Thursday, 21 February 2019

भारत की शिक्षा नीति : अतीत, वर्तमान एवं भविष्य-1


यह मेरे लिए सम्मान की बात है कि कीर्तिशेष अर्जुन सिंह जी की स्मृति में आयोजित इस कार्यक्रम में आपने मुझे आमंत्रित किया और इस योग्य समझा कि मैं ऐसे विषय पर आपसे बातचीत करूं जो एक विरल बौद्धिक क्षमतावान, समाज सजग राजनेता के रूप में संभवत: उनका सबसे प्रिय विषय था और जिसे लेकर उनके मन में अनेकानेक कल्पनाएं थीं। मेरा यह सौभाग्य है कि अर्जुन सिंह जी को कुछ निकट से देखने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को जानने-समझने का कुछ अवसर मुझे मिला। वैसे तो मैं उनको 1963 से जानता था जब वे पंडित द्वारिकाप्रसाद मिश्र मंत्रिमंडल में शामिल किए गए थे, लेकिन उन्हें बेहतर रूप में तब जाना जब मध्यप्रदेश के शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने प्रदेश के शैक्षणिक वातावरण को बेहतर बनाने के लिए गहरी सूझबूझ के साथ बहुत सारे कदम उठाए। यहां उस समय के दो प्रसंगों का उल्लेख उचित होगा। उन्होंने मध्यप्रदेश के निजी स्कूलों के शिक्षकों की समस्याओं को गहरी मानवीय संवेदना के साथ सुलझाया, दूसरी ओर 1973 में एकीकृत विश्वविद्यालय अधिनियम के द्वारा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी ढांचाकृत परिवर्तन की पहल की।
भारत के मानव संसाधन मंत्री के रूप में काम करते हुए उनका अविस्मरणीय योगदान शिक्षा का अधिकार कानून के रूप में हमारे सामने है। उनके समय में शिक्षाजगत की बेहतरी के लिए और भी बहुत से निर्णय लिए गए। उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मैं आज के विषय पर अपने विचार आपके साथ साझा करने की अनुमति चाहता हूं। आपने मुझे विषय दिया है- भारत की शिक्षा नीति : अतीत, वर्तमान एवं भविष्य। विषय बहुत व्यापक है और इस पर अधिकारपूर्वक विचार रखना मेरी सामर्थ्य से परे है, फिर भी किन्तु पांच दशकों से मेरा शिक्षा जगत से जो कुछ लगाव रहा है उसके आधार पर कुछ बिन्दु आपके सामने रखना चाहूंगा।
भारत की शिक्षा नीति पर अतीत के संदर्भ में चिंतन करते हुए मन में पहला प्रश्न उठता है कि अतीत में हम कितने पीछे तक जाएं। यदि हम प्राचीन इतिहास में जाते हैं तो किसी सुविचारित शिक्षा नीति के कोई अकाट्य प्रमाण हमें नहीं मिलते। आज भी जब प्राचीन का गौरवगान करते हैं तो तक्षशिला और नालंदा, ये दो नाम ही सामने आते हैं। इन शिक्षा केन्द्रों का अस्तित्व भी लंबे समय तक कायम नहीं रह पाया। इस बात के प्रमाण तो हैं कि प्राचीन समय में वास्तुशिल्प, मूर्ति शिल्प, वस्त्रकला, खगोलविज्ञान, गणित जैसे विषयों में भारत ने महारत हासिल कर ली थी, किन्तु इन विषयों की व्यवस्थित शिक्षा देने के कोई प्रबंध यदि थे तो मैं उनसे परिचित नहीं हूं। मेरा अनुमान है कि पारिवारिक परंपरा अथवा गुरु-शिष्य परंपरा में ही ज्ञानदान की प्रथा लम्बे समय तक हमारे यहां प्रचलित रही होगी। इसका अर्थ है कि शिक्षा सर्वसुलभ नहीं है।
बहरहाल यह शायद उपयुक्त होगा कि हम बहुत पीछे जाने के बजाय आधुनिक समय की स्थितियों की चर्चा करें जिसके बारे में हमारे पास पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं। हम पाते हैं कि भारत में औपचारिक शिक्षा का प्रारंभ अंग्रेजी शासनकाल में प्रारंभ होता है। देश के प्रथम तीन विश्वविद्यालय क्रमश: कलकत्ता, बंबई और मद्रास में 1857 में स्थापित किए गए थे। इसके समानांतर स्कूली शिक्षा का भी औपचारिक तंत्र विकसित किया गया। इस शुरूआती दौर में एक ओर देशी रियासतों में स्कूल खोले गए वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश भारत में सरकारी स्कूलों की स्थापना होने लगी। आज जिसे हम पीपीपी अथवा प्रायवेट पब्लिक पार्टनरशिप कहते हैं उसका भी प्रारंभ तभी हो गया था। आज यह देखकर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता होती है कि 1870-80 के आसपास देश में कितने ही स्थानों पर यहां तक कि दूरदराज गांवों में भी प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय खोले गए। लड़कियों की विधिवत शिक्षा की शुरूआत भी इसी समय हुई। एक तरफ राजाओं और सामंतों ने इस दिशा में पहल की तो दूसरी तरफ उदारचेता नागरिकों ने भी महती योगदान किया। यह एक नए युग के आने की दस्तक थी।
औपनैवेशिक शासकों ने जिस शिक्षा प्रणाली की नींव रखी उसका तिरस्कार करना आज के समय में आम हो गया है। इस व्यवस्था के माध्यम से भारत को गुलाम बनाने का दोष लार्ड मैकाले पर डाल दिया जाता है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है। गुलाम तो हम 1757 में पलासी के मैदान में हार के साथ ही बन चुके थे। लेकिन यह अंग्रेजी राज में लागू शिक्षा पद्धति ही थी, जिसका देशहित में भरपूर इस्तेमाल हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने किया। इंग्लैंड ही नहीं, विश्व के अन्य देशों में भारत की आजादी के लिए जनमत तैयार करने में यह शिक्षा मददगार सिद्ध हुई। आचार्य जगदीशचंद्र बसु, सी.वी. रमन, एम. विश्वश्वरैया जैसी महान प्रतिभाएं भी इसी की देन है। मैं यहां बहुत अधिक विस्तार में नहीं जाना चाहता, लेकिन इतना अवश्य कहूंगा कि इस क्षण हम सब जो इस सभा में उपस्थित हैं कमोबेश उसी शिक्षा व्यवस्था के लाभार्थी रहे हैं।
यदि आप मेरी स्थापना से सहमत नहीं है तब भी अतीत के पृष्ठों पर रुके रहने के बजाय बेहतर होगा कि फिलहाल वर्तमान पर ध्यान केंद्रित किया जाए, क्योंकि भविष्य का रास्ता इसी से निकलेगा।
हम देख सकते हैं कि 1947 में आजादी हासिल करने के बाद से ही अन्य बहुत से क्षेत्रों के साथ शिक्षा जगत में भी एक नया वातावरण निर्मित करने की पहल हुई। अनेक नीतिगत निर्णय लिए गए और अनेक परियोजनाओं पर काम प्रारंभ हुआ। उद्देश्य था एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण जो देश की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के अनुकूल हो और जो वैश्विक पटल पर भी भारतीय मेधा की पहिचान कायम कर सके। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का गठन, आईआईएससी, आईआईटी, आईआईएम व अनेक नए विश्वविद्यालयों की स्थापना, कोठारी आयोग का गठन आदि इसी सोच की देन है। देश में बड़े पैमाने पर विद्यालय भी प्रारंभ किए गए जिसमें सरकारी व गैर-सरकारी दोनों क्षेत्रों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। यहां याद कर लेना प्रासंगिक होगा कि देश के प्रथम व द्वितीय उपराष्ट्रपति क्रमश: सर्वपल्ली राधाकृष्णन व डॉ. जाकिर हुसैन अपने समय के अत्यन्त प्रतिष्ठित शिक्षाविद थे। उन्होंने कालांतर में राष्ट्रपति पद को भी सुशोभित किया। इसमें जो राजनैतिक संदेश निहित था, वह स्पष्ट था।
ये सारे उपक्रम समयानुकूल थे। इनसे देश के भीतर एक उदार चेतना विकसित करने में सहायता मिली, लेकिन प्रारंभ में जो आशा व उत्साह का वातावरण था वह एक वक्त आने पर ठंडा पड़ने लगा। इसके दो-तीन कारण समझ में आते हैं। पहला- एक ओर जहां देश में जनतांत्रिक राजनीति का विस्तार हुआ, वहीं दूसरी ओर उसे चुनावी राजनीति का पर्याय बना दिया गया। यह दुखद स्थिति क्यों निर्मित हुई इसकी मीमांसा अलग से की जा सकती है। दूसरा- भारत अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आए परिवर्तनों से अछूता नहीं रहा। अस्सी के दशक से जिस तरह से विश्व के अनेक देशोंं में राजनीति पर पूंजीवादी ताकतें हावी होने लगीं, वैसा ही कुछ भारत में भी हुआ। यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि जनता द्वारा निर्वाचित सरकारों ने ही जनहित के दो बड़े क्षेत्रों याने शिक्षा और स्वास्थ्य से धीरे-धीरे अपने हाथ खींचना शुरू कर दिया। स्थिति यहां तक आ पहुंची कि स्कूल हो या कॉलेज, पूर्णकालिक शिक्षकों की भर्ती पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। नौकरशाही की भाषा में शिक्षक वर्ग को ''डाइंग कैडर'' घोषित कर दिया गया। वर्ल्ड बैंक के इशारे पर यह काम हुआ। यह लोकहितकारी नीति से पलायन की एक बड़ी साजिश थी।
देश की निरंतर बढ़ती हुई आबादी का इस संदर्भ में जो प्रभाव पड़ा है उसे मैं तीसरा कारण मानता हूं। यद्यपि वाम, दक्षिण, मध्यमार्गी- सभी इस सच्चाई को स्वीकार करने से कतराते हैं। किसी भी देश के पास कितने भी संसाधन क्यों न हो ,अंतत: वे सीमित होते हैं। फिर भारत तो चीन, अमेरिका, रूस, आस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राजील किसी से अपनी तुलना नहीं कर सकता। भारत का क्षेत्रफल इन सबकी तुलना में लगभग एक तिहाई हैं इसका अर्थ है कि उपलब्ध संसाधन भी एक तिहाई हैं जबकि चीन को छोड़कर भारत की आबादी सबसे कई-कई गुना अधिक है। ऐसे में सरकार किसी की भी हो उसके सम्मुख यह प्रश्न हमेशा मुंह बाए खड़े रहेगा कि प्राथमिकताओं का निर्धारण कैसे और संसाधनों का वितरण किस अनुपात में किया जाए?
हमने शुरूआती दौर में जो बेहतर स्थिति देखी थी उसके पीछे कहीं न कहीं गांधी- नेहरू के आदर्शों का प्रभाव था। बहुराष्ट्रीय निगमों और कारपोरेट पूंजी के दुष्चक्र के चलते एक नई मानसिकता विकसित हुई जिसमें प्राथमिकताएं बदलते गइंर्। शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर ढांचागत निवेश अर्थात भवनों का निर्माण तो हुआ किन्तु शिक्षक, डॉक्टर और इनके सहायक स्टाफ आदि की भर्ती पर रोक लगा दी गई। सम्पन्न और सुविधाभोगी वर्ग ने अपने ही वर्ग की सेवा करने के लिए महंगे-महंगे स्कूल, कॉलेज और अस्पताल खोल लिए। यहां तक कि वातानुकूलित प्राथमिक विद्यालयों का निर्माण होने लगा। छोटी-छोटी कक्षाओं में पढ़ने वाले बालक-बालिकाओं के लिए या तो सर्वसुविधा सम्पन्न आवासीय विद्यालय स्थापित हो गए या फिर उनके स्कूल जाने के लिए वातानुकूलित वाहनों का प्रबंध कर दिया गया।
यह सब जैसे एक सामान्य नियम बन गया जिसे अंग्रेजी में ''न्यू नार्मल" कहा जाता है। दूसरी ओर शासकीय शिक्षा संस्थानों की हालत बद से बदतर होती गई। शिक्षक ठेके पर रखे जाने लगे। इन अस्थायी शिक्षकों का महिमामंडन शिक्षा-मित्र इत्यादि संज्ञाओं से किया गया। यह विचार भी सामने आया कि गांव के बारहवीं पास नौजवानों को ही गांव के स्कूल में पदस्थ कर दिया जाए। कुल मिलाकर एक दयनीय स्थिति निर्मित कर दी गई। जिसका एक ही उद्देश्य था कि गरीब की संतान को पढ़ने और पढ़कर अपना जीवन संवारने के लिए बराबरी के अवसर से कैसे वंचित किया जाए।
इस बीच संवेदनशील नागरिक समूहों ने अपनी ओर से कुछ पहल की। मध्यप्रदेश में ही किशोर भारती, होशंगाबाद विज्ञान, एकलव्य के उदाहरण सामने हैं। अन्य राज्यों में भी ऐसे प्रयत्न अवश्य हुए होंगे। लेकिन ऐसे तमाम प्रयत्न सत्ता की निगाहों में हमेशा संदेहास्पद बने रहे और इन्हें असफल करने के लिए सरकार की ओर से बार-बार अड़ंगे लगाए जाते रहे। होशंगाबाद विज्ञान जो कि एक वैकल्पिक प्रयोग था उसे प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने ही बंद करवा दिया था। दूसरे शब्दों में निहित स्वार्थों को इन उपक्रमों से कष्ट पहुंच रहा था। जबकि शासन द्वारा संचालित शालाओं में न तो पर्याप्त शिक्षक नियुक्त किए गए और न उनकी अध्यापन क्षमता का आकलन किया गया और न उन्हें अध्यापन प्रवीण बनाने के लिए आवश्यक व्यवस्थाओं के बारे में ठीक से सोचा गया। उच्च शिक्षा में भी ऐसी ही स्थिति बनाई गई।(अगले सप्ताह जारी)
#देशबंधु में 22 फरवरी 2019 को प्रकाशित
अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवां द्वारा आयोजित अर्जुन सिंह व्याख्यानमाला में 15 फरवरी 2019 को मुख्य अतिथि का व्याख्यान
  
