Friday, 30 January 2015

प्रकृति से प्यार की एक पुस्तक


 मेरे सामने एक नई पुस्तक है, आकर्षक मुखपृष्ठ, चिकने पन्ने, उम्दा छपाई, रंगीन तस्वीरें, लालित्यपूर्ण भाषा और विषय भी एकदम नया। ऐसा विषय जिस पर अमूमन हिन्दी में किताबें नहीं लिखी जातीं। लेखक हिंदी जगत के लिए लगभग अपरिचित व्यक्ति हैं- शिक्षा से चिकित्सक, पेशा डॉक्टरी छोड़कर अखबार प्रबंधन, रुचि से प्रकृति प्रेमी और कवि तो नहीं, किन्तु अवश्य ही कवि-हृदय।

पुस्तक के शीर्षक से विषय परिचय हो जाएगा- ''विकराल वनांचलों की विभीषिकाओं में एक वनप्रेमी"। विकराल और विभीषिका जैसे शब्द सुनकर डर लग सकता है; यह अंदाज हो सकता है कि यह जंगल महकमे के किसी अधिकारी या किसी शिकारी के लोमहर्षक अनुभवों की कथा है। वास्तव में ऐसा है नहीं, यह तो लेखक ने आलंकारिकता के मोह में पड़कर पाठक को कुछ पलों के लिए भ्रमित कर दिया है। पुस्तक में वनप्रेमी के अनुभव तो हैं, लेकिन वे आपको प्रकृति और वनराशि के निकट ले चलते हैं, उनसे साक्षात्कार करवाते हैं, वन्य पशुओं, पक्षी जगत और जलचरों से परिचय पाने के लिए आमंत्रित करते हैं। उनके साथ साहचर्य स्थापित करने, उनका सम्मान करने, उनकी सुरक्षा करने के लिए प्रेरित करते हैं।

आइए, लेखक से भी आपको मिलवाएं। डॉ. सुरेन्द्र तिवारी भोपाल के निवासी हैं। वन्यजीवन में लंबे समय से आपकी रुचि रही है। जब समय मिला, जंगल की सैर पर निकल पड़े। इसी शौक के चलते आज मध्यप्रदेश और अन्यत्र एक वन्यजीवन विशेषज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। यूं तो देश में इस अनुशासन के अध्येताओं/विशेषज्ञों की कमी नहीं है, लेकिन उनमें से कितने हैं जो अपने ज्ञान और अनुभवों को लिपिबद्ध करने में रुचि रखते हैं? जो लिखते हैं तो उनमें भी अधिकतर अंग्रेजी में। हो सकता है कि कुछेक ने अन्य भारतीय भाषाओं मे लिखा हो, उन्हें हम नहीं जानते। ऐसे लेखकों को उंगलियों पर गिना जा सकता है, जिन्होंने हिन्दी में प्राणीजगत और वन्य जीवन पर संस्मरण लिखे हों। एक नाम अवश्य याद आता है- रमेश बेदी का। उन्होंने वन्य पशुओं पर काफी लिखा है, सरल भाषा में, एक समय उनकी किताबें काफी लोकप्रिय हुई थीं, उस दौर में जब पुस्तकें पढ़ी जाती थीं। सुरेन्द्र तिवारी ने उनके काम को न सिर्फ आगे बढ़ाया है, बल्कि उसके क्षेत्र को विस्तृत किया है और प्रस्तुति भी बेहतरीन तरीके से की है। बेदीजी का साथ उनके पुत्रों ने दिया तो यहां श्रीमती तिवारी हाजिर हैं, जिन्हें लेखक कभी साथिन, कभी संगिनी लिखकर मधुरता से संबोधित करते हैं। श्री बेदी व श्री तिवारी के बीच मुझे याद आता है कि जानी-मानी लेखिका लीना मेहंदेले ने भी पशुजगत को लेकर आत्मीय भाव से परिपूर्ण संस्मरण लिखे हैं।

डॉ. सुरेन्द्र तिवारी इसके पूर्व एक और पुस्तक लिख चुके हैं जिसका शीर्षक ज्यादा सटीक है- ''एक प्रकृति प्रेमी के प्रेरक प्रसंग"। उनकी दूसरी पुस्तक भी ऐसे ही प्रसंगों से भरपूर है जो पाठक के मन में एक अलग तरह की प्रेरणा जगाते हैं। इस पुस्तक में चौबीस अध्याय हैं जिनमें से तेरह भारत पर और ग्यारह विदेशों में की गई यात्राओं पर आधारित हैं।  लेखक उस तरह का प्रकृति प्रेमी नहीं है जिनकी भरमार आज देखी जा रही है। वाइल्ड लाइफ टूरिज्म और इको टूरिज्म आदि के नाम पर पांच सितारा होटलों व पर्यटन उद्योग ने जो प्रपंच खड़ा किया है उसके चलते ही यह भीड़ इकट्ठा हुई है। जंगल, पहाड़, समुद्र, रेगिस्तान सब देखना है, लेकिन अपनी शर्तों पर और हड़बड़ी में। ऐसे पर्यटकों का एकमात्र लक्ष्य होता है कि यात्रा से लौटकर आएं और सबको बताएं कि वे शेर देखकर आए हैं। इन्हें पर्यटन स्थल पर हर तरह की सुविधा की दरकार होती है, उनके बिना वे रह नहीं सकते, जो कुछ देखकर लौटते हैं उसकी तस्वीरें परिचितों को पोस्ट करते हैं और शायद किसी हद तक ग्लानि से मुक्त हो बताने की कोशिश करते हैं कि देखो, हम भी प्रकृति प्रेमी हैं।

डॉ. सुरेन्द्र तिवारी के संस्मरणों में एक अपवाद स्वरूप व्यक्तित्व उभरकर आता है। वे उड़ीसा की विश्व प्रसिद्ध चिलिका झील पर पहुंचते हैं तो स्वाधीनता सेनानी कवि गोपबंधु दास की कविता उद्धृत करते हैं- ''एक पल को रुको, क्या तुम रुकोगे, ओ अग्नि रथ? मुझे इस सौंदर्य को जी भर करके देख लेने दो, चिलिका के इस विहंगम दृश्य को। मुझे तो ऐसा लग रहा है मानो ये तो कोई स्वप्न-चित्र है, सत्य नहीं। क्या इस धरती पर कोई इतनी सुन्दर चीज हो सकती है? आह! ये वेदना शून्य वाहन, जो मुझे यहां से इतनी लापरवाही से भगाए लिए जा रहा है। जहां चट्टानों, शिलाओं और वृक्षों से मेरी दृष्टि अवरुद्ध हो रही है- मेरे और चिलिका के बीच और इतने सुन्दर न•ाारों को बार-बार ओझल कर देती है। ये कभी दिखाई देते हैं और कभी मेरी नजर से दूर हो जाते हैं। वैसे ही जैसे अपने अति प्रिय के सपनों में दर्शन होते हैं और ओझल हो जाते हैं। मेरी आत्मा तो हमेशा-हमेशा से इस सुंदरता की प्यासी ही रही है। अपने अति व्यस्त समय में से भी मैंने यह योजना बनाई थी कि मैं तुम्हारे किनारों पर नितान्त अकेला ही टहलूंगा और इस सुंदरता का पान करूंगा ओ मेरी प्यारी चिलिका"। वे पुस्तक के इस पहले ही लेख में चिलिका की शोभा का वर्णन करते हैं लेकिन वहीं उन्हें यह चिंता भी सताती है कि मछली और झींगे के व्यापार के चलते वृक्षों की कटाई और गाद भरने से झील को कितना नुकसान हो रहा है। यहां वे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को उद्धृत करते हैं कि ''शौकीन मानव ने इतने पशु-पक्षी मारकर खा डाले हैं कि तैरने वालों में सिर्फ नाव, उडऩे वालों में सिर्फ पतंग और चौपायों में सिर्फ खाट ही शेष बची है।"

उड़ीसा के ही भीतरकनिका अभ्यारण्य के पूरे परिवेश का वे सजीव चित्रण करते हैं। प्रकृति की एक अद्भुत लीला के बारे में बताते हैं कि कैसे हजारों किलोमीटर दूर से आलिव रिडले नामक समुद्री कछुए यहां के समुद्रतट पर हर साल आते हैं। लाखों कछुए पानी से बमुश्किल पैंतालिस मिनट के लिए बाहर निकलते हैं, घोंसले बनाते हैं, अंडे देते हैं, वे भी रात के समय और फिर तुरंत लौट जाते हैं। इसी लेख में वे बतलाना जरूरी समझते हैं कि उड़ीसा के समुद्रतट वासियों से लेकर चीन तक इन अंडों का बाजार कैसे फैला हु्आ है जिसके कारण कछुओं की संख्या में लगातार कमी आ रही है। वे कछुए के साथ प्रकृति के आदिम संबंध की भी चर्चा करते हैं और विश्व में इन्हें बचाने की पहल का भी। वे एक अन्य उद्धरण देते हैं कि  ''आज हम उस दोराहे पर खड़े हैं जहां से एक राह तो इन पुरातन जीवों को बचाने के लिए जाती है और दूसरी उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए खो देने के लिए।"

उड़ीसा के समुद्र तट से लेखक हमें हिमाचल प्रदेश ले जाते हैं। हिमालय की कुल्लू घाटी में, उत्तराखंड के कतरनिया घाट में, ऊपर नेपाल तक। वे अपने घर मध्यप्रदेश के मढ़ई अभ्यारण्य में भी ले चलते हैं, राजस्थान के केवलादेव पक्षी अभ्यारण्य में, महाराष्ट्र के भीमाशंकर में, कर्नाटक के दांड़ेली में, कच्छ के पिरोटन द्वीप में जिसकी जानकारी सामान्य तौर पर लोगों को कम है और भारत के अंतिम छोर अंडमान निकोबार में भी। जब ऐसी-ऐसी यात्राएं कर रहे हैं तो कुछ न कुछ मुश्किलें भी पेश आना ही है। परिणामस्वरूप जब वे पिरोटन में जाते हैं जो कि एक समुद्री अभ्यारण्य है तो वहां बीच समुद्र में शून्य तापमान पर रात बिताने की नौबत आती है,  तो किसी दूसरी यात्रा में सामने बाघ आकर खड़ा हो जाता है और शायद लेखक को अपना दोस्त समझकर छोड़ देता है!

