Wednesday, 28 May 2014

भारत और पड़ोसी देश



प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों सहित मॉरिशस के शासनाध्यक्ष के सम्मिलित होने का सब तरफ स्वागत हुआ है। यह माना गया कि श्री मोदी ने इन समकालीन नेताओं को आमंत्रित कर अपनी कूटनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया है। वे तमाम लोग जो चाहते है कि दक्षिण एशिया मेें शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का स्थायी वातावरण बने उन्हें नवनिर्वाचित भारतीय प्रधानमंत्री की इस पहल से आशा की एक किरण फूटती नज़र आती है।  जैसा कि पाठक जानते हैं कांग्रेस सहित अधिकतर विरोधी दलों ने इस पहल का स्वागत किया है। सच पूछें तो इसमें आलोचना की कहीं कोई बात ही नहीं है। यद्यपि यह सच्चाई अपनी जगह पर कायम है कि वह भारतीय जनता पार्टी ही थी जिसने पड़ोसी देशों खासकर पकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की पिछले दस साल की हर पहल का आक्रामक ढंग से विरोध किया था। जाहिर है कि सत्ता हासिल करने के साथ भाजपा को जमीनी हकीकतों से रूबरू होना पड़ रहा है।  यह संतोष का विषय है कि कम से कम इस मुद्दे पर मोदीजी ने इस सच्चाई को देखने से इंकार नहीं किया कि कोई भी देश अपने पड़ोसी नहीं बदल सकता।

यूपीए-1 और 2 के दौरान भी पड़ोसी देशों के साथ बेहतर वातावरण बनाने के लिए समय-समय पर पहलकदमी की गई थी। उस समय भाजपा के अलावा शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस, अन्नाद्रमुक और द्रमुक इत्यादि दलों ने भी हठीलेपन का परिचय दिया था। अब जब भाजपा की सरकार बन गई है तब भी तमिलनाडु के विभिन्न राजनीतिक दलों के अलावा शिवसेना ने भी श्री मोदी की पहल का अपने-अपने कारणों से विरोध किया। प्रधानमंत्री पर इस विरोध प्रदर्शन का कोई असर नहीं पड़ा क्योंकि भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है और जैसा कि मैंने 17 मई को लिखा था कि अब सरकार दबावमुक्त होकर निर्णय ले सकती है। इसलिए जयललिता शपथग्रहण में नहीं आईं तो उससे श्री मोदी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वाइको और उनके एमडीएमके के कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया तो वह भी व्यर्थ गया।  उद्धव ठाकरे ने पहले शपथ ग्रहण का बहिष्कार करने की धमकी दी, लेकिन जब उन्हें समझ आ गया कि वे कितने पानी में हैं तब उन्होंने अपना निर्णय वापिस ले लिया।

यहां तक तो सब ठीक है, लेकिन श्री मोदी ने एक जो साहसिक यद्यपि सांकेतिक पहल की है उसे सही अंजाम तक पहुंचाना कोई आसान काम नहीं है।  यह चूंकि नए प्रधानमंत्री द्वारा उठाया गया पहला महत्वपूर्ण कदम था इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्येता आने वाले दिनों में यह जानने को उत्सुक रहेंगे कि अपने पड़ोसी देशों के साथ बेहतर रिश्ते कायम करने की दिशा में नई सरकार कितना आगे बढ़ सकती है और कितनी हिम्मत का परिचय दे सकती है। इस बारे में आगे जो भी होगा, प्रेक्षक अटलबिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा को स्वाभाविक रूप से याद करेंगे। तब और अब के बीच एक पीढ़ी का फर्क आ गया है और यह दिलचस्प संयोग है कि पाकिस्तान में नवाज शरीफ एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन हैं। वाजपेयी- शरीफ वार्ता ने उस समय उपमहाद्वीप में एक नई आशा का संचार किया था, लेकिन पाकिस्तान का सैन्यतंत्र उस समय इसके विरोध में था तथा तब के सैन्यप्रमुख जनरल मुशर्रफ ने भारतीय प्रधानमंत्री को सैल्यूट करने या हाथ मिलाने से इंकार कर दिया था।

लाहौर बस यात्रा प्रसंग रेखांकित करता है कि सिर्फ अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं होते। दूसरी तरफ यह भी ध्यान देने योग्य है कि सिर्फ शक्ति प्रदर्शन से बात बनती नहीं है। भारत ने आण्विक परीक्षण किया तो पाकिस्तान ने उसका जवाब देने में देर नहीं की। जो बात विश्व के रक्षा विशेषज्ञ जानते थे वह खुलकर सामने आ गई कि दोनों देशों के पास संहारक आण्विक अस्त्र हैं। इसके बाद कारगिल का शीतयुद्ध, कुछ और समय बाद ऑपरेशन पराक्रम, इनसे भी न तो पाकिस्तान को कोई लाभ मिला और न भारत को। इसलिए पाकिस्तान के संदर्भ में यह नोट करना होगा कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की स्वागतेय भारत यात्रा के बावजूद दोनों देशों के बीच मीठे तो क्या कामकाजी संबंध बढ़ाने के रास्ते में बहुत सी बाधाएं हैं जिन्हें पार करना चुनौतीपूर्ण होगा।

हमारी समझ में प्रधानमंत्री मोदी को इस दिशा में आगे बढऩे के पूर्व प्रथम तो विपक्षी दलों को विश्वास में लेना होगा। पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर भाजपा पिछले वर्षों में जो जुमलेबाजी करते आई है, उसकी अब कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन विपक्ष यदि विरोध करना चाहे तो उसके सौ तरीके हैं।  ज्ञातव्य है कि राज्यसभा में भाजपा फिलहाल अल्पमत में है और अगर सत्तादल और विपक्ष के बीच कोई तालमेल स्थापित नहीं हो पाया तो सरकार को तकलीफ हो सकती है। इसके अलावा यह भी स्मरण रखना होगा कि पाकिस्तान में सत्तासूत्र वास्तविकता में सेना के हाथों में हैं तथा निर्वाचित सरकार के लिए उसकी उपेक्षा करना संभव नहीं है। हमारे दोनों देशों के बीच कड़वाहट के दो बड़े कारण हैं- पहला कश्मीर और दूसरा 1971 की हार का दंश।  फिर भारत और पाक दोनों में ऐसे सलाहकारों की बड़ी संख्या है जो किसी भी तरह की रियायत या लचीलेपन के लिए तैयार नहीं होते। भारत की बात करें तो विदेशमंत्री सुषमा स्वराज जिस स्वर में बात करेंगी क्या वही स्वर उनके राज्यमंत्री जनरल वी.के. सिंह का भी होगा? इन दोनों का स्वर यदि एक हुआ तो एनएसए प्रत्याशी अजीत डोभाल इत्यादि क्या उनसे सहमत होंगे?

पाकिस्तान के अलावा अन्य सार्क देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ करने की दिशा में इसी तरह की और अड़चनें हैं। श्रीलंका में महेन्द्र राजपक्ष ने सैन्य शक्ति के बल पर जाफना में तमिल टाइगर्स को खत्म तो कर दिया है, लेकिन इसमें मानवाधिकारों की जो अनदेखी की गई वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद का विषय बना हुआ है। श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहली व अल्पसंख्यक तमिलों के बीच जो खाई बहुत लंबे समय से बनी हुई है वह कहीं से भी पटती नज़र नहीं आती।  एक चन्द्रिका कुमारतुंग को छोड़ दें तो श्रीलंका में एक भी ऐसा शासन प्रमुख नहीं हुआ, जिसने तमिलों के प्रति सहानुभूति दर्शाई हो। इसका एक अन्य आयाम यह है कि तमिलनाडु में जिसकी भी सरकार हो वह श्रीलंका की संप्रभुता का अतिक्रमण कर जाफना के तमिलों का हर संभव समर्थन करती है। अगर जाफना में आत्मनिर्णय का अधिकार मान लिया जाए तो फिर कश्मीर में क्यों नहीं, इस द्वैत पर ध्यान देना वे जरूरी नहीं समझते।

बंगलादेश के साथ हमारे संबंध स्वाभाविक रूप से मधुर होना चाहिए। शेख हसीना ने इस दिशा में अपनी ओर से कभी कोई कमी नहीं की, लेकिन इसके चलते वे हमेशा खालिदा जिया व अन्य कट्टरपंथियों के निशाने पर रहीं। बंगलादेश की आर्थिक, भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है कि वहां के लोग स्वेच्छा से नहीं मजबूरी में रोजी-रोटी की तलाश में भारत आते हैं। अब यदि भाजपा बंगलादेशियों को वापिस खदेडऩे के अपने पुराने नारों पर कायम रही तो इससे शेख हसीना की स्थिति कमजोर पड़ेगी। तीस्ता जल संधि तथा ग्रामीण संकुलों का विनिमय जैसे कुछ रुके मुद्दे भी हैं जिन पर नरेन्द्र मोदी को ममता बनर्जी के साथ जूझना पड़ेगा। ऐसी ही कुछ स्थिति नेपाल में भी है। विश्व हिन्दू परिषद इत्यादि चाहेंगे कि नेपाल में हिन्दू राष्ट्र की पुर्नस्थापना  हो, जबकि वहां की नई पीढ़ी आगे निकल चुकी है। नेपाल के साथ नदीजल वितरण, आतंकवाद, नेपालियों को भारत में रोजगार जैसे मुद्दे भी हैं जिन पर नेपाल में भी एक राय नहीं है।

भारत के भूटान के साथ संबंध दोस्ताना है, लेकिन इस आकार में लघु देश में भी जनतंत्र दस्तक दे चुका है तथा हमें बदलते हुए समय का संज्ञान लेना ही होगा। अफगानिस्तान के साथ भी हमारे अच्छे संबंध हैं, लेकिन याद रखें कि हामिद करजई का कार्यकाल समाप्ति पर है। उनके जाने के बाद वहां की राजनीति में क्या बदलाव आएंगे इस पर भारत को सतर्क निगाह रखना होगी। वहां आंतरिक अशांति बनी हुई है तथा यह भय भी है कि अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद क्या होगा। कल को अगर अफगान सत्ता तालिबान के हाथ आती है तो भारत के प्रति उनका रुख क्या होगा। दक्षिण में मालदीव में भी स्थितियां सामान्य नहीं हैं। इस विराट फलक पर चीन की सक्रिय उपस्थिति भी आशंका को जन्म तो देती ही है। भारत और चीन के बीच पहले से बेहतर संबंध हुए हैं किन्तु यह भी हमें पता  है कि चीन सार्क देशों में लगातार अपनी पैठ बनाने में लगा हुआ है। इस सच्चाई के बरक्स भारत किस तरह शक्ति संतुलन कर पाएगा, यह देखना होगा।

एक आखिरी बात। श्री मोदी ने मॉरिशस के प्रधानमंत्री नवीन  रामगुलाम को आमंत्रित किया यह तो उचित था। किन्तु एक और पड़ोसी देश म्यांमार को भी न्यौता चला जाता तो बात पूरी बन जाती।


