Thursday, 11 September 2014

आत्मकथा लिखना आसान नहीं



भारत में इन दिनों आत्मकथाओं की बहार आई हुई है। बहार की जगह बौछार लिखूं तो भी शायद गलत नहीं होगा। आप समझ रहे होंगे कि मैं हाल के चंद महीनों में प्रकाशित उन आत्मकथाओं की बात कर रहा हूं जो सत्ता के गलियारों में दखल रखने वाले प्राणियों द्वारा लिखी गई हैं। ये सारी किताबें अंग्रेजी में हैं और ऐसा मौका देखकर बाजार में लाई गई हैं, जब उनकी अधिक से अधिक बिक्री की जा सके। इसके लिए सबसे पहले तो देश के उन प्रकाशन गृहों की तारीफ की जानी चाहिए जो जानते हैं कि पुस्तकें बेचकर मुनाफा कैसे कमाया जाता है। अगर ये आत्मकथाएं सालभर पहले या सालभर बाद प्रकाशित होतीं तो इनकी शायद एक चौथाई प्रतियां  भी नहीं बिकती, न इन पर अखबारों में चर्चा होती और न अंग्रेजी टीवी पर ''पैनल डिस्कशन" होते। यह भी नोट करना चाहिए कि इन पुस्तकों के लेखक वे हैं जो पहले कभी चंद्रमा की तरह प्रकाशमान थे और सौरमंडल से बाहर होते ही अंधेरे में खो गए थे। सो उन्हें एक बार फिर मीडिया की मेहरबानी से प्रकाश में आने का मौका मिल गया है।


मैंने इनमें से कुछ पुस्तकें पढ़ ली हैं, कुछ को पढऩा बाकी है। एकबारगी ही समझ आता है कि इनकी विषयवस्तु किसी हद तक खीज एवं हताशा से उपजी है और इन लेखकों के मन में कहीं क्षीण आशा है कि सत्ता केन्द्र में उनका पुनर्वास हो जाएगा। अगर यह आशा नहीं है तब भी इतना स्पष्ट है कि जीवन में जिन नैतिक मूल्यों का पालन करने की सहज अपेक्षा किसी व्यक्ति से की जाती है, उसे इन्होंने जरूरी नहीं समझा है। मोटे तौर पर ये पुस्तकें बहुत अधिक व्यक्ति केन्द्रित हैं। इनमें आत्मप्रशंसा का भाव कूट-कूटकर भरा है और उसी अनुपात में परनिंदा मानो उफनकर बाहर आ रही है। यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि उसे अफवाहों, चुगलखोरी, दूसरों की बुराई जैसी बातों में रस आता है। इस वजह से इनको पढ़ा तो जा रहा है, लेकिन छुटपुट प्रसंगों को छोड़कर ऐसा कुछ भी नहीं है जो सारगर्भित हो। प्रकाशक बिक्री से खुश, लेखक रॉयल्टी से और ''मजा चखाया" के आनंद से अभिभूत। सिर्फ पाठक हैं जो अपने को छले जाने से दुखी हैं कि पुस्तक में वैसा कुछ भी नहीं है जैसा प्रचारित किया गया था।

मैंने अपनी बात की शुरूआत सत्ता से जुड़े व्यक्तियों की आत्मकथाओं से की है। जीवन के अन्य क्षेत्रों से संबंधित जनों ने भी अपनी कहानियां लिपिबद्ध करने के प्रयत्न किए हैं। इन सबको एक साथ रखकर देखें तो समझ आ जाता है कि आत्मकथा लिखना किसी भी तरह से आसान नहीं है। यूं तो हर व्यक्ति के पास कहने के लिए कुछ न कुछ तो होता है और हरेक को एक छोटे दायरे में पाठक या श्रोता मिल जाते हैं, लेकिन अधिकतर आत्मकथाओं के अंत में हासिल आया शून्य की स्थिति ही बनती है। कहने के लिए आत्मकथा एक व्यक्ति के निज जीवन की कथा होती है, लेकिन कुएं के मेंढक के जीवन के बारे में किसी की भी दिलचस्पी भला क्यों होना चाहिए? मेरे कहने का आशय है कि किसी व्यक्ति की जीवनगाथा का महत्व तभी है जब एक विराट फलक पर उसे उकेरने के लिए थोड़ी सी जगह मिल गई हो या मिलने की संभावना हो। आकाश की नि:सीमता में सूर्य तो एक ही होता है, लेकिन एक छोटे से तारे की टिमटिमाहट के बिना आकाश का काम नहीं चलता। अगर आत्मकथा में वह क्षीण चमक भी न हो तो निरर्थक है।

