Wednesday, 26 March 2014

चुनाव 2014 : कुछ नजारे



हम
भारत के लोगों की राजनीति में दिलचस्पी जगजाहिर है। इसके लिए सबसे पहले तो हमें महात्मा गांधी का आभारी होना चाहिए जो राजनीति को सभाकक्षों में होने वाली बौध्दिक बहसों से निकालकर सड़कों और चौराहों तक लाए, कुछ इस तरह कि स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे और चूल्हा-चौके तक सिमटे रहने वाली घरेलू औरतें भी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने सामने आ गईं। राजनीति को जन-जन तक लाने की दिशा में दूसरी बड़ी पहल पंडित नेहरू के नेतृत्व में हुई जब नवस्वतंत्र देश ने अपने संविधान में वयस्क मताधिकार की अवधारणा स्वीकार की। आज जब सोलहवीं लोकसभा के चुनावों की प्रक्रिया चल रही है तब इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को जान लेने में कोई हर्ज नहीं है। यह कहने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि पिछले सड़सठ साल में राजनीति हमारे सामाजिक जीवन में गहरे जाकर रच-बस गई है। एक आम हिन्दुस्तानी हर समय राजनीति पर बहस के लिए तैयार रहता है। यह तब जबकि समाज में ऐसे भी लोग हैं जो राजनीति को अक्सर कोसते हुए नज़र आते हैं और राजनेताओं का जहां तक सवाल है उनकी लानत-मलामत करने में हम सबको ही आनंद आता है।

एक जनतांत्रिक समाज में राजनीति को लेकर उत्सुकता अथवा उत्साह स्वागतयोग्य है। आखिरकार देश और समाज की बेहतरी के लिए जो भी फैसले लिए जाने हैं, जो कार्यक्रम बनना हैं और जो उन पर अमल होना है वह सब राजनीति के बिना कहां संभव है?  हम जानते हैं कि आम चुनावों के वक्त इस बारे में हमारा उत्साह कई गुना बढ़ जाता है। सबकी अपनी-अपनी सोच और अपना-अपना नजरिया है कि देश में कैसी सरकार बनना चाहिए। इस लिहाज से अभी के चुनाव पिछले पन्द्रह चुनावों के मुकाबले कहीं ज्यादा दिलचस्प होने जा रहे हैं। इसके बहुत से कारण हैं। एक तो यही कि चुनावी मैदान में अभी जो अफरा-तफरी मची है वैसे पहले कभी देखने नहीं मिली। आप चाहें तो इस माहौल की तुलना मौसम के साथ कर सकते हैं। दिल्ली हो या रायपुर, भोपाल हो या हैदराबाद, कब बारिश हो जाएगी, कब धूप निकल आएगी, कब पारा चढ़ जाएगा और कब बर्फ गिरने लगेगी, कुछ पता ही नहीं चलता। इस अनिश्चितता से चुनावों का मंजर और दिलचस्प हो गया है।

इस बार एक बिल्कुल नया तथ्य भी चुनावों के साथ जुड़ गया है। मुझे यहां 1960 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव का ध्यान आता है। अमेरिकी इतिहास में वह पहला मौका था जब राष्ट्रपति चुनावों के दो प्रमुख उम्मीदवारों के बीच टीवी पर आमने-सामने बहस हुई थी। अनेक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अगर टीवी न होता तो अनुभवी निक्सन के मुकाबले सुदर्शन युवा जॉन एफ. कैनेडी  चुनाव न जीत पाते। अब तो अमेरिका में बिना टीवी बहसों के राष्ट्रपति चुनाव की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इसका सीधा-सीधा परिणाम यह हुआ है कि राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार अनुभव और ज्ञान में भले ही कमतर हो, उसे चपल और वाकपटु अवश्य होना चाहिए। उम्मीदवार जितना युवा और स्मार्ट हो उतना ही अच्छा। ओबामा की विजय का बड़ा कारण यहां ढूंढा जा सकता है। भारत में भी अब कुछ ऐसी ही स्थिति निर्मित होती दिख रही है। यद्यपि यहां एक फर्क है। भारत के टीवी चैनवों ने काफी हद तक निष्पक्षता को ताक पर रख दिया है।

इस बार चुनाव प्रचार का जो रंग-ढंग है उसे देखकर लगता है कि भारत में चुनाव प्रणाली को ही बदलने की साजिश चल रही है। चूंकि किसी भी पार्टी को दो तिहाई बहुमत मिलने की अगले कुछ चुनावों तक कोई गुंजाइश नहीं है इसलिए संविधान संशोधन होना फिलहाल मुमकिन दिखाई नहीं देता, किन्तु ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है कि देश में अब पार्टी नहीं व्यक्ति के आधार पर चुनाव होना चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि सत्ता प्रतिष्ठान का एक धड़ा हमारी जानी-परखी संसदीय व्यवस्था को तहस-नहस करने पर तुला हुआ है। इसके चलते एक विरोधाभास उत्पन्न हो गया है। संविधान कहता है कि चुनावों के बाद सदन में बहुमत दल का नेता प्रधानमंत्री बनेगा, लेकिन यहां तो पार्टी ने हथियार डाल दिए हैं और एक व्यक्ति प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित हो गया है। याने चुनावों के बाद संसदीय दल को कहीं और लिए गए निर्णय पर अपनी रजामंदी देने विवश होना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में यह संसद की सर्वोच्चता का अपमान होगा।

इस बार का एक नया दृश्य राजनीतिक दलों के बीच नेताओं के आवागमन का है। यूं तो 1967 में ही दल-बदल का खेल शुरू हो गया था, लेकिन अब उसने विकराल रूप ग्रहण कर लिया है। ऊपरी तौर से देखने में लगता है कि इस खेल में कांग्रेस को काफी नुकसान हुआ है। कांग्रेस छोड़कर भाजपा या अन्य किसी दल में शामिल होने वालों की संख्या कहीं अधिक है, लेकिन गौर से देखें तो भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले कम नुकसान नहीं हुआ है।  भाजपा में शीर्ष स्तर पर जिस तरह से असंतोष मुखर हुआ है वैसी नौबत कांग्रेस में नहीं आई। सर्वश्री अडवानी, जसवंत सिंह, सुषमा स्वराज का असंतोष आगे चलकर भाजपा को अपनी रीति-नीति पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित कर सकता है!

अब की दफे क्षेत्रीय दलों के तेवर भी देखने लायक हैं। जिस दिन एच.डी. देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने थे उसी दिन से राजनीति में छोटी सी छोटी हैसियत रखने वाला व्यक्ति भी अपने आपको प्रधानमंत्री पद का काबिल समझने लगा है। आज प्रकाशसिंह बादल व उध्दव ठाकरे को छोड़कर हर क्षेत्रीय नेता सोच रहा है कि वह जोड़-तोड़ कर प्रधानमंत्री बन सकता है। टी.आर.एस. के नेता चन्द्रशेखर राव कांग्रेस से किए गए वायदे से पलट गए कि जरूरत पड़ेगी तो एनडीए में शामिल हो जाएंगे। मायावती, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, जयललिता व चन्द्राबाबू नायडू- इन सबको भाजपा से कोई परहेज नहीं है; उसके साथ पहले रह चुके हैं। अभी उन्हें सिर्फ अल्पसंख्यक वोटों का डर सता रहा है। चुनावों के बाद मतदाताओं को कौन पूछता है?