इस पुस्तक में दिए संस्मरणों में ऐसी अनूठी विविधता है जो पाठक को लगातार आनंदित करती है। लेखक चूंकि सिद्धहस्त फोटोग्राफर हैं तो उनकी ही खींची हुई सैकड़ों रंगीन तस्वीरें इस आनंद को दोगुना करती हैं। एक सामान्य शहरी व्यक्ति अपने आसपास के चिडिय़ाघर में जो पशु-पक्षी हैं उनको ही देख पाता है, उसके आगे देखने का न तो शायद समय मिलता, न ही कोई ललक होती। बहुत हुआ तो डिस्कवरी चैनल पर कोई कार्यक्रम देख लिया। लेकिन यहां तो सुरेन्द्र जी हमारे सामने एक पूरा एलबम खोलकर रख देते हैं। उसमें कहीं समुद्र तट पर कछुओं के नष्ट हुए असंख्य अंडों का चित्रण है तो कहीं लम्बी पूंछ वाली गिलहरी शेकरू, कहीं छलांग भरती कोयटी लोमड़ी है, तो कहीं पेड़ पर चढ़ी चींटीखोर पेंगोलिन। इन चित्रों को देखिए, इनके साथ दिए गए विवरण को पढि़ए और मन को प्रसन्न कीजिए।

वे केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान के वृत्तांत में साइबेरिया से आए प्रवासी पक्षियों से हमें परिचित कराते हैं। हमें पता चलता है कि सारस पक्षी अपने जीवन साथी का वियोग नहीं सह पाता। दोनों में से कोई एक मर जाए या खो जाए तो दूसरा विरह में तड़प-तड़प कर जान दे देता है। वे हमें यह भी बताते हैं कि ये पक्षी अपना यात्रा पथ कैसे तय करते हैं और फिर उनकी स्वतंत्र दिनचर्या का इन शब्दों में वर्णन करते हैं जिन्हें पढ़कर हमें शायद पक्षियों से ही ईष्र्या होने लगे- ''इन प्रवासी पक्षियों को एक देश से दूसरे देश जाने के लिए न तो कोई पासपोर्ट चाहिए न ही कोई वीसा या कोई वाहन। ये पक्षी कोई राजनीतिक बंधन में भी नहीं बंधते और जहां इनकी मर्जी, जहां सुरक्षा व उत्तम भोजन मिले, उसे ही अपना ठौर-ठिकाना बना लेते है। घने में उगी घास की जड़ें इनका प्रिय भोजन है। छिछले पानी में खड़े ये अपना भोजन तलाशते रहते हैं। इनका नृत्य देखना भी एक अत्यंत दुर्लभ और अतुलनीय आनंददायक अनुभव है। नृत्य के दौरान इनकी आवाज से ऐसा भ्रम होता है जैसे कहीं कोई मीठी बांसुरी बजा रहा है।"

हमारे प्राणीविद् लेखक नेपाल के बरदिया राष्ट्रीय उद्यान की सैर करते हैं ताकि वहां के वासी राजा गज नामक हाथी को देख सकें, जिसके दांत दुनिया के सारे हाथियों से ज्यादा लंबे हैं। इस परिवेश का वृत्त लिखते हुए लेखक इन शब्दों में अपने कवि हृदय का परिचय देता है:- अब महारात्रि अपनी चादर फैला रही थी, अपने आगोश में लेने के लिए, झींगुर, झिल्ली की झंकार ने अपना रात्रि संगीत आरंभ कर दिया था निशा प्रहरी का कर्तव्य निभाने के लिए। पंछी आवास वृक्षों पर रात्रि विश्राम के लिए बसेरा करने आने लगे थे। संध्या घाटी में उतर आई थी। समूचा महावन प्रगाढ़ निद्रा में अचेत होने को आतुर था और भय की छायाएं प्रतिक्षण मंडराने लगी थीं।"

प्रकृति के साथ लेखक ने जो तादात्म्य स्थापित कर लिया है वह उसे हमेशा परेशान करता है। वह चाहता है कि वन देवता और उसकी प्रजा दोनों की रक्षा होना चाहिए। वह बहुत व्यावहारिक होकर कहता है कि मनुष्य और वन पशु के बीच की लड़ाई तभी समाप्त हो सकती है जब राज्य याने सरकार इसमें प्रभावी ढंग से हस्तक्षेप करे। हाथियों पर मुख्यत: केन्द्रित इस लेख में वह हाथियों पर फिल्म बनाने वाले विश्वप्रसिद्ध माइक पांडे को उद्धृत करता है- ''वन्य जीवन से लगाव ऐसा होता है मानो जंगल से शादी रच ली हो और यह तो एक ऐसा रोग होता है जिसे तुम अपने खून से कभी बाहर नहीं निकाल सकते हो।"

सुरेन्द्र तिवारी भारत में अंडमान निकोबार तक जाते हैं तो सात समुंदर पार सुदूर उत्तर में अलास्का भी हो आते हैं। वे देश के भीतर कतरनिया घाट की यात्रा करते हैं तो अमेरिका का यलोस्टोन नेशनल पार्क भी उन्हें अपनी ओर खींच लेता है। ऐसा सैलानी अफ्रीका न जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता तो वे केन्या-तंजानिया में सेंरगेटी और मसाईमारा अभ्यारण्य के भी अनुभव हासिल करते हैं। इन सारे विवरणों में जो विशेष बात है वह यह कि इनकी भाषा कवि सुलभ है। लेखक स्वयं अपने विचार आलंकारिक शब्दावली में व्यक्त करता है और उसे जहां भी उचित लगता है वहां अन्यों से उद्धरण लेने में संकोच नहीं करता। मिसाल के तौर पर एक जगह वह देश के जाने-माने बाघ विशेषज्ञ बिली अर्जुनसिंह का कथन दोहराता है- वन्य प्राणियों के लिए कोई स्वर्ग या नरक नहीं होता सिवाय उसके जिसे मनुष्य ने बनाया है। वह पक्षी वन में जाता है तो इन शब्दों में अपने भाव व्यक्त करता है- ''परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं, हवा में सनसनी घोले हुए हैं।"

इसी तरह एक स्थान पर वह लिखता है- ''हिमालय की तराई के गहन वन में धंसे दबे हुए एक पुरातन जंगल ग्रंथ का फडफ़ड़ाता पृष्ठ है कतरनिया घाट जिसके हर सफे पर वन्य जीवन के जीवंत हस्ताक्षर हैं।" दूसरी ओर दांडेली में वह कहता है- ''वन देवता को अप्रसन्न करने का एक भी कार्य वहां न होना चाहिए। वन भूमियां सौंदर्य के अक्षय भंडार हैं, अहिंसा, प्रेम और शांति के प्रतीक हैं, वैराग्य के उद्दीपक हैं, आनंद के स्रोत हैं, पवित्रताओं के निकेतन हैं। उनके लिए हमारे हृदय में ऐसी ही सम्मान भावना रहनी चाहिए। तभी तो रस आएगा।" इस लेख का अंत वह इन पंक्तियों के साथ करता है-
''वो भयानक जंगलों को पार कर आया मगर,
आदमी था अपनी ही बस्ती में आकर डर गया।"

सुरेन्द्र तिवारी की एक और विशेषता है। वे वन्य जीवन को एकांगी दृष्टि से नहीं देखते बल्कि जो कुछ देख रहे हैं उसका व्यापक संदर्भों के साथ वर्णन करते हैं। वे पुराकथाओं का आश्रय लेते हैं, उन किंवदंतियों का भी उल्लेख करते हैं जो प्रसंग विषय से जुड़ी हुई है। ऐतिहासिक संदर्भों का भी हवाला देते हैं तथा भौगोलिक एवं प्राणीशास्त्रीय तथ्यों को भी रोचकता के साथ प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने जगह-जगह वन्य जीवन विशेषज्ञों के कथनों को दोहराया है तो हिन्दी तथा अन्य भाषाओं के कवियों की पंक्तियों को भी अपने विचारों के समर्थन में उठाकर उन्हें पुष्ट किया है। याने पुस्तक भले ही वन्यजीवन के संस्मरणों की हो, लेकिन भाषा शैली के चलते मानो यह एक कविता की किताब में बदल गई हो। एक जगह कहीं नदी किनारे बैठे उसे किसी कवि की ये पंक्तियां याद आती हैं-
बन जाओ तुम पत्थर मैं तुम पर,
फूल-फूल गिरता जाऊंगा,
तुम्हें कद ऊंचा इतना ऊंचा दूंगा कि,
तुम्हारी नीची आंखें पा जाऊंगा।
तो अंडमान के आदिवासी अंचल से लौटते हुए उन्हें महाकवि जयशंकर प्रसाद का स्मरण हो आता है-
''बांधकर तूफान अपनी मुट्ठियों में हम चले,
दोपहर के सूर्य जैसे इस धरा पर हम जले,
हम नदी की धार बनकर बह रहे,
उठ गए ऊपर गए, ऊंचाइयों से नभ तले।"

मैं इस पुस्तक पर चर्चा लेखक द्वारा उद्धृत दो कथनों से समाप्त करना चाहूंगा। एक जगह वह जॉन म्यूर नामक प्रकृतिविद् को उद्धृत करता है- ''जंगल की प्रत्येक यात्रा एक धार्मिक अनुष्ठान है और झरने का हर स्थान उसे बचाने का अध्यादेश।" दूसरा कथन विलियम हॉजलिट का है- ''मैं तो अपना सम्पूर्ण जीवन ही ऐसी यात्राओं में बिताना चाहता हूं, यदि मुझे एक और जीवन कहीं से उधार में मिल जाए अपने घर में बिताने के लिए।"
 अक्षर पर्व फ़रवरी 2015 अंक की प्रस्तावना 

Thursday, 29 January 2015

पॉलीथिन पर रोक: अधूरी पहल


 छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने प्रदेश में पॉलीथिन के निर्माण, विक्रय और उपयोग पर आंशिक प्रतिबंध लगा दिया है। पर्यावरण सुधार की दिशा में यह एक सही किन्तु अधूरा कदम है। यह हम जानते हैं कि पॉलीथिन झिल्लियों के उपयोग से बहुत सी परेशानियां खड़ी होती हैं। जहां-तहां पॉलीथिन के ढेर खड़े हो जाते हैं, नालियों की सफाई में बाधा उत्पन्न होती है, किसी के गले में फंस जाए तो मौत हो जाए, मवेशी के पेट में चले जाए तो उसकी भी मौत हो जाने का अंदेशा, किन्तु पॉलीथिन खासकर सस्ते हल्के झिल्लीनुमा बैग पर रोक लगा देने मात्र से समस्या का हल नहीं निकलने वाला। मैं कहूंगा कि यह एक आलस भरी सोच है। जो सामने दिख रहा है उसे बंद कर दो, लेकिन जो एकदम से दिखाई न दे उसकी तरफ झांकने की कोशिश भी न करो। यदि सरकार प्लास्टिक एवं अन्य वस्तुओं से हो रही पर्यावरण हानि को रोकना चाहती है तो उसे कुछ ठोस और कठोर कदम उठाना चाहिए अन्यथा यह पहल मोदीजी के स्वच्छ भारत मिशन जैसी दिखावटी मुहिम बनकर रह जाएगी।