मुझे ध्यान आता है चार दशक पुरानी घटना का। मेरे हमउम्र किसी लेखक ने मात्र 32 वर्ष की आयु में अपनी आत्मकथा प्रकाशित कर ली। मुझे तब आश्चर्य हुआ था कि इस उम्र में उनमें ऐसा क्या था जो वे पुस्तक के माध्यम से समाज के साथ बांटना चाहते थे। वे बंधु हिन्दी जगत में अपनी पहचान बना रहे थे, लेकिन उनकी रचनात्मक क्षमता मानो उस दौर में ही पूरी तरह छीज गई थी और आज उनका नाम भी कहीं सुनाई नहीं देता। तो क्या यह कहना उचित होगा कि आत्मकथा लिखने वाले अधिकतर लोग आत्ममुग्ध होते हैं और वे अपने व्यक्तित्व का तटस्थ भाव से विश्लेषण करने में असमर्थ होते हैं? मेरी दृष्टि में आत्मकथा की पहली और अनिवार्य शर्त यही है कि वह पाठक के मन में उदात्तता का संचरण करने में समर्थ हो और उसे बौद्धिक रूप से झकझोर सके। ऐसी क्षमता हर व्यक्ति के पास नहीं होती और कई बार ऐसा भी होता है कि जिसके पास अनुभव और विचारों की पूंजी है उसके पास भाषा की पूंजी नहीं है।

इस तरह एक आत्मकथा में समृद्ध अनुभव, सघन विचार और समर्थ अभिव्यक्ति से मिलकर वह आकर्षण होना चाहिए जो दूर-दूर तक प्रभावित कर सके। यह भी तभी कारगर होगा जब जीवनीकार पारदर्शी सच्चाई के साथ अपनी कहानी कहने के लिए तैयार हो। उसमें मानसिक बाधा या संकोच होगा तो वह कभी भी पाठक का ध्यान बांधकर नहीं रख पाएगी। आत्मकथा एक आईना है, जिससे लेखक स्वयं को देख सकता है, लेकिन वह शायद एक ऐसा शीशा भी है जिसके पार खड़ा व्यक्ति भी लेखक के अंतर्मन में झांक सकता है। जो जीवनीकार यह सोचे कि वह पूरी-पूरी सच्चाई सामने रखे बिना भी काम चला सकता है वह अपने आपको भरम में रखता है। इसीलिए ज्यादातर आत्मकथाएं प्रकाशन के बाद बहुत जल्दी भुला दी जाती हैं; भले ही उसकी बिक्री के लिए बढ़-चढ़कर प्रचार क्यों न किया गया हो। हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती, यह पुरानी कहावत यहां लागू होती है।

मेरे ध्यान में आता है कि हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा का पहला खंड ''क्या भूलूं क्या याद करूं" जब प्रकाशित हुआ, तो उसकी बेहद चर्चा हुई। समीक्षकों ने टिप्पणी की कि ऐसी आत्मकथा हिन्दी में पहले कभी नहीं लिखी गई। लेखक की बेबाक स्वीकारोक्तियों की बेहद तारीफ हुई। मैं नहीं जानता कि अब उसे कितने लोग पढ़ रहे हैं, लेकिन मेरी नजर में वह एक ईमानदार आत्मकथा नहीं थी। उसमें ऐसे सच्चे-झूठे प्रसंग थे, जो सनसनी फैला सकें। ऐसा करते हुए लेखक ने यह नहीं सोचा कि उससे कहीं-कहीं अन्यों के चरित्र हनन जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो गई थी। बच्चन मेरे अत्यंत प्रिय कवि हैं, और उनकी आत्मकथा पर प्रतिकूल टिप्पणी करने का मुझे दु:ख है, किन्तु इस बहाने मैं यह बिन्दु उठाना चाहता हूं कि आत्मकथा में एकतरफ यदि आत्मश्लाघा वर्जित है तो दूसरी ओर परपीडऩ भी।