 

Tuesday, 19 February 2019

वह अफसर कहाँ है?


पैंतीस साल पहले देखी फिल्म 'सूखा' का अंतिम दृश्य याद आता है। फिल्म का युवा नायक जो किसी सूखाग्रस्त जिले का कलेक्टर है, अपने साथी से क्षोभ भरे स्वर में कहता है-''आई हेट पॉलिटिक्स''। जहां तक मुझे याद आता है, फिल्म यहां समाप्त हो जाती है। इन पैंतीस सालों के दौरान इस अंतिम संवाद में निहित भावना में यदि कोई परिवर्तन हुआ है तो यही कि राजनीति के प्रति जनता के मन में संदेह व अविश्वास की भावना कुछ और गहरी हो गई है। इसका स्वाभाविक परिणाम यह भी हुआ है कि राजनीति जिनका पेशा है याने राजनेता, उनके प्रति भी जनमानस में घृणा व अविश्वास पहले से अधिक प्रबल हुआ है। विगत बीस-पच्चीस सालों के दौरान बनी अनेक फिल्मों में इसके प्रमाण हमें मिलते हैं। मेरी राय में यह स्थिति दुखदायी व चिंताजनक है। मेरी चिंता के एकाधिक कारण हैं। पहली बात तो यही कि जनतांत्रिक समाज में राजनीति व राजनेताओं के प्रति ऐसा क्यों होना चाहिए? राजतंत्र, तानाशाही, सैन्य शासन में शासकों के प्रति जनता के मन में नफरत हो तो उसे समझना कठिन नहीं है, लेकिन जिन्हें जनता ने स्वयं चुना है, उनके प्रति असम्मान विकसित हो जाए तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
दूसरे, सत्तातंत्र में क्या सिर्फ राजनेताओं की प्रथम और अंतिम भूमिका होती है? ''मैं राजनीति से घृणा करता हूं'' कहने वाला अधिकारी स्वयं भी क्या उस तंत्र का अंग नहीं है? और अगर है तो क्या वह पूरी तरह से असहाय है या कठपुतली है? अपनी फिल्मों को देखने से तो ऐसा नहीं लगता। उनमें तो हम कई बार सरकारी अधिकारी का रोल निभा रहे नायकों, महानायकों, नायिकाओं को देखते हैं जो अकेले अपनी दम पर भ्रष्ट व्यवस्था से लड़कर बुराई का खात्मा करते हैं। फिल्म की कहानी में सत्य का अंश हो सकता है, लेकिन हम जानते हैं कि उनमें अधिकतर कल्पना की ऊंची उड़ान होती है, इसलिए फिल्म में जो कुछ वर्णित है, उसे अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा। फिल्मों की विवेचना हो तो यह स्मरण रखना उतना लाजिमी है कि न तो हर राजनेता खलनायक होता है और न हर अधिकारी नायक। बहरहाल, 'सूखा' फिल्म के एक संवाद से अपने लेख का प्रारंभ करने के पीछे मेरा मकसद कुछ और ही था कि आज से तीन-चार दशक पहले जो ईमानदार अफसर सत्तातंत्र की विसंगतियों का मुकाबला करते हुए थक रहा था, निराश हो रहा था, वह आज कहां है? मैं उसे आभासी दुनिया से बाहर व्यवहारिक जगत में देखने की कोशिश कर रहा हूं। इसमें जो दृश्य सामने आता है, वह मुझे भयानक प्रतीत होता है और नई चिंता से भर देता है।
पिछले सप्ताह पश्चिम बंगाल में जो घटित हुआ, उस पर एक नज़र डालिए। सीबीआई का दस्ता कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के आवास पर पहुंचता है। उद्देश्य है- शारदा चिटफंड घोटाले में उनसे पूछताछ। आशंका है कि उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा। सरकारी आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मी सीबीआई अधिकारियों को न सिर्फ रोकते हैं, बल्कि उल्टे उनको ही पुलिस थाने भेज देते हैं। घटना के विवरणों में मैं नहीं जाऊंगा। खबर सबको पता है। राज्य की मुख्यमंत्री, अनेक अधिकारी, अंतत: सर्वोच्च न्यायालय, दृश्य में एक के बाद एक प्रकट होते हैं। अदालत राजीव कुमार को गिरफ्तार न करने के आदेश देती है और राजीव कुमार को राज्य के बाहर तटस्थ स्थान याने शिलांग में सीबीआई की जांच में सहयोग करने निर्दिष्ट करती है। कुछ समय के लिए एक संवैधानिक संकट जैसी स्थिति उत्पन्न होने की आशंका बनने लगती है। कहा नहीं जा सकता कि उसमें आगे क्या होगा। यहां उल्लेखनीय है कि उस दिन सीबीआई में कोई पूर्णकालिक निदेशक न होकर एक कार्यवाहक या अस्थायी निदेशक है और वह स्वयं अनेक विवादों में घिरा हुआ है।
इस बीच छत्तीसगढ़ में पुलिस के एक आला अफसर को एक अन्य अधिकारी के साथ निलंबित कर दिया जाता है। सिर्फ दो माह पहले तक मुकेश गुप्ता को प्रदेश का सबसे ताकतवर पुलिस अफसर माना जाता था, जो सिवाय मुख्यमंत्री के अन्य किसी के प्रति जवाबदेह नहीं था। तत्कालीन मुख्यमंत्री के परम विश्वस्त अधिकारी अमन सिंह के खिलाफ भी आवाज़ें उठती हैं। उन पर तरह-तरह के आरोप लगते हैं। प्रदेश के एक होनहार व सक्षम माने-जाने वाले आईएएस अधिकारी डॉ. आलोक शुक्ला एक बड़े घोटाले में आरोपी होकर पहले से ही निलंबित हैं। लेकिन यह स्थिति पश्चिम बंगाल या छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। उत्तरप्रदेश में मुख्य सचिव रहे अखंड प्रताप सिंह और सुश्री नीरा यादव के नाम अनायास ध्यान आते हैं। याद करेंगे तो हरेक प्रांत से एक-दो प्रकरण अवश्य मिल जाएंगे। केंद्र सरकार में सचिव रहे एच.सी. गुप्ता व पी.सी. पारख का नामोल्लेख भी यहां किया जा सकता है। सवाल उठता है कि ऐसे प्रकरण घटित होने की नौबत ही क्यों आ रही है?
जिस भारतीय प्रशासनिक सेवों को सरदार पटेल ने शासन संचालन के लिए इस्पाती ढांचा निरूपित किया था, क्या उसमें समय के साथ जंग लग चुकी है? यदि उत्तर हां में है तो इस शोचनीय दशा में पहुंचने के कारणों की खोज करना और उनका निदान करने की तत्काल आवश्यकता है। हां, जब बात भारतीय प्रशासनिक सेवा की हो रही है तो विषय को समग्रता में जानने के लिए अन्य सेवाओं को उसमें शामिल मान लेना चाहिए। यह समयसिद्ध है कि किसी भी समाज या देश में प्रशासन तंत्र पूरी तरह से भ्रष्टाचार मुक्त नहीं रहा है; लेकिन आज भारत में जो स्थिति है वह कल्पनातीत है। भ्रष्टाचार से यहां हमारा आशय सिर्फ रिश्वत के लेन-देन से नहीं है, बल्कि बात उसके बहुत आगे जाती है। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि हमारे देश में प्रशासन तंत्र पूरी तरह चरमरा गया है। अधिकारी और कर्मचारी जिन्हें हम लोकसेवक की संज्ञा देते हैं, वे तो प्रथम दृष्टया दोषी है ही, लेकिन उनके पीछे जो अदृश्य शक्तियां काम करती हैं, उनकी ओर से निगाह फेर लेने से काम नहीं चलेगा।
मैंने ऐसे राजनेताओं को देखा है जिन्होंने अपने अधीनस्थों पर कभी भी अनुचित दबाव नहीं डाला, बल्कि उन्हें अभय दिया कि वे लोक महत्व के किसी भी मुद्दे पर खुलकर अपनी राय व्यक्त करें, सरकारी फाइल में उसकी नोटिंग करें। दूसरे शब्दों में इन नेताओं ने अधिकारियों-कर्मचारियों को कभी बलि का बकरा नहीं बनाया और अपने निर्णयों की जिम्मेदारी खुद स्वीकार करने में आनाकानी नहीं की। वर्तमान समय में यदि यह स्थिति बदल गई है तो इसमेें नेताओं की मानसिक दुर्बलता भी प्रकट होती है। जो सामने है वह सबको दिखता है, किंतु इस तस्वीर का एक तीसरा पहलू भी है। वही सबसे अधिक भयानक और सर्वाधिक चिंताजनक है। आज दुनिया एक ऐसे मुकाम पर आकर खड़ी है, जहां वैश्विक पूंजीवाद की ताकतें सर्वग्रासी, सर्वभक्षी होते जा रही हैं। भ्रष्टाचार को संगठित, सांस्थानिक स्वरूप देने का काम इन्होंने किया है। एक तरफ इन्होंने मनुष्य के मन में असीमित इच्छाएं जागृत कर दी हैं, दूसरी ओर उन्हें हासिल करने के नए-नए रास्ते खोल दिए हैं। ये ताकतें देशों की सार्वभौमिकता का तिरस्कार करती हैं और राष्ट्रीय सरकारों की निर्णयक्षमता व न्यायबुद्धि में पलीता लगाती हैं। इसके लिए ये तरह-तरह के प्रलोभनों में नेताओं व अधिकारियों को उलझाती हैं।
यदि विश्व के मानचित्र पर निगाह डालें तो इनकी कुटिल चालों का कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। वेनेजुएला में निकोलस मदूरो की निर्वाचित सरकार को अस्थिर करना ज्वलंत उदाहरण है। कभी विश्व में लोकप्रिय रहे ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति लुला आज जेल में हैं। ध्यान रहे कि वैश्विक पूंजी के एजेंट, समर्थक व अनुयायी हरेक देश में हैं। दुर्भाग्य यही है कि आज जो सत्तातंत्र के अंग हैं, वे इनके चक्रव्यूह में फंस जाते हैं। तीसरी दुनिया के देशों की क्या बात करें, इन्हीं ताकतों के चलते कभी विश्व की दूसरी महाशक्ति माने जाने वाले सोवियत संघ तक का विघटन हो गया। फिर येल्तसिन के शासनकाल में रूस की जो दुर्गति हुई, वह विश्व इतिहास का एक त्रासद अध्याय है।
इस दुर्दशा से बाहर निकलना असंभव नहीं है, लेकिन आसान भी नहीं है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध नारे लगाने और मोमबत्तियां जलाने से कुछ नहीं होगा। जनलोकपाल जैसी फर्जी बहसें भी कहीं नहीं ले जाएंगी। मिठलबरे साधु-सन्यासियों के प्रवचन भी किसी काम के नहीं हैं। भारत को गर्त से बाहर निकाल आगे ले जाने का काम सिर्फ वे युवजन कर सकते हैं, जो पद, धन, यश, पदवी के लोभ और हर तरह के प्रलोभनों से मुक्त हो देश के किसानों-मजदूरों याने आमजन के बीच जाकर काम कर सकें।
#देशबंधु में 14 फरवरी 2019 को प्रकाशित

