Thursday, 22 February 2018

मुस्लिम देशों में हिन्दू मंदिर!


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले हफ्ते  चार अरब देशों की यात्रा करके लौटे हैं। उनके इस प्रवास की कुछ झलकियां मीडिया पर प्रसारित तो हुईं, लेकिन उनकी पृष्ठभूमि को समझने, उनको व्यापक परिपे्रक्ष्य में देखने और उनके निहितार्थ पर विचार करने पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। मुझे लगता है कि देश की जनता को इस यात्रा और इन झलकियों से उभरे गहरे संदेशों की ओर ध्यान देना चाहिए।
प्रधानमंत्री ओमान में एक शिव मंदिर में दर्शन करने गए। मोतीश्वर महादेव नामक यह मंदिर, जैसा कि बताया गया सवा सौ साल से अधिक पुराना है। अर्थात इसके निर्माण अथवा प्राण-प्रतिष्ठा का समय उन्नीसवीं सदी के अंत के आसपास पड़ता है। इस दृष्टि से यह एक विरासत स्थल है।  प्रचलित परिभाषा के अनुसार एक सौ वर्ष से अधिक पुराने भवन को धरोहर निधि माना जाता है। मेरे मन में सवाल उठता है कि 1890 के आसपास इस मंदिर की स्थापना कैसे हुई? इसका एक सामान्य उत्तर हो सकता है कि भारत और ओमान के बीच व्यापारिक संबंध थे। दोनों देशों के व्यापारी और वाणिज्य दूत आदि एक-दूसरे के यहां आते-जाते रहे होंगे।
खबरों में कहीं हल्का सा जिक्र भी था कि किन्हीं गुजराती व्यापारियों ने इस मंदिर की स्थापना की थी। इसका नामकरण मोतीश्वर मंदिर भी शायद इसलिए हुआ होगा कि भारत के व्यापारी इस खाड़ी देश से मोती खरीदते होंगे! मैं पाठकों को याद दिलाऊं कि एक समय बसरा के मोती बहुत प्रसिद्ध थे। बसरा इरान में है याने फारस की खाड़ी में और ओमान भी फारस की खाड़ी में है तो वहां शायद मोतियों की मंडी रही होगी! ओमान में भारत के देवता का मंदिर है यह तथ्य जानकर अच्छा लगता है। हम गर्व भी कर सकते हैं कि भारतीय संस्कृति कैसे दूर-दूर तक फैली है। लेकिन हमारे हिन्दुत्ववादी मित्रों को यह तथ्य जानकर कुछ असुविधा होगी कि आज से सवा सौ साल पहले एक मुस्लिम देश ने कैसे एक हिन्दू देवता का मंदिर बनाने की अनुमति दी थी!
प्रधानमंत्री अपने इसी प्रवास में संयुक्त अरब अमीरात भी गए। वहां उन्होंने अबू धाबी की अमीरात में स्वामी नारायण संप्रदाय के मंदिर का भूमिपूजन किया। स्वामी नारायण सम्प्रदाय का गांधीनगर स्थित अक्षरधाम बहुत प्रसिद्ध है। दिल्ली में यमुना तट पर बसा अक्षरधाम भी जन आकर्षण का केन्द्र है। इंग्लैंड सहित कुछ अन्य देशों में भी स्वामी नारायण मंदिर है। इस संप्रदाय के अधिकतर अनुयायी गुजराती हैं तथा सम्पन्न गुजराती ही इन भव्य मंदिरों के निर्माण हेतु भेंट-अर्पण करते हैं। अच्छी बात है। एक और देश में एक हिन्दू मंदिर बनेगा याने हिन्दू धर्म की पताका वहां फहराएगी। लेकिन फिर हमारा ध्यान इस बात पर जाए बिना नहीं रहता कि अबू धाबी इत्यादि देश इस्लाम के अनुयायी हैं। दक्षिण एशिया के लाखों लोग वहां रोजी-रोटी कमा रहे हैं, लेकिन कुल मिलाकर है तो एक मुस्लिम देश। अगर वहां के सुल्तान या अमीर ने हिन्दू मंदिर बनाने की अनुमति दी है तो क्या इससे उनकी उदारता और सहिष्णुता का परिचय नहीं मिलता? क्या अबू धाबी के अमीर का यह कदम इस्लाम के बारे में हमारी जड़तावादी सोच को नहीं तोड़ता? विचार करके देखिए।
हम ओमान की ओर वापिस लौटते हैं। हमारे प्रधानमंत्री एक ओर जहां मंदिर में दर्शनलाभ हेतु गए वहीं उन्होंने सुल्तान कबूस मस्जिद जाकर भी माथा टेका। मैं इसमें कोई बुराई नहीं देखता। ओमान की यह मस्जिद बहुत पुरानी नहीं है। वर्तमान सुल्तान ने अपने नाम पर ही इसे बनवाया है। कहते हैं कि यह एक भव्य और अतिसुंदर मस्जिद है। दूसरे शब्दों में ओमान की सांस्कृतिक परंपराओं व जातीय अस्मिता का यह एक शानदार उदाहरण है। अपने मेजबान की भावनाओं को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री को वहां जाना ही चाहिए था। वे जिस बड़े मिशन पर निकले थे उसमें भी इस प्रसंग से सही संदेश जाता है। यहां हमें फिर ध्यान आता है कि एक वह दिन था जब गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी सद्भावना सम्मेलन या ऐसा कुछ आयोजन कर रहे थे और उसमें उन्होंने किसी मौलवी के द्वारा पहनाई जा रही टोपी पहनने से इंकार कर दिया था। तब यह संदेश देश भर में गया था कि नरेन्द्र मोदी कितने कट्टर हिन्दू हैं। आज वे प्रधानमंत्री हैं तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक-सामाजिक संबंधों को संज्ञान में लेते हुए आचरण कर रहे हैं। क्या ऐसा आचरण सब लोगों को सब समय नहीं करना चाहिए ताकि हमारे देश की हालत कुएं की मेंढक जैसी होने से बच सके? 

यह ध्यान दीजिए कि कुछ सप्ताह पूर्व ही प्रधानमंत्री इजराइल के दौरे पर गए थे। उस समय वे फिलिस्तीन नहीं गए। इन दोनों बातों की बहुत आलोचना हुई थी। एक तो प्रधानमंत्री को एक नस्लवादी देश के प्रवास पर जाना ही क्यों चाहिए था जिसे विश्व समुदाय एक घुसपैठिया मानता है और जो पड़ोसी देशों पर लगातार दादागिरी कर रहा है। अगर गए भी तो साथ-साथ फिलिस्तीन क्यों नहीं गए जो विगत सत्तर वर्षों से लगातार इजराइल के आक्रमण और निरंकुशता का शिकार बना हुआ है? इस मुुद्दे पर राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा प्रधानमंत्री की आलोचना करना जायज थी, गो कि उसके कुछ समय पूर्व संयुक्त राष्ट्र महासंघ में भारत ने इजराइल के खिलाफ और फिलिस्तीन के पक्ष में मतदान किया था। बहरहाल प्रधानमंत्री की चार देशों की यात्रा में राजनीतिक दृष्टि से सबसे अहम पड़ाव फिलिस्तीन का ही था।
उन्होंने वहां राष्ट्रपति महमूद अब्बास को आश्वस्त किया कि भारत हमेशा की तरह फिलिस्तीन के साथ खड़ा रहेगा। इस तरह उन्होंने इजराइल और फिलिस्तीन के बीच संबंधों का संतुलन साधने का सफल उपक्रम किया। यह अच्छी बात है, लेकिन किसी हद तक यह तो जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के पदचिह्नों पर चलना ही हुआ। भाजपा तो सब कुछ बदल देने का सपना दिखाकर सत्ता में आई थी। प्रधानमंत्री स्वयं पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी को कोसते रहते हैं, लेकिन कम से कम इस मामले में तो उन्होंने सत्तर साल पहले बनी परंपरा को ही निभाना बेहतर समझा। ऐसा क्यों हुआ?
मेरे द्वारा इन सारे प्रसंगों का उल्लेख करने का मकसद यही है कि देश का जो राजनीतिक वातावरण है उसमें स्थितियों का सही ढंग से आकलन करने की ओर जनता का ध्यान जाए। सामान्य तौर पर होता यह है कि अधिकतर समय हम अपने-अपने कामों में मशगूल, अपनी-अपनी चिंताओं में मुब्तिला रहते हैं। देश का राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक वातावरण कैसा है उस पर हमारा ध्यान अक्सर नहीं जाता। भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर सतही चर्चाएं होती हैं। उनमें हम कुछ देर दिलचस्पी लेते हैं और वापिस अपनी खोल में लौट आते हैं। जो सत्ता में बैठे हैं या जो सत्ता में आना चाहते हैं वे कैसे-कैसे प्रपंच रचते हैं इसे हम अपनी बेख्याली में समझ नहीं पाते या फिर भावनाओं में बह जाते हैं। हाल के वर्षों में भारत की जनता जाति, धर्म, भाषा, प्रांत, खानपान इन सबको लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गई है। छोटी-छोटी बातों पर हम चिंहुक उठते हैं। यह काम भावनाओं को भड़काने वाली शक्तियां करती हैं। ऐसे में हम अपने मानसिक क्षितिज का विस्तार करने के बजाय संकीर्ण मनोवृत्ति का शिकार हो जाते हैं।
प्रधानमंत्री की यात्रा के उपरोक्त सारे प्रसंग बतलाते हैं कि हर चीज काली या सफेद नहीं होती। काले और सफेद के बीच भूरा रंग भी होता है। हिन्दू बनाम गैरहिन्दू, हिन्दू बनाम मुसलमान, हिन्दू बनाम ईसाई, शाकाहारी बनाम मांसाहारी, आदमी बनाम औरत, सवर्ण बनाम दलित-आदिवासी भारत बनाम पश्चिम, यह सोच आत्मघाती हैं। विकास के पथ पर आगे बढ़ने के बजाय पीछे ले जाने वाली सोच है यह। सोशल मीडिया पर गाली-गलौज करने, सड़क पर लोगों को मारने, किसी के घर में घुसकर हत्या करने, इन सब कुकृत्यों में कोई गर्व की बात नहीं है। अपने लिए सुखी जीवन और अपने बच्चों के लिए सुखी भविष्य गढ़ने के लिए सहिष्णुता और समन्वय की आवश्यकता है। स्वयं प्रधानमंत्री को सत्ता में बने रहने के लिए समन्वय करना पड़ रहा है, जैसा कि इस यात्रा से प्रकट हुआ। तो फिर जनता क्यों इनके उकसावे में आए?
देशबंधु में 22 फरवरी 2018 को प्रकाशित 