हमने अभी तक वामदलों की बात नहीं की। सीपीआईएम की अगुवाई में वामदलों ने तीन दशक तक अत्यन्त सफलतापूर्वक एक गठबंधन संचालित किया। इसका श्रेय प्रमुख रूप से प्रमोद दासगुप्ता और ज्योति बसु की जोड़ी को दिया जाना चाहिए।  ऐसा नहीं कि वाममोर्चे में कभी मतभेद न रहे हों, लेकिन जब भी कोई विवाद हुए उन्हें आपसी बातचीत  से सुलझा लिया गया। एक उल्लेखनीय मौका 2004 में आया जब सीपीआई यूपीए सरकार में शामिल होने के लिए तैयार थी, लेकिन सीपीआईएम की अलग राय देखकर उसने वह मौका वाम एकता की खातिर छोड़ दिया। इधर कुछ समय से लगने लगा है कि वामदल अतीत के बंदी होकर रह गए हैं और वर्तमान समय के संकेतों को समझने से इंकार कर रहे हैं। इसका एक उदाहरण अभी हाल में तीसरे मोर्चे के लिए की गई उठापटक में देखने मिला।

वरिष्ठ नेता व भाकपा के पूर्व महासचिव ए.बी. वर्ध्दन ने करण थापर को दिए एक साक्षात्कार में स्पष्ट कहा कि चुनाव पूर्व तीसरे मोर्चे के गठन का प्रस्ताव समयानुकूल नहीं था और इसीलिए बनने के पहले ही मोर्चा बिखर गया। उन्होंने यह संकेत भी दिया कि इसके लिए माकपा का नेतृत्व जिम्मेदार है। बाद में माकपा के नेताओं ने भी स्वीकार किया कि चुनावों के पूर्व यह पहल नहीं की जाना चाहिए थी।  जो भी हो, वामदलों को यह देखना आवश्यक है कि देश के राजनीति में वे किस तरह से प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। यह स्वीकार करना होगा कि दुनिया के तमाम देशों की तरह नवपूंजीवादी शक्तियां यहां भी अपने पांव पसार चुकी हैं। उससे लड़ने के लिए नए विचारों की, नई ऊर्जा, नए प्रयत्न और नए सिरे से जनजागृति की आवश्यकता है। अब पुराने औजारों  से काम नहीं चलेगा।

कुछ यही बात भारत के उदारवादी बुध्दिजीवी तबके पर भी लागू होती है। इस वर्ग में बड़े-बडे नामचीन लोग शामिल हैं। उनके विद्वतापूर्ण लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपते हैं, उनकी लिखी किताबों का भी खूब जिक्र होता है, वे टीवी बहसों में भी भाग लेते हैं। सबके सब अंग्रेजी में। हिन्दी, मराठी, बंगला, तेलगू, तमिल आदि देशी भाषाओं से इनका कोई सरोकार नहीं है। ये एक तरफ देश में फासीवाद के खतरे की बात करते हैं और फिर अपने अध्ययन कक्ष में सिर गड़ाकर बैठ जाते हैं शुतुरमुर्ग की तरह। शायद इन्हें पक्का पता है कि भारत में फासीवाद नहीं आएगा। हो सकता है कि वे सही सोच रहे हों!

 
देशबंधु में 27  अप्रैल 2014 को प्रकाशित

Wednesday, 19 March 2014

भाजपा का भविष्य



भारतीय
जनता पार्टी के कार्यकर्ता व समर्थक अतिउत्साहित हैं कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में उनकी सरकार बनने जा रही है। इन दिनों मीडिया ने जैसी हवा बांध रखी है उसे देखते हुए इस उत्साह को गलत नहीं कहा जा सकता किन्तु हमारे विचार में भाजपाई एक बड़े सवाल की अनदेखी कर रहे हैं कि अगर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बन भी गई तो एक राजनैतिक दल के रूप में भाजपा का भविष्य क्या होगा? हमारे सामने कुछ तस्वीरें हैं। 16 मार्च को होली के दिन भाजपा के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवानी एक तरह से कोप भवन में बैठे रहे। वे उस दिन कुछ गिने-चुने लोगों से ही मिले और मीडिया को उनके दरवाजे से भीतर घुसने की मनाही कर दी गई थी। जबकि इसके पहले तक आडवानी जी बहुत उल्लास के साथ रंगों के त्योहार का आनंद उठाया करते थे। भाजपा के दूसरे ज्येष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी की नाराजगी भी छिपाए नहीं छिप रही है। उन्होंने पिछले कुछ दिनों में पल-पल संदेश दिए कि वे वाराणसी की सीट नहीं छोड़ना चाहते, लेकिन उनकी एक न चली। यही नहीं, श्री आडवानी की टिकट भी इस कॉलम के लिखे जाने तक पक्की नहीं की गई है।

जो पार्टी देश की सत्ता हासिल करने के लिए इतनी बेचैन है उसमें बड़े नेताओं के साथ इस तरह का बर्ताव आश्चर्यजनक है। ये सिर्फ नाम से ही बड़े नेता नहीं हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी को स्थापित करने में अपना पूरा जीवन होम कर दिया। इस संदर्भ में सुषमा स्वराज का भी ध्यान आता है। उन्होंने कर्नाटक के बागी नेता श्रीरामुलु को दुबारा पार्टी में लेने का सार्वजनिक तौर से पुरजोर विरोध किया, लेकिन उनकी बात भी नहीं सुनी गई। कलराज मिश्र, लालजी टंडन, नवजोत सिंह सिध्दू एवं गिरिराज सिंह इत्यादि कुछ ऐसे नाम हैं जो अपनी पसंदीदा सीट हासिल नहीं कर सके। कुल मिलाकर ऐसा दृश्य है कि एक तरफ श्री आडवानी, श्री जोशी और श्रीमती स्वराज जैसे कद्दावर नेताओं को नीचा दिखलाया जा रहा है और दूसरी तरफ अमित शाह, बी.एस. येदियुरप्पा, कल्याण सिंह व श्रीरामुलु जैसे विवादित व्यक्तियों का पार्टी बांहें फैलाकर स्वागत कर रही है, गले लगा रही है।

इस दृश्य को देखकर सहज ही प्रश्न उठता है कि यदि श्री मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन सकी तो भारतीय जनता पार्टी में संगठन और विचार के स्तर पर किस तरह के परिवर्तन आएंगे। क्या ये बदलाव उसी तरह के होंगे जिसकी कल्पना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने की है? अभी दबी जबान में जो बातें सुनने मिल रही हैं उनके अनुसार संघ में एक बड़ा वर्ग इस घटनाचक्र से खिन्न और विचलित है। यह संभवत: मोहन भागवत की सोच रही होगी कि एक दृढ़ संकल्पित नेतृत्व के बिना भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का स्वप्न पूरा नहीं हो सकेगा! हो सकता है उनके मन में यह विचार भी रहा हो कि जिस लक्ष्य को पाने में उनके पूर्ववर्ती असफल रहे उसे वे पूरा कर के दिखाएंगे और इसी हिसाब से उन्होंने अपनी रणनीति तैयार की हो! चूंकि संघ ''एकचालकानुवर्ती'' के सिध्दांत पर काम करता है याने सरसंघचालक ने जो तय कर दिया वह पत्थर की लकीर इसलिए संघ के भीतर किसी ने उनका विरोध तो नहीं किया, लेकिन अब एक कसमसाहट नज़र आ रही है।

