Wednesday, 13 September 2017

हिमाचल प्रदेश-5 : होटलों का शहर : हिडिंबा का मंदिर

           
 कुल्लू से मनाली की चालीस किमी की दूरी सामान्यत: डेढ़ घंटे में तय होना चाहिए थी, लेकिन सामरिक महत्व के भी इस राजमार्ग को फोरलेन करने का काम जारी था, जिसके चलते दो घंटे से भी अधिक समय लग गया। इस दरम्यान सड़क और नदी किनारे के कुछ गांवों की थोक फल मंडियां देखने का मौका अनायास ही मिल गया। फल, विशेषकर सेब की, सैकड़ों दूकानें सजी हुई थीं। मनाली व आसपास के इलाकों से फल उत्पादक किसान छोटे मालवाहकों से अपनी फसल लेकर आ रहे थे, मंडियों  में नीलामी लग रही थी, और देश के दूरदराज क्षेत्रों से आए ट्रक चालक माल भरकर वापिस जाने की प्रतीक्षा में रुके हुए थे। इन बाज़ारों की सारी दूकानें अस्थायी थीं, बांस-बल्ली और तिरपाल के सहारे खड़ी की हुई। अभी मौसम है तो बाज़ार है, चहल-पहल है, दो माह बाद बर्फ गिरना शुरू होगी तो अगले कुछ माह तक की छुट्टी। कहना न होगा कि फल मंडियों की गहमागहमी के कारण भी यातायात में अपेक्षा से अधिक समय लग रहा था। रह-रहकर बारिश हो रही थी तो उसका भी असर पड़ना ही था।
मनाली की दूरी जब कोई दस-बारह किमी रह गई होगी, वहीं से होटलों व रिसोर्टों का लगभग अटूट सिलसिला प्रारंभ हो गया। एक से एक सुंदर नाम और हर तरह की सुविधा का वायदा करते उनके साइन बोर्ड। नगर की सीमा में प्रवेश किया तो चैन की सांस ली कि प्रतीक्षा समाप्त हुई, लेकिन कहां? हमारा होटल व्यास नदी के दूसरे किनारे पर प्रीणी गांव में था, जिसके लिए नगर के भीतर होटलों की कोई पांच किमी लंबी श्रृंखला पार करने के बाद पुल से दूसरी तरफ उतरे और यू-टर्न लेकर फिर होटलों के बोर्ड पढ़ते-पढ़ते अपने ठिकाने पर पहुंचे। सुबह से निकले हुए थे, खूब थक चुके थे, किंतु अपना होटल देखकर तबियत खुश हो गई। पहाड़ी के ऊपर सेव के बगीचे के बीच बसा छोटा सा होटल, जहां बालकनी से हिमालय की हिमटा पर्वत श्रृंखला के सुंदर दर्शन हो रहे थे। आसपास सेव के और बगीचे भी थे तथा निकट ही एक पहाड़ी झरना कलकल प्रवाहित हो रहा था। नदी भी सामने ही थी, लेकिन मकानों के पीछे दब जाने से दिखाई नहीं दे रही थी।
कुल्लू-मनाली की वैसे तो बहुत ख्याति है और कुल्लू का दशहरा तो विश्वप्रसिद्ध हो चुका है, किंतु यह स्थान उनके लिए मनमाफिक है जो शांतिपूर्वक अवकाश के पल बिताना चाहते हैं। मनाली ही क्यों, हिमालय से लेकर सतपुड़ा, और नीचे मलयगिरि तक के सारे हिल स्टेशन निसर्ग की ममत्व भरी गोद में विश्राम करने के लिए निमंत्रित करते हैं, लेकिन आज जो यहां आते हैं, उनके पास शायद इतना समय नहीं होता कि प्रकृति की पुकार सुन सकें। वे उपभोक्ता बनकर आते हैं और पैसा वसूल की संतुष्टि लेकर लौट जाते हैं।  शहर में बीचोंबीच क्लब हाउस नामक स्थान है। यहां एक तरह का स्थायी कार्निवाल या मेला लगा हुआ है। नहर में बोटिंग, भवन के भीतर अनेक तरह के खेल-तमाशों का इंतजाम जो सामान्यत: किसी भी फन पार्क में पाए जाते हैं। यह क्लब हाउस सैलानियों के बीच खासा लोकप्रिय है। अगर मौसम उपयुक्त हो तो पर्यटक रोहतांग दर्रे या उसके पहले सोलांग की वादी तक जाते हैं। इनको छोड़ दें तो नगर की परिधि में दो-तीन स्थल ही दर्शनीय हैं।
वशिष्ट मंदिर समुच्चय एक प्रमुख दर्शनीय स्थल है। जैसा कि नाम से पता चलता है यहां वशिष्ठ ऋषि का मंदिर है, जिसके गर्भगृह में उनकी प्रतिमा स्थापित है। इसका एकमंजिला मुख्य भवन काष्ठ निर्मित है और उस पर सुंदर नक्काशी की गई है। बाजू में ही गरम पानी का सोता है, जिसे दीवारें खड़ी कर दो भागों में बांट दिया गया है। एक खंड पुरुषों और दूसरा महिलाओं के स्नान हेतु। मैं कल्पना कर रहा था कि बिना इस निर्माण के यह प्राकृतिक झरना मंदिर प्रांगण की शोभा कितनी बढ़ाता होगा, लेकिन यहां तो रेलमपेल मची थी। तेल-साबुन लेकर पर्यटक कुंड के भीतर एक छोटी दीवाल खड़ी कर बना दिए गए छोटे हिस्से में स्नान कर रहे थे और बाकी बड़े हिस्से में देह से देह टकराते स्नान करते हुए अपना जीवन सार्थक करने में लगे थे। खैर, वशिष्ठ मंदिर के बाहर कुछ सीढ़ियां चढ़कर एक राममंदिर है। यहां सामने एक नया मंदिर बन गया है जिसमें पूजा-पाठ होता है; प्राचीन पाषाण मंदिर पीछे दब गया है, जिसकी कोई देखभाल नहीं है। उसके दो तरफ मटमैला पानी भरा था, याने आप मंदिर को चारों तरफ से देख भी नहीं सकते। इस प्राचीन भवन की नक्काशी भी दर्शनीय है। तीसरा इसके ठीक नीचे एक शिवमंदिर है, जो किसी मढ़िया जैसे आकार का है। इस मंदिर समुच्चय तक आने के लिए एक संकरी सड़़क है, जिस पर एक साथ दो वाहन नहीं गुजर पाते।
मनाली में सबसे सुंदर, सबसे आकर्षक, सबसे रमणीय स्थान है- वन विहार नेशनल पार्क और उसकी परिधि पर स्थित हिडिंबा देवी मंदिर। चारों तरफ देवदार के ऊंचे-ऊंचे वृक्षों से घिरा काष्ठ निर्मित भवन। हिडिंबा कुल्लू रियासत की अधिष्ठात्री देवी हैं और दशहरे के समय मनाली के मंदिर से बाहर निकल उनकी यात्रा कुल्लू तक जाती है। सबसे पहले उनकी पूजा, बाद में अन्य अनुष्ठान। भीम और हिंडिबा के बेटे प्रतापी घटोत्कच का मंदिर भी कुछ सौ मीटर की दूरी पर है। इस स्थान पर प्रकृति के सान्निध्य में आप घंटों बिता सकते हैं। उस दोपहर मंदिर में दर्शनार्थियों या पर्यटकों की संख्या काफी थी, लेकिन कहीं कोई हल्ला-गुल्ला नहीं, सब नैसर्गिक सुषमा का आनंद लेने में मगन थे। दर्शन के लिए पच्चीस-पचास जनों की कतार लगी थी, हम बाहर बैंच पर इत्मीनान से बैठे थे कि भीड़ कम होगी, तब भीतर जाएंगे। इतने में फुग्गे लेकर एक छोटा बालक आया, हमारे बाजू में एक परिवार बैठा था, उनका शिशु फुग्गे के लिए ललक रहा था। बेचने वाला बालक बार-बार उसके हाथ में गुब्बारा थमाता और शिशु की मां हर बार उसे लौटा देती। 
मुझे कौतूहल हुआ। बालक से बातचीत करने लगा। पंजाब के किसी गांव से वह अपने माता-पिता के साथ आया है। पिता बढ़ई हैं, माँ मजदूरी करती है। इसकी उम्र छह-सात साल है। मनाली बाजार में कोई दूकानदार पांच सौ रुपए में पचास फुग्गे उधार दे देता है। दस रुपए नग का एक फुग्गा बीस में बेचकर यह बालक कुछ कमाई कर लेता है। उसके साथ थोड़ा बड़ा एक और बालक था। वह भी गुब्बारे लिए था। हमने एक फुग्गा खरीद लिया। बालक खुश। बोला- अपने स्मार्टफोन से हमारा फोटो खींचो। हमारे बाजू में दो युवक और बैठे थे। बंगलुरु से आए थे। उनके साथ बालक की दोस्ती पहले हो चुकी थी। वे एक बढ़िया कैमरे से तस्वीरें ले रहे थे और हमारे नन्हें मित्र को अपना वह कैमरा खुशी से इस्तेमाल करने दे रहे थे। बालक ने उनसे कहा- आपके कैमरे से मैं इनकी फोटो खींचूंगा और खटाखट हमारी दो-तीन तस्वीरें ले डालीं। इतनी छोटी उमर, इतनी समझदारी, इतना जिम्मेदारी का एहसास और इतनी ही वयसुलभ चंचलता। उस बच्चे की क्रीड़ाएं देखकर मन भर आया।
मैं बंगलुरु से आए युवकों से बातचीत करने लगा तो अपना परिचय देते हुए स्वाभाविक ही रायपुर का नाम आया। नजदीक खड़े एक अन्य युवक ने सुन लिया तो मेरे पास आया- आप रायपुर से हैं। हाँ। मैं भी बस्तर का हूं। अरे वाह, खुशी की बात है। क्या करते हो, अभी कहां रहते हो। उसने जानकारी दी कि माता-पिता जगदलपुर में हैं, वह पटियाला रहकर कोई काम करता है। इसके कुछ घंटे पहले वशिष्ठ मंदिर में महाराष्ट्र से आए एक दल के कुछ लोग मिले। वे यवतमाल, विदर्भ से थे। अच्छा, आप रायपुर से हैं। हम वहां से अपने काम के लिए मजदूर लेकर आते हैं। अभी भी पच्चीस-तीस मजदूर हैं। सड़क का काम बहुत अच्छा करते हैं। वे लोग हमारे पास खुश हैं। कई साल से आते हैं। धर्मशाला के बाद मनाली में भी रायपुर या छत्तीसगढ़ से जुड़े लोगों का मिलना एक ऐसा संयोग था, जिससे हमारे प्रदेश की आर्थिक-सामाजिक स्थिति का भी संक्षिप्त परिचय मिलता है।
हिडिंबा मंदिर एक संरक्षित विरासत स्थल है। गनीमत है कि इसके मूलस्वरूप के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ नहीं की गई है। इसके प्रवेश द्वार पर उत्कृष्ट काष्ठकला का परिचय मिलता है। गर्भगृह की छत नीची है और भीतर देवी प्रतिमा के सिवाय कोई अलंकरण या सजावट नहीं है। प्रवेशद्वार पर ही हमारी भेंट जैसलमेर से आए भाई-बहनों के एक ग्रुप से हो गई। उनके साथ भी फोटो खींचे गए। मनाली की संयोगवश हुई भेंट क्यों रोचक सिद्ध हुई, इसे आखिरी किश्त में जानेंगे।
देशबंधु में 14 सितम्बर 2017  

