी रुचि न तो भाषा में होती, न तो साहित्य में। उनके लिए वह नौकरी पा जाने का एक जरिया मात्र है। जब शिक्षा प्राप्ति के दौरान यह स्थिति है तो आगे चलकर क्या होगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। किन्तु हम विद्यार्थियों को ही क्यों दोष दें? हिन्दी का पूरा तंत्र जिनके जिम्मे है वे लोग क्या कर रहे हैं? इसमें हिन्दी अखबार, टीवी चैनल, सरकारी उपक्रमों के राजभाषा विभाग, हिन्दी सेवा के नाम पर चल रही संस्थाएं, विश्व हिन्दी सम्मेलन इत्यादि सब शामिल हैं।
मैं एक समय रेलवे बोर्ड की राजभाषा समिति का सदस्य था। तब देखा कि देश के अनेकानेक रेलवे स्टेशनों पर जो हिन्दी ग्रंथालय हैं उनमें एक सिरे से अपठनीय पुस्तकें भरी पड़ी हैं जिन्हें गैर-हिन्दी तो क्या, हिन्दीभाषी रेलकर्मी भी छूना पसंद नहीं करते। जाहिर है कि यह लेखक, प्रकाशक और राजभाषा विभाग का मिला-जुला करतब था। अन्य सार्वजनिक उपक्रमों में भी स्थिति बेहतर नहीं है।  जो राजभाषा अधिकारी होते हैं उनमें से अधिकतर औपचारिकता का निर्वाह करने में विश्वास करते हैं। भूले-भटके कोई कल्पनाशील और परिश्रमी हिन्दी अधिकारी आ जाए तो वह एक अपवाद ही होता है। इस विषय में चिंता यह देखकर और बढ़ जाती है कि सार्वजनिक उपक्रमों का धीरे-धीरे निजीकरण हो रहा है। निजी कंपनियों को अपने कारोबार से मतलब। वे राष्ट्रभाषा जैसे व्यर्थ के कामों में अपना दिमाग खपाना पसंद नहीं करते।
मेरा ध्यान अभी-अभी मॉरीशस में सम्पन्न हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन पर जाता है। पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 1975 में नागपुर में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत रुचि से आयोजित हुआ था। उसी समय महात्मा गांधी के नाम पर वर्धा में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय स्थापित करने का फैसला लिया गया था। दूसरा सम्मेलन 1976 में मॉरीशस में ही हुआ था जिसमें मैंने भाग लिया था। तभी  यह आशंका हो गई थी कि विश्व हिन्दी सम्मेलन के नाम पर ऊंची पहुंच वाले कुछ लेखकों, पत्रकारों और हिन्दी सेवियों ने एक प्रपंच रच लिया है जिसका इस्तेमाल वे निज लाभ के लिए करेंगे। वही हुआ भी। मॉरीशस के ताजा सम्मेलन में जो कुछ हुआ उससे तो मॉरीशस के ही हिन्दी लेखक व हिन्दी प्रेमी विक्षुब्ध और हताश हैं। वैसे भी नाम के लिए यह हिन्दी सम्मेलन था, इसकी पूरी परिकल्पना हिन्दुत्व सम्मेलन की थी।
दरअसल, तमाम भारतीय भाषाओं में सबसे प्रमुख हिन्दी एक दुरभिसंधि का शिकार हो गई है। हिन्दी के समूचा तंत्र पर मनुवादी सोच का कब्जा ऊपर से नीचे तक दिखाई देता है। जातीय, प्रांतीय और धार्मिक आस्थाओं ने हिन्दी को पुष्ट करने के बजाय दुर्बल करने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। मीडिया भी कम अपराधी नहीं है। हिन्दी अखबारों से हिन्दी को लगातार खारिज किया जा रहा है। चैनलों की स्थिति भी बेहतर नहीं है और सबसे बढ़कर दोष तो हमारे उस प्रबुद्ध समाज का है जिसकी मानसिकता हिन्दी में विमर्श करने के लिए, संवाद करने के लिए, है ही नहीं। वे अंग्रेजी में भाषण देते हैं, लेख लिखते हैं, उनकी पुस्तकें उसी में छपती हैं; और वे सोचते हैं कि हिन्दी का प्रयोग करने से  उनका उच्चासन छीन जाएगा। कुल मिलाकर हिन्दी अब धार्मिक कर्मकांड की भाषा बनती जा रही है। हिन्दी दिवस पर इस बारे में हम सबको सोचने की आवश्यकता है। 
देशबंधु में 13 सितम्बर  2018 को प्रकाशित 

Wednesday, 5 September 2018

मानसरोवर यात्रा पर राहुल 



कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इन दिनों मानसरोवर यात्रा पर हैं। ध्यान आता है कि आज से तकरीबन सौ साल पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू  ने अमरनाथ की यात्रा की थी। उन दिनों दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर यात्रा करना कष्टसाध्य था। रास्ते में सुविधाएं भी न्यून थीं फिर भी नेहरूजी ने यह यात्रा की। इसका सुंदर वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा 'मेरी कहानी' में किया है। बात निकल पड़ी है तो ध्यान आता है कि जब पंडित नेहरू नैनी जेल में कैद थे तब उन्होंने माघ स्नान के लिए जाते श्रद्धालुओं को लेकर गंगा के बारे में इंदिरा जी को एक रोचक पत्र लिखा था।

इसी तरह वे जब अहमदनगर जेल में बंद थे तब बुद्ध पूर्णिमा का चन्द्रमा देखकर उन्होंने भगवान बुद्ध के बारे में एक संक्षिप्त लेकिन सटीक टिप्पणी लिखी थी। यह भी हमें पता है कि गीता उनके सिरहाने हमेशा रखी रहती थी और वे नियमित योगाभ्यास भी करते थे। शीर्षासन की मुद्रा में उनका फोटो बहुत ही दिलचस्प है। इलाहाबाद के पैतृक घर आनंद भवन के संग्रहालय में यह देखना दिलचस्प है कि नेहरू जी ने इंदिरा गांधी के जन्म पर उनकी कुंडली भी बनवाई थी। इन तथ्यों के आईने में अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एक आस्थावान व्यक्ति थे। वे जड़ अर्थ में नास्तिक नहीं थे लेकिन उनकी रुचि तत्वज्ञान में अधिक थी, कर्मकांड में उनका विश्वास लगभग नहीं था और वे धर्म को निजी आस्था का विषय मानते थे।

सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी उनका अनुसरण कर रहे हैं? जाहिरा तौर पर ऐसा नहीं लगता। लेकिन थोड़ी गहराई में जाएं तो कयास लगता है कि राहुल ने नेहरू परिवार की परंपरा को त्यागा नहीं है बल्कि कुछ अधिक उत्साह से उसे आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। इसके पीछे क्या कारण हैं यह जानने की कोशिश हम करेंगे। मेरी समझ में तीन बिन्दु आते हैं- एक- पंडित नेहरू की तरह राहुल भी आस्थावान हैं। दो- उन्हें इंदिरा गांधी की तरह अपनी आस्तिकता का प्रदर्शन करने से संकोच नहीं है। तीन- वे जो ऐसा कर रहे हैं, आज के राजनीतिक माहौल में शायद उसकी आवश्यकता है।

