Thursday, 27 December 2012

दूसरी चीन यात्रा: कुछ नए अनुभव




चीन 
जैसे महाकाय देश को छह दिन के संक्षिप्त प्रवास में समझ लेना और कोई निर्णायक राय बना लेना कठिन ही नहीं असंभव है। फिर भी चीन के बारे में लंबे समय से जितना कुछ पढ़ा और सुना था उसके आधार पर अपनी दूसरी यात्रा के दौरान जो कुछ देखा उसकी कुछ छवियां पाठकों के साथ साझा करने में शायद कोई हर्ज नहीं है। मेरी पहली चीन यात्रा अक्टूबर 2005 में अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन के शिष्ट मंडल के साथ हुई थी जिसमें भारत से हम छह सदस्य थे। इस बार मैं विश्व शांति परिषद के डैलिगेशन का सदस्य बनकर गया था और भारत से मैं अकेला ही था। चीन की प्राचीन चार राजधानियों में से दो बीजिंग व शियान पहली यात्रा में देख ली थी। इस बार तीसरी प्राचीन राजधानी नानजिंग देखने का भी अवसर मिल गया।

चीन में पिछले सात सालों के दौरान कुछ बदलाव आए हैं, लेकिन मैंने जो बदलाव सबसे पहले अनुभव किया वह मौसम का था। अक्टूबर में देश का मौसम खुशगवार था, जबकि अभी दिसम्बर मध्य में वहां कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। शंघाई, नानजिंग, बीजिंग- तीनों ही शहरों में कभी शून्य, कभी शून्य से थोड़े ऊपर के तापमान के बीच बादल भी जब-तब बरस कर मौसम को और ठंडा कर रहे थे। हमारे बीजिंग पहुंचने के एक दिन पहले तक वहां बर्फ भी गिर रही थी। और जब हम पहुंचे तब जगह-जगह बर्फ हटाने का काम चल रहा था। नानजिंग से बीजिंग की हमारी ट्रेन राजधानी के कुछ किलोमीटर पहले ही रोक दी गई और बहुत सावधानी से धीमी रफ्तार के साथ आगे बढ़ाई गई ताकि कोई अनहोनी न हो जाए। बीजिंग से पचास-साठ किलोमीटर पर बादालिंग नामक स्थान है: अमूमन चीन की दीवार देखने पर्यटक यहीं आते हैं, लेकिन हमारे प्रवास के दौरान यह रास्ता बर्फ से ढंका होने के कारण बंद था और मैं चीन की दीवार दुबारा देखने से वंचित हो गया। 

2005 में शंघाई एक विकसित होता हुआ शहर था, लेकिन इन सात सालों के दरम्यान उसकी शक्ल पूरी तरह बदल गई है। नए शहर का एक हिस्सा ऐसा है, जिसकी तुलना स्वयं चीन के लोग न्यूयार्क के मैनहट्टन से करते हैं याने समृध्दि का द्वीप। शंघाई का पुराना शहर भी काफी कुछ अपने पुराने रूप में कायम है। लेकिन अब वहां भी पुरानी इमारतों को जमींदोज कर गगनचुंबी अट्टालिकाएं खड़ी हो रही हैं। बीजिंग, नानजिंग, शंघाई- सभी जगह जमीनों के भाव भी उसी अनुपात में गगनचुंबी हो चले हैं। जिन लोगों ने अपनी पुश्तैनी जमीनें रीयल एस्टेट वालों को बेच दी है, वे फिलहाल करोड़पति तो बन ही गए हैं। यह पढ़कर आपको गुड़गांव या नोएडा का खयाल आ सकता है। मैंने शंघाई में ऐसे दो स्थान देखे जिनका निर्माण 2005 के आसपास प्रारंभ हो चुका था। पहला- पुडोंग में नया विमानतल। मुझे दिल्ली का टी-3 उसके मुकाबले बेहतर प्रतीत हुआ। दूसरा- टीवी टॉवर जिसमें 259 मीटर तक ऊपर जाने की अनुमति थी। वहीं से सामने एक और इमारत दिखाई देती है, जो संभवत: 362 मीटर ऊंची है। और उसके बगल में ही चार सौ मीटर से ऊंची एक मीनार खड़ी हो रही है। 