चलिए, पहले प्लास्टिक की ही बात करते हैं। क्या सरकार के पास इस बारे में कोई आंकड़े या ठीक-ठाक अनुमान है कि पेयजल की बोतलों में प्लास्टिक की कितनी खपत होती है और प्रतिदिन कितनी बोतलें उपयोग के बाद सड़क पर या कूड़े के ढेर पर फेंक दी जाती हैं? इन बोतलों का निर्माण कहां होता है? क्या ये बाहर से आती हैं या छत्तीसगढ़ में बनती हैं? इनके निर्माण, विक्रय और उपयोग पर कैसे रोक लग सकती है? अगर पानी प्लास्टिक की बोतल में  न बिके तो किस पदार्थ से बने? सस्ता पेयजल तो प्लास्टिक के पाउच में भी बिक रहा है। क्या उस पर भी रोक लगायी गई है? होटलों में होने वाली सरकारी, गैर-सरकारी बैठकों में सौ, दो सौ और पांच सौ मिलीलीटर की बोतलें उपयोग में लाई जाती हैं। इसमें पानी की भी बर्बादी है और प्लास्टिक का उपयोग तो है ही। कुछ साल पहले मैंने नागपुर रेलवे स्टेशन पर देखा था- आर.ओ. या अन्य किसी मशीन से पानी शुद्ध कर यात्रियों को दिया जा रहा था। क्या ऐसी व्यवस्था प्रदेश के बड़े रेलवे स्टेशनों पर सरकारी दफ्तरों में एवं होटलों में नहीं हो सकती? इसमें प्लास्टिक की खपत में भी काफी कमी आएगी और बोतलबंद पानी खरीदने में पैसा भी बचेगा।

यही बात कोक, पेप्सी आदि शीतल पेय के बारे में व फलों के रस पर लागू होती है। इनमें भी कांच की बोतल छोड़ प्लास्टिक की बोतलों का चलन तेजी से बढ़ा है। पी लेने के बाद इन बोतलों का क्या उपयोग होता है? पेप्सी, कोक आदि के बाटलिंग संयंत्र छत्तीसगढ़ में अनेक स्थानों पर लगे हैं? क्या इन पर रोक लगाने का सरकार का कोई विचार है? अगर है भी तो विकल्प क्या है? क्या निर्माताओं को मजबूर किया जा सकता है कि वे कांच की बोतल या कागज के पैकेट का ही इस्तेमाल करें? आशंका होती है कि सरकार ने हिम्मत कर ऐसा निर्णय ले भी लिया तो कंपनियां हाईकोर्ट से जाकर स्टे आर्डर न ले आएं।

हमारी राय में सरकार को यह भी देखना चाहिए कि उसके दफ्तरों में प्लास्टिक का कितना उपयोग होता है। पुराने समय में कागज और पुट्ठे की फाइलें इस्तेमाल होती थीं, लेकिन आजकल प्लास्टिक की फाइल-फोल्डरों का उपयोग करना आम हो गया है। इस दिशा में पहल की जा सकती है कि प्लास्टिक की फाइलों की खरीद बिल्कुल न की जाए। इनके बजाय गत्ते या मोटे कागज से बनी फाइलों को बढ़ावा दिया जाए। जहां आवश्यक हो वहां जूट या कपड़े के कवर वाली फाइलें भी उपयोग में लायी जा सकती हैं। सभा-सेमीनार आदि में ऐसी आकर्षक फाइलों का उपयोग कभी-कभार देखने आता है। गैर-सरकारी क्षेत्र को भी इस दिशा में सोचना चाहिए।

26 जनवरी और 15 अगस्त को प्लास्टिक के तिरंगे बड़ी संख्या में बिकते हैं इन पर शायद रोक लगा दी गई है, किन्तु इसकी जांच करना बेहतर होगा कि प्लास्टिक के तिरंगे ध्वज न बनें, न बिकें। इनके साथ-साथ सजावट के लिए भी प्लास्टिक की झंडियां, तोरण और फूल आदि बनाए जाते हैं। यहीं नहीं, आजकल तो लोहे और टिन के होर्डिंग्स का स्थान भी प्लास्टिक के फ्लैक्स ने ले लिया है। नि:संदेह फ्लैक्स में कलाकारी ज्यादा अच्छे से होती है व इन्हें काफी जल्दी बनाया जा सकता है। लेकिन इनसे बने बैनर व होर्डिंग्स का बाद में क्या उपयोग होता है। अंत में जाकर ये भी कचरे के ढेर की ही शोभा बढ़ाते हैं। तो क्या यह संभव है कि वापिस पुराने नमूने के होर्डिंग्स पर लौटा जाए और पेंटरों को उनका व्यवसाय वापिस मिल जाए!

इसी सिलसिले में यह भी ध्यान आता है कि पॉलीथिन-झिल्ली का एक बड़ा दुरुपयोग शादी-ब्याह व अन्य समारोह में होता है। इसकी शुरुआत निमंत्रण पत्रिका से हो जाती है। इधर दसेक साल से निमंत्रण पत्र पर प्लास्टिक का आवरण चढ़ाने का शौक चल पड़ा है। यह मूर्खता भरा प्रयोग मालूम नहीं किसने शुरू किया। हाथ में कार्ड आए तो पहले झिल्ली हटाओ, फिर लिफाफा खोलो। यह झिल्ली भी कचरे की पेटी में ही पहुंचती है। फिर समारोह के दौरान प्लास्टिक के कप में चाय-काफी, प्लास्टिक के गिलास में पेयजल व शीतल पेय; औसत दर्जे के समारोह में प्लास्टिक के प्लेट में खाना याने इसका कोई अंत नहीं है। क्या सरकार प्रिटिंग प्रेसों को और कैटररों को रोक सकती है कि वे प्लास्टिक का उपयोग बिल्कुल भी न करें?

इसी तरह की एक और कवायद करने की जरूरत है। रेडीमेड कपड़ों की दुकानों से जो कचरा निकलता है उसकी तरफ सामान्यत: ध्यान नहीं जाता। सबसे ऊपर गत्ते का डिब्बा उसके भीतर प्लास्टिक में लिपटा रेडीमेड वस्त्र एवं उसमें टँकी ढेर सारी ऑलपिनें और लेबल, शर्ट के कॉलर के लिए कड़ा प्लास्टिक और न जाने क्या-क्या। मालूम नहीं इतना प्रपंच क्यों किया जाता है! ऐसे उदाहरण अन्य दूकानों पर भी मिल जाएंगे। इसमें अगर अपराधी की तलाश की जाए तो हमारी खोज पैकेजिंग इंडस्ट्री पर जाकर टिकती है।

जैसा कि आजकल सुबह-शाम कहा जाता है यह बाजार का समय है। बाजार अब ग्राहक की आवश्यकता पूर्ति के लिए नहीं है। उसकी निगाह तो ग्राहक की जेब काटना तो क्या, उसकी सारी जमा पूंजी हड़प लेने की है। इसीलिए बाजार दिनोंदिन ज्यादा लुभावना, ज्यादा आकर्षक होते जा रहा है। यह पैकेजिंग इंडस्ट्री की देन है। यहां सादगी से काम नहीं होता। जितना ज्यादा दिखावा उतना बड़ा डाका। बहरहाल यह तो जनता की समझने की बात है। वह जब समझेगी तब समझेगी। सवाल यह है कि सरकार अभी क्या करे। यहां सिर्फ छत्तीसगढ़ राज्य की बात नहीं है। यदि सरकारें स्वच्छ सुरक्षित पर्यावरण वापिस लाना चाहती हैं तो प्लास्टिक की झिल्लियों का निर्माण रोकने के अलावा और भी बहुत से काम करना पड़ेंगे। इसके समानांतर यह भी सोचना पड़ेगा कि प्लास्टिक के व्यवसाय में जो लोग जुड़े हुए हैं उनके रोजगार व रोजी दोनों का क्या होगा। समस्या कठिन है। प्लास्टिक का पुराना विकल्प कागज है, लेकिन कागज के लिए पेड़ कटते हैं। दूसरा विकल्प कांच है, किन्तु उसमें टूट-फूट ज्यादा है। ईंधन का इस्तेमाल और परिवहन की लागत ये दोनों समस्याएं कागज व कांच दोनों के साथ जुड़ी हैं। तब फिर क्या हो?

हमारी राय में यह सरकार का भी दायित्व है और बुद्धिजीवियों का भी कि वे अनावश्यक उपभोग के विरुद्ध जनता को सचेत करने के लिए निरंतर मुहिम चलाएं।  'यूज एंड थ्रो' याने उपयोग करो और फेंको की मनोवृत्ति उचित नहीं है। उसका हर स्तर पर विरोध होना चाहिए। जो भी समाज टिकाऊ विकास चाहता है, उसे टिकाऊ वस्तुओं का उपयोग करना सीखना होगा। आज ही कहीं खबर पढ़ी थी विश्व के एक प्रतिशत लोगों के पास दुनिया का पचास प्रतिशत धन हो गया है। इसका सीधा अर्थ है कि निन्यानबे प्रतिशत जनता को एक प्रतिशत लुटेरों के साथ लडऩे के लिए स्वयं को तैयार करना होगा। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक प्लास्टिक की झिल्ली का न उपयोग करने का संकल्प लें और इस खुशफहमी में रहें कि आपने पर्यावरण की रक्षा कर ली है।
देशबन्धु में 29 जनवरी 2015 को प्रकाशित