एक समय था जब प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने बनारस में पंडितों के पैर धोए थे और नेहरू जी ने उस पर आपत्ति दर्ज की थी। राजेन्द्र बाबू से इस पर उनका संवाद हुआ।  नेहरू जी का स्पष्ट मत था कि राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का जीवन व्यापार निजी नहीं होता इसलिए उन्हें अपनी आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन करने से बचना चाहिए। उनकी यही सोच थी जिस वजह से देश में एक बहुत बड़े वर्ग ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में सत्ताधारी नेताओं जैसे के.एम. मुंशी की सक्रिय भूमिका को नापसंद किया था। आगे चलकर जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देवरहा बाबा के मचान के नीचे खड़े होकर बाबा के चरणों तले अपना मस्तक रखा था तो वह दृश्य भी प्रबुद्ध समाज को नागवार गुजरा था। इसमें भविष्य में आने वाले खतरे की परछाई भी नजर आ रही थी।

मेरा मानना है कि कोई भी व्यक्ति आस्थाहीन नहीं होता। आवश्यक नहीं कि आपका विश्वास किसी अदृश्य शक्ति में हो। आस्था का केन्द्र जीवित या मृत, हाड़-मांस का कोई व्यक्ति भी हो सकता है, या फिर कोई अन्य वस्तु। आखिरकार संगठित धर्म का उदय होने के पहले प्राचीन युग का मनुष्य सूर्य, आकाश, चन्द्रमा, अग्नि- इन सबकी ही आराधना करता था। आज के दौर में हम जितना महत्व धर्मग्रंथों को देते हैं, कम से कम कहने के लिए, उतना ही महत्व देश के संविधान को देते हैं। नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद संसद की ड्योढ़ी पर माथा टेका था तो क्या वे यही संदेश नहीं दे रहे थे कि संसद ही जनतंत्र का सर्वमान्य मंदिर है! इसके बाद उन्होंने क्या किया, उसकी चर्चा करने पर हम विषय से भटक जाएंगे। दरअसल वर्तमान समय जनतांत्रिक आकांक्षाओं का समय है और उसकी सार्थकता इसी में निहित है कि बेड़ियों में जकड़ने वाले धार्मिक कर्मकांड के बजाय प्रगति की दिशा में ले जाने वाली वैज्ञानिक सोच को हम अंगीकार करें।

जनतंत्र बहुमत से चलता है, लेकिन बहुमतवाद से नहीं। किसी संगठित धर्म के प्रति निष्ठा निजी आचरण का विषय हो सकता है, तथापि जनतांत्रिक राजनीति में वह इस मायने में अनर्थ है कि तब अल्पमत की निष्ठा और विश्वास का तिरस्कार होने लगता है। इसीलिए अमेरिका जैसे अग्रणी देश में भी जहां शपथ ईश्वर के नाम पर ली जाती है किन्तु राजकारण में धर्मनिरपेक्षता का पालन किया जाता है। इसका उल्लंघन होता है तो ऐसा करने वाले को दंडित भी होना पड़ता है। यही वातावरण इंग्लैंड और यूरोप के अनेक देशों में है। फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, नार्वे, डेनमार्क, इटली ऐसे तमाम देशों में अल्पसंख्यक समुदाय को सिर्फ शरण ही नहीं, बल्कि नागरिकता और नागरिक अधिकार भी दिए गए हैं। वहां यदा- कदा संकीर्ण मतवाद को लेकर संघर्ष होते हैं, किन्तु उस कारण से राज्य की जनतांत्रिक नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं होता।

पंडित नेहरू और उनके लगभग सभी साथी- सहयोगी भी स्वतंत्र भारत में इन जनतांत्रिक विश्वासों को पुष्ट करना चाहते थे। पाठकों को शायद ध्यान हो कि हर साल 3 जनवरी को इंडियन साइंस कांग्रेस का प्रारंभ होता है जिसमें प्रधानमंत्री उद्घाटनकर्ता होते हैं। यह परंपरा पंडित नेहरू ने ही प्रारंभ की थी। 1954 में जब पहली बार भारत रत्न का सर्वोच्च सम्मान देना प्रारंभ हुआ तो प्रथम तीन व्यक्तियों- चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और डॉ. राधाकृष्णन के साथ महान वैज्ञानिक सी.वी. रमन को यह सम्मान मिला। इससे वैज्ञानिक सोच के प्रति तत्कालीन सरकार की प्रतिबद्धता जाहिर होती है। ध्यान देना चाहिए कि धार्मिक विश्वास को लेकर नेहरू जी से सरदार पटेल व राजेन्द्र बाबू के बीच मतभेद भले रहे हों, लेकिन शासन स्तर पर उन्होंने कोई ऐसा निर्णय नहीं लिया जिससे अन्य धर्मों के मतावलंबियों को कोई आघात पहुंचता हो।

उस युग की चर्चा चलने पर मुझे बांग्ला के प्रसिद्ध उपन्यासकार प्रबोध कुमार सान्याल का फिर स्मरण हो आता है। उन्होंने 'हुस्नबानो' उपन्यास लिखा था जिसमें पूर्व और पश्चिम, हिन्दू और मुस्लिम के द्वैत से हटकर बंगाल की सांस्कृतिक एकता पर बल दिया गया था। यह उपन्यास धर्मनिरपेक्षता की पुरजोर वकालत करता है। मजे की बात है कि इन्हीं प्रबोध कुमार सान्याल ने दो बार हिमालय की सुदीर्घ यात्राएं कीं। उनके यात्रा विवरण 'देवतात्मा हिमालय' और 'महाप्रस्थान के पथ पर' इन दो ग्रंथों में संकलित हैं। एक व्यक्ति अपने निजी धार्मिक विश्वासों के बावजूद कैसे धर्म की संकीर्णता से उबर सकता है श्री सान्याल उसका प्रबल प्रमाण हैं। उस दौर में वे ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं थे। सच कहें तो सारे देश का माहौल कुछ इसी तरह का था कि धरम-करम घर तक सीमित रखो, और सार्वजनिक जीवन में संकीर्ण मतवाद से दूर रहो। हमने तो रायपुर में देखा है कि गणेश उत्सव और नवरात्रि के समय पंडालों में सार्वजनिक महत्व के विषयों पर भाषण व वाद विवाद आदि कार्यक्रम होते थे और उनमें विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, कॉलेज के प्राचार्य, पत्रकार, कलाकार इत्यादि बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। उनमें तब आज जैसा धार्मिक आस्था का भौंडा प्रदर्शन नहीं होता था।

आज है कि समूचा बाजार, जिसमें मीडिया भी शामिल है, सारे माहौल को बहुसंख्यक धार्मिकता के मद में डूबा देने के लिए हरसंभव युक्तियां कर रहा है। इसी के बीच से  राहुल गांधी को अपना रास्ता निकालना है। उन्हें शायद लगता है कि अपनी साख कायम करने और अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए उन्हें अपनी आस्था का खुलकर प्रदर्शन करना चाहिए। यह एक फौरी रणनीति हो सकती है, लेकिन राहुल गांधी की असली परीक्षा तो इसी में है कि वे भारतीय जनमानस को संकीर्णता और जड़वाद से मुक्त कर कैसे वैज्ञानिक चेतना से लैस होने के लिए प्रेरित कर पाते हैं।