शंघाई में होनपु नामक नदी है, जो शहर के भीतर यू आकार में बहती है और इस तरह महानगर को तीन हिस्सों में बांटती है। बीच में एक जगह नदी तट पर कोई दो किलोमीटर लंबा घाट विकसित किया गया है, जो सैलानियों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र है। पास में ही वाहनों के लिए प्रतिबंधित एक सड़क है, जिस पर चहलकदमी करते हुए आप आजू-बाजू के मॉल व मैगा स्टोर्स में और कुछ नहीं तो विंडो शॉपिंग कर सकते हैं। इस बाजार में दुनिया के हर प्रसिध्द ब्राण्ड का माल आपको मिल जाएगा। चीन विश्व की दूसरी आर्थिक महाशक्ति बन चुका है और उसे न तो केएफसी या मेकडोनाल्ड से डर लगता है और न वालमार्ट से। इस सड़क पर घूमते हुए मन में सवाल उठा कि यहां जो महंगे-महंगे सामान बिक रहे हैं इनको आखिर खरीदता कौन है। समझ आया कि देश में निश्चित रूप से ऐसा धनिक वर्ग तैयार हो चुका है, जिसके पास यह सामर्थ्य है।  दूसरे-नौजवानों को भी यह बाजार लुभा रहा है।

शंघाई से हम नानजिंग के लिए बुलेट ट्रेन में रवाना हुए। यह एकदम नया अनुभव था। शंघाई, बीजिंग और नानजिंग तीनों शहरों में हमने रेल्वे स्टेशन देखे। हर जगह चार या उससे यादा रेल्वे स्टेशन है, जो अलग-अलग दिशाओं की सेवा करते हैं। हर रेलवे स्टेशन विमानतल की तर्ज पर बना है। तलघर में या दूर कहीं पार्किंग, फिर स्वचालित सीढ़ी या एस्केलेटर से ऊपर, प्रवेश द्वार पर एक्स-रे मशीन की सामान की जांच, यात्रियों की खानातलाशी, फिर दूसरी स्वचालित सीढी से और ऊपर लंबा गलियारा पार कर अपने बोर्डिंग गेट पर, ट्रेन आने के पन्द्रह मिनट पहले बोर्डिंग गेट खुलता है, नीचे उतरकर प्लेटफार्म पर आओ, टिकट पर बोगी नंबर लिखा है, अपने निर्धारित स्थान पर खड़े हो जाओ, ट्रेन का दरवाजा वहीं खुलेगा, दो या तीन मिनट रेलगाड़ी रुकती है। सैकड़ों यात्री, लेकिन कोई भगदड़ नहीं। प्लेटफार्म पर यात्रियों के अलावा कोई नहीं आ सकता। बूढ़े या अशक्त लोगों को किस तरह संभाला जाता है यह मैं नहीं देख पाया। शंघाई से नानजिंग चलने वाली बुलेट ट्रेन में मात्र एक घंटा बीस मिनट में तीन सौ किलोमीटर से अधिक का सफर तय कर लिया। ट्रेन यादातर समय दो सौ नब्बे किलोमीटर की औसतन रफ्तार से दौड़ती रही। इसी तरह नानजिंग से बीजिंग का एक हजार किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करने में ट्रेन ने महज चार घंटे लिए गो कि बर्फ के कारण ट्रेन आधा घंटा लेट हो गई। हमारे साथ चल रहे चीनी शांति संगठन के साथी शर्मिंदा होकर सफाई दे रहे थे, यद्यपि उसकी कोई जरूरत नहीं थी। 