 
 देशबन्धु में 29 मई 2014 को प्रकाशित 

Wednesday, 21 May 2014

कुछ यात्रा चित्र : 2




मेरा
मन था कि बचपन के उस स्कूल को भी देखूं जहां गुरुजी खूबचंद मंडलोई ने मुझे पढ़ाया था। होशंगाबाद जिला लंबे समय तक समाजवादियों का गढ़ था तथा पिपरिया नगरपालिका में अध्यक्ष अमूमन समाजवादी ही हुआ करते थे। इसलिए नगरपालिका द्वारा संचालित स्कूल का नाम आज से चौसठ-पैसठ साल पहले जयप्रकाश प्राथमिक शाला रख दिया गया था, लेकिन मैं स्कूल नहीं देख सका और अब कभी देख भी नहीं पाऊंगा, क्योंकि स्कूल को जमींदोज कर दिया गया है और अब वहां एक शापिंग काम्पलेक्स का निर्माण चल रहा है। यह स्थिति सिर्फ पिपरिया की नहीं है। दो-तीन साल पहले में ग्वालियर गया था तो देखा कि मेरे हाई स्कूल के सामने जो कन्या माध्यामिक विद्यालय था उसे तोड़कर मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल ने वहां एक भव्य शापिंग काम्पलेक्स खड़ा कर दिया था। रायपुर में ही पिछले चार-पांच साल के दौरान शासकीय विज्ञान महाविद्यालय और शासकीय संस्कृत महाविद्यालय का भूगोल बदल कर रख दिया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार को रईसजादों के लिए स्वीमिंग पुल बनाने के निमित्त संस्कृत कॉलेज के  खुले मैदान से बेहतर और कोई जगह नहीं जंची। इसी तरह साइंस कॉलेज की छाती को चीरकर उस पर सड़क बना दी गई। जिनके बच्चे एयर कंडीशन निजी स्कूलों में बढ़ते हैं उन्हें आम जनता की सुख- सुविधा से क्या लेना देना?
0000
इधर पिछले कुछ दिनों में मैंने जो यात्राएं कीं उनमें बार-बार यही कड़वी सच्चाई सामने आई कि देश में विकास का मतलब सिर्फ सम्पन्न-सुविधाभोगी वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। आप रायपुर से दुर्ग चले जाइए। फोरलेन सड़क कार वालों के लिए तो ठीक है, लेकिन कुम्हारी, चरौदा, भिलाई-3 आदि बस्तियां दो हिस्सों में बंट गई हैं और किसी ने इस बात पर गौर नहीं किया कि बस्ती में रहने वाले सड़क पार कैसे करेंगे। यह समस्या राजमार्ग पर स्थित छोटी-मोटी बस्तियों की ही नहीं, महानगरों की भी है। दिल्ली, बंबई, हैदराबाद : अब जिस तरह से नगर नियोजन हो रहा है उसमें सामान्यजन की फिक्र किसी को नहीं। भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर कहीं-कहीं पैदल पुल बना दिए गए हैं, लेकिन बूढ़े और कमजोर लोगों के लिए पुल पर चढऩे-उतरने में कितना कष्ट हो सकता है इस ओर कोई गौर नहीं किया गया। योजना बनाने वाले भूल जाते हैं कि शहरों में लोग पैदल भी चलते हैं, सायकिल पर भी और वे रिक्शे की सवारी भी करते हैं !
0000
पिछले माह हैदराबाद गया तो वहां एक और बात समझ आई। अब देश के सारे बड़े और मशहूर शहर एक जैसे दिखने लगे हैं। कोई पन्द्रह साल पहले आगरा में एक ऐसा इलाका देखा था, जहां ज्यादातर विदेशी पर्यटक भोजन के लिए आते थे। वहां पिज्जा हट जैसे रेस्तरां खुल गए थे। बाकी आगरा वैसा ही था, जैसा जमाने से चला आ रहा था, लेकिन अब हैदराबाद हो या आगरा, लखनऊ हो या जयपुर, सर्वत्र विदेशी ब्रांड वाली हर तरह की दुकानें खुल गई हैं। बड़े शहरों की क्या बात, गोंदिया, बालाघाट तक में डोमिनो पिज्जा पार्लर हैं, मतलब यह कि अब आप कहीं भी जाएं सब तरफ आपको एक जैसे दृश्य और एक जैसी वस्तुएं मिलेंगी। पहले लोग यात्रा पर जाते थे तो मथुरा का पेड़ा या आगरे का पेठा, या भोपाल से जरी का बटुवा लेकर आते थे, बल्कि आस-पड़ोस के लोग याद दिलाते थे कि फलानी जगह से हमारे लिए फलाना सामान लेकर आना। अब इस सब की जरूरत खत्म हो गई हैं। कौन बोझा बढ़ाए, अपने शहर में भी सब कुछ मिल जाता है।
0000
विदेशी ब्रांड और विदेशी नाम देश में जिस तरह से छा गए उसे देखकर सचमुच आश्चर्य होता है। हैदराबाद में एक छोर पर सिंगापुर सिटी है, तो दूसरे छोर पर मलेशियन टाउनशिप। ये दोनों आज की भाषा में गेटेड कम्युनिटी हैं। याने चारदिवारी और चाक-चौबंद पहरेदार। इनके अलावा हर शहर में नए-नए  मॉल और मल्टीप्लेक्स बनते जा रहे हैं। बताते हैं कि मल्टीप्लेक्स में आधी कमाई तो दस रुपए की पानी बोतल चालीस रुपए में बेचने से होती है।  मॉल में देशी-विदेशी कंपनियों के रिटेल आउटलेट सजे हुए हैं, इनमें जो कपड़े, जूते आदि बिकते हैं वे सब लगभग एक जैसे, एक डिजाइन के सौ-सौ कमीज, सौ-सौ सलवार सूट आदि। ऐसा लगता है मानो स्कूल यूनीफार्म की दुकान में आ गए हों। फिर ग्राहकों को लुभाने के लिए तरह-तरह की स्कीमें हैं। हैदराबाद में सामान खरीद रहे हैं, चिंता की कोई बात नहीं, बोनस पॉइंट रायपुर के मॉल में हमारे आउटलेट पर भुना लीजिए। सब कुछ इतना एकरस कि बिल्कुल नीरस। घूमते-घूमते पैर दुखने लगते हैं, देखते-देखते आंखें थक जाती हैं, और मन ऊब जाता है।
0000
एक समय लोग हैदराबाद जाते थे तो पहले चारमीनार देखते थे, फिर सालारजंग म्युजियम, फिर गोलकुंडा का किला, लेकिन अब उनकी बात ही कोई नहीं करता। वहां के रहवासी सिफारिश करते हैं कि आपको रामोजी फिल्म सिटी अवश्य देखना चाहिए। हो सकता है कि किशोरों और युवाओं के लिए इसमें आकर्षण हो कि फिल्म की शूटिंग देख रहे हैं। यह भी शान के साथ बताया जाता है कि अब फिल्म सिटी में शादियां भी होने लगी हैं। याने अब सारा ध्यान नए किस्म के आकर्षणों पर है। और कुछ नहीं तो शमशाबाद स्थित राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय विमानतल ही देख लीजिए जो अपने आप में एक छोटे शहर से कम नहीं है। बहुत से व्यस्तजन तो विमानतल के पास स्थित बड़े होटल में अपनी बैठकें या सभाएं कर लेते हैं। सुबह के जहाज से उतरे, शाम के जहाज से घर वापिस। इस तरह हैदराबाद जैसे चार शहरों में बंट गया है- एक हवाई यात्रियों का, दूसरे साइबर जगत के निवासियों का, तीसरा राजधानी के हुक्मरानों का और चौथा आम जनता का।
0000
एक संक्षिप्त यात्रा बीते दिनों जगदलपुर तक की। यूं तो पहले साल में दो-तीन बार बस्तर जाना हो जाता था, लेकिन अब की बार मैं दो साल बाद वहां जा रहा था। मुख्य प्रयोजन था एक साहित्यिक कार्यक्रम में शरीक होना। बस्तर के कुछ युवा रचनाकारों ने 'बस्तर पाती' शीर्षक से साहित्यिक पत्रिका प्रारंभ की है। उसका लोकार्पण था। एक कस्बानुमा शहर से पत्रिका प्रकाशन होना अपने आप में प्रसन्नता का बायस था। मैं सोचता हूं कि हिन्दी में जितनी भी पत्रिकाएं निकलें कम हैं। हिन्दी भाषियों की जनसंख्या सत्तर करोड़ के लगभग होगी। वह भी एक विस्तृत भूभाग में फैली हुई। ऐसी कोई पत्रिका नहीं है जो हिन्दी समाज में चारों तरफ पहुंच सके। साहित्यकारों का भी एक-दूसरे से परिचय स्थापित होना कठिन काम है। अगर एक बड़ी पत्रिका निकल भी जाए तो उसमें कितने रचनाकारों को स्थान मिल सकता है? ऐसे में यह निहायत जरूरी है कि छोटे-बड़े केन्द्रों से पत्रिकाएं निकलें, उनमें स्थानीय या कि क्षेत्रीय लेखकों की रचनाएं छपें, अंचल से संबंधित अन्य विषयों पर भी प्रामाणिक जानकारी उसमें शामिल हो और इस तरह से पत्रिका क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक पहचान के रूप में सामने आए। ऐसी पत्रिकाओं के माध्यम से ही हिन्दी जगत में एकता के सूत्र विकसित हो सकते हैं।
0000
'बस्तर पाती के लोकार्पण में भाग लेना एक सुखद अनुभव था। इसमें जगदलपुर के अलावा आसपास के नगरों से भी साहित्यप्रेमी आए थे। यह पूरे दिन का कार्यक्रम था। पहले खंड में लोकार्पण, दूसरे खंड में एक परिचर्चा और अंत में कवि गोष्ठी। लोकार्पण के समय स्वाभाविक रूप से उपस्थिति अधिक थी, लेकिन शाम को आयोजन समाप्त होने तक अच्छी खासी संख्या में सुधीजन वहां उपस्थित रहे यह देखकर स्वाभाविक प्रसन्नता हुई। परिचर्चा में अनेक महिलाओं ने भी भागीदारी की जिससे पता चला कि दूर बसे जगदलपुर में भी किस रूप में साहित्यिक चेतना विद्यमान है।
0000
इस यात्रा के दौरान कुछ वर्ष पूर्व ही स्थापित बस्तर विश्वविद्यालय देखने का भी पहला अवसर आया। कुलपति डॉ. चन्द्रा ने मुझे व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित कर लिया था। मैंने ''हमारी साझा विरासत विषय पर अपनी बात रखी और वहां भी मुझे यह देखकर संतोष हुआ कि विद्यार्थियों और अध्यापकों के साथ-साथ नागरिक बंधुओं ने भी प्रश्नोत्तर में पर्याप्त दिलचस्पी दिखलाई। बहरहाल, इस प्रवास के दौरान मुझे यह जानकर तकलीफ हुई कि अब बस्तर में कोसा बनना लगभग बंद हो गया है। वहां चांपा से आए रेशम पर ही काम होता है। इसी तरह एक और चिंताजनक तथ्य की ओर ध्यान गया कि बस्तर के जो शिल्पकार थे वे धीरे-धीरे कर कारीगरों में तब्दील होते जा रहे हैं। बस्तर शिल्प एक बड़ा व्यवसाय बन गया है जिसके स्वामित्व का एक अंश भी उनके पास नहीं है। हां! इतना शायद हो कि पहले से कहीं ज्यादा मजदूरी उन्हें मिल रही है। आदिवासियों के जंगल और जमीन तो उनसे पहले ही छीन चुके हैं, सांस्कृतिक पहचान भी उनसे छिन रही है।
00000
और अंत में, मुझे सड़क मार्ग से यात्रा करने पर दो अड़चनों का जिक्र करना चाहिए। यूं तो अब कदम-कदम पर पेट्रोल पंप खुल गए हैं किन्तु मुझे जानकर हैरत हुई कि ज्यादातर पंपों पर डीजल ही उपलब्ध था, पेट्रोल नहीं। इसके पीछे क्या गणित है यह या तो पंप संचालक बता सकते हैं या तेल कंपनियों के अधिकारी। दूसरे इन रास्ते पर कहीं भी यात्रियों के लिए प्रसाधन की व्यवस्था नहीं है। इसमें महिला यात्रियों को निश्चित ही परेशानी होती है। ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि टोल-टैक्स नाके के बाजू में ही पेट्रोल पंप, कैफेटेरिया व प्रसाधन की व्यवस्था कर दी जाए। मैंने यह भी नोटिस किया कि पहले ढाबों में जितनी साफ-सफाई के साथ और जैसा स्वादिष्ट चाय-नाश्ता मिल जाता था, अब वह बात नहीं रही।

देशबन्धु में 22 मई 2014 को प्रकाशित








Tuesday, 20 May 2014

अब्बास और कृश्न चन्दर


 इस वर्ष जिन रचनाकारों की जन्मशती है उनमें से दो मेरे प्रिय लेखक हैं- ख्वाजा अहमद अब्बास व कृश्न चंदर। इनका स्मरण करते हुए यह भी ध्यान आता है कि इसी माह पं.जवाहरलाल नेहरू की पचासवीं पुण्यतिथि आएगी और सितंबर में गजानन माधव मुक्तिबोध की। आज के समय में इन्हें याद करना पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है और आवश्यक भी। ये सब एक नए भारत और एक नई दुनिया के न सिर्फ स्वप्नदृष्टा थे बल्कि इन्होंने अपना समूचा जीवन स्वप्न को यथार्थ में बदलने के लिए समर्पित कर दिया। पंडित नेहरू और मुक्तिबोध जी का जहां तक सवाल है, पिछले पचास बरस के दौरान उन पर लगातार चर्चाएं होती रही हैं, उन पर पुस्तकें लिखी गई हैं, उनके योगदान व इतिहास में उनके स्थान पर विश्लेषण भी अपनी-अपनी तरह से करने का प्रयत्न व्यापक स्तर पर हुआ है। इस वर्ष भी उन पर केन्द्रित आयोजन होंगे ही होंगे। मैं फिलहाल अपनी बात अब्बास साहब और कृश्न चंदर तक सीमित रखना चाहता हूं।

ख्वाजा अहमद अब्बास की जन्मशती पहले आएगी- 7 जून को। सत्तर के दशक में उनकी आत्मकथा ''आई एम नॉट एन आइलैण्ड" शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। इसके एक प्रसंग की मुझे धुंधली स्मृति है। युवा अब्बास तब की बंबई में ''बॉम्बे क्रॉनिकल" नामक अखबार के नौसिखिया रिपोर्टर थे और साइकिल की सवारी कर शहर के थानों में खबरें जुटाने के लिए जाया करते थे। उन दिनों थानों में टेलीफोन भी नहीं हुआ करते थे। अपने पत्रकार जीवन के प्रारंभिक दिनों का एक और प्रसंग उन्होंने लिखा था कि जब उन्होंने एक रिपोर्ट लच्छेदार भाषा में कई पन्नों में लिख डाली तो संपादक ने उसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया और उन्हें छोटी, फिर छोटी, फिर और छोटी रिपोर्ट बनाने के लिए कहा। यह उनके लिए एक सबक था कि पत्रकार को कम से कम शब्दों में अपनी बात कहने का अभ्यास होना चाहिए। बहरहाल उनकी आत्मकथा में जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित और प्रभावित किया वह पुस्तक का शीर्षक ही था।
सत्रहवीं सदी के प्रसिद्ध कवि जॉन डन की एक कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार है -

''नो मेन इज़ एन आइलैण्ड
एन्टायर टू हिमसेल्फ एवरी मेन इज़ ए
पार्ट ऑफ द होल"
श्री अब्बास ने इस कविता से प्रेरित होकर ही अपनी पुस्तक का शीर्षक रखा था। उन्होंने पुस्तक के पहले-दूसरे पन्ने पर इन पंक्तियों को उद्धृत भी किया था। ये अर्थ प्रगल्भ पंक्तियां मनुष्य जीवन की सार्थकता को परिभाषित करती हैं।

हमने स्कूल के दिनों में पढ़ा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होता है। यह कविता इस कहावत का मर्म खोलती है। संसार में कोई भी व्यक्ति द्वीप बनकर नहीं रह सकता। वह समष्टि का अंश है, अपने आप में संपूर्ण व स्वतंत्र नहीं। आज की दुनिया में जब वैयक्तिकता पर बहुत अधिक जोर दिया जा रहा है तब जॉन डन की यह कविता जीवन का दिशाबोध करवाती है। कहना न होगा कि ख्वाजा अहमद अब्बास का पूरा जीवन अपने आपको समष्टि का हिस्सा समझने में ही बीता। अपनी कलम और अन्य विधाओं के माध्यम से उन्होंने लगतार एक ऐसे समाज की रचना के लिए प्रयत्न किए जहां जन-जन के बीच भाईचारा, समता और सौहाद्र्र का भाव हो।


ख्वाजा अहमद अब्बास बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने एक पत्रकार के रूप में कैरियर की शुरूआत की और वे जीवन के अंतिम समय तक पत्रकारिता ही करते रहे, लेकिन इस बीच उन्होंने अन्य रचनात्मक विधाओं में भी अपनी प्रतिभा का भरपूर परिचय दिया। उन्होंने मुंबई के ही एक अखबार से ''द लास्ट पेज नाम से एक साप्ताहिक स्तंभ लिखना प्रारंभ किया था, जो बाद में चर्चित साप्ताहिक ब्लिट्ज में छपने लगा। यह कॉलम दोनों पत्रिकाओं में मिलाकर पचास साल से अधिक समय तक छपा। यह अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड है। लेकिन यहां रिकॉर्ड बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि न तो अब्बास की लेखनी की धार में इस सुदीर्घ अवधि में कोई कमी आई और न ही लोकप्रियता में। सप्ताह-दर सप्ताह पाठक कॉलम के छपने का बदस्तूर इंतजार करते रहे। एक पत्रकार के रूप में उनकी लेखन क्षमता का यह एक ज्वलंत प्रमाण था। पत्रकारिता के अलावा उन्होंने कहानियां लिखीं, फिल्मों की पटकथाएं भी, फिल्म भी बनाईं और नाटक भी लिखे। दरअसल यह तय करना मुश्किल है कि एक फिल्मकार के रूप में उनका योगदान बड़ा है या पत्रकार के रूप में!

