Wednesday, 28 June 2017

कुछ इंदौर, कुछ उज्जैन

                                      

 मध्यप्रदेश के सबसे बड़े शहर तथा वाणिज्यिक राजधानी इंदौर को लंबे अरसे से 'लिटिल बॉम्बे’ के विशेषण से नवाजा जाता रहा है। इंदौर की समृद्धि के सामने मध्यप्रदेश के बाकी नगर फीके पड़ते थे। यद्यपि विगत पच्चीस-तीस वर्षों में यहां जो तथाकथित विकास अंधाधुंध रफ्तार से हुआ है उसके चलते मुझे इंदौर एक भीड़ और चीख-चिल्लाहट से भरा शहर लगने लगा था। लेकिन अभी दस दिन पहले इंदौर गया तो नगर का एक नया रूप देखने मिला। इंदौर के नागरिक प्रशासन और नागरिक समाज दोनों ने मिलकर एक बेहतरीन काम किया है कि आज इंदौर की गिनती देश के सबसे स्वच्छ नगरों में होने लगी है। आप कहीं भी निकल जाइए, कचरे का कहीं नामोनिशान नहीं दिखता, सड़कों पर आवारा मवेशी बिल्कुल नज़र नहीं आते, सड़क पर बैठी गाय-भैंस आपका रास्ता नहीं रोकतीं, सड़कों के किनारे अनेक स्थानों पर शौचालय बना दिए गए हैं जो इस्तेमाल में आते हैं। नगरवासी गर्व के साथ बताते हैं कि उनके शहर को स्वच्छ भारत अभियान में प्रधानमंत्री से प्रथम पुरस्कार मिला है। मैं समझता हूं कि उनका यह गर्व उचित है।
इंदौर को पश्चिमी मध्यप्रदेश अर्थात मालवा की राजधानी भी कहा जा सकता है। 1956 में बने नए मध्यप्रदेश की राजनीति में इंदौर का वर्चस्व लंबे समय तक रहा। मुख्यमंत्री किसी भी क्षेत्र का रहा हो उसके लिए इंदौर की उपेक्षा करना संभव नहीं था। वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी उसी परिपाटी का पालन कर रहे हैं। उन्होंने अपनी तरफ से इंदौर का ध्यान रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। शायद इसलिए स्वच्छता में प्रथम आने की बात हो या अन्य किसी विकास योजना की, आम जनता से मुख्यमंत्री की तारीफ ही सुनने मिलती है। इंदौर में सत्तारूढ़ दल के जो प्रमुख नेता हैं उनके प्रति जनता की भावना कुछ अलग है। यहीं पर एक पेंच आ गया है। मध्यप्रदेश में भाजपा के पहले तीन मुख्यमंत्री मालवा से ही थे। सुश्री उमा भारती बुंदेलखंड और बाबूलाल गौर भोपाल का प्रतिनिधित्व करते थे किन्तु उनका कार्यकाल लंबा नहीं चला अत: उनकी भूमिका भी उल्लेखनीय नहीं रही। अब शिवराज सिंह को कुर्सी पर बैठे ग्यारह साल हो गए हैं तो मालवा के कद्दावर नेताओं की आंख की किरकिरी बन गए हैं। विधानसभा चुनावों के लिए मात्र डेढ़ साल का वक्त बाकी है; अभी कुर्सी मिल जाए तो ठीक वरना कौन जाने आगे मौका मिलेगा या नहीं।
हमें इंदौर एक दिन रुककर उज्जैन जाना था। मित्रों ने प्रसन्नता के साथ सूचित किया- कोई परेशानी नहीं, बस पचास किलोमीटर तो है, एक घंटे में पहुंच जाएंगे। कोई हड़बड़ी मत कीजिए। हमने उनकी बात मान ली। शहर से निकलकर हाईवे तक आने में जो भी समय लगा हो, उसके बाद तो चालीस-पैंतालीस मिनट में सफर तय हो गया। शहर के भीतर एक एक्सप्रेस-वे है इस पर टोल टैक्स का नाका पड़ता है। हमारे टैक्सी ड्राइवर ने टोल नहीं पटाया। उसने बताया कि यह नाका अवैध रूप से चल रहा है। सरकार इसे बंद कर चुकी है। इंदौर वाले इस बात को जानते हैं, लेकिन बाहर की नंबर प्लेट देखकर नाकेदार वसूली कर लेते हैं। उसने भाजपा के एक बड़े स्थानीय नेता का नाम लिया कि अवैध वसूली में चालीस परसेंट हिस्सा उनको जाता है। उन नेता की शहर में और कहां-कहां हिस्सेदारी है, क्या-क्या जमीन-जायदाद हैं, यह रहस्योद्घाटन भी उसने किया। एक तरफ इंदौर की सड़कों की स्वच्छता, दूसरी तरफ राजनीति की मलीनता, दो विरोधाभासी तथ्य उजागर हुए। लेकिन टैक्सी ड्राइवर ने जो बात बताई वह तो आज की कड़वी सच्चाई है और सर्वव्यापी है। इसकी सफाई कैसे होगी, पता नहीं।
इंदौर से आगे बढऩे पर उज्जैन जैसे-जैसे पास आते जाता है राजमार्ग के दोनों किनारे नए-नए बने होटल और रिसोर्ट नज़र आने लगते हैं। एक-एक रिसोर्ट कई-कई एकड़ में फैला और अल्प प्रवास के लिए आवश्यक सारी सुविधाएं एसी कमरे, बड़े-बड़े हाल, रेस्तोरां, लॉन, सौ गाडिय़ां खड़ी हो जाएं इतनी बड़ी पार्किंग और हां, स्वीमिंग पूल भी। इनमें से अधिकतर का निर्माण सिंहस्थ-2016 को ध्यान में रखकर किया गया था। मध्यप्रदेश सरकार बारह साल में एक बार पड़ने वाले इस पर्व को अभूतपूर्व रूप से मनाने की तैयारी में जुटी हुई थी। मुख्यमंत्री स्वयं हर दूसरे-तीसरे दिन उज्जैन पहुंच जाते थे। इन होटलों का निर्माण जाहिर है कि विशिष्ट तीर्थयात्रियों को ध्यान में रखकर किया होगा। सिंहस्थ पर्व समाप्त होने के बाद भारी निवेश से निर्मित संपत्ति का क्या होता तो ये होटल या रिसोर्ट अब शादी-ब्याह के प्रयोजन में काम आ रहे हैं। इंदौर के आसपास जो विवाह घर तथा मैरिज लॉन आदि हैं वे बहुत महंगे हैं। इंदौर के परिवार भी इसलिए अब यहां आकर पारिवारिक समारोह आयोजित करने लगे हैं।
हम भी परिवार में एक विवाह के सिलसिले में उज्जैन गए थे। इन्हीं में से किसी एक रिसोर्ट में ठहराए गए थे। यहां ठहरने के दो लाभ मिले। एक तो शहर के शोरशराबे और भागमभाग से मुक्ति मिली तो विवाह में आए पारिवारिक सदस्यों के साथ मिलने का, बात करने का पर्याप्त से अधिक अवसर मिल गया। दूसरे उज्जैन नगर कुछ किलोमीटर की ही दूरी पर था तो तीर्थ यात्रा का पुण्य कमाने का योग भी बन गया। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में सुबह चार या पांच बजे भस्म आरती होती है। आधी रात को किसी ताजी चिता की भस्म लाकर ज्योतिर्लिंग का लेपन होता है और फिर आरती। इस दुर्लभ दर्शन के लिए लिए रात बारह बजे से श्रद्धालु कतार में लग जाते हैं और चार-पांच घंटे खड़े रहकर अपनी बारी आने की धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते हैं। हमारे बीच भी ऐसे उत्साही धर्मप्रवण सदस्यों की कमी नहीं थी जो आधी रात को उज्जैन गए और सुबह दर्शन करके लौटे। उन्हें इस अनुभव से जो आत्मिक शांति मिली होगी वह उनके प्रफुल्लित मुखानन पर साफ देखी जा सकती थी। मुझ जैसे सांसारिक प्राणी को यह कष्ट उठाना गवारा न था।
मुझे यहां बिलासपुर की दिवंगत कथा लेखिका सुश्री शशि तिवारी की एक कहानी का स्मरण हो आया है। उन्होंने लिखा था कि महाकाल के दर्शन एक बार में पूरे नहीं होते। वे अपने धाम में तीन बार बुलाते हैं। यह तो लोक मान्यता हुई। मैं शायद पांचवीं-छठवीं बार उज्जैन जा रहा था। महाकाल के पहले पहल दर्शन 1957 में बाबूजी के साथ किए थे। उसके बाद संयोग नहीं बना। इस बार दर्शन के लिए पहुंचा तो मेरे लिए सब कुछ नया ही था। तीर्थयात्रियों की हर साल बढ़ती हुई संख्या को ध्यान में रखकर मंदिर परिसर का विस्तार और साथ-साथ नवनिर्माण भी हुआ है। दर्शन करने के लिए लगभग आधा किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है और बाहर आने में भी उतनी ही दूरी तय करना पड़ती है। पहले गर्भगृह तक जा सकते थे, अब कुछ मीटर दूरी से दर्शन करना पड़ते हैं। दर्शन पथ में मंदिर का इतिहास कहीं-कहीं उत्कीर्ण है। एक प्रस्तर फलक पर उज्जैन के अनन्य विद्वान पंडित सूर्यनारायण व्यास के हवाले से उल्लेख है कि इस मंदिर का अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब सबने राजकोष से पोषण किया और जागीरें दीं। जहांगीर ने तो एक दिन में यहां साढ़े तीन हजार स्वर्ण मुद्राएं लुटाईं। यह इतिहास का वह पृष्ठ है जिसे हम संकीर्ण मतवाद के चलते जान-बूझ कर भूल जाना चाहते हैं।
उज्जैन यूं तो महाकाल की नगरी के रूप में प्रसिद्ध है, किन्तु सच पूछा जाए तो यह नगर ही मंदिरों का है। किसी समय वेगवती क्षिप्रा इस नगर की सीमा पर से बहती थी, वह लगभग सूख चुकी है और नर्मदा से पानी लाकर क्षिप्रा की प्यास बुझाई जा रही है। इसी तरह यहां पुरातात्विक महत्व के अनेक प्राचीन मंदिर हैं किन्तु उनका मूल स्वरूप भी क्षिप्रा की जलधारा की तरह खो चुका है। महाकालेश्वर हो या अन्य मंदिर, सबमें संरक्षण या सुविधाएं जुटाने के नाम पर जो परिवर्तन किए गए हैं उनके नीचे मंदिरों का प्राचीन सौंदर्य दब गया है। राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी हरसिद्धि के मंदिर में एक प्राचीन बावली है, जिसे लोहे के दरवाजे में बंद कर सामने बड़ा सा ताला लगा दिया गया है। मराठाकालीन दो भव्य दीप स्तंभ ही एक तरह से मंदिर की प्राचीनता का परिचय देते हैं।
एक मंदिर दुर्गा के स्वरूप गढ़कालिका का है, जो महाकवि कालिदास की आराध्य देवी थीं। यहां परिक्रमापथ में तीन सुंदर प्रस्तर फलक हैं, जिनमें कुछ कथाएं उत्कीर्ण हैं। ये फलक निश्चित रूप से हजार-आठ सौ साल पुराने होंगे किन्तु सिंदूर पोतकर इनकी सुंदरता नष्ट कर दी गई है। उज्जैन में ही सांदिपनी आश्रम है, किन्तु प्राचीन युग के उस गुरुकुल का कोई भी अवशेष वहां नहीं है। श्रद्धालुओं के लिए यही जानना पर्याप्त है कि कृष्ण-बलराम और सुदामा यहां पढ़े थे। भर्तृहरि की गुफा अपनी जगह पर सुरक्षित है, लेकिन वह नाथ संप्रदाय के नवनिर्मित मठ के घेरे में आ गई है। मंदिरों के इस विशाल समुच्चय में कालभैरव का अलग ही स्थान है। कालभैरव को महाकाल का सेनापति माना जाता है। यहां रोचक तथ्य है कि देवप्रतिमा को मदिरा का भोग लगाया जाता है। भक्तजन अपनी पसंद की मदिरा की बोतल लेकर आते हैं, पुजारी उसमें से कुछ हिस्सा निकालकर बोतल वापिस कर देते हैं जिसका आचमन भक्त बाद में करते होंगे! अगर मंदिर पाटलिपुत्र में होता तो क्या होता।
देशबंधु में 29 जून 2017 को प्रकाशित 