Thursday, 7 September 2017

हिमाचल प्रदेश- 4: कुंती झील से व्यास नदी तक


 इक्कीस साल पहले गुजरात में पोरबंदर से सोमनाथ की ओर जाते हुए बीच में माधवपुर का समुद्रतट देखा था। सड़क के साथ-साथ कई मील तक चलता हुए चांदी जैसी रेत का विस्तार। चेन्नई का प्रसिद्ध मरीना बीच भी उसकी तुलना में फीका था। उस दृश्य को देखकर मन में भाव आ रहा था कि शांति के साथ अवकाश के कुछ दिन बिताने के लिए इससे बेहतर स्थान और क्या होगा। ऐसी ही कुछ भाव रिवालसर से नैनादेवी के मंदिर जाते समय मन में आया। नौ किलोमीटर की चढ़ाई का रास्ता था, धीमी गति से एक के बाद एक मोड़ पार करते हुए गाड़ी आगे बढ़ रही थी। एक तरफ पहाड़ियां, दूसरी ओर वादियां। रास्ते में छोटे-छोटे गांव थे, घर के बगीचों में मुख्यत: नाशपाती के फल लगे हुए थे। किसी-किसी जगह से रिवालसर और नीचे बसे अन्य गांवों का मनमोहक नज़ारा दिख रहा था। जानकारी मिली थी कि इस रास्ते पर सात झीलें हैं, लेकिन तीन झीलें ही दिखाई दीं। 
यहां पर्यटक अधिक नहीं आते, फिर भी गांवों में कई जगह स्थानीय निवासियों ने अपने घर के साथ होम स्टे का सरंजाम कर रखा है। थोड़ी-थोड़ी दूर पर होम स्टे के साईन बोर्ड देखने में आ रहे थे। अगर कभी अवसर मिला तो कुछ दिन के लिए यहां आकर रहूं और कुछ लिखना-पढ़ना करूं, यह विचार बार-बार मन में उठता रहा। इसी बीच कुंत भोज्य झील दिखाई दी। अनियमित आकार की काफी लंबी और बड़ी झील। इसके साथ किंवदंती जुड़ी है कि माता कुंती की प्यास बुझाने के लिए अर्जुन ने तीर मारा था जिससे यह झील निर्मित हुई। हिमाचल के पहाड़ों में ऐसी दंतकथाएं हर जगह सुनने मिलती हैं। बहरहाल इस झील को देखकर मुझे बरबस बस्तर में नारायणपुर के पास स्थित छोटे डोंगर की झील का स्मरण हो आया। वही अनियमित आकार, उसी तरह पहाड़ की गोद में लेटी, हरियाली का आवरण ओढ़े हुए। 
उल्लेखनीय है कि अधिकतर पर्यटक रिवालसर की उस झील की सुंदरता का वर्णन जानकर आते हैं जो नीचे गांव में स्थित है जिसका वर्णन हम पिछली किश्त में कर आए थे। आश्चर्य हुआ कि नैनादेवी मंदिर के रास्ते में पड़ने वाली बाकी झीलों का उल्लेख क्यों नहीं होता? यदि बीती रात रिवालसर के बाजर में मिले पंडित जी ने सलाह न दी होती तो हम इस मनोरम दृश्य को देखने से वंचित हो जाते। हम सुबह तैयार होकर मनाली के लिए निकल ही रहे थे, लेकिन तभी सोचा कि इतनी दूर आए हैं, एक नया स्थान देख लेने में क्या हर्ज है। सो हमने गाड़ी का रुख विपरीत दिशा में मंदिर की ओर कर दिया। उत्तर भारत में नैनादेवी के  कई मंदिर हैं। हिमाचल में ही इसी नाम से एक प्रसिद्ध मंदिर और भी हैं, किन्तु रिवालसर का यह मंदिर अल्पज्ञात है। 
ऊंची पहाड़ी पर एक समतल मैदान पर मंदिर है। यहां भी बदस्तूर बाज़ार है। कोई तीस-चालीस दुकानें होंगी। अधिकतर दुकानदार रिवालसर से यहां आते हैं। उनके लिए शायद यह आमदनी का पूरक स्रोत है। नवरात्रि जैसे अवसरों पर संभव है कि भीड़ होती हो, लेकिन सामान्य दिनों में श्रद्धालुओं की संख्या भी नगण्य होती है। हम जब पहुंचे तो कोई खास हलचल नहीं थी। मंदिर का स्वरूप आधुनिक है, बल्कि कहना होगा कि इसे आधुनिक स्वरूप दे दिया गया है। ठीक वैसे ही जैसे आजकल अधिकांश उपासना स्थलों में हो रहा है। यदि प्राचीनता के कोई चिन्ह हैं तो उनका न तो सम्मान होता, न उन्हें संभाल कर रखा जाता। इस दृष्टि से नैनादेवी मंदिर में संतोष की बात थी कि प्राचीन मंदिर के कुछ भग्नावशेष गर्भगृह के बाहर हॉल में तरतीब से रखे हुए थे। यह दिलचस्प था कि श्रद्धालु इन क्षत-विक्षत पाषाण खंडों पर भी रोली-अक्षत चढ़ाकर श्रद्धा निवेदित कर रहे थे।
ज्वालामुखी की तरह नैनादेवी में भी मंदिर के प्रांगण में एक बकरा बंधे देखा। भक्तगण उस पर पानी चढ़ा रहे थे। यह व्यापार मेरी समझ में नहीं आया। मंदिर के बाहर एक दुकानदार ने बताया कि देवी के मंदिरों में विभिन्न पशुओं की बलि आज भी चढ़ाई जाती है और यह बकरा किसी शगुन संकेत के लिए बांधा हुआ है। हमारी रुचि इस विषय के विस्तार में जाने की नहीं थी। दो-तीन घंटे का समय बीत चुका था, अभी मनाली का सफर तय करना था। हम वापिस लौटे, रास्ते में दो-तीन अन्य दर्शनीय स्थल भी थे, उन्हें भी छोड़ दिया। रिवालसर लौटकर मंडी होते हुए मनाली के पथ पर वाहन चल पड़ा। मंडी हिमाचल का एक प्रमुख नगर है। हमने बायपास पकड़ा और शहर बाजू में छूट गया। अभी तक पहाड़ी झरने याने खड्ड और झीलें देखते आए थे, अब अवसर था नदी से मिलने का। 
हिमसुता व्यास नदी मंडी शहर के बीच से गुजरती है। मंडी से कुल्लू और कुल्लू से मनाली तक हमने व्यास के किनारे-किनारे सफर तय किया और उसे विभिन्न मुद्राओं और भावों में देखा। व्यास नदी भाखड़ा परियोजना का अंग है। उस पर मंडी से मनाली मार्ग पर कुछ ही आगे बैराज निर्मित है। यहां मानो नदी अनमने भाव से अनुशासन में बंधी हुई है। बैराज होने के कारण नदी में जल तो था लेकिन प्रवाह नहीं। लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़े, व्यास की छटाएं देखकर लगातार मुग्ध होते रहे। कहीं पहाड़ों से झरने आकर उसमें विलीन हो रहे हैं, कहीं नदी में लहरें उठ रहीं हैं, कहीं वह चट्टानों से टकराकर आगे बढ़ रही है, कहीं उसका उद्दाम वेग देखकर भय लगता है। व्यास नदी की जो चंचलता है वह उसे न जानने वालों के लिए सांघातिक हो सकती है, इसीलिए पूरे रास्ते भर जगह-जगह चेतावनी देते हुए बोर्ड लगे हैं-नदी के पास न जाएं, जल स्तर कभी भी बढ़ सकता है।
मंडी से मनाली का रास्ता यूं भी निरापद नहीं है। एक तरफ नदी है, तो दूसरी तरफ पहाड़। जिनसे भूस्खलन की आशंका हमेशा बनी रहती है। भूगर्भ शास्त्री बताते हैं कि हिमालय अपेक्षाकृत एक युवा पर्वतमाला है और उसकी संरचना काफी नाजुक है। बरसात जैसे कारणों से कभी भी पहाड़ियां टूटने लगती हैं। कुल मिलाकर प्राकृतिक सुषमा से भरपूर इस रास्ते पर संभलकर चलने में ही भलाई है। इसीलिए मुझे तेज रफ्तार से निकलते हुए बाइकर्स के झुंड के झुंड देखकर बहुत हैरानी हुई। ये युवाहृदय बाइकर्स रोमांच के लिए मनाली के आगे रोहतांग दर्रा पार कर लद्दाख तक जाते हैं। तेज रफ्तार का रोमांच अवश्य होता होगा, लेकिन क्या उसके लिए हिमालय का यह पथ उपयुक्त है? यह सवाल मन में उठता है। उन्हें देखकर यह विचार भी उठा कि इनका सारा ध्यान तो अपनी गाड़ी की रफ्तार और ट्रैफिक पर है, इस मार्ग पर जो नैसर्गिक सौंदर्य बिखरा है उसे तो ये देख ही नहीं पाते, फिर इतनी दूर आकर पैसा और पेट्रोल खर्च करने का क्या लाभ है?
मानता हूं कि मनुष्य में खतरों से खेलने की सहजात प्रवृत्ति होती है। उत्साह और उमंग से भरे ये बाइक सवार भी शायद उसी के वशीभूत हो इस तरह देशाटन पर निकलते हैं, लेकिन क्या उनकी बाइक की गति और शोर से हिमालय की सेहत को आघात नहीं पहुंचता होगा! खैर! हम अपनी रफ्तार से मनाली की ओर बढ़ रहे थे, नए-नए दृश्यों को आंखों से पी रहे थे। एक जगह तीन किलोमीटर लंबी एक सुरंग हमने पार की। जल्दी ही कुल्लू आ गया। यहां भी हमने शहर से गुजरने के बदले बाइपास से जाना बेहतर समझा। बाइपास पर सड़क के दोनों तरफ कालीनों और दुशालों का बाजर सजा हुआ था। हिमाचल में ऊन की शॉल कई जगहों पर बनती है पर सबकी अपनी-अपनी खासियत होती है। हमारी शापिंग करने में कोई रुचि नहीं थी सो बिना रुके आगे बढ़ गए। इस बीच सेब के बगीचे नजर आने लगे थे। एक तरफ व्यास नदी और दूसरी तरफ सेबों से लदे वृक्ष। अब हम कुछ ही समय में मनाली पहुंचने वाले थे। 
देशबंधु में 07 सितम्बर 2017 को प्रकाशित          

Thursday, 31 August 2017

हिमाचल प्रदेश-3 : जहां अकबर ने देवी को छत्र चढ़ाया


हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा क्षेत्रफल की दृष्टि से एक बड़ा जिला है। इसके अनुरूप कांगड़ा में विविधता भी बहुत है। एक ओर प्रकृति की विभिन्न छटाएं हैं, तो दूसरी ओर ऐतिहासिक स्थल भी कम नहीं हैं। दलाई लामा का विगत साठ वर्षों से निवास होने के कारण इसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति भी मिल चुकी है। यहां की बानी-बोली भी हिमाचल प्रदेश के पूर्वी भाग से कुछ अलग है, यद्यपि एक-दूसरे की बोली सब समझ लेते हैं। यहां विभिन्न धार्मिक पंथों का भी सहअस्तित्व रहा है। शाक्त, शैव, वैष्णव इन सबके उपासना स्थल तो हैं ही, कांगड़ा किले में प्राचीन जैन मंदिर है तथा धर्मशाला के आसपास बौद्ध धर्म की प्रमुखता हो गई है। स्थानीय रीति-रिवाजों में एक दिलचस्प जानकारी चंबा इलाके के बारे में मिली जहां भुट्टे में बाली आने के बाद त्यौहार मनाया जाता है। धर्मशाला के निकट चामुंडा का एक मंदिर है जिसकी मान्यता हाल के सालों में काफी बढ़ गई है। निकट ही एक पुराना शिव मंदिर भी है। समयाभाव के कारण यह सब देखना संभव नहीं था। हम तो मैक्लॉडगंज के बाजार में भी नहीं रुके जहां सैलानी जन तिब्बती दुकानों पर खरीदारी करने टूटे पड़ते हैं।

तीन दिन बाद धर्मशाला से रवाना होने लगे तो होटल के निकट स्थित एक तिब्बती संस्थान देखने अवश्य गए। नोरबुलिंका नामक यह संस्थान तकनीकी प्रशिक्षण, उत्पादन और विक्रय प्रतिष्ठान है। बहुत खूबसूरत कैम्पस है। प्रवेश द्वार से लेकर भीतर सब जगह तिब्बती स्थापत्य कला में निर्मित अनेक भवन हैं। यहां तिब्बती युवा अपने देश के विभिन्न शिल्पों का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं और फिर छोटे-छोटे बटुओं से लेकर ड्राईंग रूम के फर्नीचर तक का निर्माण यहां होता है। इन सामानों की बिक्री के लिए एक बड़ा शो रूम भी सजा हुआ है। इसमें शक नहीं कि यहां प्रशिक्षक और प्रशिक्षार्थी दोनों  कुशलतापूर्वक अपना काम करते हैं और निर्मित सामग्री की सुंदरता आपको अनायास ललचाती है। दिक्कत यह कि औसत भारतीय के लिए यहां उपलब्ध सामान की कीमत  काफी ज्यादा है। विदेशों से आने वाले पर्यटक ही शायद इनके बड़े ग्राहक होते हैं। वे शायद इस तरह स्वाधीनचेता तिब्बतियों की मदद भी कर रहे होते हैं!
हमारी यात्रा का अगला पड़ाव रिवालसर नामक एक अल्पज्ञात कस्बा था। धर्मशाला से वहां के लिए एक सीधा रास्ता था परंतु गूगल मैप पर देखा कि ज्वालामुखी होते हुए जाने से बीस-पच्चीस किलोमीटर का अतिरिक्त रास्ता तय करना पड़ेगा तो हमने एक बार फिर कांगड़ा का रुख किया। बायपास से गुजरते हुए ज्वालामुखी गए। पाठक इस प्रसिद्ध मंदिर से अवश्य परिचित होंगे। अनेक श्रद्धालु इसे एक चमत्कारी स्थान मानते हैं क्योंकि यहां मंदिर के गर्भगृह में निशिदिन एक ज्वाला प्रज्ज्वलित होते रहती है जिसका स्रोत अज्ञात है। भारत के अनेक धर्मस्थानों की तरह ज्वालामुखी मंदिर के लिए भी एक जनसंकुल बाजार से गुजरना होता है। एक किलोमीटर की चढ़ाई जिसके दोनों तरफ दुकानें और फिर सर्पाकार पंक्ति में सरकते हुए अपनी बारी आने की प्रतीक्षा। ऐसे भी कुछ उद्यमी थे जो रेलिंग फांदकर आगे निकल अपनी वीरता का प्रदर्शन कर रहे थे। बहरहाल हमारी बारी आई। गर्भगृह के बीचों बीच एक कुंड जिसमें अग्निशिखा प्रज्ज्वलित हो रही थी। एक कोने में आले जैसी जगह पर एक और शिखा थी जिसे हिंगलाज देवी का नाम दिया गया था।
भक्तजनों का रेला लगा हुआ था, लेकिन मेरा ध्यान समीप के एक कक्ष पर चला गया जहां दीवार पर बड़े-बड़े हर्फों में लिखा था कि शहंशाह अकबर ने देवी माता को छत्र चढ़ाया था, वह यहां है। मेरे लिए यह एक नायाब जानकारी थी। उस कक्ष में प्रवेश किया, देवी की सामान्य आकार की प्रतिमा वहां थी, सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित, मुख मंडल पर सौम्य भाव और सिर पर मुकुट; बाजू में इबारत थी शहंशाह अकबर का चढ़ाया हुआ छत्र। उसके साथ तीर का निशान था ताकि कोई शक-शुबहा न रहे। मैं यह देखकर किसी हद तक चकित था। एक दिन पहले ही तो नूरपुर के किले में मुसलमान चारण द्वारा भेंट किया गया मंदिर का प्रवेश द्वार देखा था, आज यहां शहंशाह द्वारा चढ़ाया गया मुकुट देख लिया। यात्राओं के दौरान साम्प्रदायिक सद्भाव के ऐसे उदाहरण जगह-जगह देखने मिलते हैं लेकिन जिनकी आंखों पर पट्टी चढ़ी होती है वे इन्हें देखकर भी देखने से इंकार कर देते हैं।
मंदिर में जल रही ज्योति का स्रोत अज्ञात है, किंतु संभव है कि नीचे कहीं प्राकृतिक गैस हो जो इस रूप में प्रकट होती है। बहरहाल मंदिर से निकलते-निकलते काफी समय हो गया था और हमें अभी रिवालसर का रास्ता तय करना था। ज्वालामुखी से कुछ किलोमीटर ही दूर एक ढाबा देखकर रुके। छोटा सा ढाबा लेकिन भोजनालय के संचालक का निवास वहीं था और पूरा परिवार ग्राहकों की सेवा में तत्पर था। आम होटलों से अलग सादा और ताजा भोजन मिला और हम आगे की ओर रवाना हो गए। रिवालसर पहुंचे तब तक शाम घिर आई थी। हिमाचल टूरिज़्म का यहां एक होटल है। हम वहीं ठहरेे। सामने रिवालसर की झील थी और उसके पीछे पहाड़ी पर पद्मसंभव की विशाल आवक्ष मूर्ति। ये पद्मसंभव ही थे जो रिवालसर से निकलकर तिब्बत गए थे और वहां बौद्ध धर्म का प्रचार किया था। इसीलिए तिब्बती बौद्धों के लिए यह पवित्र स्थान है। यहां तिब्बती काफी संख्या में आकर बस भी गए हैं।
होटल के कमरे में बैठे-बैठे क्या करते? हम बस्ती में घूमने निकल गए। यहां होटल रेस्तरां बस एक-दो ही हैं, बाजार भी महज आधा किलोमीटर लंबी सड़क पर बसा हुआ है। वैसी ही दुकानें जो सामान्यत: किसी भी कस्बे में देखने मिल जाती हैं। एकाएक पूजा सामग्री की एक दुकान पर नजर पड़ी, दुकानदार खाली था, सोचा इनके साथ कुछ गपशप करें। इतने में एक पंडित जी सत्यनारायण कथा की पोथी लेने आ गए। उनसे बातचीत होने लगी तो परामर्श मिला कि यहां से लगभग आठ किलोमीटर ऊंचाई पर नैनादेवी का मंदिर है, उसे देखे बिना न जाएं। उनकी सलाह ध्यान में रख ली। गांव में कुछ खास करने को था नहीं। सुबह घूमने के लिए निकल पड़ा। एक गुमटी वाली चाय दुकान पर कुछ तिब्बती महिलाएं बैठी थीं। वहां चाय पीने रुक गया, उन महिलाओं से बात होने लगी। एक ने बताया कि अमेरिका में रहती हैं, बेटे को वहीं पढ़ा रही है, घर रिवालसर में है, साल में एकाध बार आ जाती है। उनकी वाणी में हल्की सी वेदना थी, घर छूटने की वेदना। चाय पीकर मुझसे कहा कि आप हमारे अतिथि हैं, चाय का पैसा मैंने दे दिया है।
इस बीच एक तिब्बती सज्जन आ गए। उनसे कुछ देर वार्तालाप होता रहा। रिवालसर की जलवायु न बहुत ठंडी है न बहुत गरम, इसलिए यहां रहना अच्छा लगता है। कामकाज का कोई बहुत ठिकाना नहीं है। अधिकतर तिब्बती जाड़ों में ऊनी वस्त्र बेचने भारत यात्रा पर निकल पड़ते हैं। कुछ वस्त्र तो तिब्बती स्वयं बुनते हैं, लेकिन अधिकतर माल लुधियाना से खरीदते हैं। कुछ निवासी हिमालय की इन वादियों में थोड़ी बहुत खेती भी कर लेते हैं। इतने में ही एक विदेशी युवक-युवती भी वहां चाय पीने आ गए। स्कॉटलैंड निवासी ऐलेन टीवी स्टूडियो में काम करते हैं। उनकी मित्र बैथ मेडिकल छात्रा है। दोनों दिल्ली से मोटर सायकल लेकर घूमने निकले हैं। वे ब्रेक्जिट से दुखी हैं, स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता चाहते हैं और अभी जेरेमी कोर्बिन के वोटर हैं। हमने साथ-साथ चाय पी और मैंने यह कहकर विदा ली कि चाय का पैसा मैंने दे दिया है, आप हमारे अतिथि हैं।
रिवालसर की झील पहाड़ों से घिरी हैं। कभी बहुत सुंदर रही होगी। स्वच्छ, निर्मल जल से भरी हुई। लेकिन इधर इस झील में हर तीसरे साल बड़ी संख्या में मछलियां मरने लगी हैं जिसने पर्यावरणविदों के सामने चिंता और चुनौती पेश कर दी है। अभी दस-बारह साल पहले तक लोग यहां झील में मछलियों की क्रीड़ा देखने ही आते थे, लेकिन झील के आसपास जो बहुत सारा निर्माण हुआ है वह भी कहीं न कहीं इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। ताजा पानी लाने वाली झीलें शायद बंद हो गई हों, जल निकासी के रास्ते भी रुंध गए होंगे तथा रिहायशी क्षेत्र का अपशिष्ट कुछ न कुछ तो इसमें पड़ता ही होगा। आशंका होती है कि क्या एक और सुंदर झील इस तरह मर जाएगी?
देशबंधु में 31 जुलाई 2017 को प्रकाशित

