Wednesday, 24 June 2015

योग बनाम योग दिवस


 यह अनुभवसिद्ध सच्चाई है कि योगासनों एवं यौगिक क्रियाओं का अभ्यास करने से मनुष्य को सेहतमंद बने रहने में सहायता मिलती है। यह भी उतना ही सच है कि योगाभ्यास कोई रामबाण नुस्खा नहीं है, जिससे हर बीमारी का उपचार हो जाए। आवश्यक पडऩे पर डॉक्टर की सलाह और अस्पताल की सुश्रुषा का सहारा लेना ही पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति आंख मूंदकर सिर्फ योग चिकित्सा के भरोसे रहा आए तो उसे लाभ के बजाय नुकसान होने की आशंका बनी रहेगी। वैसे एक वर्ग उन लोगों का भी है जो योग पर बिल्कुल विश्वास नहीं रखते। पाठकों को शायद कोलकाता के उन बुजुर्ग महाशय का स्मरण होगा जो अस्सी साल की वय में भी प्रतिदिन मीलों पैदल चलते हैं किंतु योगासनों को अप्राकृतिक एवं शरीर पर अत्याचार मानते हैं। उनका साक्षात्कार तीन-चार साल पूर्व टीवी पर आया था। खैर, दुनिया का ऐसा कौन सा विषय है जिसमें पक्ष-विपक्ष दोनों न होते हों?

बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर 21 जून को अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की तो इससे एक प्राचीन एवं लाभकारी विद्या या अनुशासन को मान्यता मिली, जिसका मोटे तौर पर सब तरफ स्वागत ही हुआ है। हम संतोष कर सकते हैं कि भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता भले ही न मिल पाई हो, विश्व को भारत की देन की रूप में पहिले अहिंसा दिवस और अब योग दिवस को रेखांकित किया गया। ऐसे किसी भी दिवस की घोषणा से संबंधित व्यक्ति, वस्तु या विचार का महत्व प्रतिपादित होता है, जनता को प्रेरणा मिलती है कि साल में कम से कम एक दिन वह उस विषय पर ध्यान केंद्रित कर अपने जीवन में उसका लाभ उठाने का प्रयत्न करे। लेकिन सच कहें तो यह लाभ तभी मिल सकता है, जब बात सिर्फ एक दिन तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन का स्थायी अंग बन जाए। मसलन अहिंसा दिवस की सार्थकता तभी है, जब मनुष्य हृदय से घृणा, वैमनस्य एवं प्रतिहिंसा के कुविचारों को पूरी तरह से छोड़ दे।

मैं उन करोड़ों जनों में से एक हूं जिसने योगाभ्यास का लाभ उठाया है। मेरे दादाजी ने मुझे मात्र 4-5 वर्ष की आयु में योगासन सिखलाना प्रारंभ कर दिया था। आगे चलकर स्काउट, फिर ए.सी.सी. (ऑक्ज़ीलरी कैडेट कोर) में भी मैंने योगाभ्यास किया। जब रायपुर में बिहार योग विद्यालय, मुंगेर की शाखा स्थापित हुई तो नियमित अभ्यास के लोभ में मैंने वहां जाना भी प्रारंभ किया। सुबह-सुबह ताज़ी, ठंडी हवा के बीच योगासन करने में उत्फुल्लता का अनुभव होता ही था। किंतु मैंने योग विद्यालय जाना उस दिन बंद कर दिया, जब वहां के स्वामीजी ने हम लोगों को कीर्तन एवं गुरुवंदना करने के लिए कहा। मैं वहां ‘‘गुरुदेव दया कर दीन जने’’ का गायन करने के लिए नहीं जा रहा था और न मेरी दृष्टि में योगाभ्यास से उसका कोई प्रत्यक्ष-परोक्ष संबंध था। मैंने महसूस किया कि स्वामीजी इस तरह अंधभक्तों की फौज खड़ी करने की चाल चल रहे थे।

मेरे ऐसे कुछ मित्र थे जो योग विद्यालय के न सिर्फ नियमित सदस्य थे, बल्कि उसका प्रचार करने में भी काफी उत्साह के साथ भाग लेते थे। इनमें से एक मित्र जो वकील थे, लंबे समय तक अपने दिल की बीमारी का इलाज योगाभ्यास से करने में लगे रहे, लेकिन एक दिन ऐसी स्थिति आई कि उन्हें सही उपचार के लिए ताबड़तोड़ बंबई भेजना पड़ा। उसके पहिले तक इन मित्र को भरोसा था कि कैंसर जैसे रोग का उपचार योग से हो सकता है। समय रहते उनका यह भ्रम टूट गया। मुझे भय है कि यह खतरा आज फिर मंडरा रहा है। आज प्रचारतंत्र पहिले की अपेक्षा कहीं अधिक मजबूत व प्रभावशाली है; प्रचार की तकनीकें भी नायाब हैं; आज योग गुरुओं को जो सरकारी मान्यता मिल रही है, वह भी अभूतपूर्व है। ऐसे वातावरण में आम जनता के बीच यह भ्रांति पनप सकती है कि योग से हर बीमारी का उपचार संभव है। हम समझते हैं कि भारत सरकार के आयुष विभाग को योग के लाभ एवं उसकी सीमाएं-दोनों के बारे में जनता को शिक्षित करना चाहिए।

अनुमान होता है कि स्वयं प्रधानमंत्री ने इस आसन्न खतरे को भांप लिया है। रविवार को राजपथ पर योग के सरकारी आयोजन के एक घंटे के भीतर ही प्रधानमंत्री का ट्वीट आ गया कि योग का व्यवसायीकरण करने वालों से सावधान रहें। यह कौन नहीं जानता कि बाबा रामदेव, श्रीश्री रविशंकर आदि आधुनिक संत दवा व प्रसाधन सामग्रियों का अच्छा खासा व्यापार करते हैं। इनके कारखानों में निर्मित सामान दूर-दराज तक जाकर बिकता है। ये संत अरबपति उद्यमी हैं। इनका सरकार में भी खासा दबदबा है। योग दिवस के ऐसे अद्भुत प्रचार से इनका मुनाफा बढऩे की संभावनाएं एकाएक कई गुना बढ़ गई हैं। ऐसे में इनका उत्साह छुपाए नहीं छुप रहा। दूसरी ओर योगासन के लिए रबर की दरी, यौगिक वेशभूषा आदि का भी एक नया बाकाार खड़ा हो गया है। कहते हैं चीन से ‘‘योगा मैट’’ आकर बिक रही हैं। याने आप अगर साधारण दरी या चादर पर योगासन करेंगे तो बेवकूफ कहलाएंगे। ये ‘‘योगा मैट’’ कौन बना और बेच रहा है? अभी यह संभावना भी दिख रही है कि जल्दी ही स्पोकन इंग्लिश क्लास, वेस्टर्न डांस क्लास और ब्यूटी पार्लर के साथ-साथ ‘‘योगा क्लासेज़’’ भी गली-गली में खुलने लगेंगी।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा होने के साथ ही एक अनावश्यक बहस इसको लेकर छिड़ी कि योग का धार्मिक पक्ष क्या है। इस बहस पर आग में घी देने का काम दोनों तरफ के सांप्रदायिक तत्वों ने किया। बहस अनावश्यक इसलिए थी कि हिंदू और गैर हिंदू दोनों अपनी रुचि अथवा इच्छा के अनुरूप योगाभ्यास करते रहे हैं। दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग जब रायपुर में कलेक्टर थे तब वे अपने बंगले के सामने ही स्थित उपरोक्त योग विद्यालय में नियमित जाया करते थे। मज़े दार बात यह है, कि तब उन्हें योग सिखलाने वाले स्वामी ऑस्ट्रेलिया से आए एक ईसाई युवक थे। योग में धर्म आड़े नहीं आता, उसका इससे बेहतर प्रमाण भला और क्या हो सकता है? कहना होगा कि योग को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश के पीछे दो तरह की मंशाएं काम कर रही थीं। हिंदू पुनरुत्थानवादी भारत को शीघ्रातिशीघ्र एक हिंदू राष्ट्र बना देना चाहते हैं। दूसरी ओर, अल्पसंख्यक समुदाय के बीच ऐसे तत्व विद्यमान हैं जो आक्रामक हिंदुत्व का तार्किक विरोध करने के बजाय मुसलमानों के बीच खौफ पैदा कर अपना नेतृत्व सिद्ध करना चाहते हैं। यह अच्छी बात है कि भारतीय जनता ने इनको गंभीरता से नहीं लिया। इस प्रसंग में संघ से भाजपा में डेपुटेशन पर भेजे गए राम माधव की निंदा की जाना चाहिए जिन्होंने उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर अनर्गल आरोप मढ़े और बाद में ट्विटर पर अपनी टिप्पणियां हटा दीं। उन्हें ऐसी क्या हड़बड़ी थी?