Friday, 23 June 2017

शिक्षा और परीक्षा-2



 पिछले सप्ताह इसी विषय पर चर्चा करते हुए मैंने शिक्षा जगत में स्वायत्तता की बात की थी। इसके साथ-साथ मेरा यह भी मानना है कि भारत जैसे अपार विविधता वाले देश में शिक्षा का विकेन्द्रीकरण भी होना चाहिए। आज जो माहौल है उसे देखते हुए ये दोनों बातें धारा के विपरीत मानी जाएंगी। लेकिन हर समय धारा के साथ बहने में समझदारी नहीं होती। एक तरफ तो हमारे सामने सुभाषित है कि- विद्या मनुष्य को विमुक्त करती है और दूसरी तरफ उसे अनेक तरह के बंधनों में जकडऩे की कोशिश की जा रही है।संस्कृत का यह सुभाषित 'सा विद्या या विमुक्तये न जाने कितने शिक्षण संस्थानों में ध्येय वाक्य के रूप में लिखा होता है, किन्तु इसका पालन करने में किसी की रुचि दिखाई नहीं देती। हम ऋग्वेद की सूक्ति का भी ध्यान करें जिसमें प्रार्थना की गई है कि विश्व की सभी दिशाओं से उत्तम विचारों को हम तक आने दें। जब ज्ञान देने वाली संस्थाओं को सत्ता की प्राचीरों में कैद कर दिया जाएगा तो उत्तम विचार कहां से आएंगे?
मैं पिछले कई दशकों से देख रहा हूं कि शिक्षा में प्रगति और नवाचार के नाम पर जो नित नए निर्णय और प्रयोग हो रहे हैं उनसे देश में संस्थागत शिक्षा के स्तर में निरंतर गिरावट आ रही है। जब शासन द्वारा अनुमोदित शिक्षा व्यवस्था से हटकर अन्यत्र नए प्रयोग होते हैं तो वे भी देखते ही देखते हुक्मरानों को नागवार गुजरने लगते हैं। सच पूछा जाए तो हमारे देश में शिक्षातंत्र वर्गभेद और वर्णभेद को मिटाने के बजाय उसे पुख्ता करने का काम कर रहा है। यहां एक उदाहरण देना प्रासंगिक होगा। देश की राजधानी दिल्ली में संस्कृति विद्यालय नाम का एक निजी स्कूल है। इस शाला में आम जनता के प्रवेश की कोई गुंजाइश नहीं है। यहां मुख्यत: आईएएस तथा अन्य उच्च सेवाओं में पदस्थ अफसरों के बच्चे ही दाखिला ले सकते हैं। ठीक है आप बड़े आदमी हैं, अपने बच्चों के लिए आपने सबसे अलग एक स्कूल बना लिया है, लेकिन फिर केन्द्र सरकार उच्चवर्ग के इस स्कूल के लिए भी तीन करोड़ रुपया या उससे अधिक की सालाना ग्रांट क्यों देती है?
कुछ दिन पहले फेसबुक पर एक सज्जन ने माकूल टिप्पणी की कि सरकारी नौकरियां सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए आरक्षित होना चाहिए, जबकि जिनके बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं वे प्राइवेट सेक्टर में काम करें। इस पर एक अन्य सज्जन की टिप्पणी आई कि सरकारी स्कूलों के हाल बेहाल हैं पहले उन्हें दुरुस्त कीजिए। मैं भी यही कह रहा हूं। अगर हमारे राजनेताओं और अफसरों के बच्चे निजी संस्थानों में पढ़ेंगे तो सरकारी स्कूलोंकॉलेजों पर कौन ध्यान देगा। जो लोग  सरकार का नमक खा रहे हैं उन्हें तो सबसे पहले सरकार द्वारा स्थापित संस्थाओं में ही अपनी संतानों को भेजना चाहिए। सत्ताधीश ऐसा नहीं करते क्योंकि वे आम  जनता से दूरी बना कर रखना चाहते हैं। यह स्थिति उस समय नहीं थी जब मैं स्कूल में पढ़ता था। मेरे सहपाठियों में जिला कलेक्टर का बेटा था, तो गुड़पट्टी बनाने वाले एक मामूली से कारीगर का बेटा भी। हम दोस्तों के बीच कोई भेदभाव नहीं था, सब एक-दूसरे के घर आते-जाते थे, साथ-साथ खेलते-कूदते थे, लड़ते-झगड़ते थे, टिफिन भी मिल -बांट कर खाते थे।
शिक्षा जगत में जब बड़ी हद तक स्वायत्तता का माहौल था तो समाज में शिक्षकों का सम्मान भी होता था। यह सही है कि कुछ लोग इस स्वायत्ता से की गई अपेक्षा पर खरे न उतरकर उसका दुरुपयोग करते थे। उनका प्रतिशत बहुत कम था, परंतु ऐसा करने वालों ने नीति-निर्माताओं को बहाना दे दिया कि वे शिक्षा क्षेत्र में हस्तक्षेप करने लगे। इसका दुष्परिणाम सामने है।  विश्वविद्यालय का उपकुलपति, महाविद्यालय का प्राचार्य और विद्यालय का प्रधानाध्यापक अपने-अपने स्तर पर ये सम्मान के पात्र होते थे।
जनता की निगाहों में इनका ओहदा कमिश्नर, कलेक्टर या मंत्री से कम नहीं होता था। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के संस्थापक कुलपति डॉ. बाबूराम सक्सेना के बारे में प्रसिद्ध है कि वे मुख्यमंत्री द्वारिकाप्रसाद मिश्र के रायपुर आगमन पर उनकी अगवानी करने विमानतल नहीं गए। जब मिश्र जी ने संदेश भेजकर उन्हें सर्किट हाउस बुलाया तभी वे उनसे मिलने गए। आज तो स्थिति यह है कि  कलेक्टर के सामने वाइस चांसलर की भी कोई हैसियत नहीं रही है। भले ही हिन्दी पर्यायवाची उपकुलपति के बजाय कुलपति क्यों  हो गया हो।
यह इसलिए हो रहा है क्योंकि विधानसभा में बैठकर जो नीतियां बना रहे हैं और मंत्रालय में बैठकर जो निर्णय ले रहे हैं वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल-कॉलेज में पढ़ने नहीं भेजते। उनके बच्चे तो धन्नासेठों के बच्चों के साथ देश-विदेश के अभिजात्य से भरे शिक्षण संस्थानों में पढ़ने जाते हैं। हुक्मरानों की इस पीढ़ी के साथ यह दिक्कत भी है कि देश के राजनीतिक इतिहास से इनका परिचय बहुत क्षीण है।  ये जहां पर हैं वहां सिर्फ हुक्म चलाने के लिए बैठे हैं। इनकी नज़रों में शिक्षक की हैसियत एक मुलाज़िम से अधिक नहीं है।
शिक्षक भी हैं कि उनका अधिकतर समय छठवें-सातवें वेतन आयोग की ओर लगा रहता है, कई शिक्षकों का मन तो उसमें भी नहीं भरता और वे धनोपार्जन के लिए हर तरह से जुटे रहते हैं। ऐसे शिक्षकों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। इन्हें शिक्षातंत्र की स्वायत्तता से कोई मतलब नहीं है। अपना काम बन जाए उतना ही काफी है। एकजुटता और संघर्ष के रास्ते पर चलना इन्हें गवारा नहीं है।
यही कारण है कि शिक्षा क्षेत्र में तुगलकी फैसले होते हैं और उन पर कोई सवाल खड़ा नहीं होता। कोठारी कमीशन की रिपोर्ट  पचास साल से ऊपर हो गए। सरकार और शिक्षक दोनों में उसे लागू करने की कोई प्रतिबद्धता नहीं थी तो रिपोर्ट जहां की तहां धरी  गई। आज यदि विश्व में हमें सचमुच अपना रुतबा कायम करना है तो उसके लिए सबसे पहली शर्त शिक्षा में स्वायत्तता लाने की है। सरकार को अपनी भूमिका सहस्राब्दी लक्ष्य और उसके बाद आए टिकाऊ विकास लक्ष्य के अंतर्गत किए गए वादे को पूरा करना तक सीमित रखना चाहिए। आप जीडीपी का छह प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करें; यह खर्च कैसे हो, उसकी योजना कैसे बने, कहां कैसे स्कूल-कॉलेज की आवश्यकता है। ये सारे निर्णय शिक्षा विशेषज्ञ लें और इस हेतु समाज के साथ व्यापक परामर्श किया जाए। यह नहीं कि जहां मंत्रीजी का मन हुआ वहां स्कूल खोलने की घोषणा कर दी। इस तरह की सस्ती लोकप्रियता के मोह से हमारे नेताओं को बचना चाहिए।
यह देखकर कौतुक होता है कि मंत्री और अफसर जब मन आए तब किसी सरकारी शाला में क्लास लेने पहुंच जाते हैं। आप निरीक्षण करने जाएं वहां तक तो ठीक है, लेकिन बच्चों को पढ़ाना आपका काम नहीं है और न ही आप इसके लिए प्रशिक्षित हैं। यह सवाल भी उठता है कि आप किसी प्राइवेट स्कूल में जाकर क्लास क्यों नहीं लेते? इसी तरह का काम कुछ समाजसेवी संस्था भी करती हैं। वे अपने सदस्यों से कहती हैं कि खाली समय में जाकर स्कूल में पढ़ाएं। इन्हें नहीं पता कि पढ़ाने की भी एक सुचारु विधि होती है। आपके मन में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों के प्रति इतना ही दर्द है तो स्कूलों   में नियमित शिक्षक की व्यवस्था करवा दीजिए। उन बच्चों की दुआएं  आपको मिलेंगी। मेरा मानना है कि जैसे शेर जंगल का राजा होता है एक प्राचार्य या प्रधानपाठक को भी अपने संस्थान में उसी रौब के साथ रहना चाहिए। प्रोफेसर उमादास मुखर्जी, प्रोफेसर एसडी मिश्रा, प्रोफेसर रणवीर सिंह शास्त्री जैसे व्यक्ति आदर्श के रूप में हमारे सामने हैं।
मैंने जैसा कि शुरू में कहा हमारे बहुविध देश में शिक्षा का विकेन्द्रीकरण होना भी आवश्यक है। अभी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा विभिन्न नियामक संस्थाओं द्वारा पाठ्यक्रम के बारे में जो व्यवस्था की गई है वह कतर्ई संतोषजनक नहीं है। सुना है कि वर्तमान व्यवस्था को और कड़ा किया जा रहा है अगर ऐसा हुआ तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा। दिल्ली में बैठकर पूरे देश के बारे में एकसार फैसले किसी भी मामले में लेना वांछित नहीं है। शिक्षा के मामले में तो बिल्कुल नहीं। इसी तरह भोपाल या रायपुर में बैठकर भी समूचे प्रदेश के बारे में निर्णय लेने को मैं उचित नहीं मानता।
प्राथमिक शाला स्तर पर बुनियादी पढ़ाई में किसी सीमा तक एकरूपता हो सकती है, लेकिन वहां भी पूरी तरह से नहीं। किसी जिले में स्कूलों में क्या पढ़ाया जाए, यह निर्णय वहां का स्कूल बोर्ड करे, विश्वविद्यालय में वहां के कुलपति और अध्यापक मिलकर तय करें और फिर इतनी निगरानी रखी जाए कि विद्यालय, महाविद्यालय अथवा यूटीडी के परिणाम कैसे आ रहे हैं। उसमें अगर कमजोरी दिखे तो संस्थाप्रमुख उसके लिए जवाबदेह हो। लेकिन ऊपर बैठकर सरकार सबको एक ही लाठी से हांकने की कोशिश करे तो इसका प्रतिकार करना आवश्यक है।