Thursday, 7 February 2019

सत्ता कुसुम, रस-लोभी भ्रमर व अन्य बातें


छत्तीसगढ़ में इन दिनों कड़ाके की ठंड पड़ रही है। इसके बरक्स प्रदेश के राजनैतिक-सामाजिक वातावरण में एक आश्वस्तिकारी गर्माहट का अनुभव हो रहा है। आम जनता को लग रहा है कि सरकार सचमुच उसके पास आ गई है। मुख्यमंत्री और उनके सहयोगी इन दिनों सोलह-सोलह घंटे काम कर रहे हैं। सरकारी कामकाज भी चल रहा है और इसके बीच दूर-दराज के गांवों तक पहुंच मंत्रीगण सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सेदारी दर्ज कर रहे हैं। दिल्ली और अनेक स्थानों से फोन करके लोग मुझसे पूछते हैं कि सरकार कैसी चल रही है। मेरा एक ही उत्तर होता है कि कुल मिलाकर सरकार की दिशा और गति सही है। मैं रायपुर में बैठकर अनुमान लगाता हूं कि संभवत: मध्यप्रदेश में भी ऐसा ही खुला-खुला माहौल होगा। जिस दिन रायपुर के एक कार्यक्रम में भूपेश बघेल लट्टू घुमा रहे थे, उसी दिन ग्वालियर में ज्योतिरादित्य सिंधिया किसी मेले में समोसे में आलू भरने की दक्षता प्रदर्शित कर रहे थे। यह सब अच्छा लगता है, लेकिन मेरा मन एक चेतावनी दर्ज करना चाहता है।
सत्ता कुसुम पर रस-लोभी भौंरे मंडरा ही नहीं रहे हैं, आकर बैठ भी गए हैं। इनमें पत्रकार, मीडिया मालिक, लेखक, अध्यापक, अधिकारी, कर्मचारी, संन्यासी सभी वर्गों के लोग शामिल हैं। अधिकतर वे ही हैं जिन्होंने पिछले पंद्रह साल में रमन सरकार का रस चूसने में कोई कसर बाकी नहीं रखी और बिना समय गंवाए अपना उड़ान- पथ बदल लिया। खबरे है कि रायपुर शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष गिरीश दुबे ने ऐसे कुछ कर्मचारियों की सूची मुख्यमंत्री को सौंपी है। लेकिन जो ऊंचा दांव खेल रहे हैं, उनकी सूची कौन बनाएगा? यह तो हर मंत्री के निजी विवेक पर निर्भर करेगा कि वे स्वार्थ के एजेंटों से बचकर रहें।
अब सरकार के सामने यह चुनौती भी है कि जन आकांक्षाओं के अनुरूप नीतियों व कार्यक्रम कैसे बनाए जाएं व उनका निष्ठापूर्वक क्रियान्वयन कैसे हो। मैंने चुनावों के दौरान ''अपनी सरकार से अपेक्षाएं'' शीर्षक से तीन लेख लिखे थे। उसी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कुछेक बिंदु मुख्यमंत्री व संबंधित विभागीय मंत्रियों के ध्यान में लाना चाहता हूं।
टी.एस. सिंहदेव के समक्ष बड़ी चुनौती है कि प्रदेश में चिकित्सा सुविधाओं को कैसे जनसुलभ बनाया जाए। उन्होंने आयुष्मान योजना के स्थान पर राज्य की अपनी योजना प्रारंभ करने की बात कही है। इसका मैं स्वागत करता हूं। देशव्यापी जनस्वास्थ्य अभियान से भविष्य के बारे में परामर्श करना उचित होगा। यह अच्छी खबर है वे उनके संपर्क में है। क्यूबा की स्वास्थ्य सुविधाएं विश्व में सबसे उत्तम है। इंग्लैंड की नेशनल हैल्थ सर्विस का उदाहरण भी सामने है। क्या इनसे कुछ सीखा जा सकता है? प्रदेश में भी सेवाभावी डॉक्टरों की कमी नहीं है। उनके अनुभव काम में आ सकते है। आशय यह कि स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में नवाचार की आवश्यकता है।
सिंहदेवजी पर पंचायती राज की भी महती जिम्मेदारी है। शकुंतला साहू, द्वारिकाधीश यादव, ममता चंद्राकर, कुंवर सिंह निषाद आदि की विधानसभा में उपस्थिति प्रदेश में जनतंत्र की जड़ें मजबूत होने का संकेत देती हैं। लेकिन आवश्यक है कि पंचायती राज प्रतिनिधियों को सही ढंग से प्रशिक्षण दिया जाए। अभी तक इस दिशा में खानापूरी होते आई है। ग्राम सभाएं कागज पर हो जाती हैं। विभागीय अधिकारियों के सामने चुने हुए प्रतिनिधियों की कोई हैसियत नहीं रहती और जमीनी स्तर पर प्रणाली को पुष्ट करने में अब तक किसी की रुचि नहीं देखी गई है।
सांस्कृतिक मोर्चे पर इस सरकार ने एक पुण्य का काम किया कि राजिम पुन्नी मेला को उसकी पुरानी पहचान वापिस मिल गई और कुंभ के नाम पर हो रहा आडंबर खत्म हो गया। लेकिन ताम्रध्वज साहू से हमें अभी बहुत सी अन्य अपेक्षाएं हैं। मेरा पहला प्रस्ताव है कि प्रदेश में पृथक से पुरातत्व संचालनालय तुरंत स्थापित किया जाए। उसे संस्कृति संचालनालय से अलग करना आवश्यक है। हमारा राज्य पुरातत्व के मामले में बहुत संपन्न है, किंतु इस अनमोल खजाने का ठीक से संरक्षण नहीं हो रहा है। ए.एस.आई. के पुराविद् शिवाकांत बाजपेयी ने यहां प्रतिनियुक्ति पर रहते हुए डमरू (बलौदाबाजार) में जिस लगन से काम किया था, उसी तरह के परिश्रम और लगन से प्रदेश के अतीत-वैभव को संजोया जा सकता है।
श्री साहूू के पास पर्यटन का महकमा भी है। दुर्भाग्य है कि लंबे समय तक इस विभाग में सचिव पद पर दूसरे प्रदेशों से डेपुटेशन पर आए अफसर काम करते रहे, जिनकी कोई रुचि प्रदेश में पर्यटन के विकास में नहीं थी। चमक-दमक वाली महंगी पुस्तकें , ब्रोशर, बुकलेट, नक्शे छापे गए, जिनमें दी गई जानकारियां भी गलत थीं। लेकिन जिनके लिए बाहर की एजेंसियों को भारी भरकम भुगतान किया गया। पर्यटन मंडल ने करोड़ों की लागत से मोटल बनाए। वे अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं। आज आवश्यक है कि पर्यटन व संस्कृति पर नए सिरे से नीति व कार्यक्रमों का निर्धारण हो, ताकि प्रदेश में रोजगार व राजस्व वृद्धि का एक स्थायी स्रोत तैयार हो सके। अतीत में संस्कृति विभाग ने व्यवसायिक प्रतिष्ठानों तक को उनकी ब्रांड इक्विटी बढ़ाने के लिए अनुदान दिया। यह सब बंद होना चाहिए।
अनुभवी विधायक रवीन्द्र चौबे के पास कृषि और संबंधित विभाग हैं। इस सरकार को जनता की निगाहों में किसानों की सरकार माना गया है। यह संतोष का विषय है कि छत्तीसगढ़ की चार चिन्हारी को लेकर प्राथमिकता के आधार पर क्रियान्वयन प्रारंभ हो गया हैै। चौबेजी को इसके आगे भी देखना है। प्रदेश का कृषि विश्वविद्यालय है तो इंदिरा गांधी के नाम पर, किंतु हाल के वर्षों में यह प्रतिक्रियावादी सोच का क्रीड़ांगन बन गया है। सोचना होगा कि यहां कृषि शिक्षा का वातावरण पुन: कैसे स्थापित किया जाए। यह भी देखा जाए कि प्रदेश की औद्योगिक प्रशिक्षण शालाओं (आई.टी.आई.) में क्या कृषि तकनीकी की शिक्षा जोड़ी जा सकती है, ताकि नौजवानों को उस दिशा में रोजगार मिलने की संभावनाएं बन सकें। गोठान बनाने और पशुधन के संस्था को ध्यान में रखते हुए पशु चिकित्सा शिक्षा (वेटेरेनरी) के बारे में भी सम्यक विचार करना होगा।
डॉ. प्रेमसाय सिंह और उमेश पटेल क्रमश: स्कूली शिक्षा व उच्च शिक्षा संभाल रहे हैं। मेरी राय में तो शिक्षा का एकीकृत एक ही विभाग होना बेहतर होता; लेकिन फिलहाल जो है, उसमें क्या हो सकता है, यह गौरतलब है। शिक्षकों का प्रशिक्षण बुनियादी आवश्यकता है। फिर हमें स्कूलों में पूर्णकालिक शिक्षक चाहिए। शाला प्रबंधन समितियों को सुदृढ़ करने के उपायों पर विचार करना वांछित है। विचारणीय है कि क्या समाजसेवी संस्थाओं का सहयोग शालाओं की स्थिति सुदृढ़ करने में लेना उचित होगा। इसके लिए प्रदेश की प्रमुख सामाजिक संस्थाओं के साथ बातचीत का मंच तैयार करना उपयुक्त हो सकता है।
महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव फिर से शुरू करने का निर्णय स्वागत योग्य है। अठारह वर्ष से अधिक आयु के हर युवा को जब राजनीति में भाग लेने का अधिकार है तो उससे वंचित क्यों रखा जाए! लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि छात्रसंघ जनतांत्रिक राजनीति की सीढ़ी बने, न कि ठेकेदारी और कमीशनखोरी की। युवा उच्च शिक्षा मंत्री को तत्काल इस तरफ भी ध्यान देना चाहिए कि कॉलेज और वि.वि. में शिक्षकों के सैकड़ों पद रिक्त पड़े हैं। पहुंच वाले शिक्षकों ने अपने लिए आरामदेह प्रतिनियुक्तियां ढूंढ ली हैं। विवि में रजिस्ट्रार के पद भी खाली हैं, और हाईकोर्ट में न जाने कितने मुकदमे चल रहे हैं। याने यहां प्रशासनिक पारदर्शिता व स्वच्छता की महती आवश्यकता है। शिक्षातंत्र के बारे में मेरी राय यह भी है कि शिक्षण संस्थाओं को अधिकतम स्वायत्तता देना चाहिए। संस्था प्रमुख के पद पर कल्पनाशील, ऊर्जावान, ईमानदार व्यक्ति नियुक्त हों, यह देखना भी आवश्यक है।
आज मैंने कुछ विभागों के बारे में उपलब्ध जानकारी के आधार पर बात की है। अन्य विभागों के बारे में भी चर्चा की जा सकती है, लेकिन कॉलम का सीमित स्थान उसकी इजाजत नहीं देता। तथापि भूपेश बघेल और उनके सभी सहयोगियों से हमारी अपेक्षा है कि अधूरी पड़ी योजनाओं को जल्दी पूरा करें। जिन योजनाओं में जनधन का अपव्यय हो रहा है उन पर रोक लगाई जाए, मंत्रियों के आचरण में अभी जो सादगी दिख रही है वह बनी रहे, और प्रदेश की जनता और उनके बीच न सिक्यूरिटी के बैरियर हों और न अहंकार की दीवार ही खड़ी हो।
#देशबंधु में 07 फरवरी 2019 को प्रकाशित