अब सवाल उठता है कि सरकार प्रायोजित इस भव्य प्रस्तुति के बाद आगे क्या होगा। यह सवाल उठाना लाज़िमी है। हमें थोड़ा पीछे जाकर देखने की आवश्यकता है कि 2 अक्टूबर 2014 को अन्तरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस को किस रूप में मनाया गया। ऐसा क्यों हुआ कि अहिंसा का स्थान स्वच्छता ने ले लिया। और फिर स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा जोर-शोर से प्रारंभ स्वच्छता अभियान आज किस हालत में है। क्या योग दिवस को भी एक दिन के औपचारिक समारोह के बाद इसी तरह भुला दिया जाएगा? हमारे यहां नेक इरादों से प्रारंभ किया गया कोई भी अभियान अपनी स्वाभाविक परिणति तक पहुंचने के पहिले रास्ते में ही दम तोड़ देता है, क्या यह हमारी चिंता का विषय नहीं होना चाहिए? क्या इसकी वजह यह है कि हमारे नीति-निर्माता चुनाव जीतने के बाद अपनी सहजबुद्धि से काम लेना बंद कर देते हैं और इसके बजाय वे झूठी चमक-दमक का शिकार हो जाते हैं?

अब बात गिनीज़ बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज कराने की। इंग्लैंड की एक शराब कंपनी द्वारा अपनी बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से प्रकाशित इस पुस्तक में 21 जून योग दिवस की प्रविष्टि हो जाने से क्या होगा? इसमें आए दिन तमाम ऊटपटांग हरकतों को उपलब्धि बताकर दर्ज किया जाता है। मोदी सरकार ने एक तरह से बचकानेपन का प्रमाण दिया है। इस क्षणिक ‘‘उपलब्धि’’ के मोह से यदि बचा जाता तो बेहतर होता। आशा की जाना चाहिए कि जनता इन प्रश्नों पर यथासमय अवश्य विचार करेगी।
 देशबन्धु में 25 जून 2015 को प्रकाशित

Saturday, 20 June 2015

खैरागढ़ के रास्ते पर


रायपुर से भिलाई। फिर चिखली, नगपुरा, जालबांधा होकर खैरागढ़। अभी और आगे जाना था- ईटार तक। एक लंबा समय बीत गया। मित्र रमाकांत श्रीवास्तव ने राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के एक शिविर की कुछ तस्वीरों के साथ रिपोर्ट भेजी थी। इंदिरा कला संगीत वि.वि. के छात्र कैडेट गांव की दीवारों पर चित्र उकेर रहे हैं। अपनी प्रतिभा से गांव की गलियों को एक नए आकर्षण से भर रहे हैं। कैंप ईटार गांव में लगा था, वहीं की तस्वीरें थीं। इसलिए जब गांव में एक साहित्यिक कार्यक्रम में आने का न्यौता मिला तो स्वीकार करने में देरी नहीं की। अपनी स्मृति में अनायास बस गए एक नितांत अपरिचित ग्राम को देखने का अवसर जो मिल रहा था। बाहर से ईटार वैसा ही औसत गांव है जैसे देश के बाकी सात लाख गांव हैं, लेकिन पास जाकर देखने से पता लगता है कि हर स्थान की अपने-आप में कोई खूबी होती है। ईटार में हमारी मुलाकात हुई पलटन दाऊ से। 80-85 उम्र के दाऊजी ब्रह्म मुहूर्त से भी पहिले उठ जाते हैं और सुबह चार बजे अपने घर में स्थापित लाउडस्पीकर से ग्रामवासियों को न सिर्फ जगाते हैं, बल्कि उन्हें गांव से संबंधित नई-पुरानी खबरें सुनाते हैं। हम वहां 3 जून की शाम पहुंचने वाले थे, उसकी घोषणा सुबह कर दी गई थी। सो कहना चाहिए कि दाऊ गांव का चलता-फिरता अखबार हैं, शायद आकाशवाणी कहना अधिक सटीक होगा!

जगजाहिर है कि छत्तीसगढ़ तालाबों का प्रदेश है। यह बात अलग है कि तेजी से तालाब पट रहे हैं और सरकारी अमला उन्हें पाटने के लिए धन लेकर तन-मन से सहयोग भी कर रहा है। फिर भी जो जनमान्यता है, उसे सही सिद्ध करने के लिए ईटार में झा परिवार का अपना 12 एकड़ का तालाब है। ऐसे पुराने निजी तालाब प्रदेश में मैंने अन्यत्र भी देखे हैं। ईटार में भी और तालाब शायद होंगे। तालाब है तो मछलियां भी होना ही हैं। उनसे पौष्टिक आहार की व्यवस्था है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में योगदान है और खैरागढ़ की हाट में व्यापार का विकास भी है। छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन की पाठक मंच योजना की इकाई खैरागढ़ में है, जिसके संयोजक डॉ. प्रशांत झा हैं। उन्होंने अपने गांव में साहित्य चर्चा एवं कवि सम्मेलन का कार्यक्रम रखा जो रात आठ बजे प्रारंभ हुआ तो सुबह एक बजे तक चला। कविताएं पहिले, चर्चा गोष्ठी बाद में। उसका भी प्रसारण लाउडस्पीकर से गांव में होता रहा। इस कवि सम्मेलन में न तो लतीफेबाजी थी और किसी अन्य प्रकार का भौंडापन। सारा गांव सांस्कृतिक मंच के इर्दगिर्द उमड़ आया था। कविगण श्रोताओं की समझ और संवेदनशीलता को सराह रहे थे और श्रोता कवियों पर अपना प्रेम निछावर कर रहे थे। गांव के सारे टीवी सैट उस रात बंद थे।

ईटार की इस यात्रा को लेकर मेरे मन में अनेक लालच थे। कई बरसों से खैरागढ़ नहीं गया था। वहां मित्रों से मिलना चाहता था, इंदिरा कला-संगीत वि.वि. की बदलती तस्वीर भी देखने का मोह था और जालबांधा की सडक़ से एक बार फिर गुजरने का मन भी। कोई चालीस बरस पहिले जब पहिली बार खैरागढ़ गया था तब एक ही रास्ता मालूम था-व्हाया राजनांदगांव। उस रास्ते रायपुर-खैरागढ़ के बीच की दूरी लगभग 120 किमी थी। दुर्ग-पुराना शिवनाथ पुल-नगपुरा होकर पक्की सडक़ बनना प्रारंभ हुई तो दूरी घटकर कोई 100 किमी रह गई। इस बनती हुई सडक़ से ही मैंने अनेक यात्राएं कीं, कभी खैरागढ़ वि.वि. की परिषद बैठक में भाग लेने तो कभी किसी अन्य कार्यक्रम में। इस मार्ग पर पडऩे वाले छोटे से गांव जालबांधा का नाम मुझे न जाने क्यों शुरु से आकर्षित करता रहा! शायद इस नाम में किसी रचना की संभावना छुपी हो! इस पथ पर ही नगपुरा का जैन तीर्थ मेरे देखते-देखते विकसित हुआ। आज वह धर्मप्राण जैनियों का एक प्रमुख तीर्थ बन चुका है। उसके आगे एक समय सडक़ के दोनों ओर काफी दूरी तक मुख्यत: सुबबूल का वृक्षारोपण हुआ करता था। यह सरकारी सामाजिक वानिकी या सोशल फॉरेस्ट्री की योजना का अंग था, जिसका भरपूर लाभ अनेक व्यवसाय-प्रवीण व्यक्तियों ने उठाया।

