Wednesday, 14 November 2018

बदलाव की बयार बनाम इलेक्शन मैनेजमेंट



छत्तीसगढ़ की नब्बे विधानसभा सीटों में से अठारह पर 12 नवंबर को मतदान के साथ विधानसभा चुनावों का पहला चरण सम्पन्न हुआ। बस्तर संभाग के पांच जिलों और राजनांदगांव जिले की इन सीटों के बारे में राजनीतिक पर्यवेक्षकों को  खासी दिलचस्पी थी। इसका एक कारण तो राजनांदगांव क्षेत्र से मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का स्वयं उम्मीदवार होना था जहां उनके मुकाबले में भाजपा छोड़ कांग्रेस में आईं पूर्व सांसद और अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला मैदान में थीं। जहां तक बस्तर की बात है अबूझमाड़ इस विशाल प्रांतर का एक हिस्सा ही है, लेकिन बाकी दुनिया के लिए समूचा बस्तर ही अबूझ और रहस्यमय इलाका है। बस्तर अनेक कारणों से दिलचस्पी का केन्द्र रहा है, लेकिन चुनावी संदर्भ में यह मान्यता बन गई है कि छत्तीसगढ़ में राजनीति की दिशा बस्तर के चुनाव परिणामों से तय होती है। यह कुछ-कुछ वैसी ही बात है जैसे कभी कहा जाता था कि बंगाल की राजनीति भारत की दिशा तय करती है।
बस्तर के बारे में यह मान्यता शायद 2003 के विधानसभा चुनाव परिणामों के चलते बन गई और अभी तक चली आ रही है। यही वजह है कि दिल्ली हो या चेन्नई, कोलकाता हो या मुंबई, जो भी पत्रकार या शोधार्थी छत्तीसगढ़ आता है तो सबसे पहले बस्तर का रुख करता है। इस इलाके में लंबे अरसे से चली आ रही नक्सली गतिविधियों ने भी बस्तर के प्रति एक रूमानियत का भाव सा जगा दिया है। राजनांदगांव जिला चूंकि बस्तर की सरहद को छूता है इसीलिए वहां भी नक्सलियों की उपस्थिति लगातार बनी हुई है। इस मुकाम पर विषयांतर की जोखिम लेकर भी एक ताजा किस्सा पाठकों से साझा करने के लोभ से मैं नहीं बच पा रहा हूं। पिछले दिनों एक नामी-गिरामी चैनल के एक वरिष्ठ पत्रकार ने रिपोर्ट जारी की कि उसने कैसे सीआरपीएफ के साथ घूमकर अपनी जान को खतरे में डालकर नक्सली क्षेत्र की रिपोर्टिंग की। बाद में खुलासा हुआ कि यह एक पूरा नाटक रचा गया था और इसमें वास्तविकता का लेशमात्र भी नहीं था। मैंने जिस रूमानियत की बात की यह उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
बहरहाल पहले चरण का मतदान सम्पन्न हो गया। बस्तर में शायद चौबीस हजार सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए थे ताकि चुनाव निर्विघ्न सम्पन्न हो सके। मतदान दलों को बीहड़ इलाकों में हेलीकाप्टर से भेजा गया। जिन गांवों में नक्सली वारदातों का खतरा था उनके लिए कई किलोमीटर दूर सुरक्षित समझे जाने वाले इलाके पर मतदान केन्द्र बनाए गए और पुलिस की भारी चौकसी के बीच मतदाताओं को वहां तक लाने के प्रबंध किए गए। छत्तीसगढ़ अकेला राज्य है जहां दो चरणों में मतदान हो रहा है उसकी वजह यही है कि बस्तर के संवेदनशील इलाकों की सुरक्षा प्रबंध करना लाजिमी था। पिछली बार भी ऐसा ही हुआ था। नक्सलवादी हर आम चुनाव के पहले बदस्तूर मतदान बहिष्कार की अपील करते हैं। उसके जवाब में सरकार जनता को उसके मताधिकार का प्रयोग करने के लिए हरसंभव प्रयत्न करती है।
इस बार के प्रबंध पिछली बार के मुकाबले कहीं ज्यादा सघन थे। उम्मीद की गई थी कि इन प्रबंधों को देखते हुए मतदान प्रतिशत में अच्छी खासी बढ़ोतरी होगी। प्रारंभिक रिपोर्टों में बताया गया कि नक्सलियों के चुनाव बहिष्कार के आह्वान का कोई फर्क नहीं पड़ा और मतदाताओं ने बढ़-चढ़ कर मतदान में भाग लिया। मतदान के एक-दो दिन पहले छुटपुट हिंसक वारदातें भी हुईं, जो पिछली बार भी हुई थीं। लेकिन 2013 और 2018 की तुलना करें तो ऐसा लगता नहीं है कि इस बार पहले के मुकाबले मतदान के प्रतिशत में कोई अधिक बढ़ोतरी हुई हो; बल्कि पहले कम मतदान की सूचना आई थी और बाद में मिले संशोधित आंकड़े पिछली बार के आसपास ही हैं।
मतदान के एक दिन पहले याने 11 नवंबर की रात को एकाएक खबर फैली कि सत्तारूढ़ पार्टी मतदान में भारी धांधली करवाने जा रही है। यह खबर क्यों और कैसे फैली इसका कोई सिरा पकड़ में नहीं आया। एक जानकारी अवश्य यह मिली कि नक्सली खेमे से ही खबर फैलाई गई थी, जिसे छत्तीसगढ़ तो क्या दिल्ली के भी कुछ पत्रकारों ने लपक लिया। सोशल मीडिया पर खबर फैल गई। कुल मिलाकर इससे कांग्रेस खेमे में एकाएक हड़कंप मच गया। मेरा अनुमान है कि यह अफवाह कांग्रेसियों का मनोबल गिराने के लिए फैलाई गई थी। वरना मेरे सूत्रों का कहना है कि छोटी-मोटी गड़बड़ियां तो चलती रहती हैं, बड़े पैमाने पर कहीं कोई गड़बड़ियां नहीं हुई हैं। चूंकि चुनावों के समय विरोधियों को पस्त करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं तो मानना चाहिए कि यह खबर या अफवाह भी उसी तरह की एक चाल थी। आने वाले दिनों में  ऐसे नजारे और भी देखने मिलेंगे!
खैर! अब सबका ध्यान दूसरे चरण के मतदान और शेष चार प्रदेशों के चुनावों पर लग गया है। इस बीच यह जानना दिलचस्प होगा कि हार-जीत की भविष्यवाणियों के परे प्रदेश और प्रदेश के बाहर के पत्रकारों ने इस पहले चरण को किस तरह देखा है। मेरी जितने लोगों से बात हुई है उन सभी का लगभग एक स्वर से कहना है कि परिवर्तन की बयार बह रही है। वे इसके कुछ कारण भी गिनाते हैं जो उन्होंने चुनावी दौरों में आम जनता से बातचीत कर समझे हैं। सबका कहना है कि भ्रष्टाचार इस बार एक बहुत बड़ा मुद्दा है। नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार खत्म करने के चाहे जितने दावे करते रहें, छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार चरम पर है और डॉ. रमन सिंह अपने तमाम नेक इरादों के बावजूद उस पर रोक नहीं लगा सके हैं।
भ्रष्टाचार के साथ अहंकार भी एक गंभीर मुद्दा बन कर उभरा है। भाजपा के छुटभैया नेताओं ने आम जनता को ही नहीं, सरकारी कर्मचारियों को भी त्रस्त कर रखा है। मंत्रियों का तो कहना ही क्या! एकाध को छोड़कर कोई सीधे मुंह बात नहीं करता। सुनते हैं कि डॉ. रमन सिंह इस बार बहुत से मंत्रियों और विधायकों के टिकट काट देना चाहते थे, लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने अपने अलग पैमाने बनाए और उस आधार पर टिकटों का वितरण हुआ। युवाओं के बीच में बेरोजगारी का प्रश्न भारी है। पिछले कुछ समय में अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ी है, कितने ही कारखाने बंद हो गए हैं या ले-दे कर चल रहे हैं, व्यापार-व्यवसाय में दीपावली के बाद भी चमक नहीं आई है। ऐसे में नौजवान या तो ताश खेलकर समय काट रहे हैं या स्मार्टफोन से मन बहला रहे हैं। उनका आंतरिक क्षोभ क्या रंग लाएगा यह देखने वाली बात होगी।
एक दिलचस्प बात यह सुनने को मिली कि छत्तीसगढ़ में नरेन्द्र मोदी का कोई जादू नहीं है। उनकी बातों पर जनता ने एतबार करना बंद कर दिया है। वे जनसभाओं में जिस तरह बात करते हैं वह छत्तीसगढ़ की जनता के मिजाज के खिलाफ है। वही हाल अमित शाह का है। चुनाव में अगर भाजपा का कोई चेहरा है तो वह रमन सिंह का है। वे कल तक तो राजनांदगांव में ही फंसे हुए थे। अगले पांच-सात दिनों में वे अपनी पार्टी के लिए जितनी मेहनत संभव है करेंगे ही, लेकिन भाजपा ने स्टार प्रचारकों की जो फौज उतारी है वह नाकाम हो रही है। नोटबंदी और जीएसटी के कारण व्यापारी वर्ग त्रस्त है। टिकट वितरण में भी व्यापारी समाज से नए चेहरों को सामने न लाने की नाराजगी ही दिखाई दे रही है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो कुछेक ''सै'' प्रत्याशी आराम फरमा रहे हैं; कहीं-कहीं तीसरी ताकत की चुनौती है; कुछ अभी से खुद को मुख्यमंत्री मान बैठे हैं। ऐसे में सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भाजपा कितनी दक्षतापूर्वक इलेक्शन मैनेजमेंट कर पाती है!
 देशबंधु में 15 नवंबर 2018 को प्रकाशित 