#देशबंधु में 06 सितंबर 2018 को प्रकाशित

Thursday, 30 August 2018

राजनीति में नौकरशाह

                                             
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस संभवत: पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा (उसे तब आईसीएस कहा जाता था) से इस्तीफा देकर राजनीति की राह पकड़ ली थी। यह 1920-21 की बात है। नेताजी की आयु उस समय मात्र चौबीस वर्ष थी। मुझे जितना याद है नेताजी का अनुकरण करने वाले दूसरे व्यक्ति हरि विष्णु कामथ थे। 1938-39 में वे जबलपुर में पदस्थ थे। जबलपुर के पास त्रिपुरी में कांग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन उन्हीं दिनों हुआ था। वे तभी नेताजी से प्रभावित हुए और आनन-फानन में आईसीएस से त्यागपत्र दे दिया। कामथ साहब सुभाष बाबू द्वारा स्थापित फारवर्ड ब्लाक के पहले महामंत्री थे। वे संविधान सभा के सदस्य भी रहे और जबलपुर से लगी होशंगाबाद सीट से लोकसभा के लिए  चार बार चुने गए। उनके अलावा मुझे आर.के. पाटिल का भी ध्यान आता है, वे भी गांधी जी से प्रभावित होकर आईसीएस छोड़कर राजनीति में आए। श्री पाटिल एक समय रायपुर के कलेक्टर थे और आगे चलकर पं. रविशंकर शुक्ल ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया था। रायपुर में स्टेशन चौक पर नेताजी की जो प्रतिमा स्थापित है उसका अनावरण उन्होंने मंत्री के रूप में किया था।
छत्तीसगढ़ की राजधानी याने रायपुर के कलेक्टर ओ.पी. चौधरी के भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर राजनीति में प्रवेश करने की खबर हाल में पढ़ी तो ये सारे प्रसंग अनायास स्मृतिपटल पर उभर आए। श्री चौधरी स्वयं भी संभवत: इनसे वाकिफ होंगे! जाने-अनजाने वे उस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं जिसकी बुनियाद लगभग सौ साल पहले रखी गई थी। तब और अब के समय में बहुत बड़ा फर्क है। वह स्वाधीनता की लड़ाई का दौर था। सुभाष बाबू, कामथ साहब, पाटिल जी, ये सब गांधी मार्ग के अनुयायी थे। इन्हें गांधीजी ने नौकरी छोड़ने के लिए नहीं कहा था, लेकिन उनके मन में देश की आजादी का सपना पल रहा था; और ये सुख-सुविधा छोड़कर कांटों भरी राह पर चलने के लिए कृतसंकल्प सेनानी थे। इस परंपरा को जिन लोगों ने आगे बढ़ाया उन्हें मुझे सबसे पहले सी.डी. देशमुख का नाम ध्यान आता है। यह संयोग है कि श्री देशमुख ने भी आईसीएस में अपनी सेवा रायपुर से ही प्रारंभ की थी। यहां वे  शायद प्रशिक्षु अधिकारी के रूप में पदस्थ थे। श्री देशमुख तीस साल की सेवा के पश्चात 1948 में सेवानिवृत्त हुए।  
आर्थिक मामलों में उनकी प्रतिभा का लोहा अंग्रेज सरकार ने भी माना। वे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर बनने वाले पहले भारतीय थे। आजाद देश ने भी उनकी सेवाओं का लाभ लेने में संकोच नहीं किया। पंडित नेहरू ने 1950 में उन्हें अपनी कैबिनेट में वित्त मंत्री के रूप में शामिल किया। यहां स्पष्ट कर देना उचित होगा कि उन्होंने नौकरी से इस्तीफा तो नहीं दिया था, लेकिन वे उन प्रारंभिक व्यक्तियों में से थे जिन्होंने सरकारी सेवा के बाद सक्रिय राजनीति में लंबे समय तक हिस्सेदारी की। उनकी श्रेणी में सुशीलचन्द्र वर्मा को रखा जा सकता है जो 1960 के आसपास रायपुर के कलेक्टर थे, आगे चलकर भारत सरकार के सचिव और मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव बने और फिर भोपाल से चार बार लोकसभा के लिए चुने गए। 
1947 के पहले आजादी की लड़ाई थी, तो 1947 के बाद देश के नवनिर्माण का स्वप्न था। सी.डी. देशमुख, सुशीलचन्द्र वर्मा, यशवंत सिन्हा, राजमोहन गांधी जैसे कितने ही अधिकारी हैं जिन्होंने नेहरू युग में और फिर इंदिरा युग में स्वावलंबी, सक्षम, शक्तिशाली देश बनाने के लिए अपनी सेवाएं पहले नौकरशाह के रूप में और फिर राजनेता के रूप में दीं। यहां भारतीय विदेश सेवा से राजनीति में आए कुछ नाम भी लिए जा सकते हैं- जैसे के.आर. नारायणन, मणिशंकर अय्यर, हामिद अंसारी, मीरा कुमार इत्यादि। इनके समानांतर और इनकी तुलना में संख्या में बहुत अधिक वे अधिकारी भी थे जिन्होंने सरकार में रहकर सत्यनिष्ठा से काम किया और सेवानिवृत्त होकर अन्य कोई इच्छा, आकांक्षा रखे बिना पार्श्व में चले गए।
ओ.पी. चौधरी के सामने इन दोनों तरह के दृष्टांतों के अलावा रायपुर जिलाधीश कार्यालय का इतिहास भी था। हमने दो नाम तो पहले ही लिए हैं। आर. के. पाटिल और सुशीलचन्द्र वर्मा के अलावा अजीत जोगी और नजाब जंग का ध्यान आ जाना स्वाभाविक है। अजीत जोगी का उदाहरण आज की चर्चा के संदर्भ में अधिक मौजूं है। श्री जोगी और श्री चौधरी दोनों ग्रामीण परिवेश से आते हैं। श्री जोगी ने मई 1986 में मात्र चालीस वर्ष की आयु में सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। वे प्रदेश के सबसे प्रमुख जिला इंदौर के कलेक्टर थे और कुछ ही दिनों में आयुक्त या सचिव बनने वाले थे; किन्तु उन्होंने त्यागपत्र तब दिया जब शायद उनके राज्यसभा में जाने की बात पक्की हो चुकी थी। ओ.पी. चौधरी ने सैंतीस वर्ष की आयु में सरकारी नौकरी छोड़ी है। उनका राजनीतिक भविष्य ऊपरी तौर पर अनिश्चित लगता है, लेकिन उन्होंने कुछ गुणा-भाग तो लगाया ही होगा! जिस तरह श्री जोगी उन दिनों अर्जुन सिंह  के विश्वस्त अधिकारी थे उसी तरह श्री चौधरी भी डॉ. रमन सिंह के विश्वासभाजन हैं।
ओ.पी. चौधरी ने अपना त्यागपत्र स्वीकृत हो जाने के बाद ट्विटर पर लिखा है कि वे अपनी माटी की सेवा करना चाहते हैं। उनके मनोगत का स्वागत है।  इन सारे रोचक किस्सों के बीच कुछेक बुनियादी पहलुओं पर ध्यान जाता है। मेरा मानना है कि आप जहां भी जिस भी स्थिति में हों, हर जगह देश और समाज की सेवा के अवसर होते हैं। राजनीति सेवा का न तो एकमात्र माध्यम है और न सर्वोपरि। सरकारी सेवा हो या जीवन का कोई अन्य क्षेत्र, सब में अपनी-अपनी तरह से समाज का ऋण चुकाने के मौके मिलते हैं। स्वाधीनता संग्राम के दिनों की बात कुछ और थी। उस समय के उदाहरण आज लागू नहीं हो सकते। नेहरू युग में देश की राजनीति का जो आदर्शवादी स्वरूप था वह धीरे-धीरे कर विकृत होते गया है, इसलिए आज के दिन राजनीति के माध्यम से सेवा करने का स्वप्न संजोना साहस का काम है। 
यहां समझ लेना उचित होगा कि सेवा से हमारा अभिप्राय मशीनी ढंग से काम करने से नहीं, बल्कि समाज में बेहतरी के लिए बदलाव लाने के प्रयत्नों से है। इस दृष्टि से विचार करें तो आईएएस अथवा अन्य किसी शासकीय सेवा छोड़कर राजनीति में आने मात्र से परिवर्तन की कोई निकट या दूर संभावना नजर नहीं आती। आज देश की राजनीति यथास्थिति की पोषक है, फिर सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो। बंकर राय, अरूणा राय, हर्षमंदर जैसे अधिकारियों ने आईएएस छोड़ी तो राजनीति में आने के बजाय उन्होंने गैरसरकारी क्षेत्र में काम करना पसंद किया। उन्हें जो कुछ भी सफलता मिली उसी में मिली। डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा, एन.सी. सक्सेना, एस.आर. शंकरन और शरतचन्द्र बेहार जैसे व्यक्ति जो आईएएस में लंबे समय तक रहे और ऊंचे पदों पर काम किया, वे भी गैरसरकारी और गैरराजनीतिक मंचों पर काम करके ही यथास्थिति में बदलाव के एजेंडा को सार्वजनिक विमर्श में ला पाए। इस पृष्ठभूमि में ओ.पी. चौधरी कितना कुछ सफल हो पाएंगे। यह देखने की उत्सुकता बनी रहेगी।
भारत में सरकारी नौकरी की बात चलने पर एक सच्चाई की ओर बरबस ध्यान जाता है। हमारे यहां सरकारी नौकरी के साथ जीवनयापन की सुरक्षा का मुद्दा जुड़ा हुआ है। एक बार सरकारी नौकरी मिल जाए तो जीवन भर की आश्वस्ति हो जाती है। यह स्थिति आज से नहीं, न जाने कब से बनी हुई है। प्रेमचंद की कहानी 'नमक का दरोगा' को याद कीजिए। सरकारी नौकरी मिल गई याने गंगा नहा लिए। इस लिहाज से सोचें तो ओ.पी. चौधरी ने नि:संदेह अपने भावी जीवन को दांव पर लगा दिया है। यदि वे कल को राजनीति में सफल न हो पाए तो उन जैसे प्रतिभाशाली युवक के लिए कार्पोरेट क्षेत्र में काम करने के अवसर होंगे। फिर भी आईएएस का जो रौब-रुआब है वह प्राइवेट सेक्टर में कहां? 
आखिरी बात। नौकरशाह सामान्य तौर पर परदे के पीछे रहकर काम करते हैं। उनका आम जनता के साथ संवाद तो होता है, लेकिन उनके और जनता के बीच एक संकोच, एक आड़ हमेशा बनी रहती है। चुनावी राजनीति में आने के बाद एक नौकरशाह को स्वयं अपने आपको पूरी तरह से बदलना होता है।  क्या ओ.पी. चौधरी मसूरी अकादमी से हासिल श्रेष्ठता का दंभ भूलकर आम जनता के साथ तादात्म्य बैठा पाएंगे? अगर वे ऐसा कर सके तो इस युवा नौकरशाह का भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल होगा।
 देशबंधु में 30 अगस्त 2018 को प्रकाशित 