खैर, इस ताज़ा यात्रा पर निकलने के पूर्व खैरागढ़ के साथी गोरेलाल चंदेल से मार्गदर्शन मिला कि भिलाई बाईपास से चिखली-नगपुरा होकर आऊं तो दूरी और समय की बचत होगी और सडक़ भी बेहतर मिलेगी। मैंने उनकी बात मान ली कि एक और नया रास्ता देखने मिलेगा। पत्रकार और लेखक को तो राहों का अन्वेषी होना ही चाहिए न! इस नए मार्ग से मात्र 90 किमी की दूरी कोई पौने दो घंटे में तय हो गई। रायपुर से भिलाई तो फोर-लेन है ही, बाईपास पर एक किमी चलने के बाद दुर्ग-धमधा मार्ग पर चिखली गांव आता है, वहां से मुडक़र नगपुरा और फिर जाना- पहचाना रास्ता। चिखली-नगपुरा के बीच शिवनाथ नदी के किनारे पर एक बड़ा भारी रिसोर्ट सा कुछ बनते देखा। जानकारी मिली कि यहां एक गोल्फ कोर्स बन रहा है। हमारे नया रायपुर में गोल्फ कोर्स बना कि नहीं, मुझे ज्ञात नहीं, किंतु चलिए अच्छा है किसी उद्यमी ने अपनी कल्पनाशीलता का परिचय देते हुए निजी गोल्फ कोर्स बना दिया। भारत को शंघाई एवं सिंगापुर का मुकाबला करना है तो यह सब तो होना ही चाहिए! (बशर्ते भूमि अधिग्रहण और उचित मुआवजे को लेकर कोई संघर्ष की स्थिति निर्मित न हो)।

इस नई सडक़ से आने पर नगपुरा गांव को पहिली बार ठीक से देखा। पुरातत्ववेत्ता बताते हैं कि इस ग्राम के आसपास खेतों में प्राचीन मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। नगपुरा के भव्य जैन मंदिर में जो प्रतिमाएं स्थापित हैं, उनके अलावा गांव के अन्य मंदिरों में भी वे संरक्षित हैं। सोचता हूं कि दुबारा अवसर मिले तो गांव के दूसरे मंदिर भी देखूंगा। नगपुरा ने अब एक कस्बे की शक्ल ले ली है। तीर्थ के साथ व्यापार का चोली-दामन का साथ होने के कारण यह विकास स्वाभाविक है। किंतु मुझे अनुमान नहीं था कि जालबांधा भी इतना बढ़ जाएगा। शायद कुछ तो आबादी बढ़ जाने के कारण और कुछ पक्की सडक़ के कारण आवागमन में वृद्धि के चलते! जालबांधा में गांव से लगकर ही पुलिस थाने की जो नई इमारत बनी है, वह यात्रियों का ध्यान अनायास अपनी ओर खींचती है। दुमंजिला भवन जिसके चारों कोनों पर छोटी-छोटी मीनारें खड़ी करने से एहसास होता है मानों किसी गढ़ी को देख रहे हों। सडक़ बहुत उम्दा बनी है, विकास की प्रक्रिया में गांव शनै: शनै: भीतर से उठकर बाहर सडक़ किनारे बसने लगे हैं। एक जगह राजनैतिक छत्रछाया पाकर चंडी मंदिर लगभग सडक़ पर ही आ गया है और गांव-गांव में वीरांगना अवंतिबाई की प्रतिमाएं स्थापित हो गई हैं। वैसे इस सडक़ पर मैंने जितने मंदिर-मढिय़ां देखे, वह भी शायद एक रिकॉर्ड ही हो। रास्ते में दो गांवों ने मुझे फिर अपने नाम से आकर्षित किया-एक जोगीगुफा, दूसरा शेरगढ़। क्या जोगीगुफा में कभी कोई जोगी रमता था? और शेरगढ़? हमारे-प्रदेश में अमूमन ऐसे नाम नहीं होते।

अब हम खैरागढ़ पहुंच चुके हैं। जंगल के मुहाने पर बसा नगर न तो भारतीय रेलवे के मानचित्र पर है और न किसी राजमार्ग पर। हां, अतीत में एक देशी रियासत अवश्य थी, किंतु तब ऐसी साढ़े पांच सौ रियासतें और भी थीं। फिर भी खैरागढ़ छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण स्थान है, जिसका नाम चर्चा में आने पर प्रदेशवासियों को गौरव अनुभव होता है, और वह भी किसी एक वजह से नहीं। खैरागढ़ आया तो इतिहास, भूगोल और संस्कृति के कितने ही चित्र आंखों के सामने झिलमिलाने लगे। छत्तीसगढ़ या तत्कालीन मध्यप्रदेश ही नहीं, भारत के सांस्कृतिक नक्शे पर इस जगह को महत्व मिलाने का सर्वप्रथम श्रेय मूर्धन्य लेखक-संपादक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी को जाता है। इतना कहना पर्याप्त होगा कि खैरागढ़ की यात्रा करना एक साहित्य तीर्थ की यात्रा करना होता है। साहित्य की दुनिया से आगे बढक़र खैरागढ़ को व्यापक ख्याति व प्रतिष्ठा मिली-इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय से। सीपी एंड बरार प्रांत में नागपुर व सागर के बाद खुलने वाला यह तीसरा विश्वविद्यालय था। खैरागढ़ से ही अपने कर्म जीवन का प्रारंभ करने वाले पं. रविशंकर शुक्ल की प्रेरणा से खैरागढ़ के राजपरिवार ने 1954 में दिवंगत राजकुमारी इंदिरा की स्मृति में वि.वि. स्थापित करने के लिए राजमहल इत्यादि का दान किया था। खैरागढ़ राजवंश में संगीत के प्रति अनुराग की सुदीर्घ परंपरा थी, एक राजा ने तो संगीत पर ग्रंथ भी रचे, इसीलिए यह उचित ही था कि नया विश्वविद्यालय ललित कला व संगीत के उच्च अध्ययन का केंद्र बनकर विकसित हो। आज खैरागढ़ की ही बेटी एवं देश की जानी-मानी नृत्यांगना डॉ. मांडवी सिंह इस विश्वविद्यालय की कुलपति हैं। पिछले दस वर्षों में वि.वि. ने प्रगति की नई मंजिलें तय की हैं, जिसका श्रेय युवा कुलपति की कल्पनाशीलता एवं ध्येयनिष्ठता  को भी जाता है। वि.वि. के पुराने परिसर का विस्तार होने के साथ-साथ नया परिसर भी आकार ले रहा है जिसे देखकर भविष्य के प्रति आश्वस्ति होती है।

सिर्फ एक शाम और देर रात के कुछ घंटे बिताने के बाद रायपुर लौटना था। तीन नदियों- पिपरिया, मुस्का और आमनेर से घिरे खैरागढ़ में साहित्य, ललित कला व सौहार्द्र की नदियां भी बहती हैं और प्रवासी के मन को घेर लेती हैं। प्रदेश के जनकवि खैरागढ़वासी जीवन यदु ने इस आयाम पर कोई गीत न रचा हो तो अब लिख लेना चाहिए।
देशबन्धु में 18 जून 2015 को प्रकाशित