यह हम जानते हैं कि संघ परिवार (जिसमें विश्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल भी शामिल हैं) के कार्यकर्ताओं ने भारतीय जनता पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं की उपस्थिति में उनकी मौन स्वीकृति के साथ 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराने का जघन्य कृत्य किया था। इसके अलावा अडवानीजी की रथयात्रा, मुरली मनोहर जोशी की श्रीनगर में राष्ट्रध्वज फहराने की यात्रा, एकात्मकता यात्रा, श्रीरामशिला के नाम से ईंटें  एकत्र करने का अभियान- जैसे उपक्रमों के परिणामस्वरूप भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक लाभ तो हुआ, लेकिन वह कभी भी इतना पर्याप्त नहीं था कि भाजपा अपने बलबूते केन्द्र में सत्ता हासिल कर सके। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा को सत्तारूढ़ होने का मौका अवश्य मिला, किन्तु इसके लिए उन्हें बहुत सारे छोटे दलों का समर्थन हासिल करने के साथ-साथ अपने घोषणा पत्र के तीन मुख्य बिन्दुओं को छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था।

श्री वाजपेयी अनुभवी राजनेता थे और अच्छी तरह से जानते थे कि भारत जैसे देश की सरकार चलाने के लिए कट्टरता छोड़कर लचीला रुख अपनाना आवश्यक है। अपनी इस सूझबूझ के कारण ही वे भाजपा के नेतृत्व में सरकार चलाने में समर्थ हो सके। श्री आडवानी जिन्हें वाजपेयी जी के मुकाबले एक कट्टरपंथी नेता माना जाता था उन्हें भी आगे चलकर भान हुआ कि वे जब तक उदारवादी रवैय्या नहीं अपनाएंगे या वैसा अभिनय नहीं करेंगे वे प्रधानमंत्री नहीं बन सकेंगे। उन्होंने अपनी इस नई सोच का परिचय जिन्ना की मजार पर जाकर श्रध्दांजलि देने जैसे काम से दिया। संघ को उनका यह नया रूप पसंद नहीं आया और परिणामस्वरूप उन्हें पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद पार्टी ने अपना दांव नितिन गडकरी पर लगाया। श्री गडकरी राष्ट्रीय स्तर के नेता नहीं थे, लेकिन उन्हें संघ का विश्वास तो प्राप्त था ही। फिर भी शायद वे संघ की आशाओं पर खरा नहीं उतर सके!  बिना अधिक विस्तार में गए अभी इतना कहना पर्याप्त होगा कि मोहन भागवत ने नरेन्द्र मोदी से आशा बांध रखी है कि वे भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने में समर्थ होंगे। यक्ष प्रश्न है कि क्या सचमुच ऐसा हो पाएगा?

श्री नरेन्द्र मोदी की दो विशेषताएं हैं जो उनके हिन्दू हृदय सम्राट बन सकने की संभावनाएं जगाती हैं। एक-2002 के गुजरात नरसंहार की पृष्ठभूमि में श्री मोदी भाजपा के सबसे बड़े कट्टरपंथी और अनुदार नेता के रूप में उभरे हैं। दो- वे एक ऐसे कठोर राजनेता के रूप में सामने आते हैं जिसने जो तय कर लिया सो कर लिया, जो समझौता जैसा शब्द नहीं जानता। दिलचस्प बात यह है कि उनके इन गुणों की परख करने वाले मोहन भागवत अकेले व्यक्ति नहीं हैं। भारत के टाटा, अंबानी, बिड़ला, अडानी, टोरेंट, एस्सार जैसे कारपोरेट घराने भी उनके गुणग्राहक हैं। यदि श्री भागवत का जोर उनके पहले गुण पर है तो कारपोरेट की आशाओं की डोर उनके दूसरे गुण से बंधी है।

एक अनुमान लगाने को जी चाहता है कि क्या नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से इसीलिए हटाया गया कि वे नरेन्द्र मोदी के प्रतिद्वंद्वी न बन सकें?  हमारा अनुमान गलत हो सकता है किन्तु अभी यह बिन्दु विचारणीय है कि क्या नरेन्द्र मोदी एक तरफ मोहन भागवत और दूसरी तरफ कारपोरेट घरानों की आशाओं-आकांक्षाओं के बीच कोई तालमेल बैठा पाएंगे? श्री भागवत चाहे जो सोचें, क्या भारत का कोई भी प्रधानमंत्री इस विशाल देश को एक धर्म आधारित देश बना सकता है? श्री नरेन्द्र मोदी और हिटलर के बीच प्रकारान्तर से तुलना की जाती है, लेकिन क्या आज की दुनिया में और विशेषकर स्वतंत्र भारत की अपनी राजनीतिक परंपरा में किसी भी व्यक्ति का हिटलर बन पाना संभव है? दूसरी ओर यह प्रश्न भी उठता है कि देश के कारपोरेट घराने अपने साम्राय के निर्बंध विस्तार के लिए जो माहौल चाहते हैं, क्या वह सांप्रदायिक अशांति से उपजे माहौल में संभव हो पाएगा? मेरी दृष्टि में दोनों का ही जवाब नहीं में होना चाहिए।

मैं एक और संभावना देखता हूं। यदि नरेन्द्र मोदी ले-देकर प्रधानमंत्री बन भी गए तो उन्हें मजबूर होकर क्षेत्रीय व छोटे दलों से समझौता करना पड़ेगा, हाशिए पर डाल दिए गए बुजुर्ग नेताओं की अनुपस्थिति में भाजपा का नए सिरे से गठन करना होगा, देश-विदेश के तमाम मसलों पर निर्णय लेना पड़ेगा और तब परीक्षा होगी कि मीडिया और छविनिर्माण एजेंसियों ने भारी रकम और बड़ी मेहनत कर जो प्रपंच रचा है, उसमें नरेंद्र मोदी बोरिस येल्तसिन सिध्द होते हैं या ब्लीदीमिर पुतिन!!

 
देशबंधु में 20 मार्च 2014 को प्रकाशित

Thursday, 13 March 2014

नई संभावनाएं?


 मैं नहीं जानता कि मेरा अनुमान किस सीमा तक सही निकलेगा, लेकिन इन दिनों जो राजनीतिक गतिविधियां चल रही हैं उन्हें देखकर  संभावना बनती है कि सोलहवीं लोकसभा के चुनावों के साथ भारत की राजनीति में एक बिल्कुल नई तरह की शुरुआत होगी। ध्यान रहे कि मैं यह बात एक व्यापक पृष्ठभूमि में कर रहा हूं और इसमें किसकी जीत होगी या कौन प्रधानमंत्री बनेगा, इसकी कोई चर्चा फिलहाल मैं नहीं कर रहा हूं।

सबसे पहले दलबदल की ही बात क्यों न की जाए! अलमोड़ा, भिण्ड, भुवनेश्वर, पटना और न जाने कहां-कहां से महारथी समझे जाने वाले नेताओं के एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने की खबरें मिल रही हैं। अल्मोड़ा से भाजपा ने बच्ची सिंह रावत को टिकट नहीं दिया तो उन्होंने पार्टी छोड़ दी। पटना में राज्यसभा सदस्य रामकृपाल यादव लोकसभा का टिकट न मिलने से लालू प्रसाद से खफा हो गए। ओड़िशा विधानसभा में विपक्ष के नेता भूपेन्द्र सिंह ने ही पार्टी छोड़ दी और बीजद में शामिल हो गए। इस मामले में कीर्तिमान स्थापित किया मध्यप्रदेश ने। पिछले साल विधानसभा में कांग्रेस के उपनेता चौधरी राकेश सिंह ने सदन के भीतर ही दलबदल किया। उनके बाद होशंगाबाद के लोकसभा सदस्य उदयप्रताप सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी और उनके भी सिरमौर निकले भागीरथ प्रसाद। रात को कांग्रेस टिकट मिलने की घोषणा हुई, सुबह भाजपा दफ्तर माला पहनने पहुंच गए। अब उनके सामने क्या मजबूरी थी या कोई प्रलोभन, ये तो वही बता सकते हैं।  कुछ ऐसा ही किस्सा तीसरी पीढ़ी के कांग्रेसी विवेक तनखा के साथ हुआ। वे लगभग एक दशक तक दिग्विजय सिंह सरकार में महाधिवक्ता थे, फिर उन्होंने कांग्रेस विरोधियों का सहयोग लेकर राज्यसभा का चुनाव लड़ा, उसमें हार गए। वे कांग्रेस  विरोधी प्रबंधन गुरु शिव खेड़ा के 'इंडिया फर्स्ट' अभियान से जुड़े हुए हैं और इस बार उन्हें जबलपुर से कांग्रेस का टिकट मिल गया है।