अभी पिछले साल देश में भारतीय सिनेमा की शताब्दी मनाई गई। इस पृष्ठभूमि में उल्लेख करना मुनासिब होगा कि जिस पहली भारतीय फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति और सम्मान मिला उसके निर्माण से अब्बास जुड़े हुए थे। यह फिल्म 1946 में आजादी के एक साल पहले चेतन आनंद ने ''नीचा नगर" नाम से बनाई थी। इसकी पटकथा अब्बास ने लिखी थी। कार्लोवीवेरी अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए ''गोल्डन पाम" पुरस्कार मिला था। अब्बास साहब ने खुद भी फिल्में बनाई जिनमें ''शहर और सपना को 1964 की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए ''स्वर्ण मयूर"  प्राप्त हुआ था। इस फिल्म में उन लोगों की कहानी थी जो देश के दूरदराज के कोनों से रोजी-रोटी की तलाश में महानगर बंबई आते हैं अैार वहां हर मोड़ पर विपरीत परिस्थितियों से सामना करते हैं, किन्तु हार नहीं मानते। सच पूछें तो यह उनकी प्रिय थीम है जिसका परिचय उस हर फिल्म से मिलता है जिसके निर्माण से वे संलग्न रहे। पाठकों को यह पता ही है कि राजकपूर की अधिकतर फिल्मों से अब्बास साहब जुड़े हुए थे।

यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि ख्वाजा अहमद अब्बास वामपंथी विचारों के रचनाशिल्पी थे। इसलिए उनकी फिल्मों में एक ओर जहां मनुष्य जीवन की विसंगतियों और संघर्षों के वस्तुगत चित्र देखने मिलते हैं, वहीं वे इस आदर्श को लेकर आगे बढ़ती हैं कि अन्याय व शोषण के खिलाफ लड़ते हुए अंतत: विजय मनुष्यता की ही होगी। यह संदेश श्री-420 में है, बूटपालिश में है, 'जागते रहो में है और उनकी अन्य फिल्मों में भी। इसीलिए अगर एक ओर उनकी यह कहकर आलोचना की गई कि वे प्रचारात्मक फिल्में बनाते हैं, तो दूसरी ओर यह भी कहा गया कि राजकपूर की वे ही फिल्में अच्छी हैं जिनमें पटकथा अब्बास ने लिखी है। मुझे अभी ''जागते रहो" का ध्यान आ रहा है। रात के अंधेरे में किस तरह काला कारोबार पनपता है, किस तरह सफेदपोश लोग भी अपराधों में शामिल होते हैं इसका प्रामाणिक चित्रण इस फिल्म में हुआ था। एक रात में ही इस सारे गोरखधंधे को देखकर घबराया नायक बेचैन होकर भटकता-भागता है, लेकिन फिर अब्बास उसका हाथ थाम लेते हैं। मनुष्य जीवन में आशा हमेशा विद्यमान है- यह संदेश फिल्म के अंत में बहुत प्रभावी ढंग से हमें उस सुंदर गीत की पंक्तियों के साथ प्राप्त होता है- ''जागो मोहन प्यारे जागो, नवयुग चूमे नयन तुम्हारे...।"

27 मई 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ था। मैं इस तिथि को स्वतंत्र भारत की राजनीति के एक परिवर्तनकारी मोड़ के रूप में देखता हूं। यह बात फिर कभी। पंडित जी की मृत्यु के कुछ समय बाद अब्बास साहब ने एक नाटक तैयार किया- ''लाल गुलाब की वापसी"। इस नाटक का प्रदर्शन देश के अनेक नगरों में हुआ। वे इसे लेकर रायपुर भी आए। इस नाटक के माध्यम से उन्होंने यही कहा कि- सामाजिक न्याय, जनतंत्र और धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्य इस देश की मिट्टी में रचे-बसे हैं और भारतवासी अपने संविधान में निहित इन मूल्यों पर हमेशा चलते रहेंगे।

ख्वाजा अहमद अब्बास अपने समय में उर्दू के एक जाने-माने कथाकार भी थे, इस तथ्य को लगभग भुला दिया गया है। उनकी एक कहानी ''सरदारजी" विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखी गई थी। इसमें उन्होंने अपनी धर्मनिरपेक्ष सोच के अनुसार ही वर्णन किया था कि एक सिख नागरिक दंगा पीडि़त मुसलमानों को बचाते हुए अपनी जान से हाथ धो बैठता है। यह कहानी बरसों बाद कमलेश्वर ने सारिका में प्रकाशित की थी। उन दिनों पंजाब में उग्रवाद चरम सीमा पर था। इस कहानी का मर्म न समझने वाले लोगों ने अब्बास साहब पर सिख विरोधी होने का आरोप लगाया व लेखन व पत्रिका दोनों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। अब्बास साहब ने जब सार्वजनिक माफी मांगी तब मामला ठंडा पड़ा। मैंने उस समय उन्हें पत्र लिखा था कि उन्हें माफी नहीं मांगनी चाहिए थी। इसके उत्तर में उन्होंने मुझे लिखा कि कनाडा में उनके पौत्र को जान से मारने की धमकी दी गई है इसलिए वे माफी मांगने पर मजबूर हुए। आज उनकी जन्मशती पर इस कहानी को फिर से पढऩा और उसकी अन्तर्वस्तु को समझना समीचीन होगा।

कृश्न चंदर मूलत: उर्दू के लेखक थे, लेकिन वे हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में इतना छपे कि पाठकों को कभी इस सच्चाई का भान ही नहीं हुआ और वे उन्हें हिन्दी का लेखक ही मानते रहे। इसमें शायद कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि पचास व साठ के दशक में कृश्न चंदर भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक थे। उनके बाद अमृता प्रीतम का नाम लिया जा सकता है। कृश्न चंदर ने यूं तो ढेरों कहानियां, लघु उपन्यास और उपन्यास लिखे, लेकिन उनको सबसे ज्यादा लोकप्रियता हासिल हुई ''एक गधे की आत्मकथा" से। यह व्यंग्य उपन्यास 1963-64 के आसपास हाल-हाल में स्थापित हिन्द पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुआ था। कीमत थी मात्र एक रुपया। अनुमान ही लगाया जा सकता है कि पुस्तक की कितनी हजार प्रतियां बिकी होंगी! एक दौर था जब उर्दू जगत में तीन लेखकों का दबदबा था। सआदत हसन मंटो, राजेन्द्र सिंह बेदी और कृश्न चंदर। एक और लेखक का नाम इसी तिकड़ी के साथ जुड़ता है... अहमद शाह बुखारी का जो ''पतरस" के नाम से लिखा करते थे। श्री बुखारी इनमें वरिष्ठ थे। वे ऑल इंडिया रेडियो के डायरेक्टर जनरल थे और विभाजन के समय ही पाकिस्तान चले गए थे। इन तीनों लेखकों को रेडियो में लाने का श्रेय उनको ही जाता है। मंटो पाकिस्तान से भारत आए और फिर पाकिस्तान गए थे। उनकी जन्मशताब्दी भी पिछले साल मनाई गई थी।

उर्दू और पंजाबी के अनेक लेखकों की रचनाएं हिन्दी में लगातार छपी हैं। उन्हें पढ़कर समझ आता है कि इन भाषाओं में जो वाक् विदग्धता, वक्रोक्ति, हास्य का पुट और शब्दों का खिलवाड़ है वह ऐसा आस्वाद देती है जो हिन्दी साहित्य में सामान्यत: उपलब्ध नहीं है। हिन्दी ने गंभीरता का जो लबादा ओढ़ रखा है वह तो हरिशंकर परसाई को भी कथाकारों की पंक्ति से बाहर कर देता है, लेकिन उर्दू-पंजाबी के रचनाकारों को संभवत: इन्हीं गुणों के कारण अपार लोकप्रियता मिली है जिसका सबसे बड़ा प्रमाण कृश्न चंदर हैं। वे समाज में व्याप्त विसंगतियों, कुरीतियों, भ्रष्टाचार, धोखेबाजी, पाखंड, सफेदपोश अपराध, राजनीति के कुकर्म, सांप्रदायिकता इत्यादि का खेल-खेल में ही पर्दाफाश कर देते हैं। उनकी रचनाएं सिर्फ हंसाने और गुदगुदाने के लिए नहीं है बल्कि वे पाठक का अपने समय से साक्षात्कार कराती हैं।

मुझे कृश्न चंदर की जो पहली पुस्तक याद आती है वह है ''बावन पत्ते"। यह शायद उनका एकमात्र पूर्णाकार उपन्यास है, अन्यथा उनके बाकी उपन्यासों को लंबी कहानी की श्रेणी में भी रखा जा सकता है। ''बावन पत्ते" में उन्होंने बंबई के फिल्म जगत याने आज के बॉलीवुड में जो प्रपंच होते हैं उनका वर्णन किया है। याद रखिए कि लेखक उस दौर का बयान कर रहा है जब बॉलीवुड में आज जैसी बेहूदा और उटपटांग फिल्में नहीं बनती। इस उपन्यास में फिल्म के फाइनेंसर और प्रोड्यूसर किस तरह से कलाकारों का शोषण करते हैं, कैसे डायरेक्टर को अपने इशारों पर नचवाते हैं, कैसे अभिनेता और एक्स्ट्रा की विवशता का फायदा उठाया जाता है, ऐसी तमाम सच्चाइयों का वर्णन उपन्यास में हुआ था। इसी थीम पर उन्होंने बाद में एक-दो उपन्यास और भी लिखे। उनकी परवर्ती रचनाओं में हमें भारत के अभिजात समाज की तस्वीरें देखने मिलती हैं। इनमें कहीं नैनीताल का बोट क्लब है, कहीं महालक्ष्मी रेसकोर्स, कहीं हांगकांग में हीरों के तस्कर, तो कहीं बड़े-बड़े सटोरिए और जुए के अड्डे चलाने वाले लोग। इनके सामने दिखने वाले सभ्य-सभ्रांत जीवन के पीछे कितनी कुरूपता है पाठक उसे देख सकता है।

कृश्न चंदर की कुछ और रचनाएं महत्वपूर्ण हैं- जैसे- "हम वहशी हैं", "जब खेत जाग उठे" और "दादर पुल के बच्चे". दादर में मुंबई महानगरी की जगमगाहट के पीछे छुपे अंधेरे की कहानी है। इस उपन्यास की अंतिम पंक्ति ही पढ़ लीजिए- ''जीवन में अंतिम बार जब मैंने भगवान को देखा तो वे छ: वर्ष के एक अंधे, कमजोर बच्चे थे और शाम की लालिमा के ढलते सायों में दोनों हाथ फैलाए हुए रोते हुए पुल पर खड़े भीख मांग रहे थे।"

''हम वहशी हैं" कृश्न चंदर का कहानी संग्रह है। इसमें सात कहानियां हैं और विभाजन के दौर में हिन्दुस्तान का वर्णन करती हैं। इस संकलन की एक कहानी है- ''पेशावर एक्सप्रेस"। बंटवारे के बाद हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच आबादी का पलायन हो रहा है। हिन्दू और सिख पाकिस्तान से भागकर हिन्दुस्तान आ रहे हैं और मुसलमान हिन्दुस्तान छोड़कर पाकिस्तान की राह पकड़ रहे हैं। ऐसा माहौल है जिसमें किसी का किसी पर भरोसा नहीं है। पीढिय़ों के पड़ोसी एक-दूसरे के जान की ग्राहक हो गए हैं। जिस पेशावर एक्सप्रेस में अपनी जान की खैर मनाते लोग सवार हैं वह लाशों का बोझ ढोते हुए आपबीती सुना रही है। रामानंद सागर के उपन्यास ''और इंसान मर गया", खुशवंत सिंह के ''अ ट्रेन टू पाकिस्तान", भीष्म साहनी के ''तमस" और मंटों की ''टोबा टेकसिंह" जैसी कहानियों के समकक्ष ही इस कहानी को रखा जाना चाहिए।

कृश्न चंदर का उपन्यास ''जब खेत जागे" सुप्रसिद्ध शायर मखदूम मोइनुद्दीन को समर्पित है और तेलंगाना आंदोलन पर आधारित है। पुस्तक की भूमिका में कृश्न चंदर स्पष्ट लिखते हैं कि ''जब खेत जागे ऐसी ही क्रांतिकारी चेतना रखने वाले किसानों की कहानी है, जो अपनी धरती की रक्षा के लिए अत्याचारियों की हिंसा के विरुद्ध उठ खड़े होते हैं".  इस उपन्यास में कृश्न चंदर तेलंगाना आंदोलन को नष्ट करने के लिए विनोबा भावे द्वारा चलाए गए भूदान आंदोलन की खुली आलोचना करते हैं। दूसरी ओर वे उम्मीद करते हैं कि गांव के किसान और शहर के मजदूर मिल जाएं तो अन्याय और शोषण का सिलसिला रोका जा सकता है। उपन्यास का नायक राघव किसानों का नेतृत्व करते हुए फांसी पर चढ़ जाता है, लेकिन उपन्यास इस उम्मीद के साथ खत्म होता है कि उसका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।

कृश्न चंदर की कृतियों से गुजरते हुए हमें उनकी लेखनी के दो रूप देखने मिलते हैं- एक- जहां वे उस पारंपरिक शिल्प का सहारा लेते हैं जो हिन्दी के अपने मुहावरे के करीब बैठता है और दो- जहां वे उर्दू-पंजाबी की बिंदास शैली का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वे अपना वैचारिक आधार कहीं भी नहीं छोड़ते। ख्वाजा अहमद अब्बास और कृश्न चंदर दोनों के रचना संसार से गुजरते हुए यह सोचने पर मजबूर होता हूं कि एक वह दौर था जब लेखक कोरी साहित्यिक बहसों से आगे निकलकर जनसमाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने में अपना श्रेय मानता था और अब यह सोचकर मन उदास हो जाता है कि आज का लेखक अपने आप में कितना सिमट गया है कितना आत्ममुग्ध, कितना आत्मकेन्द्रित, कितना प्रचारप्रिय, कितना यशलोभी। ऐसे में अब्बास और कृश्न चंदर की जन्मशती किस रूप में मनेगी?
 अक्षर पर्व मई २०१४ में प्रकाशित

Sunday, 18 May 2014

विपक्ष : आत्ममंथन का समय


 भारतीय जनता पार्टी की विजय के बाद कांग्रेस व कुछ अन्य दलों ने अपनी हार पर आत्ममंथन करना प्रारंभ कर दिया है। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सही समय पर कदम उठाते हुए शनिवार को ही अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया। उसके बाद जदयू के अध्यक्ष शरद यादव ने साफ-साफ कहा कि बदले हुए हालात में वे लालूप्रसाद के साथ मतभेद समाप्त करने के लिए तैयार हैं। इस बारे में जो भी फैसला होगा, वह आज का अंक छपने के पहले ही पाठकों के सामने आ जाएगा। मैं नीतीश कुमार की उनकी पहल के लिए सराहना करता हूं। उन्होंने संदेश दिया है कि सत्ता से परे भी राजनीति होती है। अगर जदयू व राजद के बीच समझौता होता है तो वह भी स्वागतयोग्य होगा। सच पूछिए तो विभिन्न समाजवादी धड़ों के बीच व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की ही लड़ाइयां थीं। उनके बीच कोई नीतिगत मतभेद तो थे नहीं। यह सच्चाई मुलायम सिंह को भी समझ आ जाए तो बेहतर है। मेरा समाजवादी पार्टी के मित्रों से आग्रह है कि उन्हें अब लोहियावादी रास्ता छोड़कर आचार्य नरेन्द्रदेव व आचार्य कृपलानी जैसों के बताए पथ पर चलना चाहिए जहां व्यक्तिगत कुंठा की नहीं, बल्कि विचारों की राजनीति हो सकती है।