पुनश्च: 14 सितम्बर को दो संयोग हुए।  दिल्ली हवाई अड्डे से जो टैक्सी मैंने ली उसके चालक नरेश हिमाचल कई बार हो आये हैं।  उसी शाम पालमपुर, काँगड़ा के ही मूल निवासी और पुराने मित्र सुधीरेन्दर शर्मा से भेंट हुई।  दोनों ने यह कथा बताई कि शहंशाह अकबर ने ज्वालामुखी मंदिर की लौ को बुझाने के लिए वहां भारी मात्रा में पानी भरवाया था लेकिन लौ नहीं बुझी तब दैवीय चमत्कार के सामने नतमस्तक होकर अकबर ने दिल्ली से ज्वालामुखी तक नंगे पैर यात्रा की और छत्र चढ़ाया। छत्र सोने का था लेकिन बाद में उसका रूप कब कैसे बदला यह आज भी आश्चर्य का विषय है। पाठक तय करें कि इस किंवदंती पर कितना विश्वास किया जाए।  

Wednesday, 23 August 2017

हिमाचल प्रदेश-2 : आरामकुर्सी पर पसरा जलप्रपात



22 जुलाई की दोपहर धर्मशाला में विमान उतरा। जैसे ही बाहर निकले एक सुखद ताजगी ने छू लिया। हवा में एक खनक थी और थी हल्की सी शीतलता। शहरी जीवन में नित दिन धूल और धुएं से भरी हवा पीने वाली देह के लिए यह एक स्फूर्ति भरा अहसास था। लगभग दस वर्ष पूर्व जब अंडमान-निकोबार की यात्रा पर गए थे तब भी ऐसा ही अनुभव हुआ था। हवाई अड्डे से अपने होटल की ओर बढ़े तो सड़क के बांयी ओर काफी दूर तक एक वेगवती नदी साथ चलती रही। हमारे वाहन चालक रामकुमार उर्फ बंटी ने नदी का नाम पूछने पर हमारी ज्ञान वृद्धि की कि नदी नहीं, खड्ड है। खड्ड याने पहाड़ों से उतरकर आता झरना। जिनकी आंखें बरसाती नदियों के सूखे विस्तार देखकर पथरा चुकी हों उनके लिए तो यह नदी ही थी जिसका पाट लगभग चालीस-पचास फीट चौड़ा रहा होगा।बहरहाल कोई आधा घंटा बाद हम अपने होटल पहुंचे जो कहने को तो धर्मशाला में ही था, लेकिन था शहर से कोई चार किलोमीटर दूर, शीला चौक नामक स्थान पर। मैंने बहुत जानना चाहा कि ये देवी कौन थी जिनके नाम पर इस जगह का नाम पड़ा, लेकिन उस बस्ती के लोग भी यह नहीं बता पाए।

होटल में व्यवस्थित हो जाने के बाद हमारे पास अंधेरा होने के पहले तीन-चार घंटे का समय था। होटल वालों ने बताया कि आप इस समय का सदुपयोग क्रिकेट स्टेडियम देखने में कर सकते हैं। चलो यही सही। वाहन भी था, सारथी भी। घुमावदार संकरे रास्ते से गुजरते हुए क्रिकेट स्टेडियम पहुंच गए। वहां पहुंचकर ध्यान आया कि यह तो वही स्थान है जिसके कारण भाजपा के क्रिकेट प्रेमी युवा सांसद अनुराग ठाकुर पिछले दिनों में चर्चित हुए थे। स्टेडियम के भीतर दर्शनीय कुछ भी नहीं था, लेकिन पहाड़ी पर ऊंचे बसे इस स्थान का आकर्षण यह था कि यहां से धौलाधार की पर्वत माला और उसकी छाया में बसे गांवों का विहंगम दृश्य देखा जा सकता था। एक तरफ ऊंची-ऊंची पहाड़ियां, दूसरी ओर हरे-हरे कटोरों के बीच बसे गांव। देवदार और चीड़ के गगनचुंबी वृक्ष, हिमालय की चोटियों पर पिघलती बर्फ से बने झरने, तेज गति से नीचे उतरते हुए। मन करे कि यहीं बैठे रहो। लेकिन कब तक। वहां बैठने की भी कोई व्यवस्था नहीं थी। फिर एक जगह देखा कि कार में बैठे कुछ युवक किसी नशीले द्रव्य का सेवन कर रहे थे। उन्हें भी तफरीह के लिए इससे बेहतर जगह और क्या मिलती!
यहां एक रोचक प्रसंग हुआ जिसने हमारे अगले दिन का कार्यक्रम बना दिया। मैं श्रीमती जी का फोटो लेना चाहता था, मुझे रोककर उन्होंने मेरा ही फोटो ले लिया। मुझे अपनी ही तस्वीर अच्छी लगी और मन में न जाने क्या आया कि शीर्षक के साथ फेसबुक पर साझा कर दी। थोड़े समय बाद ही संदेश आया- ललित जी, आप धर्मशाला में है, कब आए हैं, मुलाकात होना चाहिए। यह संदेश था हिन्दी के वरिष्ठ लेखक और बालगीतों के लिए विशेषकर प्रसिद्ध प्रत्यूष गुलेरी का। मुझे भी ध्यान नहीं था कि वे धर्मशाला में रहते हैं। खैर! उनके साथ फोन नंबर का आदान-प्रदान हुआ, बातचीत भी हो गई, अगली शाम उनके घर आने का न्योता भी मिल गया। उनसे ही सलाह करके तय हुआ कि दलाईलामा के निवास मैक्लॉडगंज से लौटते हुए शाम की चाय उनके साथ होगी।
हम जब धर्मशाला पहुंचे थे तब मौसम खुला हुआ था, लेकिन रात अच्छी-खासी बारिश हुई थी, सुबह भी रिमझिम हो रही थी। हम छाता-बरसाती लेकर घूमने के लिए निकल पड़े। धर्मशाला पार कर बारह-पन्द्रह किलोमीटर दूर मैक्लॉडगंज पहुंचे। वहां तिब्बती दुकानों की गहमागहमी के अलावा कोई विशेष आकर्षण प्रतीत नहीं हुआ तो तंग सड़कों से निकलते हुए दो किलोमीटर आगे भागसू नाग की तरफ बढ़ गए। वहां भी खूब भीड़ और धक्का-मुक्की। एक जगह गाड़ी रोककर पैदल चले। भागसू नाग का मंदिर प्रसिद्ध है, उसके साथ किंवदंतियां जुड़ी हुई है। मंदिर पुराना ही होगा, लेकिन बाहर से एकदम नया। संगमरमर की टाइल्स चारों तरफ, ऊपर जाने के लिए संकरी सीढ़ियां। वहां भीगते हुए जाने का मन नहीं हुआ। 
कुछ और आगे चलकर भागसू जलप्रपात पर हम पहुंच गए। वह एक अत्यंत मनोहारी दृश्य था। सामान्य तौर पर जलप्रपात लगभग नब्बे डिग्री के कोण पर उतरते हैं, लेकिन भागसू प्रपात अनुपम था। बहुत ऊपर से जलराशि धीरे-धीरे तिरछे नीचे उतरती है मानो कोई आरामकुर्सी पर पैर पसार कर लेटा हो। इस कोण से उतरने पर जलप्रपात को एक लंबा आकार मिल जाता है। नीचे उतरकर वह बांयी ओर मुड़कर फिर एक खड्ड का स्वरूप ले लेता है। भागसू प्रपात को हम बहुत देर तक मुग्धभाव से निहारते रहे। मन तो बहुत था कि नीचे उतरें, लेकिन भीड़ बहुत थी। नीचे प्रपात के किनारे लोग बाकायदा पिकनिक मना रहे थे और वह हमें बहुत रुचिकर नहीं लगा। वापिस लौटे तो भागसू नाग मंदिर के सामने एक सार्वजनिक तरणताल (स्विमिंग पूल) देखा। पहाड़ से भीतर-भीतर बहकर आते झरने का हिमशीतल जल उसमें प्रवाहित हो रहा था और लोग मजे में स्नान कर रहे थे। 
यहां से लौटते हुए पहुंचे दलाईलामा के मंदिर। यह दलाईलामा का स्थायी निवास है। यहां एक बौद्ध मंदिर है। प्रवेशद्वार के पास तिब्बत राष्ट्रीय शहीद स्मारक स्थापित है। उसकी पृष्ठभूमि में एक दीवाल है जिसमें तिब्बती जनता पर चीनी सत्ता द्वारा किए गए अत्याचार का एक विस्तृत फलक उत्कीर्ण है। इस स्मारक के अलावा दलाईलामा मंदिर में हमें और कोई उल्लेखनीय बात नहीं लगी।
मैक्लॉडगंज से धर्मशाला लौटते समय एक जगह एक छोटा रास्ता मुड़ता है जो नद्दी सनसेट पाइंट की ओर ले जाता है। जैसा कि  नाम से पता चलता है यह जगह सूर्यास्त देखने के लिए प्रसिद्ध है, जैसे पचमढ़ी में धूपगढ़ की चोटी। तीन-चार किलोमीटर के इस रास्ते पर होटल ही होटल हैं। बारिश थम नहीं रही थी इसलिए सूर्यास्त देखने का सवाल ही नहीं था। थोड़ा समय हमने इस जगह पर बिताया और लौटते हुए बीच में डल लेक नामक स्थान पर रुके। नाम तो  डल लेक है, लेकिन श्रीनगर की डल झील से इसका कोई मुकाबला नहीं है। जानकारी मिली कि यह एक प्राचीन झील है और इसका धार्मिक महत्व चला आ रहा है किन्तु हमें यहां भी कोई विशेषता नज़र नहीं आई। झील प्राकृतिक ही होगी, किन्तु इसका 'आधुनिक' सौन्दर्यीकरण कर दिया गया है। अच्छी बात यह है कि चीड़ के वृक्षों का एक घना झुरमुट झील के पीछे एक परदा सा बनाता है और डल लेक जैसे स्थिर जल का एक मंच बन जाती है।
अब बारी थी धर्मशाला में प्रत्यूष गुलेरी जी से मिलने की। हम रास्ता न भटक जाएं इसलिए वे मुख्य सड़क पर हमें लेने आ गए थे। गुलेरी जी और श्रीमती कुसुम गुलेरी ने बेहद आत्मीयता के साथ हमारा स्वागत किया। उनके साथ ढेर सारी साहित्य चर्चा हुई। वे अक्षरपर्व के नियमित पाठक हैं तो अन्य चित्रों के साथ मेरे द्वारा उन्हें अक्षरपर्व की प्रति सौंपते हुए भी एक फोटो खिंच गया। अपने घर में गुलेरी जी ने एक सुंदर सा बगीचा लगा रखा है सो उसे भी हमने बहुत रुचि के साथ देखा, लेकिन बात यहां खत्म नहीं हुई। 
गुलेरी निवास में एक अचरज हमारी प्रतीक्षा में था। हमारी भेंट यहां रामबाई से हुई। रामबाई के बच्चे कुसुमजी को बड़ी मां कहकर पुकारते हैं। गुलेरी परिवार इन बच्चों को घर के बच्चों को अपने बच्चों जैसा ही दुलार देता है। रामबाई का पति धर्मशाला में कहीं मजदूरी करता है और वह स्वयं छोटे-मोटे कामों में इनका हाथ बंटा देती है। गुलेरी निवास के आऊट हाउस में ये लोग रहते हैं। रामबाई शिवरीनारायण के पास टुंड्री गांव की मूल निवासी है। अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए विगत अनेक वर्षों से वे इस सुदूर प्रदेश में रह रहे हैं। रामबाई के चेहरे पर दैन्य की कोई झलक नहीं दिखती। उसे जब मालूम पड़ा कि हम लोग रायपुर से आए हैं तो वह बेहद खुश हुई।
 देशबंधु में 24 अगस्त 2017 को प्रकाशित 
   