ऐसे और न जाने कितने उदाहरण हैं। इनसे पता चलता है कि राजनीतिक दल व राजनेता क्षणिक एवं तात्कालिक मुनाफे की प्रत्याशा में किस तरह का आचरण कर रहे हैं। अगर इसे अनैतिक आचरण कहा जाए तो क्या गलत होगा? वैसे तो दल-बदल की यह प्रवृत्ति 1967 से शुरू हो गयी थी। डॉ. लोहिया के अनुयायी इसमें बेहद प्रवीण थे। जनसंघ, फिर भाजपा ने इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने में हमेशा उत्साह का प्रदर्शन किया। इस मामले में कांग्रेसी भाजपा से उन्नीस बैठे। जो भी हो, आज देश के मतदाता के सामने खुलकर यह बात आ रही है कि राजनीति में सिध्दांतहीनता किस कदर हावी हो गयी है। ये नेता जो मौका ताड़कर दल बदलते हैं, वे इस अवांछित स्थिति को बढ़ावा देने के लिए बहुत बड़ी हद तक जिम्मेदार हैं। इसलिए आज आम चुनावों की बेला में भारतीय मतदाताओं के सामने यह अवसर और संभावनाएं हैं कि इस तरह के मौकापरस्त उम्मीदवारों को घर का रास्ता दिखाकर स्वस्थ राजनीति का मार्ग प्रशस्त किया जाए। अगर मतदाता अपने वोट का इस्तेमाल विवेकपूर्ण ढंग से करे तो दल-बदल का रोग हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है।

इन चुनावों का एक दिलचस्प तथ्य यह है कि देश के अधिकतर हिस्सों में दो पार्टियों के बीच आमने-सामने का मुकाबला न होकर चतुष्कोणीय संघर्ष होगा। चार-पांच प्रांत ही ऐसे हैं जहां कांग्रेस व भाजपा के बीच सीधी-सीधी टक्कर होगी। अस्सी सीटों वाले सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में एक तरफ कांग्रेस-राष्ट्रीय लोकदल  गठबंधन, दूसरी तरफ भाजपा, तीसरी तरफ सपा व तीसरा मोर्चा व चौथी तरफ बसपा होगी। अड़तालीस सीटों वाले महाराष्ट्र में कांग्रेस, भाजपा-शिवसेना, मनसे और आप के बीच अनेक सीटों पर चतुष्कोणीय मुकाबले होंगे। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक और द्रमुक ने किसी के साथ गठजोड़ नहीं किया है। वहां कांग्रेस अपने बूते पर लड़ेगी और वामदल भी। भाजपा छोटे दलों के साथ गठजोड़ करने की जुगत में है। बिहार में कांग्रेस-राजद, भाजपा, लोजपा और जदयू के बीच मुकाबला होना है। वाममोर्चे की पहल पर तीसरा मोर्चा बनने की पहल हुई है, लेकिन उसके आगे बढ़ने के पहले ही टूटने के आसार नजर आ रहे है। बंगाल में भी चार पक्षों के बीच मुकाबला होगा- कांग्रेस, तृणमूल, वाममोर्चा और भाजपा।

इस स्थिति में आज यह अनुमान लगा पाना कठिन है कि कहां से कौन जीतेगा। कल तक बिहार में नीतीश कुमार की छवि अजेय योध्दा की बनी हुई थी, जो अब बिखर गयी है। इसी तरह अन्य क्षेत्रीय नेता अपने-अपने उद्देश्य में क्या कमाल कर पाएंगे, इस पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। यहां मतदाताओं के सामने एक नया विकल्प खुलता है कि वे अपनी समझ से बेहतर उम्मीदवार को चुन सकें। जहां आमने-सामने मुकाबला हो वहां मतदाता एक बार पार्टी के प्रति निष्ठा या सिध्दांतों के आधार पर अपना वोट देने का निर्णय कर सकता है, लेकिन जहां एक तरह से सीमाएं धुंधला गयी हों वहां प्रत्याशी के अपने गुण व अपनी छवि के आधार पर फैसला होना संभव है। तो क्या इस बार हम ऐसी लोकसभा देखेंगे जिसमें बड़ी संख्या में सदस्य पार्टी के बजाय निजी छवि के कारण जीतकर आएंगे?

इसी सवाल से एक और संभावना उभरती है, बशर्ते राजनीतिक दल जनता से मिल रहे संकेतों को पढ़ने में सक्षम हों. कांग्रेस व भाजपा इन दोनों बड़े दलों के सामने आज यह अवसर है कि वे प्रत्याशियों को चुनने में सिर्फ ''जीत सकते हैं'' (विनेबिलिटी) को आधार न बनाएं बल्कि थोड़ी हिम्मत जुटाकर ऐसे लोगों को सामने लाएं जिनकी छवि स्वच्छ हो। हम याद करना चाहेंगे कि छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस ने पहले चरण में जिन अठ्ठारह प्रत्याशियों को टिकट दिए थे उनमें से बारह ने जीत दर्ज की। अगर कांग्रेसी मगरूर न हुए होते तो बाद के चरणों में भी नए लोगों को सामने लाकर बेहतर नतीजे हासिल कर सकते थे। इस दृष्टि से अभी कांग्रेस ने जो पहली सूची जारी की है उसमें बड़ी संख्या में नए लोगों को, युवाओं को और महिलाओं को टिकट दी गईं। क्या कांग्रेस इस नीति पर कायम रह पाएगी? क्या भाजपा भी ऐसी ही कोई नीति अपनाएगी? गर ऐसा हो सका तो इन पार्टियों के लिए भी अच्छा होगा और राजनीतिज्ञों के लिए भी। एक अच्छी बात यह हुई है कि आसन्न चुनावों में कांग्रेस व भाजपा दोनों के पास नया नेतृत्व है। ऐसा लगता है कि इधर डॉ. मनमोहन सिंह, उधर डॉ. लालकृष्ण अडवानी-दोनों बुजुर्गों की भूमिका नई पीढ़ी को आशीर्वाद देने तक सीमित रह गयी है। फिर कांग्रेस में यदि सोनिया गांधी खुद होकर अपनी भूमिका को समेट रही हैं तो भाजपा में सुषमा स्वराज और उनके समकालीनों को योजनाबध्द तरीके से हाशिए पर खिसकाया जा रहा है। यद्यपि नरेंद्र मोदी युवा नहीं हैं, लेकिन मीडिया के सहयोग से उनकी एक युवकोचित छवि बनाने की कोशिश चल रही है। इसके चलते दोनों पार्र्टियों में सांगठनिक स्तर पर नयी पीढ़ी का अभ्युदय होने की उम्मीद जागने लगी है। यह राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी दोनों पर निर्भर करता है कि वे अपनी-अपनी पार्टी के भीतर युवाओं को कितना आगे ला सकते हैं!