भाकपा और माकपा से चुनावी नतीजों के विश्लेषण और आत्ममंथन के बारे में भी अभी तक कोई खबर सुनने में नहीं आई है। जिस दिन पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथी मोर्चे को धराशायी किया था उस दिन मेरा अनुमान था कि माकपा महासचिव प्रकाश करात नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपना पद छोड़़ देंगे, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ। आज फिर दोनों पार्टियों के सामने विचार करने का अवसर है कि वे मतदाताओं के दिल में जगह बनाने में बार-बार क्यों फेल हो रहे हैं। यह ठीक है कि वामदल सत्ता की राजनीति नहीं करते, लेकिन इस तर्क को बहुत लंबा नहीं खींचा जा सकता। जब आप चुनाव राजनीति में भाग ले रहे हैं और बरसों-बरस प्रादेशिक सत्ता पर काबिज रहे तब कहीं न कहीं तो नैतिक जिम्मेदारी का मामला बनता ही है।

बहुजन समाज पार्टी को भी इस बार भारी निराशा हाथ लगी है। लेकिन जहां मायावती ही प्रथम एवं अंतिम नेता हों, वहां कौन तो इस्तीफा देगा और कौन आत्ममंथन करेगा? कांशीरामजी ने बहुत मेहनत से, बहुत धीरज से पार्टी को खड़ा किया था और दलित समाज में उसके माध्यम से स्वाभिमान व समर्थता का बोध जाग्रत किया था। यदि बसपा अपने आपको फिर से खड़ा नहीं कर पाई तो यह एक दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना होगी। इससे सदियों से चली आ रही रूढि़वादी मानसिकता को और पुष्ट होने का अवसर मिलेगा। मायावती ने अपने मुख्यमंत्री काल में निश्चित रूप से कुछ क्षेत्रों में प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया था, आज उसकी जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है। मायावती को एक बार फिर दलित समाज के बीच जाकर अपनी पैठ बनानी होगी। उन्हें इस बात की प्रतीक्षा नहीं करना चाहिए कि दलित समाज का भाजपा से मोहभंग होगा और वे उनके पास अपने आपसे लौटकर आएंगे। हम मायावती की कार्यप्रणाली के बारे में ज्यादा नहीं जानते इसलिए बस इतना कह सकते हैं कि कांग्रेस पर या अन्य किसी पर दोष मढऩे के बजाय वे इस वक्त आत्मपरीक्षण करें।

कांग्रेस में भी सुनने आ रहा है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ने ही पार्टी पद छोडऩे की इच्छा जाहिर की है।  मुझे लगता है कि आज की कठिन परिस्थिति में उन्हें यह कदम नहीं उठाना चाहिए। यह संभव है कि स्वास्थ्य संबंधी कारणों से सोनिया गांधी आने वाले दिनों में कोई सक्रिय भूमिका निभाने के लिए अनिच्छुक हों, लेकिन कांग्रेस का जैसा आंतरिक ढांचा है उसमें राहुल गांधी की उपस्थिति आवश्यक है। मैंने पिछले दो सालों में दो-तीन बार यह लिखा है कि राहुल गांधी संभवत: प्रधानमंत्री पद के इच्छुक नहीं हैं। मेरा अपना अनुमान था कि कांग्रेस की जीतने की स्थिति में वे प्रधानमंत्री नहीं बनते। यह बात अलग है कि मीडिया ने बार-बार राहुल को नरेन्द्र मोदी के प्रतिस्पर्धी के रूप में खड़ा कर उनका उपहास करने की कोशिश की और यह सिलसिला कांग्रेस के हार जाने के बाद भी चल रहा है। ऐसे में राहुल को रणछोड़दास नहीं बनना चाहिए। वे बार-बार अपनी दादी का जिक्र करते हैं तो उन्हें अवश्य ही यह पता है कि 1977 की हार, शाह आयोग, लोकसभा की सदस्यता समाप्त होने और जेल भेजने जैसी विपरीत परिस्थितियों का उन्होंने डटकर मुकाबला किया व 1980 में विजयी होकर वापिस लौटीं।

राहुल गांधी के पास फिलहाल अवसर है कि वे शांतचित्त होकर कांग्रेस की हार का विश्लेषण कर सकते हैं और आने वाले समय के लिए स्वयं अपनी भूमिका परिभाषित करने के साथ अपनी पार्टी के लिए भी एक नई कारगर रणनीति बना सकते हैं। इसके लिए उन्हें क्या करना होगा। शायद सबसे पहले राहुल को यह देखना चाहिए कि पहले जो गल्तियां हुईं उसके क्या कारण थे? मेरी समझ में उत्तर नेहरू युग में कांग्रेस ने तीन बड़ी गलतियां कीं। पहली, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट का विपरीत फैसला आने  पर इंंदिरा गांधी ने इस्तीफा नहीं दिया। वे अगर उस दिन प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ जगजीवनराम या अन्य किसी वरिष्ठ सहयोगी को प्रधानमंत्री बना देतीं तो इससे उनकी प्रतिष्ठा कई गुना बढ़ जाती। यह सब जानते हैं कि एक बहुत छोटे तकनीकी बिन्दु पर उनका चुनाव निरस्त हुआ था तथा उच्च न्यायालय का फैसला बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने पलट दिया था। वह एक पल था जहां इंदिरा गांधी चूक गईं।

कांग्रेस ने दूसरी बड़ी गलती तब की जब 1987 में हरियाणा के चुनाव हारने के बाद राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया। तब 'देशबन्धु' ने अपने अग्रलेख में उन्हें पद छोडऩे की सलाह दी थी। उस दिन संयोग से राजीव गांधी की रायपुर में सभा होने वाली थी वह निरस्त हो गई। अग्रलेख पढ़कर सुबह-सुबह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दिग्विजय सिंह और अनेक कांग्रेसी मुझे उलाहना देने घर आए कि आपसे ऐसे संपादकीय की उम्मीद नहीं थी। मेरा उत्तर था कि हम आपके शुभचिंतक हैं इसीलिए ऐसा कह रहे हैं। आज यदि राजीवजी इस्तीफा देकर नए चुनाव की सिफारिश कर दें तो कुछ घटी हुई सीटों के साथ सही कांग्रेस को फिर बहुमत मिल जाएगा। स्पष्ट है कि न तो नेताओं को हमारी सलाह पसंद आई और न ही ये बात राजीव गांधी तक पहुंच पाई।

तीसरी बड़ी गलती उस समय हुई जब टीवी चैनलों पर दिन-रात यूपीए सरकार की भ्रष्टाचार के किस्से बखाने जाने लगे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस्तीफा नहीं दिया। दुर्भाग्य से पार्टी के अधिकतर प्रवक्ता वकील हैं तो सबके सब ''लॉ विल टेक इट्स ओन कोर्स' याने कानून अपना काम करेगा कहकर अपने नैतिक दायित्व से पल्ला झाड़ते नज़र आए। मैं डॉ. सिंह की मन:स्थिति को समझ सकता हूं कि मैदानी राजनीति से उनका कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन आसन्न खतरे को वे सोनिया गांधी भी क्यों नहीं समझ पाईं जो लगातार जनता के बीच जाती रही हैं। क्या वे डॉ. सिंह को इस्तीफा देने की सलाह सौजन्य के वशीभूत होकर नहीं दे रही थीं या फिर उनके अपने सलाहकार उन्हें कोई दूसरी ही तस्वीर समझा रहे थे?

पिछले तीन सालों के दौरान देश के विभिन्न प्रांतों में अनेक वरिष्ठ कांग्रेसजनों के साथ मेरी निजी चर्चाएं हुईं। इन सबका कहना था कि सोनिया गांधी से उन्हें भेंट के लिए समय ही नहीं मिलता। सोनिया गांधी नहीं तो राहुल के साथ भेंट होने में क्या अड़चन थी? तो बताया गया कि वे भी लोगों से नहीं मिलते। मैं इसका एक ही अर्थ निकालता हूं कि सोनिया और राहुल के इर्द-गिर्द कुछ ऐसे लोग जमा हो गए थे जो पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं से मिलने से रोकते थे अन्यथा सोनिया, राहुल, प्रियंका तीनों का स्वभाव कुछ ऐसा है कि वे जनता के बीच जाकर प्रफुल्लता का अनुभव करते हैं। इसी बिन्दु पर आकर आज राहुल गांधी को कुछ कड़े कदम उठाने की जरूरत है, यदि वे कांग्रेस के अच्छे दिन लौटने की उम्मीद करते हैं।

यह बहुत अच्छा हुआ कि बहुत सारे कांग्रेसी तो हवा का रूख देखकर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में चले गए। अब यह नरेंद्र मोदी का सिरदर्द है कि उनसे कैसे निपटते हैं। बहुत से नाकारा कांग्रेसी चुनाव हार भी गए हैं। इन्हें नाकारा कहना गलत होगा। असल में इनकी सारी काबलियत सिर्फ अपनी स्वार्थपूर्ति तक सीमित है जिसे देर-सबेर मतदाताओं ने पहचान ही लिया। इस तरह राहुल गांधी के पास एक अच्छा मौका है कि वे नई पीढ़ी के ऊर्जावान कांग्रेसियों को लेकर नए सिरे से अपनी टीम का गठन करें। दरअसल यूपीए-1 में भी कांग्रेस ने एक गलती की थी कि युवाओं को मनमोहन सरकार में जगह नहीं दी गई। इनमें से भी कुछ लोग हाल के चुनावों में हार चुके हैं, लेकिन राहुल को इनके साथ मिलकर एक मजबूत टीम बनाना चाहिए। सचिन पायलट, मीनाक्षी नटराजन, जितेन्द्र प्रसाद, आरपीएन सिंह इत्यादि नाम यहां ध्यान आते हैं। लेकिन इसके साथ-साथ यह परम आवश्यक है कि दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद, अजीत जोगी, सुशील कुमार शिंदे इत्यादि नेताओं को घर पर रहकर आराम करने की सलाह दी जाए। दिग्विजय सिंह और अजीत जोगी चाहे जितने वाकपटु हों, लेकिन आम जनता की छोडि़ए, स्वयं कांग्रेसी उनके उद्गारों से बेचैनी अनुभव करने लगे हैं। ऐसे नेता जिनका वाणी पर संयम न हो और जिनके वचनों पर विश्वास न बैठता हो वे पार्टी का नुकसान ही कर सकते हैं।  

राहुल गांधी को नई टीम बनाने के अलावा सघन जनसंपर्क करने की भी आवश्यकता है। उन्हें चाहिए कि दिल्ली से बाहर निकलें, पूरे देश का दौरा करें, जगह-जगह लोगों से मिलें, जनता के साथ नए सिरे से संवाद स्थापित करें और मीडिया से मिलने में परहेज न करें। हां, वे मनीष तिवारी, अभिषेक मनु सिंघवी व संजय झा जैसे प्रवक्ताओं को भी थोड़ा आराम करने का मौका दें। अगले कदम के रूप में उन्हें समानधर्मा पार्टियों के साथ मिलकर एक साझा कार्यक्रम बनाना चाहिए। अगर वे ऐसा कर सके तो अगले एक साल के भीतर जो विधानसभा चुनाव होंगे उनमें कांग्रेस को सफलता मिलने की उम्मीद बन सकती है!

देशबन्धु में 19 मई 2014 को प्रकाशित 

प्रधानमंत्री मोदी: प्रारंभिक चुनौतियॉं



नवनिर्वाचि
त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि राजनीति में कोई दुश्मन नहीं होता। केवल प्रतिस्पर्धा होती है। यह बात उन्होंने समयानुकूल की है और वास्तव में उनके द्वारा ऐसा कहे जाने की आवश्यकता थी। इसलिये कि सोलहवीं लोकसभा के चुनाव अभियान में मर्यादा और शिष्टाचार को पूरी तरह से ताक पर रख दिया गया था। इस बार के चुनावों में जिस तरह से व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप लगाये गये थे वैसा पहले कभी नहीं देखा गया था और हमें यह कहने में संकोच नहीं है कि इसका दोष मुख्यत: श्री मोदी और उनकी पार्टी का ही था। श्री मोदी ने स्वयं भी अपनी ओर से विरोधियों पर निजी वार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यहां तक कि उन्होंने बीच-बीच में चुनाव आयोग की न सिर्फ आलोचना की बल्कि उसे धमकी भी दी। आज जब श्री मोदी चुनाव जीत चुके हैं तब वे शायद यह पुनर्विचार कर रहे होंगे कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्र चिन्ह लगाकर उन्होंने भूल तो नहीं की थी!

बहरहाल नरेन्द्र मोदी द्वारा अहमदाबाद की अभिनंदन सभा में दिये गये इस वक्तव्य के बाद उनके अति उत्साही समर्थकों को भी अब थोड़ा शांत हो जाना चाहिये। विजय के उल्लास में अगर वे मर्यादा का पालन नहीं करेंगे तो इससे उनकी साख में कमी आयेगी। मैं देख रहा हूँ कि सोशल मीडिया में सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी पर अभद्र टिप्पणियों, अपशब्दों व कटाक्षों का अनवरत सिलसिला चला हुआ है। ऐसा करके उन्हें किस आनंद की प्राप्ति हो रही है यह समझ से परे है। भारतीय संस्कृति के झंडाबरदारों को याद रखना चाहिए कि महाभारत युद्ध भी सूर्यास्त के बाद रोक दिया जाता था। अश्वत्थथामा ने रात के समय पांडवों के खेमे में प्रवेश कर द्रौपदी के पुत्रों को मारा था जिसके फलस्वरूप उसकी आत्मा आज भी भटक रही है, ऐसा माना जाता है। मतलब यह है कि राजनैतिक लड़ाई में भी एक सीमा होती है जहां आकर हर एक को रुक जाना चाहिये।

श्री मोदी व भारतीय जनता पार्टी के लोगों को इस समय पूरा हक है कि वे जीत की खुशियाँ मनाएं, आतिशबाजी चलाएं, मिठाई बांटें लेकिन दो-चार दिन में ही सत्तारूढ़ दल को शासन की कठोर वास्तविकताओं का सामना करना पड़ेगा। भाजपा ने जनता के मन में ढेर सारी उम्मीदें जगायीं हैं। अब उन्हें इन उम्मीदों को पूरा करने के लिये नीतियां व कार्यक्रम बनाने पड़ेंगे व उन्हें लागू भी करना होगा। एक तो मोदीजी ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना दिखलाया है। यह एक ऐसा वादा है जिस पर अमल करना बेहद कठिन क्या, लगभग असंभव है। लोकपाल वगैरह से भी इसमें कुछ ज्यादा होना जाना नहीं है। श्री मोदी शायद इतना तो कर सकते हैं कि केन्द्र सरकार के कामकाज में भ्रष्टाचार सीमित हो जाये लेकिन जिन मंत्रियों, अधिकारियों व बाबूओं पर सरकार चलाने की जिम्मेदारी है, क्या रातों-रात उनका हृदय परिवर्तन हो जायेगा? जिन कार्पोरेट घरानों ने श्री मोदी पर दांव लगाया है, क्या वे अपने समर्थन की कीमत नहीं वसूलेेंगे? फिर प्रदेशों के स्तर पर जो भ्रष्टाचार व्याप्त है उसे कौन दूर करेगा?