Friday, 23 January 2015

स्वायत्त संस्थाएं कितनी स्वायत्त


 लोकतंत्र की यह एकमात्र शर्त नहीं है कि निर्धारित अवधि में आम चुनाव सम्पन्न हो जाएं और बहुमत के आधार पर एक सरकार बन जाए। लोकतंत्र का अर्थ है कि व्यवस्था में अधिकतम लोगों की भागीदारी हो तथा ऐसा सुनिश्चित करने के लिए स्वायत्त संस्थाओं का गठन हो। एक चुनी हुई सरकार अपने दायित्व से विमुख होती है जब वह इस स्वायत्तता की रक्षा करने में असफल होती है अथवा स्वयं अपनी पहल पर स्वायत्तता को बाधित करती है। आज इस अवधारणा पर गौर करना बहुत आवश्यक हो गया है। वह इसलिए कि लोकतांत्रिक समाज में अनिवार्य रूप से विचारों की बहुलता का सम्मान होता है, नागरिक समूहों को आत्मनिर्णय के अवसर मिलते हैं एवं इस तरह अलग-अलग दिशाओं में समाज-रचना का काम होकर एक वृहत्तर पहचान के साथ समाज आगे बढ़ता है।

सिर्फ चार दिन बाद भारत अपने गणतंत्र के पैंसठ वर्ष पूर्ण करेगा। इधर एक जुमला खासा प्रचलित हो गया है कि साठ-पैंसठ साल में कुछ नहीं हुआ। कुछ लोग आगे बढ़-चढ़कर यह भी कह देते हैं कि जो हुआ सब गलत हुआ। यह अपने-अपने राजनीतिक विश्वास से उपजी प्रतिक्रिया है। आश्चर्य की बात यह है कि इस आलोचना में कभी यह सुनने में नहीं मिला कि लोकतंत्र के लिए आवश्यक स्वायत्त संस्थाओं की शक्ति कैसे बाधित की गई। ऐसा क्या इसलिए है कि जब जिसके हाथ में सत्ता आई उसने अपने तरीके से इन संस्थाओं का दोहन करने व इनके माध्यम से अपने संकीर्ण स्वार्थ साधने की ही कोशिश की? हमने केन्द्र व प्रदेशों में कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी के अलावा वामपंथियों, समाजवादियों व क्षेत्रीय दलों के शासन को देखा है। इनमें से किसी ने भी लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति वह आदर नहीं दर्शाया जिसकी उनसे अपेक्षा थी।

सबसे ताजा उदाहरण केन्द्रीय फिल्म प्रमाणीकरण मंडल याने सेंसर बोर्ड का है। यूपीए द्वारा नियुक्त सुप्रसिद्ध नृत्यांगना लीला सेमसन एवं अन्य सदस्य इस्तीफा देकर जा चुके हैं व नए बोर्ड का गठन हो गया है। इस नए बोर्ड में अधिकतर सदस्य वे हैं जो भाजपा की राजनीति में सक्रिय हैं। सत्तारूढ़ दल अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाए इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन क्या यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि जिन्हें नियुक्त किया गया है वे इस पद के योग्य हैं? अटल बिहारी वाजपेयी के समय अभिनेता अनुपम खेर को अध्यक्ष बनाया गया था, उस समय वह सवाल नहीं उठा था क्योंकि श्री खेर की इस पद के लिए योग्यता असंदिग्ध थी। अभी पहलाज निहलानी अध्यक्ष बने हैं। वे दोयम दर्जे के फिल्मकार हैं तथा नरेन्द्र मोदी के लिए चुनावी फिल्म बना चुके हैं। अन्य की योग्यताएं भी कुछ इसी तरह की हैं। उनकी तुलना में लीला सेमसन कला जगत का एक प्रतिष्ठित नाम था एवं अधिकतर सदस्यों की योग्यता पर भी कोई सवाल नहीं था।

यह नियुक्ति तो एक बात हुई। लीला सेमसन ने टीवी पत्रकार करन थापर से साक्षात्कार में जो कहा वह अधिक विचारणीय है। जिस यूपीए ने उन्हें नियुक्त किया था उसी के सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी पर उन्होंने सेंसर बोर्ड के कामकाज में अनुचित हस्तक्षेप करने तथा बोर्ड की स्वायत्तता का सम्मान न करने का आरोप लगाया। उन्होंने यहां कहा कि मंत्रालय से बोर्ड के छोटे-मोटे अधिकारियों के पास सीधे फोन पर निर्देश आते थे याने बोर्ड को अंधेरे में रखकर काम किया जाता था। आज जो कांग्रेसजन भारतीय जनता पार्टी पर लीला सेमसन को दबावपूर्वक हटाने का आरोप लगा रहे हैं उन्हें यह भी देखना चाहिए कि कांग्रेस का अपना रिकार्ड इस मामले में क्या रहा है। यह ठीक है कि अनुपम खेर को एनडीए-1 ने मनोनीत किया था, लेकिन वे अगर अपना कार्यकाल पूरा कर लेते तो इसमें कौन सा पहाड़ टूटने वाला था। क्या कांग्रेस ने उस समय अपना छोटा दिल होने का परिचय नहीं दिया?

मुझे सुश्री सेमसन की बात से कोई आश्चर्य नहीं हुआ। यह कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस और भाजपा में इस बारे में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। इतना अवश्य है कि भाजपाई अपने और पराए का भेद जानते हैं। भाजपा सरकार में वही लोग नियुक्त होते हैं, जिनकी संघ या पार्टी के प्रति प्रतिश्रुति में संदेह की रंचमात्र की गुंजाइश नहीं होती। कांग्रेस में एक अलग तरह की उदारता है। वहां पार्टी के सिद्धांतों के प्रति निष्ठा रखने वालों की बजाय उन लोगों को पसंद किया जाता है जो मंत्रियों के करीबी होते हैं या वे जिन्हें चाटुकार कहा जा सकता है। नेहरु युग में तो ऐसा नहीं था किन्तु धीरे-धीरे योग्यता पर चाटुकारिता हावी होते चली गई है। इसके सैकड़ों-हजारों नहीं, बल्कि असंख्य उदाहरण पेश किए जा सकते हैं। कहने का मतलब यह कि स्वायत्तता का हनन उत्तर नेहरु युग में प्रारंभ हो गया था जो अब चरम परिणति पर पहुंच चुका है।

हम अपनी बात कुछेक उदाहरणों से स्पष्ट कर सकते हैं। एक समय देश में सहकारिता आंदोलन काफी मजबूत अवस्था में था। सहकारी संस्था के चुनाव बाकायदा होते थे। वही स्थिति नगरीय निकायों की भी थी। जो राजनीतिक कार्यकर्ता संसद या विधानसभा की सीढ़ी चढऩे से वंचित रह जाते थे वे सहकारी संस्था अथवा नगरपालिका इत्यादि में अपने लिए जगह तलाश कर लिया करते थे। इसमें कई बार ऐसा भी होता था कि जो जीतकर आए वे मुख्यमंत्री, मंत्री या संसद सदस्य के विरोधी खेमे के हों। जैसे रायपुर में नगरपालिका अध्यक्ष बुलाकीलाल पुजारी और विधायक शारदाचरण तिवारी एक-दूसरे के विरोधी थे। जब तिवारीजी मंत्री बने तो नगरपालिका भंग कर प्रशासक बैठा दिया गया और फिर बरसों तक चुनाव नहीं हुए। नगरीय निकायों के चुनाव तो अब खैर तिहत्तरवें संविधान संशोधन विधेयक के चलते होने लगे हैं, लेकिन पाठक याद करें कि हमारे यहां सहकारी चुनाव आखिरी बार कब हुए थे!

इस सोच का एक दुष्परिणाम तो यह हुआ है कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं को व्यवस्था के भीतर जो भी छोटा-मोटा अवसर मिल जाता था वे उससे वंचित हो गए हैं। इसका दूसरा दु:खद नतीजा यह भी हुआ है कि दूसरी और तीसरी पंक्ति का नेतृत्व सुचारु रूप से विकसित नहीं हो पा रहा है। रायपुर के रमेश बैस पहले पार्षद, फिर विधायक, फिर संसद सदस्य बने। यह सही रास्ता था, लेकिन ऐसा अपवादस्वरूप ही होता है। अब शायद नेताओं को डर लगने लगा है कि यदि दूसरी पंक्ति का नेतृत्व विकसित हुआ तो इससे कहीं उनका भविष्य खतरे में न पड़ जाए।

जिन संस्थाओं का चरित्र गैर-राजनीतिक है जैसे साहित्य अकादमी, सेंसर बोर्ड, विश्वविद्यालय या आईआईटी, उनकी भी स्थिति बेहतर नहीं है। ये वे संस्थाएं हैं जिन्हें काम करने दिया जाए तो ''लेस गवर्नमेंट" याने कम सरकार का लक्ष्य फलीभूत होता है। किन्तु जब इनके ऊपर प्रतिबंध लगाया जाए और ऊपर से आदेश दिए जाएं तो फिर ये संस्थाएं एक प्राणहीन सरकारी दफ्तर बनकर रह जाती हैं। इनमें न तो नवाचार की गुंजाइश होती और न नवोन्मेष की। मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में विवि की स्वायत्तता कैसे छीनी गई है इसे मैंने निकट से देखा है। अब तो केन्द्रीय विवि जैसे दिल्ली विवि तक पर मंत्रालय के तुगलकी फरमान चलने लगे हैं। यह कितना शर्मनाक है कि राज्यपाल याने कुलाधिपति पर वाइस चासंलर की नियुक्ति में पैसे लेने का आरोप लगे। इसके बाद आप शिक्षण संस्थाओं से देश का भविष्य बनाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

मैंने ऊपर नरेन्द्र मोदी के नारे का जिक्र किया है-''लेस गवर्नमेंट" का। यदि प्रधानमंत्री सचमुच इस पर विश्वास करते हैं तो उन्हें इन लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता बहाल करने के बारे में सोचना पड़ेगा और चाटुकारों के बजाय उन सुपात्रों को मौका देना होगा जो सरकारी बाबुओं के इशारे पर नहीं, बल्कि अपने अनुभव और योग्यता के बल पर निर्णय लेने में सक्षम हों।
देशबन्धु में 22 जनवरी 2015 को प्रकाशित