Wednesday, 22 August 2018

अटल: संघ के होकर संघ से दूर 



अटल बिहारी वाजपेयी पिछले एक दशक से नेपथ्य में थे। वे स्मरणशक्ति भूल जाने सहित कुछ अन्य बीमारियों से ग्रस्त थे, इसी कारण बाहरी दुनिया से उनका संपर्क लगभग समाप्त हो चुका था। इसके बावजूद उनकी मृत्यु की खबर आने के बाद सारा देश जिस तरह से शोकाकुल हुआ उससे पता चलता है कि श्री वाजपेयी ने अपने साठ साल के राजनैतिक जीवन में उससे भी परे जाकर जनमानस के बीच एक अलग छवि बनाई थी। किसी व्यक्ति के निधन पर आम चलन में कहा जाता है कि उसके जाने से एक शून्य बन गया है जिसे भरना मुश्किल होगा या फिर हमें उनके बताए मार्ग पर चलना है। इन उद्गारों में अधिकतर समय औपचारिकता निभाने का भाव होता है। अटल बिहारी वाजपेयी के देहांत पर भी इस तरह की रस्म अदायगी की गई लेकिन वह काफी हद तक दिल से की गई बात थी।

श्री वाजपेयी के बारे में कहा गया कि वे पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे जिन्होंने पांच साल का निर्धारित कार्यकाल पूरा किया। मैं इसमें संशोधन करना चाहता हूं। श्री वाजपेयी के पूर्व जो अन्य गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री हुए याने मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर, एच.डी. देवेगौड़ा, आई. के. गुजराल-ये सब के सब कांग्रेस के विद्रोही थे जिनकी राजनीतिक शिक्षा-दीक्षा कांग्रेस के भीतर हुई थी। इसलिए यह श्रेय भी अटल बिहारी वाजपेयी को देना होगा कि वे देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे। इसमें यह जोड़ना आवश्यक है कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दीक्षा प्राप्त पहले प्रधानमंत्री थे, आगे चलकर जिनका उत्तराधिकारी बनने का अवसर नरेन्द्र मोदी को मिला। प्रसंगवश उल्लेख किया जा सकता है कि इन दोनों के बीच लालकृष्ण अडवानी के हाथों से सत्ता आते-आते फिसल गई। श्री वाजपेयी के राजनैतिक जीवन का अध्ययन करते समय उनकी संघ की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखे बिना बात पूरी नहीं हो सकती।

यह गंभीर शोध का विषय है कि श्री वाजपेयी ने संघ के होकर भी संघ से स्वतंत्र दिखने वाली छवि कैसे बनाई। फिलहाल मैं वाजपेयी जी के व्यक्तित्व के बारे में दो बातों का उल्लेख करना चाहूंगा। एक तो यह कि उन्हें हंसना खूब आता था। आप उन्हें सदन के भीतर और बाहर, औपचारिक और अनौपचारिक माहौल में ठहाका लगाते हुए सुन सकते थे। आमतौर पर संघ से जुड़े राजनेता मुस्कुराने से परहेज करते हैं। उन्हें शायद यह भारतीय संस्कृति के विपरीत जान पड़ता है! उन्हें आप अक्सर तनाव भरी मुद्रा में ही देखते हैं। वाजपेयी जी इसके अपवाद हैं। दूसरे, उनकी पढ़ने-लिखने में निश्चित रूप से रुचि थी। संघ की पृष्ठभूमि से आए अधिकतर नेता अंग्रेजी साहित्य तो बिल्कुल नहीं पढ़ते। हिन्दी में भी वे रामचरितमानस और हनुमान चालीसा या फिल्मी धुनों पर लिखे भजनों से आगे बढ़ने से परहेज करते हैं। वाजपेयी जी के व्यक्तित्व का अनूठापन यहां भी प्रदर्शित होता है।

दरअसल, हिन्दी क्षेत्र में दो ऐसे राजनेता हुए हैं जिनका लेखकों, पत्रकारों और अकादमिकों से जीवंत संवाद रहा है। डॉ. राम मनोहर लोहिया अपने इसी गुण के कारण हिन्दी जगत में लोकप्रिय और प्रतिष्ठित हुए। उनके संबंध अन्य भारतीय भाषाओं के संस्कृतिकर्मियों के साथ भी घनिष्ठ थे। अटल बिहारी वाजपेयी का रास्ता भी लगभग यही था। वे जब प्रधानमंत्री थे तब हिन्दी लेखकों के अलावा  अली सरदार जाफरी व जावेद अख़्तर जैसे लोकप्रिय साहित्यकारों के साथ उनकी संगत के समाचार पढ़ने में आते थे। वे जब ग्वालियर में विद्यार्थी थे तब शिवमंगल सिंह सुमन उनके अध्यापक थे और वाजपेयी जी ने भिन्न राजनीतिक विचार होने के बावजूद अपने इस गुरु का अंत तक सम्मान ही किया।