जीत की खुशी में इस तथ्य को नहीं भूलना चाहिये कि भाजपा से ही श्री येदियुरप्पा व श्री श्रीरामलु जैसे उम्मीदवार जीत कर आये हैं। कांग्रेस से भी महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने जीत दर्ज की है जिन्हें आदर्श घोटाले के कारण पद छोडऩा पड़ा था। यह तो दो-तीन नाम याद आ गये लेकिन इनके जैसे और भी बहुत से लोग चुने गये हैं जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। इसी क्रम में यह भी ध्यान दें कि कितने सारे दलबदलू मोदीजी की कृपा से चुनाव जीते हैं। जैसे होशंगाबाद से राव उदय प्रताप सिंह, भिंड से भागीरथ प्रसाद, बाड़मेर से कर्नल सोनाराम, डुमरिया गंज से जगदम्बिका पाल इत्यादि। ऐन चुनाव के समय पार्टी बदलने वाले इन लोगों को अवसरवादी ही कहना होगा तथा उनके ऐसा करने का मकसद यही था कि जहाँ मलाई मिल रही है वहाँ चले चलो। जाहिर है कि भ्रष्टाचार दूर करना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी।

श्री मोदी के सामने दूसरी बड़ी चुनौती मंहगाई कम करने की है। मेरा सामान्य ज्ञान कहता है कि मंहगाई दो तरह से है। एक तो खाद्यान्न की मंहगाई, दूसरी अन्य जरूरतों की - जिसमें बच्चों की शिक्षा, मोबाईल फोन, बाइक का पेट्रोल आदि शामिल है। खाद्यान्न की कीमतें बढऩे का एक बड़ा  कारण किसानों को बेहतर समर्थन मूल्य मिलना है। पिछले सालों में गेहूं, चावल आदि जिन्सों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में लगातार वृद्धि हुई है जिसके कारण अनाज मंहगा हुआ है। अब सरकार समर्थन मूल्य तो घटा नहीं सकती तब खाद्यान्न पर सब्सिडी देना ही एक विकल्प दिखाई देता है। देखना यह होगा कि क्या केन्द्र सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली में वांछित सुधार ला सकती है। फिर इस सब्सिडी का बोझ कितना होगा व वह कैसे पूरा किया जायेगा? याद रखें कि सस्ते अनाज के कारण छत्तीसगढ़ जैसे उच्च राजस्व प्राप्ति वाले प्रदेश पर भी भारी कर्ज लद गया है।

जहॉं तक खाद्यान्नेतर वस्तुओं और सुविधाओं से मंहगाई का सवाल है इस में भी पेचीदगी है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में पिछले 25 सालों में लगातार शिक्षा और स्वास्थ्य याने दो अत्यंत जरूरी सेवाओं में निजीकरण बढ़ता जा रहा है। निजी क्षेत्र के स्कूलों व अस्पतालों को न तो बंद किया जा सकता है और लाख कोशिशें की जायें उन पर कोई नियंत्रण भी संभव दिखाई नहीं देता है। आज के समय में बाइक व मोबाईल फोन शान की नहीं, एक तरह से दैनंदिन जीवन की आवश्यकता बन चुकी है। इसके अलावा उपभोग की ललचाने वाली नई-नई सामग्रियाँ बाजार में आ गई हैं। इनके कारण परिवारों का बजट जिस तरह बिगड़ रहा है क्या उसे सरकार संभाल सकती है? इसी तरह दो अन्य बिंदु विचारणीय हैं। एक तो देश को अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत पेट्रोलियम आयात करना पड़ता है। याने इसके भावों में वृद्धि पर सरकार का कोई नियंत्रण हो ही नहीं सकता। दूसरे मनमोहन सरकार ने सातवां वेतन आयोग स्थापित कर दिया है। इसकी सिफारिशें जिस दिन आयेंगी, कहर बरपा हो जायेगा। वेतन आयोग से सिर्फ कुछ लाख सरकारी कर्मचारियों को फायदा होता है लेकिन उससे जो मंहगाई बढ़ती है उसका खामियाजा न्यूनतम आय वर्ग को भी भुगतना पड़ता है। क्या श्री मोदी सातवें वेतन आयोग को समाप्त करने का निर्णय ले सकेंगे?

श्री मोदी के सामने तीसरी बड़ी चुनौती बेरोजगारी दूर करने की है। इसका वायदा भी उन्होंने जगह-जगह किया है। आने वाले दिनों में हम देखना चाहेंगे कि नये प्रधान मंत्री इस मोर्चे पर क्या कर दिखाते हैं? यदि उद्योगों को देखें तो वहां रोजगार के नये अवसर बेहद कम हैं। नई से नई तकनीकी से काम होता है जिसमें श्रमिकों की न्यूनतम आवश्यकता पड़ती है। इसके अलावा कारखानेदार हमेशा सस्ती मजदूरी पर काम करवाना चाहते हैं। भारत के उद्यमी इसीलिये चीन जाकर कारखाने डाल रहे हैं।

उद्योग लॉबी अभी से बहुत सारे श्रमिक सुरक्षा कानूनों को खत्म करने की मांग कर रही है। यही लॉबी श्री मोदी की सबसे मजबूत समर्थक है। ऐसे में यह द्विविधा स्वाभाविक ही होगी कि उद्योगों की मांगें किस हद तक मानी जायें? सरकार सड़कें और भवन निर्माण आदि की बड़ी योजनाएं हाथ में लेकर रोजगार के नये अवसरों का बड़ी मात्रा में सृजन कर सकती है, लेकिन भाजपा सरकार यह काम निश्चित रूप से निजी क्षेत्र की भागीदारी में ही करेंगी। ऐसे में जो रोजगार मिलेगा वह कितना पर्याप्त और संतोषदायी होगा इस बारे में शंका होती है। फिलहाल हम अपनी बात यहीं रोक रहे हैं। अन्य चुनौतियों की बात आगे करेंगे।
देशबन्धु में 18 मई 2014 को प्रकाशित
 

Friday, 16 May 2014

नरेन्द्र मोदी की प्रामाणिक जीत




सोलहवीं
लोकसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने प्रामाणिक व असंदिग्ध रूप से जीत हासिल की है तथा कांग्रेस को शोचनीय ढंग से पराजय का सामना करना पड़ा है। भाजपा (जनसंघ) के बासठ साल के जीवन में यह पहला अवसर है जब उसे ऐसा स्पष्ट जनादेश प्राप्त हुआ है। जबकि कांग्रेस को इतनी कम सीट मिलना आश्चर्यजनक ही नहीं, अप्रत्याशित भी है। पहली नज़र में ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में सामने करने की जो रणनीति बनाई यह जीत उसका परिणाम है। श्री मोदी को एक कुशल प्रशासक व एक दृढ़निश्चयी नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसका लाभ इस जीत के रूप में मिला। दूसरी तरफ कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों ने श्री मोदी को रोकने के लिए जो भी दांव चले वे एक के बाद एक उल्टे पड़ते गए। इसके साथ यह ध्यान देने योग्य है कि नरेन्द्र मोदी को देश के कारपोरेट घरानों का व पूंजीमुखी मीडिया का भी खुला समर्थन मिला। संघ के सदस्यों ने भी पूरे उत्साह के साथ रणनीति के तहत काम किया एवं कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी।

कांग्रेस की जो दुर्गति हुई है उसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार है, ऐसा कहना गलत नहीं होगा। हमने पिछले सालों में बार-बार कहा है कि कांग्रेस जब हारती है तो हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाती है कि जनता खुद-ब-खुद किसी दिन उसके पास आएगी और गद्दी सौंप देगी। और जब जीतती है तो उसके नेताओं का अहंकार सिर चढ़ कर बोलने लगता है।  यूपीए-1 और यूपीए-2 की तुलना करें तो यही समझ आता है कि 2009 की जीत के बाद कांग्रेस के अहंकार की मानो कोई सीमा ही नहीं रही थी। 2010-2011 में भ्रष्टाचारों के अभूतपूर्व प्रकरण सामने आने पर हमने एकाधिक बार लिखा था कि डॉ. मनमोहन सिंह को नैतिकता के आधार पर प्रधानमंत्री पद छोड़ देना चाहिए, लेकिन वैसा नहीं हुआ। इसके अलावा न कांग्रेस अध्यक्ष और न प्रधानमंत्री दोनों ही ने जनता के साथ सीधे संवाद करने की, यहां तक कि पत्रवार्ता करने की, कोई जरूरत समझी। कुल मिलाकर वे अपने ही बनाए घेरे में कैद होकर रह गए, जिसकी पहरेदारी कुछ चाटुकार कांग्रेसी करते रहे। परिणाम सामने है।

नरेन्द्र मोदी की ऐतिहासिक जीत के तीन प्रमुख तथ्य दिखाई देते हैं। एक तो ये चुनाव संसदीय प्रणाली के बजाय राष्ट्रपति प्रणाली की शैली में हुए हैं। ऐसा पहली बार हुआ। पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों में भी कद्दावर छवि के नेता हुए, लेकिन श्री मोदी ने जिस तरह पार्टी को अप्रासंगिक बना दिया वैसा पहली बार हुआ। इससे आशंका उपजती है कि आगे चलकर कहीं संविधान संशोधित करने की बात तो नहीं होगी! यह तथ्य गौरतलब है कि देश के सबसे बड़े प्रांत उत्तरप्रदेश में नरेन्द्र मोदी ने चुनाव की कमान किसी स्थानीय नेता के बजाय अपने विश्वस्त अमित शाह को दी। इसके अलावा उन्होंने पार्टी के पुराने अनुभवी नेताओं की एक तरह से लगातार अनसुनी की और यह सिद्ध किया कि वे अपनी मर्जी के मालिक हैं। दूसरे शब्दों में चुनाव व्यक्ति-केन्द्रित सिद्ध हुए। दूसरे, युवा मतदाताओं ने नरेन्द्र मोदी की बदलाव लाने की क्षमता पर विश्वास करते हुए उन्हें भरपूर समर्थन दिया। कहना होगा कि कांग्रेस युवा पीढ़ी की भावनाएं समझने में असफल हुई।

तीसरे, श्री मोदी ने प्रसार माध्यमों व सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया। यह काम बहुत योजनाबद्ध तरीके से हुआ। कांग्रेस ने इसका जवाब देने की कोशिश की, लेकिन आधे-अधूरे ढंग से। कांग्रेस के प्रवक्ता आत्मुग्धता की स्थिति से बाहर नहीं निकल पाए। मोदी टीम के आक्रमणों का जवाब विचार और भाषा दोनों स्तर पर कैसे दिया जाए यह उनको आखरी तक समझ नहीं पड़ा। कांग्रेस से सहानुभूति रखते हुए इतना जरूर कहा जा सकता है कि समाचार चैनलों ने उसका साथ नहीं दिया। यूं इसमें शिकायत की कोई बात नहीं होना चाहिए। चैनल को अधिकार है कि वह अपनी इच्छा से किसी पार्टी या दल का समर्थन या विरोध करे, लेकिन फिर उसे निष्पक्षता का नाटक नहीं करना चाहिए।

बहरहाल, 1984 के बाद याने पूरे तीस साल बाद कोई एक पार्टी पूर्ण बहुमत लेकर लोकसभा में आ रही है। यह किसी हद तक संतोषदायक है। भाजपा को अथवा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अब अपनी नीतियों और सिद्धांतों के अनुसार दैनंदिन निर्णय लेने में सुविधा होगी व समर्थक दलों के हस्तक्षेप अथवा भयादोहन (ब्लैकमेल) की आशंका नहीं रहेगी। चूंकि भाजपा ने एनडीए के बैनर तले चुनाव लड़ा था इसलिए सरकार में सहयोगी दलों का प्रतिनिधित्व तो रहेगा, किन्तु अनुचित दबाव की क्षमता नहीं होगी। यह अवसर भी बीस साल बाद आया है कि क्षेत्रीय दल अपने प्रदेश के  बाहर और अपने को मिले जनादेश के बाहर जाकर व्यर्थ की उलझनें खड़ी करने की स्थिति में नहीं होंगे। (ममता बनर्जी जैसे उद्धत नेता का स्मरण यहां अनायास हो आता है।) क्या आज के नतीजों से द्विदलीय राजनीतिकी बुनियाद पड़ेगी? अभी कुछ नहीं कहा सकता।

आज वामपंथी दलों व आम आदमी पार्टी के रोल की भी चर्चा कर लेना चाहिए। यह स्पष्ट दिख रहा है कि 'आप के कारण कांग्रेस को कई जगहों पर सीधे-सीधे नुकसान उठाना पड़ा है। यूं तो इस पार्टी के उंगलियों पर गिने जाने वाले उम्मीदवार जीत कर आ गए हैं, लेकिन पूछना लाजिमी है कि आखिर आपका उद्देश्य क्या था और आप चुनाव क्यों लड़ रहे थे? आम आदमी पार्टी के प्रमुख भाष्यकार लोहियावादी योगेन्द्र यादव हैं। सर्वप्रथम डॉ. लोहिया ने ही गैर-कांग्रेसवाद का नारा दिया था। ऐसा अनुमान लगाने को मन होता है कि उनकी इस इच्छा की पूर्ति के लिए ही 'आप' का गठन किया गया था! बदली हुई परिस्थिति में अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के सहयोग से दिल्ली में फिर सरकार बना लें तो अलग बात है।

भारत में वामपंथी दलों ने जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए लंबी लड़ाईयां लड़ीं। आज नवसाम्राज्यवाद के दौर में जनसंघर्ष की आवश्यकता पहले से कहीं ज्यादा है, लेकिन इन चुनावों में वामदलों ने जो प्रदर्शन किया है उसके बाद यह समझ नहीं आता कि सामाजिक न्याय की लड़ाई अब कौन लड़ेगा? ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि सिर्फ कांग्रेस के नेता ही प्रमाद में नहीं थे, वामदलों के नेताओं ने भी खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने में कोई कमी नहीं की। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन दलों में अब न तो युवा नेतृत्व बचा है और न ही ऐसे कार्यकर्ता जो किसी जन आंदोलन में प्राण फूंक सकते हों।