देशबंधु में 22 जून 2017 को प्रकाशित 

Wednesday, 14 June 2017

शिक्षा और परीक्षा



एक कोई वक्त था जब 31 मार्च तक सारी परीक्षाएं निपट जाती थीं। शालाओं के परीक्षाफल 30 अप्रैल तक और विश्वविद्यालय के मई के दूसरे सप्ताह तक घोषित हो जाते थे। विद्यार्थियों को मई-जून दो माह का पूरा अवकाश मिलता था, जिसका सदुपयोग करने के लिए बहुत सी योजनाएं होती थीं। बहुत से बच्चे अपने गांव या मामा गांव जाते थे, एक नया माहौल जिसमें सीखने के लिए काफी कुछ होता था, जिनको सुविधा होती थी वे देशाटन पर जा सकते थे और कुछ नहीं हुआ तो गर्मी की दोपहरें घर के भीतर परिवार के सदस्यों तथा मित्रों के साथ भांति-भांति के खेल खेलने में बीत जाती थीं।जिन्हें पढऩे का शौक होता था वे लाइब्रेरी से किताबें लेकर आ जाते थे। यही समय खासकर उत्तर-भारत में शादियों का सीजन होता था तो उसका आनंद भी घराती या बराती बनकर बच्चे उठाते थे। कुल मिलाकर छुट्टियों के दिन, छुट्टियों की तरह बीतते थे जिसका बेहद मनोरंजक चित्र अजीत कुमार ने अपने लघु उपन्यास 'छुट्टियां’ में किया है।
उस बीते हुए समय की तुलना में आज का दृश्य देखता हूं तो कोफ्त होने के साथ-साथ गुस्सा भी आने लगता है। एक तरफ लगता है कि हमने अपनी शिक्षा व्यवस्था का मजाक बनाकर रख दिया है, तो दूसरी तरफ यह देखकर मन को पीड़ा होती है कि हमने कैसे अपने युवजनों को मशीन में तब्दील कर दिया है। एक तो वैसे ही साल भर परीक्षाएं होते रहती हैं, कभी वीकली टेस्ट, कभी मंथली टेस्ट, कभी प्रोजेक्ट वर्क, कभी कुछ और।बच्चों को अपने लिए मानो समय ही नहीं मिलता। फिर मां-बाप के सपने कि उनकी संतान सर्वगुण सम्पन्न हो, जो पढ़ाई में अव्वल, खेलकूद में सबसे आगे और नृत्य, संगीत, चित्रकला सबमें प्रवीण हो। स्कूल में होमवर्क दे दिया जाता है, उसका बोझ तो रहता ही है, ऐसे में हॉबी क्लास के लिए समय कब निकले, तो अक्सर शनिवार, रविवार का अवकाश उसकी भेंट चढ़ जाता है। अब पहले वाली बात तो है नहीं कि एक तिमाही, एक छमाही और एक वार्षिक परीक्षा में काम चल जाए। तब हॉबी पूरी करने के लिए भी समय मिल जाता था और खेलकूद तो स्कूल शिक्षा का अंग ही था।
जब हम पढ़ रहे थे, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, आईआईटी, आईआईएम तब भी थे। सिविल सर्विसेस की परीक्षाएं भी होती थीं, जिनकी अभिलाषा उस ओर होती थी, वे उसकी तैयारी करते थे। लेकिन अभी जैसी आपाधापी मची है इसकी कल्पना हमने नहीं की थी। शायद जमाना आगे निकल गया है और मुझ जैसे लोग पीछे रह गए हैं।ऐसा नहीं कि आज से साठ साल पहले सब कुछ अच्छा ही अच्छा था। परीक्षाओं में नकल होती थी, नकलची छात्र झगड़ा करने पर उतारू भी होते थे, कितने सारे साथी परीक्षा के दिनों में हनुमानजी के मंदिर पर मत्था टेकने जाते थे, फेल होने पर छात्रों द्वारा आत्महत्या करने के दु:खद प्रसंग भी सामने आते थे, कई बार गुंडानुमा छात्र भी छात्रसंघ का अध्यक्ष बन जाते थे। इस सबके बावजूद सामाजिक ताना-बाना काफी मजबूत था और नौजवानों में अपने भविष्य को लेकर इतनी अधिक दुश्चिंता और हताशा नहीं थी। एक विश्वास था कि सब कुछ समाप्त नहीं हो गया है। उस समय न तो बुजुर्ग पीढ़ी आत्मकेन्द्रित थी और न नई पीढ़ी। समाज में सामूहिकता की एक छाया थी, जिसमें ठहरने का वक्त मिल जाता था।
मैं अभी देख रहा हूं कि एक तरफ वार्षिक परीक्षाओं के नतीजे आ रहे हैं और दूसरी ओर विद्यार्थी हर दूसरे दिन एक नई परीक्षा देने की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं। यह सुनने में ही विचित्र लगता है कि परीक्षा में आजकल सौ प्रतिशत तक अंक मिल रहे हैं। देश की राजधानी के कॉलेजों में कटऑफ होता है जिसके तहत तिरानबे-चौरानबे प्रतिशत से कम अंक पाने वाले विद्यार्थियों को दाखिला ही नहीं मिल पाता। यह परीक्षापद्धति अपनी समझ में नहीं आती। बताते हैं कि आजकल ऑब्जेक्टिव मैथड से परीक्षा ली जाती है। होती होगी।इस तरह के प्रयोगों के चलते परीक्षा में बैठने वाले बच्चों का खाना-पीना तक मुहाल हो जाता है। साल भर तैयारी करते रहो, चार विकल्प में से एक उत्तर सही है उसे याद करो, और अपना पूरा दिमाग उसी में लगा दो। मैं नहीं जानता कि इसमें विद्यार्थियों के स्वतंत्र मानसिक विकास का कितना अवसर होता है। वे इस कठिन परीक्षा पद्धति की तैयारियों के बीच देशकाल के बारे में कितना ज्ञान हासिल कर पाते हैं। उनके कोमल हृदय का रस कहीं ये परीक्षा पद्धति सोख तो नहीं लेती है?
एक बात समझ आती है कि देश में बहुत सी अन्य बातों के साथ शिक्षा जगत में भी जो परिवर्तन नज़र आते हैं उसका बहुत कुछ श्रेय नवपूंजीवादी विश्वव्यवस्था को है। कभी-कभी महसूस होता है कि सारी दुनिया जैसे किसी दौड़ में भाग ले रही है, एक के पीछे एक लोग भागे जा रहे हैं, क्यों, कहां, किसलिए यह शायद किसी को पता नहीं। आजकल तो हर किसी मौके पर दौड़ों का आयोजन होने लगा है- रन फॉर दिस, रन फॉर दैट, शायद इसी सोच का प्रतिबिंब है।इधर हाल में बहुत सी कॉमेडी फिल्में आई हैं जैसे वेलकम आदि। उनमें भी सब लोग इसी तरह यहां से वहां दौड़ लगाते नज़र आते हैं, लेकिन अंत में हासिल कुछ नहीं होता। ये फिल्में भी एक तरह से इस नई सोच को ही दर्शाती हैं। अब चूंकि भारत भी विश्व ग्राम का अंग बन चुका है, जिसका पहला प्रमाण हमारे सामने पुराने गुडग़ांव और नए गुरुग्राम के रूप में सामने है, तो स्वाभाविक ही हम दौड़ में किसी से पीछे नहीं रहना चाहते। इसका परिणाम है कि शिक्षा का निजीकरण प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में हो रहा है। बहुत सारे निजी विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, तकनीकी संस्थान इत्यादि प्रत्यक्ष उदाहरण हैं किंतु परोक्ष निजीकरण का मामला एकदम से समझ नहीं आता।
शिक्षा के क्षेत्र में एकाएक कितनी तो परामर्शदात्री एजेंसियां काम करने लगी हैं। वे बताती हैं कि देश की शिक्षा व्यवस्था को विश्व स्तर पर लाने के लिए आपको क्या करना चाहिए। उनके ब्रीफकेस में आपके लिए अनगिनत प्रोजेक्ट रिपोर्टें हैं। मसलन, बिना अध्यापकों के शिक्षा संस्थान को कैसे चलाएं, इंटरनेट की सहायता लेकर ऑनलाइन पढ़ाई कैसे की जाए, वर्चुअल क्लासरूम क्या है, ई-क्लासें कैसे चलती हैं, संस्था की ग्रेडिंग क्यों और कैसे हो, पाठ्यक्रम में क्या तब्दीली लाई जाए, नैक, नैट, स्लेट, जीईई मेन, जीईई एडवांस जैसे फार्मूले एक के बाद एक भानुमति के पिटारे से निकलते रहते हैं।मंत्रालय में बैठे अफसर इन सुझावों से बहुत खुश होते हैं और वे मंत्री के दस्तखत लेकर आदेश जारी कर देते हैं जिन्हें मानना वाइस चॉन्सलर से लेकर प्रायमरी स्कूल के शिक्षाकर्मी तक का पुनीत कर्तव्य बन जाता है।
मुझे लगभग साठ साल पहले लिखी गई किताब का ध्यान आता है। ' अग्ली अमेरिकन’ शीर्षक इस पुस्तक में व्यंग्य में बताया गया था कि कैसे अमेरिकी विशेषज्ञ किसी विकासशील देश में आकर वहां के लोगों को मुर्गीपालन कैसे किया जाता है सिखाते हैं। उस समय वैश्वीकरण का यह दौर प्रारंभ नहीं हुआ था, लेकिन यह पुस्तक उसका एक प्रारंभिक संकेत देती है। आज वही सब हो रहा है। भारत के स्कूल कैसे चलें, कॉलेजों में पढ़ाई कैसे हो, तकनीकी संस्थानों की क्या भूमिका हो, यह सब नवपूंजीवाद के पंडे-पुरोहित हमें सिखा रहे हैं।भारत में मार्च तक परीक्षाएं क्यों खत्म हो जाती थीं, उसके पीछे क्या कारण था, इसे बिना समझे हमने शिक्षा सत्र की समय सारिणी बदल दी, परीक्षा लेने के जो सीधे-सरल तरीके थे, उनको अनावश्यक रूप से दीर्घ सूत्रीय और जटिल बना दिया, बच्चे बचपन में ही सारा ज्ञान हासिल कर लें, इसलिए उन पर भारी-भरकम बस्ते का बोझ लाद दिया और भी न जाने क्या-क्या...
इस सबमें सबसे अधिक नुकसान हुआ है शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता का और साथ-साथ शिक्षकों की प्रतिष्ठा का। विद्यार्थियों का नुकसान तो कई तरह से हो ही रहा है। मेरा पक्का मानना है कि अगर हमें अपनी नई पीढ़ी का सच्चे मन से अच्छा भविष्य बनाना है तो उसके लिए शिक्षा जगत में स्वायत्ता कायम होगी। कोई भी शिक्षण संस्थान अपने शिक्षकों के बल पर अपनी पहचान बनाता है।  यदि वे शिक्षक  समय राजनीतिक अथवा प्रशासनिक दबाव में रहेंगे तो कभी भी अपना काम ठीक से नहीं कर पाएंगे। विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न आयामों में दी जाने वाली शिक्षा की पद्धति व मूल्यांकन का तरीका क्या हो, ऐसे सारे निर्णय शिक्षा संस्थानों के प्रमुख ही आपस में मिलकर तय करें। उसमें लालफीताशाही का दखल न हो यह बहुत आवश्यक है। उन्हें यह स्वतंत्रता होगी तो वर्तमान में विद्यार्थियों के मन मस्तिष्क पर अनुचित दबाव डालने वाली परीक्षा पद्धति से उन्हें मुक्ति मिलेगी और वे निद्र्वन्द्व भाव से अपने भविष्य के बारे में फैसला कर सकेंगे।
देशबंधु में 15 जुलाई 2017 को प्रकाशित 