मुझे शंघाई से नानजिंग के बीच यह देखकर अचरज हुआ कि पूरे रास्ते में जितने भी गांव पड़े कहीं भी एक व्यक्ति न तो सड़क पर नजर आया और न घरों के बाहर लोग सुस्ताते, गपियाते नजर आए। क्या इसलिए कि अपरान्ह का समय था और सब कारखाने या दफ्तर में अपने-अपने काम में मशगूल थे? इस पूरे रास्ते पर जगह-जगह हमें विद्युत संयंत्र व अन्य कारखाने देखने मिले। नानजिंग से बीजिंग के लिए हम सुबह सवा सात बजे रवाना हुए थे। इस लंबे रास्ते पर भी कुछ वैसा ही दृश्य था। आधे रास्ते तक तो खेत दिखते रहे, लेकिन उसके बाद का नजारा एकदम अलग था। चारों तरफ बर्फ की चादर बिछी हुई थी। ट्रेन में हमने यह भी देखा कि लगभग सभी ट्रेन कर्मी महिलाएं ही थीं। और दूसरी बात यह नोटिस की कि दोनों यात्राओं में कोई भी टिकट चेक करने नहीं आया। शायद इसलिए कि प्लेटफार्म पर आने के पहले स्वचालित मशीन से पहले ही टिकट चेकिंग हो जाती है। मुझे ट्रेन यात्रा के दौरान  बातचीत में यह भी पता चला कि चीन में अभी भी औरतों को पचास वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त कर दिया जाता है ताकि वे अपने घर-परिवार की जिम्मेदारियां संभाल सकें।  संभवत: नौजवानों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए भी ऐसा किया जाता है।

बहरहाल अपनी इस दूसरी यात्रा में मेरा ध्यान इन दो बातों पर विशेषकर गया। एक तो मैंने यह अनुभव किया कि चीन में धनिकों का एक नया वर्ग तैयार हो जाने के बावजूद जाहिरा तौर पर वहां सामाजिक व्यवहार के स्तर पर गैर-बराबरी नहीं है। नानजिंग रेलवे स्टेशन के बोर्डिंग गेट पर पैरों से लाचार एक युवा भिक्षा मांग रहा था। थोड़ी देर में ही वह उचक कर अन्य यात्रियों के बीच कुर्सी पर बैठ गया और उस पर किसी ने भी आपत्ति नहीं की, नाक-भौं नहीं सिकोडे। रेल्वे स्टेशन पर भीख मांगी जा रही है यह एक वास्तविकता थी, और दूसरी वास्तविकता थी उस याचक का सबके साथ बराबरी के साथ बैठना। यही नहीं, छह दिनों के दौरान और भी कहीं ऐसा नहीं लगा कि सामान्य स्थिति के लोग कहीं हीनभावना से ग्रस्त हैं। दूसरी बात ये मुझे समझ आई कि युवा वर्ग की आकांक्षाओं को वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व ने भलीभांति समझा है। आज की बदलती दुनिया में नौजवान जिस तरह का जीवन जीना चाहते हैं वह उन्हें अपने देश में काफी हद तक उपलब्ध है। कम से कम तीनों शहरों में तो मुझे यही प्रतीत हुआ।

मेरे चीन पहुंचने के कुछ दिन पहले ही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का अठारहवां महाधिवेशन सम्पन्न हुआ था। एक नया नेतृत्व सामने आ गया है। चीन के नए राष्ट्रपति ने पहला निर्देश यह जारी किया है कि वी.आई.पी. के लिए ट्रैफिक दो या तीन मिनट से ज़्यादा न रोका जाए। उन्होंने औपचारिक स्वागत आदि के लिए भी मनाही की है। इसके साथ-साथ उन्होंने यह भी कहा है कि भ्रष्टाचार से लड़ना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। यह सब तो हम अपने यहां भी सुनते आए हैं। आने वाले दिनों में चीन में क्या परिवर्तन आते हैं इसे जानने में हमारी रुचि होगी। आखिरी दिन हम सब  चेयरमैन माओ की समाधि पर भी गए: उसी शाम यह खबर भी मालूम पड़ी कि चूंकि माओ व्यक्ति पूजा के खिलाफ थे इसलिए उनके पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि किए जाने पर भी गंभीरता से विचार चल रहा है।