Friday, 9 November 2018

चुनावी हार को जीत में बदलने की तरकीबें

   
                              
इतना तो तय है कि जब भी चुनाव होंगे, किसी एक उम्मीदवार की जीत होगी और बाकी जितने, एक या अधिक, हों, हार का सामना करेंगे। अधिकतर अवसरों पर मतदाता जिसके पक्ष में राय बना लेते हैं, वही प्रत्याशी या दल जीतता है। लेकिन देखने में ऐसा आता है कि जीतते-जीतते कोई प्रत्याशी हार जाता है और मतदाता अविश्वास से सिर हिलाने के अलावा और कुछ नहीं कर पाते। लंबे समय से राजनैतिक शब्दावली में ''इलेक्शन मैनेजमेंट'' के नाम की शै चलन में है, यह जीतना-हारना उसी का परिणाम है। इलेक्शन मैनेजमेंट यानी चुनाव प्रबंध के मुख्यत: तीन अंग या सोपान हैं- टिकिट मिलने तक पहला ; चुनाव संपन्न होने तक दूसरा; और मतगणना के समय या उसके भी बाद तक तीसरा चरण। इन सभी चरणों में हारी हुई बाजी को जीत में बदलने के अनेकानेक उदाहरण हमने देखे हैं। हाल के समय में इस प्रबंध कौशल को एक आदर्श अनिवार्यता का दर्जा हासिल हो गया है। इसकी विवेचना करने के पूर्व नब्बे के दशक की एक सत्यकथा को फिर से जान लेते हैं।
तत्कालीन मध्यप्रदेश की एक लोकसभा सीट पर कांटे की टक्कर थी। एक तरफ एक पार्टी के सचमुच दिग्गज कहे जा सकने वाले नेता थे, उनके सामने एक अपेक्षाकृत युवा किंतु अनुभवी उम्मीदवार था। युवा प्रत्याशी के जीतने की पूरी उम्मीद थी, लेकिन अंतत: वह लगभग एक हजार वोट से हार गया। निर्वाचन अधिकारी याने जिला कलेक्टर ने मतगणना के दौरान उसके खाते के कोई दस हजार वोट थोड़े-थोड़े कर दस-बारह निर्दलीय प्रत्याशियों के खाते में दर्ज करवा दिए और इस चाल को समझने में प्रत्याशी ने चूक कर दी। पुर्नमतगणना की मांग भी नहीं की।  इस तरह चुनाव अधिकारी के सहयोग से दिग्गज नेता ले-देकर जीत गए। इस पुरस्कारोचित सहयोग भावना का उन्नत स्वरूप अभी देखने मिला, जब एक राज्य में निर्वाचन अधिकारी ने निवर्तमान मुख्यमंत्री का नामांकन पत्र निरस्त कर दिया। आशय यह कि नामांकन दाखिले से लेकर नतीजा आने के बीच कुछ भी हो सकता है। कहावत है न- देयर आर मैनी स्लिप्स, बिटवीन द कप एंड द लिप्स। 
हाथ में चाय का प्याला है, लेकिन ओठों तक पहुंचते-पहुंचते किसी का धक्का लग सकता है, हाथ कांप सकते हैं, चाय छलक सकती है। आवश्यकता सावधान रहने की है। पांच साल पहिले की ही तो बात है। एक प्रमुख दल के प्रत्याशी ने नाम वापिसी के आखिरी क्षण में अपना नाम वापिस लेकर विपक्षी उम्मीदवार को वाक ओवर दे दिया था। ऐसे प्रकरण भी तो हैं जब ऐन मौके पर बी-फार्म किसी और को दे दिया गया हो। इसके आगे बढ़ें तो सुनने मिलता है कि साधन-संपन्न प्रत्याशी अपने प्रतिद्वंद्वी को अच्छी खासी रकम पहुंचा देते हैं कि तुम घर में मौज करो, इस धन से अपनी जिंदगी संवारो; और जिनका चुनाव में उतरने का मकसद ही धन कमाना होता है, वे खुशी-खुशी ऑफर स्वीकार लेते हैं। कोई-कोई प्रत्याशी तो इसलिए भी जीती बाजी हार जाते हैं कि चुनावी खर्च के लिए पार्टी से जो धनराशि मिलती है, उसका इस्तेमाल करने के बजाय भविष्य की सुरक्षा के लिए एफडीआर में निवेश कर देते हैं। काश कि फलाने ने यह बुद्धिमता (!) न दिखाई होती! 
जाहिर है कि नामांकन के बाद चुनाव प्रचार के दौरान भी ऐसे खेल चलते रहते हैं। जो पैराशूट प्रत्याशी होते हैं, वे तो अपने कार्यकर्ताओं को भी ठीक से नहीं पहचानते। विरोधी खेमे का कौन जासूस आपके दरबार में हाज़िरी लगा रहा है, यहां की खबरें वहां पहुंचा रहा है, इसका भेद जब खुलता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। वैसे तो आचार संहिता के अनुसार मतदाता को किसी भी तरह का प्रलोभन नहीं दिया जा सकता, किंतु इसका पालन वही करता है, जिसके पास राजनैतिक अनुभव की कमी है। जिन पर आचार संहिता लागू करवाने का दायित्व है, वे भी तो आखिर इंसान हैं, और ऐसे प्रकरणों की कमी नहीं है, जब वे दबाव या प्रलोभन के सामने झुक गए हों। एक तरफ अनुभवी उम्मीदवार खैरातें बांटते घूम रहे होते हैं, तो दूसरी ओर कच्चे उम्मीदवार मतदाताओं तक अपनी पर्चियां भी नहीं पहुंचा पाते। 
और मतदान के दिन क्या होता है? पोलिंग बूथ के भीतर पार्टी का एजेंट यदि परिपक्व न हुआ तो उसे बहकाना बहुत आसान होता है। वह यदि अपने मतदाताओं को नहीं पहचानता तो सामने वाला किसी का वोट किसी के नाम से डलवा देता है। फिर शिकायत करते रहिए फर्जी मतदान की। कुछेक गुणी नेताओं के बारे में तो कहा जाता है कि वे पड़ोसी प्रदेशों से लोगों को बुलाकर पांच-सात हजार फर्जी वोट डलता देते हैं। इनसे भी शायद एक कदम आगे वे चतुर नेता हैं जो मतदान की पूर्व रात्रि पर खैरात बांटने के साथ-साथ कहीं से जुगाड़ कर अमिट स्याही भी लगा देते हैं कि बंदा अगली सुबह वोट डालने ही न जा पाए। एक ही नाम के पांच-दस निर्दलीय उम्मीदवारों को मैदान में उतार भ्रम  पैदा करना भी इस चतुर नीति का ही एक और उदाहरण है। ऐसे तमाम नेतागण हमारे लिए प्रणम्य हैं। आखिरकार, चुनाव जीतने को इन्होंने एक खूबसूरत कला में परिवर्तित जो कर दिया है।
चुनाव के दौरान अपने पक्ष में माहौल तो बनाना ही पड़ता है। यह काम भी अब सीधे-सादे तरीके से कोई नहीं करता। अनेक चतुर सुजान अपने दूतों को विरोधी पक्ष के मतदाताओं के पास पठाते हैं। वे जाकर बताते हैं कि उनकी तो हार हो रही है, भैयाजी या नेताजी बात ही नहीं सुनते, इत्यादि। इससे सामने वाले के गफलत में पड़ जाने की संभावना बन जाती है। जब उनके ही लोग हार मान बैठे हैं तो हमें कुछ करने की क्या जरूरत है? हमें तो जनता खुद ही जिता रही है। बस, इसी खुशफहमी में पत्ता साफ। यह तो एक तरकीब है। इससे बढ़कर महीन तरकीब चुनाव पूर्व सर्वे के इस्तेमाल की है। पहले किसी पार्टी या प्रत्याशी की जीत का अनुमान पेश करो, फिर कुछ दिन बाद उस के हारने का अनुमान घोषित कर दो। प्रत्याशी का और उसके पक्षधर मतदाताओं का मनोबल तोड़ने, उन्हें हतोत्साह करने की यह तरकीब कई बार सफलतापूर्वक आजमाई गई है। राजनैतिक दल इन सर्वे करने वालों और उन्हें प्रकाशित-प्रचारित करने वालों का ऐहसान चुकाने में कोई कमी नहीं रखते।
आप सोच रहे होंगे कि ईवीएम का मुद्दा अभी तक क्यों नहीं उठा। इस बारे में प्रामाणिक रूप से कुछ कहना कठिन है, यद्यपि व्यापक जनभावना बन चुकी है कि ईवीएम में धांधली होती है। सवाल यह है कि क्या पुरानी मतदाता पर्ची वाली प्रक्रिया दोषरहित थी? वोटरों की बढ़ती हुई संख्या को देखकर निर्धारित अवधि में मतदान सुचारु संपन्न करा पाना आज एक असंभव कार्य प्रतीत होता है। फिर मतपेटियों की लूट, मतगणना के दौरान टेबुलेशन चार्ट में हेराफेरी आदि गड़बड़ियां नए सिरे से लौट सकती हैं। इसलिए यही शायद बेहतर होगा कि ईवीएम से ही वोट डाले जाएं और उसमें कोई धांधली न हो पाए, इस ओर उम्मीदवार व उनकी पार्टियां पर्याप्त सतर्कता बरतें।
सभी को इस ओर भी सतर्क रहना चाहिए कि जीती हुई बाजी येन-केन-प्रकारेण हार में तब्दील न हो जाए। जिनके सिर पर सत्ता का नशा चढ़कर नाच रहा है, उनके लिए नैतिक-अनैतिक का फर्क मायने नहीं रखता, किंतु आम मतदाता के  लिए तो चुनाव लोकतंत्र का एक पवित्र पर्व है। इसमें जीत या हार नहीं, बल्कि दोनों ही स्थितियों में लोक कल्याण के लिए काम करने की प्रतिबद्धता ही मायने रखती है। मतदाताओं की खरीद-फरोख्त से लेकर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की नीलामी, दल-बदल, मंत्री पद का झुनझुना- ये सब घृणित कार्य हैं। अगर जनता सतर्कता नहीं बरतेगी तो इस देश में फासीवाद आने से कोई नहीं रोक सकता।
देशबंधु में 10 नवंबर 2018 को प्रकाशित 