लोककथाओं की तार्किक व्याख्या


 
इस बार भी मैं हाल में पढ़ी एक नई पुस्तक की चर्चा करना चाहता हूं। उसके पहले मन हो रहा है कि देश के प्रकाशन व्यवसाय पर एक टिप्पणी करूं। ऐसा करने से मूल विषय से थोड़ा भटक जाने का खतरा तो है तथापि एक लेखक के अथक परिश्रम और प्रकाशक की व्यापारी दृष्टि दोनों के बीच जो संबंध है वह कुछ स्पष्ट हो पाएगा। मेरा मानना है कि हमारे हिन्दी प्रकाशकों में अमूमन उद्यमशीलता तथा कल्पनाशीलता का अभाव है। गो कि बीच-बीच में कुछ अपवाद सामने आते हैं। उद्यमशीलता से मेरा तात्पर्य जोखिम उठाने की क्षमता, दीर्घकालीन दृष्टिकोण और धीरज जैसे गुणों से है। सच्चे अर्थों में जो उद्यमी होगा उसकी निगाह अपने उपक्रम की विश्वसनीयता कायम करने और तुरत-फुरत मुनाफा कमाने के बजाय लम्बे समय तक लाभ लेने की ओर होगी। जिसमें यह क्षमता नहीं है वह तत्कालीन प्राप्तियों से भले प्रसन्न हो ले, पुस्तकों की दुनिया में वह अपनी साख कायम नहीं कर सकता। पुस्तक प्रकाशन के व्यवसाय में कल्पनाशीलता भी एक आवश्यक तत्व है। वर्तमान में कहां-क्या लिखा जा रहा है, क्या प्रकाशन योग्य है, कैसे नए नामों को आगे लाया जाए, पाठकों को पुस्तकों की ओर आकर्षित कैसे किया जाए, ये सब विचारणीय बिन्दु हैं। इनके अभाव में ही पुस्तकों के प्रति हिन्दी समाज की रुचि समाप्त हो रही है। 

मेरे सामने ...और यूं तारे बने  शीर्षक पुस्तक है जिसके लेखक अली एम. सैयद हैं जो जगदलपुर, बस्तर के एक शासकीय महाविद्यालय में प्रोफेसर हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन भी शासकीय काकतीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय जगदलपुर ने किया है। यह संभवत: पहली बार है जब छत्तीसगढ़ में किसी कॉलेज ने अपने एक प्राध्यापक की पुस्तक प्रकाशित की है। पुस्तक में लेखक का जो संक्षिप्त परिचय है उससे पता नहीं लगता कि वे किस विषय के लेखक हैं। यह अवश्य ज्ञात होता है कि वे पैंतीस साल से सरकारी कॉलेजों में पढ़ा रहे हैं। अपने बारे में बहुत संकोच के साथ लेखक इतना ही लिखता है- 

असल में मेरा अपना परिचय क्या है? मुद्दतों सोचूं तो भी एक ही निष्कर्ष निकलेगा कि मैं शुरू से लेकर आखीर तक बस पढ़ता ही रहा। जिन्दगी कस्बे से शुरू होकर कस्बों तक महदूद रही और नौकरी मिली भी तो पढ़ाने की... सो जो कुछ भी कमाया और गंवाया, वो सब किताबों और हर्फों के दायरे के अंदर। 

लेकिन श्री अली एक दृष्टिसम्पन्न अध्यापक हैं तथा सामाजिक सरोकारों की गहरी चिंता करते हैं, यह भी हमें इसी परिचय की आखिरी पंक्ति से मालूम पड़ता है।

अब जा के जाना कि साधारण और सहज बने रहना भी कठिन कार्य है, जबकि दुनिया के तमाम संसाधन चंद हाथों में सिमटकर रह गए हों और बहुसंख्य आबादियां, बुनियादी अधिकारों के वंचन और अप्रतिष्ठा के भयावह संकट के दौर से गुज़र रही हों...

मेरा प्रोफेसर अली के साथ कोई परिचय नहीं है। उनके साथ कभी भेंट भी नहीं हुई। कुछ माह पूर्व बस्तर के ट्रेड यूनियन नेता शेख नजीमुद्दीन ने मुझे उनकी यह पुस्तक भेंट की थी। मेरे लिए यह निजी दुख का सबब है कि साथी नजीमुद्दीन का कुछ समय पूर्व निधन हो गया। यह एक अटपटी सच्चाई है कि बस्तर के हमारे मित्रों ने भी कभी प्रोफेसर अली का जिक्र नहीं किया। संभव है कि वे संकोची स्वभाव के हों तथा अपने लिखने-पढऩे के अलावा बाहर की दुनिया से वास्ता कम ही रखते हों। मेरा यह विचार गलत भी हो सकता है। हम अक्सर पाते हैं कि अंतर्मुखी व्यक्ति के सामने अभिव्यक्ति का संकट होता है। श्री अली पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता। वे विचार सम्पन्न तो हैं ही, उनके पास एक समृद्ध भाषा भी है। इससे एक दूसरा अनुमान लगता है कि लेखक अपना समय निठल्ले लोगों के बीच बिताने के बजाय आमजनों के बीच गुजारता हो, जिनसे उसने सहज सरल और प्रवाहमय भाषा पाई है।

...और यूं तारे बने  का विषय अपने आप में नया है। इसमें विश्व के कई सारे देशों की लोकगाथाएं संकलित की गई हैं। यह स्वयं में कोई नई बात नहीं है। नयापन इसमें है कि लेखक ने हर लोकगाथा का बारीकी से विश्लेषण किया है। वह कहानी की चर्चा करते हुए तत्कालीन कालखंड का चित्र खींचता है, उस समय राजनैतिक परिस्थितियां क्या थीं, आर्थिक व्यवहार कैसा था, सामाजिक परिपाटियां क्या थीं, प्राकृतिक परिवेश क्या था और इन सबके बीच उस कहानी का जन्म कैसे हुआ, उसकी भावभूमि क्या है, उसका अंत कहां आकर होता है, ऐसे तमाम घटकों की विशद व्याख्या लेखक ने की है और इस तरह वह लोकगाथा को निरी भावुकता के धरातल से उठा व्यावहारिक जीवन की समर भूमि में लाकर स्थापित कर देता है। दो सौ पृष्ठों की इस पुस्तक में छियासठ लोककथाएं संकलित हैं और वे लैटिन अमेरिका, उत्तर अमेरिका, अरब, अफ्रीका, रूस से लेकर चीन, जापान, मंगोलिया और कोरिया तक की हैं। 

इस संकलन में एक कहानी है किनतू-नाम्बी  नाम की। किनतू इस धरती का आदि पुरुष है। उसके पास उदर पोषण के लिए एक गाय है। आकाश के शासक गुलू की पुत्री नाम्बी से उसका प्रेम होता है। एक तरफ ऊंचाई पर बैठा राजा, दूसरी तरफ धरती पुत्र। राजा को कैसे पसंद आएगा कि उसकी नाजों में पली बेटी एक गरीब से शादी करे सो वह किनतू की हर तरह से परीक्षा लेता है, जिसमें वह सफल होता है। राजा गुलू किनतू की चतुराई से प्रभावित हो अपनी हार मान लेता है। किनतू और नाम्बी का विवाह हो जाता है। इस मुख्य कथा में बहुत से प्रसंग हैं। इनका परीक्षण करते हुए लेखक इस नतीजे पर पहुंचता है- लेकिन किनतू और नाम्बी अपने भावी जीवन के लिए गाय, बछड़े के अतिरिक्त भेड़, बकरी, मुर्गी, रतालू और केला ही लेकर वापस होते हैं, जिससे इस तथ्य की पुन: पुष्टि होती है कि कथाकालीन समाज पशुपालक रहा होगा और उसने रतालू और केले के माध्यम से कृषक समाज होने की दहलीज में कदम रख दिया होगा। मोटे तौर पर यह प्रणय कथा पशुपालक जगत और कृषक जागतिकता के संधिकाल की कथा है। 

राज हित  एक चीनी लोककथा है। इसमें एक युवक है जो चीन की दीवार बनते समय बेगारी से बचने के लिए अंगूर के बगीचे में जाकर छुप जाता है। वहीं मालिक की बेटी से कालांतर में उसका प्रेम, फिर विवाह होता है। राजा के सैनिकों को पता चलता है तो वे उसे गिरफ्तार कर ले जाते हैं। वह बनती हुई दीवाल के नीचे दबकर मर जाता है। उसकी पत्नी के आर्तनाद से आसमान आहत हो जाता है, स्वर्ग उसके आंसुओं में बहने लगता है, दीवार का एक हिस्सा ढहता है, पति का शव बाहर निकल आता है, वह अपने मृत पति को देख पाती है, लेकिन पति अपने प्रिया को नहीं देख सकता, क्योंकि वह तो मर चुका है। कहानी यहां समाप्त होती है। लेखक यहां निम्न शब्दों में एक लम्बी व्याख्या करता है:- 
इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि दुनिया के महान आश्चर्यों की बुनियाद रक्तरंजित है। आज उन्हें देखने, पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है, निर्मित देखकर सब अश-अश करते हैं, पर कोई सोचता भी नहीं कि इसने कितने इंसानों का लहू खुश्क कर दिया है। कितने घर उजाड़ डाले थे और आज भी कमोबेश आत्मकेन्द्रित सुख ध्यानी ज्ञानी इंसानी लक्ष्यों के चरमोत्कर्ष, उसकी महानतायें, उसकी ही लाशों के ढेर पर खड़ी हुई हैं। 

अहलिया गोया चांद  शीर्षक कहानी में सूर्य और चंद्रमा को पति-पत्नी बताया गया है। सूर्य बदसूरत और झगड़ालू है, चंद्रमा सुंदर। सूर्य चंद्रमा पर अत्याचार करता है। अंतत: वह भाग निकलती है। सूर्य उसका पीछा करता है, लेकिन उसे पकडऩे से बार-बार चूक जाता है। इसी कहानी में जिक्र है कि उनका पुत्र एक बड़ा तारा था। सूर्य ने गुस्से में उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे जिससे आकाश के असंख्य तारे बने। इस कथा पर लेखक अली की टिप्पणी है कि इनका विवाह प्रेमवश न होकर परिवार द्वारा तय रहा होगा और पति की सतत आक्रामकता के विरुद्ध पत्नी को इसीलिए समाज से कोई संरक्षण नहीं मिलता। लेखक यहां दक्षिण पूर्व एशियाई समाज की एक अन्य लोक कथा की ओर ध्यान आकर्षित कराता है जहां एक स्त्री चावल के दानों को आकाश में बिखेर देती है, जिससे तारों का जन्म होता है। इस व्याख्या को पढ़ते हुए मुझे सहज ही तेजिंदर के उपन्यास काला पादरी का ध्यान हो आया जहां एक गरीब को आकाश के तारे चावल के दाने जैसा प्रतीत होते हैं। 

कैलीफोर्निया के चेरॉकी आदिवासियों को सोने की खोज में निकले गौरांगों ने उनकी धरती से बेदखल कर दिया। सुफैद गुलाब  शीर्षक कथा दो सौ या तीन सौ साल से अधिक पुरानी नहीं है। इसमें जब आदिवासी गौरवर्णी स्वर्ण पिपासुओं द्वारा बलपूर्वक खदेड़े जा रहे थे तब वे एक शाम अपने कबीले की देवी का आह्वान करते हैं। देवी उन्हें आश्वस्त करती है कि तुम्हारे कबीले का अंत नहीं होगा। कल एक पौधा उगेगा जिसमें सफेद रंग का गुलाब खिलेगा, जिसके बीच सुनहरे रंग का गुच्छा तुम्हें आताताइयों की हमेशा याद दिलाएगा और उस पौधे के कांटे नुकसान पहुंचाने वाले से तुम्हारी रक्षा करेंगे। यहां लेखक की टिप्पणी पर ध्यान दीजिए-
उस कालखंड में यूरोपीय मूल के लोग जहां भी गए, उन्होंने अपनी पहुंच की धरती को कमोबेश रौंद ही डाला था, स्थानीय संसाधनों पर बलात कब्जेधारियों और लूट खसोट के उस दौर में सामूहिक अप्रवास के लिए विवश कर दी गई स्थानीय आबादियों को नितांत अप्राकृतिक/मानव लोलुपताजन्य कारणों से अपनी जड़ों से उखडऩा पड़ा था। 

पुस्तक का शीर्षक जिस कथा से लिया गया है वह आस्ट्रेलिया की है। इसमें एक वृद्ध है जो समुद्र किनारे पर मछलियां पकड़ रहा है। निकट से गुजर रही दो युवतियों को देखकर वह उन पर जाल फेंकता है। एक युवती जाल से बचने के लिए समुद्र में कूद गई। वृद्ध उसके पीछे जलती लकड़ी लेकर समुद्र में कूदा। लकड़ी जैसे ही समुद्र की सतह से टकराई, रोशनी के कण आकाश में बिखर गए और इस तरह तारों का जन्म हुआ। इस कथा में समुद्र, मोती, मूंगा, शैवाल, समुद्री घास, केकड़ा, आक्टोपस इत्यादि का जो उल्लेख हुआ है उसे समेटते हुए लेखक मानता है कि प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय अधिकारियों के हक की अवधारणा अत्यंत पुरानी है। इसी कहानी की व्याख्या करते हुए लेखक यह भी स्थापित करता है कि स्त्रियों में अंधकार को आलोकित करने की ऊर्जा निहित है। उसकी यह स्त्रीवादी व्याख्या अन्यत्र भी देखने मिलती है। 

एक नाईजीरियाई कहानी है- चाह बर्बाद करेगी । इसमें मत्स्य कुमार तेंदुए का मित्र है और उसकी पत्नी से प्रेम करने लगता है। तेंदुए को यह बात पता चल जाती है। वह राजा के पास शिकायत करने पहुंचता है। राजा न्याय करता है। मत्स्य कुमार ने विश्वासघात किया है इसलिए अब उसे धरती के बजाय जल में रहना होगा। वह यदि धरती पर आने की कोशिश करेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। राजा यह व्यवस्था भी देता है कि जब भी कोई मनुष्य या पशु मत्स्य कुमार को पकड़ पाएं, उसे मारकर खा लें। लेखक का मानना है कि यह कथा एक सुव्यवस्थित न्याय प्रणाली का उदाहरण है। इसमें राजा सार्वजनिक सुनवाई करता है। विश्वासघाती को उसका पक्ष रखने का अवसर भी मिलता है और पारदर्शिता के साथ न्याय होता है। इस व्याख्या में अंत में की गई टिप्पणी भी विचारणीय है:- 

घटनाक्रम में राजा का न्याय तथा समाज का बहिष्कार समझ में आता है, किन्तु मारे जाने की अंतहीन सजा कि जो भी, उसे जब भी पाए, उसका भक्षण कर जाए, औचित्यहीन है। कब समाप्त होगी ये सजा?