Wednesday, 30 January 2019

प्रियंका गांधी : उदात्त राजनीति की संभावना

प्रियंका गांधी 19 मार्च 2008 को वैल्लोर, तमिलनाडु के केंद्रीय कारागार पहुंचीं थीं। मकसद था बंदिनी नलिनी से भेंट करना। हत्यारों के जिस गिरोह ने लिट्टे सुप्रीमो प्रभाकरन के आदेश पर राजीव गांधी की हत्या की थी, नलिनी उसकी एक सदस्य थी। प्रियंका ने उससे मुलाकात की और अपने व अपने परिवार की ओर से उसे क्षमा कर देनेेे का संदेश दिया। भारत के राजनैतिक इतिहास में यह एक अनूठी घटना थी। आज जब प्रियंका गांधी औपचारिक तौर पर राजनीति के मंच पर आ गई हैं और कांग्रेस पार्टी के एक महासचिव का पद संभाल लिया है, तब ग्यारह साल पुराने इस प्रसंग को याद रख लेना चाहिए। क्योंकि इसके निहितार्थ गहरे व दूरगामी हैं। आज भले ही प्रियंका के राजनीति में सक्रिय होने को आसन्न लोकसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा हो; मुझे लगता है कि इसमें कहीं राजनीति की क्षुद्रता से उठकर उसे उदारवादी स्वरूप देने की चाहत छुपी हुई है। पंडित नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक की राजनीतिक यात्रा का अध्ययन करने से बात कुछ साफ हो सकेगी।
विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जवाहरलाल नेहरू को ऋतुराज की उपाधि दी थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में ही वे विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता बन चुके थे। वे प्रधानमंत्री बने तब उन्हें अजातशत्रु कहा गया। महान इतिहासकार अर्नाल्ड टायनबी ने कहा कि जब राजनीति के परिष्कार की आवश्यकता होती है तब नेहरू जैसे राजनेता का उदय होता है। पं. नेहरू के निधन के बाद इंदिरा गांधी की राजनीति में आने की कोई इच्छा नहीं थी। वे तब अपनी इंग्लैंडवासी सहेली को पत्र लिखकर कहीं ठीक-ठाक रोजगार की तलाश कर रहीं थीं। यह एक विडम्बना भरा संयोग था कि शास्त्रीजी के आकस्मिक निधन के बाद उन्हें एक कमजोर राजनेता मानकर प्रधानमंत्री पद की पेशकश की गई, ताकि कांग्रेस के घुटे हुए नेताओं का सिंडीकैट अपनी मनमर्जी शासन कर सके। बेशक आगे चलकर इंदिराजी का एक कठोर स्वरूप सामने आया। उन्होंने पार्टी के भीतर व बाहर अपने विरोधियों को पस्त करने के लिए हर तरह के उपाय किए, फिर भी मैं कहूंगा कि अपने जटिल व्यक्तित्व के बावजूद देशहित उनके लिए सर्वोपरि था और देश की जनता से उन्हें सच्चा प्रेम था।
जैसा कि हम जानते हैं राजीव गांधी भी अनिच्छा से राजनीति में आए थे। उनकी अनुभवहीनता और निश्छल स्वभाव का अनुचित लाभ उनके करीब समझे जाने वाले दोस्तों व सहयोगियों ने उठाया, जिसकी परिणति 1989 के चुनावों में हार के साथ हुई। वे दो साल बाद जीतकर लौटने की राह पर थे, तभी लिट्टे को सामने कर उनकी हत्या कर दी गई। अगर वे दुबारा प्रधानमंत्री बनते तो हमें उनका एक नया रूप देखने मिलता। उनके निधन के बाद सोनिया गांधी ने लंबे समय तक राजनीति से दूरी बनाए रखी। सात साल बाद जब उन्हें लगा कि उनके आए बिना पार्टी बिखर जाएगी तब 1998 में बेमन से वे सक्रिय राजनीति में आईं। यहां एक कम चर्चित प्रसंग का उल्लेख करना वांछित होगा। लाभ का पद मामले में जब तमाम संबंधित राजनेता अपनी कुर्सी बचाने की जोड़तोड़ में लगे थे, तब सोनिया गांधी अकेली थीं, जिन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और उपचुनाव जीतकर दुबारा सदन में लौटीं। और यह तो सर्वविदित है कि इसके पूर्व 2004 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद ठुकरा दिया था।
राहुल गांधी की अब तक की यात्रा पर गौर करें तो भी यही अनुभव होता है कि वे राजनीति में आने के इच्छुक नहीं थे। पिछले पंद्रह साल में इसको लेकर राहुल का उपहास करने में विपक्षियों ने कोई कसर बाकी नहीं रखी, किंतु अन्यत्र निरपेक्ष भाव से यह विश्लेषण भी किया गया है कि अपनी दादी और फिर अपने पिता की नृशंस हत्या देख लेने के कारण वे राजनीति से दूर ही रहना चाहते थे। जयपुर में कार्यकारी अध्यक्ष मनोनीत होने के बाद उन्होंने सोनिया गांधी के हवाले से राजनीति को जहर भी निरुपित किया था। इस पृष्ठभूमि में यदि प्रियंका भी राजनीति से सायास दूरी बनाकर चल रही थीं तो यह समझ में आने वाली बात है। उनके आगमन को भी इस परंपरा के विस्तार में देखा जाना उपयुक्त होगा। विगत वर्षों में वे सोनिया गांधी व राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र में ही यथा आवश्यक भूमिका निभाती रहीं हैं। अब देखना खास दिलचस्प होगा कि उनके राजनीतिक व्यक्तित्व का निखार किस तरह होता है।
राहुल गांधी ने हाल-हाल में जाहिर किया है कि वे शिव के उपासक हैं। सामान्य तौर पर यह भी ज्ञात है कि वे बौद्ध धर्म से काफी प्रभावित हैं और विपश्यना आदि में उनकी रुचि है। प्रियंका गांधी के बारे में भी उपलब्ध जानकारी यही है कि वे बौद्ध धर्म को मानती हैं। क्या अपने पिता की हत्या के अपराध में शामिल नलिनी को माफ कर देने के पीछे गौतम बुद्ध द्वारा प्रदत्त करुणा का प्रभाव रहा होगा! भारतीय मनीषा के व्यापक संदर्भ में देखें तो उसका निर्माण और विकास करुणा, क्षमा, अहिंसा, समन्वय, सद्भाव और सहानुभूति से हुआ है। प्रश्न यह है कि प्रियंका गांधी देश की राजनीति में इन उदात्त मूल्यों की अभिवृद्धि करने में कितनी सफल भूमिका निभा पाती हैं।
जहां तक तात्कालिक राजनीति व लोकसभा चुनावों की बात है, यदि उसमें प्रियंका गांधी अपनी पार्टी की ओर से जिम्मेदारी संभाल रही हैं तो उसमें किसी को भी ऐतराज क्यों होना चाहिए? जो लोग इस संदर्भ में तरह-तरह के आरोप लगा रहे है, उनके बारे में यही कहा जा सकता है कि वे संकीर्ण मानसिकता का परिचय दे रहे हैं। खुले मन से विचार करें तो इस सच्चाई को जानना कठिन नहीं है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जो प्रचंड विजय मिली थी उसे दोहराना अब संभव नहीं है। श्री मोदी को तब मतदाताओं के एक बड़े वर्ग ने अवतारी पुरुष की तरह देखा था, जिसके दामन पर कोई दाग नहीं लग सकता, जो अपराजेय है और जो भारत में किसी मिथिकीय स्वर्णयुग को वापिस लाएगा। समय के साथ यह विराट छवि टूटती गई है। सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक-हर मोर्चे पर मोदी सरकार की नीतियां असफल होते जा रही हैं। सरकार की सोच का दायरा अत्यंत सीमित है। एक के बाद एक निर्णय गलत और हाहाकार मचाने वाले सिद्ध हुए हंै।