Sunday, 4 November 2018

'रोशनी का घोषणापत्र'

                                        

 "समय करीब है
जब हर पौधा पेड़ बनेगा
तब हर मां गहरी नींद सोएगी
और उसके जवान बेटे
खेत पर बने मचानों पर
अकाल के जाल को
मिट्टी-सने हाथों से काटेंगे
भूख की यह खिड़की
अब बार-बार नहीं खुलेगी
छीन ली जाएगी
उस हर तथाकथित आदमी से
सज्जनता की वर्दी
जो हर सच्चे शब्द की गर्दन काट लेता है
नहीं गल सकेगी दाल
अब निकम्मे अर्थशास्त्र की
क्योंकि यहां से वहां तक 
अंधेरे की हर पीठ पर
रोशनी का घोषणा-पत्र
चिपकाया जा चुका है।''
उपरोक्त पंक्तियां नारायणलाल परमार की लंबी कविता 'रोशन हाथों की दस्तक है' से ली गई है जो उनके इसी नाम से प्रकाशित संकलन की पहली कविता है। मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने इसे 1980 प्रकाशित किया था। अस्तु,
पिछले सप्ताह इस कॉलम में ''मेरा चुनावी घोषणापत्र'' छपा था। मैं उसी को आगे बढ़ाते हुए इस सप्ताह अनेक नए बिन्दुओं को जोड़ना चाहता था। लेकिन जब दीपावली का त्योहार आ गया हो तब यह समयोचित है कि चुनावी घोषणापत्र के बजाय रोशनी के घोषणापत्र पर बात की जाए। वैसे दोनों में बुनियादी तौर पर कोई अंतर नहीं है। आम चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न अंग है तथा घोषणापत्र एक तरह से संविधान में निहित शाश्वत मूल्यों, मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों के प्रति राजनीतिक दलों की प्रतिबद्धता को ही दोहराते हैं।
संविधान  समतामूलक, न्याय आधारित, मानवीय गरिमा से भरपूर, सुखी, शांतिमय, सुरक्षित भविष्य के प्रति वचनबद्धता को प्रतिबिंबित करता है। हमने जो एक सौ नब्बे साल की गुलामी झेली, अकाल, भुखमरी, गरीबी, फूट डालो और राज करो, अशिक्षा, बीमारी आदि का सामना किया, उस अंधकार से निकलकर खुली हवा और रोशनी में जी सकने की गारंटी का ही तो दूसरा नाम संविधान है। यह अवश्य है कि राजनीतिक ताकतें सर्वशक्तिमान होने के अहंकार में डूबकर इस गारंटी का तिरस्कार जब-तब करती हैं। ऐसे में सत्ताधारियों को याद दिलाने के लिए कवि की वाणी मुखरित होती है कि वह आम जनता के प्रति अपने कर्तव्यों को भूलने का अपराध न करें। "रोशनी का घोषणापत्र" महज कविता नहीं है। वह सत्ताधीशों को उनके प्रमाद के विरुद्ध एक चेतावनी है।
कवि ने तो अपनी बात कह दी। हमारा दायित्व है कि सही संदर्भों में उसकी परिभाषा करें। मैं यहां से बात शुरू करना चाहूंगा कि दुनिया की आधी आबादी जब तक अंधेरे की कैद में रहेगी तब तक एक रोशन दुनिया की कल्पना साकार नहीं हो सकती। हमारे देश में स्त्री जाति की जो स्थिति है वह किसी से छिपी नहीं है। कहने के लिए कानून तो बहुत बन गए हैं और यही नहीं, कानूनों को कठोर से कठोरतम बनाने की मांग भी हमेशा उठती रहती है; लेकिन जब तक समाज के नज़रिए में आमूलचूल परिवर्तन नहीं होगा तब तक कानून बेमानी रहे आएंगे। प्रश्न उठता है कि समाज की सोच में परिवर्तन लाने के लिए क्या सचमुच आवश्यक परिवर्तन किए जा रहे हैं; क्या उनमें तकनीकी विकास के चलते आ रहे सामाजिक बदलावों का ध्यान रखा जा रहा है; क्या देश के राजनीतिक दल गौर करेंगे कि घिसी-पिटी युक्तियों से बात नहीं बनेगी।
मैं देखता हूं कि मूल रूप में मातृसत्तात्मक रहे आदिवासी समाजों में भी पितृसत्ता की पकड़ मजबूत हो रही है। यह चिंताजनक है। ध्यान देना होगा कि बचपन से स्त्री और पुरुष के बीच बराबरी के भाव को बढ़ाया जाए, पुरुष वर्चस्व को नकारा जाए, लड़के-लड़की दोनों का लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा इत्यादि में भेद न किया जाए, उन्हें एक-दूसरे का सम्मान करना सिखाया जाए। हमारी स्कूली किताबें भेदभाव को बढ़ाती हैं। विशेषज्ञ इनका परीक्षण करें और वर्चस्ववाद के बजाय नर-नारी समता का संदेश देने वाले पाठ पुस्तकों में रखें जाएं। सिनेमा और टीवी में आदर्श भारतीय नारी की जो कपोल-कल्पित छवि बना दी गई है उसे तोड़ा जाए। मैं यहां तक कहूंगा कि लड़के के लिए बंदूक और लड़की के लिए गुड़िया जैसे खिलौने की मानसिकता का भी त्याग किया जाए। इस सबके लिए राजनीतिक दलों को पूर्वाग्रह त्यागकर नई सामाजिक नीति बनानी होगी।
हाल के वर्षों में हुई तकनीकी प्रगति के चलते संचार माध्यमों ने स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर विकृतियां फैलाने का काम बड़े स्तर पर किया है। मैंने पहले भी लिखा है कि महान दार्शनिक प्लूटो ने होमर रचित महाकाव्यों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी क्योंकि उसका किशोर मन पर दुष्प्रभाव पड़ता है। आज हम उस सीमा तक नहीं जाएंगे, लेकिन सोशल मीडिया का जो दुरुपयोग हो रहा है वह वीभत्स और भयानक रूप से चिंताजनक है। कल्याणकारी शासन की जवाबदेही बनती है कि वह पोर्नोग्राफी पर रोक लगाए ताकि दुर्बल मन विकृति का शिकार होने से बच सकें। पश्चिम में बहुत कुछ अच्छा है, लेकिन हम उनकी हर चीज आंख मूंदकर  नहीं ले सकते। दूसरी ओर यह भी नहीं है कि हमारी  संस्कृति में सब कुछ अच्छा ही अच्छा है। अपनी सामाजिक संरचना की सड़ांध को दूर तो करना ही होगा।
रोशनी का घोषणापत्र लागू तभी होगा, जब समाज के कमजोर वर्गों के प्रति हमारी सोच सकारात्मक और सक्रिय सहानुभूति की होगी। यहां आंखें चुराने से काम नहीं चलेगा। आश्रम शालाएं, अनुसूचित जाति व जनजाति के छात्रावास, मलिन बस्तियां और अन्य स्थितियां चीख-चीख कर कहती हैं कि आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक- इनके प्रति हमारा रवैया अमानवीय और अन्यायपूर्ण है। कामकाजी, मेहनतकश समाज के प्रति हमारा रवैया तिरस्कारपूर्ण और अपमानजनक होता है। कोऑपरेटिव सोसायटियां मृतप्राय हैं। अब जो कालोनियां बस रही हैं उनमें यह वर्गविभेद तुरंत दिखाई दे जाता है। राजनीतिक शक्तियों का दायित्व बनता है कि वे सामाजिक विभेद को खत्म करने के लिए समुचित नीतियां व कार्यक्रम बनाएं।
यहां पर मीडिया के बारे में भी कुछ कहना आवश्यक लगता है। शासक वर्ग की सोच बन गई है कि मीडिया उसकी जी हुजूरी करता रहे। अगर स्वस्थ, तटस्थ, निष्पक्ष मीडिया नहीं होगा तो सत्ता  की चकाचौंध में खोए शासकों को पता ही नहीं चलेगा कि आम जनता किस अंधेरे में जी रही है। दुर्भाग्य से आजकल नीतिगत आलोचना को भी निजी आलोचना मान लिया जाता है। अधिकतर राजनेता उतना ही जानते हैं जो उन्हें उनके अफसर और चाटुकार बताते हैं। अगर कहा जाए कि सत्तावर्ग में सूरज का सामना करने की ताब नहीं है, तो गलत नहीं होगा।  लेकिन  इसमें अंतत: नुकसान सत्ताधीशों को ही होना है। अगर अभी भी कहीं थोड़ी समझदारी की उम्मीद बची हो तो हम कहेंगे कि मीडिया को स्वतंत्र और निष्पक्ष रहकर काम करने की गारंटी मिले। सुरक्षा की गारंटी तो उतनी ही चाहिए जितनी आम जनता को उपलब्ध है।
बातें अभी भी पूरी नहीं हुई है, लेकिन उन पर फिर कभी। 
देशबंधु में 05 नवंबर 2018 को प्रकाशित 