मैंने यहां कुछ कथाओं के उद्धरण दिए हैं। पूर्व में अनेक प्रकाशकों ने विभिन्न देशों और प्रांतों की लोककथाओं के संकलन प्रकाशित किए हैं। इस पुस्तक की विशेषता है कि अली एम. सैयद हर कहानी की वस्तुनिष्ठ व्याख्या करते हैं। वे बतलाते हैं कि प्राचीन समय में स्त्री पुरुष संबंध कैसे थे, न्याय व्यवस्था कैसी थी, पारिवारिक रिश्तों का स्वरूप क्या था, प्रभुत्वशाली लोगों द्वारा गरीब और मजदूर लोगों के साथ कैसा बर्ताव किया जाता था, शस्त्रबल से कैसे जनता आतंकित रहती थी, प्रकृति के विभिन्न उपादानों का मनुष्य जीवन में क्या महत्व था इत्यादि। 

इन कहानियों के आईने में हम मनुष्य सभ्यता के विकास क्रम को देख सकते हैं; उसमें क्या-कैसे परिवर्तन आए हैं, इनकी झलकियां मिलती हैं; कबीलाई समाज, सामंतशाही और राजतंत्र की भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं से परिचय होता है। मनुष्य की जिजीविषा का बयान इन कहानियों में है। कुल मिलाकर यह संकलन लोककथाओं के माध्यम से पाठकों के मनोरंजन का माध्यम मात्र नहीं है, बल्कि अपने समय और जीवन का विश्लेषण करने का भी अवसर जुटाता है। 

मुझे लेकिन इस पुस्तक से एक बड़ी शिकायत है। अगर किसी अच्छे प्रकाशक के पास यह पांडुलिपि गई होती तो पुस्तक का गेटअप बेहतर और नयनाभिराम होता। इसका मुद्रण साफ-सुथरा है, लेकिन उम्दा विचारों की ये किताब उम्दा तरीके से छपना भी चाहिए थी। मुझे अनुपम मिश्र का एक कथन याद आता है। मैंने आज भी खरे हैं तालाब  के सुंदर ले-आउट और गेटअप की प्रशंसा की तो उन्होंने कहा- ''भैया! पानी सुंदर विषय है, उस पर लिखी पुस्तक भी तो सुंदर होना चाहिए। अगर प्रोफेसर अली को साधन उपलब्ध होते तो वे भी शायद वैसा ही कुछ करते। लेकिन बात फिर हमारे पुस्तक प्रकाशकों की है। वे खुद अच्छी पांडुलिपियां खोजने का कष्ट क्यों नहीं उठाते? बहरहाल प्रोफेसर अली एम. सैयद को उनके इस सुंदर प्रयत्न के लिए बधाई देता हूं। उनके महाविद्यालय ने प्रकाशन का बीड़ा उठाया। वे भी बधाई के पात्र हैं। हमें ऐसी पुस्तकों की जरूरत है।
अक्षर पर्व अगस्त 2017 अंक की प्रस्तावना 

Wednesday, 16 August 2017

हिमाचल प्रदेश-1: नूरपुर का किला,मसरूर का मंदिर


  

यह जनश्रुति व्यापक है कि मीरा बाई ने द्वारिका के निकट बेट द्वारिका में जलसमाधि ली थी। इसके अलावा यह जनश्रुति भी है कि मीरा अपने साथ गिरधर गोपाल की एक छोटी सी मूर्ति रखा करती थीं। वह मूर्ति कहां गई, इस बारे में कोई चर्चा अब तक सुनने नहीं मिली थी। लेकिन हिमाचल प्रदेश में जसूर के निवासी हमारे बंधु गोविंद पठानिया ने बताया कि नूरपुर के किले में स्थित बृजराज स्वामी मंदिर में काले पत्थर की जो भगवान कृष्ण की प्रतिमा है वह मीरा बाई की ही प्रतिमा है जो नूरपुर के राजा को किसी संयोग से प्राप्त हो गई थी। यह भी एक किंवदंती ही है और इसका कोई ठोस आधार शायद नहीं है, फिर भी यह एक रोचक जानकारी है जो गोविंद जी ने हमें दी। हम हिमाचल प्रदेश की दो सप्ताह की यात्रा पर थे और पहले पड़ाव में धर्मशाला पहुंचे थे। धर्मशाला से जसूर कोई पैंसठ किलोमीटर है।  इंटैक की हिमाचल राज्य संयोजक बहन मालविका पठानिया का आदेश था कि हिमाचल यात्रा में हम उनके घर जरूर आएं।
पालमपुर से पठानकोट के राष्ट्रीय राजमार्ग पर जसूर के लिए चले तो नूरपुर कब गुजर गया पता ही नहीं चला। मालविका और गोविंद जी के साथ चाय पीते-पीते उक्त जानकारी मिली तो हम लोगों का मन नूरपुर किला देखने का हो आया। हम लगभग सात-आठ किलोमीटर पीछे नूरपुर आए, एक संकरे पहाड़ी मार्ग पर चढ़े, तहसील व अन्य सरकारी दफ्तरों की भीड़ से बचते हुए किले तक पहुंचे। यूं तो नूरपुर किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है, लेकिन यह ऐतिहासिक परिसर बहुत कुछ ध्वस्त हो चुका है। मुख्य द्वार से प्रवेश करते साथ भीतर चारों ओर प्राचीन वैभव के भग्नावशेष दिखाई देते हैं। यहां शायद कभी सात तालाब थे, लेकिन अब एक ही बचा है। बायें हाथ पर एक प्राथमिक शाला के खंडहर भी हैं, जिसमें कभी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मेहरचंद महाजन ने पढ़ाई की थी। बहरहाल इस विस्तृत परिसर में स्थित मंदिर के प्रांगण में तीन खास बातें नोट करने लायक लगीं।
एक तो बृजराज स्वामी याने भगवान कृष्ण की मूर्ति बहुत आकर्षक और सुंदर है। मंदिर के भीतर कृष्णलीला के भित्तिचित्र भी हैं जो धुंधले पड़ चुके हैं। दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य है कि मंदिर के प्रवेश द्वार का निर्माण राजस्थान से आए एक मुसलमान चारण ने करवाया था। संगमरमर में अपना नाम लिखकर बांकाराय राजभट्ट ने द्वार पर लगा दिया था ताकि भक्तों की चरण-धूलि उनको मिलती रहे। साम्प्रदायिक सौहाद्र्र का यह एक प्रत्यक्ष उदाहरण था। तीसरी खास बात मंदिर के बाहर ही फल-फूल रहा मौलश्री का वृक्ष है जो कि कम से कम चार सौ साल पुराना है। वहां जो सूचनाफलक लगा है उससे ज्ञात होता है कि मंदिर के पहले यह भवन दरबार-ए-खास था जिसकी जगह पर राजा जगतसिंह ने मंदिर स्थापित कर दिया। इस कस्बे का नाम नूरपुर क्यों पड़ा इसकी भी एक कहानी है। बताया जाता है कि जहांगीर के साथ नूरजहां यहां आई थीं और उनके सम्मान में पुराना नाम बदलकर नूरपुर नाम रख दिया गया था। जहांगीर के आदेश पर जगतसिंह ने उस दौरान कभी कंधार की लड़ाई जीत कर अपनी वीरता का परिचय भी दिया था। नूरपुर पठानकोट से मात्र पच्चीस किलोमीटर दूर है तथा प्राचीन इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यह देखने योग्य स्थान है।
नूरपुर और जसूर की हमारी यह संक्षिप्त यात्रा कई कारणों से आनंददायक सिद्ध हुई। सबसे पहले तो मालविका और गोविंद जी के घर हम हिमाचली भोजन का आस्वाद ले सके। छत्तीसगढ़ में जैसे मसूर की दाल का बटकर बनाया जाता है, वैसे ही हिमाचल में राजमा अथवा काले चने का मदरा बनाया जाता है। इसमें तेल का इस्तेमाल नहीं होता बल्कि दही तपने से निकले घी में ही दाल पक जाती है। दूसरा व्यंजन है तेलियामाह जो माह की दाल को सरसों के तेल में खूब पकाने से बनता है। हिमाचल के इस पश्चिम अंचल में धान की पैदावार खूब होती है और यहां सुबह-शाम भोजन में चावल ही खाया जाता है।
रोटी या फुलके मेहमानों के आने पर ही बनाते हैं। एक दिलचस्प बात यह हुई कि गोविंदजी पचास साल पहले रायपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज में पढऩे आए थे और पढ़ाई बीच में छोड़कर घर वापिस चले गए थे, लेकिन रायपुर की स्मृतियां उनके हृदय पर आज भी अंकित हैं। बातों-बातों में कुछ परिचितों के नाम निकले तो मैंने फोन पर गोविंद जी से उनकी बात कराई। यह एक मजेदार प्रसंग था।
जसूर में ही हमें मसरूर के मंदिर की जानकारी मिली। तापमान कम था फिर भी उमस बहुत ज्यादा थी। इस असुविधा को झेलते हुए हम कांगड़ा जिले के इस दूरस्थ गांव पहुंचे। मसरूर एक अद्भुत स्थान है। यहां एक विशालकाय पहाड़ी को काटकर आज से हजार वर्ष पूर्व शिव मंदिर का निर्माण किया गया था। एक तरह से मसरूर को एलोरा के  विश्वप्रसिद्ध मंदिर की लघु प्रतिकृति कहा जा सकता है। किंतु विडंबना यह हुई कि किन्हीं कारणों से मंदिर का निर्माण अधूरा रह गया।
दूसरे सन् 1905 के भूकंप में मंदिर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इसलिए अब आप जो देखते हैं वे मुख्यत: टूटकर गिरे हुए शिलाखंड ही हैं जिन पर उकेरी गई आकृतियां कलाकारों की कल्पना और कौशल का परिचय देती हैं। मसरूर मंदिर एकांत में एक टीले पर अवस्थित है। यह एक पुरातात्विक धरोहर है और नोट करें कि ग्राम पंचायत का दफ्तर मंदिर परिसर में ही लगता है। इस प्राचीन धरोहर की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है, यह दुख की बात है।
मसरूर से हम कुछ किलोमीटर चलकर वापिस राष्ट्रीय राजमार्ग पर कांगड़ा की ओर बढ़े। कांगड़ा हिमाचल का एक बड़ा जिला है। यहां कांगड़ा का किला, उसके भीतर स्थित जैन मंदिर तथा कांगड़ा शहर में बृजेश्वरी देवी का मंदिर मुख्यत: ये दो आकर्षण हैं। हम कांगड़ा फोर्ट पहुंचे तब तक शाम हो चुकी थी। प्रवेश टिकट लेकर भीतर तो गए, लेकिन सूनापन देखकर किले में ऊपर चढऩे का साहस नहीं जुटा पाए। यह किला एक ऊंची पहाड़ी पर स्थापित है और इसे देखकर ग्वालियर के किले की कुछ-कुछ याद आती है क्योंकि वहां भी ऐसी ही सीधी सपाट ऊंची प्राचीर है।
हम दिन भर की यात्रा में धूप और उमस से बेहाल हो चुके थे, इसलिए बृजेश्वरी देवी के मंदिर नहीं गए, लेकिन धर्मशाला लौटते हुए कांगड़ा नगर के बीच से गुजरने का मौका मिला। ऐसा अनुमान हुआ कि यहां एक ही मुख्यमार्ग है, वह भी इतना संकरा कि दो वाहन किसी तरह निकल जाएं। शहर में भारत की हर शहर की तरह खूब भीड़-भाड़ थी और हमें बाहर निकलने में ही कोई आधा घंटा लग गया होगा। आज इतना ही। धर्मशाला और आसपास की बात अगले हफ्ते...।
देशबंधु में 17 अगस्त 2017 को प्रकाशित 

Wednesday, 9 August 2017

वैज्ञानिक जिन्हें हम भूल न जाएं



वे लोग जो पिछले सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ की रट लगाते हैं, रोना रोते हैं, शिकायत करते हैं, उनके सामने मैं कुछ नाम रखना चाहता हूं। होमी जहांगीर भाभा, विक्रम साराभाई, सतीश धवन, यू.आर. राव, जयंत विष्णु नार्लिकर, बसंत गोवारीकर, पंचानन माहेश्वरी, खड्गसिंह वल्दिया, वर्गीज़ कुरियन, आर.एच. रिछारिया, डी.एस. कोठारी, प्रो. यशपाल, पुष्पमित्र भार्गव, एपीजे अब्दुल कलाम इत्यादि। नामों की यह फेहरिस्त काफी लंबी बन सकती है। इसमें वे नाम भी जुड़ सकते हैं जो विदेश जाकर बस गए हैं और जिन्होंने नोबल पुरस्कार सहित अनेक सम्मान हासिल किए। पाठक अगर गौर करें तो पाएंगे कि ये सारे नाम वैज्ञानिकों के हैं। देश में ऐसे विद्वानों की कमी नहीं है जिन्होंने अन्य क्षेत्रों में अपार सफलताएं अर्जित की हैं; अपनी मेधा से विश्व को चमत्कृत और भारत को गौरवान्वित किया है। कभी प्रसंग आने पर ऐसे नामों की भी चर्चा शायद हो सकेगी। मैं वैज्ञानिकों की सूची में दो नाम और जोड़ना चाहूंगा जो थे तो विदेशी, लेकिन जिन्होंने अंतर्मन से भारत को अपना घर बना लिया था। एक जेबीएस हाल्डेन, और दूसरे प्रोफेसर डब्लू. डी. वैस्ट।
मैंने इनमें से अधिकतर वैज्ञानिकों के काम के बारे में सुना है और अपने देश के लिए उन्होंने जो कुछ किया है उसके प्रत्यक्ष परिणाम भी देखे हैं। इन नामों का जिक्र मैं आज इसलिए कर रहा हूं कि पिछले दिनों हमने अपने तीन महान वैज्ञानिकों को खो दिया, लेकिन उनके निधन पर न तो मीडिया में कोई खास चर्चा सुनने मिली और न उन उच्च शिक्षण संस्थानों में उन्हें शायद ही याद किया गया जिनको बनाने संवारने में उन्होंने अपना पूरा जीवन खपा दिया। हमें कभी भारत का अर्थ बताया गया था कि जो भा अर्थात बुद्धि और ज्ञान की साधना में रत हो वह भारत है। आज का दृश्य देखकर लगता है कि यह परिभाषा शायद मनगढ़ंत है। यहां टीवी के छोटे-मोटे कलाकारों को देखने के लिए भीड़ उमड़ती है, नामचीन फिल्मी सितारों के मिनट-दो मिनट के कार्यक्रम के लिए करोड़ों लुटा दिए जाते हैं, लेकिन विश्वगुरु होने का दावा करने वाले इस देश में उन गुरुओं का कोई सम्मान नहीं, उन्हें कोई याद नहीं करता, जिन्होंने सचमुच मां भारती की सेवा की है।
हमारी शासन व्यवस्था, समाज व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था- सब में ज्ञान, विवेक और तर्कबुद्धि, इन सबका मानो कोई स्थान नहीं रह गया है। अंग्रेजी में जिसे सॉफ्ट पावर कहा जाता है उसे हम लगभग भूलते जा रहे हैं। चंद्रयान, मंगलयान, उपग्रहों का प्रक्षेपण इत्यादि देखकर मन स्वाभाविक रूप से आनंदित होता है कि हमारे देश ने वैज्ञानिक प्रगति का ऐसा मुकाम हासिल किया है; लेकिन आनंद के इस क्षण में अगर यह याद न रहे कि इन उपलब्धियों के पीछे किसकी कल्पना, ज्ञान और परिश्रम लगा हुआ है, तो क्या यह एक तरह से अकृतज्ञता नहीं है? विरोधाभास देखिए कि जब अपने आसपास के किसी प्रतिभावान युवक या युवती को किसी वैज्ञानिक मिशन में छोटी-मोटी भूमिका निभाने का भी अवसर मिलता है तो हम उस पर उल्लास प्रकट करते हैं, लेकिन ऐसे किसी मिशन की परिकल्पना कैसे होती है, उसे साकार कौन करता है, उसकी कार्ययोजना किसने बनाई है, यह सब हम शायद जानना ही नहीं चाहते। दूसरे शब्दों में हम एक अवसरवादी मनोवृत्ति का पालन करते दिखाई देते हैं।