Friday, 16 February 2018

तपती रेत पर हरसिंगार : समकालीन ओडिआ कविता का प्रतिनिधि संकलन


सुश्री रमणिका गुप्ता ने लगभग एक वर्ष पूर्व अपनी पत्रिका युद्धरत आम आदमी का एक विशेषांक प्रकाशित किया था। यह अंक ओडिआ भाषा की स्त्री कथाकारों पर केन्द्रित था। इसमें तीन पीढ़ी की लेखिकाओं की लगभग पचास कहानियां संकलित की गई थी। इस उपक्रम से एक ओर ओडिआ भाषा में लिखे जा रहे कथा साहित्य से हिन्दी पाठक परिचित हुए; ओडिआ लेखिकाओं की सामथ्र्य को जाना; तथा भारतीय समाज में औरतों की क्या स्थिति है, उसका भी मार्मिक चित्रण देखने मिला। कहना न होगा कि यह लीक से हटकर एक अभिनव प्रयास था। यह विशेषांक यदि पुस्तक रूप में आ सके तो इसका स्थायी महत्व हो सकेगा। एक दौर था जब हिन्दी की लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न भारतीय भाषाओं की रचनाओं के रूपांतरण नियमित रूप से प्रकाशित होते थे। इन लोकप्रिय पत्रिकाओं का प्रसार व्यापक था और हजारों घरों में परिवार के सदस्य उत्तम साहित्य पढऩे का अवसर पा लेते थे। अब भी अनेक पत्रिकाओं में अनुवाद प्रकाशित तो होते हैं, लेकिन साहित्यप्रेमी समाज तक वे आसानी से नहीं पहुंच पातीं।
जिनका अधिकतर समय साहित्य-साधना में बीतता है, वे निश्चित रूप से हिन्दी ही नहीं, देश-विदेश की अन्य भाषाओं में रचे जा रहे साहित्य का अध्ययन-मनन करते होंगे, किन्तु वे जो इतनी उत्कटता के साथ साहित्य में रुचि नहीं ले पाते, वे पुरानी धारणाओं से ही बंधकर रह जाते हैं। मैं स्वयं अपने को इस दूसरी श्रेणी में रखता हूं। मुझे जब जैसा समय मिलता है अन्य भाषाओं के लिए साहित्य का अनुशीलन करने का प्रयत्न करता हूं, लेकिन वह कभी पर्याप्त नहीं होता। ओडिआ साहित्य  की ही बात करूं तो फकीर मोहन सेनापति, जिन्हें व्यासकवि की उपमा दी गई है, गोपीनाथ महंती, हरेकृष्ण मेहताब, नंदनी सत्पथी, सीताकांत महापात्र, सच्चिदानंद राउत राय, राजेन्द्रकिशोर पंडा, प्रतिभा राय इत्यादि के सीमित अध्ययन के अलावा ओडिआ साहित्य के बारे में मैं बहुत अधिक नहीं जानता।
इस बीच कुछेक समर्थ रचनाकारों से निजी परिचय हुआ जैसे नृसिंह प्रसाद त्रिपाठी, यशोधरा मिश्र, इतिश्री सामंत, प्रभासिनी महाकुल, जापानी इत्यादि। तो इनकी भी कुछ रचनाएं मैंने अवश्य पढ़ी। इस पृष्ठभूमि में युद्धरत आम आदमी के उपरोक्त विशेषांक को पढऩा मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से लाभकारी था। उससे मैंने ज्ञानार्जन किया। अभी कुछ दिन पहले एक निमंत्रण पर 2017 के आखिरी दिन याने 31 दिसंबर को संक्षिप्त प्रवास पर भुवनेश्वर जाने का मौका मिला तो यह मेरे लिए एक आश्वस्तिकारक, आशाजनक और आनंददायक अनुभव सिद्ध हुआ। मेरे मित्र और कथाकार जापानी ने लगभग दो माह पूर्व फोन करके आदेश दिया था कि मुझे 31 दिसंबर को भुवनेश्वर पहुंचना है और इसके लिए भुवनेश्वर साहित्य समाज के अध्यक्ष सूज्र्य मिश्र तुमसे संपर्क करेंगे। मैं उन्हें नहीं कह सका और जब फोन आया तो मैंने तुरंत अपनी सहमति दे दी।
भुवनेश्वर साहित्य समाज  31 दिसंबर को अपना वार्षिक उत्सव मना रहा था। संस्था सृजन सम्मान और शिल्पी सम्मान  ऐसे दो पुरस्कार देती है। यह सौभाग्य मुझे मिला कि वरिष्ठ रचनाकार गजानन मिश्र को सृजन सम्मान और चित्रकार बल्देव महारथा को शिल्पी सम्मान अर्पित करूं। इस अवसर पर संस्था द्वारा क्रमश: अंग्रेजी और हिन्दी में अनूदित ओडिआ कविताओं के संकलन वॉयेज और तपती रेत पर हरसिंगार का लोकार्पण भी किया। यह जानकर बेहद अच्छा लगा कि भुवनेश्वर साहित्य समाज ने कहानी और कविता के इस तरह तीन-तीन संकलन प्रकाशित किए हैं। उन्होंने इस तरह एक ओर वर्तमान ओडिआ साहित्य को वैश्विक पटल पर और दूसरी तरफ शेष भारत के समक्ष रखने का महत्वपूर्ण काम किया है।
अब तपती रेत पर हरसिंगार  के बारे में कुछ विस्तार के साथ बात।  मैं ऊहापोह में था कि निमंत्रण स्वीकार तो कर लिया है, ओडिआ साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों के बीच ऐसी क्या बात कहूं जिससे आयोजकों की और स्वयं मेरी लाज बची रहे। मैंने जिन वरेण्य रचनाकारों को पढ़ रखा था उनकी कृतियों को आधार बनाकर वक्तव्य देने का मन बना लिया था, लेकिन इस कविता संग्रह के पन्ने उलट-पुलट कर देखा, तो पूर्व निर्धारित वक्तव्य देने का इरादा छोड़ दिया। संग्रह के सरसरी तौर पर किए अवलोकन ने मुझे स्फूर्ति दी कि कोई नई बात कह सकूं। मुझे मुक्तिबोध जी के ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान वाली कसौटी सहसा स्मरण हो आई और उसे आधार बनाकर मैंने इन कविताओं पर ही अपनी बात केन्द्रित कर दी।
ओडिआ के कवि व व्यंग्यकार राधू मिश्र ने तपती रेत पर हरसिंगार का संपादन किया है। यह समकालीन ओडिआ कविता का संकलन है। इसमें सौ कवियों की कविताएं संकलित हैं। संपादक ने नाम चयन में वरिष्ठ कवि राजेन्द्र किशोर पंडा का मार्गदर्शन लिया है। राधू मिश्र ने भूमिका में उचित ही लिखा  है कि किसी हिन्दीत्तर प्रदेश से प्रकाशित यह संकलन एक अनूठा प्रयास है। ओडिआ देश की छह प्राचीन भाषाओं में से एक है और उसकी गतिशीलता निरंतर बनी हुई है। संपादक ने इसमें उन कवियों को ही लिया है जो 1947 के बाद जन्मे हैं तथा जो कविताएं ली गई हैं वे विगत बीस वर्ष के दौरान ही लिखी गई हैं। एक तरह से यह इक्कीसवीं सदी की कविताओं का संकलन है।
संकलन को तैयार करने में एक मार्गदर्शक रहे प्रोफेसर कुलजीत सिंह की राय भी सटीक है कि यह संकलन ऐसे कवियों के उत्तराधिकारियों का है जो अब नवक्लासिक या नवशास्त्रीय की श्रेणी में शुमार किए जा सकते हैं। ये कवि उस पीढ़ी के हैं जिसने स्वाधीन भारत की खुली हवा में सांस ली इसलिए पराधीन अतीत का कोई बोझ इसके कंधों पर नहीं है। इसी तरह स्वयं संपादक ने टीका की है कि सदी के नौवें दशक में अतिकल्पना और अतिभावावेग का दामन छोड़कर कविता मनुष्य उसके परिवेश और परिस्थिति को महत्व देने लगी है। इस काल के कवि के पास विचार हैं तो नवव्यवहारिक  प्रतिक्रियाएं भी हैं जो उसके चिंतन और अनुभव की उपज हैं। संपादक का मानना है कि ये कवि पलायनपंथी न होकर अपने समय की वास्तविकता, उसके विद्रूपों से जूझ रहे हैं। वह इसे विस्तार से परिभाषित भी करता है कि इन कविताओं से अमानवीयता का विरोध है, दलित और इतर के प्रति संवेदनशीलता है, नारी मुक्ति का समर्थन है, व्यवस्थापन और पलायन की पीड़ा है, राजनैतिक विसंगति पर चोट है, ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न है, प्रेम अपरिभाषित सा है और कवि प्रचंड रूप से स्वाभिमानी है।
सौ कवियों की सौ कविताएं पढ़ते हुए बारंबार लगता है कि संपादक राधू मिश्र ने कविताओं के चयन में इन तमाम बातों का बखूबी ख्याल रखा है। विश्वास होता है कि यह संकलन समकालीन ओडिआ कविता के निश्चित ही एक प्रतिनिधि और मानक संकलन के रूप में स्वीकार होगा। तपती रेत पर हरसिंगार  शीर्षक ही अपने अटपटेपन के  बावजूद बहुत कुछ कहता है। कवि सदैव सुन्दर का स्वप्न देखता है, सुन्दर की रचना करना चाहता है। हरसिंगार उसके कोमल मनोभावों का प्रतीक है, लेकिन तपती रेत जीवन की कठोर झुलसाने वाली वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करती है।
कुमार हसन की कविता है जंगल बुक । इस कविता में गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं। कविता की अंतिम पंक्ति व्यवस्था पर तीखा प्रहार करती है-
पता नहीं, जंगल में/जनतंत्र का मतलब क्या होता है?/ स्वतंत्रता तलाशते लोग / फिलहाल विदेश दौरे पर।
उधर गिरिजाकुमार बलियार सिंह की कविता में सदियों से चले आ रहे आर्थिक शोषण और गैरबराबरी का चित्र इन पंक्तियों में है-
नकली बीज से हाय ! भरा है आज तुम्हारा खेत / धान दिखता नहीं... सिर्फ अगाड़े छांट रहा किसान / पूंजी के सर उठाने पर रेंगने लगी है मुनाफे की लट / तुम्हारा यह मजदूर बैठे बांध रहा है मालिक का मचान।
रामकृष्ण साहू संकेतों में अपनी बात कहते हैं। वे जानते हैं कि आज के समय में शब्दों को मूल्यहीन बना दिया गया है और एक तरह से उनकी कविता में प्रोमेथ्युस की वेदना प्रतिध्वनित होती है। जब वे कहते हैं-
मैं तुम्हारी ही बातें कहता हूं / हां हां तुम्हारी ही / वे जो आखिरी पंक्ति में/ सबके पीछे खड़े हैं कुर्सियों के अभाव में /आधे प्रकाश और आधे अंधकार में / क्या पहुंच पा रही उनके पास / मेरे निरर्थक शब्दों की नीरवता?
ज्ञानी देवाशीष की कविताओं का शीर्षक है- दलित कवि। वे कोई आडम्बर नहीं रचते और बहुत खरे शब्दों में एक दलित लेखक के मनोभाव व्यक्त करते हैं-
चूल्हे में लकड़ी की भांति जलता है जो जीवन / उसे कविता बना परोसना होता है / डाइनिंग टेबल पर / वे लोग जल रहे हैं इसीलिए तो / हांडी में उबल रहे हैं शब्द /
जैसा कि सब जानते हैं ओडिशा की धरती रत्नगर्भा है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों पर समाज का कोई हक नहीं है। इस पर अमिय पांडव चीख उठते हैं-
मत मारो मां को मेरी / पहाड़ नहीं नियमगिरि/ मेरी मां है।
तो वहीं अभय नारायण नायक अगली पीढ़ी की चिंता करते हैं-
हमारी बेटियां /अब गा नहीं पाएंगी /भादो महीने में 'करमा' गीत।
गांवों की चिंता अनेक कविताओं में है। बादल महंती विक्षोभ से भरकर कहते हैं-
गांव में सब कुछ ठीक है / सुनाई नहीं देती कहीं से हा-अन्न की चीख
तो मनोज कुमार पंडा की कविता में गांव की दारुण परिस्थिति इस तरह व्यक्त हुई है-
मैली निगाह वाले सौदागरों के डर से / छिपा  हुआ है एक गांव।
एक तरफ गांव है, दूसरी तरफ राजधानी। सरोज की दिल्ली  शीर्षक कविता बड़े साफ-साफ लफ्जों में कहती है-
दिल्ली पहुंच भी जाओ / 'दिल्ली' मिलेगी नहीं तुमको।
जबकि प्रीतिधारा सामल की कविता राजधानी से गांव की ओर इन शब्दों में देखती है-
राजधानी से काशीपुर / दिखाई देता है कैसा? / सुन्दर युवक के चेहरे पर / फैल गए सफेद दाग-सा? / सड़क के किनारे कूड़े से पोलिथीन चुनते / गैर जरूरी बच्चे-सा?
संकलन में सावित्री कबि अकेली लड़की का गीत लिखती हैं-
सभी के सो जाने के बाद अकेली लड़की / चुपचाप घर से निकलती है / सालों पुराने नपे तुले रिश्ते / पुराने बक्से के भीतर उनकी संभाली हुई पोथी।
तो शुभश्री लेंका की कविता में विज्ञापन की नारी है-
विज्ञापन में न रोने वाली नारी है वह / चिकनी, चुलबुली /सबकी ईर्ष्या के कारण बनती / उसका नहीं है पता मारफत भी नहीं / चतुराई का जाल ले / वह चतुर मछुआरे की भांति / छटपटाती तृष्णाओं को / अपने जाल में फंसा लेती है।
गायत्री बाला पंडा आज के भारत में बच्चों के भविष्य पर प्रश्न उठाते हुए लिखती हैं-
बच्चे प्रश्न चिन्ह बन जाने पर / क्यों डोल उठता है देश / तब बच्चे बैठे होते हैं लंबी कतारों में / खाने के लिए नहीं, ना ही बही-खातों के लिए / गुडिय़ा-खिलौनों के लिए नहीं / मांग रहे होते हैं अपनी माटी की मुक्ति / मांग रहे होते हैं जीने का अधिकार / मांग रहे होते हैं शांति।
उसी क्रम में दुर्गाप्रसाद पंडा ड्राइंग के पन्नों पर बेटी की धरती का चित्र बनाते हैं-
हां, ड्राइंग की वह चपटी धरती / आज भी कभी-कभी आती है / उसके सपने में / पर बेटी समझ चुकी है/ जिन्दगी इतनी हरी-भरी और आसान नहीं है / ड्राइंग के पन्नों के बाहर
अमिय रंजन महापात्र की कविता पुरी जैसे शहर में एक दिन की ये पंक्तियां बेहद मार्मिक हैं-
चूल्हा चख रहा था चावल के उस स्वाद को / जो उस पर उछल-उछल कर गिर रहे थे / उधर किसी मरीचिका से घड़ा-घड़ा पानी लाकर / मैं तपन को मिटा रहा था /
उसी तरह रमेश पति की कविता में पुरी और कोणार्क नए संदर्भों के साथ आते हैं-
देश की संपदा को / चंद पूंजीपतियों के हाथों सौंपकर / गरीबों के खून से महल बनाना / कोई नई बात नहीं है / लेकिन उन दिनों / बनाए गए कोणार्क या श्री मंदिर / संकेत है एक पुरानी जाति का / जिन मजदूरों के पसीने से / बनकर खड़े हैं ये / राज कार्यालय / आज उसी के अंदर / उनका प्रवेश मना है/
मनुष्य की गरिमा और अस्मिता को हृदयभेदी शब्दों से चित्रित करने वाली दो कविताएं मुझे विशेष उल्लेखनीय जान पड़ती है। श्रीदेब पांवपोश  में लिखते हैं-
एक फटे हुए जूट का बोरा पड़ा है / चौखट पर, पांव पोंछने को / कितने पांवों का स्पर्श पाता है पांवपोश / पर अहल्या बनना क्या इतना आसान है / पत्थर के लिए, इतना अनायास भी नहीं / एक कविता बनने के लिए कम पड़ जाती है / कभी-कभी शब्दों की आयु /
वहीं स्वरूप महापात्र जितना ऊपर उठना हो  में बरजते हैं-
जितना ऊपर उठना चाहते हो / उठो / कोई मनाही नहीं / लेकिन इतना भर याद रहे / किसी की पीठ पर न पड़े पांव।
यूं तो संकलन की लगभग हर कविता उद्धृत करने योग्य है, लेकिन स्थान सीमित है। पत्रिका के आगामी अंकों में आप ऐसी कुछ कविताएं पढ़ सकेंगे जो मुझे निजी तौर पर प्रभावपूर्ण लगीं।
अक्षर पर्व फरवरी 2018 अंक की प्रस्तावना 
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 तपती रेत पर हरसिंगार
(समकालीन ओडिआ कविताएं)
संपादक- राधु मिश्र
प्रकाशक- भुवनेश्वर साहित्य समाज
पृष्ठ- 242
मूल्य- 350 रुपए   