हाल में संपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों ने मोदी नीति का खोखलापन सिद्ध कर दिया है। भाजपा को पांच साल पहले दुर्लभ संयोग से उत्तर प्रदेश में तिहत्तर सीटें मिल गई थीं। सभी विपक्षी दल मिलकर इस मिट्टी के किले को ढहा देना चाहते हैं। स्वयं कांग्रेस के लिए आवश्यक है कि वह उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत करे तथा क्षेत्रीय दलों की कृपा पर जीवित न रहे। पार्टी अध्यक्ष होने के नाते राहुल गांधी को पूरे देश में धुआंधार दौरे करना पड़ेंगे। उ.प्र. में कांग्रेस के पास फिलहाल कोई ऐसा नेता नहीं है जिसका बाईस करोड़ की आबादी वाले विशाल प्रदेश में व्यापक प्रभाव हो। याद रखें कि चुनावी नजरिए से कांग्रेस ने प्रदेश को दो हिस्सों में बांट दिया है। और दो युवा नेताओं ज्योतिरादित्य सिंधिया व प्रियंका गांधी को एक-एक की जिम्मेदारी दे दी है। यह एक सुविचारित रणनीति प्रतीत होती है। कांग्रेस को यदि इसका लाभ मिलता है तो देश की राजनीति में एक नए युग की शुरूआत होगा। इस हेतु हमें धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी चाहिए।
#देशबंधु में 31 जनवरी 2019 को प्रकाशित

Friday, 25 January 2019

शाकिर अली की कविताएं


शाकिर अली के पहले ही लेख ने साहित्य जगत की प्याली में एक छोटा-मोटा तूफान उठा दिया था। यह वाकया आपातकाल लागू होने के कुछ समय बाद का है। जबलपुर से 'पहल' पत्रिका को निकले अधिक समय नहीं हुआ था। उसके शुरूआती किसी अंक में पचहत्तर-छिहत्तर के दरम्यान कभी यह लेख छपा था। पहले तो लोगों ने समझा कि मध्यप्रदेश के वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता शाकिर अली का यह लेख है। लेकिन उनसे इस स्तर के अकादमिक लेख की अपेक्षा कोई नहीं करता था। खोज-खबर करने पर मालूम हुआ कि बिलासपुर के बीस-बाईस बरस के एक नौजवान ने यह निबंध लिखा है। मुझे उसकी धुंधली सी याद है। मध्यप्रदेश के कुछ उत्पाती कांग्रेसियों ने कुछ चाटुकार लेखकों के उकसावे पर इस लेख के खिलाफ हंगामा खड़ा कर दिया था। वे पहल को बंद करने तथा संपादक व लेखक पर कार्रवाई करने की मांग कर रहे थे। प्रकाशचंद्र सेठी मुख्यमंत्री थे। उन्होंने जहां जैसा भी सलाह-मशविरा किया हो, उत्पातियों की मांग पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अनुमान कर सकते हैं कि लेख में तत्कालीन केन्द्र सरकार की रीति-नीति की आलोचना की गई थी।
जाहिर है कि इस पहले लेख के प्रकाशन के साथ ही बिलासपुर के युवा शाकिर अली की साहित्य जगत में पहचान बन गई। लेख में तार्किकता के बजाय भावुकता का पुट कुछ अधिक था, लेकिन समय के साथ शाकिर की रचनात्मक प्रतिभा का परिपक्व ढंग से विकास हुआ है और यह भी अच्छी बात है कि उनकी तरुणोचित भावुकता समय के साथ सूखी नहीं है। वे एक तरल, पारदर्शी और विचार-सम्पन्न व्यक्तित्व के धनी हैं। यह हाल में प्रकाशित उनके दो कविता संग्रहों को पढ़कर हम जान सकते हैं। शाकिर कविताएं बहुत लंबे समय से लिख रहे हैं, तकरीबन चालीस साल से, लेकिन उनका अब तक कोई संकलन प्रकाशित नहीं हुआ था। इसका एक कारण शायद यह रहा हो कि वे क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में कार्यरत थे जिसके चलते उन्हें छत्तीसगढ़ के बस्तर सहित अनेक दूरस्थ इलाकों के गांवों में एक लंबा समय बिताना पड़ा जहां बैठकर वे कविताएं तो लिख सकते थे, लेकिन संकलन तैयार कर उसे प्रकाशित कराने की सुविधा नहीं थी! अब जब वे सेवानिवृत्ति के बाद घर लौट आए हैं तब ही शायद उन्हें समय मिल पाया कि वे कविता संकलन प्रकाशित करने के बारे में संजीदगी से सोच सकें!
'बचा रह जाएगा बस्तर' में चौवन और 'नए जनतंत्र में' अट्ठाइस, इस तरह कुल जमा ब्यासी कविताएं उन्होंने प्रकाशित की हैं। इन दोनों संकलनों को पढऩे के बाद में मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि वे जिस खूबी से दस-बारह लाइन की छोटी कविताओं में अपनी बात कह जाते हैं उसे वे लंबी कविताओं में सामान्यत: नहीं साध पाते। शाकिर अली प्रगतिशील विचारधारा के लेखक हैं। उन्होंने अपने आसपास के जीवन को नजदीक से देखा है तो दूसरी ओर देश और दुनिया में जो कुछ घटित हो रहा है उसे भी वे सतर्क दृष्टि से देखते-समझते हैं। हर लेखक की सहानुभूति हाशिए पर खड़े समाज के साथ होती है; उनके साथ होती है जो सताए गए हैं, दबाए गए हैं, कुचले गए हैं और जिनकी आवाज सत्ता के गलियारे में, कुबेर की अट्टालिकाओं में अनसुनी कर दी जाती है। जिस लेखक की कलम पर जन-जन की पीड़ा न उभरे वह लेखक ही क्या? शाकिर अली की कविताएं अपने काल के सच्चे कवि की रचनाएं हैं। उनकी छोटी कविताओं की खूबी यह है कि वे किसी घटना के साक्षी बनते हैं, किसी दृश्य को देखते हैं और बिजली की कौंध सी तड़प और त्वरा के साथ गहराई तक चीरकर सच को सामने ले आते हैं।
'अहा सुंदर बस्तर' शीर्षक कविता बस्तर के प्राकृतिक सौंदर्य के वर्णन से प्रारंभ होती है, लेकिन आखिरी पंक्ति तक पहुंचने पर वह पाठक को स्तब्ध कर देती है। इस कविता को पढि़ए-
बस्तर में अभी भी फलते हैं
फल पेड़ों पर!
इमली आम, महुआ, तेन्दू, साल के
पेड़ों की भरमार है,
यहां के पहाड़ों के बदन पर
झरने फूटते हैं, अभी भी
बहकर जाता है, पानी
नदी नाले, इन्द्रावती से होकर
गोदावरी में,
बचे हुए पेड़, पहाड़ बारहों माह हरे रहते हैं,
गनीमत है, अभी भी
बारुद-असला पेड़ों पर नहीं
गोदामों में ही फलते-फूलते हैं!!
स्कूल बंद है, बारूदनाथ, एनकाउंटर और अन्य तमाम कविताएं विगत कुछ दशकों से बस्तर में विद्यमान खौफनाक परिस्थितियों से हमारा सामना करवाती हैं। वे खोखले दावों को ध्वस्त कर सच्चाई को उजागर करती हैं। बस्तर में एक अंतहीन सी लगने वाली लड़ाई चल रही है, जिसमें कौन किसके साथ हैं, यह समझना दुश्वार है, किन्तु इतना तय है कि आदिवासी के साथ कोई नहीं है। ''कोरेनार का स्कूल'' और ''बंकर'' दो छोटी कविताओं में यह त्रासदी उजागर होती है।
कोरेनार का स्कूल