मैंने प्रारंभ में जिन महानुभावों के नाम लिए, उनमें से कुछ को निजी तौर पर जानने के संक्षिप्त अवसर भी मुझे मिले और मैंने पाया कि भारत को प्रगतिशील, शांतिपूर्ण, सौहाद्र्रपूर्ण, समृद्ध देश बनाने की कितनी तड़प इनके मन में थी। ये वे लोग थे जो उत्तर औपनिवेशिक युग में नवसाम्राज्यवादी ताकतों के सामने नहीं झुके, जिन्हें विदेशी विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं और शोध संस्थानों से एक से बढ़कर एक लुभावने, लालच भरे प्रस्ताव मिले किन्तु इन्होंने उनको ठुकरा दिया। भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर हो या इसरो, अमूल डेयरी हो या राष्ट्रीय वनस्पति शोध संस्थान, सागर विश्वविद्यालय हो या भारतीय सांख्यिकी संस्थान, ऐसे तमाम प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान इन लोगों की ही देन है। जेबीएस हाल्डेन मूलत: ब्रिटिश थे, लेकिन वे भारत में अन्य बातों के अलावा सिकलसेल पर अनुसंधान करते रहे और उनका निधन हुआ तो वसीयत के मुताबिक उनका पार्थिव शरीर मेडिकल कॉलेज में दान कर दिया गया। प्रोफेसर वैस्ट ने सागर विश्वविद्यालय में टीन की छत वाले बैरक में भूगर्भशास्त्र की अपनी प्रयोगशाला स्थापित की।
बसंत गोवारीकर वह वैज्ञानिक थे जिन्होंने मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने का फार्मूला विकसित किया। वे 1960-61 में इंग्लैंड में पंडित नेहरू से मिले थे और उनके विचारों से प्रभावित होकर देश लौट आए। युवा वैज्ञानिक संजय पलसुले के निमंत्रण पर कोई पन्द्रह साल पहले वे रायपुर आए थे तब उनके साथ घंटे-दो घंटे की बातचीत हुई थी। उनके मन में तड़प थी कि कैसे हमारे युवजन वैज्ञानिक सोच और वैज्ञानिक दृष्टि सिद्ध करें। पुणे विश्वविद्यालय के कुलपति रहते हुए इस दिशा में वे सदैव प्रयत्न करते रहे। जयंत नार्लिकर ने तो युवावस्था में ही काफी सुयश अर्जित कर लिया था। वे इंग्लैंड में प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रेड हॉयल के साथ खगोल विज्ञान में काम कर रहे थे। उनकी खोजों के लिए उन्हें नोबल पुरस्कार मिलने तक की संभावना जतलाई जाती थी, किन्तु वे भी देश की सेवा करने के लिए भारत लौट आए। यहां उन्होंने देश भर से खगोलशास्त्रियों की एक अच्छी टीम तैयार कर ली। पुणे विश्वविद्यालय के परिसर में ही इस हेतु एक केन्द्र भी स्थापित हुआ। यही नहीं, उन्होंने विज्ञान कथाएं लिखने के साथ-साथ बच्चों को विज्ञान शिक्षा देना प्रारंभ किया जो आज तक जारी है। उनकी गणितज्ञ पत्नी मंगला जी उनका साथ देती हैं।
प्रो. यशपाल इसरो अर्थात भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अहमदाबाद के निदेशक थे। उन्होंने अमूल के संस्थापक और श्वेत क्रांति के जनक डॉ. कुरियन से मिलकर योजना बनाई कि इसरो के उपग्रहों का उपयोग करते हुए गुजरात के दुग्ध उत्पादक परिवारों को शिक्षित किया जाए। परिणामस्वरूप साइट (SITE)योजना अस्तित्व में आई। हिन्दी में इसे उपग्रह शैक्षिक टेलीविजन प्रयोग के नाम से हम जानते हैं। देश के छह प्रदेशों में साइट (SITE) के अंतर्गत ग्रामीण जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की बुनियादी जानकारी उपग्रह से जुड़े टीवी सेट के माध्यम से दी जाने लगी। 1975 में प्रारंभ इस कार्यक्रम के बाद ही भारत में टीवी की लोकप्रियता बढ़ी। इसके बाद का किस्सा तो सब जानते हैं।
छत्तीसगढ़ के पाठकों को शायद याद हो कि वे प्रो. यशपाल ही थे जो नवगठित राज्य में अंधाधुंध निजी विश्वविद्यालय खोलने के निर्णय के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय तक गए थे इस प्रदेश को उनका कृतज्ञ होना चाहिए कि उनकी सामयिक पहल के चलते ही निजी विश्वविद्यालयों के लिए नियम-कानून बने और शिक्षा की दुकानें खोलने पर किसी हद तक लगाम लग सकी। मुझे यशपाल जी के साथ राष्ट्रीय साक्षरता अभियान की एक जूरी में सदस्य बनने का संयोग मिला। मैंने जब उन्हें बताया कि उदयपुर (राजस्थान) के एक गांव में एक नाई परिवार की बहू उच्च सवर्ण, विशेषकर ठाकुरों की महिलाओं के लिए साक्षरता की कक्षाएं लगा रही है तो यह सुनकर वे बहुत खुश हुए और मुझसे कहा- ललित! कमाल है मैं इस लड़की से मिलकर उसे व्यक्तिगत तौर पर बधाई देना चाहता हूं। ऐसे लोग ही भारत में एक नए समाज की रचना कर पाएंगे। मैं प्रोफेसर यशपाल का उत्साह और सहजता देखकर अभिभूत था। उन्हें कोई गुरूर ही नहीं था कि वे इतने बड़े वैज्ञानिक और शिक्षाविद थे
अभी कुछ दिन पहले पुष्पमित्र भार्गव का निधन हुआ। प्रो. भार्गव सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी अर्थात कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान संस्थान, हैदराबाद के संस्थापक निदेशक थे। मैंने उन्हें पहली बार हैदराबाद में ही देखा जब वे निजाम कॉलेज मैदान में करीब दस हजार लोगों की भीड़ के सामने विश्वशांति, भाईचारे और सांस्कृतिक विनिमय पर व्याख्यान दे रहे थे। वैसे वे हिन्दी भाषी थे, लेकिन एक राष्ट्रीय सम्मेलन में होने के नाते उनका व्याख्यान अंग्रेजी में था। सहज, सरल, धाराप्रवाह जिसे उपस्थित श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे। प्रो. भार्गव ने वर्तमान सरकार में असहिष्णुता के विरुद्ध अपना पद्मभूषण सम्मान लौटा दिया था, लेकिन कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार समिति से भी त्यागपत्र दे दिया था क्योंकि वे कार्यकारी अध्यक्ष सैम पित्रोदा के विचारों से असहमत थे दूसरे शब्दों में वे एक स्वतंत्रचेता नागरिक थे। हमें वर्तमान युग के इन मनीषियों के बारे में स्वयं जानना चाहिए और आवश्यकता है कि नई पीढ़ी का भी इनसे परिचय कराया जाए।
देशबंधु में 10 अगस्त 2017 को प्रकाशित 

Wednesday, 2 August 2017

स्मार्ट सिटी : शहर और सपना

 स्मार्ट सिटी...स्मार्ट सिटी... स्मार्ट सिटी...। जहां-जहां घोषणा हुई है, जनता बेहद प्रसन्न है कि उनके शहर की तकदीर संवरने वाली है। वह गर्व के उस क्षण की प्रतीक्षा कर रही है, जब उसे 'स्मार्ट सिटी’ के नागरिक होने का खिताब मिल जाएगा। जनता से कई गुना अधिक खुशी तो उनको हो रही है जिन पर स्मार्ट सिटी योजना लागू करने की जिम्मेदारी आन पड़ी है। सड़कें चौड़ी करना है, फुटपाथ बनाना है, स्काई वॉक का अजूबा तैयार करना है, बिजली के खंभे और ट्रांसफार्मर हटाना है, भूमिगत वायरिंग करना है, वाई-फाई का प्रबंध करना है, अपशिष्ट याने कचरा हटाना है, और ऐसे तमाम काम हैं। सिर उठाने की भी फुरसत नहीं है। अखबारों की सुर्खियां चीखती हैं- अपने रायपुर में, अपने जबलपुर में, हमारे इंदौर में, हमारे भोपाल में क्या-क्या होने जा रहा है। अखबारों का शहर के प्रति ऐसा प्यार देखकर मन जुड़ा जाता है। इन्हें कितनी फिक्र है शहर की! अफसरों के चेहरों पर चमक आ गई है। नेतागण खिल-खिल पड़ रहे हैं। मुझे 'काला पत्थर’ फिल्म में नीतू सिंह का संवाद याद आता है- बाबू, मैं अंगूठी नहीं, सपने बेचती हूं। स्मार्ट सिटी नीतू सिंह की वही तिलस्मी अंगूठी है। शहर के सारे कष्टों का निवारण हो जाएगा।
लेकिन फिर ऐसा क्यों है कि स्मार्ट सिटी योजना पूरे शहर के लिए नहीं है, रायपुर हो कि इंदौर, भोपाल हो कि भुवनेश्वर। अभी तक जितने नगर इस योजना में लिए गए हैं, उनमें से प्रत्येक का दो-ढाई प्रतिशत के लगभग क्षेत्रफल ही योजना के अंतर्गत आएगा। मैंने एक-दो साल पहले लिखे अपने लेख मेें इसका उल्लेख किया था (देखिए, देशबन्धु 30 जुलाई 2015 और 4 फरवरी, 10 फरवरी 2016 )। अभी मेरे सामने इंडियन एक्सप्रेस का 14 जून 2017 का अंक है। 135 वर्ग किमी क्षेत्र वाले भुवनेश्वर में मात्र 4 वर्ग किमी क्षेत्र को स्मार्ट सिटी बनाया जाएगा, जबकि पुणे की स्थिति तो बदतर है। महानगर का क्षेत्रफल 276 किमी है, जबकि स्मार्ट सिटी के अंतर्गत सिर्फ 3.6 वर्ग किमी को लिया गया है, जो क्षेत्रफल का 1.3 प्रतिशत है। इसके आगे भी पढ़ लीजिए। भुवनेश्वर के लिए एशियाई विकास बैंक (एडीबी) से चार हजार करोड़ का ऋण इस काम हेतु लिया गया है, जबकि पुणे के लिए बाईस सौ करोड़ रुपए। इस भारी कर्ज की रकम कौन पटाएगा? जनता ने अभी तक यह सवाल नहीं उठाया है। उसे अभी अंगूठी की करामात पर विश्वास है। तिलिस्म टूटेगा, भरम टूटेगा, तब तक अंगूठी बेचने वाले कोई और नुस्खा लेकर आ जाएंगे।
समझना होगा कि स्मार्ट सिटी से हमारा आशय आखिरकार क्या है। इसकी तस्वीर ऐसी हो सकती है- शहर की बसाहट तरतीबवार हो, जैसी कि फिल्मों में विदेशों के दृश्यों में दिखाई देती है। सड़कें साफ-सुथरी, गड्ढामुक्त हों। कचरे का कहीं नामोनिशान न हो। खेल के मैदान और बाग-बगीचे हों। यातायात के साधन चौबीस घंटे सुलभता से उपलब्ध हों। दैनिक जरूरतों का सामान आस-पड़ोस में मिल जाए। सड़क पर निकलते वक्त दुर्घटना का डर न हो। मनोरंजन के लिए छविगृह और नाट्यशाला हों। स्कूल-अस्पताल पहुंचना आसान हो। बाज़ार में धक्का-मुक्की न हो। बिजली और टेलीफोन के तार टूट कर गिरने का भय न हो। रेलवे स्टेशन व बस स्टैंड सुव्यवस्थित हों। रेस्तोरां हो या चाट की दूकान-गुणवत्ता व स्वच्छता का ख्याल हो व उस पर निगरानी रखी जाए। वाहनों की पार्किंग में सुगमता हो। नालियां बदबू से बजबजाती न हों। विरासत महत्व की इमारतों का बाकायदा संरक्षण हो और नगरवासियों के साथ प्रवासी भी उन्हें देखकर आनंदित हों। इतना ही नहीं, नगर में अतिथि सत्कार की परंपरा हो, दूरदराज गांव-गांव से भी लोग आएं तो उनके साथ बदसलूकी न हो, रोजगार की तलाश जिन्हें खींचकर ले आती है, उन्हें भी आश्रय का भरोसा हो। हम जो स्मार्ट सिटी बनाने जा रहे हैं क्या उनमें इन सारी बातों की गारंटी होगी?