 इन सारे बिन्दुओं पर विचार करते हुए ऐसा विश्वास करने को मन होता है कि आगामी लोकसभा में हमें ऐसे सदस्य देखने मिलेंगे, जो राजनीति के घिसे पिटे तरीकों से दूर रहेंगे और कुछ इस तरह से अपना कामकाज करेंगे कि संसदीय लोकतंत्र व लोकतांत्रिक राजनीति में जनता का विश्वास फिर से जाग सके। क्या वास्तव में ऐसा हो सकेगा?


देशबंधु में 13 मार्च 2014 को प्रकाशित

Monday, 10 March 2014

गीता किसने लिखी?





भारतीय चिंतनधारा में श्रीमद्भागवतगीता अथवा संक्षेप में गीता को जो उच्चासन प्राप्त है वह सर्वविदित है। श्रुति, स्मृति और गीता अर्थात् वेद, उपनिषद व गीता ये तीनों मिलकर प्रस्थानत्रयी के नाम से जाने जाते हैं। इनको आधार बनाकर ही भारत की उस दार्शनिक परंपरा का विकास हुआ है जिसने भारत के बहुसंख्यक समाज का मनोगत रचने में अहम् भूमिका निभाई है। वेद व उपनिषद का अध्ययन इस समाज में अभी भी सीमित है और उसकी व्याख्या करने का काम पंडितों के जिम्मे है। एक सामान्य व्यक्ति के लिए इतना जानना ही पर्याप्त है कि वह वैदिक संस्कृति का वारिस है। गीता के साथ ऐसी कोई उलझन नहीं है। गीता और उसके कई शताब्दियों बाद रचित रामचरित मानस ऐसे दो ग्रंथ हैं, जो संभवत: हर उस घर में मिल जाएंगे जो रूढ़ अर्थों में सनातन अथवा हिन्दू धर्म के अनुयायी माने जाते हैं। इनमें शैव, वैष्णव, शाक्त सब शामिल हैं। इस्लाम में कुरान शरीफ व ईसाईयत में पवित्र बाइबिल का जो ओहदा है वही हमारी इस परंपरा में गीता को हासिल है।

यह सामान्य तौर पर माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में महाभारत युध्द प्रारंभ होने की पूर्व बेला में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था ताकि वे संशयरहित होकर युध्द भूमि में अपने कर्तव्य को निभाने के लिए प्रवृत्त हो सकें। गीता के सात सौ श्लोकों में जो उपदेश दिए गए हैं उनको हमारे यहां विभिन्न स्थितियों में दोहराया जाता है, उनसे प्रेरणा ली जाती है, मन को समझाया जाता है। अदालत में हिन्दू धर्म को मानने वाले गीता पर हाथ रखकर सच बोलने की कसम खाते हैं, तो मृत्यु के समय शरीर नश्वर और आत्मा अविनाशी की उक्ति स्मरण हो आती है। जीवन में सफलता-असफलता के बीच जब कभी उहापोह की स्थिति बनती है तो ''कर्म करते जाओ, फल की चिंता मत करो'' का परामर्श किसी न किसी सयाने के मुख से सुनने मिल ही जाता है। गीता की इस लगभग निर्विकल्प श्रेष्ठता का सर्वप्रथम सूत्र संभवत: आदि शंकराचार्य की टीका में देखा जा सकता है। उनके बाद रामानुजाचार्य, निंबार्काचार्य, मध्वाचार्य से लेकर वल्लभाचार्य, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद तक अनेक मनीषियों ने अपनी-अपनी व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं।

गीता के इस दृढ़तापूर्वक स्थापित महत्व के बावजूद इस महान ग्रंथ के लेखन-समय एवं लेखक के बारे में समय-समय पर परस्पर विरोधी मत व्यक्त किए जाते रहे हैं। इसका एक प्रमुख कारण तो यही है कि गीता के विभिन्न अध्याओं में दिए गए उपदेशों में ही कई जगह विरोधाभास देखने मिलता है। दूसरे गीता की भाषा में भी प्रारंभ से अंत तक एकरूपता नहीं है, जो एक लघुग्रंथ के लिए स्वाभाविक नहीं कही जा सकती और जिसकी ओर अनेक धुरंधर विद्वानों ने संकेत किया है। ये दो ऐसे कारण थे, जिन्होंने प्रोफेसर मेघनाद देसाई को गीता व उससे संबंधित साहित्य के विशद अध्ययन के लिए प्रेरित किया। उन्होंने इस बिना पर जो स्थापनाएं की हैं वे 2014 की शुरुआत में प्रकाशित उनकी अंग्रेजी पुस्तक ''अ सेकुलर इन्क्वायरी इन टू अ सेक्रेड टैक्स्ड'' याने ''एक पवित्र पाठ की आग्रहमुक्त पड़ताल'' का आधार हैं। स्मरणीय है कि प्रोफेसर देसाई अंतरराष्ट्रीय ख्याति के समाजचिंतक हैं तथा उन्हें टीवी दर्शक आए दिन किसी न किसी चैनल पर समसामयिक मुद्दों पर अपने विचार रखते हुए देख सकते हैं।

श्री देसाई जैसा कि नाम से स्पष्ट है मूलत: भारतीय हैं। वे लगभग चालीस साल तक लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स में प्रोफेसर रहे हैं तथा ब्रिटिश संसद के उच्च सदन याने हाउस ऑफ लॉर्ड्स के भी सदस्य हैं। भारतीय इतिहास और संस्कृति पर कुछेक कार्यक्रमों में भाग लेते हुए उन्होंने अनुभव किया कि गीता का समदृष्टि विवेचन किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में वे अनेकानेक विद्वानों के विचारों से रूबरू होते हैं और फिर अपने निष्कर्ष निकालते हैं। उनकी एक स्थापना तो यह है कि प्राचीनकाल में आदि शंकराचार्य के पूर्व गीता का उल्लेख बहुत कम मिलता है। शंकराचार्य के एक शताब्दी पूर्व बाणभट्ट की कादंबरी में गीता का उल्लेख अवश्य है यद्यपि उसके दो अर्थ निकाले जाते हैं, जिनमें एक यह है कि महाभारत में अर्जुन को अनंत गीता सुनकर आत्मिक आनंद मिला था। इसी तरह कालिदास के रघुवंश एवं कुमारसंभव में भी गीता का उल्लेख है तो लेकिन पूरी तरह से प्रमाणित नहीं। महान चीनी यात्री शुआन जांग (ह्वेनसांग) ने सातवीं शताब्दी के अपने यात्रा वृत्तांत में एक ऐसी कथा का उल्लेख किया है जो गीता प्रसंग से मिलती-जुलती है। कुल मिलाकर इस ग्रंथ का विधिवत और नियमित अध्ययन व टीका का काम शंकराचार्य से प्रारंभ होता है। पुराने आचार्यों ने इसे भक्त को सुनाई देववाणी की बजाय एक दार्शनिक विमर्श के धरातल पर ही देखा है।