Thursday, 15 February 2018

मालदीव और भारत


 
अभी एक सप्ताह पहले तक हम आसियान देशों और भारत के साथ उनके संबंधों की बात कर रहे थे। इस बीच सार्क का सदस्य और दक्षिण एशिया में हमारा पड़ोसी मुल्क मालदीव वहां तेजी से बदले राजनैतिक घटनाचक्र के कारण सुर्खियों में आ गया और उसके साथ भारत के संबंधों का विश्लेषण होने लगा। मालदीव हमारे लिए क्या अर्थ रखता है, उसका सामरिक महत्व क्या है, चीन के साथ उसके संबंध कैसे हैं, अतीत में भारत और मालदीव के बीच संबंधों का स्तर क्या था, ऐसे तमाम मुद्दों पर राजनीतिक पंडितों के विद्वतापूर्ण विचार सामने आने लगे। इस बारे में मैं कोई गंभीर बात करूं उसके पूर्व एक छोटा सा संस्मरण पाठकों के साथ साझा करना चाहूंगा। मेरे रायपुर निवासी दिवंगत मित्र हरिकिशन चांडक लगभग पैंतीस वर्ष पूर्व मालदीव गए। लौटने के बाद मुझे सलाह दी कि मैं भी वहां घूम आऊं। उन्होंने कुछ कारण गिनाए- भारतीयों को वीजा नहीं लगता, विदेश तो है ही, सुंदर बहुत है, कोचीन से आने-जाने का विमान किराया मात्र चौदह सौ रुपए है, और शापिंग के लिए भी सिंगापुर के मुकाबले सस्ता है। अफसोस कि मैं न तब और न उसके बाद मित्र की सलाह पर अमल कर पाया।
इस उल्लेख का आशय यह बतलाना था कि आज से पैंतीस वर्ष पहले का मालदीव कैसा था और यह कि उस वक्त तक भारतीयों के लिए वह एक लगभग अनजाना देश था। अब स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। साउथ एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन याने सार्क के गठन के बाद से मालदीव के साथ हमारे संपर्क तेजी से विकसित होना शुरू हुए। जब चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने तब मालदीव की राजधानी माले में सार्क का शिखर सम्मेलन हुआ था। इन तीन दशकों के दौरान मालदीव ने एक टूरिस्ट डेस्टिनेशन याने एक महत्वपूर्ण पर्यटन केन्द्र के रूप में अपना विकास किया। वहां के द्वीपों पर पांच सितारा और सात सितारा होटल बनना शुरू हुए। भारत के ताज ग्रुप का एक रिसोर्ट भी वहां पर है। अनेक द्वीपों को मिलकर बना मालदीव अपनी नैसर्गिक शोभा और हिंद महासागर के बीच समशीतोष्ण जलवायु के कारण पर्यटकों के लिए एक स्वर्गोपम स्थान बन गया और इससे वहां की अर्थव्यवस्था में भी बेहतरी आई।
मालदीव पर लगभग तीन दशक तक राष्ट्रपति मैमून अब्दुल गयूम का एक छत्र राज रहा। देश की आबादी साढ़े चार लाख से भी कम है। सैकड़ों द्वीपों वाला देश इस्लाम का अनुयायी है, जो कि वहां बारहवीं सदी से है। 1965 तक मालदीव एक ब्रिटिश उपनिवेश था। स्वतंत्रता पाने के पहले भी वहां राजनीतिक उथल-पुथल कई स्तरों पर चलती थी। 1968 में मालदीव ने अपने को गणराज्य घोषित किया, लेकिन देश की जो वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक स्थिति है उसका श्रेय मुख्यत: 1978 में राष्ट्रपति बने गयूम को ही जाता है। वे लगातार छह बार राष्ट्रपति चुने गए। पर्यटन का विकास भी उनके कार्यकाल में हुआ। किंतु वे धीरे-धीरे कर एक निरंकुश शासक बनते चले गए। 2008 में मोहम्मद नशीद सत्तारूढ़ हुए, गयूम को पद छोड़ना पड़ा लेकिन यह उनको बर्दाश्त नहीं हुआ। नशीद अधिक समय राष्ट्रपति नहीं रह सके। वे पदच्युत किए गए। जेल भेजे गए। अंतत: ब्रिटेन में उन्हें राजनीतिक शरण मिली। गयूम के बदले उनके सौतेले भाई अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति बन गए।
अब्दुल्ला यामीन ने गयूम की बेटी दुनिया गयूम को विदेश मंत्री बनाया। अन्य रिश्तेदारों को भी पद दिए। दूसरी तरफ गयूम के पदचिह्नों पर चलते हुए विपक्षी नेताओं को न सिर्फ जेल भेजा बल्कि उनके चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। उनके निर्णयों को जब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया तो दो न्यायाधीश जेल भेज दिए गए और तीन ने अपना ही दिया निर्णय बदल दिया। देश में आंतरिक आपातकाल लागू हो गया है। इसी साल आम चुनाव होना है। यामीन जैसे भी हो, दुबारा राष्ट्रपति बनने की ठाने हुए हैं। जिस सौतेले भाई ने उन्हें राष्ट्रपति बनाया, वे गयूम भी अब उनके दुश्मन हो गए हैं। कुल मिलाकर मालदीव में फिलहाल गणतंत्र सिर्फ कहने को है। राष्ट्रपति का एकछत्र निरंकुश शासन चल रहा है। सवाल उठता है कि इस मौके पर भारत की क्या भूमिका हो?
अपदस्थ राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद इंग्लैंड से आकर श्रीलंका में टिके हुए हैं। उनसे मिलने के लिए मालदीव से बहुत से विपक्षी नेता श्रीलंका इस बीच आए। यहीं यामीन को खतरे की घंटी सुनाई दी। नशीद चाहते हैं कि भारत मालदीव में हस्तक्षेप करें और वहां संवैधानिक गणतंत्र दुबारा स्थापित करने निर्णायक भूमिका निभाए। यह सही है कि यामीन का रुख भारत-विरोधी रहा है और नाशीद ने भारत के साथ मधुर संबंध बनाए रखे लेकिन नशीद की स्वयं लोकतंत्र में कितनी आस्था है इस पर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है। कुछ प्रेक्षकों का कहना है कि राजीव गांधी ने 1988 में मालदीव में जब गयूम के खिलाफ बगावत हो रही थी तब भारतीय सेना भेजकर वहां बगावत को विफल कर दिया था। इसे दृष्टांत मानकर कदम उठाना  गलत हो सकता है क्योंकि 1988 के सैनिक विद्रोह को लिट्टे के ही एक समूह याने तमिल आतंकियों का समर्थन हासिल था। अर्थात वह मालदीव की संप्रभुता के खिलाफ था। आज की स्थिति तब से बिल्कुल भिन्न है।
यह तर्क भी दिया गया है कि जैसे अमेरिका ने मुनरो डॉक्टरीन के अंतर्गत लैटिन अमेरिका को अपना आंगन बना लिया है वैसे ही भारत को भी दक्षिण एशिया में पूरी तरह से अपना दबदबा कायम करना चाहिए। यह तर्क देने वाले 1988 के अलावा श्रीलंका में भारतीय शांति सेना, दलाई लामा तथा ऊ नू को राजनीतिक शरण, बंगलादेश मुक्ति संग्राम, श्रीलंका के नौसैनिक विद्रोह इत्यादि में भारत की भूमिका को रेखांकित करते हैं। हमारी राय में स्थितियां इतनी सरल नहीं हैं। आज भारत यदि मालदीव में हस्तक्षेप करता है तो उसका अंतिम परिणाम हमारे अनुकूल ही होगा, यह कहना कठिन है। कैसे भूल जाएं कि श्रीलंका में उसके ही आग्रह पर शांति सेना भेजने का कैसा दुष्परिणाम अपने देश को भुगतना पड़ा!