यह हम जानते हैं कि वाजपेयी जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पत्रिका राष्ट्रधर्म से अपने कॅरियर की शुरूआत की थी। संघ के मुखपत्र पांचजन्य से भी वे जुड़े रहे। उनके सहयोगी लालकृष्ण अडवानी ने भी संघ के अंग्रेजी मुखपत्र आर्गनाइजर में बरसों काम किया था। इसके अलावा वाजपेयी जी ने मंच पर पढ़ी जा सके, ऐसी तुकबंदी वाली कविताएं भी लिखीं। उन्होंने प्रारंभिक दौर में एक कविता लिखी थी वह शायद आज भी संघ की शाखाओं में सुनाई जाती है। इसमें वे अपने हिन्दू होने का गर्वपूर्ण बखान करते हैं। कह सकते हैं कि उनके विचारों की नींव इस कविता से उद्घाटित होती है। बहरहाल, प्रधानमंत्री बनने के बाद उनका कविता संकलन भी प्रकाशित हुआ, उनकी कविताओं के कैसेट आदि भी बने। मुझे लगता है कि वे अपने समय के मंचसिद्ध कवियों में अपना स्थान बना सकते थे! वे पूर्णकालीन कवि नहीं बने यह उनके लिए भी उचित ही हुआ क्योंकि तभी वे देश की राजनीति में परिवर्तनकारी भूमिका निभा सके।

संघ के प्रचारक और सिद्धांतकार गोविंदाचार्य ने एक बार वाजपेयी जी को संघ का मुखौटा कहा था। ऐसा उन्होंने किसी योजना के तहत कहा था या अनायास, कहना मुश्किल  है, लेकिन श्री वाजपेयी के राजनीति के शीर्ष तक पहुंचने के संदर्भ में यह कथन सच मालूम होता है। वे संघ के होकर भी संघ से एक दूरी दिखा सके इसी में उनकी सफलता का राज निहित है। वे शायद बहुत पहले जान गए थे कि भारत का लोकमानस मध्यमार्गी है। यहां अतिरेकवादी राजनीति करने से आगे नहीं बढ़ा जा सकता और इसीलिए उन्होंने जाहिरा तौर पर मध्यमार्गी रास्ता अपना कर जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता स्थापित की। यह नीति शायद संघ के भी मनमाफिक थी। उदारवादी वाजपेयी और कट्टरवादी अडवानी- जनता दोनों में से जिसे चाहे पसंद कर ले।

यह कहना आवश्यक होगा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने जवाहर लाल नेहरू के दौर में अपने राजनैतिक जीवन की शुरूआत की थी। वह समय बुद्धिजीवी राजनेताओं का और राजनीति में वैचारिक हस्तक्षेप का था। आज जिस तरह की व्यक्ति केन्द्रित राजनीति दिल्ली से लेकर ग्राम पंचायत तक दिखाई दे रही है वह उस दौर के लिए कल्पनातीत थी। इसीलिए जब 1957 में वाजपेयी जी ने लोकसभा के नवनिर्वाचित सदस्य के रूप में अपना पहली बार वक्तव्य दिया तो प्रधानमंत्री नेहरू ने उनकी बेंच तक जाकर उन्हें बधाई देते हुए उम्मीद जाहिर की कि यह नौजवान नेता आगे चलकर देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। आज वाजपेयी जी के जाने के बाद एक जो शून्य नजर आ रहा है उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि राजनीति में विचारशीलता, तर्कशीलता, शिष्टाचार और शालीनता जैसे गुण विलुप्त हो चुके हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी का मूल्यांकन करते हुए यह तथ्य भी सामने आएगा कि वे एक तरफ संघ के स्वप्न को साकार करने के लिए धैर्यपूर्वक काम कर रहे थे; दूसरी ओर वे तथाकथित उदारीकरण के दौर में वैश्विक पूंजीवाद के एजेण्डा से भी प्रभावित थे और अपने प्रधानमंत्री काल में उन्होंने इसके मुताबिक अनेक निर्णय लिए जिनकी सम्यक समीक्षा आगे चलकर होगी। फिर भी यह उनकी खूबी थी कि प्रधानमंत्री के रूप में उनके जो सर्वाधिक विश्वस्त और निकटतम साथी थे जैसे जार्ज फर्नांडीज, ब्रजेश मिश्रा, यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह, इनमें से कोई भी संघ की पृष्ठभूमि वाला नहीं था। तीसरी ओर वे प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी पुरानी नीति छोड़ पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की पहल कर इतिहास के लिए भी अपनी भूमिका निर्धारित करना चाहते थे। इस तरह वे एक नाजुक संतुलन साध रहे थे। उन्होंने जो जमीन तैयार की उसी के परिणामस्वरूप आज नरेन्द्र मोदी इस देश की सत्ता पर काबिज हो सके हैं। विनम्र श्रृद्धांजलि।

देशबंधु में 23 अगस्त 2018 को प्रकाशित

Monday, 20 August 2018

कुंदन सिंह परिहार की कहानियां : सादगी में प्रगल्भता

 
              

साहित्य की हर विधा की भाषा, शैली और विषय निरूपण की अपनी-अपनी विशिष्टताएं होती हैं, इसलिए प्रत्येक विधा पाठक अथवा सहृदय से एक विशिष्ट व्यवहार की प्रत्याशा रखती है। मसलन उपन्यास को ही लें। अगर उपन्यास आकार में छोटा है तब भी उसे पढऩे के लिए सामान्य तौर पर कम से कम एक दिन का वक्त चाहिए और वह भी ऐसा कि पढ़ते समय कोई खलल न पड़े। नाटक को पढ़ा तो जा सकता है, लेकिन उसका रसास्वाद रंगमंच पर प्रस्तुति से ही संभव है। कविता भी पाठक से धैर्य और तल्लीनता की मांग करती है। उसे समाचार पत्र में छपी खबर की तरह नहीं पढ़ा जा सकता। इन सबसे अलग स्थिति कहानी की है। कहानियां अमूमन बहुत लंबी नहीं होती। उन्हें पढऩे में अधिक वक्त नहीं लगता और पढऩे के लिए समय चुराना बहुत कठिन नहीं होता है। इतना सब जो कहा इसके अपवाद भी अवश्य होंगे। एक समय पत्रिकाओं में एकांकी नाटक छपते थे और उनका आनंद उठाना संभव था। कुछेक मूर्धन्य लेखकों के नाटक रंगमंच के लिए कठिन थे लेकिन वे पाठकों के बीच लोकप्रिय हुए थे।