मैं जब हिन्दी में प्रकाशित आत्मकथाओं की तरफ देखता हूं तो कुछ पुस्तकों का ध्यान अनायास हो आता है। इनमें बेशक सबसे ऊपर राहुल सांकृत्यायन की ''मेरी जीवन यात्रा" है। पांच खंडों में विभक्त यह पुस्तक एक व्यक्ति विशेष के जीवन का लेखा-जोखा मात्र नहीं है बल्कि इसमें तत्कालीन समाज व्यवस्था, राजनैतिक उथल-पुथल, वैश्विक घटनाचक्र, लेखक के राजनीतिक विश्वासों का निर्माण व उसकी कारक स्थितियां जैसे बहुविध विषयों से पाठक परिचय पाते हैं। यह ऐसी कथा है जो पढऩे वाले को भरपूर तृप्ति देती है।

मैं दो अन्य पुस्तकों का भी उल्लेख करना चाहता हूं जिनमें से एक है विश्वनाथ त्रिपाठी की ''नंगातलाई का गांव" और दूसरी है बेबी हालदार की ''आलो आंधारी"। दो अलग-अलग जीवन चरित्र, भिन्न व्यक्तित्व, भिन्न जीवन परिस्थितियां और भिन्न अनुभव। विश्वनाथ त्रिपाठी अपनी वृद्धावस्था के प्रथम चरण में अपने बाल्यकाल की कथा लिखते हैं। वे अपने गांव लौटते हैं और वहां के जीवन, व्यक्ति और दृश्य- इन सबको पाठक के सामने जीवंत उपस्थित कर देते हैं। त्रिपाठी जी को हमने व्याख्यान देते कई बार सुना है। वे ठहर-ठहर कर और सोच-सोचकर यद्यपि प्रफुल्लचित्त होकर भाषण देते हैं किन्तु उनकी लेखनी में एक ऐसी तरलता है, जो बिना रुके पाठक को अपने साथ ले चलती है। भाषा पर उनका अद्भुत नियंत्रण है। कुछ ऐसे भी प्रसंग हैं जो सामान्यत: जुगुप्सापूर्ण हो सकते हैं। किन्तु वहां भी त्रिपाठी जी उन पर शब्दों की ऐसी सजावट कर देते हैं कि पढऩे में कहीं कुछ बुरा नहीं लगता। एक वरिष्ठ लेखक से आप और क्या अपेक्षा कर सकते हैं।

बेबी हालदार की आत्मकथा 2003 में जब प्रकाशित हुई थी, मैंने इसी स्तंभ में उसकी चर्चा की थी। उसके बाद तो ''आलो आंधारी" का अंग्रेजी के अलावा भारत की तमाम भाषाओं में रूपांतरण हुआ। शायद ही किसी अन्य पुस्तक का इतने बड़े पैमाने पर अनुवाद हुआ होगा। बेबी हालदार की कथा बेहद कारुणिक है और वह एक संवेदनहीन भारतीय समाज को झकझोरने का यत्न करती है। दुर्भाग्य है कि जब पुस्तक लिखी तब बेबी एक घरेलू नौकरानी थी और आज भी वही है। रॉयल्टी से मिला पैसा उसकी पारिवारिक जिम्मेदारियों में ही उठ जाता है। हरियाणा के जिस गुडग़ांव में वह रहती है, न तो वहां  मुख्यमंत्री ने कभी उसे कोई पुरस्कार या संबल देने की बात सोची, न पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने और न किसी अन्य ने। बहरहाल सवा सौ पन्नों की यह आत्मकथा एक बेबस चीख के रूप में पाठक के सामने है।