Friday, 12 June 2015

भीष्म साहनी: जन्मशती स्मरण



भीष्म साहनी की लंबी रचना ‘आवाजें’ देश विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आए शरणार्थियों के जीवन से पाठक का परिचय करवाती है। दिल्ली में शरणार्थियों की एक बस्ती बस गई है। उनकी तीन पीढिय़ां यहां रहते हुए बीत चुकी हैं। जो मुसीबतज़दा लोग अपना सब-कुछ लुटाकर एक नई जगह पर आए थे उनके जीवन में धीरे-धीरे ठहराव आया है, कमोबेश खुशहाली भी आई है। स्थितियां बदल गई हैं, दृश्य बदल गए हैं, पहले और आज के व्यवहार में भी फर्क आ गया है। लेखक बारीक निगाहों से परिवर्तनों को देख रहा है। वह इनका बयान कुछ इस अंदाज में करता है, मानो सिनेमा की रील आंखों के सामने घूम रही है। यह रचना चूंकि एक कथासंग्रह में शामिल है इसलिए कहानी ही कहलाएगी, लेकिन मेरे मन में शंका है कि समीक्षक अपने प्रतिमानों पर इसे कहानी मानेंगे या नहीं। जो भी हो, मैं तो यह देख रहा हूं कि भीष्म साहनी ने सामान्य लोक व्यवहार से छोटे-छोटे दृश्य उठाकर कैसे एक बड़ी तस्वीर बना दी है। भीष्म जी के जन्मशती वर्ष पर उनकी रचनाओं को दुबारा पढ़ते हुए मुझे इस कहानी ने एकाएक अपनी ओर खींच लिया। उन्होंने अपनी रचना का शीर्षक दिया है आवाज़ें, लेकिन इन आवाज़ों में शोर नहीं है। कहानी के जितने पात्र हैं उनके बीच एक ही सूत्र हैं कि वे सबके सब शरणार्थी हैं। समय के साथ यह सूत्र धीरे-धीरे कमजोर पडऩे लगता है। एक सामान्य व्यक्ति के जीवन में जो भी अच्छा-बुरा घटित होता है वैसा ही सब कुछ इस कहानी के पात्रों के साथ भी होता है। इस बिखराव के बीच सिर्फ एक पात्र है, जो प्रारंभ से लेकर अंत तक कथा में मौजूद है। कथाकार मानो उसको माध्यम बनाकर उस बस्ती के जीवन का अध्ययन करता है। एक नए और अपरिचित स्थान पर दशकों पहले आकर बसे लोगों के जीवन में जो अस्थिरता, आशंका, भविष्य के प्रति चिंता, मुसीबत के समय सबके साथ रहने की इच्छा इत्यादि की जो आवाज़ें थीं वे अब हर व्यक्ति या परिवार के निजी जीवन की आवाज़ों में बदल गई हैं और लेखक कहता है कि मोहल्ला सचमुच रच-बस गया है। कहानी यहां खत्म हो जाती है।

भीष्म साहनी एक व्यक्ति के रूप में जितने सहज और सरल थे, उनकी रचनाएं भी उस सहज-सरल शैली में सामर्थ्य के साथ रची गई हैं। यदि अतिशयोक्ति के विरुद्ध अल्पोक्ति जैसे किसी विशेषण का इस्तेमाल किया जा सके तो मैं कहना चाहूंगा कि भीष्म साहनी अल्पोक्ति के कलाकार हैं। अंग्रेजी में एक शब्द है- अंडरस्टेटमेंट। यह विशेषण भीष्मजी की रचना शैली पर बखूबी लागू किया जा सकता है। उनके उपन्यास हों, नाटक हो या तमाम कहानियां, सबमें यही देखने मिलता है कि वे न तो नाटकीय रूप से घटनाओं का सृजन करते हैं और न अपनी ओर से कोई बयानबाजी करते हैं। वे जिन घटनाओं को अपनी रचनाओं का आधार बनाते हैं वे रोजमर्रा के जीवन में घटित होती हैं और हम सबने उनका कभी न कभी अनुभव किया है। किन्तु मेरी निगाह में उनकी खूबी यह है कि वे अपने पात्रों के माध्यम से उन घटनाओं को एक नए अर्थ से भर देते हैं जबकि ये पात्र भी सामान्य जनजीवन से ही आते हैं।


अपनी जिस कहानी के कारण भीष्मजी को बहुत अधिक ख्याति मिली याने ‘चीफ की दावत’- उसके अध्ययन से यह बात अधिक स्पष्ट हो जाती है। इस कहानी में भी एक औसत परिवार है जिसे हम शायद निम्न मध्यमवर्गीय कह सकते हैं। एक क्लर्क है जो अपनी तरक्की पाने की प्रतीक्षा कर रहा है। साहब को घर बुलाकर दावत देने से शायद वे खुश हो जाएंगे और पदोन्नति की राह आसान हो जाएगी, यह आशा उसे है। छोटा-सा घर है जहां पुराने तौर-तरीकों वाली बूढ़ी मां भी साथ रहती है। उसे आशंका होती है कि साहब के सामने अगर मां ने ठीक से बर्ताव न किया तो उसका सपना टूटते देर न लगेगी। वह डरता है कि मां को आज के जमाने के अदब कायदे मालूम नहीं है इसलिए वह उसे भीतर कोठरी में ही रहने की, और साहब के सामने न आने की कठोर हिदायत देता है। मां भी समझती है कि बेटे के भविष्य का मामला है, लेकिन होता यह है कि साहब आता है, टेबल पर बिछे मेजपोश की कढ़ाई देखकर खुश हो जाता है; यह जानकर कि यह मां के हाथ की कारीगरी है, मां से मिलने की इच्छा व्यक्त करता है और क्लर्क को बधाई देता है कि तुम्हारी मां कितनी अच्छी कलाकार हैं।


इस कहानी में एक औसत नौकरीपेशा व्यक्ति के मनोभावों का जो चित्रण हुआ है उसकी सच्चाई सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। सामान्य व्यक्ति हमेशा बेहतर भविष्य के सपने देखता है। उसे पूरा करने के लिए तरह-तरह के उद्यम करता है। वह चापलूसी और कभी-कभार झूठ खुशामद का भी सहारा लेता है। उसे यह डर भी होता है कि उससे जो बलवान हैं उनके कोप का शिकार न बनना पड़े, इसलिए वह कई बार बेमन से ही सही, समझौते करता है। ये सारी बातें कथा आगे बढऩे के साथ-साथ अपने आप ही खुलने लगती हैं।


विभाजन की ही पृष्ठभूमि पर भीष्मजी की एक बेहद सशक्त कहानी है ‘पाली’। इस कहानी में विभाजन के समय एक हिन्दू परिवार का बच्चा पाकिस्तान में बिछुड़ जाता है; वहां एक मुसलमान परिवार उसे पालता है। कुछ बरस बाद परिस्थिति बनती है कि वह बच्चा अपने हिन्दू मां-बाप के पास लौट आता है। जिस मुसलमान दंपति ने उसे पाला उसके दिल पर क्या बीती और जब अपने सनातनी परिवेश में लौटा तो क्या-क्या हुआ, उसका जो चित्रण भीष्मजी ने किया है उससे एक तरफ ममता के अधिकार का प्रश्न अनायास उठता है, तो दूसरी तरफ मनुष्य और मनुष्य के बीच धर्म द्वारा खड़ी की गई कृत्रिम दीवारों का भी एक कचोटने वाला अहसास पाठक के मन पर पड़ता है। धर्म के ठेकेदारों की अहम्मन्यता भी इस कहानी से व्यक्त होती है। जन्म देने वाले माता-पिता अपने बच्चे को वापिस पाना चाहते हैं, पाकर खुश भी हैं; यह तो ठीक है, लेकिन इस खुशी में वे यह नहीं जान पाते कि उस अबोध बालक के मन पर क्या गुजरती है। भीष्मजी ने देश विभाजन की पृष्ठभूमि पर कहानियों के अलावा ‘तमस’ जैसा उपन्यास भी लिखा है। इस संदर्भ में विशेषकर गौरतलब है कि उनके मन में एक गहरा विषाद तो है, लेकिन कटुता, प्रतिशोध या आक्रामकता बिल्कुल नहीं है। वे जैसे कहना चाहते हैं कि मनुष्य का जीवन बहुत कीमती है और मनुष्यता से बढक़र कोई दूसरा मूल्य नहीं है।