Friday, 9 June 2017

विश्व चेतना के कवि मुक्तिबोध



बीसवीं सदी सभ्यता के इतिहास का ऐसा कालखंड है जिसकी तुलना किसी और समय से नहीं की जा सकती। उन सौ सालों में विश्व में जो युगांतरकारी परिवर्तन हुए, जो उलटफेर हुए, जिस तेजी के साथ बदलाव आए, वैसे पहले कभी नहीं देखे गए। आज इक्कीसवीं सदी में जब यातायात, संचार और सूचना के क्षेत्र में नए-नए आविष्कारों की बदौलत विश्वग्राम की अवधारणा पर बार-बार चर्चाएं हो रही हैं तब यह ध्यान देना दिलचस्प होगा कि बीसवीं सदी में प्रौद्योगिकी के ये उपकरण हासिल न होने के बावजूद जापान से लेकर अमेरिका तक विश्व के तमाम समाजों में एकता, समता और बंधुत्व के सूत्र तलाशे जा रहे थे, परिभाषित किए जा रहे थे और एक नए समाज की रचना का स्वप्न करोड़ों लोगों की आँखों में बसने लगा था। बीसवीं सदी वह समय था जिसकी शुरूआत में कुछ ऐसे आविष्कार हुए जिन्होंने हमारे दैनंदिन जीवन को सुलभ कराने में सहायता की। उस सदी में ही मनुष्य ने अंतरिक्ष तक पंख फैलाकर उडऩे के सफल प्रयोग किए। बीसवीं सदी ने दो विश्व युद्ध भी देखे जिन्होंने समूची मानवता को आक्रांत कर दिया। इस दौर में नृशंस फासीवादी सत्ताओं का उत्थान व पतन भी हुआ। रूस में महान अक्टूबर क्रांति हुई, जिसका शताब्दी वर्ष चल रहा है। संयोग है कि जिन कार्ल मार्क्स के विचार और दर्शन सेे प्रभावित होकर बोल्शेविक क्रांति हुई, उनकी यह दूसरी जन्मशती का वर्ष भी है।
 भारत के स्वाधीनता संग्राम और एक सौ नब्बे साल की गुलामी से आजाद होने की अनूठी कथा भी इस सदी के पूर्वार्ध में लिखी गई। उपनिवेशवाद के जुएं तले दबे एशिया, अफ्रीका व लेटिन अमेरिका के देशों को भारत के स्वाधीनता संग्राम से बड़ी प्रेरणा व ताकत मिली। 1950 के बाद देखते ही देखते अनेक देशों में स्वाधीनता का सूर्योदय हुआ। यही समय था जब रंगभेद के विरुद्ध संयुक्त राज्य अमेरिका में और उधर दक्षिण अफ्रीका सहित अन्य देशों में जनसंघर्ष हुए। मार्टिन लूथर किंग जूनियर व नेल्सन मंडेला जैसी विश्व विभूतियों ने गांधी को अपना गुरु माना। इजिप्त के नासिर, इंडोनेशिया के सुकार्णों, घाना के एनक्रूमा आदि स्वाधीनचेता जननायकों के लिए जवाहरलाल नेहरू आदर्श बने। बीसवीं सदी का इतिहास संक्षेप में लिखने बैठें तो भी सैकड़ों पन्नों की जरूरत होगी।
 राजनीति, भूगोल, रसायन, भौतिकी, अर्थशास्त्र, सामाजिक विज्ञान- कोई भी क्षेत्र बाकी नहीं है, जिसमें इस अवधि में नए-नए अध्याय न लिखे गए हों। कहना होगा कि बीसवीं सदी ने हमारे समूचे जीवन को प्रभावित ही नहीं किया, बल्कि कई तरह से बदल भी दिया। ये जो बदलाव आए इनके ब्यौरे इतिहास की पुस्तकों में उपलब्ध हैं। ज्ञान-विज्ञान की अलग-अलग शाखाओं में भी इनका विषय-केन्द्रित दस्तावेजीकरण हुआ है। साहित्यकार भी इन युगांतरकारी परिवर्तनों से दूर और तटस्थ कैसे रह पाता? विश्व की तमाम भाषाओं के साहित्य में इस बदले हुए समय की तस्वीरें देखने मिलती हैं। हिन्दी साहित्य में इस दृष्टि से विचार करें तो हम पाते हैं कि बीसवीं सदी के विश्व समाज में जो नई पदचापें, ध्वनियां और धडक़नें सुनाई पड़ रही थी उन्हें अगर किसी लेखक ने पकड़ा था तो वह गजानन माधव मुक्तिबोध ही थे। जिस तरह कोई सयाना धरती से कान लगाकर दूर से आती घोड़ों की थाप सुनकर गांव को सतर्क कर देता था, कुछ वैसी ही बात मुक्तिबोध जी में है। वे बदलते समय की आहटों को बहुत ध्यान के साथ सुन और समझ रहे थे।
 इसका प्रमाण उनके लेखों और निबंधों में मिलता है। क्लॉड ईथरली जैसी कहानी में और तमाम कविताओं में यहां से वहां तक उनकी विश्व दृष्टि को देखा जा सकता है। मैं समझता हूं कि उनके समकालीनों में ही नहीं, बल्कि बीसवीं सदी के हिन्दी लेखकों में एक अज्ञेय ही थे जिनके लेखों में और दिनमान के संपादन में इस दृष्टि का आभास होता है। मैं यह भी सोचता हूं कि अपने से पहले के तमाम बड़े साहित्यकारों के बीच मुक्तिबोध ने जयशंकर प्रसाद की कामायनी को ही सर्वांग समीक्षा के लिए क्यों चुना! क्या शायद इसलिए कि कामायनी का जो महाकाव्यात्मक फलक है वही मुक्तिबोध की लंबी कविताओं में है? या इसलिए कि कामायनी में भी एक वैश्विक परिवर्तन, एक नई दुनिया निर्मित करने का मिथक बुना गया उससे मुक्तिबोध प्रभावित हुए? मुक्तिबोध की रचनाओं पर विगत पचास वर्षों में बहुत चर्चाएं हुई। उनकी अनेक रचनाएं हमारे लिए तब प्रासंगिक हो उठती हैं जब रंगमंच से उनका पाठ करते हुए हमारे कलाकार वर्तमान के विद्रूप को जनता के सामने लाने का यत्न करते है। ऐसे भी कुछ अध्यापक व समीक्षक हैं जो मुक्तिबोध की कविताओं को मध्यमवर्गीय चेतना का कुंठित स्वर मानकर खारिज कर देते हैं, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है।
 अधिकतर लेखक तो यही मानते हैं कि मुक्तिबोध की रचनाओं में प्रखर प्रगतिशीलता है; कि ये रचनाएं अपने समय से मुठभेड़ करती हैं और आगे का रास्ता बताती हैं। मुक्तिबोध ने साहित्यालोचना के जो नए प्रतिमान रचे हैं वे आज सर्वमान्य हैं। कला के तीन क्षण का हवाला आज हर कोई देता है। ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान की बात भी बार-बार की जाती है। उन्होंने कबीर से लेकर सुभद्राकुमारी चौहान तक पर जो लिखा है वह एक नए आलोक में इनकी रचनाओं को समझने में सहायक होता है। ‘अंधेरे में’ कविता को तो मुक्तिबोध की महाकाव्यात्मक प्रतिभा का उत्स स्वीकार कर लिया गया है।
 मैं फिलहाल इनसे हटकर मुक्तिबोध की वैश्विक चेतना को केन्द्र में रख उनकी चर्चा करना चाहता हूं। मुझे लगता है कि मुक्तिबोध की रचनाओं की यह विशिष्टता हिन्दी ही नहीं, समूचे भारतीय साहित्य में लगभग दुर्लभ है। एक विराट फलक पर अपने समय की त्रासद सच्चाइयों और विसंगतियों की गहरी और तार्किक पड़ताल मुक्तिबोध जी ने की है वह सामान्यत: अन्य रचनाकारों में देखने नहीं मिलती। यूं तो हर साहित्यकार एक मायने में विद्रोही होता है। वह व्यवस्था के मनुष्य विरोधी चरित्र का चित्रण करता ही है, लेकिन यह देखना जरूरी है कि विरोध का स्वर तात्कालिक है अथवा स्थायी प्रभाव डालने में सक्षम है। क्या विरोध भावनामूलक, इसलिए सतही है अथवा उसमें गहराई में जाकर कारणों की पड़ताल की गई है। मुझे यहां मुक्तिबोध जी की दो रचनाएं, जिनसे मैं खासा प्रभावित हूं, विशेषकर उल्लेखनीय प्रतीत होती हैं।
 एक तो उनकी कहानी क्लॉड ईथरली है जिसका उल्लेख शुरू में हो गया है। यह कहानी अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर अणुबम गिराए जाने की विभीषिका को केन्द्र में रखकर लिखी गई है। यह एक ओर साम्राज्यवादी, पूंजीवादी अमेरिका के सत्ताधारी वर्ग के दोहरे चरित्र को उद्घाटित करती है, वहीं दूसरी ओर भारत का अभिजात समाज कैसे इस घनघोर मानवीय त्रासदी से निर्लिप्त रहकर अमेरिका के इन्द्रजालिक स्वर्ग में अपने लिए शरण ढूंढता है, इसका भी बेबाक चित्रण है। कहानी का मुख्य पात्र विमान चालक क्लॉड ईथरली है जो अणुबम गिराने वाले दस्ते में शामिल था, जो अपने आकाओं के आदेश पर किए गए नरसंहार को देख लेने के बाद अपराध बोध से भर जाता है। वह अपने आपको मनुष्य समाज से बहिष्कृत कर लेना चाहता है, लेकिन अमेरिका की आम जनता, जिसे यह सब नहीं पता, उसकी निगाहों में वह एक नायक है। एक नेशनल हीरो, जिसने देशभक्ति का अनुपम उदाहरण पेश किया है। यह कहानी युद्ध की नि:सारता को उजागर करती है, युद्ध और हिंसा से कौन-सा वर्ग लाभान्वित होता है यह बतलाती है और एक वीभत्स सच्चाई सामने लाकर मन को ग्लानि से भर देती है। आज जब एटमी हथियारों की दौड़ कम नहीं हो रही बल्कि नरसंहार के नए-नए तरीके और नए-नए उपकरण विकसित हो रहे हैं तब मुक्तिबोध की कहानी एक चेतावनी की तरह हमारे सामने आती है। हमारे अभिजात वर्ग के जीवन का खोखलापन, आडंबर और लालच तब से अब तक कितना बढ़ गया है- 1953 में लिखी कहानी 2017 में भी विचार करने का अवसर जुटाती है।