Wednesday, 31 October 2018

मेरा चुनावी घोषणापत्र

                                                 
जैसे तीज-त्योहार में कुछ रस्मों का पालन करना लगभग अनिवार्य माना जाता है, वैसे ही आम चुनावों के समय विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा घोषणापत्र जारी करना भी एक अनिवार्य कर्मकांड बन गया है। यह कोई अटपटी बात नहीं है। आम चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार है, तो उसके अनुरूप परिपाटियों का निर्वाह भी होना चाहिए। यह बात अलग है कि एक चुनाव सम्पन्न होने और अगले चुनाव सिर पर आ जाने के बीच का जो अंतराल है उसमें इन घोषणाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। कथनी और करनी के इस फर्क को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष ने अपनी ओर से वैधानिकता भी प्रदान कर दी है। अमित शाह की स्वीकारोक्ति गौरतलब है कि चुनावी घोषणाएं जुमलेबाजी होती हैं। मुझे रहीम कवि का दोहा याद आ रहा है-
काज परै कछु और है, काज सरे कछु और।
रहिमन भंवरी के भए, नदी सिरावत मौर।।
जैसे विवाह सम्पन्न होने के बाद मौर की उपयोगिता समाप्त हो जाती है वैसे ही चुनावों के बाद घोषणापत्र भी निरर्थक हो जाता है।  फिर भी इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह एक बौद्धिक व्यायाम तो है ही। आम जनता से वोट बटोरने के लिए जो हथकंडे अपनाए जाते हैं वह एक अलग आख्यान है, किन्तु चुनावों के समय हर वर्ग को संतुष्ट करने की कोशिश राजनीतिक दल करते हैं और चुनावी घोषणापत्र की सीमित उपयोगिता इस संदर्भ में बन जाती है। अपने आपको प्रजातंत्र का प्रहरी मानने वाले बुद्धिजीवी राजनीतिक पार्टियों पर जोर डालते हैं कि वे आने वाले दिनों के लिए एक दृष्टिपत्र घोषित करें। इस वर्ग को खुश रखने के लिए नेतागण उनकी बात मान लेते हैं और बड़े-बड़े वायदे हो जाते हैं। गो कि आगे जो होना होता है वही होता है।
घोषणापत्र मुझ जैसों को आश्वस्त करता है कि जिसकी सरकार बनेगी वह अपने किए वायदों पर अमल करेगी और अगर नहीं करेगी तो उस पर वादाखिलाफी का अपराध सिद्ध किया जा सकेगा। लेकिन हाल के दिनों में यह विश्वास  टूटने लगा है। इसका प्रमाण हमें वर्तमान में चल रहे विधानसभा चुनावों के दौर में बखूबी मिल रहा है। दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा के नेता लगातार आरोप-प्रत्यारोप में उलझे हुए  हैं। बड़े-बड़े नेता आते हैं, भाषण देकर चले जाते हैं। भाषण सुनने के लिए भीड़ जुटाई जाती है, लेकिन कुल मिलाकर क्या होता है? एक-दूसरे पर छींटाकशी, व्यक्तिगत लांछन, सच्चे-झूठे आरोप, अभद्र भाषा का प्रयोग, गाली-गलौज तक की नौबत इसी में सारी मेहनत लग रही है। पत्रवार्ताएं होती हैं तो उनमें भी बुनियादी मुद्दों पर सवाल नहीं पूछे जाते। 
फिर भी मन है कि मानता नहीं। पत्रकार होने के नाते दूरदराज से जनता की आशा-आकांक्षा की तस्वीरें देखने मिलती हैं। उन्हें देखकर मन में विचार उठता है कि अगर मैं राजनीति में होता तो जनता के लिए क्या करता। दोनों पार्टियों के घोषणापत्रों में बहुत अच्छी-अच्छी बातें अवश्य होंगी जो बहुत जल्दी जुमलों में बदल जाएंगी, लेकिन आम जनता को अपने तईं भी सोचने की आवश्यकता है कि सुखी भविष्य के लिए उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं? उसके लिए नितांत आवश्यक है कि वह तटस्थ भाव से परिस्थितियों का आकलन कर अपनी सामूहिक आकांक्षाओं को समेटते हुए एक ऐसा दृष्टिपत्र या रोडमैप तैयार करे जिस पर अमल करने के लिए वह किसी दिन अपने चुने हुए, लेकिन गुमराह हुक्मरानों को बाध्य कर सके।
अपने प्रदेश छत्तीसगढ़ के बारे में सोचते हुए मेरे ध्यान में निम्नलिखित बिन्दु आते हैं जो शायद ऐसे किसी एक मुकम्मल घोषणापत्र का हिस्सा बन सकें। इनमें से अनेक बिन्दु शायद अन्य राज्यों की जनता के भी काम में आएं! 
1.     सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता प्राथमिक शिक्षा और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराना है।
2.     प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य हासिल करने के लिए शिक्षा का अधिकार कानून को ईमानदारी से लागू करना। 
3.     प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत शिक्षा, जिसका बड़ा हिस्सा प्राथमिक शिक्षा पर खर्च।
4.     तमाम प्राथमिक शालाएं सरकार के अधीन और उनमें पूर्णकालिक प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति।
5.     निजी स्कूलों को सरकार से किसी भी तरह की कोई रियायत नहीं। कोई भी मंत्री, अधिकारी निजी स्कूलों का कोई निमंत्रण स्वीकार नहीं करेंगे।
6.     प्रदेश में जितने प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और उपकेन्द्रों की आवश्यकता होगी उतने खोले जाएंगे।
7.     स्वास्थ्य सेवाओं पर सकल घरेलू उत्पाद का तीन प्रतिशत खर्च।
8.     हर ऐसे बड़े गांव में सरकारी कर्मचारियों के लिए आवासीय संकुल  जहां से वे अधिकतम पांच किलोमीटर की दूरी तक जाकर अपनी सेवाएं दे सकें। इन आवासीय संकुलों में उनके लिए सभी आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी ताकि वे शहर की ओर बार-बार भागने की न सोचें।