यह सच है कि मालदीव हिन्द महासागर में जहां अवस्थित है उसका भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बहुत महत्व है। वैश्विक राजनीति में हिन्द महासागर के विशाल क्षेत्र में भारत की निर्णायक स्थिति है और होना चाहिए। यह विश्व शांति के लिए भी आवश्यक है। दूसरी तरफ हम यह भी जानते हैं कि चीन बजरिए हिन्द महासागर एक मैरीटाइम सिल्क रूट याने सामुद्रिक व्यापार पथ का विकास करना चाहता है। उसे अपना व्यापार बढ़ाने के लिए एक समुद्रीरास्ते की आवश्यकता है। इसी कारण यह आशंका भी उठती है कि चीन कहीं भारत को इसकी आड़ में घेरने की कोशिश तो नहीं कर रहा है? यह आशंका निर्मूल नहीं है लेकिन यह भी सोचना होगा कि क्या चीन सचमुच इतना शक्तिसंपन्न है कि वह चारों दिशाओं से भारत जैसे विशाल देश को घेर सके और क्या चीन के साथ शक्ति संतुलन बनाने के लिए हम स्वयं अपनी सामरिक क्षमता का विकास नहीं कर रहे हैं? उदाहरण के लिए अगर उसके पास पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह है तो हमने इरान के चाबहार में बंदरगाह स्थापित कर लिया है।
ध्यान देने योग्य है कि मालदीव एक इस्लामी देश है। हाल के वर्षों में अमेरिका और सऊदी अरब ने मिलकर इस्लाम में कट्टरपंथी तत्वों को बढ़ावा दिया है। मालदीव भी उससे मुक्त नहीं है। आज अगर भारत, मालदीव में सैन्य हस्तक्षेप करे तो यह बात सऊदी अरब व खाड़ी के देशों के अलावा दो अन्य पड़ोसी मुल्कों याने पाकिस्तान और बंगलादेश को नागवार गुजर सकती है। बंगलादेश में बीच में जब गैरलोकतांत्रिक मज़हबी कट्टरता वाली हुकूमत कायम थी तब भारत ने संयम बनाए रखा था। पाकिस्तान में जनतांत्रिक ताकतें सेना और मुल्लाओं के आगे कमजोर हैं तब भी हम संयम से ही काम ले रहे हैं। मालदीव में भी यही संयम बनाए रखना हमारे लिए शायद बेहतर होगा। यह तो वहां की जनता पर निर्भर करता है कि वह निरंकुश सत्ता के विरुद्ध जम्हूरियत कायम करने के लिए लड़े। हमारी भूमिका अपने पड़ोसी मुल्कों में लोकतंत्रवादी ताकतों को नैतिक समर्थन देने तक सीमित रहे, शायद यही श्रेयस्कर होगा।
देशबंधु में 15 फरवरी 2018 को प्रकाशित 

Monday, 12 February 2018

छत्तीसगढ़ : वर्तमान सांस्कृतिक परिदृश्य


छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक परिदृश्य की चर्चा करते हुए कुछ बिन्दु स्पष्टता के साथ उभरते हैं।
1. यह प्रदेश एक लंबे समय से संस्कृति की विभिन्न विधाओं का धनी रहा है। विगत अनेक शताब्दियों के दौरान समय-समय पर यहां रचनाशीलता का जैसा उन्मेष हुआ और जिसकी परंपरा आज तक चली आ रही है, वह किसी भी अन्य प्रदेश से कम नहीं है।
2. इस सांस्कृतिक वैभव की जो पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बनना चाहिए थी, वह नहीं बन पाई है।
3. प्रदेश में इस संबंध में जिस व्यवस्थित तरीके से अध्ययन, शोध व प्रसार होना चाहिए था, वह भी नहीं हो सका।
4. मध्यप्रदेश से पृथक हो एक स्वतंत्र इकाई बन जाने के बाद प्रदेश की रचनाशीलता पर एक तरफ शासकीय संरक्षण की अभिलाषा व दूसरी ओर उपभोक्ता संस्कृति का प्रभाव- इस तरह राहू-केतु की छाया पड़ गई है। अगले अनुच्छेदों में हम इन बिंदुओं की विस्तार से व्याख्या करेंगे।