 मुक्तिबोध की कुछ कविताएं हैं जो सहचर मित्रों को संबोधित हैं। उनके ज्येष्ठ सुपुत्र रमेश मुक्तिबोध ने 2001 में एक अड़तालीस पेज की पुस्तिका के रूप में इन्हें प्रकाशित किया है। इनमें दो कविताएं काफी लंबी हैं, तीन-चार कविताएं छोटी हैं। सबके शीर्षक अलग-अलग हैं, किन्तु मुझे लगता है मानो ये सब मिलकर एक लंबी कविता ही बनाती हैं। ये कविताएं किसी एक मित्र को संबोधित हैं अथवा अलग-अलग मित्रों को, इसका कोई संकेत संकलनकर्ता ने नहीं दिया है। वैसे इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। इस पुस्तिका में ही मुक्तिबोध के आत्मवक्तव्य का एक संक्षिप्त अंश प्रकाशित किया गया है जो इस प्रकार है- मैं उन सौभाग्यशाली व्यक्तियों में से हूं जिसे अपने गली-कूचे में रहनेवालों का स्नेह प्राप्त हुआ। वे मेरी ही भांति छोटी-छोटी हस्तियां हैं। किन्तु उनके पेचीदा संघर्ष, अथाह प्रेम करने का उनका हार्दिक सामथ्र्य, और बौद्धिक जिज्ञासा के साथ ही साथ, उनकी साहसिक पहल, उनकी रोमैण्टिक कल्पना, उनकी राजनैतिक आशा-आकांक्षाएं, उनके समाजनैतिक स्वप्न मेरे चारों ओर चक्कर लगाने लगे। (आत्म-वक्तव्य : दो / मुक्तिबोध रचनावली खण्ड-5 पृष्ठ 267) इस वक्तव्य से हमारा यह अनुमान लगाना गलत नहीं होगा कि कवि ने भारत के, बल्कि विश्व के सामान्यजन को ये कविताएं संबोधित की हैं जिनसे कि वे बहुत प्रेम करते थे और जिनसे उन्हें बहुत आशाएं हैं।
 मुक्तिबोध की कविताओं में भारत की अंधकार भरी गलियों का जिक्र बार-बार आता है, लेकिन वे आश्वस्त हैं। उनके मन में अपार आस्था है कि जनता अपने संघर्षों में विजयी होगी, उसे मुक्ति मिलेगी और अंधकार दूर होगा। वे जानते हैं कि आमजन को बेहद कठोर स्थितियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए वे कभी जिंदगी के फूटे घुटनों की बात करते हैं, कभी छाती पर पड़े घावों का जिक्र करते हैं। थूहर के जंगल इन कविताओं में बार-बार आते हैं। दैनिक जिंदगी जलते हुए पथरीले सूखे हुए घाटों पर बीतती है। कुटियों में रहने वाले अपनी ही हड्डियां जलाकर ठिठुरते प्राणों को सर्दी की रातों में गरमाते हैं। आमजन को ऐसी इस दारुण परिस्थितियों को जीते हुए विक्षोभ होता है, क्रोध आता है लेकिन वह फूटे घुटनों से बहती रक्तधार से अविचलित कांटों से शरीर के छिल जाने की फिक्र न करते हुए आगे बढ़ता जाता है। इस रास्ते पर कौन उसके साथी बनते हैं? कवि मुक्तिबोध लेखक का धर्म निभाते हैं, वे संघर्षशील जनता के साथ हैं। वे मानते हैं कि वे कलम के मजदूर हैं और निम्नलिखित पंक्तियों में जनता के साथ अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं-
इस रास्ते पर हम लेखक मज़दूरी करते
हम मजबूरी खूब समझनेवाले दिल हैं
लोक विरोधी पाप शक्तियों से मुठभेड़ें
मुंहज़ोरी, शहज़ोरी, सीना ज़ोरी करते।
कवि मेहनतकश जनता के साथ, सर्वहारा के साथ सिर्फ शाब्दिक सहानुभूति व्यक्त नहीं करता, वह उनके संघर्षों में किस तरह साथ देता है इस कवितांश में देखा जा सकता है- 
देखते हो यह भी कि 
ज़िन्दगी के कंधे पर झुकी हुई वजनदार
जन-अनुभवों की छलछलाती भरी हुई
कावड़ का मीठा पानी
देता है प्राणदान
दहकते ग्रीष्म में सचाई के बरगद के तले, अरे
पिलाता है मानव-अमृत, जीवन-अमृत
जनता का प्याऊ अरे, दिलभरे
पीती है हृदय की कली
पीते हैं मजूर कूली
पीते हैं गरीब लोग
कलम के हमाल और 
मटियाले चेहरों के मेहनत के कमाल लोग
पीते हैं मानव-अमृत दोनों हाथों भर-भर
मेरे मित्र, सहचर
सूखा हुआ तरु ज्यों कि 
ताज़ा मेघ-जल पिये, पहाड़ों पर हरियाय
प्राणों में यौवन की नई-नई धडक़नें
आंखों में नीली भोर धीरे-धीरे तिर आय।
मुक्तिबोध के मित्रों में किसान, मजदूर, सिपाही- ये सब हैं। उनके किसान के मन में वह श्रद्धा या विश्वास है जो मिट्टी से सने लोहे के फाल सी धारदार है जिससे वह जिंदगी के खेतों में मुक्ति के लेखों की रेखाएं खींचता है। उनका सिपाही मित्र कहीं दूर युद्धभूमि में वतन की याद लिए गीत गाता है, जिसे माता-पिता का प्यार, मजदूर का पसीना और सिपाही का लोहू ये सब मिलकर एक धार बना देते हैं, जिससे ज्ञान, क्रांति और मुक्ति के गीतों की रचना होती है। मुक्तिबोध अपने मजदूर मित्र के पैरों में गुंथी हुई नसों की गठानों में देखकर विचारों की अनुभवी गठानों से गुंथे हुए व्यक्तित्व को साकार करते हैं जो जिंदगी के जलते हुए मैदान पर चलते हुए नवयुग का आसमान छूता है। कवि अपने सर्वहारा मित्र के सामने स्वयं को छोटा पाता है। वह बिंब रचता है कि मित्र के कंधों पर खड़ा होकर नभ को छूकर स्याह चंद्रमा का फ्यूज बल्ब निकाल पावन प्रकाश का वह प्राण बल्ब वहां लगा दे जो मित्र ने जिंदगी की वैज्ञानिक प्रयोगशाला में श्रमपूर्वक तैयार किया है।
 सहचर मित्र को समर्पित ये कविताएं भारत के सर्वहारा को विश्व के सर्वहारा से जोड़ती है। अमेरिका की खदान में काम कर रहा अश्वेत मजदूर बेतवा के बांसवनों पर उतरी शाम को अपना स्नेह गीत देता है तो क्षिप्रा का कोई तटवासी छाया बनकर नील नदी के तट पर पहुंच जाता है। दोनों मिलकर परिवर्तन का आगाज़ करते हैं जिसे देखकर अरब के रेगिस्तान का चांद मुस्कुराने लगता हैा। एक अन्य बिंब में एक तरफ चीन से यांग्तज़ी नदी बहती आती है इधर भारत से गंगा दौड़े जाती है। कितनी मधुर है यह कल्पना-
एक-दूसरे की छाती में उलझ गई हैं
दुनिया यह सारी सुलझ गई है।
विश्व के जनता के बीच मैत्री हो और नदियाँ मित्रता का प्रतीक बनकर आए, यह अनोखा सुंदर बिंब है। इन कविताओं में मुक्तिबोध बार-बार एक नई व्यवस्था, जाहिर है जो कि समाजवाद है, लागू होने में आस्था व्यक्त करते हैं और उसे एक कौंधते हुए विश्वस्वप्न की संज्ञा देते हैं। इस विश्वस्वप्न के बरक्स विश्व क्रोध भी है। वह जब कौंधता है तब धरती से गगन तक किरणों के इस्पाती तार झनझना उठते हैं। मुक्तिबोध ऐसे प्रबल-प्रखर बिंबों और प्रतीकों को लेकर हर उस जगह से गुजरते हैं जहां मनुष्य मुक्ति का संघर्ष चल रहा है। वे विश्व जनता के गहन सहानुभव से साक्षात करते हैं और कोसों दूर समंदरों के पार बसे मित्रों को पहचान लेते हैं,लेकिन हां, जिन लेखकों, कलाकारों, संस्कृति कर्मियों ने अपनी आत्मा को बेच दिया है उन्हें वे जनशत्रु कहकर उनकी लानत-मलामत करते हैं और उनसे कोई उम्मीद नहीं रखते। उन्हें जिनसे उम्मीद है, उनके लिए ये पंक्तियां हैं- देश-देश की, गांव-गांव की, शहर-शहर की
म्लान बस्तियों में घूमा अनुभवी रास्ता
इस पर चल बेचैन लोग ये दुनिया भर के
देश-देश की चौहद्दी के पार, मिलाने हाथ,
बनाते नये प्यार का गहरा रिश्ता
नया वास्ता।