 देशबंधु में 27 दिसम्बर 2012 को प्रकाशित 

Thursday, 20 December 2012

विधानसभा नतीजों के संकेत



गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के बहुप्रतीक्षित नतीजे आ गए हैं। इन्हें समग्रता में देखा जाए तो स्पष्ट संकेत मिलता है कि न तो नरेन्द्र मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं और न ही भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय विकल्प बन पाने की कोई संभावना है।

गुजरात में भाजपा ने लगातार पांचवीं बार जीत दर्ज की है, लेकिन इस तथ्य को कैसे भुला दिया जाए कि जिन नेताओं ने प्रदेश में भाजपा का जनाधार तैयार किया, उनमें से एक पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला आज कांग्रेस में हैं तथा दो अन्य भूतपूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल व सुरेश मेहता ने अपने लिए अलग रास्ता चुन लिया है। नि:संदेह नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने गुजरात में लगातार तीसरी बार चुनाव जीते हैं, लेकिन देश के चुनावी इतिहास में यह कोई अनोखी घटना नहीं है। कांग्रेस के मोहनलाल सुखाड़िया लगातार अट्ठारह वर्षों तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे, मार्क्सवादी योति बसु पांच बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने और आज भी ओडिशा में बीजद के नवीन पटनायक व दिल्ली में कांग्रेस की शीला दीक्षित की चुनावी सफलताएं मोदी के समकक्ष ही ठहरती हैं।

हां, कोई फर्क है तो इस बात का कि नरेन्द्र मोदी की एक विराट छवि इस बीच गढ़ने की निरंतर कोशिशें हुईं जिसमें कारपोरेट घरानों व पूंजीमुखी मीडिया ने भी बढ़-चढ़ कर भूमिका निभाई। श्री मोदी को अपराजेय, लौहपुरुष, विकास पुरुष, कृष्ण, विवेकानंद जैसे विशेषणों से नवाजा गया। उनकी अशिष्टता की हद को छूती वाचालता, प्रकट नस्लवादी मानसिकता, व्यक्तिवादी अहंकार, पार्टी के ऊपर स्वयं को रखने की एक तरह की दृष्टता व प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा- इन सबको उनके गुणों के रूप में प्रचारित किया गया। ऐसा हिटलर के उदय के समय जर्मनी में भी हुआ था। आज भी इस तथ्य को सहजता से भुला दिया गया कि 182 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए नरेन्द्र मोदी को एक भी अल्पसंख्यक उम्मीदवार उपयुक्त न जान पड़ा। पिछले चुनाव के दौरान उन्होंने जहां बार-बार मुख्य चुनाव आयुक्त का पूरा नाम लेकर उनके ईसाई होने को रेखांकित किया था, इस बार उन्होंने अहमद पटेल को सप्रयोजन बार-बार अहमद 'मियां' पटेल कहकर पुकारा। इससे नरेन्द्र मोदी के अल्पसंख्यक द्वेष का प्रमाण तो मिलता ही है, भाजपा का राष्ट्रीय पार्टी होने का दावा भी कमजोर पड़ता है।