Thursday, 15 January 2015

रायपुर साहित्य महोत्सव


 रायपुर साहित्य महोत्सव को बीते एक माह पूरा हो चुका है। इस बीच देश के अनेक स्थानों से मित्रों ने फोन कर जानना चाहा है कि महोत्सव को लेकर जो चर्चा छिड़ी है उसमें क्या सही, क्या गलत है। कई मित्रों ने यह सवाल भी किया है कि मैं इस कार्यक्रम में शरीक क्यों नहीं हुआ और इस बारे में मैंने स्वयं अभी तक कुछ क्यों नहीं लिखा? मेरे ख्याल से इस आखिरी सवाल का उत्तर पहले दे देना ठीक होगा। मैं दरअसल प्रतीक्षा कर रहा था कि इस मुद्दे को लेकर माहौल में जो गर्मी है वह कुछ ठण्डी हो जाए, गुबार बैठ जाए और प्याली में आया तूफान शांत हो जाए। यूं तो छुटपुट बातें अभी भी हो रही हैं, लेकिन कुल मिलाकर स्थिति सामान्य है। ऐसे समय मैं अपनी बात कहूं तो उसे शायद शांतिपूर्वक सुना जा सकेगा। मैं रायपुर में इतने बड़े पैमाने पर आयोजित साहित्यिक अनुष्ठान में शामिल क्यों नहीं हो पाया  इसका भी स्पष्टीकरण मुझे उन मित्रों को तो देना ही चाहिए जो मुझसे इसकी अपेक्षा कर रहे हैं, खासकर उनको जो यह मान बैठे हैं कि मैं भाग खड़ा हुआ था। ऐसा उन्होंने क्यों सोचा, ये वही जानें।

यह प्रारंभ में स्पष्ट कर देना उचित होगा कि छत्तीसगढ़ शासन के जनसंपर्क विभाग द्वारा महोत्सव की परिकल्पना पर विचार करने के लिए जो पहली बैठक आयोजित की गई थी उसमें मैं आमंत्रित और उपस्थित था। मुझे छत्तीसगढ़ के दो वरिष्ठ साहित्यिकों के नाम लेकर बताया गया था कि वे भी आ रहे हैं और आपको भी आना है।  इस बैठक में मुझे मिलाकर चार ऐसे व्यक्ति थे जो वृद्ध हैं या वृद्धावस्था के निकट हैं और जो साहित्य में किसी न किसी रूप में सक्रिय रहने का दावा कर सकते हैं। हमारे अलावा अगली पीढ़ी के कुछ पत्रकार भी बैठक में थे। चूंकि आमंत्रण जनसंपर्क विभाग का था इसलिए पत्रकारों की उपस्थिति स्वाभाविक ही थी,  गो कि साहित्य से उनका कितना सरोकार है यह मैं नहीं जानता। यह एक अनौपचारिक सी बैठक थी जिसमें यह तो स्पष्ट हुआ कि आयोजन होगा वह भी नवम्बर में राज्योत्सव के आस-पास, किन्तु उसकी रूपरेखा क्या होगी इसे लेकर बातचीत बेहद हल्के-फुल्के ढंग से हुई। इसके उपरांत मैंने अपना कर्तव्य मान जनसंपर्क संचालक को कार्यक्रम की एक रूपरेखा बनाकर भेज दी जो मेरे पचास साल के बड़े-छोटे साहित्यिक कार्यक्रमों के आयोजन अथवा उनमें शिरकत करने के अनुभवों पर आधारित थी। यह कार्य मैंने छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में किया। जवाब में मुझे संचालक महोदय का धन्यवाद संदेश भी प्राप्त हुआ।

इस पहली बैठक के बाद कार्यक्रम की रूपरेखा कब कैसे बनी? क्या उसके लिए बाद में कोई बैठक हुई? किन लोगों पर आयोजन की जिम्मेदारी डाली गई? इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं मिली। बस एक खबर उड़ते-उड़ते मिली कि नगरीय निकायों के प्रस्तावित चुनावों के चलते महोत्सव नवम्बर में न होकर दिसम्बर में होगा। इसके कई दिनों बाद रायपुर के चौक-चौराहों पर रायपुर साहित्य महोत्सव के होडिंग्स नज़र आने लगे। उनकी रूपाकृति और इबारत देखकर यह समझ नहीं पड़ा कि यह साहित्य महोत्सव है या लोक साहित्य महोत्सव या फिर साक्षरता महोत्सव! खैर, एक दिन अचानक मुझे फोन आया कि रायपुर में तीन दिवसीय साहित्य महोत्सव हो रहा है। उसमें अशोक बाजपेयी का एकल काव्यपाठ होगा और आपको उस सत्र का संचालन करना है और यह कि डॉ. राजेन्द्र मिश्र ऐसा चाहते हैं। मैं नहीं समझ पाया कि फोन करने वाले व्यक्ति का जनसंपर्क विभाग से या साहित्य महोत्सव से क्या लेना देना है। संभव है कि उनकी सेवाएं अनुबंध पर ली गई हों। फिर एक कवि के एकल काव्यपाठ के सत्र का संचालन करने की ऐसी क्या योग्यता मुझमें है! डॉ. राजेन्द्र मिश्र ने अगर संदेश दिया है तो किस अधिकार से और अगर वे ही इस महोत्सव के प्रभारी हैं तो फिर उन्हें स्वयं मुझसे फोन पर बात करने में क्या कष्ट या संकोच था? यह सब सोचकर मैंने फोन  पर ही अपनी असमर्थता जता दी।

दो-तीन दिन बार समाचार पत्रों को ई-मेल से जो विज्ञप्ति भेजी गई वह मुझे भी पत्रकार की हैसियत से भेजी गई। इसमें जो तीन दिन का कार्यक्रम तज़वीज था वह मेरी बुद्धि से परे था।  फिर यह मालूम पड़ा कि इस महोत्सव  में साहित्य के अलावा सिनेमा पर भी चर्चा होगी और पुरातत्व पर भी तथा शिल्पकार भी अपनी कला का जीवंत प्रदर्शन करेंगे। इन सूचनाओं से मैंने तीन निष्कर्ष निकाले। एक- कार्यक्रम प्रभारियों का पूरा ध्यान कुछ जाने-माने नामों पर ही था, खासकर जो दिल्ली की धुरी पर हैं। उनसे नैकट्य प्रगाढ़ करना व उसका भविष्य में निज लाभ उठाने की भावना इसके पीछे है। दो- मुझ जैसे अनेक को मजबूरी में ही निमंत्रित किया गया। उनका बस चलता तो न करते। तीन- कार्यक्रम सरकार का था, इसलिए आयोजक या आयोजन संचालक स्थानीय दबावों से मुक्त नहीं हो पाए। इससे भले ही कार्यक्रम की मूल अवधारणा क्यों न बदल गई हो। कुल मिलाकर एहसास हुआ कि मन में एक वृहत साहित्य कार्यक्रम को लेकर जो सोच थी उससे यह महोत्सव बिल्कुल हट कर होने वाला है। मैंने इसलिए तय किया कि इसमें शामिल न होना ही मेरे लिए उचित होगा। जब एक बहुप्रसारित अखबार के शीर्षक में छपा कि अशोक चक्रधर सहित अनेक लेखक शामिल होंगे तो एक तरह से पुष्टि हुई कि मेरा निर्णय उचित था। बहरहाल यह तो मेरी निजी बात हुई।

रायपुर साहित्य महोत्सव को लेकर जो बहस चली, वास्तव में उसका विश्लेषण किया जाना चाहिए। एक तो समारोह सम्पन्न होने के बाद बार-बार यह कहा गया कि इसमें लेखकों को आने से रोका गया। मैं जहां तक जानता हूं ऐसा न तो किसी साहित्यिक संगठन ने किया और न व्यक्तिगत रूप से किसी लेखक ने।  एक अखबार ने कुछ दिनों तक मुहिम ही चला दी कि वामपंथी लेखक बहिष्कार कर रहे हैं, किन्तु यह बात सरासर असत्य थी। प्रलेस, जलेस और जसम किसी ने भी महोत्सव का विरोध या बहिष्कार नहीं किया बल्कि अधिकतर लेखक जो आए वे सामान्य तौर पर वामपंथी या उदारवादी माने जाते हैं। सच तो यह है कि संघ परिवार के कुछ घटकों द्वारा उस समय आपत्ति दर्ज कराई गई कि भाजपा सरकार के कार्यक्रम में पार्टी विरोधी लेखकों को क्यों बुलाया गया।

हां, यह अवश्य था कि छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ने इस कार्यक्रम का विरोध किया और कुछ लेखकों को टेलीफोन पर न आने का अनुरोध भी। यह एक खुला राजनीतिक कदम था जिसका लेखकों से कोई लेना-देना नहीं था। कांग्रेस पार्टी का विरोध प्रदेश में हो रही नक्सली हिंसा और हाल ही में हुई नसबंदी मौतों की दर्दनाक वाकये की पृष्ठभूमि में था। उन्होंने अपनी बात सामने रख दी। लेखकों को नहीं मानना थी, सो नहीं मानी। भोपाल गैस त्रासदी के बाद यदि भोपाल में विश्व कविता समारोह हो सकता था तो उसकी तुलना में तो यहां ऐसा कुछ भी नहीं था। मुझे ध्यान आता है कि मैंने 2009 में दिल्ली में ''अक्षर पर्व" द्वारा आयोजित कार्यक्रम प्रभाष जोशी के आकस्मिक निधन के कारण निरस्त कर दिया था, लेकिन उसी शाम, उसी दिल्ली में दो अन्य साहित्यिक कार्यक्रम भी आयोजित थे जो बाकायदा सम्पन्न हुए और संवेदनशील लेखकों को उनमें उपस्थिति से गुरेज नहीं हुआ।

प्रदेश कांग्रेस का विरोध तो महोत्सव प्रारंभ होने के पहले ही समाप्त हो चुका था, लेकिन मेरा अनुमान है कि जो बहस आगे हुई वह मुख्यत: जनवादी लेखक संघ की विज्ञप्ति के कारण हुई। जलेस ने महोत्सव बीत जाने के हफ्ते भर बाद विज्ञप्ति जारी कर एक तरफ तो आयोजन के पीछे भाजपा और संघ परिवार पर अपना एजेण्डा लागू करने के लिए साहित्य के मंच का उपयोग करने की दुरभिसंधि आदि के लिए लानत मलामत की; वहीं दूसरी ओर समारोह में शामिल लेखकों का बचाव यह कहकर किया कि वे तो वहां भले मन से गए थे और उन पर कोई तोहमत मढऩा गलत होगा। जलेस को यह वक्तव्य जारी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? जबकि महोत्सव समापन के बाद से उसे लेकर आलोचना तो दूर, कहीं कोई गंभीर बात नहीं हो रही थी। इस विज्ञप्ति के बाद आरोप-प्रत्यारोप का एक संक्षिप्त अध्याय प्रारंभ हुआ। कुछ ने शामिल होने वाले लेखकों की संयत-असंयत आलोचना की तो कुछ शरीक होने वाले लोगों ने भी अपनी सफाई पेश की और वीरोचित मुद्रा में घोषित किया कि उन्होंने भाजपा सरकार के मंच का उपयोग अपनी बात कहने के लिए किया। ये सारी व्यर्थ की बातें थीं जो कुछ ही दिनों के भीतर ठंडी पड़ गईं।