9.      डॉक्टरों की पदस्थापना में रोस्टर पद्धति का पालन  ताकि हर डॉक्टर अपनी आयु, अनुभव और आवश्यकता के अनुरूप उपस्वास्थ्य केंद्र से शुरू कर बड़े अस्पताल तक पहुंच कर अपनी सेवाएं दे सकें।
10.     शिक्षकों, डॉक्टरों और शिक्षा-स्वास्थ्य से जुड़े अन्य पदों पर रिक्त तमाम पदों पर प्राथमिकता के आधार पर भर्ती। 
11.     प्रदेश की नदियों व जलाशयों के सुचारु प्रबंध के लिए नदी पंचायत व अन्य संस्थाओं का गठन जिसमें जनता स्वयं जल संरक्षण, जल  संवर्धन व जल आपूर्ति के बारे में सूझबूझ के साथ खुद फैसले ले सके।
12.     जल के अविरल व निर्मल प्रवाह के लिए पांच-पांच, दस-दस किलोमीटर की दूरी पर बने स्टापडेम योजनाबद्ध तरीके से खत्म करना।
13.     जिन पर्वतों, पहाड़ियों से वर्षा जल नीचे उतरता है वहां प्राथमिकता से वृक्षारोपण। 
14.     जनता के साथ खुले संवाद के माध्यम से प्रदेश की खनिज सम्पदा व वन सम्पदा के दोहन की नई नीति।
15.     गांवों में स्थित चरागान आदि सामुदायिक भूमि तथा शहरों में तालाब, मैदान, बगीचे की भूमि किसी भी सूरत में अन्य उपयोग के लिए नहीं।
16.     प्रदेश में सार्वजनिक यातायात सेवा का अधिकतम विस्तार तथा निजी वाहनों की बढ़ती संख्या रोकने के लिए उचित उपाय।
17.     रोजगार के अधिकतम अवसर हेतु हाथकरघा व कुटीर उद्योगों को प्राथमिकता के साथ संरक्षण।
18.     हमारा प्रदेश आदिवासी बहुल है। यहां कृषक और श्रमजीवी समुदाय की बहुतायत है। हर हाल में इनका हित संरक्षण।
19.     पंचायतीराज कानून व पेसा कानून को संविधान की भावना के अनुरूप लागू करना।
20.     हर ग्राम में धान भंडारण, पंचायत के माध्यम से धान की मिलिंग, जिससे किसान को उचित मूल्य मिल पाए।
21.     हर ग्राम में गौशाला परिसर का निर्माण। बायोगैस से बिजली उत्पादन व सड़कों पर आवारा मवेशियों पर रोक।
22. विश्वविद्यालयों को संपूर्ण स्वायत्तता।
यह घोषणापत्र आधा-अधूरा है। इसमें बहुत से बिन्दु अभी जोड़ना बाकी है। संभव है कि अगले लेख में उसके विवरण आएं! इस बीच पाठकगण भी अपने सुझाव भेज सकते हैं।
 देशबंधु में 01 नवंबर 2018 को प्रकाशित 

Wednesday, 24 October 2018

कन्फ़्यूज़न जारी है

                            
छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री और वर्तमान में जोगी कांग्रेस के सुप्रीमो अजीत जोगी ने विधानसभा चुनावों के काफी पहले जोर-शोर से घोषणा की थी कि वे राजनांदगांव क्षेत्र से मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे।  लेकिन फिर न जाने क्या हुआ कि उन्होंने विधानसभा चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया। कारण यह बताया कि वे एक जगह बंधे रहने के बजाय पूरे प्रदेश में घूम-घूम कर अपने उम्मीदवारों के लिए प्रचार करेंगे। इस दूसरी खबर की स्याही सूखी भी न थी कि उनके अपनी पुरानी सीट मरवाही से चुनाव लड़ने की सुगबुगाहट  प्रारंभ हो गई। अब एक दिलचस्प स्थिति सामने है। पत्नी श्रीमती रेणु जोगी कोटा क्षेत्र से कांग्रेस टिकट की आस लगाए बैठी हैं। पुत्र और डीफैक्टो सुप्रीमो अमित जोगी के मनेन्द्रगढ़ से लड़ने की अटकलें लग रही हैं और पुत्रवधु ऋचा जोगी के अकलतरा से बसपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने की घोषणा हो चुकी है।
मैंने पिछले सप्ताह छत्तीसगढ़ के चुनावी मैदान में जिस भारी  कन्फ़्यूज़न का उल्लेख किया था वह इस प्रकरण से प्रमाणित हो रहा है। लेकिन यह कुहासा सिर्फ जोगीजी के कारण नहीं है और छत्तीसगढ़ तक सीमित भी नहीं है। छत्तीसगढ़ में जब कांग्रेस ने पहले चरण की बारह सीटों पर उम्मीदवारी घोषित कर दी तो मीडिया के साथियों को लगा कि कांग्रेस ने बाजी मार ली है, किन्तु दो दिन बाद भारतीय जनता पार्टी ने एकमुश्त सतत्तर उम्मीदवार घोषित कर दिए तो क्या इसे भाजपा का बाजी मार लेना कहा जाएगा? क्योंकि कांग्रेस ने अभी तक दूसरे चरण के उम्मीदवारों की सूची प्रकट नहीं की है। यदि कांग्रेस ने पहले चरण में राजनांदगांव सीट पर ऐन मौके तक सस्पेंस बनाए रखा तो भाजपा के बारे में संशय बरकरार है कि बची बारह सीटों पर उसने अभी तक प्रत्याशियों के नाम रोककर क्यों रखे? कुल मिलाकर चुनावी विश्लेषकों के लिए भ्रम से भरपूर लेकिन रोचक स्थिति है।
खैर! जिन्हें दूर से बैठकर तमाशा देखना है उन्हें तो हर उथल-पुथल में मसाला मिल जाता है परन्तु जिनका राजनीतिक कॅरियर दांव पर लगा हो उनके लिए स्थितियां रोचक न होकर दुखदायी बन गई प्रतीत होती हैं। जैसे भाजपा के अधिकतर नेता और कार्यकर्ता अभी तक समझ नहीं पा रहे हैं कि पार्टी ने प्रत्याशी चयन में अपेक्षित बेरहमी क्यों नहीं दिखाई या जुमलेबाजी का इस्तेमाल करूं तो सर्जिकल स्ट्राइक क्यों नहीं की? दो साल पहले दिल्ली के तीन नगर निगमों के चुनाव हुए थे तो भाजपा ने पूरे दो सौ सत्तर से अधिक उम्मीदवारों को बदल डाला था जिसका वांछित परिणाम भी विजय के रूप में उन्हें मिला। यही उम्मीद छत्तीसगढ़ में की जा रही थी, लेकिन ऐसा लगता है कि ऐन वक्त पर पार्टी नेतृत्व के हाथ-पैर कांप गए। उसे शायद लगा कि पुराने उम्मीदवारों पर भरोसा करना ही बेहतर होगा! कम से कम इससे पार्टी में बगावत नहीं होगी।