यह सवाल आवश्यक है और उत्तर की मांग करता है। सेमिनार देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका है। इसमें हर माह किसी एक विषय पर केन्द्रित विद्वतापूर्ण लेख प्रकाशित होते हैं। इस पत्रिका का जून अंक मेरे सामने है, जो बंगलुरु की दुर्दशा पर केन्द्रित है। पत्रिका ने शीर्षक में ही कटाक्ष किया है- 'बैंगलोर्स ग्रेट ट्रांसफार्मेशन’ याने 'बंगलोर का अपूर्व कायाकल्प’। ध्यान दीजिए कि सेमिनार ने सरकारी नाम बंगलुरु के बजाय जबान पर चढ़े प्रचलित नाम बंगलोर का ही प्रयोग किया है। संदेश साफ है कि नाम बदल देने से किसी स्थान की किस्मत नहीं बदल जाती। इस संदर्भ में ताजा उदाहरण गुडग़ांव का है। किसी जमाने में गुड़ की मंडी थी तब उसका नाम बदलना किसी को नहीं सूझा। कारपोरेट के चमचमाते दफ्तर खुल गए, आलीशान इमारतें खड़ी हो गईं, अभिजात कालोनियां बन गईं तो नीति-निर्माताओं को गुरु द्रोणाचार्य याद आ गए और देहाती नाम वाले गुडग़ांव का नामकरण संस्कृतनिष्ठ गुरुग्राम हो गया। हरियाणा सरकार को ध्यान नहीं रहा कि द्रोणाचार्य महाभारत में धर्मराज नहीं, कौरवों के साथ थे। जो भी हो, नाम बदलने के बाद भी गुडग़ांव स्मार्ट सिटी तो नहीं बन पाया। वहां की अव्यवस्था के किस्से आए दिन सुनने मिलते हैं।
सेमिनार के बंगलोर पर केन्द्रित अंक में भी ऐसी ही कुछ विसंगतियों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है। यह सबको पता है कि बंगलौर को भारत की सिलिकॉन वैली की संज्ञा दी जाती है। विगत दो दशकों के भीतर यहां आईटी कंपनियों के बड़े-बड़े प्रतिष्ठान स्थापित हुए हैं जिनमें नौकरी करने भारी संख्या में देश भर से युवजन आते रहे हैं। यह शहर एक तरह से भारत की स्वप्न नगरी बन गया है। कहना होगा कि बंगलोर या बंगलुरु में उद्यमशीलता का वातावरण काफी पहले से था। भारत सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक महत्वपूर्ण कारखाने यहां स्थापित किए थे। आईटी कंपनियों के आने के बाद औद्योगिक विकास की यह गति कई गुना बढ़ गई, लेकिन दूसरी ओर नगरीय प्रशासन का ढांचा लगभग नेस्तनाबूद हो गया। यूं तो नया हवाई अड्डा बन गया, मेट्रो रेल आ गई, सड़कों का जाल बिछ गया, लेकिन शहर की पहचान खो गई और उसे किसी कदर मरने के लिए छोड़ दिया गया।
बंगलुरु की नगर निगम दिवालिया हो चुकी है तथा विकास के नाम पर चारों ओर अराजकता है। जिस शहर में दक्षिण भारत के सेवानिवृत्त लोग शांत स्वच्छ वातावरण में बुढ़ापा बिताने आते थे, वहां का वायु प्रदूषण आज दिल्ली से मुकाबला कर रहा है। नगर की हरियाली खत्म हो रही है और यहां की झीलों में जहरीले रसायनों से उपजा सफेद झाग सड़कों पर बहता है। विडंबना यह है कि बंगलुरु में कोई एक सरकार नहीं है। वहां नगर निगम है, विकास प्राधिकरण है, औद्योगिक क्षेत्र विकास मंडल है, अंतरराष्ट्रीय विमानतल विकास अभिकरण है, बंगलोर-मैसूर अधिसंरचना गलियारा विकास प्राधिकरण है, बंगलोर एजेंडा टॉस्क फोर्स है और है बंगलोर ब्लू प्रिंट एक्शन ग्रुप। दो-चार सरकारें और भी होंगी तो हमें आश्चर्य नहीं होगा। हां! एक बंगलोर विजन ग्रुप भी है। ये सब मिलकर या अलग-अलग क्या कर रहे हैं, यह शायद कोई नहीं जानता। बंगलौर या बंगलुरु चूंकि देश का पांचवां बड़ा महानगर है तथा नागरिक हस्तक्षेप की एक लंबी परंपरा वहां रही है इसलिए जो तमाम गड़बडिय़ां हो रही हैं उन पर सवाल उठाने वालों की कमी नहीं है। सेमिनार पत्रिका का अंक निकला है तो स्थानीय स्तर पर भी बात होती ही होगी, यह कल्पना हम कर सकते हैं।
इस मुखर विरोध का कोई असर होता तो बात समझ में आती। हमें तो ऐसा लगता है कि सरकार कहीं भी, किसी की भी हो, जनता की चिंता करना सबने छोड़ दिया है। यदि बंगलोर जैसे जागरुक शहर में नागरिकों की आवाज अनसुनी कर दी जाती है तो भोपाल, रायपुर या बिलासपुर की क्या औकात! हर जगह देखने मिलता है कि राजनीतिक प्रभु अपने विश्वस्त अधिकारियों के भरोसे नीति-निर्माण और क्रियान्वयन दोनों का काम छोड़कर निश्चिंत हो जाते हैं। जिन्हें शहर की जनता महापौर या पार्षद पद के लिए चुनती है उनकी भी कोई सुनवाई नहीं होती। उसका एक बड़ा कारण है कि हमारे तथाकथित जनप्रतिनिधि चुनाव तो जीत जाते हैं, लेकिन नगर निवेश हो या अन्य कोई नीति, उनकी समझ का दायरा बेहद सीमित होता है। ये जिस विषय को नहीं जानते, उसे सीखने की भी कोई इच्छा उनकी नहीं रहती। उनके संकीर्ण स्वार्थ की पूर्ति हो जाए, इतनेे मात्र से वे प्रसन्न रहते हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी शहर सही अर्थों में स्मार्ट सिटी बने भी तो कैसे?
देश के जाने-माने वास्तुविद (आर्किटेक्ट) गौतम भाटिया अनेक वर्षां से कहते आए हैं कि हमारे नगरों की जो पारंपरिक बसाहट है वह देश की जलवायु के माफिक है। इसमें अनेक सुविधाएं हैं और प्रदूषण फैलने की कम से कम गुंजाइश है। दूसरे प्रसिद्ध वास्तुविद ए.जी.के. मेनन दिल्ली में पुरातत्व महत्व की इमारतों व स्थलों को बचाने में जुटे हुए हैं। वयोवृद्ध वास्तुविद बालकृष्ण दोशी ने ऐसी डिजाइनों के भवन बनाए हैं जिनमें पंखे व ए.सी. की आवश्यकता नहीं पड़ती। इंग्लैण्ड से आकर बसे स्वर्गीय लॉरी बेकर ने स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का उपयोग कर सस्ती कीमत पर रिहायशी मकान बनाए, लेकिन हमें शायद इन सबकी आवश्यकता नहीं है। हमें तो ऐसे कथित विशेषज्ञ चाहिए जो समुद्र की लहरों को गिनते हों और उससे प्राप्त धनराशि सही जगह तक पहुंचा सकें।
 देशबंधु में 03 अगस्त 2017  प्रकाशित 

Tuesday, 1 August 2017

स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्गति-2


यह अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल की बात है, जब सुषमा स्वराज केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री थीं। उस समय हर प्रदेश में एम्स की स्थापना करने का निर्णय लिया गया था।  परिणामस्वरूप आज लगभग हर प्रदेश में एम्स अस्तित्व में आ गया है। इसके समानान्तर प्रदेशों में नए चिकित्सा महाविद्यालय खोलने की भी पहल की गई। छत्तीसगढ़ में राज्य निर्माण के पूर्व मात्र रायपुर में एक मेडिकल कॉलेज था। आज बिलासपुर, जगदलपुर, रायगढ़ व अंबिकापुर में शासकीय चिकित्सा म.वि. स्थापित हो चुके हैं।  इनके अलावा निजी क्षेत्र में भी कुछ मेडिकल कॉलेज प्रारंभ हुए हैं। दक्षिण भारत व महाराष्ट्र में तो लंबे समय से निजी महाविद्यालय हैं, लेकिन अब अन्य प्रांत भी उनका अनुकरण करने में पीछे नहीं हैं। इनके अलावा डेंटल कॉलेज व नर्सिंग कॉलेज भी बड़ी संख्या में खुले हैं। चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में  हो रहे इस भौगोलिक विस्तार का स्वागत होना चाहिए।  देश की बढ़ती आबादी के अनुपात में यह आवश्यक हो गया है कि आधुनिक व बेहतर चिकित्सा सर्वत्र पहुंचे और उसके लिए उपयुक्त शिक्षा व प्रशिक्षण की व्यवस्था हो। 
यह एक सैद्धांतिक कथन हुआ। व्यवहारिकता के धरातल पर क्या स्थिति है, यह जान लेना उचित होगा। मध्यप्रदेश के भोपाल स्थित एम्स में डायरेक्टर याने संस्था प्रमुख का पद लंबे समय से खाली पड़ा है। रायपुर एम्स के डायरेक्टर डॉ. नितिन नगरकर को ही भोपाल की जिम्मेदारी दे दी गई है, जबकि रायपुर एम्स भी एक नया संस्थान है और यहां की व्यवस्था मुकम्मल होने में काफी कुछ किया जाना बाकी है। भोपाल में स्थापना के समय 27 विभाग थे, जो तीन साल में बढ़कर 41 हो गए हैं, लेकिन उस अनुपात में डॉक्टरों की संख्या बढ़ने के बजाय कम हो गई है। कल्पना की जा सकती है कि जो मरीज इतनी आस लेकर अस्पताल पहुंचते हैं, उन पर क्या बीतती होगी। इससे बदतर हालात राज्य शासन के कॉलेजों के हैं। एक भी म.वि. ऐसा नहीं है, जिसमें चिकित्सा शिक्षकों के सारे पद भरे हों। जब भारतीय चिकित्सा परिषद की निरीक्षण टीम आना होती है तो यहां के डॉक्टरों को वहां ट्रांसफर किए जाने का नाटक खेला जाता है। इस कलाबाजी को आत्मप्रवंचना ही कहना होगा। करोड़ों-अरबों भवन निर्माण व उपकरण खरीद में लग गए, लेकिन भवन सूने हैं और मशीनों में जंग लग रही है। जिनको कमीशन मिलना था, बस वही खुश नजर आ रहे हैं।
मुझे जानकर आश्चर्य होता है कि एम्स में भी डॉक्टर पूरी या पर्याप्त संख्या में नहीं है, जबकि यह देश का सबसे अधिक प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान है। एम्स के डॉक्टर प्राईवेट प्रैक्टिस नहीं करते। इसका एक प्रमुख कारण बताया जाता है कि उनके निवास कॉलेज परिसर में ही होते हैं। अगर वे निजी तौर पर मरीज देखने लगें तो तुरंत शिकायत हो सकती है। लेकिन शायद इससे बड़ा कारण यह है कि एम्स में काम करते हुए जो सम्मान प्राप्त होता है, वह भारत में अन्यत्र नहीं मिल सकता। जहां तक भौतिक परिलब्धियों याने वेतन-भत्ते का मामला है तो वह भी पर्याप्त और संतोषजनक होता है। एक समय प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टर भी निजी प्रैक्टिस नहीं करते थे। उन्हें इसके लिए एन.पी.ए. (नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस या गैर-प्रैक्टिस भत्ता) मिलता था। इसमें कुछ कमजोरी परिलक्षित हुई तो कॉलेज में ही पे-क्लीनिक खोल दिए गए। इसमें अपनी ड्यूटी करने के बाद डॉक्टर निजी तौर पर मरीज देख सकते थे और फीस का आधा भाग अस्पताल को उसकी सुविधाओं का लाभ लेने की एवज में दिया जाता था। किंतु ऐसा वक्त आया कि यह व्यवस्था भी ध्वस्त हो गई।
यह लाख टके का सवाल है कि शासकीय चिकित्सा महाविद्यालयों में, शासकीय अस्पतालों में, यहां तक कि एम्स जैसे संस्थान में डॉक्टरों का टोटा क्यों पड़ जाता है। मुख्यत: यह स्थिति विगत पच्चीस-तीस वर्ष के भीतर बनी। ऐसा नहीं है कि उसके पहले प्राईवेट प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर नहीं थे। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम होती थी और वे अक्सर बस्ती के धनाढ्य परिवारों का ही इलाज करते थे। यद्यपि पास-पड़ोस के लोग भी उनके पास इलाज के लिए पहुंच जाते थे। इन निजी चिकित्सकों पर मरीजों को लूटने का आरोप भी शायद ही कभी लगा हो। एकाध-दो अपवाद तो हर जगह होते हैं। आम तौर पर जनता सरकारी अस्पताल का ही उपयोग करती थी और वहां के डॉक्टरों को समाज में यथेष्ट सम्मान मिलता था। इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि मंत्री, संसद सदस्य, विधायक, संभागायुक्त, जिलाधीश भी अपना और अपने परिवार का इलाज सरकारी अस्पताल के डॉक्टर से करवाने को प्राथमिकता देते थे। जब शासन-प्रशासन के कर्णधार सरकारी अस्पताल में आएंगे तो स्वाभाविक ही वहां की व्यवस्था चाक-चौबंद होगी और डॉक्टर अपने कर्तव्य के प्रति पूरी तरह मुस्तैद।