पार्टिशन पर उनकी एक और कहानी है ‘निमित्त’। यह कहानी उन लोगों पर एक करारा व्यंग्य है जो अपनी कायर अकर्मण्यता को भाग्य या ईश्वर पर छोडक़र खुद को बरी कर लेते हैं। इस कहानी में लेखक ने प्रहसन की शैली में एक दृश्य की रचना की है। फैक्ट्री का हिन्दू मालिक अपने मुसलमान कर्मचारी को सुरक्षित निकल भागने के लिए ड्रायवर के साथ एक कार में भिज देता है। जब दंगाई उसे ढूंढते हुए फैक्ट्री आते हैं तो वह उन्हें दूसरी कार दे देता  है कि तुम उसका पीछा कर लो। भागना उसके भाग्य में था, शायद तुम्हारे हाथ से मरना भी उसके भाग्य में हो। ड्रायवर लौटकर आता है और उसके मरने की खबर भी दे देता है। फैक्ट्री मालिक हर बात में कहता है कि हम सब तो निमित्त हैं। ईश्वर, भाग्य और निमित्त के इस राग के बीच धीरे से कहीं उस हिन्दू या सिख ड्रायवर की सूझबूझ और बहादुरी उभरती है जिसने अपने मुसलमान सहकर्मी को सुरक्षित उसके ठिकाने पहुंचाकर उसके मरने की झूठी खबर फैला दी।


भीष्म साहनी का रचनाफलक बहुत विस्तृत है और दृष्टि बहुत गहरी। उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए बार-बार महसूस होता है कि मनुष्य के मनोभावों की जितनी गहरी समझ भीष्मजी को थी वैसी उनके समकालीनों में शायद कम को ही थी। उनकी रचनाओं के पात्र चारों तरफ से आते हैं- अमीर-गरीब, शहरी-ग्रामीण, अफसर-व्यवसायी, लेखक-कलाकार आदि। उन्होंने इनमें से जिस किसी का भी चित्रण किया है उसकी प्रामाणिकता पर उंगली नहीं उठाई जा सकती। एक कहानी है- ‘मेड इन इटली’ जिसमें वे भारत के अभिजात एवं नवधनाढ्य वर्ग का विदेशी वस्तुओं के प्रति मोह की जमकर खिल्ली उड़ाते हैं। एक दूसरी कहानी है ‘सेमीनार’ जिसमें वे बतलाते हैं कि लेखक व कलाकार किस तरह से अपने प्रायोजकों के सामने बौने और ओछे पड़ जाते हैं। एक तरह से ये दोनों कहानियां भारतीय समाज में व्याप्त आडंबर की ओर हमारा ध्यान खींचती है। इस तरह की एक और कहानी है जिसका शीर्षक है- ‘रामचंदानी।’ इसमें भी लेखक एक पात्र के बहाने विदेशी चाल-ढाल की नकल करने की खिल्ली उड़ाता है।


यह कहना आवश्यक होगा कि भीष्म साहनी एक प्रगतिशील लेखक थे। उनके अग्रज बलराज साहनी और वे स्वयं कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे जिसे उन्होंने कभी छुपाया नहीं। भीष्मजी आगे चलकर राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ के कई बरस अध्यक्ष रहे। उन्होंने संगठन के प्रति अपना दायित्व निभाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। वे जब प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रमों में आते थे तो उन्हें किसी भी भांति अतिरिक्त सुविधाओं की आवश्यकता नहीं होती थी। वे बहुत आसानी से सबसे घुलमिल जाते थे और नए से नए लेखक को पलभर में अपना  बना लेते थे, लेकिन संगठन में सक्रियता का कोई प्रतिकूल प्रभाव उनकी रचनाशीलता पर पड़ा हो ऐसा कभी नहीं हुआ। उनकी रचनाओं में प्रगतिशीलता के जो तत्व हैं याने अन्याय, शोषण, गैरबराबरी, साम्प्रदायिकता, धर्मांधता- इन सबका विरोध, लेकिन ये सारी बातें समर्थ लेखक के आंतरिक विश्वासों से उपजी हैं, किसी सांगठनिक आग्रह के कारण नहीं।


स्वतंत्रोत्तर हिन्दी कथा साहित्य को जिन रचनाकारों ने समृद्ध किया है उनमें भीष्म साहनी का नाम अग्रणी है। नई कहानियां आंदोलन में कुछ समर्थ किन्तु प्रचारप्रिय लेखकों के नाम बढ़-चढक़र सामने आए। भीष्मजी ऐसी आत्मश्लाघा से हमेशा दूर रहे। वे लेखक कहलाने के लोभ से निर्लिप्त रहकर रचनाकर्म को आवश्यक सामाजिक काम मानकर उसमें जुटे रहे। मैं मानता हूं कि भीष्मजी की रचनाएं दिनों-दिन अधिक प्रासंगिक होती जाएंगी। इस विशेषांक में जो सामग्री संकलित है, उससे भीष्मजी की भाषा, शैली, विचार, कथ्य आदि सभी पक्षों पर और रौशनी पड़ेगी। मैंने तो बस यूं ही बात छेड़ दी है।
 
अक्षर पर्व जून 2015 अंक की प्रस्तावना

Thursday, 11 June 2015

मैगी : बात सिर्फ इतनी नहीं है


 


स्विट्जरलैंड स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनी नैस्ले के डिब्बाबंद उत्पाद मैगी पर भारत में एकाएक हल्ला मचा कि सिर्फ दो मिनिट में पकने वाला बच्चों को अतिप्रिय यह खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक है; आनन-फानन में कई प्रदेशों ने इसका प्रयोगशाला में परीक्षण करवाया और देखते ही देखते केंद्र सरकार ने भी मैगी को विषाक्त मानते हुए इस पर प्रतिबंध लगा दिया। उत्पादक कंपनी ने भी भारतीय बाज़ार से मैगी को वापिस ले लिया है। इस बीच यह प्रश्न भी उठा कि मैगी के हानिकारक होने का मुद्दा सबसे पहिले किसने उठाया और उसका श्रेय अन्य किसी ने कैसे ले लिया। तीन फिल्मी सितारों पर मैगी का प्रचार करने के लिए केस भी दर्ज किए गए। सच पूछिए तो विवाद की शुरुआत तो वहीं से हुई, किंतु एक हफ्ते के भीतर ही जो तूफान उठा तो फिल्म अभिनेता विवाद के केंद्र से खामोशी के साथ बाहर हो गए। फिर ट्विटर पर एक टिप्पणी आई कि आज भले ही इस नूडल या सेंवईनुमा पदार्थ पर रोक लग गई हो, बहुत जल्दी सब आरोपों से बरी होकर मैगी भारतीय बाज़ार में वापिस आ जाएगी। जनरल एच.एस. पनाग की टिप्पणी से मैं स्वयं को सहमत पाता हूं।