प्रो. देसाई कहते हैं कि अधिकतर टीकाएं अभिजात समाज के लिए थीं जो संस्कृत जान-समझ सकते थे। तेरहवीं सदी में संत ज्ञानेश्वर ने मराठी अनुवाद कर इसे पहले-पहल आमजन के लिए उपलब्ध कराया यद्यपि उस समय भी दलित-वंचित जन इसे प्रवचन स्थल के बाहर बैठकर ही सुन सकते थे। आगे चलकर अकबर के नवरत्नों में एक फैजी ने गीता का फारसी में अनुवाद किया एवं अंग्रेजी राज में सबसे पहले वायसराय वारेन हेस्टिंग्स ने चार्ल्स विलकिंस से इसका हिन्दी अनुवाद कराया। इसके उपरांत अंग्रेजी तथा यूरोप की कुछ अन्य भाषाओं में भी गीता के अनुवाद हुए। तथापि सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं सर्वाधिक लोकप्रिय जो अनुवाद हुआ वह सर एडविन अर्नाल्ड ने किया। सर एडविन ने पूर्व में भगवान बुध्द के जीवन पर 'द लाइट ऑफ एशिया' पुस्तक लिखी थी। गीता का अनुवाद 'द सांग सेलेस्टियस' शीर्षक से 1885 में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक से ही गीता की जानकारी आधुनिक काल में दूर-दूर तक पहुंची।

वस्तुत: स्वयं महात्मा गांधी ने इस पुस्तक के द्वारा ही गीता से प्रथम परिचय प्राप्त किया था। प्रो. देसाई लिखते हैं कि उन्नीसवीं सदी के अंत में गीता भारतीय घरों में बहुत ज्यादा लोकप्रिय नहीं थी। गांधीजी के पिता ने अपने जीवन के अंतिम समय में ही गीता का वाचन शुरू किया था। यही स्थिति लोकमान्य तिलक की थी। उन्होंने सोलह वर्ष की आयु में गीता का पहली बार अपने पिता की मृत्युशैय्या पर वाचन किया, जबकि उनके घर में संस्कृत प्रचलित थी। महात्मा फुले ने भी अपनी प्रसिध्द पुस्तक 'गुलामगिरी' में मनुस्मृति एवं भागवत का जिक्र तो किया है किन्तु गीता का नहीं। उधर बंगाल में महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर ने प्राचीन ग्रंथों के अनुवाद हेतु काफी उपाय किए, लेकिन उन पुस्तकों में गीता शामिल नहीं थी। कुल मिलाकर लेखक की स्थापना है कि बीसवीं सदी के प्रारंभ तक गीता को वह महत्व प्राप्त नहीं था जो आज देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह स्थिति कैसे बदली? एक तो पश्चिमी भाषाओं में अनुवाद से भारतीयों में यह भाव जागृत हुआ कि भारत एशिया के अन्य देशों से कुछ ऊंचे स्थान पर तथा पश्चिम के कुछ निकट है। इससे अपनी प्राचीन सभ्यता के प्रति गर्व का भाव उत्पन्न हुआ। बंकिम के उपन्यास 'आनंदमठ' से प्रेरित होकर जो क्रांतिकारी दस्ते बने उन्होंने स्वाधीनता संग्राम की अपनी लड़ाई में गीता से प्रेरणा ली। शहीद खुदीराम बोस अपने गले में गीता को पहनकर फांसी के फंदे पर झूले। अपनी संस्कृति पर इस गर्व को पुष्ट करने का काम सबसे प्रमुख रूप से लोकमान्य तिलक रचित 'गीता रहस्य' से हुआ। यह सचमुच आश्चर्यचकित करने वाला तथ्य है कि बर्मा के मंडाले जेल में कालापानी भुगतते हुए तिलक महाराज ने नवंबर 1910 से मार्च 1911 के बीच मात्र एक सौ पांच दिन में बारह सौ दस पेज की यह किताब लिख डाली।

यह हम जानते हैं कि लोकमान्य के बाद गांधी जी ऐसे राजनेता थे, जो साबरमती आश्रम में दैनिक प्रार्थना के बाद गीता पर प्रवचन दिया करते थे। गांधीजी गीता का पाठ सत् और असत् के बीच संघर्ष में सत्य की जीत के रूप में करते थे। महर्षि अरविन्द जो पहले क्रांतिकारी और बाद में आध्यात्मिक नेता बने, उनकी सोच तिलक जी के निकट थी। वे इसे कर्मयोग का सूत्र मानते थे। परवर्ती समय में डॉ. राधाकृष्णन ने गीता की व्याख्या की और उसकी गूढ़ दार्शिनिकता को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाया। प्रो. देसाई कालक्रम में वर्णन करते हुए हरेकृष्ण आंदोलन तक आते हैं और बतलाते हैं कि इस सम्प्रदाय के अनुयायी के घरों में पढ़ी भले न जाए, ड्राइंगरूम में गीता अवश्य रखी होती है।

अगले अध्यायों में प्रो. देसाई गीता की विषय वस्तु, भाषा, लेखक जैसे पेचीदा सवालों पर अपने विचार सामने रखते हैं। वे एक तरफ विवेकानंद के विचारों को उध्दृत करते हैं तो दूसरी ओर डी.डी. कोसाम्बी व बाबा साहेब आम्बेडकर को। वे सूचनार्थ प्रोफेसर ए.टी. तैलंग द्वारा 1892 में किए गए पहले गद्यानुवाद का भी उल्लेख कहीं करते हैं। दामोदर धर्मानंद कोसाम्बी बीसवीं सदी के महान समाज चिंतकों में से एक थे। जो धारा गीता को एक सम्पूर्ण दार्शनिक एवं दैविक कविता मानती है, कोसाम्बी उससे सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि गीता का हरेक ने अपनी-अपनी तरह से ऐसा भाष्य किया है कि उससे समाधान की बजाय और अधिक प्रश्न उठते हैं। इससे आंतरिक द्वंद्व दूर होने की बजाय व्यक्तित्व खंडित होने की गुंजाइश बनती है। प्रो. देसाई इससे सहमत हैं। 


लेखक कोसाम्बी के हवाले से ही आगे प्रश्न उठाते हैं कि युध्द क्षेत्र में अर्जुन को संशयमुक्त होने के लिए विशद व्याख्यान की आवश्यकता थी या एक मित्रतापूर्ण फटकार की कि तुम अपना काम करो? श्री देसाई इसके आगे महाभारत के अश्वमेध पर्व में संकलित अनुगीता का उल्लेख करते हैं, जिसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को दुबारा गीता का संदेश संक्षेप में इसलिए देते हैं क्योंकि अर्जुन के चंचल मन में युध्द क्षेत्र के उपदेश की कोई स्मृति बाकी नहीं थी। प्रश्न उठता है कि यदि अर्जुन में गीता का उपदेश समझने की क्षमता नहीं थी जो कि कृष्ण को अवश्य पता रही होगी तो फिर क्या सचमुच यह उपदेश युध्द क्षेत्र में ही दिया गया था? श्री देसाई दूसरा सवाल उठाते हैं कि कृष्ण ने तो धाराप्रवाह उपदेश दिया होगा, फिर उसे अध्यायों में किसने बांटा और फिर हर अध्याय में जो समापन टीका की गई है वह किसने लिखी? इस बारे में वे डॉ. आम्बेडकर को उध्दृत करते हैं कि विद्वानों की विवेचना गलत रास्ते पर है। गीता ईश्वरीय उपदेश नहीं है बल्कि धर्म के पक्ष में दर्शनशास्त्र का उपयोग है।

डॉ. आम्बेडकर ने गीता पर काफी विस्तार से लिखा है। उनका मानना है कि बौध्द धर्म के प्रतिकार के लिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने भगवतगीता का एक अस्त्र के रूप में उपयोग किया। यह प्रमाणित है कि ईसापूर्व से नवमीं शताब्दी के बीच लगभग एक हजार वर्ष तक इन दोनों के बीच द्वंद्व चलता रहा है। यह अभी हमारा विषय नहीं है। विद्वान लेखक कोसाम्बी को पुन: उध्दृत करते हुए कहते हैं कि गीता का उत्स प्राचीन दार्शनिक स्रोतों याने उपनिषद अथवा सांख्य दर्शन में है। वे स्वामी विवेकानंद के हवाले से कहते हैं कि ''गीता एक ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें उपनिषदों से चुन-चुनकर दार्शनिक शक्तियों के खूबसूरत फूल सजाए गए हैं।'' विवेकानंद पुन: कहते हैं कि- ''गीता के लेखक ने अद्वैत, योग, ज्ञान, भक्ति आदि को सम्मिश्रित करने का काम किया है। उसने सभी सम्प्रदायों से सर्वश्रेष्ठ चुनाव और गीता की माला में पिरो दिया।'' इस बिंदु पर स्वामी विवेकानंद और डी.डी. कोसाम्बी एक साथ खड़े नजर आते हैं।