इसी भांति ऐसे उपन्यास भी लिखे गए हैं जिन्हें पढऩे के लिए पाठक समय निकालने के लिए स्वयं मजबूर हो जाता है। उपन्यास की कथावस्तु और निर्वाह यदि रोचक है तो फिर सारे कामधाम छोड़कर पाठक उसमें डूब जाता है। किसी समय मैं खुद लंबी रेलयात्राओं में मोटे-मोटे उपन्यास साथ लेकर चलता था कि आते-जाते आराम से पढ़ सकूंगा। और यहां बात जासूसी उपन्यासों की नहीं बल्कि श्रेष्ठ साहित्यिक कृतियों की हो रही है, विष्णु प्रभाकर का अर्द्धनारीश्वर, गंगाधर गाडगिल का दुर्दम्य या आशापूर्णा देवी का प्रथम प्रतिश्रुति और सुवर्णलता। कविता की बात न्यारी है। एक मंच की कविता है जिसे कोई अगले दिन भी याद नहीं रखता; एक हिन्दी गज़ल है जिसके सिरमौर दुष्यंत की गज़़लें जगह-जगह उद्धृत की जाती हैं; और एक वह कविता है जो पाठक को बार-बार नए सिरे से समझने के लिए आमंत्रित करती है। ऐसी कविता सीधी-सपाट लगकर भी अर्थगंभीर हो सकती है। 
कविता और नाटक प्राचीनकाल से चली आ रही विधाएं हैं। उपन्यास अपेक्षाकृत बहुत नई विधा है, लेकिन कहानी का उद्भव कम पुराना नहीं है। कथासरित्सागर, जातक कथाएं, पंचतंत्र जैसे उदाहरण भारतीय साहित्य में मौजूद हैं। हिन्दी कहानी का मूलस्रोत शायद उनमें ढूंढा जा सकता है। ये तमाम बातें मैं एक साधारण पाठक होने के नाते कर रहा हूं। विद्वान, अध्यापक और आलोचक अगर इन कथनों से सहमत न हों तो मेरी निंदा कर सकते हैं। जहां तक आज की कहानी की बात है उसमें भी शायद कुछ वर्गीकरण संभव है। एक तो वे कहानियां हैं जो कहने को गद्य में है, लेकिन उनका पूरा या आंशिक विन्यास काव्यमय होता है। यह कथाकार की क्षमता पर निर्भर है कि वह अपनी रचना को पठनीय और सराहनीय कैसे बनाता है। फिर वे कहानियां हैं जिनमें कथाकार स्वयं हर समय अपनी उपस्थिति का अहसास करवाते चलता है और अपनी विद्वता से पाठकों को आक्रांत कर  देता है। कहानी का एक रूप वह भी है जिसमें कथाकार मानो किसी फार्मूले के अंतर्गत लिखता है। कथा का प्रारंभ कहीं से भी हो, अंत पूर्व निर्धारित होता है।
इन सबसे हटकर सीधी-सच्ची कहानियां भी लिखी जाती हैं। इनमें कथाकार की दृष्टि का पैनापन उजागर होता है। वह अपने चारों तरफ खुली आंखों से सब कुछ देखता रहता है। उसकी भाषा में पारदर्शिता होती है। इन कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि कथाकार के पास कहने के लिए कितना कुछ है। एक साधारण व्यक्ति अपने आसपास की जिन बातों से बेखबर होता है समर्थ कथाकार उन छोटी-छोटी बातों को उठाकर करीने से पाठक के सामने रख देता है कि लो इसमें अपनी छवि देख लो। ये कहानियां महज मनोविनोद के लिए नहीं लिखी जातीं; इनको लिखने वाला कोई समाज सुधारक, उपदेशक या प्रवचनकर्ता भी नहीं होता; वह तो अहंकार का लबादा ओढ़े बिना जीवन के सत्य को समाज के सामने प्रकट करने का काम करता है। मुझे ऐसी कहानियां पसंद आती है। कुंदन सिंह परिहार का नया संकलन ''कांटा और अन्य कहानियां’’ मेरे सामने आया तो मैं इन कहानियों में डूबते चला गया। सारे कामधाम छोड़कर एकबारगी इनको आद्योपांत पढ़ लिया। फिर अहसास हुआ कि इन्हें दुबारा पढऩा चाहिए। अपने कहन की तमाम सादगी के बावजूद इस संकलन की पच्चीस में से हर कहानी प्रगल्भ है। कुंदन सिंह परिहार एक लम्बे अरसे से लिख रहे हैं। उनकी रचनाएं बीच-बीच में पढऩे का अवसर मुझे मिला है। अक्षर पर्व में भी यदा-कदा उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। इस नए संकलन की रचनाओं से गुजरने के बाद एक अपराधबोध मन में जागा है कि एक समर्थ कथाकार का जैसा परिचय हिन्दी जगत में ऐसा होना चाहिए था वैसा नहीं हो पाया है। वह शायद इसलिए कि श्री परिहार आत्मश्लाघा से से दूर रहकर अपना काम करते चलते हैं। वे यश और प्रतिष्ठा के लोभी नहीं है, यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
यह इन कहानियों को पढ़ते हुए अनुभव कर सकते हैं कि कुंदन सिंह परिहार की कहानियों में व्यंग्य की एक अंतर्धारा प्रवाहित हो रही है। यह क्या इसलिए है कि लेखक जबलपुर का निवासी है? मैं जहां तक जानता हूं परसाई जी ने अपनी ओर से कोई गुरु परंपरा स्थापित नहीं की, लेकिन इसे क्या कहिए कि जबलपुर के सौ-डेढ़ सौ किलोमीटर की परिधि में बसने वाले हर लेखक की कलम में व्यंग्य का पुट आ ही जाता है। सतना, कटनी, दमोह, छिंदवाड़ा, इटारसी, पिपरिया, होशंगाबाद, गाडरवारा, नरसिंहपुर, मंडला, सिवनी, बालाघाट का पूरा क्षेत्र जो मोटे तौर पर महाकौशल में नर्मदा के दोनों किनारों पर फैला हुआ है, में व्यंग्य लेखकों की एक पूरी जमात दिखाई देती है और जो सीधे-सीधे व्यंग्य लेखक नहीं हैं, उनकी भी कोई रचना वक्रोक्ति का आश्रय लिए बिना पूरी नहीं होती।
इन कहानियों को पढ़ते हुए दूसरी प्रमुख बात समझ में आती है कि कथाकार मानव मन के अंर्तद्वंद्वों की सूक्ष्म पड़ताल करने में समर्थ है। वह जानता है कि समाज में किस तबके का व्यक्ति, किस परिस्थिति में, किस तरह का व्यवहार करेगा। मैं इसे परिहार जी की लेखनी की खूबी कहूंगा कि वे कहानी कहते-कहते बहुत सामान्य से लगने वाले प्रसंगों के माध्यम से चरित्र चित्रण कर देते हैं। अपनी तरफ से कोई टिप्पणी नहीं करते। मनुष्य मन के अनेकानेक भाव- मैत्री, स्वार्थ, परमार्थ, उदारता, कृपणता, परनिंदा, पड़ोसी धर्म, पारिवारिक संबंध, अहंकार, इत्यादि अंत आते-आते कुछ यूं व्यक्त होते हैं कि पाठक चमत्कृत हुए बिना नहीं रह सकता। मुझे इन कहानियों को पढ़ते हुए कई जगह ओ हेनरी और जैफरी आर्चर जैसे प्रसिद्ध कथाकारों की लेखक शैली का सहज स्मरण हो आया।
लेखक ने विभिन्न सामाजिक स्तरों और जीवन स्थितियों से विषय उठाए हैं। इनमें कहीं व्यंग्य का भाव है, तो कहीं कोई कहानी पाठक को गहरे विषाद से भर सकती है। इनमें निम्न मध्य वर्ग को लेकर कुछ कहानियां हैं जहां अंत में एक असहायता का बोध घेर लेता है; तो कहीं उस स्वार्थ बुद्धि के दर्शन होते हैं जिस पर मन में आक्रोश उमड़ता है। एक कहानी है जिसमें पड़ोसियों के बीच आत्मीय संबंध हैं, लेकिन अपनी-अपनी सीमाएं हैं जिनके कारण चाहकर भी एक पड़ोसी परिवार दूसरे की मदद करने से बच निकलता है। एक कहानी में मध्यवर्गीय पिता बेटे की फरमाइश के आगे लाचार है। इकलौते बेटे की इच्छा को पूरा करना ही पड़ेगा। खासकर जब पत्नी भी उसका साथ दे रही हो। फिर भले ही घर का बजट क्यों न गड़बड़ा जाए। एक अन्य कहानी में एक व्यक्ति इसलिए परेशान है कि हाल-हाल में रिटायर हुआ मित्र कहीं रुपए पैसे की मांग न कर बैठे। लेकिन वह तो सिर्फ समय बिताने के लिए मिलना चाहता था। जब यह भेद खुलता है तो पहला मित्र तनावमुक्त हो जाता है।
''भुक्खड़’’ और ''पिकनिक’’ ये दो ऐसी कहानियां हैं जहां मध्य वर्ग की अपने से निचले तबके के प्रति सहज हिकारत की भावना है, लेकिन कहानी के अंत पर पहुंचने तक वह आत्मग्लानि में बदल जाती है। एक अन्य कथा में घर की कामकाजी लड़की की सुरक्षा को लेकर चिंता है, लेकिन उसका कोई उपाय न खोज पाने की द्विविधा भी है। लड़की की कमाई की भी आवश्यकता है। ऐसे में जब वह कहती है कि आप चिंता मत कीजिए मैं स्वयं संभाल लूंगी, तो पिता के मन से एक भारी बोझ उठ जाता है। ''एक खुशगवार शाम’’ कहानी में एक ऐसे दोस्त का चरित्र चित्रण है जिसे दोस्तों की सोहबत में खाने-पीने के अलावा और कोई काम नहीं रहता। वह समझने के लिए तैयार नहीं है कि जिस दोस्त के घर आया है उसकी पत्नी बीमार है और उसे तीमारदारी की आवश्यकता है। जब दोस्त साथ देने के लिए तैयार नहीं होता तो उल्टे उसी पर इल्जाम लगाकर बाहर चला आता है कि बीवी की खिदमत में लगे रहो। तुम खुदगर्ज हो। कहने की आवश्यकता नहीं कि यहां खुदगर्ज कौन है।
कांटा जो कि संग्रह की शीर्षक कथा है तथा कुछ अन्य कहानियों में कथित बुद्धिजीवियों की खूब खबर ली गई है। इन कहानियों की शैली व्यंग्यात्मक है। कांटा में जबलपुर से कुछ लेखक एक कार्यक्रम के लिए दूसरे शहर जाते हैं। एक उभरता हुआ लेखक भक्तिभाव से उनके साथ जुड़ गया है। वह वरिष्ठ लेखकों की सेवा-खातिरी में पूरे समय लगा रहता है, लेकिन ये लेखक हैं कि उस युवक को कांटा समझते हैं। उन्हें मन मारकर नवोदित लेखक के सामने सज्जनता का लबादा ओढऩा पड़ता है जबकि उनके मन में इच्छा है कि किसी तरह यह टले तो वे खुलकर आपस में बातें कर सकें। ये पंक्तियां दृष्टव्य हैं-
आते समय उसके सारे सेवा-भाव के बावजूद उसकी उपस्थिति से हमें निरंतर असुविधा हुई थी। वजह यह थी कि हम सहज होना और खुलना चाहते थे, जो हम उसकी उपस्थिति में नहीं कर पा रहे थे। साहित्यकारों का सबसे प्रिय रस निंदारस होता है। कार्यक्रम में जो दिग्गज आ रहे थे उनमें से कुछ के घटियापन का विस्तार से चर्चा करके हम सुखी और श्रेष्ठ अनुभव करना चाहते थे, लेकिन उस लड़के की उपस्थिति के कारण हम इस सुख से वंचित हो रहे थे। प्रवीण जी साहित्य से आगे बढ़कर साहित्यकारों के निजी जीवन की कुछ अत्यंत अंतरंग बातों का जख़ीरा बहुत जतन से अपने पास रखते थे। वे भी इस यात्रा का लाभ उठाकर हमें कुछ दुर्लभ ज्ञान देकर सुखी होने के लिए कसमसा रहे थे, लेकिन यह लड़का उनके लिए भी कांटा बना हुआ था। हारकर हम सब भद्र ही बने रहे और रात को उसी लादी गई पवित्रता को लिए हुए अपनी-अपनी बर्थ पर सो गए।
इसका दूसरा पहलू हिसाब-किताब कहानी में देखने मिलता है। जहां एक वरिष्ठ प्रोफेसर के साथ उनकी अनिच्छा के बावजूद एक अध्यापक उनकी सेवा करने का ढोंग करता है। इस कहानी का अंत कुछ इस तरह होता है-
उधर से डॉक्टर पाठक का जवाब आया, ''डॉक्टर प्रकाश को पता चल गया है कि आप रिटायर हो गए हैं, इसीलिए अब आपके प्रति उनका प्रेम खत्म हो गया है। अब वे दूसरे पहुंच वाले लोगों की खोज-खबर में लगे रहते हैं, जिनका सत्कार किया जा सके। आप उनके काम के आदमी नहीं रहे, इसलिए आपको पत्र लिखकर वे पैसे बरबाद नहीं करेंगे।‘’
इसी तरह की एक और कहानी ''यवनिका पतन’’ है। कुल मिलाकर कुंदन सिंह परिहार आश्वस्त करते हैं कि कथा लेखन के पारंपरिक सांचे के भीतर भी बिना बड़बोलेपन, बिना विद्वता प्रदर्शन, सहज सरल भाषा में वर्तमान याने इक्कीसवीं सदी के जीवन व्यापार की कहानियां आज भी लिखी जा सकती हैं।