मेरा मानना है कि रायपुर साहित्य महोत्सव के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भाजपा का न तो कोई निर्देश था और न उनका एजेण्डा लागू करने का कोई प्रच्छन्न प्रयत्न। इसमें अगर राजनीति थी तो सिर्फ इतनी कि रायपुर में एक महत्वाकांक्षी समारोह आयोजित करके  मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की छवि को निखारा जाए। यह अपने आप में कोई गलत विचार नहीं था। कोई भी जनतांत्रिक सरकार अपने छवि निर्माण के लिए ऐसे उपक्रम करती ही है। मैंने कई वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश में देखा था कि मेला-मड़ई के अवसर पर प्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग का पैवेलियन भी सजता था। मेले में हज़ारों लोग आते हैं। उनके बीच सरकार के प्रचार का थोड़ा सा अवसर मिल जाए तो क्या बुराई है। मुझे लगता है कि आजकल देश में जगह-जगह साहित्य महोत्सव आयोजित करने का फैशन चल पड़ा है; हमारे प्रदेश के युवा और उत्साही जनसंपर्क संचालक को जयपुर लिटफेस्ट या ऐसे किसी अन्य आयोजन से रायपुर में भी वैसा ही कुछ करने की प्रेरणा मिली होगी। मैं कहूंगा कि उन्होंने कल्पनाशीलता के साथ अपने कर्तव्य का  निर्वाह करने का प्रयत्न किया। यह बात अलग है कि इस बड़े काम के लिए जैसी टीम बनना चाहिए थी वे नहीं बना पाए।

मेरा यह भी मानना है कि इस वृहद आयोजन की प्रक्रिया पर प्रारंभ से अंत तक जितना ध्यान अपेक्षित था वह नहीं दिया गया। सबसे पहले तो यही सवाल उठता है कि महोत्सव का आयोजन जनसंपर्क विभाग ने क्यों किया। जहां शासन के पास किसी काम के लिए पर्याप्त ढांचा न हो वहां तदर्थ रूप से किसी अन्य एजेंसी को काम सौंपा जाए तो बात समझ आती है, लेकिन छत्तीसगढ़ में बाकायदा एक संस्कृति विभाग है; फिर साहित्य अकादमी नामक संस्था भी है यद्यपि उसके अध्यक्ष की पात्रता के बारे में कुछ न कहना ही बेहतर है। तो शासन ने संस्कृति विभाग छोड़कर जनसंपर्क विभाग को क्यों चुना? चलिए मान लेते हैं कि इसके पीछे कोई महत्वपूर्ण वजह रही होगी। ऐसी स्थिति में क्या यह बेहतर नहीं होता कि जनसंपर्क, संस्कृति, आदिम जाति विकास, हस्तशिल्प, वन, शिक्षा इत्यादि सारे विभागों को मिलाकर एक संचालन समिति बन जाती क्योंकि महोत्सव में इन सबकी कुछ न कुछ भूमिका प्रस्तावित थी।

मैंने जैसा कि प्रारंभ में संकेत किया कि इन तीन दिवसीय कार्यक्रम की रूपरेखा युक्तियुक्त ढंग से नहीं बनाई गई। एक सत्र में जहां सिर्फ एक कवि का एकल का पाठ रखा गया वहीं ऐसे सत्र भी हुए जिनमें दस या अधिक कवियों को काव्य पाठ का बराएनाम अवसर मिल पाया। इस संयोग को क्या कहिए कि जिन अशोक बाजपेयी का 13 दिसंबर को रायपुर में एकल काव्यपाठ महोत्सव के दौरान डॉ. राजेन्द्र मिश्र की बनाई कार्य योजना के अनुसार हुआ, वे ही अशोक बाजपेयी इसी रायपुर में 18 जनवरी को फिर एक बार उन्हीं राजेन्द्र मिश्र द्वारा निर्देशित एक कार्यक्रम में एकल काव्यपाठ करेंगे! दूसरे, इसे आयोजकों की अनुभवहीनता कहिए या संकुचित दृष्टि कि एक ओर जहां परिचर्चाओं में भाग लेने वालों को इक्कीस हजार रुपए प्रत्येक दिए गए वहीं छत्तीसगढ़ के कवियों को मात्र पांच हजार के योग्य समझा गया। इस तरह का भेदभाव बरतने के पीछे आखिर क्या कारण था? और शामिल कवियों ने तत्काल यह राशि लौटा क्यों नहीं दी?

रायपुर साहित्य महोत्सव के बहाने एक बात यहां पर फिर उठी है कि सत्ता और साहित्य के बीच क्या संबंध हो? यह सत्य अपनी जगह पर है कि साहित्य और कला के विकास को या तो राजाश्रय की आवश्यकता होती है या सेठाश्रय की। इन दोनों में से कौन बेहतर है? जब सामंती युग था तब ललित कलाओं और साहित्य का उन्नयन राजाश्रय में ही होता था। राजा जिस पर खुश हो जाए उसे मोतियों की माला दे दे या उसके घर पर हाथी बंधवा दे। फिर भी उस समय ऐसे गुणीजन कम नहीं थे जो राजा की ड्योढ़ी चढऩा पसंद नहीं करते थे। अपन भले अपना घर भला यह उनका सिद्धांत होता था। सामंतवाद समाप्त हुआ। पूंजीवाद का दौर आया तो संस्कृति के संवर्धन का जिम्मा धनपतियों ने उठा लिया। आज का जो समय है उसमें जनतांत्रिक सरकारें और पूंजी के स्वामी दोनों अपने-अपने तरीके से साहित्य और संस्कृति के उन्नयन में सहयोगी हो रहे हैं। दोनों की दिलचस्पी मुख्यत: ललित कलाओं को प्रोत्साहित करने में है क्योंकि उनमें सामान्यत: ऐसा कुछ नहीं है जो उनकी संवेदनाओं पर आघात कर सके या उनके हितों के विपरीत जाए। साहित्य की स्थिति कुछ अलग है। फिर भी यदि जनतांत्रिक सरकार साहित्य को बढ़ावा देना अपने कर्तव्यों का एक हिस्सा मानती है तो पूंजीपति वर्ग भी साहित्य के प्रति अपनी अभिरुचि जतला कर श्रेय लेने में पीछे नहीं रहना चाहता।

स्पष्ट है कि यदि लेखक स्वान्त: सुखाय की भावना को तज कर अपनी रचनाओं का प्रचार-प्रसार करना चाहता है, यदि वह यश का लोभी है, यदि उसके मन में सम्मान और पुरस्कार की लालसा है तो उसे किसी न किसी रूप में माध्यम और संबल की आवश्यकता पडऩा ही है। इस संदर्भ में अक्सर कुंभनदास का हवाला देकर कहा जाता है- संतन को कहां सीकरी सों काम। यह बात अपने मन को समझाने के लिए कही जाती है। कुंभनदास मूलत: संत थे कवि नहीं।  इसलिए कवि को अपना आदर्श कुंभनदास के बजाय तुलसीदास को मानना चाहिए जिन्होंने मानस को जन-जन तक पहुंचाने के लिए रामलीला का आविष्कार किया है। किन्तु आज जब सरकार और सेठ दोनों का संरक्षण उपलब्ध है तो फिर कवि को यहां-वहां भटकने की जरूरत नहीं है! पुरस्कारों की झड़ी लगी हुई है, सम्मान अनगिनत हैं, पुस्तकें सरकारी खरीद मेें खप जाती हैं। ऐसे में जहां से भी बुलावा आए वहां चले जाने में ही श्रेय है। वैसे भी आज देश राजनीति के संक्रमण काल से गुजर रहा है। ऐसे समय अनावश्यक बहसों में उलझने और अपनी आत्मा पर बोझ लादने में कोई तुक नहीं है!
देशबन्धु में 15 जनवरी 2015 को प्रकाशित

Tuesday, 13 January 2015

मलय के "मैं" में सब शामिल

''बची उम्र को
बचाने की फिकर क्या
इस रात में भी
दोपहरी सा
दूना धधकता हूं।''
कवि मलय के नए संकलन ''असंभव की आंच'' की एक कविता ''रात में दूना'' की ये अंतिम पंक्तियां हैं। कह सकते हैं कि यह मलय का आत्मपरिचय है और मैं उन्हें जितना जानता हूं, उनके संघर्षपूर्ण जीवन की शायद इससे बेहतर और कोई व्याख्या नहीं हो सकती थी।

मलय पच्यासी साल के हो गए हैं। इस संकलन का प्रकाशन इसलिए सुखकारक है कि कवि ने इस आयु में भी अपनी सक्रियता बरकरार रखी है, किन्तु मेरे लिए यह ज्यादा प्रसन्नता का विषय है कि इन कविताओं में कवि ने खुद को किसी हद तक नए सिरे से तराशा है। प्रस्तुत कविताओं में जो बिंब-विधान, जो प्रतीक उन्होंने प्रयुक्त किए हैं, वे उनकी चिर-परिचित शैली से काफी भिन्न हैं। यह ताजगी प्रसन्न करती है। आशय यह कि मलय जी इस आयु में भी ऊर्जा से लबरेज होकर नए अंदाज में अपने विचारों को प्रगट करने का सफल यत्न कर रहे हैं।

मैं इन कविताओं से गुरते हुए फिर एक जगह रुकता हूं। ''चाबियां" शीर्षक कविता में वे कहते हैं-
''इस तरह उम्र यह
खुल खिलकर
कुछ छूटती है खुद
और आगे बढ़ चलती है
रास्ते तलाशती है
जान की जोखिम से
पूरी निडर होकर।"
इस कविता में भी वही भाव है जो हम पहले देख आए हैं। कवि को अपनी बढ़ती उम्र का अहसास है जो बार-बार झलकता है, लेकिन कवि हार मानने के लिए तैयार नहीं है। जीवन है तो सुख-दुख के बीच, आशा-निराशा के बीच, उजाले-अंधेरे के बीच उसे पूरी तरह जीना चाहिए, पूरे तेज के साथ, पूरी जिजीविषा के साथ, लेकिन वह भी खुद के लिए नहीं। जिसने साहित्य के संस्कार, मुक्तिबोध और परसाई से पाए हों उससे आप स्वान्त: सुखाय लिखने या जीने की उम्मीद कर भी कैसे सकते हैं? इसीलिए कवि कहता है-
''लापरवाह-
अपने डबरों में
मस्ती के आख्यान
सुनने की फुर्सत किसे है?
मैं भूख से तिलमिलाते
दिलों में दावानल से
रोज ही झुलसता हूं।"