इस पुस्तक में इस बात की भी गवेषणा की गई है कि महाभारत और गीता का रचनाकाल क्या है। कोसाम्बी मानते हैं कि इसे दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच लिखा गया, क्योंकि इसकी भाषा उसी काल की है। प्रो. देसाई का कहना है कि महाभारत और गीता दोनों के रचनाकाल के बारे में निश्चयपूर्वक कुछ भी कहना कठिन है। महाभारत के बारे में अनेक विद्वान एकमत हैं कि इसे पहले 'जय' नामक संक्षिप्त ग्रंथ के रूप में लिखा गया, फिर 'भारत' नामक अपेक्षाकृत बड़े ग्रंथ के रूप में इसे बढ़ाया गया जिसे अंतत: महाभारत का रूप दे दिया गया। 'भारत' में चौबीस हजार वर्ष श्लोक थे, जबकि महाभारत में एक लाख। संभवत: महाभारत का यह विकास लगभग एक हजार वर्ष की अवधि में हुआ। हरिवंश पुराण को पहले महाभारत का उन्नीसवां पर्व माना जाता था, जिसे बाद में अलग किया गया। इसी के साथ कृष्ण की ऐतिहासिकता पर भी सवाल उठते हैं। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि कृष्ण के व्यक्तित्व को लेकर बहुत से संदेह है। प्राचीनकाल में हमारे देश में इतिहासशोधन के द्वारा सत्यान्वेषण की परंपरा लगभग नहीं थी इसलिए बिना तथ्य और प्रमाण के जिसको जैसा मन आए वैसी स्थापना कर सकता था। जब कृष्ण को लेकर संदेह है तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि गीता की ऐतिहासिकता क्या है! यद्यपि गीता को एक स्वतंत्र पृथक ग्रंथ के रूप में पढ़ा जाता है, लेकिन वह मूलत: महाभारत के भीष्म पर्व का अंश है। गीता के बारे में सामान्य धारणा है कि यह महाभारत युध्द के पहले दिन दिया गया उपदेश है, लेकिन भीष्म पर्व तो युध्द के दसवें दिन प्रारंभ होता है! इसमें जो विरोधाभास है, वह स्पष्ट है।

प्रो. देसाई ने गीता में निहित दर्शन की भी विस्तारपूर्वक व्याख्या की है, लेकिन उनकी प्रमुख चिंता गीता के लेखक को खोजने की है। वे विभिन्न स्रोतों का हवाला देते हुए कहते हैं कि इसके लिखने वाले कम से कम तीन लोग थे, जो तीन अलग-अलग समयों में हुए। वे यह भी मानते हैं कि गीता अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग श्रोताओं को संबोधित थी। उनके अनुसार प्रथम लेखक के श्रोता पंडित, मुनि, योगी, तत्वदर्शी इत्यादि थे। दूसरे लेखक के श्रोता चुने हुए यति, योगी आदि थे, जबकि तीसरे लेखक के श्रोता आमजन थे। इस विवेचना में वे डॉ. गजानन खेर से काफी सहायता लेते हैं जिन्होंने मराठी में मूल गीता की खोज नामक शोध ग्रंथ लिखा था। प्रो. देसाई का अपना मानना है कि गीता के तीसरे लेखक बादरायण थे जिन्होंने ब्रह्मसूत्र की रचना की थी। वे इन दोनों ग्रंथों में बहुत सी समानताएं पाते हैं।

प्रो. मेघनाद देसाई के इस विविधतापूर्ण शोधग्रंथ पर आने वाले दिनों में पांडित्यपूर्ण चर्चाएं होंगी इसमें मुझे संदेह नहीं। गीता कब लिखी गई और किसने लिखी यह विद्वानों के बीच चर्चा का विषय है लेकिन मैं रेखांकित करना चाहता हूं कि लेखक ने वर्तमान  समय में गीता की प्रासंगिकता पर भी प्रश्न उठाए हैं। वे मानते हैं कि यह एक कठिन और भ्रम में डालने वाला पाठ है। उनका यह भी कहना है कि भारत के संविधान में सामाजिक न्याय एवं जनतांत्रिक स्वतंत्रताओं की जो प्रतिश्रुति है गीता उसके उपयुक्त नहीं है। वे बहुत स्पष्टपूर्वक कहते हैं कि - ''समय आ गया है कि गीता की समालोचना आज की कसौटियों पर की जाए।'' 


अक्षर पर्व मार्च 2014 अंक में प्रकाशित

Wednesday, 5 March 2014

स्वायत्तता और विकेंद्रीकरण



यदि
सरकार को सचमुच समाज से नजदीकियां बनाना हैं, यदि सत्ता का वास्तविक अर्थों में विकेंद्रीकरण करना है तो इसके लिए भारत जैसे विशाल देश में छोटे प्रांतों का गठन करना समय की मांग है, यह बात पहिले कही जा चुकी है। इसके साथ-साथ यदि संविधान की मंशा के अनुसार शासन-प्रशासन में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना है तो इस हेतु स्थानीय स्वशासी संस्थाओं की खुले मन से स्वायत्तता देना भी अपरिहार्य है, इस ओर मैंने अपने पिछले लेख में संकेत किया था। यह देखना भी जरूरी है कि देश के विभिन्न विधान मंडलों के चुने गए सदस्य जनाकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने में किस सीमा तक समर्थ हैं। यह कुछ आश्चर्य की ही बात है कि बदलते हुए समय की जरूरतों के  अनुसार इस ओर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था नहीं दिया गया।

भारत की जनतांत्रिक व्यवस्था व चुनाव प्रणाली में जो भी वास्तविक या काल्पनिक विसंगतियां हैं उन पर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। हम कभी अमेरिका की नकल पर राष्ट्रपति शासन प्रणाली की मांग उठाते हैं, तो कभी जर्मनी की तर्ज पर आम चुनाव करवाने की वकालत करते हैं। लेकिन अपने विधान मंडलों को भी कैसे ज्यादा उत्तरदायी बनाया जा सकता है इस पर हमने शायद ही कभी विचार किया हो। अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी आदि देशों में जो व्यवस्था लंबे समय से चली आ रही है उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि वहां जनसंख्या लगभग स्थिर है। इसके विपरीत भारत में लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण अनुपातहीनता की स्थिति उत्पन्न हो गई है। एक लोकसभा सदस्य से कैसे उम्मीद की जाए कि वह पच्चीस या तीस लाख जनता का प्रतिनिधित्व सही ढंग से कर पाएगा? इसी तरह विधानसभा सदस्यों पर भी 1952 के मुकाबले आज चार गुना अधिक जनता का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी आन पड़ी है। यहां इस विपर्यय पर भी ध्यान जाता है कि कई जगह नगरीय निकायों में चुने गए प्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दिल्ली नगर निगम को एक साल पहले ही तीन में हिस्सों बांट दिया गया है।  गरज यह कि जो फार्मूला नगर निगम के स्तर पर उपयोगी है उसे प्रदेश व देश के स्तर पर किस रूप में कहां तक उपयोगी है इस पर चर्चा करना लाजिमी है। 