अक्षर पर्व जून 2017 अंक की प्रस्तावना

Civil Society, Middle Class & Youth

                                             
 The idea of CHANGE is the common thread that runs, albeit in varying degrees, through all three groups, namely civil society, middle class and youth. The youth is the harbinger of change. It defines generational transition, suggests a break from the past and signals advent of a new spring after many a frosty night. The participation of the middle class in the process of change is not so direct, obvious and instant. It perhaps waits on the sly and puts its weight behind the process at the moment that it finds opportune. The civil society, true to its multi-dimensional character, works for change in many ways- advocacy, mobilization, agitation, and awareness campaigns and so on. As you might agree with me Change has been the constant in the history of mankind. Whatever progress we have achieved over the 5 millennia or more, has been made possible only because the human race was amenable to changes brought over generation after generation. In that sense, it might be said that change is a good thing in spite of aberrations that took place from time to time.  

We may now turn our focus on the present state of affairs, particularly in India, and rather quickly look at  the role played by the aforesaid groups in facilitating the changes witnessed in the country in recent times. One cannot over emphasize the fact that the forces, which were relentlessly conniving to transform India from a secular, socialist, democratic country to a majoritarian and capitalist state have succeeded to a degree, that through making full use of the democratic process. They, drunk upon the heady wine of power, have on the one hand unleashed the obscurantist, retrograde hounds baying for the blood of those who dare oppose them and on the other side are clandestinely working on the agenda of re-writing the constitution of India. So what we see today is change taking place on almost every front- political, of course, and then economic, cultural, social, environmental etc. The question to ask is to what was the role of the agencies of change in this process, to what extent and in what manner. Who among them stood against the reactionary forces, who became their willing partners, who were taken for a ride unmindful of the consequences and who were oblivious to developments taking place around them?