सैकड़ों की भीड़ ने
कुदाल फावड़े से स्कूल भवन
तोड़ डाला,
बच्चे, पेड़ों के नीचे, कापी-किताब के साथ
बारिश में कांपते, गलते खड़े थे
गुरुजी भी भीगते खड़े थे, अपनी छड़ी के साथ!
बंकर
सर्व-शिक्षा अभियान के पैसे से
लोहे के खिड़की-दरवाजों वाला
कांक्रीट से बना,
स्कूल भवन, ध्वस्त था
जिसे दिल्ली से आई अंतरराष्ट्रीय बुद्धिजीवी ने भी
बंकर माना!
बस्तर पर सुदीप बनर्जी ने बहुत सी कविताएं लिखी हैं। आलोक वर्मा की कविताएं भी याद आती हैं। उन कविताओं में जो बेचैनी और तड़प है, शाकिर अली की कविताएं उसी उद्वेग को और गहरा करती हैं। शाकिर ने अपनी कविताओं में लाला जगदलपुरी और शानी को भी याद किया है जिन्होंने अपनी रचनाओं में बस्तर के दर्द को समेटा था। परन्तु ये आज अभी की कविताएं ऐसी निर्मम सच्चाई का बयान करती हैं जिसकी हमने आज से तीस-चालीस साल पहले कल्पना भी नहीं की थी।
बचा रह जाएगा बस्तर में एक सुंदर लंबी कविता है- नि:शब्द खटकते हैं महुआ फूल। इस कविता का दूसरा पैराग्राफ मैं उद्धृत करना चाहता हूं-
हर पेड़ का अपना टपकता समय है
गीदम में बैंक के सामने रोज सुबह साढ़े आठ बजे
टपकता है महुआ!
जिसके बाजू में है, चाय का ठेला
आ जाती है काम वाली डोकरी फूलो
बर्तन मांजना छोड़कर उसे बीनने
या फिर कुचल जाते हैं, महुआ फूल
आती-जाती ट्रक के भारी पहियों के बीच!!
कवि जब ट्रक के भारी पहियों के बीच महुआ फूलों के कुचल जाने की बात कहता है तो मुझे एकाएक लगता है जैसे वह आदिवासियों के कुचले जाने की बात कह रहा हो।
'नए जनतंत्र' में उनका दूसरा कविता संग्रह है। मुझे इस संग्रह के शीर्षक  पर आपत्ति है। क्योंकि उससे एक भ्रम उत्पन्न होता है। इस संकलन की एक कविता है ''कविता के नए जनतंत्र में"। इसका आधा हिस्सा लेकर पुस्तक को शीर्षक दे दिया गया। यह आधा शीर्षक एक व्यापक पृष्ठभूमि का बोध कराता है, जबकि कविता लेखक और पाठक के आपसी रिश्ते पर एक चुटीला व्यंग्य करती है याने वह एक सीमित विषय पर रची गई है। बहरहाल इस संकलन की अधिकतर कविताएं कुछ लंबी हैं और जिनमें सबसे अधिक उल्लेखनीय है-
''मां ने सोते हुए बच्चो के सपनों में पहली बार प्रवेश किया था।''
यह शीर्षक असामान्य रूप से लम्बा है और विनोद कुमार शुक्ल की याद दिलाता है। बहरहाल, इसका यह अंश पढि़ए-
छोटे के सिर को सहलाया था,
मंझले को डांटा था
बड़ी को समझाया था
देख तू ऐसा करके मेरा दिल मत दुखाया कर!
मां ने सोते हुए बच्चो के
सपनों में
पहली बार
प्रवेश किया था!!
यह अत्यंत मार्मिक कविता है। मां के गुजर जाने के बाद घर की क्या हालत होती है, बच्चों पर क्या बीतती है, मासूम देखते ही देखते कैसे बड़े हो जाते हैं, इन सारी स्थितियों का सूक्ष्म और चित्रात्मक वर्णन कवि ने किया है। इसमें घर की बड़ी बेटी ने कैसे मां के चले जाने के बाद जिम्मेदारियां संभाल ली थी, उसका विश्लेषण कवि ने बड़ी गहराई व आत्मीयता के साथ किया है। इस कविता का अंतिम अंश दृष्टव्य है-
रात को सबसे आखिर में
सोने से पहले
मां की तरह बहन ने ग्रिल के फाटक पर
ताला जड़ा था!
और बिस्तर पर आने से पहले
छूटा हुआ होम वर्क पूरा कर रही थी,
मां ने बच्चो के सपनों में आना
अब छोड़ दिया था!!
इस संकलन की कपड़े का आदमी, उसका इतिहास, दोषी और निर्दोष इत्यादि कविताएं भी उल्लेखनीय हैं। संकलन में "स्त्री पढ़ रही है" शीर्षक कविता मुझे बहुत कमजोर प्रतीत हुई। यह एक रूमानी सोच की कविता है जिसकी कल्पना तो अच्छी लगती है, लेकिन जो सच्चाई से बहुत दूर है।
दोनों संकलनों में कुछ कविताएं ऐसी हैं जो या तो साहित्यिक मित्रों को समर्पित हैं या जिसमें उनके नामों का उल्लेख हुआ है। मुझे लगता है कि यहां कवि पर व्यक्ति शाकिर हावी हो गया है। कविता में दोस्तों का उल्लेख हो सकता है, लेकिन वह किसी वृहत्तर संदर्भ में उद्देश्यपूर्ण ढंग से हो तो ठीक है। सिर्फ मित्रता के निर्वाह के लिए या कृतज्ञता ज्ञापन के लिए ऐसा उल्लेख कविता को कमजोर बना देता है। हो सकता है कि शाकिर अली मेरी राय से सहमत न हों। मेरा यह भी कहना है कि दोनों संकलनों का संपादन कुछ बेहतर तरीके से किया जा सकता था। कविताओं पर गिने-चुने लेखकों की राय या उनके पत्र, इन सबको शामिल करने की आवश्यकता नहीं थी।  इसके अलावा मेरी हर लेखक को राय है कि संकलन प्रकाशित करते समय हर कविता या कहानी का रचनाकाल अवश्य उल्लेख करना चाहिए। शाकिर अली को किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है। उन्हें अपनी रचना की ताकत पर भरोसा रखना चाहिए थे। जो भी हो, मुझे प्रसन्नता है कि शाकिर अली की कविताएं अब संकलन के रूप में एक साथ उपलब्ध हैं। मैं इनमें एक बार फिर बस्तर पर केन्द्रित कविताओं का उल्लेख करना चाहूंगा। वे अपने समय की एक भीषण सच्चाई का दस्तावेज हैं और इसलिए वे आने वाले समय के लिए बेहद मूल्यवान हैं। मैं उम्मीद करता हूं कि हमें शाकिर अली की ताजा कविताएं भी जल्दी पढऩे मिलेंगी।  

अक्षर पर्व दिसंबर 2018 अंक की प्रस्तावना 

बचा रह जायेगा बस्तर (कविता संग्रह)
कवि-   शाकिर अली
प्रकाशक- उद्भावना, एच-55, सेक्टर-23, राजनगर, गाजियाबाद, मो. 9811582902
पृष्ठ-   80
मूल्य- 125 रुपए

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नये जनतंत्र में (कविता संग्रह)
कवि-   शाकिर अली
प्रकाशक- उद्भावना, एच-55, सेक्टर-23, राजनगर, गाजियाबाद, मो. 9811582902
पृष्ठ-   80
मूल्य- 125 रुपए
 

Wednesday, 23 January 2019

शराबबंदी : आगे का रास्ता?


छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में शराबबंदी को एक महत्वपूर्ण बिन्दु बनाया था। सरकार बन जाने के बाद कर्जमाफी जैसे कुछ मुद्दों पर अमल होना शुरू हो गया है। किन्तु शराबबंदी पर प्रतीत होता है कि अभी सरकार के भीतर सोच-विचार जारी है। स्वाभाविक ही अपदस्थ भारतीय जनता पार्टी इसे वादाखिलाफी निरूपित कर रही है, किन्तु मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस पर कटाक्ष करते हुए माकूल जवाब दिया है। उन्होंने कहा है कि वे नोटबंदी की तर्ज पर शराबबंदी नहीं करना चाहते और यह काम पूरी तैयारी के बाद ही होगा। राज्य सरकार ने इसके बाद इतने अहम मसले पर विचार करने के लिए दो कमेटियां गठित करने की भी घोषणा कर दी है। हम उम्मीद करना चाहेंगे कि पिछली सरकार द्वारा इसी मुद्दे पर गठित समिति की तरह ये समितियां शीर्षासन नहीं करेंगी।
भारत में पिछले दो-तीन दशकों के भीतर मद्यपान का चलन खूब बढ़ा है। खूब याने कई-कई गुणा बढ़ोतरी हुई है। इस नई चलन का दुष्प्रभाव सामाजिक और पारिवारिक जीवन में देखने मिल रहा है। एक तरफ टेक्नालॉजी के विकास के साथ बढ़ती हुई इच्छाएं, बाजार और विज्ञापन के प्रलोभन, मीडिया और सोशल मीडिया के षड़यंत्र से बढ़ते हुए मनोविकार, दूसरी ओर बढ़ती हुई आबादी, आनुपातिक रूप से घटती हुई आमदनी, और उसमें असली-नकली जहरीली शराब का सेवन इन सबने मिलकर पारिवारिक जीवन का ताना-बाना छिन्न-भिन्न करने में अपनी ओर से कोई कसर बाकी नहीं रखी है। इस नए वातावरण का सर्वाधिक दुष्प्रभाव महिलाओं और बच्चों को झेलना पड़ रहा है। हिंसा, अपराध, और दुर्घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है; और जैसा कि मैं कहते आया हूं भारतीय समाज एक क्रुद्ध व संशयग्रस्त समाज में तब्दील होते जा रहा है।
भारतीय समाज में आई इस प्रदूषित मानसिकता पर हम आगे कभी विचार करेंगे। फिलहाल शराबबंदी पर चर्चा करते हुए स्पष्ट जान पड़ता है कि चुनाव में वोट हासिल करने जनता के बीच जाने वाले राजनेता मदिरापान के दुष्प्रभावों से अनभिज्ञ नहीं हैं। दो साल पहले ही तो बिहार में नीतीश कुमार ने शराबबंदी का वायदा किया, उस पर अमल भी किया जिसके लिए उन्हें पर्याप्त सराहना भी मिली। लेकिन यह सच्चाई अपनी जगह है कि व्यापक रूप से फैली एक सामाजिक बुराई को सिर्फ कानून बनाकर नहीं रोका जा सकता। हमारे देश में कानूनों की कमी नहीं है। लेकिन इन कानूनों पर अमल करने के लिए जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक संकल्पबद्धता की आवश्यकता है वह फिलहाल नहीं है। इसका कारण है कि राजनीतिक दलों ने लोक शिक्षण के प्राथमिक दायित्व से अपने हाथ खींच रखे हैं।
यह हमें पता है कि सुरापान की परिपाटी आज की नहीं, बल्कि प्राचीन इतिहास काल से चली आ रही है। यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि हर मनुष्य को कोई न कोई लत अवश्य लगी रहती है। लेखकों, कलाकारों के बारे में तो कहा जाता है कि वे ऐसा कोई शौक अवश्य पाले रहते हैं जिससे उनकी कल्पना व रचनाशीलता को पंख लगते हैं। दूसरी ओर यह भी सच है कि कोई भी लत, आदत या शौक अगर सीमा से बाहर बढ़ जाए तो उससे व्यक्ति को नुकसान ही होता है। मनुष्य चूंकि सामाजिक प्राणी है इसीलिए व्यक्ति को होने वाला नुकसान निजी न होकर किसी मात्रा में सामाजिक हानि के दायरे में आ जाता है।
शराबबंदी के सिलसिले में कुछ दृष्टांत ध्यान में आते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में 1920 के दशक में मद्यनिषेध कानून लागू किया गया था। कहते हैं कि उसके बाद शराब की अवैध बिक्री का व्यापार खूब बढ़ा और उसके चलते ही माफिया की ताकत बहुत अधिक बढ़ी। हमारे यहां गुजरात में सत्तर साल से मद्यनिषेध लागू है किन्तु गुजरात का कोई भी इलाका नहीं है जहां शराब की अवैध बिक्री न होती हो। गुजरात से लगे राजस्थान में कोई पाबंदी नहीं है सो साधनसम्पन्न गुजराती माऊंट आबू आदि जाकर छककर मदिरा सेवन करते हैं और वापस अपने प्रदेश लौट आते हैं। तमिलनाडु में आजादी के बाद ही मद्यनिषेध कानून लाया गया था लेकिन कुछ सालों बाद खत्म कर दिया गया। केरल में अभी कुछ साल पहले कानून आया और फिर उसमें छूट देना पड़ी। यही स्थिति लगभग चालीस साल पहले महाराष्ट्र में हुई जब छूट मिलने के बाद चलती ट्रेनों में बीयर की बिक्री होने लगी।
अभी बिहार से भी कानून को तोड़़ने की खबरें लगातार आ रही हैं। कुछ अन्य राज्यों में भी कानून लागू है, लेकिन वहां भी इसे शिथिल करने पर विचार किया जा रहा है। कानून बनाने उसे शिथिल करने या पूरी तरह से उठा लेने की प्रक्रिया में गोया लुका-छिपी का खेल चल रहा है। इसके दो कारण जाहिरा तौर पर समझ आते हैं। एक तो शराब बिक्री से प्राप्त पृथक राजस्व याने आबकारी कर का मोह कोई सरकार नहीं छोड़ना चाहती। यह हमने साठ साल पहले तमिलनाडु में देखा था। दूसरे, अवैध व्यापार के चलते कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने का भय भी सरकार के सामने बना रहता है। दूसरी ओर पचास फीसदी आबादी याने महिलाओं के वोटों का आकर्षण शराबबंदी के पक्ष में माहौल बनाता है। यह एक दुविधापूर्ण स्थिति है। इससे बाहर कैसे निकला जाए और क्या कोई स्थायी समाधान खोजना संभव है? ये सवाल हमारे सामने खड़े हैं। मेरी समझ में सरकार को आबकारी कर से प्राप्त आय का लालच नहीं करना चाहिए। इससे जो राजस्व प्राप्त होता है उससे कई गुना अधिक व्यय शराब से उपजी बीमारियों और दुर्घटनाओं के उपचार में हो जाता है।
शराब के अत्यधिक सेवन के कारण स्वयं शराबी की सेहत को तो नुकसान पहुंचता ही है; घर और बाहर सिर फूटने, हड्डियां टूटने और मरने तक के हादसे होते हैं। शराब पीकर दंगे-फसाद भी होते हैं जिसमें पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी के समय व साधन जाया होते हैं। याने बैलेंसशीट बनाएं तो राजस्व कम और व्यय कई गुना अधिक।
मेरा अपना अध्ययन कहता है कि अमेरिका की अविचारित सोच के चलते जब से अन्य मादक द्रव्यों पर रोक लगाई गई है तब से मयनोशी की बुराई अधिक बढ़ी है। हमारे यहां और पूरी दुनिया में अफीम, भांग, गांजा, चरस इनका इस्तेमाल बहुत पहले से होता आया है। इसे रोकने के चक्कर में ड्रग माफिया और ड्रग कार्टेल पैदा हो गए। अब अमेरिका को समझ आई है तो धीरे-धीरे ये प्रतिबंध समाप्त हो रहे हैं। ये ऐसे नशे हैं जिनसे बड़ी सामाजिक क्षति नहीं होती। मैं समझता हूं कि इस पर हमारी सरकारों को भी विचार करना चाहिए। मेरी दूसरी राय है कि यदि शराब माफिया को खत्म करना है तो शराब बिक्री के लिए लाइसेंस प्रणाली में बड़ी छूट दी जाना चाहिए; नहीं तो माफिया ही सरकार चलाते रहेंगे। तीसरी बात, देश के अन्य हिस्सों की तरह छत्तीसगढ़ में भी ऐसे अनेक सामाजिक समूह हैं जिनके लिए मदिरापान उनके सामाजिक संस्कारों का अभिन्न अंग है। देखना यह होगा कि पेसा क्षेत्र में व्यवसायिक शराब बिक्री की अनुमति बिल्कुल न हो। मेरा अंतिम सुझाव छत्तीसगढ़ सरकार को है कि प्रदेश में जल्दी बड़े पैमाने पर इस मुद्दे पर पारदर्शी ढंग से जनसुनवाइयों का आयोजन हो। इस व्यापक परामर्श से ही आगे का रास्ता निकलेगा।

(प्रयास, रायपुर द्वारा 18 जनवरी को ''शराबबंदी: अवधारणा व औचित्य'' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में दिए अध्यक्षीय वक्तव्य का संवर्द्धित रूप)