मुझे ध्यान आता है कि 1977 की जनता सरकार के  उद्योग मंत्री और एक समय के जुझारू मजदूर नेता जॉर्ज फर्नांडीज़ ने कोकाकोला पर इसी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। उसके बाद क्या हुआ? आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा निर्मित तमाम शीतल पेय हिंदुस्तानके बाज़ार में न सिर्फ उपलब्ध हैं, बल्कि बढ़-चढ़ कर व्यापार कर रहे हैं। ये कंपनियां देश के सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट के मैचों की शृंखलाओं का प्रायोजन करते हैं और सारे नामी-गिरामी क्रिकेट खिलाड़ी इनके नाम की टी-शर्ट और टोपी पहिनकर घूमते नज़र आते हैं। दूसरी ओर जॉर्ज साहब पर अपने जिन मित्र रमेश चौहान (पार्ले-जी वाले) के शीतल पेय व्यापार में सहायता पहुंचाने का आरोप लगाया गया था, वे उस व्यापार से पूरी तरह बाहर हो चुके हैं। उनके जैसी स्थिति अन्य देशी शीतल पेय निर्माताओं की भी हुई। तीस साल पुराने विज्ञापन में एक बच्चा खाने की मेज पर जिस शीतल पेय को देखकर मुदित हो उठता है-‘‘ओह! थम्स अप, इनस्टैड ऑफ वाटर’’ (अहा, पानी के बजाय थम्स अप), उस थम्स अप और उस जैसे 77 आदि का अब नाम भी सुनने नहीं मिलता। याने जनता को ‘मैगी’ पर प्रतिबंध लग जाने मात्र से खुश नहीं हो जाना चाहिए। यह एक वृहत्तर प्रश्न है, जिसके अनेक आयाम हैं और वक्त है कि उन पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए।

सबसे पहिले तो हमें मानना होगा कि किन्ही अर्थों में दुनिया सचमुच सिकुड़ चुकी है और उस के अनुरूप हम किसी हद तक विश्वग्राम के वासी बन चुके हैं। अब यात्राएं करना पहिले की अपेक्षा अत्यन्त सुगम है तथा सूचनाओं व वस्तुओं के विनिमय में भी अभूतपूर्व तेजी आ गई है। इस नई परिस्थिति ने मनुष्य के मन में नई इच्छाएं एवं नई लालसाएं जागृत कर दी हैं। इतिहास के पथ पर हम आगे बढ़ आए हैं और उसी रास्ते पर वापिस लौटना नामुमकिन है। इसलिए आज ऐसी बात करने का कोई अर्थ नहीं है कि भारत की जनता पाश्चात्य देशों के खाद्यान्नों का सेवन न करे। अगर इस सलाह को मान लिया तो मक्का, आलू, टमाटर बैंगन, मिर्ची, चीकू, बिही या अमरूद जैसी वस्तुओं का त्याग करना होगा, क्योंकि इनका मूलस्थान लैटिन अमेरिका में है।  हमें लीची, शक्कर या चीनी, चाय का भी सेवन बंद करना पड़ेगा, क्योंकि ये चीन से आई हैं। और क्या हमने अन्य देशों को अपने उत्पाद निर्यात नहीं किए? याने मामला दोतरफा है। जहां जिसे जो सामग्री जंच जाए, वह प्रचलन में आ जाती है। फिर वह कॉफी हो या चॉकलेट, पिज़्ज़ा हो या नूडल्स, टाकोस हो या डबलरोटी, समोसा हो या केक। अगर यह बिंदु स्पष्ट हो गया है तो मैगी प्रकरण पर चर्चा आगे बढ़ाई जा सकती है।

हमें यह भी स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि सारी दुनिया के साथ-साथ भारतीय समाज की जीवनशैली में भी भारी बदलाव आया है और आते जा रहा है। संयुक्त परिवार की सराहना अवधारणा के स्तर पर की जा सकती है, लेकिन विचार करना ही होगा कि वह आज किस सीमा तक व्यवहारिक है। प्रेमचंद ने सौ साल पहिले बेटोंवाली विधवा व अलग्योझा जैसी कहानियां लिख दी थीं, आज नाभिकीय परिवार एक जीती-जागती वास्तविकता है। इस परिवार में घर की देखभाल कौन करे, खासकर तब जबकि पत्नी भी कामकाजी स्त्री हो; भारतीय पति तो वैसे भी घर का काम करने में अपनी हेठी समझता है। फिर बच्चों का अपना संसार है। पहिले की भांति स्कूल घर के नजदीक नहीं है। अच्छे स्कूल के लालच में सुकोमल बच्चों को सुबह-शाम मिलाकर दो-दो घंटे तक स्कूल बस में बिताना पड़़ सकते हैं। इस स्थिति में पति का टिफिन, खुद का टिफिन, बच्चे का टिफिन, रात का भोजन, सब कुछ सम्हालना कितना कठिन हो गया है, कौन नहीं जानता। अगर आप अपेक्षा करें कि थकी-हारी औरत घर में सेंवई, पापड़, बड़ी, मठरी, खाजा, गुझिया भी बनाए तो क्या यह उसके साथ अन्याय नहीं होगा? ऐसे में टू-मिनिट मैगी या फिर पिज़्ज़ा की घर पहुंच सेवा ही अक्सर काम आती है।

यहां एक नया प्रश्न खुलता है- नूडल्स या पिज़्ज़ा ही क्यों? इसके उत्तर के दो पक्ष हैं। एक-जो हमारे देसी फास्ट फुड व्यंजन हैं, क्या वे सचमुच पौष्टिक व स्वास्थ्यवद्र्धक हैं? क्या समोसा खाना पिज्काा खाने के मुकाबले बेहतर है? आहार विशेषज्ञ बताते हैं कि भारतीय व्यंजनों में भी तेल-मसालों का बहुतायत से प्रयोग होता है जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। हमारे चिकित्सक एवं आहार विशेषज्ञ फल व सलाद का सेवन करने की सलाह देते हैं। किंतु क्या कार्बाइड में या रसायनों में पके आम व केले नुकसानदेह नहीं हैं? घर में ताजा काटी गई सलाद तक तो ठीक है, लेकिन होटलों एवं दावतों में परोसी गई सलाद को तो छूना भी नहीं चाहिए। न जाने कैसे पानी में, कैसे हाथों से सुधारी जाती है! दो- हम स्वयं विज्ञापनों से आकर्षित एवं प्रभावित होते हैं। बच्चों का प्रभावित होना तो फिर स्वाभाविक ही है। जिन खाद्य पदार्थों के विज्ञापन टीवी पर आते हैं, वे ब्रांडेड होते हैं। जितना अच्छा विज्ञापन, उतना बढिय़ा प्रभाव, उतनी उम्दा खपत। अगर मुझे ठीक याद है तो 1950 के दशक में यूनिलीवर के डालडा के विज्ञापन के साथ ब्रांडेड सामग्री का प्रचार प्रारंभ हुआ था। रेडियो सीलोन पर प्रति बुधवार रात प्रसारित बिनाका गीतमाला उस प्रारंभिक समय में प्रभावशाली विज्ञापन का एक दूसरा उदाहरण था।
मुझे याद आता है कि किसी समय सुप्रसिद्ध अभिनेता अशोक कुमार जबलपुर में निर्मित शेर छाप बिड़ी नं. 7 के विज्ञापन में अवतरित होते थे। इसलिए आज यदि अमिताभ बच्चन, माधुरी दीक्षित अथवा प्रीति जिंटा मैगी का विज्ञापन कर रहे हैं तो वे एक स्थापित परंपरा का ही पालन कर रहे हैं। लेकिन क्या इनका ऐसा करना उचित है? हमारे देश में फिल्म और क्रिकेट के सितारों को जनता सिर-आंखों पर बैठाकर चलती है। वे हमारे लिए नवयुग के देवता हैं। वे चूंकि पत्थर के देवता नहीं हैं, इसलिए उनसे यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि किसी भी वस्तु या विषय का प्रायोजन करने में अपने विवेक का इस्तेमाल करेंगे। वे अपनी सामान्य सूझबूझ को ताक पर रखकर पैसे के मोह में गलत वस्तु का प्रचार करने लगेंगे, ऐसा उनके बारे में तो हम नहीं सोचते। लेकिन कटु वास्तविकता यही है कि मैगी इत्यादि का विज्ञापन करते समय हमारे इन नायक-नायिकाओं ने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया। एक समानांतर उदाहरण ले लीजिए- अमिताभ, सचिन, ऐश्वर्या इत्यादि ने सहारा समूह के ब्रांड एम्बेसेडर के बतौर काम किया। आज सहारा के कत्र्ता-धर्ता कहां हैं? ये तमाम सितारे अरबपति न सही, करोड़पति तो अवश्य हैं, फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि बिना छान-बीन किए ये किसी के भी लिए विज्ञापन  करने तैयार हो जाते हैं? इस मनोवृत्ति को धिक्कार है।