यह विश्लेषण तो आगे भी चलता रहेगा। आज भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बधाई के हकदार हैं। वे जनतांत्रिक, यद्यपि गैर-पारंपरिक तरीके से निर्वाचित होकर आए हैं। उम्मीद उनसे यही है कि अपनी नई भूमिका में संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता रखते हुए वे इस देश को आगे ले जाने का काम करेंगे। आंतरिक शांति, बाह्य सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग-व्यापार बहुत सारे मोर्चे हैं जिन पर उनकी कार्ययोजना हमें शायद जल्दी ही देखने मिलेगी तभी उन पर कोई टिप्पणी करना मुनासिब होगा। हर भारतवासी की तरह फिलहाल हमें भी इस बात की प्रसन्नता है कि देश ने लोकतंत्र का एक और इम्तिहान पास कर लिया है।
देशबन्धु में 17 मई 2014 को प्रकाशित विशेष सम्पादकीय

Wednesday, 14 May 2014

कुछ यात्रा चित्र-1


 
महाकवि रॉॅबर्ट फ्रॉस्ट का कथन है कि  ''शिक्षक दो तरह के होते हैं, एक वे जो विद्यार्थी को खूंटे से बांध कर रख देते हैं और दूसरे वे जो कुछ ऐसा करते हैं कि विद्यार्थी आकाश में उड़ान भरने के योग्य हो जाएं। दूसरे प्रकार के एक शिक्षक हैं- खूबचंद मंडलोई। मंडलोई गुरुजी जयप्रकाश प्राथमिक शाला पिपरिया (मप्र) में 1952 से 1954 तक मेरे कक्षा शिक्षक थे। अपने चालीस साल के अध्यापक जीवन में उन्होंने मुझ जैसे हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाया। मंडलोईजी ने मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में अध्यापन कार्य प्रारंभ किया था। उन्हें सेवानिवृत्त हुए भी दो दशक बीत चुके हैं, लेकिन विद्यार्थियों में ही नहीं, पिपरिया के नागरिकों के बीच वे उसी तरह सम्मान के पात्र व लोकप्रिय हैं जैसे कि वे शुरू से रहे आए हैं।

मुझसे तो पिपरिया कब की छूट गई, लेकिन उनके जो विद्यार्थी आज भी वहीं हैं उन्होंने गुरुजी का नागरिक अभिनंदन करना तय किया। मुझे भी आदेश मिला कि मैं 10 मई को आयोजित नागरिक सम्मान में अवश्य शामिल होऊं। ऐसे अवसर पर मना तो खैर कर ही नहीं सकता था, लेकिन अपने शिक्षक के नागरिक अभिनंदन में उपस्थित रहना सचमुच एक आह्लादकारी अनुभव था। कार्यक्रम तीन घंटे चला व इसमें पिपरिया की नगरपालिका अध्यक्ष सहित समाज के सभी वर्गों के लोग शामिल हुए। हम पूर्व विद्यार्थी अपने गुरु का ऐसा सम्मान देखकर गद्गद् हुए जा रहे थे। तिरासी वर्षीय मंडलोईजी स्वयं भी अभिभूत थे। आज जब भारतीय समाज में शिक्षकों का तिरस्कार व अवमानना हो रही है उस समय एक गुणी शिक्षक का सम्मान होना विरल अपवाद ही था। एक और महान लेखक जॉन स्टाइनबैक ने कहा था कि ''दुनिया की तमाम कलाओं में अध्यापन शायद सबसे बड़ी कला है और शिक्षक एक महान कलाकार ही होता है। मैं सोचता हूं कि यह कथन भी मंडलोईजी पर खरा उतरता है।

इस अभिनंदन समारोह के दौरान ही मंडलोईजी द्वारा लिखित खंड काव्य ''अपयश का आचमन; कैकेयी उत्कर्ष का भी लोकार्पण हुआ। उन्होंने अपनी इस सुदीर्घ रचना में कैकेयी को एक नए नजरिए से देखने की कोशिश की है। उनकी स्थापना है कि राम का जन्म रावण-राज्य की समाप्ति के लिए हुआ था। वे अगर अयोध्या का राजपाट संभाल लेते तो कथा वहीं समाप्त हो जाती व उनके जीवन का महत्तर लक्ष्य पूरा न हो पाता। इसलिए कैकेयी ने स्वयं को अपयश का पात्र बना राम को कर्तव्यपथ पर प्रवृत्त किया। हम जानते हैं कि पूर्व में भी अनेक लेखकों ने इसी भांति साहित्य में उपेक्षित विस्मृत या लांछित पात्रों के प्रति न्याय करने का प्रयत्न किया है- जैसे मैथिलीशरण गुप्त ने 'साकेत में उर्मिला को नए आलोक में देखा, हरिऔध ने 'प्रिय प्रवास' में यशोधरा को व शिवाजी सावंत ने मृत्युंजय की कर्ण को। मंडलोईजी की भावना भी ऐसी ही रही है।

मैं उनकी इस रचना को एक और दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करता हूं। भारतीय समाज में व उसी के अनुरूप भारतीय साहित्य में औरत जात का एक तरह से लगातार निरादर ही होते आया है। बात चाहे शकुंतला की हो, सीता की हो, द्रौपदी की हो एक पुरुषवादी मानसिकता साहित्य में निरंतर दिखाई पड़ती है। इस रूढि़ को सबसे पहले शरतचंद्र ने तोड़ा, जिसका अनुसरण उनके जीवनीकार 'अवारा मसीहा के लेखक विष्णु प्रभाकर ने किया। इस दौर में जबकि नवपूंजीवाद ने सारी चीजों की पवित्रता नष्ट कर दी है तथा स्त्री हर तरह से भोग्या बना दी गई है तब बहुत जरूरी हो गया है कि बुद्धिजीवी समाज में स्त्री की प्रतिष्ठा कायम करने के लिए हर संभव उपाय करें और इसमें साहित्य पीछे क्यों रहे। समाज में स्त्री के हक में सिर्फ लेेेखिकाएं ही आवाज उठाएं यह भी पर्याप्त नहीं है। पुरुषों को भी आगे आना चाहिए और यह काम मंडलोईजी ने किया है।

मैंने पिपरिया का निमंत्रण तो खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया था, लेकिन यह ध्यान नहीं था कि छुट्टियों और शादी के मौसम में रेलगाड़ी में आरक्षण मिल पाएगा या नहीं। परिणाम यह हुआ कि मुझे पांच सौ पैसठ किलोमीटर की यात्रा सड़क मार्ग से करनी पड़ी। अमरकंटक एक्सप्रेस में सोते-सोते आना-जाना होता; यहां दिन में सफर करना पड़ा, क्योंकि अब रात को सड़क यात्रा में असुविधा महसूस होती है। यह लेकिन अच्छा ही हुआ। मैं पिपरिया कोई चार-पांच साल बाद जा रहा था। उस इलाके की दृश्यावली देखे लंबा समय बीत गया था सो पुरानी स्मृतियों को ताजा करने का एक अच्छा मौका मिल गया। कुछ नई छवियां भी स्वाभाविक रूप से देखने-समझने मिल गईं।
 
इस सफर की सबसे बढिय़ा बात तो यह थी कि रायपुर से पिपरिया तक का रास्ता जैसा कि बोलचाल की भाषा में कहेंगे ए-वन था। रायपुर से देवरी तक फोरलेन है। राजनांदगांव में पूरब से पश्चिम तक शहर की लंबाई में फ्लाईओवर बन गया है। देवरी से गोंदिया होकर मध्यप्रदेश की सीमा तक महाराष्ट्र के लोक निर्माण विभाग की सड़क चुस्त-दुरुस्त है। वहां से सिवनी तक टोल रोड है। उसका भी रख-रखाव बढिय़ा है। सुना था कि नागपुर-जबलपुर के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग-7 दुर्दशाग्रस्त है, लेकिन मुझे जिस सिवनी-लखनादौन खंड पर चलना था वह हिस्सा एकदम बढिय़ा था। सबसे ज्यादा मजा आया लखनादौन से नरसिंहपुर तक फोरलेन वाले एनएच-26 पर। यह हिस्सा कुछ समय पहले ही बनकर तैयार हुआ है। चिकनी-सपाट सड़क पर गाड़ी दौड़ रही है और कुछ भी पता नहीं चलता। नरसिंहपुर से पिपरिया तक टोल टैक्स वाले प्रादेशिक राजमार्ग-22 का भी रख-रखाव ठीक था।

यह तो ठीक था कि यहां से वहां तक सड़क अच्छी थी, लेकिन रास्ते में पांच या छह जगह पर टोल टैक्स देना पड़ा। आते-जाते में पांच सौ रुपए तो खर्च हो ही गए। जहां सड़क नई बनी है वहां टैक्स लेना समझ आता है, लेकिन जहां लागत निकल चुकी हो वहां टोल टैक्स क्यों जारी रहना चाहिए? यह सवाल भी मन में उठता है कि जब निजी ठेकेदारों को ही सड़कें बनाना है तो पीडब्ल्यूडी में इतने सारे इंजीनियरों की फौज से क्या काम लिया जा रहा है? इस यात्रा में इस तथ्य पर भी ध्यान गया कि अब नगरों के बाहर जगह-जगह बाईपास बन गए हैं याने यात्री को शहर की भीड़-भाड़ से नहीं गुजरना पड़ता। इसका एक नुकसान भी हुआ है। बाहर-बाहर निकल गए तो न तो लखनादौन में रुककर खोए की जलेबी का स्वाद चख सके और न किसी छोटे गांव में रुककर इस मौसम में चूसने वाले देशी आम भी देखने मिले। रफ्तार ने इत्मीनान को छीन लिया है।

इन दिनों शादियों का सीजन है तो जगह-जगह उनके नजारे देखने मिले। लखनादौन के पास  किसी गांव से एक दामाद अपने ससुरजी को लेकर डेढ़ सौ किलोमीटर दूर गाडरवारा के पास किसी गांव मोटर सायकल पर लिए जा रहे थे। टोल-टैक्स नाके पर वे मिल गए तो फिर बुजुर्गवार हमारी कार में थोड़ी देर के लिए सहयात्री हो लिए। एक और युवक अपनी पत्नी और दो बच्चों को बाइक पर लेकर कहीं शादी में जा रहा था। पत्नी अपने हाथों में सूटकेस को संभाल रही थी। ऐसे लोग भी क्या करें? बसों का ठिकाना है नहीं, फिर बाइक में समय और पैसा तो बचता ही है। रतन टाटा ने शायद इन्हीं के लिए नैनो कार बनाई थी। इस यात्रा का बड़ा हिस्सा ग्राम्यांचल में था इसलिए एक और रोचक दृश्य देखने मिला कि जगह-जगह खेतों में शामियाने तने हुए हैं और आती-जाती बारात का स्वागत हो रहा है।  ज्यादातर बाराती या तो सूमोनुमा गाडिय़ों में यात्रा कर रहे हैं या ट्रेक्टर ट्रालियों मेें।
(अगले सप्ताह जारी)

देशबन्धु में 15 मई 2014 को प्रकाशित
 

Wednesday, 7 May 2014

वैमनस्य की राजनीति





अभिनेत्री
रानी मुखर्जी व निर्देशक आदित्य चोपड़ा ने कुछ दिन पूर्व इटली में जाकर विवाह रचाया। इस पर एक मोदीभक्त ने ट्वीट किया कि अगर ये लोग 16 मई तक रुक जाते तो उनके विवाह में सोनिया, राहुल, प्रियंका और राबर्ट भी शामिल हो जाते। मुझे यह टिप्पणी सुरुचिपूर्ण नहीं लगी। इस पर मैंने अपनी प्रतिक्रिया इन शब्दों में की-''क्यों भाई, क्या भारत इनका घर नहीं है और क्या आपके यहां बहू-बच्चों को घर से निकाल दिया जाता है? इसके बाद ट्विटर में मुझ पर अपशब्दों की जो बौछार हुई उसके बारे में कुछ न लिखना ही बेहतर होगा। इस प्रसंग से पता चलता है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को किस तरह व्यक्तिगत वैमनस्य के स्तर पर लाया गया, उसमें भी असहिष्णुता का परिचय देते हुए सामान्य शिष्टाचार को भी ताक पर रख दिया गया। मुझे इससे हैरत नहीं हुई क्योंकि जनसंघ और भाजपा के अधिकतर नेता-कार्यकर्ता लंबे समय से इसी भांति निजी कुंठा का परिचय देते आए हैं।

मुझे 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय का एक प्रसंग ध्यान आता है। उन दिनोंं महान शिक्षाविद् व स्वाधीनता सेनानी डॉ. जाकिर हुसैन भारत के उपराष्ट्रपति थे। उनके बारे में जोर-शोर से अफवाहें फैलाई गईं कि वे पाकिस्तान के लिए जासूसी कर रहे थे इसलिए उन्हें नजरबंद कर लिया गया है। ऐसी बेसिर-पैर की बात कहां से उड़ाई गई होंगी, पाठक स्वयं अनुमान लगा सकते हैं। इसी तरह 11 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौते के तुरंत बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के हृदयाघात से निधन पर भी अफवाहें फैलाई गईं कि उन्हें जहर देकर मारा गया। इसे लेकर कानाफूसी तो की ही गई, अखबारों में भी छपा और वीररस के एक कथित कवि तो कवि सम्मेलनों के मंच से उनके सपनों में श्रीमती ललिता शास्त्री के आकर कहने का बखान करने लगे कि शास्त्रीजी को जहर दिया गया है। ऐसा प्रचार करने वालों ने एक क्षण भी यह सोचने की जहमत नहीं उठाई कि उस वक्त भारत में ऐसा कोई भी शक्तिशाली नेता नहीं था जो इतने बड़े षडय़ंत्र को अंजाम दे पाता। जाहिर है कि इसका उद्देश्य इंदिरा गांधी को बदनाम करना मात्र था। इस आरोप को हाल-हाल में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने भी अपनी आत्मकथा में दोहराया है जबकि इस बीच शास्त्रीजी के तीन बेटे कांग्रेस के संसद सदस्य और एक बेटे मंत्री भी रह चुके हैं।