अक्षर पर्व अगस्त 2018 अंक की प्रस्तावना     

Tuesday, 14 August 2018

भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश


  

15 अगस्त 1947 को विश्व इतिहास की दो युगांतरकारी घटनाएं घटित हुईं। एक तो भारत या कहें कि भारतीय उपमहाद्वीप को दो सौ साल की गुलामी के बाद आजादी हासिल हुई और दूसरा यह कि इसी के साथ-साथ देश दो टुकड़ों में बंट कर  पाकिस्तान के नाम से एक नया देश अस्तित्व में आ गया। कालांतर में वह भी टूटा और बांग्लादेश के नाम से एक तीसरा देश बन गया। इतिहास में जो हुआ सो हुआ। उस पर इतिहास और राजनीति के विद्वान माथापच्ची कर सकते हैं। अवसर देखकर दलाईलामा जैसे परम तत्वज्ञानी भी उस पर प्रवचन दे सकते हैं। आम जनता तो अपनी-अपनी बुद्धि से व्याख्या करती ही रहती है। लेकिन मेरे मन में सवाल गूंजता है कि 1947 और 2018 के बीच इकहत्तर साल का अरसा गुजर चुका हैइस लंबे दौर में तीन पीढ़ियां भी बीत गई हैंलेकिन हमने याने भारतीय उपमहाद्वीप की आम जनता ने अपने इतिहास से क्या सबक लिया है और आगे बढ़ने के लिए कौन सा रास्ता चुना है।

 मेरा सीधा सवाल इस बात को लेकर है कि क्या इन तीनों मुल्कों के लोग एक साथ मिलजुल कर प्यार से भाईचारे के साथ नहीं रह सकते। देश तो जो बनना थे बन गए। राजनीति के नक्शे पर खिंची सरहदों को मिटाने की कोई कल्पना नहीं करतालेकिन दुनिया में और भी तो देश हैं जो कभी एक-दूसरे के खून के प्यासे थे और आज दोस्त हैं। यूरोप में पिछले एक हजार साल में न जाने कितनी लड़ाइयां हुई हैं। साम्राज्य बने और बिगड़ेलेकिन मोटे तौर पर इन देशों के बीच अमन चैन और भाईचारा आज की तारीख में कायम है।  इंग्लैंड और आयरलैंड के बीच दो सौ साल से ज्यादा वक्त तक संघर्ष चलालेकिन आज दोनों के बीच दोस्ती है। उत्तरी आयरलैंड में इस लंबे दौर में व्याप्त रही अशांति खत्म हो चुकी है और अब वहां जनजीवन सामान्य है। जर्मनी और आस्ट्रियाफ्रांस और जर्मनीस्वीडन और फिनलैंड- ऐसे दर्जनों उदाहरण मौजूद हैं जहां शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का माहौल कायम है।