Let us first briefly discuss the role of the civil society. We have already noted that its character is multi-dimensional. The civil society, is generally identified by various nomenclatures like NGO, CSO or CBO etc, but in fact encompasses all non-governmental entities. Through them it strives to intervene in the realm of public policy with a view to seek better conditions for the greater good. (We may leave aside business lobbies by whatever name they go, because their mandate is exclusionary and limited to garnering monetary profits for its members). The civil society groups mostly function in two areas- a) service delivery for community welfare and b) mass mobilization through peaceful means. Both develop their roadmaps based on the input provided by such allied groups that have expertise in the field of public awareness and action research etc- the tools necessary to carry out their activities. However, the civil society suffers from three major drawbacks- 1) In the specific case of India, dependence upon funding agencies that makes them vulnerable in many ways to the dictates of the latter 2) Tendency to view a cause in isolation and not as a part of the whole, thus missing or overlooking the larger picture & 3)   Seeking instant and superficial solutions rather than addressing to the root cause i.e. the political will.   

The net result is that the organizations that tread the mass mobilization route soon lose their stamina and willpower (though things may not be as bad in the case of service delivery organizations) and the state   stops taking note of them. But that is not all. What should worry us is that talent, energy, spirit and motivation of a whole lot of people engaged in the civil society at various levels get wasted in this manner. Quite a few of them become disillusioned and depoliticized and move away to some other direction. The trade unions are also an integral part of the civil society. But of late we notice that to a great extent they too by confining themselves to narrow ambitions have lost the ability to find common cause with the general public. The same is also true in respect of two other strong bases of civil society-our universities and media. They are supposed to provide intellectual input and impetus to people’s action but by and large both have failed to come to our expectations in this time of momentous transition.  

As regards the middle class, its mention evokes two diametrically opposite views in India. One school of thought generally believes that the middle class is the original change-seeker; that it has time, energy, resources and inclination to work for change; is better educated and articulate; and can form and use social groups to raise its concerns. But in contrast there is another viewpoint that looks down with contempt at this very section of the society. In its eye the middle class is opportunist, status-quoist, self-centered, obscurantist and finally, betrayer to the cause of a just society. Not going deeper in the debate,  one cannot miss the story that has unfolded about the middle class in India in the last three decades or so. It is estimated that the population of this class which is around 60-70 million now is likely to reach almost 600 million or 60 crores meaning about 40% of the total by the year 2025. A number of essays have been written and many books published about this emerging trend; a whole range of interest groups have set their eyes on them. A newspaper columnist points out that way back in 1991 two myths were created- one about the great Indian middle class and another about the great Indian growth story, at a time when 30% population of the country was living below the poverty line. (Radhika Saraf, Daily Mail, London, 19th May 2013).

One may get an idea about the origin of this myth-making in a much-cited report published by McKinsey Global Institute on another 19th May, much earlier in the year 2007. The report titled- Next Big Spender: Indian Middle Class- goes on to assert- “Within a generation the country will become a nation of upwardly mobile middle-class households, consuming goods ranging from high-end cars to designers clothing. In two decades the country will surpass Germany as the world’s fifth largest consumer market.” This report, and there must have been many more before and after this, is obviously written for the eyes of corporate honchos. It reduces a whole class of citizens to merely being the consumers and in the process paves the way for designing, planning and implementing schemes to lure them to marketplace by cutting them off from their surroundings and its hard realities. Therefore it is not surprising that we now have a system in place that has NGOs dedicated to consumer guidance and protection, consumer courts as different from regular courts, and also consumer awareness campaigns like –Jago Grahak Jago. In this skewed system one can seek redress for a grievance as a customer in the marketplace, but hardly has any power to rein in the powers that be.

 Sociologist Rowena Robinson in an article published in January 2001 says that modernity does not mean inclusion. On the contrary it means exclusion. She finds that the middle class Indian is fundamentally non-democratic, intolerant and committed to tradition. Furthermore it perpetuates patriarchal and hierarchical notions and for it being liberal means only consumption and spending. This statement makes it abundantly clear as to what role the middle class must have played in bringing about the change that has become the reality of the day.

Finally, we may come to the role of the youth, which on all accounts should be regarded as the most significant of all three groups. It is often said with some pride that India is on the way to becoming a young nation. In the current year i.e. 2015, the young population of the country is expected to reach almost 55% of the total. The youth symbolizes many qualities- action, ambition, courage, energy, freshness, idealism, imagination, innovation, learning, and vigour etc. But it is heartbreaking to see that the country has not been able to harness this immense potential in a gainful manner.  The youth in a general sense needs motivation and guidance to prepare her to face the future with courage and conviction.  In a nation that takes pride in its constitution based upon the principles of democracy, pluralism, social justice, human dignity and equality, there must be ideal conditions for imbuing its young generation with these cherished values, and also the leaders, both in civic life and political sphere who may don the mantle of friend, philosopher and guide for the young ones.

Let us listen to what Jawaharlal Nehru told his audience at the Inter-university Youth Festival held in 1955 in Delhi. He said- “What is my relationship to you? Most of you have adopted me as an uncle. But I was thinking of another kind of bond, an intellectual and mental bond, between you and me.” In the same speech he exhorted the youth to ‘Have the pride of youth, the ambition of youth, to do something worthwhile, something big.” As a matter of fact, I can’t think of any other leader who has stirred and inspired at least three young generations of this country and in such a powerful way. From 1920s onwards he kept on interacting with the youth and repeatedly urged them to take risks, change the stagnant pool of Indian civilization into a moving stream, strive for to remove the canker of communalism from the society, not be afraid of consequences, shun safe career and take a leaf from the French revolution’s    dictum of Daring and daring and still more daring.

Contrast this with the present situation. One Satpal Khattar, a PIO entrepreneur and a Padmshri recipient from Singapore prophesied thus in June 2011- ‘Young Indian will lead the next wave of change to make India a truly industrialized nation in the next 10-15 years.”  It implies that India will not remain a nation of villages; the vast majority of its youth will have to move out to industrial clusters or cities to become either a factory hand or fit in at some level in the tertiary sector; and from our viewpoint will have a completely strange attitude. If one is to believe Marketing consultant Rama Bijapurkar (April 2011) - “Unlike previous generations, today’s youth are not obsessed with ins and outs of the politics.” She boldly proclaims- “Today, even if Parliament blew up, no one from this generation would notice. It has little relevance for them”.  

Bizarre, atrocious, horrendous, whatever adjective one may apply to this last comment but I ask myself, is it only an exaggerated statement or she telling a hitherto unthinkable truth. Going by what is happening now in many parts of the country, one would have to agree that the celebrated businessperson that Ms Bijapurkar is, has made a candid observation that touches upon the reality about the mental makeup of a very large section of the youth today. One may enumerate a hundred reasons, which have lead to creation of this disturbing scenario, but we will do ourselves a disservice if we are bogged down in it as the need of the hour is to think beyond it and come up with some concrete action plan for future. The time has come for all democratic and progressive forces to join hands to develop a new and holistic agenda for India, particularly for its youth.

 I for one would like to first concentrate on political education of the youth. All young persons, having attained the age of 18 are eligible to cast vote in elections. A sizeable number of this group comes from university students. Yet, the social orthodoxy disapproves their participation in politics. This is against the democratic polity and has to be contested.  It is necessary to revitalize the youth and student wings of both the left and liberal political parties. Let us not overlook the fact that the rightist forces are assiduously working through their youth organizations to woo the new generation and in the process have reaped huge political benefits. However, the youth is bound to become disenchanted, sooner rather than later, with the policies and programmes being implemented by the present regime.

 The enthusiasm about the BJP-lead government generated by party’s loud proclamations before and during the elections has almost evaporated. The spin doctors have retired to their nests and the government faced with the task of running the country is faltering at every step. Its bravado has come to haunt it. The people now sense that how they were taken unawares by hollow promises made by BJP campaigners. The youth, being the biggest stakeholder is worst hit by this realization. It needs an alternative, a truthful one. A new agenda offered by democratic, progressive forces will help them to comprehend the prevailing situation, give them hope for the future and prepare them to travel along a new path.

Paper presented in AIPF national Workshop, Chandigarh, February 2014

Wednesday, 7 June 2017

कौन बनेगा राष्ट्रपति?