भारत में एक ऐसा वर्ग है जो देश में कुछ भी गलत हो उसका दोष पंडित नेहरू या उनके वंशजों पर सुविधापूर्वक मढ़ देता है। यह सिलसिला 1947 से अब तक चला आ रहा है। 2004 में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बन जाने की संभावना मात्र से ही सामान्यत: हँसमुख सुषमा स्वराज किस कदर बिफर गई थीं! उन्होंने अपना सिर मुंडवाने तक की धमकी दे डाली थी। उन्होंने यह न सोचा था कि सोनिया गांधी स्वयं प्रधानमंत्री पद ठुकरा देंगी। इधर 2014 के चुनावों में ऐसी उग्र प्रतिक्रियाएं बार-बार देखने-सुनने मिल रही हैं। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने एक नहीं, दो बार कहा कि मोदी सरकार बनेगी तो राबर्ट वाड्रा को जेल भेज देंगे। उन्हें इस बात की परवाह नहीं है कि देश का कानून क्या कहता है और अभी तो यह भी तय नहीं है कि उनकी सरकार बनेगी कि नहीं। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी तो पहले दिन से ही राहुल गांधी को शहजादा कहकर मखौल उड़ानेे की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों के समय कवर्धा में दिया अपना भाषण याद नहीं रहा कि यदि डॉ. रमन सिंह कांग्रेस में होते तो अपने बेटे अभिषेक को चुनाव लड़ाते, न कि सामान्य कार्यकर्ता अशोक साहू को। अब वही अभिषेक सिंह मोदी के नेतृत्व में लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में जब नरेन्द्र मोदी मतदाताओं से कहते हैं कि वे उन पर विश्वास करें तो उनके वचनों का खोखलापन प्रकट होने लगता है।

नरेन्द्र मोदी की निगाह में राहुल गांधी शहजादे हैं, लेकिन वे गुजरात में अपने ही मंत्री सौरभ पटेल के बारे में बात नहीं करते जो कि नवकुबेर अंबानी के दामाद हैं। श्री मोदी अपनी पार्टी के इतिहास की भी जानबूझ कर अनदेखी कर देते हैं। विजयाराजे सिंधिया क्या थीं? उनकी बेटियां वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे क्या हैं? वसुंधराजी के बेटे दुष्यंत सिंह को किस श्रेणी में रखा जाएगा, और वसुंधराजी के मामा ध्यानेंद्र सिंह और मामी माया सिंह को? मोदीजी के तर्क के अनुसार तो मेनका गांधी और उनके सुपुत्र वरुण गांधी को भी भाजपा में नहीं होना चाहिए और न ही प्रेमकुमार धूमल के बेटे अनुराग सिंह को। मोदीजी ने यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा को इस बार लोकसभा का टिकट क्यों दिया? मुझे और भी बहुत से उदाहरण याद आ रहे हैं, लेकिन कहां तक नाम गिनाएं! प्रश्न है कि श्री मोदी व उनके प्रशंसक समर्थक शीशे के घर में रहकर दूसरे के घर पत्थर क्यों फेंक रहे हैं।

इधर जब से प्रियंका गांधी ने राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र अमेठी की कमान संभाली है तब से उनके ऊपर भी भाजपा के नेता कार्यकर्ता बेदम हमले किए जा रहे हैं। राबर्ट वाड्रा के बारे में मेरे जो विचार हैं उन्हें इसी कॉलम में 11 अक्टूबर 2012 को लिख चुका हूं। मेरा कहना है कि श्री वाड्रा ने यदि कहीं विधि-विधान का उल्लंघन किया है तो भाजपा उनके ऊपर मुकदमे चलाए, लेकिन अपराध सिद्ध होने के पहले किसी को अपराधी क्यों माना जाए। राजस्थान में तो भाजपा की सरकार है। वहां यदि श्री वाड्रा ने कुछ गड़बड़ की है तो सरकार को वैधानिक कार्रवाई करने से किसने रोका है? लेकिन ऐसा न कर सिर्फ दुष्प्रचार करना क्या दर्शाता है? मुझे हैरत है कि भाजपा के बड़े नेता रविशंकर प्रसाद इत्यादि भी प्रियंका को अब श्रीमती वाड्रा कहकर संबोधित करते हैं। ऐसा करके वे एक औरत का अपमान कर रहे हैं। प्रियंका यदि अपने पिता का कुलनाम जोड़ कर खुद को प्रियंका गांधी कहलाना पसंद करती हैं तो उन्हें इसी तरह से संबोधित किया जाना चाहिए। शिष्टाचार इसी में है। बंगाल में तो ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहां पतिगृह और पितृगृह दोनों से मिलाकर नए  कुलनाम प्रचलन में आ गये हैं।

इसी रौ में मुझे दो प्रकरण और ध्यान आते हैं। एक तो 1977 में जब इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं तो यह प्रचारित किया गया कि राजीव गांधी अपनी ससुराल जाकर बस जाएंगे। हम जानते हैं कि ऐसा नहीं हुआ, बल्कि राजीव गांधी इंडियन एयर लाइंस में पायलट की नौकरी बदस्तूर करते रहे। फिर इंदिराजी की हत्या के बाद यह निंदनीय दुष्प्रचार किया गया कि उन्होंने अपनी किसी डुप्लीकेट को मरवा डाला है और वे खुद स्विट्जरलैंड भाग गईं हैं। मैं नहीं जानता कि ऐसी ओछी बातें करने में लोगों को क्या आनंद आता है। मुझे ध्यान नहीं आता कि कांग्रेस अथवा कम्युनिस्ट पार्टियों के बड़े नेताओं ने कभी विपक्ष के बारे में इस स्तर तक उतरकर अशोभनीय टिप्पणियां की हों। भाजपा में भी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता ने भी ऐसी टिप्पणियां नहीं कीं। क्या यह इसकी वजह थी कि वाजपेयीजी राजनीतिक शिष्टाचार का मूल्य समझते थे? भैरोंसिंह शेखावत, लालकृष्ण आडवानी या मुरली मनोहर जोशी को भी ऐसे निजी आक्षेप करते हुए शायद ही कभी देखा गया हो। अफसोस इस पर कि काश वे अपनी अगली पीढ़ी को राजनीति में सद्भाव, सौमनस्य निभाने के संस्कार दे सकने में सफल हो पाते।

देशबन्धु में 08 मई 2014 को प्रकाशित
 

Friday, 2 May 2014

रेंगने का वक्त



''आज बंद हैं/  दुनिया के तमाम स्कूल/  रविवार जो है/ बच्चों के बिना/  जैसे भुतहा महलों में/  तब्दील हो गए हैं स्कूल/  हाथों में छड़ी लिए/  घूम रही हैं/ गुस्सैल प्रेतात्माएं/  जब तक पूरा नहीं होगा/  बच्चों का होमवर्क/  बेचैन प्रेतात्माएं/  यूं ही भटकती रहेंगी।'' (होमवर्क)


महज तेरह पंक्तियों की छोटी-सी कविता। क्या कह रही है ये कविता? क्या इसे पढ़कर आप व्याकुलता अनुभव कर रहे हैं? क्या आपको लगा कि यह कविता आपको उठाकर कहीं साथ चलने का इसरार कर रही है? कहां- किसी स्कूल में, आपके बच्चों की दुनिया में, उनकी कापी किताबों में!

मैंने जब यह कविता पढ़ी तो मेरे सामने जैसे किसी भव्य इमारत में चल रहे बड़े स्कूल का मुख्य द्वार खुल गया हो। सुन्दर-सी इमारत है, प्रशस्त मैदान है, ढेर सारी बसें खड़ी हैं जो बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने का काम कर रही हैं। स्कूल में चहकते हुए बच्चे हैं। यह कोई ऐसा स्कूल है जहां मां-बाप अपने बच्चों को लाखों मिन्नतों, मशक्कतों के बाद भर्ती करा पाते हैं, फिर सालाना लाख-दो लाख रुपया फीस देते हैं। गाहे-बगाहे चंदे के रूप में भी रकम देनी पड़ती है। बच्चे की पीठ पर बस्ते का बोझ है। स्कूल में जो पढ़ाई होती है, सो होती है, इसके अलावा उन्हें टयूशन भी लेनी पड़ती है और रविवार का दिन हो या सर्दी-गर्मी की छुट्टियां, होमवर्क तो रहता ही रहता है।

इस दरवाजे से हटता हूं तो एक दूसरा स्कूल सामने आ जाता है। शहर की किसी नई कॉलोनी के किसी रिहायशी घर में चलता हुआ। उस पर अंग्रेजी मीडियम स्कूल का बोर्ड लगा है। अपने बच्चों का कैरियर बनाने के लिए व्यग्र और चिंतित वे मां-बाप ऐसे ही किसी स्कूल में बच्चे का दाखिला करवाते हैं जिनके पास महलनुमा स्कूल की फीस पटाने योग्य साधन नहीं है। बच्चे अंग्रेजी पढ़ते हैं- सही या गलत। उसी में बोलने-बतियाने लगते हैं। माता-पिता के देखे सपने अब उनकी आंखों में हैं। वे अपने लिए एक नए किस्म का वातावरण, एक नए तरह का समाज बनाना चाहते हैं। उनकी इच्छाओं को मूर्त रूप देने के लिए बहुत से सरंजाम मौजूद हैं- फिल्मी सितारे, टीवी सितारे, क्रिकेट खिलाड़ी, अंबानी, चेतन भगत, बरखा दत्त इत्यादि।

इनसे परे वे शालाएं हैं जिन्हें सरकार या नगरपालिकाएं चलाती हैं। इन स्कूलों में बड़ी संख्या में वे बच्चे आते हैं जिन्हें कहीं और ठिकाना नहीं मिलता है। उनके घर की हैसियत ही ऐसी नहीं है। यहां जो अध्यापक पढ़ाते हैं वे सरकार के नियमित कर्मचारी भी नहीं है। स्कूल की इमारत एक बार बन गई सो बन गई, उसमें फिर बरसों मरम्मत नहीं होती। बच्चे जितना पढ़ लें सो ठीक। कितने तो सिर्फ इसलिए आते हैं कि मध्यान्ह भोजन योजना में कम से कम एक वक्त का भोजन तो मिल ही जाता है। भारत में नब्बे प्रतिशत स्कूल ऐसे ही हैं। हम जनतंत्र की बात करते हैं, लेकिन दस प्रतिशत स्कूल जिस कुलीन वर्ग के लिए चलते हैं देश पर शासन उन्हीं का है। नब्बे प्रतिशत बहुमत वालों को तो जीवन-यापन के लिए जो सहारा मिल जाए वही बहुत है। खासकर इनके लिए ही शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुआ। कुलीन जानते हैं कि उनके बच्चों को ऐसे स्कूलों में पढ़ाकर उन्हें बिगाड़ना नहीं है। देखिए यह कविता मुझे कहां से कहां ले गई! बच्चों को अवकाश के दिन भी होमवर्क करना है। गुस्सैल प्रेतात्माएं सिर्फ स्कूल में ही नहीं, शायद घर में भी हैं। तो शायद इस तरह बनेगा देश का भविष्य!

कविता यही तो करती है कि वह आपके सामने जाने कितनी खिड़कियां, कितने दरवाजे, कितनी सड़कें खोलकर रख देती है। बशर्ते वह सचमुच कविता हो। जुमलेबाजी नहीं, नारेबाजी नहीं, चुटकुलेबाजी नहीं। कविता आपको अपने मन के अंधेरे कोनों में झांकने के लिए विवश करती है। वह आपको वहां ले जाती है जहां से आप शायद पिंड छुड़ाकर भाग आए हैं! आपने अगर अपनी आंखों को हथेली से ढांप रखा है, तो कविता हथेलियों को हटा देती है। मजबूर करती है कि जिन दृश्यों को देखने से बचना चाहते हैं उन्हें देखें। अपनी बात के समर्थन में मैं सिर्फ दस पंक्तियों की एक और छोटी कविता यहां उध्दृत कर रहा हूं-
''कितनी बड़ी और खूबसूरत कार है/  विज्ञापन में/  अभी बैठ जाओ इसमें/  तो लगेगा/  जैसे दौड़ने लगेगी सड़कों पर/  पर कार अभी विज्ञापन में है/  फिर भी/  दौड़ रही है/  दिल और दिमाग के बीच/  सरपट।'' (विज्ञापन)

देखिए, ये पंक्तियां आपसे क्या कहती हैं? इक्कीसवीं सदी में नवउदारवाद के नाम पर पूंजीवाद ने अपना कारोबार किस तरह बढ़ाया है उसने बाजार की परिभाषा बदल दी है और बाजार का स्थान भी। क्या आपने कभी सोचा कि इन दिनों बिला वजह, बेजरूरत बाज़ार का रुख क्यों कर लेते हैं? अब हम बाज़ार  इसलिए नहीं जाते कि हमें सचमुच में कोई सौदा-सुलुफ करना है। अपने समय के जाने-माने हास्य कवि रमई काका ने लखनऊ के अमीनाबाद बाज़ार का चित्रण किया था कि वहां की चकाचौंध में तो लोग किस तरह धोखे में पड़ जाते हैं। अब तो कई गुना चकाचौंध है और कदम-कदम पर धोखा। अमृतसर से लेकर मदुरै तक शुरु-शुरु में सिर्फ कौतूहलवश मॉल में जाते थे, अब आपको अनजाने ही वहां बार-बार जाने का आकर्षण होने लगा है। नियोन लाइटों और विज्ञापनों ने मिलकर जैसे सोचने की क्षमता ही छीन ली है। जो कार इस वक्त दिल और दिमाग के बीच दौड़ रही है, वह आपकी प्राथमिक जरूरतों को खारिज करते हुए आपके बैंक बैलेंस को नीचे लाते हुए किस दिन आपके दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाएगी, यह आप भी नहीं जान पाएंगे। देखता हूं कि कितने ही निम्न आय वर्ग के लोग ज़ीरो प्रतिशत ऋण के लोभ में बाइक या मोपेड खरीद लेते हैं, उसकी किश्त चुकाने के लिए व्यवस्था नहीं हो पाती, पेट्रोल भरवाने के लिए भी दो बार सोचना पड़ता है। ऐसे में किसी दिन जिस शोरूम से दुपहिया गाड़ी खरीदी गई है, वापिस वहीं सेकेण्ड हैंड बिकने के लिए आ जाती है। तो पूंजीवाद अपने नए अवतार में इस तरह का सलूक आपके साथ करता है जैसे सूनी राह पर अकेले राहगीर को चार नकाबपोश डाकू मिलकर लूट लेते हैं! ये सचमुच डाकू हैं। इनके मुंह पर नकाब है इसलिए उनकी शिनाख्त नहीं हो पाती है। लेकिन इस कविता को फिर से पढ़िए। कवि उस नकाब को हटाकर अपराधी को आपके सामने खड़ा कर रहा है।

ये दोनों कविताएं मैंने युवा कवि मणि मोहन के हाल में प्रकाशित कविता संग्रह ''शायद'' से ली हैं। मेरा कवि से प्रत्यक्ष परिचय नहीं है यद्यपि उनकी कविताएं अक्षर पर्व में पहले छपी हैं। मध्यप्रदेश के छोटे से कस्बे गंजबसौदा के निवासी मणि मोहन का पहला संग्रह 2003 में छपा था। एक दशक के अंतराल से प्रकाशित इस नए संकलन में सत्तर कविताएं हैं। अधिकतर कविताएं पन्द्रह-बीस पंक्तियों की हैं, याने कवि का मिजाज छोटी कविताओं का ही है। जैसा कि मेरा हमेशा से मानना रहा है, सामाजिक सरोकारों के बिना सच्ची कविता नहीं लिखी जा सकती। बाकी सब वाग्विलास है। मणि मोहन की कविताएं सिध्द करती हैं कि वर्तमान में हमारे आसपास जो कुछ घटित हो रहा है उस पर कवि की पैनी नजर है। यद्यपि इन कविताओं में और भी रंग हैं। इनमें प्रेम भी है और मृत्यु भी, बच्चे भी हैं और प्रकृति भी। सबसे अच्छी बात यह कि मणि मोहन ने जो भी विषय उठाए उनका बयान करने में बड़बोलापन नहीं दिखाया है। वे इस तरह अपनी बात रखते हैं कि धीरे से पाठक के मन में उतर जाए। मेरा ख्याल है कि उनकी चिंतन प्रक्रिया को समझने के लिए 'घर' शीर्षक कविता को देखना चाहिए-