बे्रक्जाट के चलते इंग्लैंड यूरोपीय यूनियन से अलग हो गया हैजिसके परिणामस्वरूप स्कॉटलैंड में दूसरा जनमत संग्रह हो सकता है। याद रहे कि कुछ वर्ष पूर्व हुए जनमत संग्रह में स्कॉटलैंड के स्वतंत्र होने का प्रस्ताव बहुत थोड़े अंतर से पराजित हो गया था। इसे राजनैतिक परिपक्वता ही मानेंगे कि यदि स्कॉटलैंड इंग्लैंड से अलग होना चाहता है तो हो जाए। कुछ ऐसा ही परिदृश्य कनाडा में है जहां क्यूबेक में एक बार जनमत संग्रह विफल हो चुका है। ये उदाहरण सिद्ध करते हैं कि देशों और समाजों के बीच खींची गई लकीरें अंतिम और अटल सत्य नहीं है। उनमें नागरिकों की इच्छानुसार परिवर्तन संभव हैं। यदि हमें स्थायी शांति की तलाश है तो देश की सीमाओं को लचीला करते हुए सरहद के आर-पार हाथ बढ़ाने का सिलसिला शुरू करना एक बेहतर उपाय हो सकता है।
आज भारतपाकिस्तान और बांग्लादेश इन तीनों मुल्कों में ऐसी दो पीढ़ियां तो अवश्य हैं जिनके पास पार्टीशन की कोई स्मृति नहीं है। उनके लिए यह बहुत आसान होना चाहिए था कि वे नई स्लेट पर दोस्ती की इबारत लिख सकते। अगर अतीत की बेड़ियों से ही जकड़े रहेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे। मैं ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि पिछले सात दशक के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप से लाखों लोग इंग्लैंडअमेरिका जाकर बसे। भारत से विदेश जाने वाले पर्यटकों की संख्या में भी इस बीच काफी बढ़ोतरी हुई है। विदेश की धरती पर इन सब लोगों को एक समान अनुभव अवश्य होता होगा। लंदन हो या न्यूयार्ककाहिरा हो या टोक्योबीजिंग हो या मैक्सिको सिटीवहां हमें भारतीय कहकर ही जाना जाता है। अल हिन्दीइंडस्कीइंडियन यह पहचान न सिर्फ भारतीय बल्कि पाकिस्तानी और बांग्लादेशी पर्यटक की भी होती है। आखिरकार विदेशियों को हमारे पहनावेबोलचालतौर-तरीके में  बहुत ज्यादा फर्क मालूम नहीं होता। 
विदेश में अब तो अनगिनत इंडियन रेस्तोरां खुल गए हैं। इनके नाम हिन्दी या उर्दू में होते हैं। लेकिन अधिकतर आप पाएंगे कि इनके मालिक बांग्लादेश के हैं। न्यूयार्क में किसी टैक्सी ड्रायवर को आप शायद पाकिस्तानी समझें तो वह संभवत: भारत के किसी शहर से गया हो। विदेशों में बसे इन लोगों के बीच काफी हद तक दोस्ती देखने मिलती है और सामान्यत: एक अपरिचित देश की अनजानी सड़क पर जब आपको अपने जैसा दिखने वाला कोई मिल जाता है तो सहज आश्वस्ति का भाव जागता है। मैं यह दावा अपने निजी अनुभवों के आधार पर  कर रहा हूं। मेरे अनेक यात्रा वृत्तांतों में इन घटनाओं का उल्लेख है। पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ श्रीलंका और नेपाल को भी जोड़ लीजिए। बात यही है कि जो भाईचारा विदेश की धरती पर दिखाई देता है वह घर में लागू क्यों नहीं हो सकता
हम लोग देश के हालात पर चर्चा करते हुए अक्सर कहते हैं कि राजनेताओं ने सब कुछ बर्बाद कर दिया है। लेकिन फिर ऐसा क्यों कि एक ऐसे अहम मुद्दे पर जो न सिर्फ हमारी बल्कि हमारी बाद की पीढ़ियों की सुखशांति और सुरक्षा से ताल्लुक रखती है हम राजनेताओं के झांसे में आ जाते हैं। क्या हमें इस बात का कोई इल्म है कि हमारे मुल्क अपने बजट का कितना प्रतिशत प्रतिरक्षा पर खर्च करते हैं। मेरा यह सवाल सिर्फ भारत के लिए नहींपाकिस्तान और बांग्लादेश के लिए भी है। लेकिन मुझे यह देखकर तकलीफ होती है कि पाकिस्तान में जहां अमनपसंद नागरिक सैन्यतंत्र के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत दिखाते हैं वहीं दूसरी ओर हम भारत में सेना पर दिनोंदिन अपनी निर्भरता बढ़ाते जा रहे हैं।
अभी मेरा मानना है कि भारत की जनता को अपने पूर्वाग्रह छोड़करनेताओं की बयानबाजी से प्रभावित हुए बिनाखुद अपने विवेक का इस्तेमाल करखुले मन से विचार करना चाहिए कि हमारे दीर्घकालीन हित में क्या है और वह कैसे संभव होगायदि हम नफरत और अविश्वास की भावना को अपने ऊपर हावी होने देंगे तो उस आंच में झुलसे बिना नहीं रह सकते। हमें यह सच्चाई स्वीकार करना चाहिए कि बांग्लादेशपाकिस्ताननेपालभूटानश्रीलंकाम्यांमार- ये सब हमारे पड़ोसी देश हैं। जिस तरह से यहां अच्छे या बुरेजिम्मेदार या गैरजिम्मेदारसमझदार या सनकी लोग बसते हैं वैसे ही इन देशों में भी बसते हैं। हम अपने पड़ोसियों को नहीं बदल सकतेराजनैतिक सीमाओं को भी मिटा नहीं सकतेलेकिन रहना तो साथ-साथ है। लड़ें-झगड़ेंमारकाट करेंउससे अंतत: क्या मिलना है। दंगों में आम लोग मारे जाते हैंलड़ाइयों में सैनिक मरते हैंलेकिन एक मौत भी अपने आप में एक त्रासदी होती है। एक व्यक्ति के साथ उसका घर-परिवारनाते-रिश्तेदारदोस्तपड़ोसी सब होते हैं। जब अकाल मृत्यु होती है तो वह इन सबको जो न भरने वाले जख्म दे जाती है। जो पीड़ा औरतों और बच्चों को झेलना पड़ती है उसकी कल्पना ही की जा सकती है। क्या हम इस सबसे बच नहीं सकते
मेरा कहना है कि हमारे इन सभी मुल्कों के समझदार लोगों को सामने आने की आवश्यकता है। हमें मैत्री और भाई-चारे के लिए साझा मंच और मोर्चे बनाना चाहिए। हमें अपने-अपने मुल्क में सत्ताधीशों और पाकिस्तान के संदर्भ में खासकरसैन्यतंत्र पर यह दबाव कायम करना चाहिए कि वे विघटनकारी षड़यंत्रों से बाज आएं। हमें शांति से रहने का अधिकार है। उसे छीनने का अधिकार हम इन्हें नहीं दे सकते।
देशबंधु में 15 अगस्त 2018 को प्रकाशित विशेष सम्पादकीय