कवि का अंतर-बाह्य एक ही है और इसीलिए वह खुद के बारे में कह सकता है-
''पानी की
पारदर्शिता में
डूबता हूं
गहरी जड़ों तक।"

मलय जी को मैं तबसे जानता हूं जब मैं जबलपुर में कॉलेज का विद्यार्थी था और वे एक स्कूल के अध्यापक। यह सन् 1961 की बात है। एक कवि के रूप में उनकी पहचान बनना प्रारंभ हो चुकी थी। अगर मुझे ठीक याद है तो उनका पहला कविता संकलन ''हथेलियों का समुद्र" 1963 में प्रकाशित हो गया था। इस संकलन में सौ कविताएं थीं। वे जिन वैचारिक मूल्यों को लेकर आगे बढ़े, उनका प्रथम परिचय इस संकलन की कविताओं से ही मिल गया था। यद्यपि कविता के शिल्प से मैं बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ था। मुझे ऐसा लगा था कि उन्हें कुछ बिबों और प्रतीकों से ज्यादा मोह हो गया है जिन्हें दोहराए बिना वे नहीं रह पा रहे हैं। आगे चलकर मलय जी ने लम्बी कविताएं भी लिखीं। इसे लेकर उन पर मुक्तिबोध की कॉपी करने जैसी टिप्पणियां भी की गईं। मेरी भी धारणा है कि मलय जी लंबी कविताओं को पूरी तरह से साध नहीं पाए। उन्होंने कुछ कहानियां भी लिखीं। एक संग्रह भी प्रकाशित हुआ, यद्यपि उसकी बहुत चर्चा नहीं हुई। शायद मलय जी ने भी जल्दी ही समझ लिया कि उनकी मूल प्रवृत्ति कविता की ही है।

मलय प्रारंभ से ही प्रगतिशील आंदोलन में सक्रिय रहे हैं। जबलपुर में जब हम कुछ तरुणों ने ''संगम" नामक साहित्यिक संस्था बनाई थी तो उसके पहले अध्यक्ष कवि पुरुषोत्तम खरे (''सृजन के पीडि़त क्षणों में") और दूसरे अध्यक्ष मलय बने। उनकी ही अध्यक्षता में हमने परसाई जी के मार्गदर्शन में मुक्तिबोध को जबलपुर आमंत्रित किया था। मलय जी के लिए यह समय व्यक्तिगत जीवन में कड़े संकट का था। स्कूल में अध्यापन के साथ-साथ वे अखबार में अंशकालीन काम भी कर रहे थे। कुछ वर्षों बाद वे राजनांदगांव के उसी दिग्विजय महाविद्यालय में प्राध्यापक होकर आए जहां मुक्तिबोध जी ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष बिताए थे। राजनांदगांव में मलय जी को लिखने-पढऩे का कुछ वैसा ही वातावरण मिला होगा जो कि जबलपुर में था। जब 1974 में प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय स्तर पर पुनर्गठन हुआ और छत्तीसगढ़ में उसकी गतिविधियां प्रारंभ हुईं तो मलय जी स्वाभाविक रूप से उसकी अग्रपंक्ति में थे।

मैं जब उनके नए कविता संग्रह पर चर्चा करने बैठा हूं तो उन्हें एक व्यक्ति के रूप में मैंने जैसा देखा है उसका ध्यान हो आना स्वाभाविक है। यदि उसमें पाठकों को विषयांतर लग रहा हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूं। राजनांदगांव में मलय जी ने अपने साथी अध्यापकों और विद्यार्थियों को लिखने-पढऩे की ओर काफी प्रेरित और प्रोत्साहित किया। सुप्रसिद्ध कथाकार पुन्नी सिंह वहां उनके सहयोगी थे, वे आगे चलकर मध्यप्रदेश प्रगतिशील संघ के अध्यक्ष बने। रामकुमार रामरिया, (स्व.) लक्ष्मण कवष इत्यादि अनेक विद्यार्थियों को उन्होंने साहित्य के संस्कार दिए। प्रलेस के शिविरों में वे लगातार शिरकत करते रहे। बहरहाल कवि मलय इन तमाम गतिविधियों में इसीलिए सक्रिय रहे कि वे ईश्वर या भाग्य पर भरोसा करने के बजाय मानते थे कि मनुष्य स्वयं अपनी तकदीर बदल सकता है। इसलिए वे लिखते हैं-
''कांटों की
कठिन क्रूर
क्षुद्रता पर
जिन्दगी को
छोड़ा नहीं जा सकता।"
जीवन में चारों ओर कांटे बिखरे हुए हैं। वे चुभते हैं, उनसे बिंधकर शरीर लहूलुहान भी हो सकता है, लेकिन क्या सिर्फ इसी डर से मनुष्य चलना बंद कर देगा? कांटों में क्रूरता है और एक क्षुद्रता भी। यह क्षुद्रता क्या है? जिनके हाथों में कांटे हैं, जो कांटे बो रहे हैं या जो स्वयं कांटे बनकर खड़े हैं उनका मन छोटा है, उनकी सोच छोटी है, वे चालाक हो सकते हैं और स्वार्थी भी, वे अपने बारे में सोचते हैं, समाज के बारे में नहीं; वे समाज के शत्रु हैं और उसके खिलाफ षडय़ंत्र रचते रहते हैं। मलय जी इसे समझते हैं-
''-प्यास से पसरे संसार में
पानी के धोखे का
पूरा तालाब।"
भूख, प्यास और अभाव का सामना कर रहे लोगों के सामने मृग मरीचिका खड़ी कर दी गई है। कवि इसे समझता है और आगाह करता है कि यह प्यासे मृगों की मूर्खता नहीं है, बल्कि उन वर्ग शत्रुओं की दुरभि संधि है जिसे समझना बाकी है। वह कहता है कि- ''दिल के खुले दरवाजों पर अंधेरे का पहरा है।" वह इस अंधेरे को मिटाना चाहता है। दूसरे शब्दों में कवि जानता है कि लोक शिक्षण मुक्ति के लिए पहली और अनिवार्य शर्त है।
'धुआं' शीर्षक कविता में मलय आगे और चेतावनी देते हैं। वे कहते हैं कि आग धधकती रहे, लेकिन धुआं बनकर न उड़ जाए। निजी महत्वाकांक्षा के चलते आग पर पानी पड़ सकता है। संकल्प अगर धुआं बनकर उड़ गया तो आकाश में छितरा जाएगा और यथास्थिति कायम रही आएगी।

इन कविताओं को पढ़ते हुए मुझे बार-बार लगता है कि यहां जैसे कवि ने अपने समूचे व्यक्तित्व को इन कविताओं में विसर्जित कर दिया है। एक-दो कविताएं ऐसी हैं जहां बाहर से किसी विषय को उठाकर कवि काव्य-दृष्टि से उसकी विवेचना करता है जैसे कि ''कभी नहीं डरता" शीर्षक कविता। यहां कवि एक तरफ है और उसके सामने गांव से पलायन करके आया मंगलू है। दोनों की पृथक सत्ता है। बाकी तमाम कविताओं में तो कवि ने स्वयं को विषय बनाया है और स्वयं की ही व्याख्या की है। तथापि यहां जो स्वयं है वह पूरे समाज में रूपांतरित, विस्तारित, और उपस्थित है। समाज के बाहर कवि की अपनी कोई इयत्ता नहीं है। जिस तरह मुक्तिबोध ''मेरे मित्र : मेरे सहचर" में अपने आपको समाज के साथ एकाकार करते हैं, कुछ वैसी ही कशिश, वैसी ही तड़प मलय की इन कविताओं में भी दिख पड़ती है। वह जब कहता है कि मैं बाजार में या कहीं और बिकने से बचता हूं तो यहां भी ''मैं" में हम सब शामिल हो जाते हैं। और जब वह कहता है कि गिरते-हांफते बच्चे धूल भरी ताकत में खेलना नहीं छोड़ते तो यहां भी बच्चे पूरे समाज का बिंब बन जाते हैं।
इन कविताओं में कुछ स्थानों पर संविधान का जिक्र हुआ है। वे एक अनूठी उपमा देते हैं कि-
''संविधान हमारा वसंत है
चहुं दिशी
खुशहाली का पैरोकार"
इसके आगे वे फिर स्पष्ट करते हैं कि चुनावी घोषणा पत्रों से बसंत को सजाकर जनता को किस तरह भरमाया जाता है। इस भाव में कुछ और कविताएं भी हैं।
मलय जी के इस संकलन में ''बेबस" शृंखला के अंतर्गत आठ कविताएं हैं। सहज ही अनुमान होता है कि ये कविताएं उन्होंने अपनी दिवंगता पत्नी की स्मृति में लिखी हैं। जीवन का एकाकीपन कविताओं में ध्वनित-प्रतिबिंबित है। लेकिन कवि मानो इस अभाव से भी जीवन शक्ति हासिल करता है। एक जगह कहता है-
''-याद के बढ़ते
गहराते ताप में
ढलकर-
मिट जाने के सिवाय
हीरा हो जाता हूं।"

इसी तरह वह फिर कहता है-

''जिन्दगी के बीहड़ में
रहते हुए भी
तुम्हारे केन्द्र से
जुड़ी आवाज का
फैलना प्रकाश
हो रहता हूं।"
मैंने मलय जी का पहला संकलन उन्हें तीन रुपया देकर नगद खरीदा था। उसके बाद उनकी बाकी की पुस्तकें भी खरीद कर ही पढ़ीं। इसलिए नोट करना जरूरी है कि यह संकलन मलय जी ने मुझे बहुत प्यार के साथ भेंट किया है। मेरी शुभकामना है कि हमारे प्रिय मित्र और साथी मलय जी अभी कई बरस इसी ऊर्जा के साथ लिखते रहें और अपना अगला संकलन भी इसी प्यार के साथ मुझे भेंट करें। यह शुभेच्छा प्रकट करना इसलिए भी आवश्यक है कि मलय एक अपवाद के रूप में हमारे सामने हैं वरना अधिकतर लेखक तो पचास-पचपन आते तक अपना श्रेष्ठ लिख चुके होते हैं और अपने को पुन: आविष्कृत करने की इच्छा से मुक्त हो चुके होते हैं। 