अब बात उठती है सरकार की जिम्मेदारी की।  वर्तमान प्रधानमंत्री ने पद सम्हालते साथ सुशासन का वायदा किया था। सुशासन का एक अनिवार्य पक्ष है कि जनता स्वस्थ रहे। यदि किसी भी भोज्य पदार्थ से सेहत पर विपरीत असर पड़ता है तो उसकी रोकथाम सरकार को ही करना होगी। खाद्यान्नों की गुणवत्ता जांचने के लिए नगरीय निकायों से लेकर केंद्र तक यथोचित व्यवस्थाएं होना चाहिए। मैं याद करता हूं कि 1969-70 मुंबई के एक बाहर से साधारण दिखने वाले रेस्तोरां को ग्रेड-1 भोजनालय का दर्जा प्राप्त था, जबकि एक जगमग रेस्तोरां को ग्रेड-2 का। महानगरपालिका ने चकाचौंध की बजाय भोजन की गुणवत्ता को प्राथमिकता दी थी। अब ऐसा कड़ा परीक्षण कहीं भी नहीं होता। पांच सितारा होटलों तक का खाना खाकर लोग बीमार पड़ते हैं। सच कहें तो आजकल हर स्तर के सरकारी कर्मचारी सिर्फ अपने लिए जीते हैं। वेतन मानों उनका मौलिक अधिकार है। काम करने की फीस अलग से लगती है। इस व्यवस्था में चौपाटी व फुटपाथ के ढाबे, रेस्तोरां, चाट भंडार, ठेले अपनी हैसियत के अनुरूप सरकारी अमले को खुश करके रखते हैं तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां तथा अन्य नामी उत्पादक अपने स्तर पर सारा प्रबंध कर लेते हैं। शीतल पेयों में भूजल से आए कीटनाशक की मिलावट होती है तो होती रहे और मैगी खाने से स्वास्थ्य बिगड़ता है तो बिगड़े, यहां परवाह किसे है? जिस सरकार ने उपभोक्ता को एक विशिष्ट दर्जा देकर उपभोक्ता अदालतें कायम कीं लेकिन बरसों-बरस न्यायाधीश नियुक्त नहीं किए तो उससे कितनी उम्मीद रखें?
 

देशबन्धु में 11 जून 2015 को प्रकाशित

Wednesday, 3 June 2015

मोदीजी और उनके मंत्री


एक साल पहिले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार बनाई थी तब मंत्रियों का चयन करने में उनकी अपनी इच्छा ही उसका सर्वोपरि एवं एकमात्र आधार थी। इसमें उन्होंने न तो संघ की चलने दी थी और न ही पार्टी की। श्री मोदी जिन्हें चाहते थे, पसंद करते थे, जिनकी क्षमता और निष्ठा पर भरोसा था, वे ही मंत्रीपद पा सके; जिनके प्रति उनके मन में रंचमात्र भी खुटका था, उन्हें बाहर करने में उन्होंने कोई आगा-पीछा नहीं किया। जो कथित फार्मूला लालकृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी पर लागू किया गया, उसे नज़्मा हेपतुल्लाह के प्रसंग में छोड़ दिया गया। राजनैतिक इतिहास के विद्यार्थियों को याद होगा कि 1977 में जनता पार्टी की सरकार जब बनी थी, तब जनसंघ के कोटे से किसे लिया जाए, इस पर संघ की ही मर्जी चली थी और जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो उन्हें भी संघ की मर्जी के आगे शीश नवाकर मंत्रिमंडल में फेरबदल करने पर मजबूर होना पड़ा था। नरेंद्र मोदी को खुला हाथ मिल सका तो उसका प्रमुख कारण यही था कि उनके नेतृत्व में भाजपा ने स्पष्ट विजय हासिल की थी।

बहरहाल, एक साल बीत चुका है। इस बीच प्रधानमंत्री को अपने मंत्रियों की कार्यदक्षता नापने के अनेक अवसर मिले होंगे। अपनी विजय की पहिली वर्षगांठ पर वे शायद यह मंथन भी कर रहे होंगे कि देश-विदेश में किस मंत्री के कामकाज से सरकार की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और किसके कार्य से अनुकूल संदेश नहीं गया। श्री मोदी यह अच्छी तरह जानते हैं कि जनता से उन्होंने एक बेहतर भविष्य की रचना के लिए बड़े-बड़े वायदे किए हैं और अब वक्त आ गया है कि उन पर गंभीरता के साथ अमल किया जाए। गत एक वर्ष में पहिले सौ दिन तो वैसे ही हनीमून में बीत गए थे, अगले सौ दिन भी खुमारी बनी हुई थी, लेकिन देखते ही देखते वह समय आ गया जब मतदाताओं ने पूछना शुरु कर दिया कि वायदे कब पूरे होंगे। अब आप न तो पिछली सरकारों पर सारा दोष डाल कर अपना बचाव कर सकते हैं और न ही अपनी अनुभवहीनता को कवच बना सकते हैं। अब न जुमले काम आएंगे, न नारे और न लच्छेदार भाषण। अपने कार्यकाल के  दूसरे साल में सरकार को ऐसे ठोस कदम उठाना ही होंगे जिनसे देश के संविधान की मर्यादा एवं जनांकाक्षाओं के अनुरूप तरक्की का रास्ता खुल सके।

यह स्पष्ट है कि मोदीजी ने अपने मंत्रिमंडल का गठन करते समय यथाशक्य संतुलन साधने की कोशिश की थी। एक ओर उन्होंने पार्टी के कई अनुभवी एवं वरिष्ठ सहयोगियों को सरकार में शामिल किया तो दूसरी ओर अनेक नए चेहरों को भी स्थान मिला। अनुभवहीन सदस्यों को मंत्री बनाना एक व्यवहारिक आवश्यकता भी थी क्योंकि अधिकतर सांसद पहिली बार चुनकर आए थे। सरकार में क्षेत्रीय भावनाओं का भी ध्यान रखा गया है तथा एनडीए के घटक दलों को भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया ही गया है। प्रारंभ में एक गड़बड़ी तब हुई थी जब अरुण जेटली को वित्त एवं प्रतिरक्षा दो भारी-भरकम विभाग एक साथ सौंप दिए गए थे। कालांतर में इस स्थिति को दुरुस्त करने का उपक्रम तो हुआ किंतु आभास होता है कि श्री मोदी को श्री जेटली से बढक़र भरोसा अन्य किसी पर नहीं है। मंत्रिमंडल को अधिक पुरअसर बनाने का एक प्रयत्न बीच में हुआ जब मनोहर पार्रीकर व सुरेश प्रभु क्रमश: प्रतिरक्षा एवं रेलवे मंत्री के रूप में लाए गए। ये दोनों उज्जवल छवि के धनी रहे हैं और अभी भी उम्मीद की जाती है कि ये कसौटी पर खरे उतरेंगे।