मेरा तो मानना है कि हमारी लोकसभा में कम से कम एक हजार सदस्य होना चाहिए। अगर बारह सौ हों तो और बेहतर। इसे लेकर कुछ साल पहले बहस चली थी जो आगे नहीं बढ़ पाई। जिन राज्यों की जनसंख्या स्थिर है उन्हें आशंका थी कि लोकसभा का स्वरूप वृहद हो जाने से उनके महत्व में कमी आ जाएगी और उनकी बातों की अनसुनी होने लगेगी। इस चिंता में सत्य का अंश हो सकता है लेकिन बहस को वहीं के वहीं समेटने के बजाय बेहतर होता कि सभी पक्षों की आशंका और आपत्तियों का निराकरण कैसे हो इसे ध्यान में रखकर बहस आगे बढ़ाई जाती।

इस संदर्भ में आज हमारे संसद सदस्यों और विधायकों पर कितना शारीरिक और मानसिक दबाव है इस ओर हमारी तवज्जो जाना चाहिए। यह सच है कि निर्वाचित प्रतिनिधि सदन की कार्रवाई में वांछित रुचि नहीं लेते। इस पर उनकी लगातार आलोचना भी होती है किंतु तरफ अपने क्षेत्र की जनता से बचने का कोई उपाय उनके पास नहीं है। वे मतदाताओं की नाराजगी झेलने की जोखिम उठाने में खुद को असमर्थ पाते हैं। अपने क्षेत्र में एक दिन में उन्हें कितने लोगों से मिलना होता है, कितने कार्यक्रमों में शिरकत करना पड़ती है, कितने आवेदन पत्र उन्हें मिलते हैं इसका मानो कोई हिसाब ही नहीं है। अमूमन जब हम उनके कामकाज की समीक्षा करते हैं तो उनकी इस मजबूरी की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। सोचिए कि आज यदि एक विधायक को दो लाख की जगह उसके आधे याने एक लाख जनता की नुमाइंदगी करने की व्यवस्था हो तो फिर उनसे सभी मोर्चों पर बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा सकती है या नहीं?

स्थानीय स्वशासी निकायों की स्वायत्तता एक और प्रमुख विचारणीय मुद्दा है। तिहत्तरवें और चौहत्तरवें संविधान संशोधन विधेयक लागू हो जाने के बाद अब पूरे देश में स्थानीय संस्थाओं के चुनाव नियमित अवधि में होने लगे हैं। अन्यथा एक समय ऐसा था जब राज्य सरकार की मर्जी हो तो चुनाव करवाए और मर्जी न हो तो निकाय भंग कर प्रशासक बैठा दे। याद करें कि 1957 में रायपुर नगर पालिका के चुनाव हुए तो अगले चुनाव उसके बाइस साल बाद 1979 में कहीं जाकर सम्पन्न हो पाए। चुनाव न करवाने के पीछे प्रदेश के कद्दावर नेताओं के निजी व राजनैतिक दोनों कारण थे। रायपुर जैसी ही स्थिति मध्यप्रदेश के अन्य शहरों में भी थी। यही स्थिति पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों को लेकर बनी। इस नाते उपरोक्त संविधान संशोधन विधेयकों का लागू होना जनतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने की दृष्टि से एक ऐतिहासिक कदम माना जा सकता है। इसका श्रेय राजीव गांधी को दिया जाना चाहिए।

यह तो ठीक है कि अब नियमित रूप से चुनाव हो रहे हैं, लेकिन संबंधित कानूनों में भी कुछ ऐसी कमियां हैं जिनके कारण उनसे अपेक्षित लाभ मिलने में बाधाएं आ रही हैं। इनमें कहा गया है कि राज्य सरकारें स्थानीय निकायों के संचालन के लिए अपने स्तर पर नियम-उपनियम बना सकती हैं। इसके कारण विसंगतियां पैदा हो रही हैं। किसी राय में महापौर का कार्यकाल एक वर्ष का है तो कहीं पांच वर्ष का। कहीं महापौर का निर्वाचन प्रत्यक्ष हो रहा है, तो कहीं अप्रत्यक्ष। कहीं सामान्य सभा में निर्णय हो रहे हैं तो कहीं महापौर की मंत्रणा परिषद में। पंचायत स्तर पर कहीं दलगत आधार पर चुनाव हो रहे हैं, तो कहीं बिना उसके। इसके अलावा इन निकायों में जो अधिकारी बैठाए गए हैं वे अपने आपको निर्वाचित निकाय के बजाय राज्य सरकार के प्रति जवाबदेह मानते हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर की इन प्रतिनिधि संस्थाओं का सुचारू रूप से चलना कठिन होते जा रहा है।

इस बारे में हमारी सोच स्पष्ट है। हमारे यहां केन्द्र और राज्य के बीच संबंध इस तरह के हैं कि राय सरकारें अपने दैनंदिन कामों व सामान्य जरूरतों के लिए केन्द्र पर निर्भर नहीं हैं। केन्द्र और
राज्य के बीच अधिकारों व शक्तियों का बंटवारा स्पष्ट है। राज्य के पास ऐसे अनेक अधिकार हैं जिनमें केन्द्र का हस्तक्षेप हो ही नहीं सकता। ऐसे भी कुछ क्षेत्र हैं जिनमें दोनों को अधिकार हैं जो कि समवर्ती सूची में वर्णित हैं। यही नहीं दोनों के बीच आर्थिक संसाधनों का बंटवारा करने के लिए भी एक पारदर्शी प्रणाली लागू है। केन्द्र द्वारा निश्चित अंतराल पर वित्त आयोग का गठन किया जाता है। उसकी सिफारिशों के आधार पर केन्द्र से संचित निधि व आयकर आदि मदों से राज्यों को धनराशि का आबंटन होता है।

इसके विपरीत दुर्भाग्य से केन्द्र व राज्य के बीच स्वस्थ संबंध बनाने के लिए जो प्रणाली अपनाई गई है उसकी भावना को राज्य सरकारें समझने से इंकार करती हैं। हमारे छत्तीसगढ़ में ही तीन बार राज्य वित्त आयोग का गठन हो चुका है, लेकिन इनकी कार्यप्रणाली, इनकी सिफारिशें व उन पर अमल को लेकर कोई साफ तस्वीर हमारे सामने नहीं है। जिन नगरीय निकायों में विपक्षी दल का महापौर अथवा बहुमत है उनके प्रति सौतेला बर्ताव होने की खबरें आए दिन प्रकाशित होती हैं। ऐसा भी देखने में आया है कि सत्ता पक्ष द्वारा विपक्षी महापौर के क्रियाकलापों में हर तरह से अड़चन खड़ी करने की कोशिश होती है। इसी तरह जिला पंचायत व जनपद पंचायत में भी ओछी राजनीति के खेल देखने मिलते हैं। ऐसे में स्थानीय निकायों की स्वायत्तता एक अधूरी इच्छा बनकर रह जाती है।

आदर्श स्थिति तो तब होगी जब राज्य व स्थानीय निकायों के बीच भी परस्पर संवाद हो, कामकाज का स्पष्ट बंटवारा हो व पारदर्शी तरीके से संसाधनों की भागीदारी हो। इसके लिए हर राज्य में मुख्यमंत्री को ही उदारभाव से पहल करना होगी। उन्हें राजनीति में त्वरित लाभ के मोह से बचना होगा।
देशबंधु में 06 मार्च 2014 को प्रकाशित