छत्तीसगढ़ का चालीस प्रतिशत से अधिक भू-भाग यद्यपि वनों से आच्छादित है, किंतु यहां विकसित नागर सभ्यता होने के चिह्न लगभग दो हजार वर्ष पूर्व से मिलते हैं। सर्वविदित है कि मल्हार में प्राप्त विष्णु प्रतिमा लगभग इतनी ही पुरानी है। इसके बाद सिरपुर, रतनपुर, बारसूर आदि स्थान है, जो छत्तीसगढ़ के प्राचीन सांस्कृतिक वैभव के साक्ष्य हैं। यहां हम सिर्फ उदाहरण के लिए कुछ नाम दे रहे हैं ताकि पाठकों के सामने एक रूपरेखा रखी जा सके। ये प्राचीन मंदिर किस राजा ने बनवाए थे, इनके स्थपति कौन थे, इन मूर्तियों को किन्होंने गढ़ा था, यह सब विशद विवेचन का विषय है। फिलहाल इतना जान लेना रोचक है कि दो हजार वर्ष से छत्तीसगढ़ में सभ्यता का विकास व प्रकृति का संरक्षण समानांतर होते आया है। इस मायने में छत्तीसगढ़ की स्थिति अन्य प्रदेशों से भिन्न कही जा सकती है।
यह अनुभव अपने आप में मुग्ध कर देने वाला है कि आप प्रदेश के उत्तरी भाग में याने सरगुजा अंचल में घने जंगलों के बीच किसी निर्जन सी सड़क पर प्रकृति की शोभा निहारते चले जा रहे हैं और अचानक आपके सामने कहीं महेशपुर तो कहीं डीपाडीह के ध्वंसावशेष सामने आ गए हैं। ऐसा अनुभव आपको बस्तर में भी हो सकता है या कवर्धा, राजनांदगांव, महासमुंद, सारंगढ़, धमतरी या गरियाबंद में भी। फिंगेश्वर के प्राचीन फणेश्वर महादेव मंदिर को देखकर मेरे मित्र त्रिभुवन पांडेय ने अनुमान लगाया था कि प्राचीन समय में मंदिर शिल्पियों का कोई बड़ा कुनबा रहा होगा, जिसने देशाटन करते हुए राजाओं के आदेश-अनुग्रह पर इन मंदिरों का निर्माण किया होगा। बड़े राजा के यहां बड़ा मंदिर, छोटे राजा के यहां छोटा। भाई त्रिभुवन के अनुसार ये उस समय के मंदिर 'कांट्रेक्टर' रहे होंगे। है न बात विचार करने योग्य!
जाहिर है कि यह सांस्कृतिक वैभव सिर्फ मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं रहा होगा। उसके साथ-साथ रचनाशीलता के नए आयामों को प्रस्फुटित होने का अवसर मिला ही होगा। यह भी मानना चाहिए कि जैसे-जैसे यात्राएं सुगम हुईं होंगी। विभिन्न प्रदेशों के बीच संपर्कों में भी वृद्धि हुई होगी तथा आज छत्तीसगढ़ के जिन कलाकारों को हम देख रहे हैं, वे बाह्य प्रभाव से मुक्त नहीं रहे होंगे। इसी तरह छत्तीसगढ़ की रचनाशीलता ने अन्य प्रदेशों को भी प्रभावित किया होगा। मुझे लगता है कि छत्तीसगढ़ के कथा गीत इसका प्रमाण हैं। मसलन, गुजरात में 'जसमा-ओढन' की कथा में अद्भुत साम्य है। डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव ने छत्तीसगढ़ के कथा गीतों पर जो गंभीर शोध कार्य किया है, वह इस बारे में अधिक जानकारी के लिए पठनीय है। शास्त्रीय नृत्य में कत्थक के रायगढ़ घराने से भी कलावंत परिचित हैं। ऐसे सांस्कृतिक विनिमय को विजयदान देथा की राजस्थानी लोककथा तथा हबीब तनवीर की नाट्य कृति 'चरणदास चोर' में भी देखा जा सकता है।
मैं दाऊ रामचंद्र देशमुख की रंगमंचीय प्रस्तुति 'चंदैनी गोंदा' का विशेष रूप से जिक्र करना चाहूंगा। 1970 के दशक में लोक मंच पर प्रस्तुत इस कृति ने समूचे छत्तीसगढ़ को एक तरह से झकझोर दिया था। उस दौर में जब डॉ. खूबचंद बघेल के छत्तीसगढ़ भ्रातृसंघ के माध्यम से प्रदेश की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान अंकित करने का प्रयत्न हो रहा था, उस समय 'चंदैनी गोंदा' ने स्थानीय समाज को अपनी जीवन परिस्थितियों का पुनरावलोकन करने के लिए उत्तेजित किया था। चंदैनी गोंदा से प्रेरित होकर आगे और भी मंचीय उपक्रम हुए, लेकिन दाऊ जी अपनी एकांतिक निष्ठा के बल पर जो जादू जगा सके थे, वैसा वे दूसरे लोग नहीं कर पाए, जिनके लिए लोक मंच निजी ख्याति मात्र पाने का माध्यम था।
हिंदी साहित्य का आधुनिक काल माने जाने वाले समय में भी छत्तीसगढ़ का जो योगदान है, वह इतिहास में दर्ज है। मुकुटधर पांडेय की कविता 'कुररी के प्रति' को छायावाद की पहली कविता माना जाता है। इस नाते पांडेयजी को छायावाद का  प्रणेता भी कहा गया है। यद्यपि पांडेय जी स्वयं श्रेय न लेते हुए महाकवि जयशंकर प्रसाद को इसका अधिकारी मानते हैं। ठाकुर जगमोहन सिंह की कृति 'श्यामा स्वप्न' को राज्य बनने के बाद हिंदी का पहली उपन्यास सिद्ध करने के स्वार्थ-प्रेरित किंतु असफल प्रयत्न हुए। इसी तरह माधवराव सप्रे की 'टोकरी भर मिट्टी' को एक बड़े तबके में हिंदी की पहली कहानी मान लिया गया है, यद्यपि वह एक लोक कथा है।  जो भी हो, ये दोनों रचनाएं आधुनिक हिंदी के प्रारंभकाल में छत्तीसगढ़ की उपस्थिति को दर्ज कराती हैं। एक स्मरणीय तथ्य यह भी है कि पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी को 'सरस्वती' का संपादन करने का सम्मान मिला। माखनलाल चतुर्वेदी ने 'पुष्प की अभिलाषा' जैसी अमर कविता बिलासपुर जेल की कोठरी में बैठकर लिखी व गजानन माधव मुक्तिबोध के अंतिम वर्ष यहीं बीते।
भारतीय रंगमंच को जिन प्रतिभाओं ने समृद्ध किया, उनमें से दो प्रमुख नाम हबीब तनवीर तथा सत्यदेव दुबे छत्तीसगढ़ के ही हैं। इसके अलावा अन्य विधाओं में भी देवदास बंजारे, तीजनबाई, झाड़ूराम देवांगन, जयदेव बघेल, गोविंदराम झारा, सोनाबाई जैसे कितने ही नाम उल्लेखनीय है। लेखकों की तो एक सुदीर्घ सूची है ही जिनसे पाठकगण परिचित हैं। भारतीय सिनेमा में भी छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण योगदान है। सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक एवं अभिनेता किशोर साहू इसी प्रदेश के थे। आगे चलकर रायपुर के कांतिलाल पटेल ने अपनी गुजराती में बनी फिल्म 'कंकू' के लिए वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार हासिल किया। उन्होंने 'परिणय' आदि अन्य स्मरणीय फिल्में भी बनाईं। इसी तरह रायपुर के दयाराम चावड़ा ने फोटोग्राफी के क्षेत्र में महारत हासिल की। छत्तीसगढ़ की संस्कृति की चर्चा के संदर्भ में ये सारे तथ्य ध्यान रखने योग्य है।
यह स्मरण कराने की आवश्यकता नहीं कि किसी भी समाज की संस्कृति शून्य में विकसित नहीं होती। भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र, पर्यावरण, सामाजिक परंपराएं इत्यादि का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव कला सर्जना पर पड़ता है। इस प्रभाव से ही प्रारंभ लोक संस्कृति का निर्माण होता है एवं कालांतर में उसका ही एक अंश शास्त्रीय रूप ढल जाता है। यहां मैं विशेषकर छत्तीसगढ़ की एक सामाजिक परंपरा की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। छत्तीसगढ़ को यदि तालाबों का प्रदेश कहा जाए तो किंचित भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज भी प्रदेश में ऐसे तालाब विद्यमान हैं, जिनकी आयु हजार-आठ सौ वर्ष की है। ये तालाब, इनकी पार पर लगे आम, अर्जुन, डूमर आदि वृक्षों की छाया में ही यहां संस्कृति का बीजारोपण हुआ होगा। ध्यान रहे कि ये तालाब हमारे सयानों ने बनवाए थे, इसलिए जिस विषय पर आज हम चर्चा कर रहे हैं, इसमें इस तथ्य को नहीं भुलाना चाहिए।
यह कटु सत्य है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद देश के सांस्कृतिक नक्शे पर छत्तीसगढ़ की विशिष्ट छवि आज तक नहीं बन पाई है। इसका एक प्रबल कारण तो शायद यह है कि प्रदेश के बाहर का समाज हमेशा से छत्तीसगढ़ को एक पिछड़ा प्रदेश मानते आया है। 1956 में जब छत्तीसगढ़ नए मध्यप्रदेश का हिस्सा बना, शायद तब से यह स्थिति चली आ रही है। मैं समझता हूं कि 1956 के पहले सीपी एंड बरार राज्य की ऐसी स्थिति नहीं थी। उस समय छत्तीसगढ़, विदर्भ और महाकौशल इन तीनों में कोई बड़ा छोटा नहीं था और न किसी तरह का भेदभाव होता था। नए मध्यप्रदेश के निर्माण के ठीक दो माह बाद 31 दिसंबर 1956 को प्रथम मुख्यमंत्री व कद्दावर नेता पंडित रविशंकर शुक्ल के निधन के साथ एक नया माहौल बनना शुरू हुआ, जिसमें महाकौशल, बुंदेलखंड व बघेलखंड के साथ-साथ छत्तीसगढ़ को भी हाशिए पर डाल दिया गया।
छत्तीसगढ़ के साथ दूसरी विडंबना यह हुई कि नए  प्रदेश के सत्ता के केंद्र भोपाल से उसकी भौगोलिक दूरी काफी थी। इसमें करेला और नीम चढ़ा की कहावत तब चरितार्थ हुई जब छत्तीसगढ़ के प्रभावी नेताओं ने इस प्रदेश को अपना प्राप्य दिलवाने में जबानी जमाखर्च से ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखलाई। जब 1 नवंबर 2000 को नया छत्तीसगढ़ प्रदेश बना तब मोमबत्ती की लौ की तरह क्षणिक आशा जगी कि अब छत्तीसगढ़ की सही पहचान बन पाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। जो सत्ता में बैठे थे, उनकी प्राथमिकताएं कुछ और थीं। कला, साहित्य व संस्कृति से उनका कोई खास लेना-देना नहीं था और न इस बारे में पिछले डेढ़ दशक में कोई सुविचारित पहल ही की गई। हमारे कलाकार और हुनरकार बीच-बीच में दिल्ली वगैरह बुलाए जाते हैं, वे वहां जाकर कुछ फुलझड़ियां बिखेर कर वापस अपने अंधेरे में लौट आते हैं।
मैं यह मानता हूं कि जनतांत्रिक व्यवस्था में जनकल्याणकारी राज्य का दायित्व है कि वह कला-साहित्य का संवर्धन-संरक्षण करें। इसके लिए अव्वल तो दृष्टि की जरूरत होती है, फिर राजनीतिक इच्छाशक्ति की। अगर छत्तीसगढ़ में इन बुनियादी शर्तों की ही पूर्ति होते दिखाई नहीं देती, तो इसके लिए हम स्वयं को दोष दे सकते हैं। रचनाशीलता को लोक, आदिवासी, नागर आदि खांचों में न बांटकर समग्रता में देखते हुए यह जरूरी है कि राज्य में ऐसा वातावरण, ऐसी संस्थाएं व ऐसा विधान हो, जिसमें हर विधा, हर शैली में सृजनात्मकता का विकास होने के लिए अनुकूल वातावरण हो।  छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्य के लिए तो यह और भी ज्यादा जरूरी है, जबकि इस प्रदेश की छवि आंतरिक अशांति याने नक्सलवादी खून-खराबे से घायल स्थान की बन गई हो। दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड में छत्तीसगढ़ की एकाध झांकी शामिल हो जाए, पुरस्कृत हो जाए, उस पर सत्ताधीश गर्व भी कर लें, लेकिन साल में तीन सौ चौंसठ दिन तो दिल्ली में बात छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या की ही होती है। 
छत्तीसगढ़ में प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित दस विश्वविद्यालय हैं। इनमें 1954 में स्थापित कला व संगीत विश्वविद्यालय भी है, लेकिन इनमें से एक में भी छत्तीसगढ़ की संस्कृति को लेकर कोई गंभीर काम नहीं होता। यह ऐसा प्रदेश है जहां छुटभैये नेता अपने ऊपर पी.एच.डी. करवा लेते हैं। यहां के लेखक और कलाकार पद्मश्री पाने के लिए खुद होकर आवेदन करते हैं और सिफारिशी चिट्ठियाँ लिखवाते इस-उस की ड्योढ़ी पर माथा टेकते हैं। यहां साल के प्रत्येक दिन कोई न कोई उत्सव, कोई न कोई सांस्कृतिक आयोजन होते रहता है, लेकिन जब तक मंत्री न आ जाएं, कार्यक्रम शुरू नहीं होता। उनके आने से आयोजक धन्य हो जाते हैं। कार्यक्रम के बीच में उठकर चले जाएं तो भी कोई बुरा नहीं मानता।
यह मजे की बात है कि 1964 में रायपुर में रविशंकर विश्वविद्यालय स्थापित हुआ। इसमें हिंदी विभाग नहीं है। ललित कलाओं के लिए भी कोई विभाग नहीं है। यहां अपने पैसे से दो-चार किताबें छपवा लेने वाले अधकचरे साहित्यकार भी अपने ऊपर शोध कार्य करवा लेते हैं। इनकी गुणवत्ता का परीक्षण करने की कोई व्यवस्था नहीं है। एक तरफ अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर, सरकारी-गैरसरकारी स्कूलों में ऐसे अध्यापक नहीं हैं जो बच्चों को शुुद्ध हिंदी लिखना सिखा सकें। नतीजतन जो हिंदी में एम.ए., पी.एच.डी. कर लेते हैं, उन्हें भी अच्छी हिंदी लिखना नहीं आता। प्रदेश के संस्कृति विभाग के हाल बेढब हैं। विगत तेरह वर्षों में इस विभाग का ठीक से ढांचा नहीं बन पाया और विभाग की दिशा क्या होगी, यह भी आज तक नहीं पता। इसीलिए बख्शीजी और मुक्तिबोध के नाम पर साहित्य के लिए नहीं, बल्कि शिक्षक पुरस्कार दिए जाते हैं।
प्रदेश में फिलहाल जो सांस्कृतिक परिदृश्य बना हुआ है, उसमें एक तो संस्कृति कर्मियों की लंबी कतार दिखाई देती है। इनमें से प्रत्येक को या तो कोई पुरस्कार चाहिए या पुस्तक प्रकाशन के लिए आर्थिक सहायता या फिर अपनी बनाई किसी जेबी संस्था के लिए अनुदान। यह शायद इस प्रदेश में ही होता है कि सरकारी स्तर पर आयोजित कवि सम्मेलन में अपना नाम जुड़वाने के लिए कविगण आयोजक अधिकारी को पत्र-पुष्प देने के लिए तैयार रहते हैं। इसके चलते किसी महोत्सव में आप मंच पर सौ-सौ कवियों को बैठा देख सकते हैं। प्रदेश में जो सृजनपीठ हैं अथवा जो साहित्य अकादमी जैसी संस्था प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हैं, उनके नाम-काम मन में किसी प्रकार का उत्साह नहीं जगाते।
बात यहां समाप्त नहीं होती। प्रदेश तीजन बाई जैसे कलाकारों पर उचित ही गर्व करता है, वहीं छत्तीसगढ़ की संस्कृति के नाम पर अब जो फूहड़पन परोसा जा रहा है, वह असहनीय है। कुछ व्यापारी लोक कलाओं के स्वयंभू संरक्षक बन गए हैं। लोक गीतों के नाम पर अब अश्लील गीतों के कैसेट बाज़ार में बिक रहे हैं, भक्ति गीतों के नाम पर बहरा कर देने वाला शोर-शराबा है, सुआगीत आदि के नाम सिर्फ एक नकलीपन है, छत्तीसगढ़ में बनने वाली फिल्मों में छत्तीसगढ़ कहीं नहीं है, आदिवासी कलाकारों के शिल्प से मौलिकता और उनके अपने जीवन अनुभव लगभग लुप्त हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ में जो लोग साहित्य व कला के क्षेत्र में सक्रिय हैं, आज उनकी चिंता यह है कि कैसे अपनी सहज प्रेरणा को बचा कर रखें, कैसे अपनी कल्पनाशीलता को मरने से बचाएं और कैसे लोभ-लालच के इस वातावरण में अपने आपको सुरक्षित रख सकें।