हिमाचल प्रदेश में भाजपा को पांच साल बाद फिर बेदखल होना पड़ा है। उत्तराखण्ड के बाद यह भाजपा की दूसरी पराजय है। कर्नाटक में भाजपा के बीच जो कशमकश चल रही है, उसके बारे में यादा कहने की आवश्यकता नहीं है बल्कि यह तुलना करने का लोभ होता है कि जिस तरह श्री येदियुरप्पा को पार्टी ने छोड़ दिया वैसा ही सलूक आने वाले दिनों में श्री मोदी के साथ हो सकता है। पंजाब में भाजपा अकाली दल की बैसाखियों पर है, बिहार में नीतीश कुमार के बलबूते और झारखण्ड में उसके गठबंधन की पवित्रता के बारे में कुछ भी कहना बेमानी है। कुल मिलाकर भाजपा के पास लड़खड़ाते कर्नाटक के अलावा अब सिर्फ तीन राय हैं- गुजरात, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़। गुजरात में भाजपा की जीत में बड़ा योगदान अहमदाबाद, बड़ौदा, सूरत और जामनगर जैसे बड़े शहरों का रहा है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में उसे वैसी सफलताएं नहीं मिलीं। 2013 में जिन प्रांतों में विधानसभा चुनाव होना है उसमें यह तथ्य कितना प्रासंगिक होगा, इसका विश्लेषण दोनों पार्टियों ने शुरू कर दिया होगा।

इन चुनावों के बाद 2014 में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम थम पाएगी या नहीं, मैं नहीं जानता। हो सकता है कि 'कारपोरेट इंडिया' अब किसी नए घोड़े पर दांव लगाए, लेकिन भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का समय है कि आने वाले दिनों में वह किस तरह से लोकहितकारी एजेंडे पर काम कर सकती है।

 देशबंधु में 21 दिसम्बर 2013 को प्रकाशित सम्पादकीय 

Wednesday, 19 December 2012

नानजिंग नरसंहार : 75वीं बरसी





चीन 
का उदय विश्व की दूसरी महाशक्ति के रूप में हो चुका है, लेकिन अपने तीन हजार साल से ज्यादा के इतिहास में इस महादेश को एक के बाद एक राजनैतिक झंझावातों से गुजरना पड़ा है जिसका एक साक्ष्य विश्व के सात आश्चर्यों में से एक चीन की दीवार के रूप में हमारे सामने है। पश्चिम से निरंतर हो रहे आक्रमणों से देश को बचाने के लिए इस दीवार का निर्माण दो हजार साल पहले किया गया था। आधुनिक इतिहास में भी चीन को बहुत से संघर्षों का सामना करना पड़ा, जिनमें ब्रिटिश अगुवाई में चलाया गया अफीम युध्द प्रमुख है। एक के बाद एक राजवंशों द्वारा शासित चीन में जनतांत्रिक राजनीति का उदय 1912 में हुआ जब डॉ. सन यात-सेन पहले चीनी गणराय के राष्ट्रपति बने।

जैसा कि हम जानते हैं 1949 में चीन में माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट शासन स्थापित हुआ, लेकिन इसके पहले के कुछ दशकों में भी देश राजनीतिक अस्थिरता भोगने के लिए बाध्य रहा। चीन के प्रमुख व्यवसायिक नगर शंघाई को विभिन्न विदेशी ताकतों ने अपने-अपने हिस्से में बांट लिया था। एक हिस्से में अंग्रेज, दूसरे में अमेरिकन, तीसरे में जापानी आदि। उन्नीसवीं सदी के अंत में जापान ने चीन पर आक्रमण कर एक तरह से उसे कुछ समय के लिए अपने अधीनस्थ कर लिया था। 1931-32 में चीन की राजनैतिक अस्थिरता को देखते हुए साम्राज्यवादी जापान ने एक बार फिर चीन पर कब्जा करने का मंसूबा बनाया। सन यात-सेन की मृत्यु हो चुकी थी व देश में अमेरिकापरस्त राष्ट्रवादी च्यांग काई शेक और माओ के नेतृत्व में उभरती साम्यवादी ताकत के बीच घमासान चल रहा था।

इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए जापान ने शंघाई के आगे अपने पैर फैलाना शुरू किया और फिर आया 13 दिसम्बर 1937 का काला दिन। देश की तत्कालीन राजधानी दक्षिण में अवस्थित नानजिंग पर जापान की साम्राज्यवादी फौज ने  उस रोज भयानक हमला किया और करीब-करीब दो महीने तक भीषण लड़ाई चलती रही। इस लड़ाई में चीन के तीन लाख से  ज्यादा निर्दोष नागरिक मार डाले गए। इनमें बड़े, बूढ़े, औरत, बच्चे किसी को भी नहीं बख्शा गया। औरतों के साथ बलात्कार की भी अनगिन वारदातें हुर्इं। जापानी सैनिकों में इस बात की होड़ लग रही थी कि कौन कितने यादा लोगों को मार सकता है। इसके लिए घरों में घुस-घुसकर लोगों को मारा गया। किसी को सोते में मार डाला गया, तो किसी औरत को खाना बनाते हुए, तो किसी बच्चे को पढ़ाई करते हुए।

यह विश्व के सामरिक इतिहास की इतनी बड़ी त्रासद कथा है, जिसकी मिसाल ढूंढ पाना मुश्किल है। सामान्य तौर पर लड़ाई सेनाओं के बीच होती है और सैनिक ही युध्दबंदी बनाए जाते हैं। पराजित सैनिक को मारा नहीं जाता, लेकिन यहां तो निर्दोष आबादी को ही मार डालने का पैशाचिक खेल चल रहा था। अगर छोटे पैमाने पर भारत में इसकी कोई मिसाल देखना हो तो नादिरशाह द्वारा दिल्ली में किए गए कत्लेआम या जनरल डायर द्वारा 1919 में बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग में किए गए नरसंहार में देखी जा सकती है। इस साल नानजिंग नरसंहार की 75वीं बरसी थी, जिसके लिए नानजिंग नरसंहार स्मृति एवं संग्रहालय के निमंत्रण पर विश्व शांति परिषद ने अपना एक प्रतिनिधि मंडल नानजिंग भेजा था। विश्व शांति परिषद के इस पांच सदस्यीय दल में मैं अखिल भारतीय शांति एकता परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में शामिल था। अन्य साथी थे पुर्तगाल के शांति संगठन की अध्यक्ष एवं योरोपियन संसद की पूर्व सदस्य इल्डा, ग्रीक शांति संगठन के अध्यक्ष प्रोफेसर स्टॉवरोस, नेपाल शांति संगठन के महासचिव रवीन्द्र अधिकारी व विश्व शांति परिषद के सचिव इराक्लीज। हमारे दल की इस छह दिवसीय चीन यात्रा में तीन दिन के कार्यक्रम नानजिंग में ही थे। 12 दिसम्बर की शाम को नानजिंग नरसंहार स्मृतिस्थल पर एक प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। 13 की सुबह वहीं एक सार्वजनिक सभा का आयोजन था और उसी अपरान्ह नानजिंग पर एक अन्तरराष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया था। इसके अलावा नानजिंग के महापौर के साथ तथा अन्य भेंट मुलाकातों के कार्यक्रम भी थे।