 भारत गणराज्य के सोलहवें राष्ट्रपति का निर्वाचन होने में अब अधिक समय नहीं बचा है। 25 जुलाई को वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी विदा लेंगे। याने अगले दो सप्ताह में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाएगी। इस बार देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए होने वाला चुनावी मुकाबला काफी दिलचस्प होगा। क्योंकि सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच, पहले से ही ज्ञात, वोटों की संख्या में बहुत अधिक अंतर नहीं है। अनुमान होता है कि अरुणाचल, मणिपुर, गोवा और उत्तराखंड में राष्ट्रपति चुनाव को ध्यान में रखकर ही सत्तारूढ़ गठबंधन के सबसे बड़े घटक भाजपा ने सरकारें अस्थिर करने और दलबदल करवाने का खेल खेला था। अरुणाचल में कांग्रेस की सरकार थी जहां अजीबोगरीब और लंबी उठापटक के बाद पूरी पार्टी भाजपा में आ गई है। उतराखंड में अगर कांग्रेस में तोडफ़ोड़ न हुई होती तो क्या विधानसभा चुनावों में भाजपा को जीत मिल सकती थी? गोवा और मणिपुर में तो दलबदल का खेल जैसा हुआ उसने 1967 के हरियाणा की याद ताजा कर दी। इसके बावजूद सत्तारूढ़ गठबंधन के पास संयुक्त विपक्ष के मुकाबले कम वोट हैं। इसे लेकर ही तमाम कयास लगाए जा रहे हैं तथा इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि मतदान की पूर्व संध्या तक तोडफ़ोड़ का सिलसिला जारी रह सकता है।
इस पृष्ठभूमि में विपक्षी दलों ने एक साथ आने की कवायद शुरू कर दी है। विपक्ष के कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि एनडीए का उम्मीदवार राष्ट्रपति बन सकता है, लेकिन अगर विपक्ष में एका कायम हो सका तो इससे भविष्य की राजनीति का रास्ता खुल जाएगा। विपक्ष में ऐसे आशावादी नेता भी हैं जो मानते हैं कि आरएसएस द्वारा जो हिन्दुत्व का एजेंडा देश पर थोपा जा रहा है उसके चलते उत्तर-पूर्व और दक्षिण के राज्य एनडीए प्रत्याशी के विरुद्ध मतदान कर सकते हैं। यद्यपि तीन-चार दिन पहले ही तेलगुदेशम पार्टी के सुप्रीमो एन. चन्द्राबाबू नायडू ने एक साक्षात्कार में स्पष्ट कहा है कि 2019 तक के चुनाव में वे भाजपा के साथ मिलकर लड़ेंगे। उल्लेखनीय है कि इसके दो दिन बाद तेलगुदेशम ने एक सम्मेलन में विजयवाड़ा जा रहे राहुल गांधी, शरद यादव व सुधाकर रेड्डी इत्यादि नेताओं को काले झंडे दिखाए। गोया ऐसा करके श्री नायडू ने अपनी मोदी भक्ति का पक्का सबूत दे दिया।
राष्ट्रपति चुनाव में कौन जीतेगा यह अनुमान अपनी जगह पर है। फिलहाल टीकाकार यह खोजने में लगे हैं कि दोनों तरफ से उम्मीदवार कौन होंगे। संयुक्त विपक्ष की ओर से अनेक नाम चले। इनमें सबसे पहले नाम आया गोपालकृष्ण गांधी का। उल्लेखनीय है कि गोपाल गांधी महात्मा गांधी के पौत्र व उनके छोटे बेटे देवदास गांधी के सबसे छोटे बेटे आईएएस अधिकारी रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका, नार्वे व श्रीलंका में उन्होंने भारत के राजदूत/उच्चायुक्त के तौर पर प्रतिष्ठापूर्वक जिम्मेदारी निभाई है। वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे जहां उनका काम करने का तरीका लीक से एकदम हटकर था। यद्यपि उन्होंने संविधान के दायरे में रहकर ही काम किया और वाममोर्चे की सरकार को ऐसी कोई असुविधा नहीं होने दी जिसकी वे शिकायत करते। गोपाल गांधी एक जाने-माने लेखक भी हैं। विक्रम सेठ के विश्वप्रसिद्ध उपन्यास 'अ सूटेबल बॉय’ का हिन्दी अनुवाद उन्होंने 'कोई अच्छा सा लड़का’ शीर्षक से किया। यह भी स्मरण रहे कि वे राजाजी याने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के नाती हैं। एक प्रखर बौद्धिक-सम्पन्न चेतना व्यक्ति जिसे दीर्घ प्रशासनिक अनुभव है, जो अपनी सादगी और ईमानदारी के लिए जाना जाता है, जिसे संविधान और संवैधानिक परिपाटी का भलीभांति ज्ञान है और जो उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम चारों के बीच सेतु हो सकता हो, उसे उम्मीदवार बनाना एक बेहतर पहल हो सकती थी।
इस दृष्टि से सोचें तो 2002 में कैप्टन डॉ. लक्ष्मी सहगल भी एक अत्यंत सम्मानित उम्मीदवार थीं। वे नेताजी द्वारा स्थापित आज़ाद हिन्द फौज की रानी झांसी बिग्रेड की कमांडर थीं। आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने के बाद एक वामपंथी सामाजिक कार्यकर्ता और ममतामयी डॉक्टर के रूप में उन्होंने प्रतिष्ठा पाई थी। दक्षिण भारतीय होकर भी उनका जीवन उत्तर प्रदेश में बीता, नेताजी का प्रभामंडल उनके साथ था, फिर भी वे डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम से चुनाव हार गई थीं। जबकि कलाम साहब का कोई राजनीतिक अनुभव नहीं था। यह अलग बात है कि राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने अपनी सादगीपूर्ण जीवन शैली और जनता से घुलमिल जाने और खासकर बच्चों से संवाद स्थापित करने के कारण लोकप्रियता और समादर पाया। इस अनुभव के परिदृश्य में देखें तो गोपालकृष्ण गांधी के उम्मीदवार बनने की कोई सूरत फिलहाल नज़र नहीं आती। वे अपने लिखने-पढ़ने में मगन हैं और इस पद के लिए संभवत: अनिच्छा भी जता चुके हैं।
संयुक्त विपक्ष की ओर से दूसरा काबिलेगौर नाम शरद पवार का है। सुना है कि वे भी राष्ट्रपति पद के इच्छुक नही हैं। संभव है कि वे पद्मविभूषण का सम्मान पाकर संतोष अनुभव कर रहे हों। यह भी उतना ही संभव है कि वे अपने पत्ते इतनी जल्दी न खोलना चाहते हों। शरद पवार अनुभवी राजनेता हैं और हर तरह के दांव-पेंच जानते हैं। इसलिए वे एक जबरदस्त उम्मीदवार साबित हो सकते हैं। हमें लगता है कि सोनिया गांधी को भी उनके नाम पर कोई आपत्ति नहीं होगी। आखिरकार वे यूपीए सरकार में दस साल तक मंत्री थे। शरद पवार इसी समय कांग्रेस में प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे। ऐसा माना जाता है कि अपनी राजनीतिक सूझबूझ एवं साधन-सम्पन्नता के बल पर पवार साहब तमिलनाडु, आंध्र और उड़ीसा की उन पार्टियों और मतदाताओं को अपने साथ ला सकते हैं जिनकी रुझान भाजपा के साथ जाने में हो। यही नहीं, शिवसेना भी मराठी मानुस के नाम पर उनका समर्थन करने से पीछे नहीं हटेगी। पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केन्द्रीय मंत्री होने के नाते शरद पवार प्रशासनिक अनुभवों के धनी हैं तथा संविधान को भलीभांति समझते हैं। वैदेशिक मामलों में भी उनका अध्ययन पर्याप्त है।
जदयू के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव का नाम भी संयुक्त विपक्ष के प्रत्याशी के रूप में चल रहा है। यह संयोग है कि जो शरद यादव 1974 के लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस-विरोधी संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार बनकर जबलपुर से लोकसभा में पहुंचे थे, आज कांग्रेस के साथ संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में उनका नाम उभरा है। शरद यादव मूलत: कांग्रेस-समाजवादी पृष्ठभूमि के हैं। वे आज देश के संसद सदस्यों में सबसे वरिष्ठों में गिने जाते हैं। उनका संसदीय ज्ञान विशद है। वे प्रारंभ से ही किसानों, मजदूरों, हाशिए के लोगों और युवाओं के अधिकारों के लिए लड़ते रहे हैं। डॉक्टर लोहिया की शिष्य परंपरा में उन्होंने राजनीतिक दांवपेंच यदि जॉर्ज फर्नांडीस से सीखें, तो किशन पटनायक और मधु लिमये से उन्होंने राजनीति के नैतिक और बौद्धिक पक्ष की भी शिक्षा ग्रहण की। वैसे वे चौधरी चरणसिंह के प्रति अत्यधिक सम्मान का भाव रखते हैं। उधर कुछ वर्षों में कांग्रेस के साथ नीतिगत मुद्दों पर उनकी नजदीकियां बढ़ीं। अपने सुदीर्घ संसदीय अनुभव, सादगीपूर्ण जीवन, स्पष्टवादिता व वंचित समाज के प्रति गहरी सहानुभूति के चलते वे एक आदर्श उम्मीदवार हो सकते हैं और चुन लिए गए तो एक अच्छे राष्ट्रपति भी सिद्ध होंगे, ऐसा मेरा सोचना है। देखना है कि विपक्ष इन तीन में से किसको चुनता है या अचानक कोई चौथा नाम आ जाएगा।
एनडीए की ओर से उम्मीदवार कौन होगा, यह शायद भीतर-भीतर तय हो चुका होगा, लेकिन जैसा कि एक वरिष्ठ राजनेता ने बात-बात में मुझसे कहा कि भाजपा से कौन प्रत्याशी बनेगा यह बात नरेन्द्र मोदी के पेट में है और उसे अभी कोई नहीं निकलवा सकता। फिर भी अनुमान तो लग ही रहे हैं। सुमित्रा महाजन का नाम इस सूची में सर्वोपरि है। किन्तु नाम सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू, नजमा हेपतुल्ला इत्यादि के भी लिए जा रहे हैं। नजमा हेपतुल्ला एक अच्छा नाम हो सकता था, लेकिन मणिपुर जैसे छोटे राज्य का राज्यपाल बनाकर भेज देने के बाद यह संभावना समाप्त हो गई लगती है। वेंकैया नायडू पार्टी अध्यक्ष रहे हैं, दक्षिण भारत की नुमाइंदगी करते हैं, वरिष्ठ मंत्री हैं- ये सारी बातें उनके पक्ष में जाती हैं। भाजपा में सबसे अनुभवी राजनेता सुषमा स्वराज हैं, जिन्होंने संघ के प्रति पूरी तरह समर्पित होने के बावजूद विपक्ष से भी प्रशंसा पाई है। सुमित्रा महाजन सातवीं बार लोकसभा की सदस्य हैं तथा उनकी अपनी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है। इस नाते वे मोदी जी की पसंद हो सकती हैं। संघ का विश्वास तो उन पर बना हुआ है ही। इन तमाम नामों के अलावा पक्ष और विपक्ष दोनों मिलकर क्या कोई एक सर्वस्वीकार्य उम्मीदवार प्रस्तावित कर सकते हैं, यह प्रश्न भी अभी खारिज नहीं हुआ है। प्रतीक्षा करिए और देखिए आगे क्या होता है।
देशबंधु में 08 जून 2017 को प्रकाशित