अभी कुल मिलाकर यह दिखता है कि राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, मेनका गांधी व अरुण जेटली जैसे वरिष्ठ व अनुभवी मंत्री पार्टी की नीतियों के मुताबिक अपना-अपना काम ठीक से सम्हाल रहे हैं। मैंने उपरोक्त नाम वरिष्ठता क्रम में लिए हैं, महत्व के क्रम में नहीं। इसी तरह वैंकया नायडू व नितिन गडक़री आदि पार्टी वरिष्ठों को जो विभाग सौंपे गए हैं, उनके बारे में भी सामान्यत: धारणा अनुकूल बनी हुई है। इसमें एक और अनुभवी मंत्री रामविलास पासवान का नाम भी जोड़ा जा सकता है जो घटक दल से हैं। ध्यान रखें कि इनमें से किसी के भी विभाग की विस्तृत चर्चा करना यहां मेरा अभीष्ट नहीं है। ये सब भारतीय राजनीति के जाने-पहिचाने चेहरे हैं और कहना होगा कि इन्हें स्वयं को चर्चा में बनाए रखने की कला भी आती है।इनमें से एक मेनका गांधी को छोडक़र बाकी सब की सक्रिय उपस्थिति रंगमंच पर बनी हुई है। इन्हें आप यदा-कदा पार्टी/सरकार के प्रवक्ता के रूप में भी देख सकते हैं। इस प्रकार कोई एक दर्जन मंत्रियों को छोडक़र मोदी सरकार में और कौन-कौन मंत्री हैं, किसके पास क्या विभाग हैं और वे क्या कर रहे हैं, इस बारे में जनता लगभग अनभिज्ञ है। प्रतीत होता है जैसे फिल्मों में एक्स्ट्रा होते हैं, कुछ वैसी ही भूमिका अधिकतर मंत्रियों को निर्माता निर्देशक द्वारा सौंप दी गई है।

यदि वरिष्ठ मंत्रियों की सूची में मेनका गांधी के इस समय नेपथ्य में चले जाने का अनुमान होता है तो मानों उस कमी की भरपाई करने के लिए दो अन्य नेत्रियां याने स्मृति ईरानी एवं निर्मला सीतारमन मंच पर सक्रिय भूमिका में दिखाई दे रही हैं। श्रीमती सीतारमन के पास जो विभाग है, उसका आम जनता से सीधा कोई लेना-देना नहीं है और न ही उसका रोजमर्रा के जीवन पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव है, फिर भी जब अवसर मिलता है, वे अपने राजनैतिक कौशल का परिचय देने में नहीं चूकतीं। दूसरी ओर स्मृति ईरानी का विभाग ही ऐसा है, जहां हर दिन उन्हें जनता के सामने जवाब देना होता है। शिक्षा याने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अलावा एक और विभाग है जिसका प्रत्यक्ष सरोकार इस प्राचीन देश की विरासत, परंपरा व सोच से जुड़ता है। इसे हम संस्कृति एवं पर्यटन विभाग के नाम से जानते हैं। इसे फिलहाल पहिली बार सांसद बने डॉ. महेश शर्मा सम्हाल रहे हैं। हमें वह समय याद है जब शिक्षा और संस्कृति के विषय एक ही मंत्रालय के अधीन थे। जिसके मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसा शीर्ष स्थानीय नेता थे। आगे चलकर राजीव गांधी के कार्यकाल में पी.वी. नरसिम्हाराव मानव संसाधन विकास मंत्री  बने तथा शिक्षा व संस्कृति के अलावा स्वास्थ्य एवं रोजगार विभाग भी उन्होंने सम्हाला।

1991 में पी.वी. नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अपने पुराने विभाग का दायित्व अर्जुनसिंह को सौंपा। श्री सिंह तब महज तीन साल ही मंत्री रहे, लेकिन उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को एक नई पहचान व ऐसी ऊंचाई दी कि वाजपेयी सरकार में मुरली मनोहर जोशी ने अपनी वरिष्ठता को आधार बनाकर, यही मंत्रालय स्वयं होकर लिया। इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक नितांत अनुभवहीन व्यक्ति को इस भारी-भरकम विभाग का मंत्री क्यों बनाया, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। ऐसी चर्चा सुनने में आई थी कि सुषमा स्वराज का कद कम करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया था। दूसरे, यह भी हो सकता है कि प्रधानमंत्री को सुश्री ईरानी ने अपनी वाक्पटुता, चपलता और जुझारू तेवरों से प्रभावित किया हो। जो भी हो, आज यह सोचने का माकूल अवसर है कि स्मृति ईरानी अपने दायित्व का निर्वहन अपेक्षा के अनुरूप कर पा रही हैं या नहीं! यहां स्मरणीय है कि डॉ. मनमोहन सिंह ने अर्जुन सिंह के विभाग में काट-छांटकर संस्कृति विभाग को अलग कर दिया था। आज यह जिम्मा डॉ. महेश शर्मा पर है। अत: सुश्री ईरानी के साथ-साथ डॉ. शर्मा के कार्य की समीक्षा भी प्रधानमंत्री कर लें तो उचित होगा।

यह हम मानते हैं कि एक सत्तारूढ़ दल को अपने सिद्धांतों के अनुसार राजकीय नीति व कार्यक्रम बनाने का अधिकार है, विशेषकर तब जबकि उसके पास स्पष्ट जनादेश है। लेकिन जनतंत्र की खूबसूरती इसमें है कि अल्पमत रखने वालों की भावनाओं का भी समादर किया जाए, अन्यता बहुमत बहुसंख्यकवाद में तब्दील होते देर नहीं लगेगी। इस दृष्टि से वर्तमान भाजपा सरकार की अनेक नीतियों एवं कार्यक्रमों से एक बड़े वर्ग का मतभेद हो सकता है और है। फिलहाल उस सैद्धांतिक विमर्श की चर्चा न भी करें तो भी यह प्रश्न तो उठता ही है कि जिन दो विभागों को लेकर केंद्र सरकार की लगातार आलोचना हो रही है, जिनमें स्वीकृत प्रक्रियाओं का बारंबार उल्लंघन होने के कारण असंतोष फैल रहा है एवं सरकार की नीयत तक पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनके बारे में प्रधानमंत्री का क्या रुख है? मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ही बात करें तो सरकार को यह बताना चाहिए कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में नियुक्ति के लिए बनी अनिल काकोडक़र समिति की सिफारिशें किस आधार पर खारिज की गईं। अगर सरकार श्री काकोडक़र की विद्वता व अनुभव का समादर नहीं कर सकती तो फिर और कौन बचता है? फिर ऐसा क्यों है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों आदि में शीर्ष पदों पर नियुक्तियां एक साल से रुकी हुई हैं? इन प्रकरणों से यही संदेश जाता है कि स्मृति ईरानी शब्दवीर भले हों, कर्मवीर तो बिल्कुल नहीं हैं।

संस्कृति मंत्रालय को देखें तो राज्यसभा के पिछले सत्र में ही ललित कला अकादमी के अध्यक्ष को गलत तरीके से हटा देने का मामला उठा। जिस पद पर नियुक्ति स्वयं राष्ट्रपति करते हों, क्या उनसे बिना परामर्श के उस अधिकारी को हटाया जा सकता है? ऐसा करने से किसका हित साधन हो रहा है? इसी भांति राष्ट्रीय संग्रहालय के निदेशक को भी यकबयक हटा दिया गया। स्वयं मंत्री ने कहा कि निदेशक सक्षम व्यक्ति थे। फिर उन्हें हटाने की आवश्यकता क्यों आन पड़ी? सबसे विचित्र निर्णय तो स्मृति ईरानी के मंत्रालय में नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष पद को लेकर हुआ। मोदी सरकार चाहती तो संघ या भाजपा के प्रति निष्ठा रखने वाले किसी गुणी सुपात्र यथा नरेंद्र कोहली या प्रभाकर श्रोत्रिय को एनबीटी का अध्यक्ष बना सकती थी, लेकिन बनाया भी तो बलदेवभाई शर्मा को जो अनुभवी पत्रकार हैं किंतु जिनकी साहित्य जगत में किंवा पुस्तकों की दुनिया में कोई पहचान नहीं है। अगर ऐसे तमाम निर्णय प्रधानमंत्री की इच्छा से हो रहे हैं तो हम सिर्फ विरोध प्रकट कर सकते हैं, किंतु फिर इससे उनकी अपनी छवि में कोई इज़ाफ़ा नहीं होता।
देशबन्धु में 4 जून 2015 को प्रकाशित