(बिलासपुर से प्रकाशित वार्षिक पत्रिका 'मड़ई' के अंक 2013 में प्रकाशित)
देशबंधु अवकाश अंक में 11 फरवरी 2018 को पुनर्प्रकाशित 

Thursday, 8 February 2018

आसियान देशों के साथ दोस्ती-2



 
इस साल गणतंत्र दिवस पर मोदी सरकार ने एक ओर जहां आसियान देशों के राज्य प्रमुखों को आमंत्रित किया वहीं इन देशों के एक-एक अग्रणी व्यक्ति को पद्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया। यह भी अपने आप में एक नई पहल थी। इस सम्मानित जनों में एक को मैं कुछ-कुछ जानता हूँ। थां मिंट ऊ वैश्विक राजनीति के अधिकारी विद्वान हैं। अपने देश म्यांमार के इतिहास और राजनीति का उन्होंने गहन अध्ययन किया है। उनकी एक चर्चित पुस्तक है- व्हेयर चाइना मीट्स इंडिया: बर्मा एंड द न्यू क्रॉसरोड्स ऑफ एशिया।  इस पुस्तक में उन्होंने म्यांमार की भौगोलिक स्थिति और राजनैतिक इतिहास की विवेचना करते हुए प्रतिपादित किया है कि कैसे उनका देश चीन और भारत के बीच का मिलन बिन्दु है। ऊ का जन्म न्यूयार्क में हुआ। वे रहते भी विदेश में हैं, लेकिन वे प्रारंभ से ही म्यांमार के नागरिक हैं। शायद कुछ वैसे ही जैसे नोबल विजेता अमर्त्य सेन ने भारत की नागरिकता कभी नहीं छोड़ी।
थां मिंट ऊ के बारे में यह उल्लेखनीय है कि वे अपने समय में बर्मा के प्रमुख राजनेता और बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव रहे ऊ थां के बेटे हैं। यह जानना दिलचस्प है कि एशिया में पारिवारिक परंपराओं का विस्तार कहां से कहां तक है। यदि राजवंशों की बात न करें तो भी जनतांत्रिक देशों में भी अपवाद की बजाय नियम की तरह उनकी उपस्थिति देखी जा सकती है। शिंजो आबे, मेघावती सुकार्णोपुत्री, आन सांग सू ची, चंद्रिका कुमारतुंग, बेनजीर भुट्टो इत्यादि उदाहरण सामने हैं। बहरहाल आसियान देशों के साथ भारत के संबंधों की चर्चा करते समय यह भी ध्यान आता है कि इन देशों में एक जैसी शासन प्रणाली नहीं है; और इनके राजनैतिक इतिहास में उपनिवेशवाद से मुक्ति भले ही एक सामान्य सूत्र हो, लेकिन असमानताएं भी बहुत सी हैं। कुल मिलाकर विविध छटाओं वाली एक तस्वीर सामने आती है। भारत को प्रत्येक देश से उसको विशेष परिस्थिति के अनुसार संबंधों को निभाना है।
भारत और आसियान देशों के मैत्री संबंधों की क्या तस्वीर बनती है यह बहुत कुछ भारत-चीन संबंधों तथा चीन की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर निर्भर करता है। भारत और चीन दोनों एशिया के ही नहीं, दुनिया के दो प्रमुख देश हैं। दोनों की आबादी मिलकर विश्व की एक तिहाई आबादी होती है। दोनों के अपने-अपने बुलंद इरादे हैं। राजनैतिक पर्यवेक्षक इसे ड्रैगन और हाथी के बीच प्रतिस्पर्द्धा का रूपक बनाकर देखते हैं। भारत ने दो सौ साल अंग्रेजों की गुलामी झेली और फिर नवस्वतंत्र देश को आगे ले जाने के लिए आधुनिक गणतंत्र की अवधारणा को स्वीकार किया। चीन वैसे कभी पूरी तरह से किसी विदेशी सत्ता का दास नहीं रहा; लेकिन जापान और कोरिया के अलावा ब्रिटेन, पुर्तगाल, फ्रांस और अमेरिका का सीमित प्रभुत्व उसे इतिहास में झेलना पड़ा। 1949 में वहां एक पार्टी की सत्ता कायम हुई जो अभी तक चली आ रही है और जिसे कायम रखने में सैन्यशक्ति के अलावा बहुसंख्यक हन भाषा व संस्कृति का बड़ा रोल रहा है।
वियतनाम ने पहले डच और फिर अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ लंबा संघर्ष किया। सार्वभौम देश बनने के बाद वहां कम्युनिस्ट सत्ता स्थापित हुई। यह इतिहास की विडंबना है कि कम्युनिस्ट चीन ने एक दूसरे कम्युनिस्ट देश पर हमला कर अपना प्रभुत्व जतलाने की कोशिश की। कंबोडिया में खमेर और पोल पाट द्वारा किए गए नरसंहार के बाद कम्युनिस्ट सत्ता स्थापित हुई, लेकिन वहां प्रधानमंत्री हन सेन तीस वर्षों से एकछत्र नेता बने हुए हैं। म्यांमार में सेना द्वारा संचालित जनतंत्र है जिसमें  नोबल विजेता आन सांग सू ची निष्प्रभावी तथा निर्बल नजर आती हैं। फिलीपींस का इतिहास भी रक्तरंजित है और फिलहाल राष्ट्रपति दुतेर्ते ने वहां निरंकुश सत्ता स्थापित कर ली है। थाइलैंड में सेना ही निर्णायक भूमिका में है और चुने गए नेता उसके सामने कोई हैसियत नहीं रखते। सिंगापुर में एक पार्टी का ही शासन चला आ रहा है। मोटे तौर पर इन सभी देशों में मानव अधिकार या नागरिक स्वतंत्रता जैसी संज्ञाएं बहुत मायने नहीं रखतीं।
कुल मिलाकर इन देशों के साथ संबंधों को गति देने के लिए बहुत सारे बिंदुओं पर अलग-अलग विचार करने और नीति बनाने की आवश्यकता भारत को है। यह तथ्य गौरतलब है कि चीन ने बीते वर्षों में कई आसियान देशों में भारी मात्रा में पूंजी निवेश किया है। जैसा कि उसने एशिया और अफ्रीका के अन्य बहुत से देशों में किया है। यदि भारत चाहे भी तो इस मामले में चीन से प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सकता। चीन के पास जो संसाधन हैं वे हमारे पास नहीं हैं। चीन जिस तरह की आक्रामक राजनीति करता है वह भी हम नहीं कर सकते। चीन ने आसियान देशों को जो आर्थिक सहयोग दिया है, वहां आधारभूत संरचना में जैसा निवेश किया है उसके चलते उनमें चीन की पूछ-परख हमारे मुकाबले अधिक होती है। यह बात अलग है कि इस सहयोग का असली लाभ उस देश को नहीं बल्कि चीन को मिल रहा है। क्योंकि यह पूंजी निवेश मुख्यत: ऋण की शक्ल में किया गया है न कि अनुदान के रूप में।

यह हम जानते हैं कि चीन ने सदियों पुराने सिल्क रूट को नए सिरे से खोलकर मध्यएशिया से होते हुए यूरोप तक का रास्ता बना लिया है। इसमें पाकिस्तान भी उसका भागीदार है जबकि भारत इस परियोजना को संशय की दृष्टि से देख रहा है। इसी तरह चीन हिन्द महासागर में भी अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा है। इससे भी भारत सशंकित है। इतना ही नहीं चीन से बर्मा तक सड़क और ऐसे बहुत से उपक्रमों पर काम हो रहा है। भारत भी पुराने बर्मा रोड को खोलकर दक्षिणपूर्व एशिया के साथ संपर्क को बढ़ाना चाहता है, लेकिन मुझे नहीं मालूम कि इस काम को कितनी प्राथमिकता दी गई है। दक्षिण चीन सागर में चीन अपना वर्चस्व स्थापित करने में लगा है जिससे वियतनाम भयभीत है। भारत वियतनाम के साथ है और यह बात भारत-चीन के बीच विवाद का एक बिन्दु भी है।
इन सारी स्थितियों को ध्यान में रखकर कहना होगा कि आसियान देशों के साथ दोस्ती मजबूत करने का इरादा तो बिल्कुल ठीक है, लेकिन इसके लिए उत्सवधर्मिता से आगे बढ़कर काम करना होगा। मैं विश्वास करना चाहूंगा कि प्रधानमंत्री मोदी का ध्यान इस ओर है। मेरी समझ में सबसे पहली आवश्यकता एक ऐसे वातावरण निर्माण की है जिसमें दक्षिण पूर्व एशिया में भारत और चीन प्रतिद्वंद्वी की भूमिका में न दिखें। म्यांमार हो या फिलीपींस, चीन के साथ उसके रिश्ते अलग चलते रहें और हमारे संबंध एक स्वतंत्र धरातल पर मजबूत हों। यदि चीन इन देशों में कहीं पूंजी निवेश करता है तो वह करे।
भारत को वे विषय ढूंढना चाहिए जहां दीर्घकालीन परस्पर सहयोग की गुंजाइश हो। एक उदाहरण कंबोडिया के विश्वप्रसिद्ध अंकारेवाट मंदिर का है। इसके जीर्णोद्धार में कई दशक पूर्व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण याने एएसआई ने सहायता की थी और आज भी वह कार्य चल रहा है।  इस तरह सांस्कृतिक सहयोग के और भी अवसर इन देशों में अवश्य होंगे। इनमें अनेक देशों से भगवान बुद्ध से जुड़े स्थानों की यात्रा के लिए बड़ी संख्या में तीर्थ यात्री और पर्यटक भारत आते हैं। इसे कैसे और सुचारू, सुरक्षित, संतोषजनक बनाया जाए यह देखना होगा।
राजनीतिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि इन सभी देशों में जनतांत्रिक इच्छा प्रबल है। सैन्य शासन या राजतंत्र के बावजूद यह भावना कायम है। एक समय हमने आन सांग सू ची को निरंतर अपना समर्थन दिया था। आज भी इन देशों में जनतंत्रवादी ताकतों को हम किस तरह समर्थन दे सकते हैं यह विचारणीय होगा। इन देशों में जो सांस्कृतिक विविधता है वह काफी हद तक भारत की तरह है। इसका संज्ञान लेना लाभकर हो सकता है।
देशबंधु में 08 फरवरी 2018 को प्रकाशित 