भाजपा छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में पन्द्रह साल से सत्तारूढ़ है। जहां गुड़ है वहां चींटे पहुंचेंगे ही। एक समय जो बात कांग्रेस के बारे में कही जाती थी वह अब भाजपा पर लागू हो रही है कि समर्पित कार्यकर्ता जीवनभर दरियां उठाते-बिछाते रहेंगे और चतुर लोग सेंधमारी कर खजाना पा जाएंगे। इधर राजनीतिक शब्दावली में एक नई संज्ञा प्रचलन में आ गई है। लोग विरोध जताने लगे हैं कि पैराशूट उम्मीदवार नहीं चलेगा। इन्हें पहले बाहर से थोपे हुए प्रत्याशी कहकर विरोध होता था। छत्तीसगढ़ भाजपा में फिलहाल ऐसे उम्मीदवारों को लेकर घमासान मचा है। साथ-साथ पार्टी के अनेक पुराने कार्यकर्ता भी जो आस लगाए बैठे थे अब कहीं दुख, तो कहीं क्रोध जाहिर कर रहे हैं। यह स्थिति मुझे भी अटपटी लगती है कि भाजपा अनेक सीटों पर जनता से खारिज किए गए, पिटे हुए मोहरों पर दांव क्यों लगा रही है। चुनाव न हुआ, कबड्डी का खेल हो गया कि जिसमें 'मरा' हुआ खिलाड़ी फिर जीवित हो जाता है। 
छत्तीसगढ़ में अभी कांग्रेस की शेष बहत्तर सीटों पर प्रत्याशियों की सूची आना बाकी है। उसके आने के बाद ही पता लगेगा कि चुनावी मुकाबला क्या  शक्ल लेता है। मैं समझता हूं कि असंतुष्टों की संख्या वहां भी कम नहीं होगी जिसकी कुछ-कुछ सुगबुगाहट अभी से सुनने मिल रही है। बस्तर में तो दंतेवाड़ा सीट पर मां देवती कर्मा के खिलाफ पुत्र छबिन्द्र कर्मा ताल ठोंक कर मैदान में आ गए हैं।  इसे प्रदेश भाजपा के एक बड़े नेता ने कांग्रेस की संस्कारहीनता निरूपित किया है। इन नेताजी को याद कर लेना चाहिए कि भाजपा की राष्ट्रीय नेता श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के विरोध में उनके सुपुत्र माधवराव सिंधिया खुलकर मैदान में आ गए थे और आज बुजुर्ग यशवंत सिन्हा एक तरह से अपने पुत्र के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। यह मामला पारिवारिक संस्कारों का नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छा, अवसर और प्राथमिकता का है। वैसे इतिहास के पन्ने पलटें तो ज्ञात होता है कि मेवाड़ के राजा व कुंभलगढ़ के निर्माता राणा कुंभा की हत्या उनके ही बेटे उदय सिंह ने मंदिर में पूजा करते समय कर दी थी। 
छत्तीसगढ़ के साथ-साथ थोड़ी बात मध्यप्रदेश की कर लें क्योंकि कन्फ़्यूज़न वहां भी कम नहीं है। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पिछले दिनों कार्यकर्ताओं के बीच खुली घोषणा की कि वे चुनाव प्रचार में हिस्सा नहीं लेंगे क्योंकि उनके कारण कांग्रेस के वोट कटते हैं। इस कथन का क्या अर्थ निकाला जाए? मैंने एक बार पहले भी लिखा है कि दिग्विजय जो कहते हैं उसका अर्थ निकालना अक्सर संभव नहीं होता। वे इस बयान के माध्यम से एक सच को स्वीकार कर रहे थे, या अपनी पीड़ा को वाणी दे रहे थे कि उन्हें चुनाव प्रचार से दूर रखा गया है, या फिर चेतावनी दे रहे थे कि उनकी उपेक्षा हुई तो यह पार्टी के हित में नहीं होगा! उनके एक वाक्य के तीन अलग-अलग मतलब तो मैं निकाल रहा हूं। हो सकता है कि असली मंतव्य कुछ और हो। मुझे ध्यान आता है कि 1998 में दुबारा मुख्यमंत्री बने दिग्विजय सिंह स्वयं को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखने लगे थे। उनके बारे में मीडिया में तो कम से कम यही प्रचार होता था। उनके ताजा बयान को लेकर भी मीडिया का एक हिस्सा उनकी मदद के लिए सामने आ गया है। कहीं अखबार में, तो कहीं यू-ट्यूब पर विश्लेषण हो रहा है कि दरअसल राहुल गांधी ने ही उन्हें गुपचुप तरीके से कार्यकर्ताओं को संगठित करने और उनमें नए सिरे से उत्साह का संचार करने की जिम्मेदारी दी है। यह सच्चाई भी हो सकती है या शायद डेमेज कंट्रोल की कवायद भी। वैसे मध्यप्रदेश तो नहीं, छत्तीसगढ़ के अधिकतर कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह के अनुयायी हैं। राहुल गांधी ने उन्हें यहां का काम सौंपा होता तो उनके मार्गदर्शन में कांग्रेस को उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करने का अवसर मिल जाता। हो सकता है कि वे दूरसंचार से ही अपने साथियों का मनोबल बढ़ा रहे हों!
मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के साथ-साथ मिजोरम और तेलंगाना में भी चुनाव हो रहे हैं। यह दिलचस्प तथ्य है कि तेलंगाना में कांग्रेस, चन्द्राबाबू नायडू की टीडीपी और भाकपा याने सीपीआई ने संयुक्त मोर्चा बना लिया है। तेलंगाना में कभी केसीआर कांग्रेस के सहयोगी थे। राज्य बनने के बाद उम्मीद थी कि वे कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाएंगे, लेकिन वे तो देखते ही देखते कांग्रेस के दुश्मन बन गए। यह क्यों हुआ समझ नहीं पड़ता। यह अवश्य ध्यान आता है कि कांग्रेस द्वारा बनाए गए राज्यपाल ई.एस.एल. नरसिम्हन ऐसे अकेले राज्यपाल हैं जो मोदी सरकार में भी पिछले चार साल से बने हुए हैं। वे आज देश के सबसे वरिष्ठ राज्यपाल हैं। तेलंगाना जाने से पहले वे छत्तीसगढ़ में थे। यह भी ध्यान आता है कि आनंदीबेन पटेल मध्यप्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़ का प्रभार भी संभाल रही हैं। यह अनूठा संयोग है कि श्री नरसिम्हन आंध्र व तेलंगाना दोनों के राज्यपाल हैं और श्रीमती पटेल मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की। इन दोनों प्रांतों में नए राज्यपाल क्यों नहीं नियुक्त हुए, इसका चुनाव से शायद कोई लेना-देना नहीं है!
 देशबंधु में 25 अक्टूबर 2018 को प्रकाशित 