इधर पिछले कुछ सालों में यह हुआ है कि जो सत्ता में बैठे हैं उनका घमंड सातवें आसमान पर पहुंच गया है। वे बाकी सबको हेय दृष्टि से देखने लगे हैं। फिर चाहे मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर हों, या विश्वविद्यालय के कुलपति या बैंक मैनेजर। नए-नए बने कलेक्टर भी अपने से दुगुनी उम्र के लोगों का लिहाज नहीं करते। नेताओं की बदतमीजी का तो कहना ही क्या? इस श्रेष्ठताबोध का परिणाम है कि नेताओं, अफसरों के बच्चे न तो सरकारी स्कूलों में पढ़ते, और न उनके परिवार का इलाज सरकारी अस्पताल में होता है। वे अपने लिए विशेष और पृथक सुविधा की मांग करने लगे हैं। इसका नतीजा सामने है। रायपुर जैसे शहरों में निजी अस्पताल खूब धड़ल्ले से चल रहे हैं। उनके संचालक चांदी काट रहे हैं और रायपुर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सिर्फ वही पहुंचता है जिसका कोई और सहारा नहीं होता। आज भी अगर हमारे कर्णधार मेडिकल कॉलेज अथवा जिला अस्पताल में जाकर इलाज करवाने लगे तो स्थितियां बदलते देर न लगेगी। दवाईयों की कमी नहीं रहेगी, उपकरण धूल खाते नहीं रहेंगे, स्टाफ ड्यूटी से नदारद नहीं मिलेगा और बड़े नामधारियों के साथ आम जनता को भी राहत मिलने लगेगी।
देवानंद-विजय आनंद की 1971 में फिल्म आई थी- तेरे मेरे सपने। युवा डॉक्टर देवानंद परासिया की कोयला खदान में डॉक्टर बन कर आता है। प्रलोभनवश वह कुछ समय बाद तब की बंबई आज की मुंबई चला जाता है जहां वह फिल्मी सितारों का डॉक्टर बन जाता है। इंग्लैंड के प्रसिद्ध उपन्यासकार और चिकित्सक ए.जे. क्रोनिन के उपन्यास 'द सिटेडल' से यह कहानी उठाई गई थी। इसका संक्षिप्त रूप मैंने अनेक वर्ष पूर्व 'इम्प्रिंट' पत्रिका में पढ़ा था जो 'माय टू वर्ल्ड्स' शीर्षक से छपा था। यह एक आत्मकथात्मक उपन्यास है। डॉक्टर क्रोनिन ने अपने जीवन की शुरूआत वेल्स की कोयला खदान में डॉक्टर के रूप में शुरू की थी। वे बाद में लंदन आकर ग्लैमर की दुनिया के डॉक्टर बन गए थे। उन्हें कमाई तो बहुत हुई, लेकिन मन का संतोष समाप्त हो गया। अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हुए क्रोनिन ने चिकित्सकीय पेशे को ही अलविदा कह दिया और वे पूर्णकालिक लेखक बन गए। प्रसंगवश उल्लेख कर दूं कि उन्हीं के अन्य उपन्यास 'द जूडास ट्री' पर मौसम फिल्म बनी थी।
ए.जे. क्रोनिन के 1924-25 में लिखे इस आत्मकथात्मक उपन्यास से ग्रेट ब्रिटेन की स्वास्थ्य नीति में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया। हर नागरिक को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो, इस उद्देश्य को सामने रखकर ब्रिटेन में एन.एच.एस. (नेशनल हेल्थ सर्विस) की स्थापना की गई, जो पिछले सत्तर सालों से ब्रिटिश जनता के लिए बड़ी हद तक वरदान बनी हुई है। उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि बिल क्लिंटन ने जब 1993 में अमेरिका का राष्ट्रपति पद संभाला तब उनकी और उनसे अधिक हिलेरी क्लिंटन की इच्छा थी कि एनएचएस का प्रयोग अमेरिका में दोहराया जाए। कारपोरेट दबाव के चलते वे ऐसा नहीं कर पाए। बराक ओबामा ने भी राष्ट्रपति बनने के बाद इस दिशा में पहल की और उनके कार्यकाल के लगभग अंत में एक नई स्वास्थ्य योजना लागू हो गई, जिसे सामान्य तौर पर ओबामा केयर के नाम से जाना जाता है। दुर्भाग्य से डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते साथ सबसे पहला कदम ओबामा केयर को खारिज करने की दिशा में उठाया। इसके पीछे निजी बीमा कंपनियों का हाथ माना जाता है।
यह हमारे देश की विडंबना है कि हमारी स्वास्थ्य नीति भी कारपोरेट क्षेत्र और निजी बीमा कंपनियों के दबाव में है। छत्तीसगढ़ में ही आए दिन स्मार्ट कार्ड में होने वाली धांधलियों की खबरें पढ़ने मिलती हैं। अभी जब राज्य सरकार ने स्मार्ट कार्ड की सीमा तीस हजार से बढ़ाकर पचास हजार करने का विचार किया तो किसी निजी बीमा कंपनी ने मनमानी प्रीमियर दर पर अनुबंध हासिल कर लिया जो जल्दी ही संदेह के घेरे में आ गया और जांच होने पर अनुबंध निरस्त करना पड़ा।  मेरा कहना है कि केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार, उन्हें ऐसे दबाव से मुक्त होकर काम करना चाहिए। प्रधानमंत्री ने तो 'स्वच्छ भारत' का नारा दिया है। यदि 'स्वस्थ भारत' नहीं होगा तो अमिताभ बच्चन लाख विज्ञापन कर लें, स्वच्छ भारत की कल्पना साकार नहीं हो सकती। मेरे अनेक मित्र डॉक्टर हैं और उनमें से कई श्रेष्ठ साहित्य के अध्येता और उत्तम फिल्मों के दर्शक हैं। वे अवश्य ए.जे. क्रोनिन के बारे में जानते हों। इन मित्रों से ही मेरी आशा है कि वे अपने हमपेशा साथियों को प्रेरित करेंगे कि हर नागरिक को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो।
देशबंधु में 27 जुलाई 2017 को प्रकाशित 

Wednesday, 19 July 2017

स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्गति-1


 
केन्द्र सरकार को एक नीतिगत निर्णय लेकर शहरी क्षेत्र में निजी अस्पताल खोलने के लिए बैंक ऋण देने पर पाबंदी लगा देना चाहिए; इस निर्णय का दूसरा पहलू यह होगा कि जो डॉक्टर दूरस्थ अंचलों में जाकर अस्पताल स्थापित करना चाहते हैं उन्हें बैंकों से रियायती दर पर कर्ज उपलब्ध कराया जाए। यह संभवत: एक दु:साहसिक निर्णय माना जाएगा। लेकिन इस कदम से देश के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की जो बदहाली है उस पर किसी हद तक रोक लग सकेगी। विचार करें तो यह प्रस्ताव पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की 'पुरा' अवधारणा के काफी करीब है। 'पुरा' याने ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाओं का विस्तार। यह सबके सामने है कि ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों का बेहद अभाव है। शहर और गांव के बीच जनसंख्या के अनुपात में डॉक्टरों की उपलब्धता में बहुत बड़ा फर्क है। आए दिन खबरें सुनने मिलती हैं कि अस्पताल है तो डॉक्टर नहीं, डॉक्टर है तो नर्स या अन्य सहायक नहीं, वे हैं तो दवाईयां नहीं। हाल-हाल में तो इस बारे में बेहद दर्दनाक समाचार सुनने मिले।
कहीं कोई खेतिहर मजदूर अपनी मृत पत्नी का शव कंधे पर ढोकर पन्द्रह-बीस किलोमीटर पैदल गांव की ओर जा रहा है, तो कोई हाथ ठेले में लाश ले जाने पर मजबूर है; किसी गर्भवती स्त्री को अस्पताल लाना हो तो एक नहीं, अनेक अड़चनें सामने आ जाती हैं। ऐसे ही प्रसंग के चलते दशरथ मांझी पर फिल्म बन गई और उसके नाम की चर्चा विदेशों तक हो गई। ग्रामीण इलाकों से बार-बार सुनने में आता है कि वहां महिला चिकित्सकों की पदस्थापना ही नहीं होती और यदि होती है तो कोई वहां रहना नहीं चाहता है। यह स्थिति सिर्फ एलोपैथिक डॉक्टरों की नहीं है, ग्रामीण इलाकों के आयुर्वेदिक अस्पताल भी, अगर कहीं भगवान है तो उसके भरोसे हैं। कुछ वर्ष पूर्व आदिवासी ग्राम दुगली में (जहां राजीव गांधी एक बार स्वयं पधारे थे।) आयुर्वेदिक अस्पताल का सूना भवन मैंने देखा था। छह बिस्तर का अस्पताल, औषधि कक्ष, निरीक्षण कक्ष, डॉक्टर का निवास, सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से निर्मित, लेकिन वहां न डॉक्टर था, न कम्पाउंडर और न ड्रेसर। धमतरी से एक कम्पाउंडर बीच-बीच में आकर सेवाएं देता था।
ऐसे प्रसंग देश के हर जिले में आपको मिल जाएंगे, बहुत ढूंढने की जरूरत नहीं होगी। काफी पहले मध्यप्रदेश में नियम था कि मेडिकल कॉलेज से निकले हर डॉक्टर को ग्रामीण अंचल में दो साल सेवा देनी होती थी। उनसे बाँड भरवाया जाता था। अगर गांव नहीं गए तो बाँड की रकम जब्त हो जाती थी। शुरू में यह रकम भारी लगती होगी, लेकिन रुपए के अवमूल्यन के साथ इसका कोई मोल नहीं रहा और डॉक्टर खुशी-खुशी बाँड की रकम जब्त करवाने लगे। उनका एक तर्क है और वह सही प्रतीत होता है कि अगर गांव में अस्पताल का भवन नहीं है, बिजली-पानी नहीं है, रहने की व्यवस्था नहीं है तो ऐसे में वहां जाकर करेंगे भी क्या? यही तर्क सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी देते हैं, लेकिन किसी तहसीलदार, डिप्टी कलेक्टर या कलेक्टर को हमने कभी ऐसे किसी तर्क का सहारा लेते नहीं देखा। विगत वर्षों में देश में बहुत छोटे-छोटे जिले बन गए हैं जहां नाममात्र की सुविधाएं हैं, इसके बाद भी कलेक्टर अपने अमले के साथ वहां रहकर काम करते हैं।
पाठकों ने कुछ दिन पहले समाचार पढ़ा होगा कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी जिले बलरामपुर के युवा जिलाधीश अवनीश शरण ने अपनी बेटी का दाखिला वहीं के सरकारी स्कूल में करवाया है। दूसरी ओर हम यह भी जानते हैं कि देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में पहले मलकानगिरी के जिलाधीश विनील कृष्ण और बाद में छत्तीसगढ़ में सुकमा के जिलाधीश अलेक्स पाल मेनन का नक्सलियों ने अपहरण किया। इन प्रसंगों का जिक्र मैं एक वृहत्तर परिदृश्य को सामने रखने के लिए कर रहा हूं। अगर अभिजात वर्ग के माने जाने वाले आईएएस अधिकारी कठिनाइयों के बीच रह सकते हैं तो डॉक्टर, अध्यापक या इंजीनियर क्यों नहीं? हां! वे ये मांग अवश्य कर सकते हैं कि जहां उनकी पदस्थापना की जा रही है वहां न्यूनतम सुविधाओं वाला निवास स्थान तो उन्हें मुहैया करवाया जाए। लेकिन फिर मुझे याद आता है कि मैंने बैंक मैनेजरों को सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते देखा है जहां सुविधा के नाम पर कुछ भी न था और इंजीनियरों के बारे में तो कहा ही जाता है कि वे किसी परियोजना में काम करते हुए तिरपाल वाले टेंट में ही रातें बिताते रहे हैं। बस्तर में जब डीबीके रेलवे लाइन बिछ रही थी तब इंजीनियरों को तंबुओं में रहते हुए मैंने देखा है।
मैं आज के समय में ऐसी घनघोर आदर्शवादी स्थिति की वकालत नहीं करना चाहता। लेकिन सरकार ध्यान दे तो एक अवधारणा को अवश्य अंजाम दिया जा सकता है। इसके लिए शायद कलाम साहब की पुरा योजना को थोड़ा संशोधित करना पड़ेगा। छत्तीसगढ़ में लगभग हर विकासखंड को तहसील का दर्जा मिल गया है। हर तहसील के अंतर्गत कुछ उपतहसीलें भी हैं। क्या यह संभव नहीं है कि उपतहसील वाले कस्बे में शासकीय कर्मचारियों  की एक आवासीय कालोनी बना दी जाए जिसमें शिक्षक, डॉक्टर, राजस्व अधिकारी, इंजीनियर, नर्स इत्यादि सब रहें? वे वहां से अपने स्कूल या अस्पताल तक आना-जाना करें और कोई आपात स्थिति हो तो कुछ ही मिनटों में सहायता उपलब्ध कराई जा सके। यह मोबाइल का जमाना है। गांव-गांव में संचार सुविधा उपलब्ध है। अगर ऐसे संकुलों का निर्माण होता है तो मेरी समझ में ग्रामीण समाज को विशेषकर शिक्षा व स्वास्थ्य संबंधी हर आवश्यक सुविधा अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध हो सकेगी।
स्वास्थ्य सुविधाओं के संबंध में मेरा दूसरा  सुझाव है कि शासकीय चिकित्सकों की पदस्थापना एक पूर्व-निर्धारित रोस्टर के अनुरूप की जाए और उसमें कोई अपवाद न हो। एक डॉक्टर की पहली पोस्टिंग कम से कम तीन साल के लिए दूरस्थ इलाके में हो। तीन साल बाद उसे किसी अपेक्षाकृत बड़े स्थान पर पोस्टिंग की जाए। जैसे-जैसे उसकी निजी आवश्यकताएं और पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ें वैसे-वैसे उसकी पदस्थापना उस जगह पर हो जहां पहले के मुकाबले बेहतर सुविधाएं मिल सके। इसे यूं समझें कि एक अविवाहित डॉक्टर भले गांव में रह ले, लेकिन जब उसके बच्चों के कॉलेज जाने का समय आए तो वह ऐसी जगह पर रह सके जहां संतान की पढ़ाई मनमाफिक हो सके। यह रोस्टर फार्मूला अन्य सेवाओं में भी लागू किया जा सकता है। अगर मैं गलत नहीं हूं तो आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की पदस्थापनाएं कुछ इसी तरह के फार्मूले के तहत होती हैं। रोस्टर प्रथा को सही रूप से लागू करने में एक अड़चन अवश्य है और वह है राजनैतिक हस्तक्षेप की जो कि बर्दाश्त नहीं होना चाहिए।
हमें इसके साथ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए एक आधारगत संरचना की आवश्यकता है। देखने में यह आया है कि निर्णयकर्ताओं की मुख्य रुचि निर्माण कार्यों में होती है। इतने करोड़ की यह योजना, उतने करोड़ की वह योजना, इसी का झांसा जनता को बार-बार दिया जाता है। इसका प्रतिकार तो जनता को ही करना है, लेकिन जिन्हें देश-प्रदेश की जिम्मेदारियां संभालने के लिए चुना गया है उन्हें भी तात्कालिक स्वार्थ से हटकर इस बारे में सोचना ही पड़ेगा। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान याने एम्स से लेकर मेडिकल कॉलेज व डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल होते हुए उपस्वास्थ्य केन्द्र तक एक श्रृंखला कायम हो जाए तो बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देना संभव हो जाएगा। अधिकतर बीमारियां मौसमी और छोटी-मोटी होती हैं, जिनका इलाज उपस्वास्थ्य केन्द्र में संभव है। मर्ज गंभीर हो तो मरीज को शहर या राजधानी के अस्पताल लाने की आवश्यकता पड़ेगी। इसके पूर्व उपकेंद्र का डॉक्टर वीडियो-वार्ता के माध्यम से प्राथमिक उपचार कर सके आज यह भी संभव है। आशय यह कि चिकित्सा तंत्र व्यवस्थित हो तो डॉक्टर भी बेहतर सेवा करने में समर्थ होगा।
फिलहाल मेरी आखिरी बात निजी और सरकारी क्षेत्र को लेकर है। मेरा मानना है कि सरकारी अस्पतालों को सुदृढ़ करना आवश्यक है। यह सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। एसडीजी (सतत विकास लक्ष्य) के अंतर्गत चिकित्सा सेवा पर जीडीपी का तीन प्रतिशत खर्च होना चाहिए। भारत सरकार उसके लिए प्रतिश्रुत है, लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकारी क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा बदतर हो रही है और निजी क्षेत्र फल-फूल रहा है। उसके अनेक कारण हैं। सरकार को ऐसी युक्ति अपनाना ही होगी जिसमें डॉक्टर ग्रामीण अंचल में जाकर सेवा करने के लिए प्रस्तुत हों। जो डॉक्टर अद्र्ध शहरी या कस्बाई केन्द्रों में निजी अस्पताल खोल कर बैठे हैं वे बता सकते हैं कि वे किसी भी तरह से घाटे में नहीं हैं। मरीज से उन्हें फीस तो मिलती ही है, उन्हें ताजी सब्जियां, अनाज, शहद जैसे उपहार भी कृतज्ञतास्वरूप प्राप्त होते हैं। अर्थात यहां गेंद डॉक्टरों के पाले में है।
देशबंधु में 20 जुलाई 2017 को प्रकाशित