12 दिसम्बर की शाम जब हम स्मृतिस्थल पर प्रार्थना सभा व दीप प्रवलन के लिए पहुंचे तब तक वहां अंधेरा छा चुका था। चीन में इस वक्त भारी ठंड का मौसम है। तापमान शून्य के आसपास पहुंच गया था, कुछ बारिश भी हो रही थी और तीखी ठंडी हवा चल रही थी। प्रार्थना सभा का प्रारंभ बौध्द भिक्षुओं द्वारा समवेत प्रार्थना से हुआ उसके बाद एक-एक कर सब लोगों ने वहां दीपदान किया और वापिस लौट आए। अगली सुबह मुख्य कार्यक्रम के समय उस परिसर को कंपकंपाती धूप के बीच देखने का मौका मिला। परिसर के बाहर स्थापित वह प्रस्तर प्रतिमा अनायास ही मन में करुणा जगाती है जिसमें एक मां अपने बच्चे की मृत देह को बांहों में उठाए हुए है। दो सौ एकड़ से यादा क्षेत्र में फैले इस परिसर की संरचना ही अपने आप में अद्भुत है। 
एक सिरे पर खुला हुआ प्रार्थनास्थल है जहां दस-ग्यारह हजार लोग समा सकते हैं। बीच में संग्रहालय और शोध केन्द्र है, जिसके चारों तरफ जलाशय, जगह-जगह पर उस त्रासदी की याद दिलाते भावपूर्ण प्रस्तर शिल्प हैं।  एक कोने पर श्वेत वस्त्रधारी शांति की देवी की विशालकाय प्रतिमा स्थापित है और जगह-जगह पर दीवार पर या पृथक फलकों पर अंकों में तीन लाख की संख्या उत्कीर्ण है जो दर्शाती है कि 1937 के दिसम्बर और 1938 के जनवरी में इस नगर ने अपनी तीन लाख संतानों को खो दिया था। 75वीं बरसी पर आयोजित कार्यक्रम में नौ अन्य देशों के प्रतिनिधियों सहित नौ हजार से अधिक लोग उपस्थित थे। अन्य देशों से आए लोगों में जापान का भी एक बड़ा जत्था था: ये वे लोग थे जिन्हें साम्राज्यवादी  दौर में अपने देश द्वारा किए गए इस अमानुषिक अत्याचार की ग्लानि थी और वर्तमान में विश्वशांति के लिए काम कर रहे हैं।

13 दिसम्बर की सुबह दस बजे आयोजित सार्वजनिक कार्यक्रम कुल मिलाकर एक घंटे का था। नानजिंग के महापौर, नानजिंग में कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव के संक्षिप्त भाषण मुख्य थे। इनके अलावा इस नरसंहार के साक्षी नब्बे वर्षीय एक वृध्द के संस्मरण व एक स्कूली बच्चे द्वारा विश्व शांति के लिए संकल्प पाठ भी  कार्यक्रम के हिस्सा थे। ठीक दस बजे तीन बार सायरन बजा और कार्यक्रम प्रारंभ हो गया था। कार्यक्रम के अंत में शोक के प्रतीक सफेद फूल चढ़ाकर नानजिंग के शहीदों को अपनी श्रध्दांजलि दी। यह एक व्यवस्थित कार्यक्रम था, लेकिन मुझे इस बात की हैरानी हुई कि 75वीं बरसी जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर चीन के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या अन्य कोई बड़ा राष्ट्रीय नेता शामिल क्यों नहीं हुए। इसके बाद ही हम लोगों ने संग्रहालय का अवलोकन किया। जापान की सरकार आज तक यह नरसंहार होने से ही इंकार करती रही है, लेकिन संग्रहालय में चीनी, जापानी, अमेरिकी, ब्रिटिश अखबारों के पुराने अंकों सहित ऐसे अनेक साक्ष्य मौजूद थे, जो इसकी पुष्टि करते हैं। इस भीषण समय में चीनी जनता ने अपना आत्मबल कैसे बचाए रखा, नानजिंग में मौजूद विदेशी नागरिकों ने लोगों की मदद करने के लिए क्या कदम उठाए और क्या-क्या उस दौरान हुआ- इस सबके विवरण, साक्ष्य व दस्तावेज संग्रहालय में प्रदर्शित है।