Wednesday, 17 October 2018

जो हुकुम सरकार

                                            
आसन्न विधानसभा चुनावों के संदर्भ में अन्यत्र प्रकाशित इस टिप्पणी का जायजा लीजिए- ''इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले कांग्रेस पार्टी की साख दांव पर लगी है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस प्रतिपक्ष में है। यहां उसे अपनी ताकत सिद्ध करना होगी, अगर वह नहीं जीत पाती है तो उसके सितारे गर्दिश में चले जाएंगे। अगर इन राज्यों में भाजपा हारती है तो भी उसे कोई नुकसान नहीं होगा। 2019 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व के सामने कोई चुनौती नहीं होगी।'' देश के एक प्रमुख अंग्रेजी समाचारपत्र में एक वरिष्ठ महिला पत्रकार ने विधानसभा चुनावों को लेकर लगभग इन्हीं शब्दों में अपनी राय व्यक्त की है। यह शब्दश: अनुवाद नहीं है, लेकिन लेख की भावना यही है। मैंने विगत एक सप्ताह में इस टिप्पणी का सिर-पैर खोजने की खूब कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाया।
जो बात कुछ-कुछ पल्ले पड़ती है, वह बस इतनी ही कि विद्वान पत्रकार ने मोदीजी को पहले से क्लीन चिट दे दी है। कांग्रेस अगर जीते तो यह उसकी किस्मत पर उसका आगामी आम चुनावों में कोई असर नहीं पड़ेगा। यदि कांग्रेस हार जाए तो यह उसके नेतृत्व की विफलता होगी। मुझे दिल्ली में बैठे पत्रकारों द्वारा इस तरह से किए जा रहे विश्लेषणों को देखकर हैरान होना चाहिए लेकिन मैं हैरान नहीं हूं। आखिरकार बिहार में अपनी करारी हार को भारतीय जनता पार्टी ने दो साल बीतते न बीतते विजय में बदल लिया। गोवा में स्पष्ट रूप से हारने के बावजूद वहां भाजपा की सरकार बन गई और बच भी गई। गुजरात में पिछले पच्चीस साल में सबसे कम अंतर से जीतने के बावजूद भाजपा के तेवरों में कमी नहीं आई। कर्नाटक में पराजय का सामना करना पड़ा। और हां, सबसे पहले तो दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने शिकस्त दी। इन सबसे अविचलित रहकर भाजपा की यात्रा कुछ इस तरह से चल रही है मानो भीड़ भरी तंग सड़क पर कोई बाइक सवार आजू-बाजू से किसी न किसी उपाय से पतली गली खोजकर दूसरों को पीछे छोड़ अपनी बाइक आगे निकाल ले जाए। इस दु:साहस के चलते किसी का सिर फूटे, किसी की गाड़ी टकराए, किसी पैदल चलते को चोट आए तो उसकी बला से। हम तो आगे निकल गए।
यह हम अपने अनुभव से जानते हैं कि सत्ताधीशों को जो पसंद न आए, वह बात नहीं लिखना चाहिए। राजनीति विचार केन्द्रित न होकर व्यक्ति केन्द्रित हो चुकी है। मैं इस बात को बार-बार दोहराता हूं यद्यपि इसका कोई लाभ नहीं है। आज की राजनीति में सत्ता पा लेना ही सर्वोपरि है और उसमें नेताओं की आलोचना करने के अलावा बाकी सब जायज है। अक्सर अंग्रेजी कहावत का हवाला दिया जाता है कि प्रेम और युद्ध में सब कुछ जायज है। पूछना चाहिए एकतरफा प्रेम या महज आकर्षण में जो कुछ किया जाता है क्या वह भी जायज है? फिर #मीटू जैसी धारणा क्यों जन्म लेती है? पूछना यह भी चाहिए कि क्या चुनावों की तुलना युद्ध से करना सही है? मीडिया ने तो शायद ऐसा ही मान रखा है। रणक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, महासंग्राम, रणभेरी जैसी संज्ञाओं का प्रयोग होता है फिर भले ही उसका मकसद टीआरपी बढ़ाना क्यों न हो। ध्यान दीजिए कि क्रिकेट के खेल में भी इसी शब्दावली का प्रयोग किया जाता है। अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि पत्रकारों के सामने भाषा का संकट है। वे नहीं जानते कि कैसे विषय के अनुकूल भाषा का निर्माण और शब्दों का प्रयोग करें।
खैर! जब चुनावों की तुलना युद्ध से करते हैं तो हमारे सोचने का नजरिया भी बदल जाता है। आज के सत्तालोलुप नेताओं को यह स्थिति बहुत रास आती है। उन्हें विरुदावलि गाने वालों की जरूरत पड़ती है। पृथ्वीराज चौहान के पास चंद बरदाई थे जिन्हें हिन्दी साहित्य के वीरगाथा काल का प्रथम महाकवि माना जाता है। इस इक्कीसवीं सदी में जनता के वोटों से विजयी या पराजित नेताओं के दरबार में सामंतकालीन कवियों का स्थान पत्रकारों ने ले लिया है। उनमें से जो महाकवि बनने की योग्यता हासिल कर लेते हैं उन्हें या तो राज्यसभा में जगह मिल जाती है या फिर वे किसी नवरत्न कंपनी के डायरेक्टर, एडवाइजर वगैरह भी बन सकते हैं। जो नेता जितना बड़ा, उसके द्वारा दी गई मोतियों की लड़ी भी उतनी ही महंगी। जो इतने ऊंचे नहीं पहुंच पाते वे अपनी-अपनी काबिलियत के मुताबिक  इनाम- इकरार पा जाते हैं। जिन्हें ड्योढ़ी चढ़ना कबूल नहीं है, वे अपने घर में बैठे रहते हैं; सोशल मीडिया पर टिप्पणियां लिखकर अपने मन का गुबार हल्का कर लेते हैं। गो कि खतरा वहां भी कम नहीं है। जब युद्ध चल रहा है तो फिर जो हमारे साथ नहीं हैं वह हमारा दुश्मन ही तो कहलाएगा! रावण के दरबार से सगे भाई विभीषण को भी निकलना पड़ा था, फिर बाकी की तो बिसात ही क्या?
बहरहाल अभी जो चुनाव होने जा रहे हैं उनके परिप्रेक्ष्य में मुझे रामायण का कम, महाभारत का ज्यादा ध्यान आ रहा है। रामायण में मोटे तौर पर राम और रावण दोनों के पक्षों का विभाजन लगभग स्पष्ट था। जबकि महाभारत में शुरू से, बोलचाल की भाषा में कहूं तो, भारी कन्फ्यूजन था। पहले तो अर्जुन ही रणक्षेत्र में उतरने को तैयार नहीं थे; फिर कृष्ण एक तरफ और उनकी सेना दूसरी तरफ; मद्र देश से नकुल-सहदेव के मामा शल्य भांजों की मदद के लिए आ रहे थे तो दुर्योधन ने उन्हें रास्ते में ही छेंककर अपने पक्ष में लड़ने का वचन ले लिया, उसके आगे का किस्सा शल्य-कर्ण संवाद में है; भीष्म पितामह लड़ रहे थे कौरवों की तरफ से, लेकिन अंत समय में उपदेश सुनाने का पल आया तो वहां अर्जुन उपस्थित थे। आजकल के चुनावों में इसी तरह के दृश्य देखने मिलते हैं।
2014 के लोकसभा चुनावों के ऐन वक्त पर  कांग्रेस के कितने ही धुरंधर नेता भाजपा में चले गए थे। गोवा विधानसभा चुनावों में भी वही हुआ, मेघालय में भी, और तेलंगाना की कहानी क्या कम रोचक है। मैं छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बैठकर अपने आसपास देखता हूं तो समझ नहीं आता कि क्या हो रहा है। मैं अपनी ही बात क्या करूं, हमारे प्रदेश के मतदाता भी उलझन में हैं कि माजरा क्या है? फिल्म ''जाने भी दो यारो'' का वह दृश्य मुझे याद आता है जब चलते नाटक के बीच अफरातफरी मच जाती है और नेत्रहीन पात्र बार-बार पूछता है- कोई बताएगा मुझे, क्या हो रहा है? मैं अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए कुछ बिन्दु सामने रखना चाहता हूं जो विभिन्न वर्गों के लोगों से चर्चा करने के बाद समझ पड़े हैं-
1.     मतदाता चाहता है कि रमन सिंह मुख्यमंत्री बने रहें, लेकिन भारतीय जनता पार्टी चुनाव हार जाए। पन्द्रह साल के राज से जनता थक  गई है।
2.     कांग्रेस चुनाव जीत जाए, लेकिन मुख्यमंत्री कौन हो, यह किसी को समझ में नहीं आ रहा है। विद्वान, विश्लेषक कहते हैं कि कांग्रेस के पास रमन सिंह के मुकाबले में कोई चेहरा नहीं है। लेकिन क्या 2003 में भाजपा के पास अजीत जोगी के मुकाबले कोई चेहरा था?
3.    'आप' पार्टी किस इरादे से मैदान में उतरी है और उसके रहने से किसे लाभ होगा? युवा 'आप' नेता संकेत ठाकुर की हालिया जेल यात्रा के पीछे भी क्या कोई योजना थी?
4.     अजीत जोगी किसके लिए लड़ रहे हैं? खुद के लिए, परिवार के सदस्यों के लिए, कांग्रेस के बुनियादी मूल्यों को बचाने के लिए या भाजपा की मदद करने के लिए?
5.     जोगी कांग्रेस और बसपा का गठबंधन किन शर्तों पर हुआ है और किसकी प्रेरणा या दबाव से हुआ है?
6.     जोगी कांग्रेस और सीपीआई के गठजोड़ की क्या उपयोगिता है? सीपीआई के सैकड़ों कार्यकर्ता जिस पुलिस अधिकारी के हाथों प्रताड़ित हुए वह तो जोगीजी के लिए पुत्रवत था। फिर क्या हुआ?
7.     रामदयाल उइके को कैसे प्रेरणा मिली कि उन्हें घर वापिस आ जाना चाहिए?
8.     एक बात जो लोग खुलकर कह रहे हैं कि भाजपा पानी की तरह पैसे बहाएगी जबकि कांग्रेस  के सामने अर्थ संकट है। इस कॉलम के छपने तक प्रथम चरण के चुनाव के टिकट शायद घोषित हो जाएंगे लेकिन इन सवालों के जवाब इतने जल्दी नहीं मिलेंगे। इसलिए हम जैसे पत्रकारों के लिए यही उचित है कि चुनाव यदि युद्ध है तो वर्तमान सत्ता के विरुद्ध न लिखें। मतदाता जिस दिन निर्णय कर देगा उस दिन हम भी निश्चिंत होकर विश्लेषण करेंगे। 
 देशबंधु में 18 अक्टूबर 2018 को प्रकाशित 