Friday, 2 February 2018

आसियान देशों के साथ दोस्ती


 
इस साल 26 जनवरी को भारतीय गणतंत्र के अड़सठ साल पूरे हुए। इस अवसर पर दिल्ली में आयोजित पारंपरिक समारोह में दुनिया के दस देशों के राजप्रमुख एक साथ विशिष्ट अतिथि के तौर पर शरीक हुए। ये दसों देश दक्षिण पूर्व एशिया के हैं तथा आसियान के नाम से परिचित आर्थिक सहयोग संगठन के सदस्य हैं। हमारे गणतंत्र दिवस समारोह में इनकी उपस्थिति कई कारणों से महत्वपूर्ण थी। इन सभी देशों के साथ भारत के रिश्ते बहुत पुराने हैं। समय के साथ ये रिश्ते दृढ़ से दृढ़तर होने चाहिए थे किन्तु ऐसा न हो सका। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इनको आमंत्रित कर एक नई शुरूआत की है, जो स्वागत योग्य है और मेरी समझ में इसके दूरगामी परिणाम अच्छे निकलना चाहिए। श्री मोदी ने एक उम्दा पहल चुनाव जीतने के साथ अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के राजप्रमुखों को आमंत्रित करके की थी। दुर्भाग्य से वह पहल सही ढंग से आगे नहीं बढ़ सकी। उल्टे पाकिस्तान, नेपाल और मालदीव के साथ हमारे रिश्ते तनावपूर्ण हो गए। यह ठीक नहीं हुआ।
हम उम्मीद करना चाहेंगे कि अब की बार प्रधानमंत्री मोदी ने जो पहल की है उसे कायम रखा जाएगा और इन देशों के साथ हमारे सदियों पुराने संबंधों में मजबूती आएगी। आसियान देश और भारत के बीच के संबंधों का एक महत्वपूर्ण पहलू यही है कि हमारी मैत्री का इतिहास बहुत लंबा है। इनके साथ हमारे रिश्ते कभी तनावपूर्ण भी नहीं रहे। इन सभी देशों पर प्राचीन भारतीय संस्कृति का किसी न किसी हद तक प्रभाव है। हमारी ही तरह इन्होंने भी उपनिवेशवाद के दौर में गुलामी झेली है तथा लड़कर स्वाधीनता पाई है। थाइलैंड को अपवाद माना जा सकता है जो प्रत्यक्ष रूप से कभी विदेशी सत्ता के अधीन नहीं रहा। एक बड़ी खासियत भौगोलिक रूप से है। ये देश चीन के दक्षिण और भारत के पूर्व में है। याने एशिया के दो बड़े देशों की परछाई इन पर शताब्दियों से किसी न किसी रूप में पड़ती रही है। लाओस, वियतनाम और कंबोडिया के सकल क्षेत्र को तो इंडो-चाइना कहकर ही पहचाना जाता रहा है।
इन दस देशों में तीन की जनसंख्या मुस्लिम बहुल है। ये हैं- ब्रुनेई, मलेशिया, और इंडोनेशिया। इंडोनेशिया विश्व में सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाला देश है। यहां इस्लाम का जो स्वरूप विकसित हुआ है उसे भारत में एक नजार की तरह पेश किया जाता है। कारण यह है कि इंडोनेशिया पर प्राचीन भारतीय संस्कृति का किसी समय बड़ा प्रभाव था। वहां व्यक्तियों और स्थानों के नामों पर संस्कृत की स्पष्ट झलक आज भी देख सकते हैं। वहां रामायण-महाभारत का भी मंचन होता है और बाली द्वीप में दीवाली भी मनाई जाती है। आशय यह कि इंडोनेशिया में इस्लाम का काफी देशीकरण हुआ है। इसे आदर्श मानकर भारत में मुसलमानों पर उंगली उठाने वाले अपनी सुविधा से अनदेखी कर देते हैं कि यहां भी इस्लाम का कितनी बड़ी सीमा तक भारतीयकरण हुआ है।
पता नहीं यही लोग जापान के बारे में क्या कहेंगे जहां हिन्दू देवी-देवताओं का पूरी तरह जापानीकरण कर दिया गया है! लक्ष्मी, गणेश, सरस्वती को जापानी नाम दे दिए गए और उनकी मूर्तियां भी उन्हीं की शैली में बनने लग गईं। बहरहाल, आज याद रखने की बात यह है कि स्वतंत्र भारत ने पंडित नेहरू के दौर में इंडोनेशिया को डच गुलामी से मुक्त कराने में भरपूर मदद की थी। जब डच सेना ने जननेता सुकार्णो को नजरबंद कर दिया था तब नेहरू जी के निर्देश पर दु:साहसी विमान चालक और राजनेता बीजू पटनायक वहां जाकर उनको सुरक्षित निकाल लाए थे।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में नेहरू, नासिर और टीटो के अलावा दो और प्रमुख स्तंभ थे अफ्रीकी देश घाना के क्वामे एनक्रूमा और इंडोनेशिया के सुकार्णो। नेहरूजी ने सुकार्णो को पहले गणतंत्र दिवस समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित भी किया था। 1946 में दिल्ली में आयोजित एशियाई सहयोग सम्मेलन के बाद 1955 में सुकार्णो ने दूसरे सम्मेलन की मेजबानी की थी जिसे बाडुंग सम्मेलन के नाम से हम जानते हैं और जहां पंचशील को राजनैतिक मान्यता दी गई थी। इसी सम्मेलन के दौरान सीआईए ने भारत के काश्मीर प्रिंसेस जहाज में बम विस्फोट कराया था। उसे गलत जानकारी थी कि चाउ एन लाई उस जहाज में थे। यह एक अलग कहानी है।
मलेशिया के साथ भी हमारे संबंध बहुत पुराने हैं। प्रसंगवश जानकारी देना उचित होगा कि इंडोनेशिया और मलेशिया दोनों अनेक द्वीपों से मिलकर  बने देश हैं। मलेशिया वह देश हैं जिसने मुस्लिम बहुल होते हुए भी पहले 1965 फिर 1971 के बंगलादेश मुक्ति संग्राम में भारतीय पक्ष का खुलकर समर्थन किया था। उस समय टुंकु अब्दुल रहमान प्रधानमंत्री थे। अभी उनके बेटे टुन अब्दुल रज्जाक प्रधानमंत्री हैं। वैसे ही जैसे पड़ोसी सिंगापुर में लीक क्वान यू के बेटे ली लुंग प्रधानमंत्री हैं। मलेशिया पर भी भारतीय संस्कृति का गहरा प्रभाव है। वहां एक बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग निवास करते हैं। इनमें अधिकतर तमिल हैं जो अंगे्रजी राज के दौरान रबर बागानों में मजदूरी करने के लिए ले जाए गए थे। आज की पीढ़ी मलेशिया को मुख्यत: एक पर्यटन स्थल या टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में ही जानती है। वजह यह है कि मलेशिया ने इसी दिशा में हाल के वर्षों में बहुत ध्यान दिया है और जमकर मार्केटिंग की है।
सिंगापुर की कहानी मलेशिया से बहुत अलग नहीं है। ये दोनों एक साथ स्वतंत्र हुए थे। दोनों ने मिलकर एक संघ भी बनाया था। वह प्रयोग ज्यादा दिन नहीं चला। सिंगापुर आकार और आबादी में छोटा देश है, लेकिन उसकी आबादी मलेशिया की ही तरह वैविध्यपूर्ण है। फर्क यह है कि मलेशिया में चीनी मूल के लोगों को कुछ अविश्वास से देखा जाता है जबकि सिंगापुर में उनका ही प्रभुत्व है। सिंगापुर में छह या आठ प्रतिशत आबादी भारतीय मूल के लोगों की है। वहां तमिल को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है तथा अल्पसंख्यकों को बराबरी का दर्जा देने के लिए राष्ट्रपति पद पर तमिल मूल के व्यक्ति को ही अधिकतर चुना जाता है। सिंगापुर भारतीयों के लिए पर्यटन का केन्द्र भी है, शापिंग का भी तथा अनेक भारतीय वहां नागरिकता लेकर व्यवसाय कर रहे हैं अथवा बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्यरत हैं। आसियान के देशों में सिंगापुर भारत का दूसरा सबसे बड़ा वाणिज्यिक भागीदार है। पहले नंबर इंडोनेशिया है जहां से हम पेट्रोलियम खरीदते हैं।
इंडो-चाइना के तीनों देशों का राजनैतिक इतिहास बहुत उथल-पुथल का रहा है। कंबोडिया को पोल पॉट के शासन में भयानक नरसंहार से गुजरना पड़ा। जबकि वियतनाम ने अमेरिका से एक लंबी लड़़ाई लड़कर आजादी हासिल की।  उसे चीन के आक्रमण का भी सामना करना पड़ा। वियतनाम, कंबोडिया और लाओस इन तीनों देशों पर भारत की सनातनी और बौद्ध दोनों परपंराओं का गहरा प्रभाव रहा है। अभी इन सभी देशों में कम्युनिस्ट शासन है, लेकिन चीन की ओर से वे हमेशा सावधान रहते हैं। ब्रुनेई में तेल के भंडार हैं और वहां के सुल्तान विश्व के अरबपतियों में एक हैं। थाइलैंड, बर्मा याने म्यांमार के साथ हमारा अनेक स्तरों पर निरंतर संपर्क बना हुआ है। फिलीपींस पर लंबे समय तक अमेरिका का नियंत्रण रहा है और आज भी है। भारत की इन सारे देशों के साथ एक बड़ी समानता यह भी है कि ये सब धान उत्पादक देश हैं।
इन देशों के साथ हमारे प्राचीन समय से चले आ रहे संबंधों को जितना सुदृढ़ किया जा सके उतना अच्छा होगा। प्रधानमंत्री वाजपेयी ने लुक ईस्ट का आह्वान किया था। मोदीजी ने एक्ट ईस्ट की बात कही है। अपने इन पड़ोसी देशों के साथ, जो हमारे स्वाभाविक मित्र हैं, बेहतर संबंध होने का सीधा मतलब है कि सबके आर्थिक स्तर में सुधार और आम जनता के जीवन में बेहतरी। यूरोप में कई देशों के बीच वीजा की अनिवार्यता समाप्त हो गई है। भारत इसी तरह सार्क और आसियान देशों के बीच कुछ ऐसी पहल कर सके तो सबके हित में होगा। चीन हमारा बड़ा पड़ोसी है। सबसे अधिक शक्तिशाली भी। उसके साथ भी हमारा व्यापार बढ़ रहा है। आसियान के राजप्रमुखों की भारत यात्रा पर उसने सकारात्मक टिप्पणी की है जिसका हम स्वागत करते हैं। आज का दौर आर्थिक रिश्तों को मजबूत करने का है। उसी से स्थितियां सामान्य होंगी। युद्ध का वातावरण शांति के वातावरण में बदलेगा। मोदीजी अपनी पहल को तर्कपूर्ण निष्पत्ति तक पहुंचा सकें, हम फिलहाल यही उम्मीद करना चाहेंगे।
देशबंधु में 01 फरवरी 2018 को प्रकाशित 