Thursday, 17 January 2019

पत्रकारों की सुरक्षा का सवाल


पत्रकारिता ऐसा पेशा है जिसमें जोखिम बहुत है। हाल के वर्षों में इसमें लगातार इजाफा हुआ है। यहां मुझे पचास साल से कुछ ऊपर हुए बिहार में अपराधिक तत्वों द्वारा एक पत्रकार की हत्या करने की वारदात याद आती है जिसके बाद मेरी एक सहपाठी ने चिंता व्यक्त करते हुए सलाह दी थी कि मुझे पत्रकारिता छोड़ कोई और काम कर लेना चाहिए। यह एक निजी प्रसंग है, लेकिन भारत में पत्रकारिता पर खतरा तो उसके जन्मकाल से ही चला आ रहा है। देश के पहले समाचारपत्र 'द बंगाल गजट' के स्वामी और संपादक जेम्स आगस्टस हिक्की को तत्कालीन वायसराय लार्ड वारेन हेस्टिंग्स ने जेल में डाल दिया था। इस घटना को सवा दो सौ साल हो गए हैं। इसके बाद उपनिवेशवादी सरकार ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट याने भाषायी समाचारपत्र कानून लागू किया जिसकी चपेट में आकर भारतीय भाषाओं के कितने ही अखबारों पर ताला लग गया। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान प्रेस पर लगातार आक्रमण होते रहे। उस दौरान महान पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की भी साम्प्रदायिक दंगों के दौरान शांति स्थापना की कोशिश के बीच एक दंगाई ने हत्या कर दी थी। देश आजाद होने के बाद स्वस्थ, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के विकास की उम्मीदें की गई थीं।

 पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र पत्रकारिता के सच्चे अर्थों में हिमायती थे। लेकिन आजादी की संधि वेला में ही वृंदावन में आयोजित श्रमजीवी पत्रकार सम्मेलन में आशंका व्यक्त की गई थी कि पत्रकारिता पर पूंजीपतियों का कब्जा हो जाएगा और स्वस्थ पत्रकारिता का उन्नयन आकाश कुसुम सिद्ध होगा। बाबूराव पराडकर व बनारसीदास चतुर्वेदी जैसे वरिष्ठ संपादकों ने बिना लाग-लपेट के इस बारे में मंतव्य व्यक्त किए थे। हुआ भी वैसा ही। प्रथम प्रेस आयोग ने स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए कुछ व्यवहारिक उपाय प्रस्तावित किए थे जिन्हें आश्चर्यजनक रूप से सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया। देश की सबसे बड़ी अदालत ने अखबार मालिकों की मुनाफा कमाने की स्वतंत्रता को तब मौलिक अधिकार के समकक्ष निरूपित किया था।

परिणाम यह हुआ कि शनै: शनै: प्रेस पर पूंजी का आधिपत्य बढ़ते चला गया। प्रेस की शान में चाहे जितने कसीदे लिखे गए हों, सच्चाई यह थी कि पत्रकारिता पूंजी की दासी बनती चली गई। वैसे आपातकाल लगने के पूर्व तक केन्द्र और राज्यों में कार्यरत कांग्रेसी सरकारों का रवैया प्रेस के प्रति किसी हद तक मैत्रीपूर्ण था। उसका कारण यह था कि उस दौर के अधिकतर पत्रकारों की पृष्ठभूमि स्वाधीनता आंदोलन की थी इसलिए राजनेताओं और पत्रकारों के बीच किसी हद तक परस्पर सम्मान का भाव था। यद्यपि 1975 के पहले के सामान्य वातावरण में भी ऐसे प्रसंग घटित हुए हैं जब किसी मुख्यमंत्री ने किसी अखबार से नाराज होकर उसके विज्ञापन बंद कर दिए हों या अपने चहेते अखबारों को मनमाने लाभ दिए हों। कुछेक राजनेता, जिनमें दो-चार मुख्यमंत्री भी शामिल थे, पत्रकारिता की पृष्ठभू्मि से ही आए थे इसलिए उनके अपने अखबारों को तो राजपत्र होने का अघोषित दर्जा हासिल था।

आपातकाल के दौरान दिल्ली और अनेक प्रदेशों में प्रेस और पत्रकारों के साथ सरकार ने जो बर्ताव किया उसके बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। आपातकाल समाप्त होने के बाद लालकृष्ण आडवानी ने प्रेस पर जो टीका की थी, वह भी सबको याद होगी। 1977 के बाद पत्रकारिता के स्वरूप में एक के बाद एक बदलाव आना शुरू हो गए। अनेक मामलों में प्रेस को पुनर्प्राप्त स्वतंत्रता देखते ही देखते उच्छृंखलता में बदल गई। दूसरी ओर प्रेस ने अपना ध्यान राजनीति से इतर विषयों पर भी केन्द्रित किया। तीसरा परिवर्तन टेक्नालॉजी के विकास के साथ आया। कुल मिलाकर यह समय देश में पत्रकारिता बहुत अच्छा न सही, अच्छा तो अवश्य था।

1991 में कथित उदारीकरण के साथ राजनीति और अर्थनीति में जो युगांतरकारी परिवर्तन आया, प्रेस उससे अछूता न रहा। प्रेस संज्ञा का स्थान जल्दी ही मीडिया ने ले लिया। पुराने समय के जूट प्रेस में संपादकों और पत्रकारों का जो कुछ भी सम्मान था वह नए मीडिया मालिकों के निजाम में तिरोहित हो गया। मुनाफाखोर मीडिया मालिक और आत्मकेन्द्रित राजनेताओं के बीच एक नया गठबंधन हो गया जिसके बाद पत्रकारिता में न तो स्वतंत्रता की गुंजाइश रही, न निष्पक्षता की, और निर्भीकतापूर्वक काम करना तो अपराध ही बन गया। हमने ऐसे-ऐसे मुख्यमंत्री और अन्य सत्ताधीश देखे जिन्हें अपनी रंचमात्र आलोचना भी बर्दाश्त नहीं थी। ऐसे में दो ही रास्ते थे- या तो समर्पण कर दो या फिर दंड झेलने के लिए तैयार रहो। केन्द्र और राज्य में जहां अलग-अलग दलों की सरकार थी वहां स्वयं को बचाने की क्षीण आशा थी; लेकिन जहां ऐसा नहीं था वहां सिर पर तलवार ही लटक रही थी। हमने जम्मू-कश्मीर और पंजाब में आंतरिक अशांति के दौर में देखा था कि पत्रकार बिरादरी को कितनी भयावह परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद को समाप्त करने के नाम पर सलवा जुड़ूम नाम से जो सरकार समर्थित मुहिम चलाई गई इसके बाद यहां भी ऐसी ही स्थिति बनने लगी। लेकिन हां, इसके पहले अजीत जोगी सरकार के दौरान जो हुआ उसे भी याद रखने की आवश्यकता है जब राजनारायण मिश्र, नंदकुमार बघेल और लीला जैन को उनकी लेखनी के कारण प्रताड़ित किया गया।

 रमन सरकार में जो हुआ वह आज हमें एक दु:स्वप्न की तरह प्रतीत होता है। बस्तर में कितने ही पत्रकार जेल में डाल दिए गए और सरकार ने इनके प्रकरणों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता भी नहीं समझी। मालिकों पर दबाव डालकर पत्रकारों को बर्खास्त करवाया गया या प्रदेश के बाहर उन्हें फेंक दिया गया। राष्ट्रीय कहे जाने वाले अखबारों ने भी इस मामले में सरकार के साथ समझौते का रुख अपनाया। कार्पोरेट मीडिया व चाटुकार मीडिया और सरकार की जुगलबंदी इस दौरान खूब चली। इस परिपाटी का समाप्त होना संदिग्ध है। इस पृष्ठभूमि में पत्रकार सुरक्षा अधिनियम की बात उठी। कांग्रेस ने जब घोषणा पत्र बनाना शुरू किया तो प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पत्रकारों ने मांग की और उसे घोषणापत्र में शामिल किया गया। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सत्ता में आने के बाद इस वचनबद्धता को दोहराया है कि कांग्रेस की सरकार बनने पर पत्रकार सुरक्षा कानून लाया जाएगा। प्रदेश के पत्रकार जगत के सामने जो कटु अनुभव हैं उनको ध्यान में रखते हुए यह मांग उचित लगती है, लेकिन विचारणीय है कि क्या कानून बन जाने मात्र से पत्रकार सुरक्षित हो जाएंगे! एक मौजूं प्रश्न यह भी है कि पत्रकारों की अपनी एकजुटता और श्रमजीवी पत्रकार संघ, प्रेस क्लब इत्यादि संगठनों की क्या भूमिका होना चाहिए।

मेरा सोचना है कि जवाहरलाल नेहरू की पार्टी अगर नेहरू नीति पर चलती है तो ऐसे कानून की शायद आवश्यकता नहीं होगी। यदि बस्तर में शांति स्थापित हो जाती है तो आज जिस तरह पत्रकारों को दो पाटों के बीच पिसना पड़ता है वह स्थिति अपने आप खत्म हो जाएगी। हम यह न भूलें कि नक्सलियों ने पत्रकारों की हत्या तक की हैं। उन पर तो कोई कानून लागू होता नहीं है। दूसरी बात यह है कि पत्र जगत को सुरक्षा से कहीं अधिक आवश्यकता सम्मान की है। यह दायित्व लोकहितकारी सरकार का बनता है कि वह ऐसे वातावरण और नीति का निर्माण करे जिसमें पत्रकारिता का स्वस्थ विकास हो और पत्रकार सहज गति से अपना कर्तव्य निर्वहन कर सके। पंडित नेहरू ने ही कहा था कि मैं पत्रकारिता को उसकी कमजोरियों के साथ भी स्वीकार करता हूं। राहुल गांधी और उनकी टीम से भी मैं इसी सिद्धांत पर चलने की अपेक्षा करता हूं।

देशबंधु में 17 जनवरी 2019 को प्रकाशित