Sunday, 14 October 2018

लछमनिया का चूल्हा: आदिवासी जीवन की प्रामाणिक कवितायेँ

             
छत्तीसगढ़ के बारे में मशहूर है कि यहां का बयालीस प्रतिशत भूभाग वनों से आच्छादित है। इस आंकड़े पर हम अभी बहस नहीं करेंगे। यह भी सर्वविदित है कि यहां की लगभग बत्तीस प्रतिशत आबादी विभिन्न जनजातियों की है। उनमें विलुप्तप्राय जनजातियां यथा- बैगा, कमार, पहाड़ी कोरवा आदि भी हैं। नागर दृष्टि के लिए आदिवासी समाज कौतुक का विषय है या फिर हाल के वर्षों में भय का। एक समय था जब बस्तर या तो कालापानी था या आदिम वासना का उत्सव। प्रदेश का दक्षिणी भाग याने बस्तर अनेक कारणों से चर्चा में रहा है, लेकिन आदिवासी तो प्रदेश की चारों दिशाओं में बसे हुए हैं। उत्तर छत्तीसगढ़ अर्थात सरगुजा, जशपुर के आदिवासी जनजीवन पर जिज्ञासुओं का ध्यान बहुत अधिक नहीं गया है। यद्यपि राजनैतिक कारणों से उसके बारे में भी चर्चाएं होती रहती हैं।
साहित्य जगत में बस्तर को स्थापित करने में महती भूमिका निभाई सुप्रसिद्ध कथाकार शानी ने। वे बस्तर के ही रहने वाले थे। उनका लघु उपन्यास कस्तूरी 1961 में पॉकेट बुक की शक्ल में प्रकाशित हुआ था। बाद में किसी और शीर्षक से उसका नया संस्करण भी छपा। लेकिन कस्तूरी से ज्यादा, बल्कि उनकी कहानियों से ज्यादा शानी को जो ख्याति मिली वह उनके उपन्यास शाल वनों का द्वीप और काला जल के कारण। दूसरी ओर सरगुजा अंचल को केन्द्र में रखकर तेजिंदर ने अपना उपन्यास काला पादरी लिखा। इस उपन्यास की भी पर्याप्त चर्चा हुई। कुछ ही समय पहले तेजिंदर की असमय मृत्यु के बाद इस उपन्यास पर पाठकों का ध्यान फिर गया है। दिलचस्प तथ्य है कि शानी और तेजिंदर दोनों गैर-आदिवासी हैं। यह उनकी गहरी संवेदना और दृष्टि थी जिसने उन्हें अपने प्रदेश के आदिवासी समाज का अध्ययन करने प्रेरित किया।
यहीं आकर एक बड़ी कमी खटकती है कि क्या आदिवासी बहुल प्रदेश में एक भी आदिवासी लेखक नहीं हुआ! यह एक सच्चाई है। पड़ोसी आदिवासी प्रदेश झारखंड को देखते हैं तो यह कमी और शिद्दत से उभर कर सामने आती है। कहना शायद गलत नहीं होगा कि लंबे समय तक छत्तीसगढ़ में न राजनीति, न अर्थचिंतन, न शिक्षा जगत, न पत्रकारिता और न साहित्य में ही आदिवासी समुदायों से कोई प्रखर प्रतिनिधि सामने आया। लेकिन स्थितियां बदल रही हैं। अन्य क्षेत्रों की चर्चा करना यहां शायद प्रासंगिक न हो, किन्तु यह देखकर प्रसन्नता होती है कि साहित्य के क्षेत्र में आदिवासी प्रतिभाएं अपनी पहचान कायम कर रही हैं। झारखंड में वंदना टेटे, निर्मला पुतुल और अनुज लुगुन जैसे नाम विगत कुछ वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित और स्थापित हुए हैं। छत्तीसगढ़ में भी कम से कम दो नाम मेरे देखने-पढऩे में आए हैं।
अन्ना माधुरी तिर्की की कविताएं कविता छत्तीसगढ़ शीर्षक संग्रह में संकलित हैं। सतीश जायसवाल द्वारा संपादित यह संकलन 2011 में प्रकाशित हुआ था। इसमें सुश्री तिर्की की दस कविताएं ली गई हैं। यह स्वयं मेरे लिए अचरज का विषय है कि मैंने उनकी कोई कविता इस संकलन के आने के पहले नहीं पढ़ी थी। मैं उनके नाम से भी परिचित नहीं था। वे शायद लंबे समय से भोपाल निवासी हैं इसलिए भी उन्हें शायद कभी जानने का मौका नहीं मिला। उनकी कविताओं में मुझे अच्छी संभावनाएं दिखी थीं, लेकिन इसे मैं अपनी ही कमी मानूंगा कि इस संकलन के बाद  उनकी कोई रचना मेरे देखने में नहीं आई। बहरहाल सतीश जायसवाल ने हिन्दी जगत से उन्हें परिचित कराया; इसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं।
इस बीच सरगुजा की विश्वासी एक्का का पहला कविता संकलन लछमनिया का चूल्हा इसी साल प्रकाशित हुआ है। इसमें साठ कविताएं हैं। विश्वासी कहानियां भी लिखती हैं और उनका कहानी संग्रह एक साल पहले ही प्रकाशित हुआ है। लछमनिया का चूल्हा  की कविताएं आदिवासी जीवन में आंतरिक और बाह्य दोनों स्तरों पर हो रहे जीवन संघर्ष को उद्घाटित करती हैं। आदिवासी समाज से उसके पारंपरिक अधिकार छीने गए हैं, उसकी परंपराओं का अनादर किया गया है, उसे एक कौतुहल की वस्तु के रूप में देखा गया है, अनेक प्रकारों से छला और वंचित किया गया है। नागर समाज ने वर्चस्ववादी शक्तियों में आदिवासी के साथ जो क्रूर बर्ताव किया है उसके प्रामाणिक ब्यौरे इन कविताओं में मिलते हैं और उसके बाह्य संघर्ष को सामने लाते हैं।
दूसरी ओर आदिवासी जनजीवन के जो अपने अंतर्विरोध हैं उन्हें चित्रित करने में भी कवयित्री ने कोई संकोच नहीं किया है। संकलन की पहली कविता बिरसो में ही यह अंतर्विरोध अंकित हुआ है। सामान्य समझ है कि आदिवासी समाज में स्त्री-पुरुष के बीच समानता और परस्पर सम्मान का भाव है। इसे एक आदर्श उदाहरण के तौर पर संगोष्ठियों में रखा जाता है, लेकिन बिरसो में एक आजी है जो साही के कांटे से श्रृंगार करती हैं और जब आजा उसे मारने दौड़ते हैं तो आजी साही के कांटों को अपना अस्त्र बना लेती है। यहां एक मिथक के टूटने की हल्की सी ध्वनि सुनाई देती है। बदला  शीर्षक कविता में एक अन्य स्थिति का वर्णन है जहां आदिवासी फिल्म के परदे पर नायक से खलनायक को पिटते देख खुश होकर अपनी तकलीफ और बेबसी को भूल जाते हैं मानो वे किस्मत के सामने आत्मसमर्पण कर रहे हैं। दो अन्य कविताएं मतवाले  तथा तकलीफ होती है मुझे भी, में पराजय स्वीकार कर लेना जैसा भाव प्रकट होता है।
इन कुछ कविताओं में विश्वासी एक्का ने अपने समाज की आंतरिक विसंगतियों का बेबाकी से लेकिन गहरी उदासी के साथ चित्रण किया है। संकलन की अन्य कविताएं तथाकथित सभ्य समाज द्वारा आदिवासी जनजीवन पर दिन-प्रतिदिन किए जा रहे चौतरफा हमलों के विरोध में लिखी गई हैं। सरगुजा, जशपुर के अंचल में ईब आदि नदियों में सोने के कण मिलते हैं जिन्हें हासिल कर कितने ही चतुर सुजान लखपति-करोड़पति बन गए हैं। विश्वासी की कविता की नायिका भी नदी की बालू को छानकर सोने के कण बीनना चाहती है, लेकिन उसकी नियति में तो गरीबी की फसल काटना लिखा है। उसके लिए खुशियां रूई के ढेर जैसी हैं कि वह हाथकरघे से बुनी एक पारंपरिक साड़ी खरीदने के लायक भी कमाई नहीं कर पाती।
मंगरू की उलझन  कविता एक और मिथक को तोड़ती है। कुछ साल पहले तक माना जाता था कि आदिवासी पलायन नहीं करता, लेकिन स्थितियां बदल गई हैं। मंगरू का बेटा बंबई में समुद्र से रेत निकालने की मजदूरी कर रहा है जो शायद कोई पांच सितारा होटल खड़़ा करने में काम आएगी। लेकिन वह हमेशा अनाम रहा आएगा। बूढ़ा होता मंगरू हांफने लगता है और उसके हिलते हुए होंठों से शब्द नहीं फूटते। भूख कहां  कविता एक कारुणिक चित्र प्रस्तुत करती है। भूख से पीडि़त बुधना इस कविता का नायक है जो शेर की निगाह चुराकर उसका अधखाया शिकार अपने खाने के लिए उठा लाता है। गांव में उसकी बहादुरी के चर्चे हो रहे हैं, लेकिन बुधना गुमसुम हो गया है।
हम जानते हैं कि कर्ई वर्षों से विकास के नाम पर आदिवासी अंचलों में प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध उत्खनन हो रहा है। झारखंड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती इलाकों में इसका व्यापक असर पड़ा है। जिन जंगलों में हाथियों का प्राकृतिक वास था वे उनसे छिन गए हैं। हाथी जाएं तो कहां जाएं? वे कभी नेशनल हाईवे पर सड़क पार करते मारे जाते हैं, कभी रेल की पटरी पर कट जाते हैं। विगत बीस वर्षों में हाथियों ने छत्तीसगढ़ का रुख किया है जिसके चलते स्थानीय निवासियों, जिनमें आदिवासियों की बड़ी संख्या है, का जीना मुहाल हो गया है। वे खड़ी फसल उखाड़ देते हैं, सामने आए लोगों को कुचल देते हैं, सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ सी रही आती है। गजदल कविता बताती है कि गांव के लोग किस तरह हाथियों से खुद को बचाने के लिए क्या-क्या उपाय करते हैं, लेकिन कोई स्थायी हल अभी तक खोजा नहीं जा सका है। 
बंधी रह गई गठरी  दैनंदिन जीवन में आ रहे परिवर्तन पर एक उदास टिप्पणी है। गांव से आए चाचा अपनी बंधी गठरी लिए ही वापिस लौट जाते हैं। क्योंकि शहर में भतीजे के घर पर सब अपनी-अपनी दिनचर्या में व्यस्त हैं और चाचा के संग बैठने बतियाने का मन किसी का नहीं है। फिर लूट जाएगा रोहिताश्वगढ़, साजिश, किस्मत का दरवाजा, घिन्न आती है मुझे, गोदना  आदि कविताओं में आदिवासी के अभिशप्त जीवन के चित्र हैं जो मर्मान्तक हैं। इन कविताओं में सतर्क रहने के लिए चेतावनी भी है। नदी और तुम  कविता नागर जीवन की कृत्रिमता पर कटाक्ष करती है। कुछ अन्य कविताओं में अपनी सहज, प्रकृत जीवन शैली को बचाए रखने की तड़प अभिव्यक्त हुई है।
लछमनिया का चूल्हा की लगभग हर कविता पाठक को ठिठक कर सोचने पर मजबूर करती है। आज का यह दौर, जिसमें पैसा और मुनाफा ही सर्वोपरि मूल्य हो गए हैं, इस तरह से जीवन की उदात्तता को नष्ट कर रहा है। विश्वासी एक्का की रचनाएं आदिवासी जनजीवन का एक प्रामाणिक  और विविधवर्णी चित्र बनाती है।  इनमें कहीं आक्रोश है तो कहीं हताशा; कहीं वर्चस्ववादी समाज से हार मान लेने की विवशता है, तो कहीं उसका भय; कहीं सावधान रहने की चेतावनी है तो कहीं सम्हल जाने की सीख। इन सारे मनोभावों के बीच कहीं-कहीं गीत-संगीत में रचे-बसे परिवेश में लौट जाने की अभीप्सा भी है। कवयित्री का पहला संकलन भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। 
अक्षर पर्व अक्टूबर 2018 अंक की प्रस्तावना 

पुस्तक का नाम- लछमनिया का चूल्हा
लेखिका- विश्वासी एक्का
प्रकाशक- प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन
चेेशायर होम रोड, बरियातु, रांची-834009
मूल्य- 120 रुपए