अक्षर पर्व जनवरी 2015 अंक की प्रस्तावना

Wednesday, 7 January 2015

नब्बे के नीरज


 हिन्दी जगत के लिए यह सुखद खबर है कि नीरज इस 4 जनवरी को नब्बे साल के हो गए हैं। वे पिछले साठ साल से अधिक समय से सर्जनारत हैं और पांच पीढिय़ों को उनकी कविताएं पढऩे व सुनने का सौभाग्य मिला है। हिन्दी साहित्य में गीत विधा को प्रतिष्ठित करने में उनकी अनन्य भूमिका रही है। हम नीरज को नौ दशक की जीवन यात्रा पूरी करने पर बधाई देते हैं और यह विश्वास करना चाहते हैं कि वे निरंतर सक्रिय रहेंगे और हमें उनकी जन्मशती उनके साथ मनाने का अवसर मिलेगा। फिलहाल अवसर  है कि हिन्दी साहित्य में नीरज के योगदान एवं उनकी विधा के बारे में कुछ बात की जाए।

हिन्दी की विडंबना है कि गीत और गेय कविता को पिछले तीस-चालीस साल के दौरान दोयम दर्जे का साहित्य मान लिया गया है। ऐसी कुछ धारणा बन गई है जो गीत लिखता है वह कवि ही नहीं है। ऐसा क्यों हुआ है हम उसकी भी संक्षिप्त चर्चा करेंगे किन्तु क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि गीत जो कि साहित्य रचना का मूल है उसका इस तरह से अवमूल्यन हो जाए! यदि हिन्दी साहित्य के इतिहास पर गौर करें तो यह तथ्य सामने आता है कि अनेक वरेण्य रचनाकारों ने गीत अथवा छांदिक रचना के माध्यम से ही यश अर्जित किया। यह बात तो स्कूल के विद्यार्थी भी जानते हैं कि द्विवेदी युग से से लेकर छायावाद-रहस्यवाद तक सब कवियों ने गीत ही लिखे। यहां तक कि प्रयोगवाद और नई कविता के कवियों ने भी अपने प्रारंभिक दौर में गीत ही लिखे। तर  सभी कवि गीतकार भी थे।  यह कहने की आवश्यकता नहीं होना चाहिए कि वृहतर हिन्दी भाषी समाज में साहित्य से अनुराग उत्पन्न करने में गीत विधा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

मैंने अपने स्कूली दिनों में जाना था कि एक समय देवकीनंदन खत्री के रहस्य रोमांच से भरे तिलस्मी उपन्यास यथा चन्द्रकांता आदि को पढऩे के लिए लोगों ने हिन्दी सीखी थी; फिर यह बात भी सामने आई कि अहिन्दी भाषी जनता ने बंबईया फिल्में देख-देखकर हिन्दी सीखी। दूसरे शब्दों में, हिन्दी भाषा को जनस्वीकृति दिलवाने में और साहित्य को लोकप्रियता दिलवाने में ये सहज, सरल, सुबोध रचनाएं कारगर साबित हुईं। यही बात तो गीतों पर लागू होती हैं। बच्चन की 'मधुशाला'  एक प्रबल दृष्टांत के रूप में हमारे सामने है। यह ज्ञातव्य है कि एक समय हिन्दी के तमाम बड़े कवि कवि सम्मेलन के मंच पर आते थे, और उनकी कविताएं सुनने के लिए श्रोता रात-रात भर जागते थे। स्वाधीनता संग्राम के दिनों में इन कवियों ने गुलामी के खिलाफ लडऩे के लिए भी जनता का मनोबल बढ़ाने में खासी भूमिका निभाई।

गोपालदास सक्सेना 'नीरज' उस परंपरा के ही कवि हैं। मैं जहां तक समझता हूं वे 1940 के दशक में मंच पर आ चुके थे। पचास और साठ के दशक उनकी अपार लोकप्रियता के वर्ष थे। नीरज के कविता संकलन प्रकाशित होते थे और देखते ही देखते बिक जाते थे। उनके अनेक गीत फिल्मों में भी लिए गए और उन्होंने पृथक से फिल्मी गीत भी लिखे। उनके ढेर सारे गीत हैं जो उस समय हम जैसे किशोरों की जुबान पर चढ़े रहते थे जैसे- कारवां गुज़र  गया गुबार देखते रहे, या फिर- आज मिलूंगा, रोज निकलता हूं इसी विचार से, किन्तु बिना मिले पलट आता हूं तुम्हारे द्वार से... इत्यादि इत्यादि। मैंने नीरज और उनके अनेक समकालीनों को मंच से कविता पाठ करते सुना है। नीरज की बराबरी के ही लोकप्रिय कवि थे- गोपाल सिंह नेपाली। इनके अलावा वीरेन्द्र मिश्र, मुकुट बिहारी सरोज, देवराज दिनेश, बालस्वरूप राही, रामावतार त्यागी, भारतभूषण, सोम ठाकुर व रमानाथ अवस्थी आदि ने धूम मचा रखी थी।

सच है कि इनमें से अधिकतर कवि जो लिखते थे उन्हें प्रेम गीत या देशभक्ति गीत जैसे खांचों में बांटा जा सकता था, तथापि ऐसा नहीं कि इनमें सिर्फ शब्द विलास ही होता था। ये भावनाप्रधान गीत श्रोताओं के दिल को छूते थे और कहीं न कहीं उनके मनोभावों का परिष्कार भी करते थे। इन कवियों ने निरी भावुकता से हटकर विचार-सम्पन्न गीत भी लिखे। और मैं मानता हूं कि किसी हद तक उनमें लोकशिक्षण का तत्व था। नीरज की ही एक कविता याद आती है- अगर तीसरा युद्ध छिड़ा तो क्या होगा, नई उमर की नई फसल का क्या होगा...। मुकुट बिहारी सरोज, उमाकांत मालवीय और वीरेन्द्र मिश्र के साथ नीरज आदि कवियों में लोक की चिंता बराबर देखने मिलती है। यह दुर्भाग्य की बात है कि पिछले तीस-पैंतीस साल के दौरान कवि सम्मेलन का मंच लगभग पूरी तरह से नष्ट हो चुका है। इसकी जिम्मेदारी बदलते हुए सामाजिक परिवेश को दी जाए, कि कवि सम्मेलन के आयोजकों को, कि नयी पीढ़ी को, कि स्वयं मंचीय कवियों को या फिर साहित्य के मठाधीशों को?

मुझे कभी-कभी लगता है कि जो अपने आपको गंभीर साहित्य का प्रवक्ता मानते हैं उन्होंने अपने ही पैरों आप कुल्हाड़ी मारी है। आज यदि देवकीनंदन खत्री हमारे बीच होते तो उन्हें शायद लेखक मानने से ही इंकार कर दिया जाता। हमारे बीच ऐसे गुणीजन उपस्थित हैं जो मैथिलीशरण गुप्त और माखनलाल चतुर्वेदी को कवि नहीं मानते। यदि इनकी कविता सुनकर कोई वाह-वाह करे या ताली बजाए तो ये उसका बुरा मान जाते हैं। गोया कविता गूंगे का गुड़ है। ये बंद कमरों में दस-बीस लोगों के बीच कविता सुनाने में गौरव अनुभव करते हैं और कवि सम्मेलन के मंच पर जाने में इनके हाथ-पैर कांपने लगते हैं। ऐसे में अगर मंच पर जोकरों का कब्जा हो गया हो तो आश्चर्य की क्या बात है?

चिंतनीय है कि हिन्दी के पाठ्यक्रम से गीत विधा अब लगभग खारिज कर दी गई है। इस बात का ख्याल नहीं रखा गया कि अन्य विधाओं की तरह इसमें भी परिवर्तन और विकास हुआ है। ऐसे अनेक समर्थ रचनाकार हैं जिन्होंने अपने गीतों में इक्कीसवीं सदी के चित्र प्रखरता के साथ अंकित किए हैं। गीत हो या नवगीत, उनमें वर्तमान की विसंगतियों को शिद्दत के साथ उभारा गया है। लेकिन हमारे अध्यापक, समीक्षक और स्वयंभू मर्मज्ञ ऐसी रचनाओं को पाठ्यक्रम में स्थान ही नहीं देना चाहते। वे इतना भी मानने को तैयार नहीं हैं कि इनकी चर्चा किए बगैर हिन्दी साहित्य का इतिहास अधूरा माना जाएगा। एक तरह से हिन्दी जगत में एक श्रेष्ठतावादी वर्ग तैयार हो गया है, जो पुरानी कहावत के अनुसार अपनी हाथीदांत की मीनारों में बैठा नीचे देखने को तैयार नहीं है।

यह विडंबना उस समय ज्यादा स्पष्ट हो जाती है जब हम पाते हैं कि यही श्रेष्ठतावादी लेखक पाठकों के न मिलने का और पुस्तकें न बिकने का रोना रोते हैं। ये मराठी, बंगला और मलयाली में साहित्यकार को मिले सम्मान का उल्लेख करते हैं, यह भूल करके कि उन भाषाओं में लोकप्रिय लेखन को हमारी तरह से खारिज नहीं किया जाता। हम भारतीय अंग्रेजी लेखकों की पुस्तकों पर मिल रहे करोड़ों की रायल्टी पर ईष्र्या करते हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि हिंदी पुस्तक की एक हजार कापियां भी बिक जाएं तो गनीमत है। जब सारा दायित्व पाठक पर ही मढ़ दिया गया है कि आप उसके पास न जाएं, वह आपके पास आए तो फिर जो मिल रहा है उसमें खुश रहिए। शिकायत किस बात की?

मेरा मानना है कि हिन्दी को आज भी नीरज जैसे कवि की आवश्यकता है। हमें ऐसे कवि चाहिए जो पांच-दस हजार की भीड़ में जाकर भी सुंदर भाषा, सुंदर भाव और सुंदर विचारों के गीत सुना सकें : ऐसे गीत जिन्हें गुनगुनाने का मन हो आए। हिन्दी साहित्य की समृद्धि में इनका कम-ज्यादा जो योगदान है उसे भी खुले मन से स्वीकार करना चाहिए। आज के समय में कवि सम्मेलन के मंच का परिष्कार करने की आवश्यकता तो है ही, जिन मसखरों ने उस पर कब्जा जमा रखा है उन्हें हटाना ही होगा ताकि हिन्दी समाज को फूहड़ता, छद्म विद्रोह और घटिया रोमांस के आक्रमण से बचाया जा सके। इससे भी ज्यादा आवश्यक है कि आज जो विचारहीनता और समाज निरपेक्षता की स्थिति उत्पन्न हो रही है उसे तोड़ा जाए। नीरज की परंपरा को आगे बढ़ाने से इस मकसद में मदद मिलेगी, ऐसा सोचना गलत नहीं होगा।
देशबन्धु में 8  जनवरी 2014 को प्रकाशित