''प्रणाम करता हूं/  भेड़ियों को/  आते जाते/  सजदा भी करता हूं/  कभी-कभी  लकड़बग्घों के दरबार में/  क्या करूं.../ एक घने बीहड़ से होकर/ गुज़रता है/  मेरे घर का रास्ता।'' (घर)

अगर मैं कहूं कि हर युग में सामान्य नागरिक को ऐसी ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, तो गलत नहीं होगा। इसके बावजूद वह कवि ही होता है जो समाज की आंतरिक पीड़ा को अभिव्यक्ति देने के लिए अपनी कविता से रास्ता बना लेता है। चाहता तो हूं कि इस संकलन से और भी कविताएं उध्दृत करूं, लेकिन यह कवि और पाठक दोनों के साथ अन्याय होगा। मुझे संकलन की अधिकांश कविताएं अच्छी लगी हैं। यद्यपि प्रेम कविताओं में कोई नयापन नहीं लगा। ''एक सुपरस्टार की अंतिम यात्रा'' व ''इस तरह'' जैसी कविताओं में कवि ने पाखंड को उजागर किया है। उसने मुझे प्रभावित किया। कविता और भाषा पर मणि मोहन का जो विश्वास है वैसा विश्वास हर रचनाधर्मी को होना चाहिए। ''हत्यारों की रुचि'' में कवि इस ओर आगाह करता है कि समर्थतंत्र किस तरह रचनाशीलता को खरीदने का षडयंत्र करता है। अंत में मैं ''वक्त'' कविता को पूरा उध्दृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं।

''ज़रा-सा तनकर चले/  कि तकलींफ होने लगी चौखटों को/ ज़रा-सा झांका भीतर/  कि डपट दिया रोशनदान ने/ बंद दरवाजे के बाहर/  मैं खड़ा रहा सुबह से शाम तक/  एक बार फिर पूछा मैंने-/  'क्या मैं अंदर आ सकता हूं श्रीमान्?'/  अपनी ही आवाज़ की अनुगूंज/  सुनी मैंने बार-बार/  मैंने गौर से देखा/ इस बार दरवाज़े को/  दरवाज़ा पूरी तरह बंद था/  और लोग रेंगते हुए/  दरारों से भीतर जा रहे थे-/  बड़ी देर बाद समझ में आया मुझे/  कि वक्त/  दरारों से भीतर रेंगने का है।'' (वक्त)

यह रचना बहुत कुछ कह जाती है।
 
अक्षर पर्व अप्रैल 2014 अंक में प्रकाशित  
 

गांधी गुजराती थे?





मैं
बड़ी उलझन में हूं। अभी दो दिन पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक समाजसेवी संस्था का बड़ा सा कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इसमें भारत के आधा दर्जन प्रांतों के प्रतिनिधियों ने शिरकत की। कार्यक्रम का उद्घाटन करने जिन्हें बुलाया गया था वे उस संस्था के बड़े पदाधिकारी थे। अपने उद्घाटन वक्तव्य में उन्होंने यह स्थापित करने का प्रयत्न किया कि महात्मा गांधी गुजराती थे। चूंकि मुख्य अतिथि स्वयं गुजराती भाषी थे इसलिए महात्मा पर उनका दावा कुछ-कुछ समझ में आता है। चूंकि मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म गुजरात के पोरबंदर में गुजराती मूल के एक परिवार में हुआ था इस नाते भी उनकी बात में दम था। महात्मा गांधी के बाद उन्होंने बात आगे बढ़ाई कि सरदार पटेल भी गुजराती थे। उनकी यह बात भी सच थी और इस बारे में भी कोई बहस नहीं की जा सकती, फिर मैं उलझन में क्यों हूं? हुआ यह कि वक्तव्य आगे बढ़ा और उसमें कहा गया कि नरेन्द्र मोदी भी गुजराती हैं। इसमें भी क्या शक है। सवाल उठता है कि क्या गांधी और पटेल की परंपरा में मोदी का नाम जोड़ा जा सकता है?

यह प्रश्न ऐसा है जिसके उत्तर में दर्जनों किताबें लिखी जा सकती हैं, लेकिन मैं अपनी बात इस कॉलम की सीमित जगह में रखने की कोशिश कर रहा हूं। हम जानते हैं महात्मा गांधी का ताल्लुक एक सम्पन्न परिवार से था और वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए थे। एक सुखी जीवन बिताने के लिए उनके पास विकल्पों की कोई कमी नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने जिस फकीरी ठाठ से जीवन जिया उसे देश का बच्चा-बच्चा जानता है और दुनिया के तमाम देशों में उनकी यही छवि लोगों को लुभाती है। महात्मा गांधी कांग्रेस पार्टी के चवन्नी सदस्य भी नहीं थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें अपना डिक्टेटर मान लिया था। बापू यदि चाहते तो भारत के पहले राष्ट्रपति बन सकते थे, लेकिन उन्हें न तो कोई पद चाहिए था और न अपनी कुटिया ही छोडऩी थी। वे बंधुत्व, न्याय, समता व समरसता के आधार पर जिस रामराज्य का स्वप्न देखते थे उसके लिए उन्होंने अपने प्राणों की बलि दे दी। महात्मा गांधी के जीवन और दर्शन पर जो हजारों किताबें लिखी गईं उसमें इन सारी बातों को विस्तारपूर्वक पढ़ा जा सकता है।

सरदार वल्लभ भाई पटेल भी गुजराती थे। वे एक समृद्ध किसान परिवार से थे। एक वकील के रूप में उन्होंने सूबे में ख्याति हासिल कर ली थी। जिस दिन वे गांधी से मिले उस दिन से उनका जीवन बदल गया। बापू का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी स्वेच्छा से एक सन्यासी जैसा जीवन भी जिया। उनकी चारित्रिक दृढ़ता के प्रमाण उनके विद्यार्थी जीवन से ही देखने मिलते हैं। उन्होंने स्वाधीनता के बाद सत्ता की राजनीति में अहम् किरदार निभाया, लेकिन इस सत्य से कोई भी इंकार नहीं करेगा कि उनके लिए सत्ता देश को बेहतरी की ओर ले जाने की एक हिकमत थी तथा उसमें निजी लाभ-लोभ की भावना नहीं थी। यहां पर गौर कीजिए कि महात्मा गांधी चाहते तो एक गुजराती होने के नाते दूसरे गुजराती को भारत का प्रधानमंत्री बना सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और सरदार पटेल ने भी अपना रहनुमा के आदेश का सम्मान करते हुए पंडित नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में कोई बाधा उत्पन्न नहीं की। आशय यह कि वे सब एक विशाल लक्ष्य को लेकर चल रहे थे तथा उनमें सांसारिक भोग करने का कोई लालच नहीं था।

हमारे समारोह के उद्घाटनकर्ता ने एक और गुजराती का नामोल्लेख शायद जानबूझ कर नहीं किया। पाठक जानते हैं कि मोहम्मद अली जिन्ना महात्मा गांधी के सबसे प्रचंड-प्रखर विरोधी थे। 1920 के आसपास वह समय था जब जिन्ना साहब कांग्रेस के सबसे बड़े नेता के रूप में उभर रहे थे, महात्मा गांधी कुछ दिन पहले ही दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटे थे और जनता के दिलोदिमाग पर कुछ इस कदर छा गए थे कि कांग्रेस के भीतर जिन्नाजी लगभग अपदस्थ कर दिए गए थे। इसके चलते उन्होंने राजनीति का एक नया अध्याय शुरू किया। यूं तो उन्हें नए नजरिए से देखने की कोशिश लालकृष्ण अडवानी व जसवंत सिंह ने की है। इनके अलावा वीरेन्द्र कुमार बरनवाल तथा प्रियंवद जैसे उदारवादी लेखकों ने भी उन पर अपने ढंग से नई रोशनी डाली है तथापि यह सच्चाई अपनी जगह बरकरार है कि मोहम्मद अली जिन्ना देश का बंटवारा कर एक नए देश  के राष्ट्रपिता या कि कायदेआजम बने। वे क्या किसी बड़े लक्ष्य के लिए सैद्धांतिक लड़ाई लड़ रहे थे या व्यक्तिगत अहम् की तुष्टि करना चाहते थे, इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

हमने भारत के राजनैतिक इतिहास के इन तीन महानायकों की संक्षिप्त चर्चा की, किन्तु गुजरात में सिर्फ राजनेता ही तो नहीं हुए हैं। भारत के इस पश्चिमी प्रदेश की आत्मा को यदि जानना है तो इसके लिए पुराकथाओं व इतिहास के अन्य पहलुओं पर भी ध्यान देने की आवश्यकता होगी। यह गुजरात ही तो था जहां मथुरा से चलकर श्रीकृष्ण ने अपने कबीले के साथ आश्रय पाया था। महाभारत में जो विनाशलीला हुई कृष्ण उसके साक्षी थे, लेकिन वे एक और त्रासदी के गवाह बनने अभिशप्त थे कि  उनके वंशधर उनके सामने ही आपस में लड़कर समाप्त हो जाएं। पुराकथाएं यह भी बताती हैं कि स्वयं कृष्ण की मृत्यु बहेलिया का बाण लगने से हुई थी। यह जो कृष्णलीला गुजराती में घटित हुई उसके मर्म को महात्मा गांधी और सरदार पटेल दोनों ने शायद गुजराती होने के नाते अच्छे समझा होगा और इसीलिए उनकी राजनीति सद्भाव और समरसता के सिद्धांत से विकसित हुई। इसी कृष्णलीला में सुदामा का जिक्र भी तो है, जो गुजराती जनमान्यता के अनुसार पोरबंदर के निवासी थे। कृष्ण ने सुदामा की मदद कर क्या यही संदेश नहीं दिया था कि राजधर्म किस तरह निभाया जाता है?

जैसा कि हम जानते हैं महात्मा गांधी का परिवार कृष्णभक्त था और वे बचपन से ही भक्त कवि नरसिंह मेहता की वाणी से प्रभावित थे। उनका सबसे प्रिय पद ''वैष्णव जन तो तैने कहिए पीर पराई जाने रे" आज भी बापू की स्मृति में होने वाले हर कार्यक्रम में उसी तरह भाव-विभोर होकर गाया और सुना जाता है। गुजराती साहित्य में इसी भावधारा पर चलने वाले और भी बहुत से रचनाकार हुए जैसे-झवेरचंद मेघाणी, गुलाबदास ब्रोकर, कुंदनिका कापडिय़ा, पन्नालाल पटेल आदि। इनकी रचनाओं में भी परपीड़ा को समझने की छटपटाहट और वंचित समाज के प्रति गहरी सहानुभूति का भाव स्पष्ट है। नरसिंह मेहता और पन्नालाल पटेल के बीच शताब्दियों के फासले को बांटनेवाला एक और नाम ध्यान आता है- वली दक्कनी या वली गुजराती का। आज जिस हिन्दी का इस्तेमाल हम करते हैं, उसके प्रारंभिक रचयिताओं में वली दक्कनी का नाम आता है जो हैदराबाद छोड़कर अहमदाबाद आ बसे थे और जहां वे वली गुजराती कहे जाते थे। अहमदाबाद में उनकी समाधि के बारे में जो पाठक नहीं जानते वे थोड़ी मेहनत कर जानकारी हासिल कर सकते हैं।

हमें याद आता है कि गुजरात में महात्मा गांधी ने अपने दो और अलबेले साथी तैयार किए थे। एक थे- रविशंकर व्यास याने कि रविशंकर महाराज जिनके बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने दुर्दांत दस्युओं का हृदय परिवर्तन कर उन्हें हिंसा छोड़ अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया था। अपने बचपन में मैंने नवनीत में उनके बारे में इस तरह की कथाएं पढ़ी थीं। गांधीजी के दूसरे साथी थे- ठक्कर बापा। दिल्ली वालों को शायद आज यह याद न हो कि नई दिल्ली के बापानगर का नामकरण उनकी स्मृति में ही किया गया था। गांधीजी के आदेश पर ठक्कर बापा ने तत्कालीन सीपी एंड बरार प्रांत में आदिवासियों के बीच रहकर लंबे समय तक काम किया था। आज भी मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में जगह-जगह पर ठक्कर बापा के नाम पर स्कूल व आश्रम इत्यादि हैं। जहां तक मुझे याद है ठक्कर बापा ने मंडला-डिंडौरी के बैगा क्षेत्र में लंबा समय बिताया था। 

राजनीति, साहित्य समाजसेवा के अलावा एक और क्षेत्र है जहां गांधी के आदर्शों की धुंधली छाप आज भी विद्यमान है। गुजरात अपनी उद्यमशीलता के लिए प्रारंभ से जाना जाता रहा है। बीसवीं सदी के उद्योगपतियों में ऐसे कितने ही थे जो किसी हद तक महात्मा गांधी से प्रभावित थे। इनमें एक नाम लेना हो तो साराभाई का लिया जा सकता है। एक तरफ इस परिवार ने जहां कपड़ा उद्योग में अपनी उद्यमशीलता का परिचय दिया, वहीं विक्रम साराभाई ने देश की वैज्ञानिक प्रगति में जो अग्रणी भूमिका निभाई उसके बारे में ज्यादा कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। उनकी बेटी मल्लिका और बेटे कार्तिक साराभाई ने भी गांधीवादी मूल्यों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। मैं एक नाम और लेना चाहूंगा देश के सुविख्यात वास्तुशिल्पी बालकृष्ण दोशी का, जिन्होंने मकबूल फिदा हुसैन के साथ मिलकर अहमदाबाद में गुफा नाम से चित्रदीर्घा की स्थापना की है।

मैं अपने सम्मानीय मुख्य अतिथि से पूछना चाहता हूं कि गांधी और पटेल की परंपरा में उन्हें ये सारे नाम याद क्यों नहीं आए? क्या इसलिए कि उनके मसीहा नरेन्द्र मोदी भी इन नामों से जानबूझकर बचना चाहते हैं। भाई, हम तो गांधी को गुजराती तभी मानेंगे जब आप मोदी के बदले इन नामों का स्मरण करेंगे।

देशबन्धु में 1 मई 2014 को प्रकाशित