Wednesday, 24 January 2018

संसदीय सचिव याने सत्ता सुख

                                      
 कल 26 जनवरी है। गणतंत्र दिवस। भारतीय संविधान को अंगीकार तथा आत्मार्पित करने का दिन। उसकी रक्षा के लिए शपथ लेने का दिन। इस अवसर पर अपने देश की राजनीतिक व्यवस्था की एक बड़ी विडंबना मुझे ध्यान आती है। एक तरफ तो हमने इंग्लैण्ड की वेस्टमिंस्टर प्रणाली याने संसदीय जनतंत्र को अपनाया; दूसरी ओर हमारा सत्ताधारी वर्ग अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली की शैली के अनुसार आचरण कर रहा है। इंग्लैण्ड में संविधान की धाराओं से कहीं अधिक महत्व संसदीय परंपराओं को दिया जाता है जो पिछली कई शताब्दियों में धीरे-धीरे कर विकसित हुई है। वहां संसद सर्वोच्च है और कार्यपालिका उसके प्रति उत्तरदायी। इन परंपराओं का पालन करने में यदि कुर्सी जाती है तो चली जाए, राजनेता उसकी चिंता नहीं करते। मार्गरेट थैचर का उदाहरण सामने है। उन्हें आयरन लेडी की उपाधि मिली थी, लेकिन छोटी सी बात पर उन्होंने प्रधानमंत्री पद छोड़ दिया था। अभी हाल में डेविड कैमरून ने ब्रेक्सिट के मामले में हार होने पर तुरंत इस्तीफा दे दिया और 10 डाउनिंग स्ट्रीट से अपना सामान खुद उठाकर पीछे के दरवाजे से चलते बने।
इसके बरक्स अमेरिका में राष्ट्रपति सर्वोच्च है। वह अमेरिकी सांसद या अमेरिकी कांग्रेस के प्रति उत्तरदायी नहीं है। उसके निर्णयों पर संसद द्वारा रोक लगाने के प्रावधान अवश्य हैं, किन्तु राष्ट्रपति चाहे तो वीटो का इस्तेमाल कर संसद के निर्णय को दरकिनार कर सकता है। तथापि राष्ट्रपति पूरी तरह से निरंकुश हो जाए ऐसा भी नहीं है। अमेरिका की अदालतें कार्यपालिका से बड़ी हद तक स्वतंत्र रहकर और उसके दबाव में आए बिना फैसले करती हैं। यह तब जबकि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रपति की पसंद सर्वोपरि होती है। रिपब्लिकन राष्ट्रपति हो तो किसी रिपब्लिकन को ही जज बनाता है। इसके साथ-साथ मीडिया भी अक्सर अपनी स्वतंत्र चेतना का परिचय देता है यद्यपि मीडिया का स्वामित्व अधिकतर कार्पोरेट घरानों के हाथ में ही होता है। इंग्लैण्ड और अमेरिका की  इन स्थितियों को सामने रखकर देखें तो पता चलता है कि हमारे सत्ताधीश अमेरिकी राष्ट्रपति से बढ़कर निरंकुश रहना चाहते हैं। उन्हें किसी भी तरह की रुकावट पसंद नहीं है और संसदीय जनतंत्र को तो मानो वे बहुत मजबूरी में झेल रहे हैं।
भारत के संदर्भ में यह बात सिर्फ केन्द्रीय सत्ता पर नहीं, बल्कि राज्य सरकारों पर भी लागू होती है। इसकी शुरूआत आज हुई हो, ऐसा भी नहीं है। पंडित नेहरू के निधन के बाद से ही राजनीति में मूल्यों की गिरावट आना शुरू हो गई थी, लेकिन इधर तो स्थितियां बेहद गंभीर हो चली हैं। इनको लेकर तमाम राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं, लेकिन हमें कहने में संकोच नहीं कि इस मामले में सारी पार्टियों का आचरण एक जैसा है। इनकी हम चर्चा करें उसके पहले ऐसे कुछ उदाहरणों का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा जो संसदीय परंपराओं के उज्ज्वल पक्ष को प्रस्तुत करते हैं। 1976 में जब लोकसभा का कार्यकाल एक साल बढ़ाया गया तो समाजवादी नेता मधु लिमये और शरद यादव ने यह कहकर इस्तीफा दे दिया कि वे जितनी अवधि के लिए चुने गए थे वह पूरी हो गई है और उसके आगे सांसद बने रहने का उनका हक नहीं बनता। ध्यान देने योग्य है कि शरद उपचुनाव में जीत कर आए थे। पहली बार सांसद बने थे। इसके बाद भी उन्होंने पद पर बने रहने का मोह नहीं किया।
ज्योति बसु ने जो मिसाल पेश की वह तो अविस्मरणीय और ऐतिहासिक मानी जाएगी। वे अगर चाहते तो 1996 में भारत के प्रधानमंत्री, वह भी पहले कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री, बन सकते थे। उन्हें उनकी पार्टी ने ही यह पद स्वीकार करने से रोक दिया। यह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की ऐतिहासिक और अक्षम्य भूल थी, लेकिन ज्योति बाबू ने पार्टी को अपने ऊपर तवज्जो दी। इसके बाद 2004 में सोनिया गांधी भी चाहतीं तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं, लेकिन उन्होंने पार्टी की सारी मनुहारों को न मान पद लेने से इंकार कर दिया। इतना ही नहीं, जब लाभ का पद मामले में उनका भी नाम आया तो बिना समय गंवाए उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया और फिर उपचुनाव में जीतकर आईं। उसी प्रकरण में जया भादुड़ी सुप्रीम कोर्ट तक गईं तथा सोमनाथ चटर्जी ने एक छोटे से पद को छोड़ने के बजाय उसे लाभ के पद से अलग करवा दिया।
इन दृष्टांतों को याद रखना आवश्यक है क्योंकि इनसे तुलना करके ही हम जान सकते हैं कि आज राजनीति का चरित्र कितना सत्तालोलुप हो गया है। दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी का आचरण इस संबंध में दृष्टव्य है। दिल्ली जीतने के बाद केजरीवाल सरकार ने जनसुविधाओं के लिए निश्चित रूप से कुछ अच्छे काम किए जैसे यातायात के लिए ऑड-ईवन प्रयोग, मोहल्ला क्लिनिक, सरकारी स्कूलों में बेहतर सुविधाएं इत्यादि। लेकिन संसदीय परंपराओं के निर्वाह में उसने जो चूकें कीं उनकी उम्मीद एक ऐसे युवा नेता से नहीं की जाती थी, जो समाजसेवा में नवाचार के लिए मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित हो चुका हो। यहां हम दिल्ली के पूर्व और वर्तमान उपराज्यपाल के साथ उनकी खींचातानी की बात नहीं कर रहे हैं। पंजाब से लेकर गोवा तक उन्होंने जिस महत्वाकांक्षा का परिचय दिया वह भी अभी हमारी चर्चा का विषय नहीं है।
आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री से हम जानना चाहते हैं कि उन्हें इक्कीस संसदीय सचिव नियुक्त करने की क्या आवश्यकता थी? आप के पास दिल्ली में ऐसा बहुमत था जो भारत में कभी किसी भी पार्टी को पहले नसीब नहीं हुआ था। इसके बाद ऐसी क्या मजबूरी थी कि इक्कीस विधायकों को संसदीय सचिव पद का झुनझुना पकड़ाना पड़ा? ये सब विधायक चुने गए थे। क्या विधायक का पद कम महत्वपूर्ण होता है? क्या वह एक सम्मानजनक पद नहीं है? सिर्फ विधायक रहकर काम करने में कौन सी परेशानी पेश आ रही थी? मान लिया कि आपने कोई अतिरिक्त वेतन-भत्ता या सुविधाएं नहीं लीं, लेकिन विधायक के रूप में जो सुविधाएं मिल रही हैं, वे ही क्या कम थीं? दो लाख रुपए प्रतिमाह से अधिक का वेतन और कहां मिलता है? और जब नियुक्त करना ही था तो इस पद को लाभ के पद की श्रेणी से अलग रखने का प्रस्ताव तीन महीने बाद क्यों पारित किया?
अपने निर्णय को उचित ठहराने के लिए अरविंद केजरीवाल भगवान का नाम लेते हैं। कहते हैं ऊपर वाला जानता था कि बीस विधायकों की सदस्यता खत्म हो जाएगी इसलिए उसने सत्तर में से सड़सठ सीटों का प्रचंड बहुमत दे दिया। यह उनकी हताशा है या नादानी, कहना मुश्किल है। हमें प्रतीत होता है कि चुनाव आयोग ने आप के विधायकों को अपात्र घोषित करने में पक्षपात का परिचय दिया है। राष्ट्रपति ने भी जिस त्वरित गति से चुनाव आयोग के फैसले पर मुहर लगाई है वह भी आश्चर्यचकित करने वाली है। रामनाथ कोविंद ने इस निर्णय के द्वारा अपना नाम फखरूद्दीन अली अहमद और ज्ञानी जैलसिंह की सूची में लिखवा लिया है। वे राजेन्द्र प्रसाद, राधाकृष्णन, जाकिर हुसैन और के.आर. नारायणन की पंक्ति के राष्ट्रपति नहीं हैं, यह स्वयं उन्होंने सिद्ध कर दिया है, लेकिन इससे अरविंद केजरीवाल ने जो किया उसका खोखलापन दूर नहीं हो जाता।
मेरा मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार सदन की कुल संख्या के पंद्रह प्रतिशत से भीतर मंत्री पद देने की सीमा जो निर्धारित है वह सर्वथा उचित है। इसका उल्लंघन किसी भी रूप में स्वीकार नहीं होना चाहिए। पंजाब और पश्चिम बंगाल उच्च न्यायालय के फैसले हमारे सामने है जिनमें संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को अवैध ठहराया गया है। जब राष्ट्रपति ने दिल्ली के विधायकों को अपात्र घोषित कर दिया है तो उन्हें संसदीय परंपरा के अनुरूप निर्णय लेते हुए देश में जहां कहीं भी विधायक इस पद पर काबिज हैं उनकी पात्रता समाप्त करने की दिशा में तुरंत कदम उठाना चाहिए।
अरुणाचल, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, हरियाणा इत्यादि में अभी भी संसदीय सचिव के पद पर विधायक काम कर रहे हैं। उन्हें अब कोई नैतिक अधिकार या आधार नहीं है कि वे इस पद पर बने रहें। उन्होंने जो सुविधाएं उठाई हैं उसकी भी भरपाई याने रिकवरी होना चाहिए।  26 जनवरी को राष्ट्रध्वज को सलामी देने, देशभक्ति के फिल्मी गीत गाने और झूठे मन से बाबा साहेब का नाम लेने से गणतंत्र दिवस नहीं मनेगा। संविधान और संसदीय परंपराओं की रक्षा होगी तभी गणतंत्र दिवस मनाना सार्थक होगा।
देशबंधु में 25 जनवरी 2017 को प्रकाशित