मैं अब वापिस लौटता हूं राजनीतिक आत्मकथाओं की ओर। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि पी.सी. पारख, संजय बारू एवं नटवरसिंह की आत्मकथाएं आम चुनाव के चढ़ते और उतरते बुखार के बीच प्रकाशित हुईं। ये पुस्तकें आत्मप्रशंसा में पगी हुई हैं और परनिंदा का भाव इनमें प्रबल है। मुझे इन्हें पढ़कर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। पिछले तीन दशक में इसी तर्ज पर बहुत सी आत्मकथाएं लिखी गई थीं। बी.के.नेहरू, पी.सी. अलेक्जेंडर और बिशन टण्डन जैसे अपने समय के दमदार लोग इनके लेखक हैं। इनमें से लगभग हरेक ने कम ज्यादा मात्रा में अपनी काबिलियत, बुद्धिमता एवं उपलब्धियों का बखान किया है और देश के प्रशासन में जहां कोई कमी या गड़बड़ी दिखी है तो उसका दोष बड़ी आसानी से नेहरू, इंदिरा, राजीव या सोनिया गांधी पर डाल दिया है। एक औसत बुद्धि का पाठक भी तुरंत समझ जाता है कि लेखक ने अपनी कोई अपेक्षा आकांक्षा पूरी होते न देखकर शीर्ष व्यक्ति पर जानबूझकर निशाना साधा है। इन्हें पढऩे से निंदारस की प्राप्ति तो होती है, लेकिन फिर वही रस थोड़ी देर बाद कड़वा लगने लगता है। इस श्रेणी में एक पुस्तक एक जानी-मानी पत्रकार की भी है, वह है तवलीन सिंह की ''दरबार"। इसमें लेखिका राजीव-सोनिया के साथ अपनी अंतरंग मित्रता का उल्लेख करती हैं और बाद में मोहभंग का भी। इन तमाम पुस्तकों के बारे में मैं जो सोचता हूं, उसे एक प्रचलित शेर से बेहतर व्यक्त किया जा सकता है-
''वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोडऩा अच्छा।"इस फिल्मी गीत की पहली पंक्ति है- ''चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों।"
जीवन में संबंध बनते और बिगड़ते हैं, यह एक सच्चाई है। इसे स्वीकार कर नई स्लेट पर इबारत लिखना शुरू करना बेहतर होता है बजाय इसके अतीत को लेकर कुढ़ते रहें और बदला चुकाने के भाव से इस तरह के किस्से लिखें। खैर! इन किताबों को पढ़ते हुए मुझे एक अन्य पुस्तक ध्यान में आई। पी.वी. नरसिंहराव के प्रेस सलाहकार रहे पी.वी.आर.के. प्रसाद की पुस्तक का शीर्षक है ''Wheels Behind The Veil: Pms, Cms and Beyond" श्री प्रसाद किसी समय रायपुर के शासकीय विज्ञान महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे वे सेवानिवृत्ति के उपरांत हैदराबाद में रहते हैं और शायद इसीलिए दिल्ली के तौर-तरीके नहीं सीख पाए। उनकी पुस्तक दो साल पहले हैदराबाद से छपी और उसकी कोई चर्चा नहीं हुई। इसमें श्री प्रसाद ने श्री राव की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वे धीरूभाई अंबानी से भी अभिभूत हैं। इसका उल्लेख मैंने इसलिए किया कि देश के राजनीतिक इतिहास की एक अहम् कड़ी को हम बिल्कुल ही भूल न जाएं।

यूं तो पुस्तकें और भी हैं- जैसे जाविद चौधरी की ''The Insider's View: Memories Of A Public Servant"। श्री चौधरी गुजरात कैडर के अफसर थे। उनकी आत्मकथा देश के प्रशासनिक ढांचे और निर्णय प्रक्रिया आदि को समझने में वस्तुगत तरीके से मदद करती है। एक समय विदेश सचिव रहे जगत मेहता की जीवनी भी विदेश नीति एवं कूटनीतिक मसलों को समझने के लिए उपयोगी है, यद्यपि उनके अनेक विचारों से मेरी असहमति है। ये सब अभी दो-तीन वर्षों के भीतर प्रकाशित आत्मकथात्मक पुस्तकें हैं। यह देखना दिलचस्प है कि जिन किताबों में नेहरू, गांधी परिवार पर व्यक्तिगत आक्षेप किए गए हैं, उनका प्रचार और उनकी चर्चा कहीं अधिक हुई है। पाठक स्वयं समझ सकते हैं कि इसके क्या कारण हैं।

एक विधा के रूप में आत्मकथा पर चर्चा करते हुए दो पुस्तकें ऐसी हैं जिनका उल्लेख किए बिना बात पूरी नहीं हो सकती। ये पुस्तकें पन्ने रंगने के लिए नहीं लिखी गईं। उनका उद्देश्य न तो अपनी धाक जमाना था और न किसी को नीचे गिराना। ये ऐसी पुस्तकें हैं जो जीवन यात्रा में जगह-जगह पर हमारा मार्गदर्शन करती हैं। ये निष्कपट मन से लिखी गई हैं। इनमें बहुविध एवं प्रामाणिक अनुभव हैं और है विचारों की गहराई। महात्मा गांधी की ''सत्य के प्रयोग" तथा जवाहरलाल नेहरू की ''मेरी कहानी" ऐसी दो पुस्तकें हैं जो हर व्यक्ति को पढऩा चाहिए।
अक्षर पर्व सितम्बर 2014 में प्रकाशित प्रस्तावना