मुझे देश-विदेश में अनेक तरह के संग्रहालयों को देखने का अवसर मिला है, लेकिन नानजिंग का यह संग्रहालय कई तरह से अनूठा था। उसकी भावभूमि तो स्पष्ट है, लेकिन प्रादर्शों को संयोजित करने में व घटनाओं को पुन: सृजित करने में जिस कल्पनाशीलता का परिचय दिया गया व वास्तुशिल्प का जैसा प्रयोग किया गया वह मैंने अन्यत्र कहीं नहीं पाया। संग्रहालय के कक्षों से गुजरते हुए पहले मन में दहशत होती है, ऐसी क्रूरता भी संभव है यह विचार मन को दहलाता है, हिंसा व युध्द के खिलाफ वितृष्णा उपजती है और अंत में यही लगता है कि अब ऐसा नहीं होना चाहिए।

देशबंधु में 20 दिसम्बर 2012 को प्रकाशित 

 

Tuesday, 18 December 2012

एफडीआई : विरोध का पाखंड







देश की अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजी की भूमिका किस हद तक स्वीकार्य हो, यह निश्चित रूप से अहम् मुद्दा है जिससे न सिर्फ अर्थनीति, बल्कि राजनीति, सांस्कृतिक मूल्य, सामाजिक परिवेश, राष्ट्रीय सुरक्षा इत्यादि अनेक सवाल जुड़े हुए हैं। इसे देखते हुए आवश्यक है कि इस पर व्यापक तौर पर सार्वजनिक बहस हो। इसके पहले यह स्मरण कर लेना बेहतर होगा कि भारत में विदेशी पूंजी निवेश की ताजा स्थिति क्या है। किसी भी देश में विदेशी पूंजी मुख्यत: दो तरीकों से आती है जिन्हें प्रत्यक्ष (एफडीआई) और संस्थागत (एफआईआई) कहा जाता है। संस्थागत निवेश में जो पूंजी आती है वह दर्शनी हुंडी की शक्ल में होती है। पूंजी लगाने वाला जब चाहे तब अपनी रकम वापिस निकाल सकता है। किसी कवि ने लिखा है-''मेरा श्याम सकारे मेरी हुंडी आधी रात को।'' ऐसा निवेश बैंक खातों में सीधे जमा हो सकता है या शेयर बाजार में और जब भी विदेशी निवेशक रकम निकालता या जमा करता है तो उससे पूंजी बाजार में फेरबदल आता है। इसलिए हमारे यहां एफआईआई को पारंपरिक दृष्टि से गैर-भरोसेमंद और अवांछनीय माना जाता रहा है।

दूसरी ओर प्रत्यक्ष निवेश अथवा एफडीआई का मतलब है कि विदेशी निवेशक कल-कारखानों में, प्रतिष्ठानों में, स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण में अपनी पूंजी लगाएगा। इसमें स्वाभाविक रूप से निवेशक के लिए जोखिम है। एक तो निवेश पर उसे तुरंत कोई लाभ नहीं होता।  कारखाना हो या मेगास्टोर- उसे मुनाफे के लिए प्रतीक्षा करना पड़ती है। यह जरूरी नहीं कि धंधे में फायदा ही हो, फिर भी निवेश तो मुनाफे की उम्मीद से ही किया जाता है। अतिथि देश को इसमें यह फायदा है कि देश के भीतर स्थायी परिसंपत्तियां निर्मित होती हैं तथा पहले दिन से रोजगार के छोटे-बड़े अवसर सृजित होने लगते हैं। इसका यह अर्थ हुआ कि ऐसे एफडीआई को ही अनुमति दी जाए जो सचमुच नया रोजगार लेकर आए और मौजूदा रोजगार को कोई नुकसान न पहुंचे। इसका एक पहलू यह भी है कि देश अपने बलबूते जो निर्माण कर सकता है उसमें अनावश्यक रूप से विदेशी मेहमानों को न बुलाया जाए। यह भी देखने की जरूरत है कि जो मेहमान आना चाहते हैं उनका इतिहास-भूगोल क्या है। क्या उन पर एतबार किया जा सकता है।

सारी बातों पर विचार करें तो ध्यान आता है कि भारत ने नीतिगत तौर पर एफडीआई का विरोध कभी नहीं किया। देश में सार्वजनिक क्षेत्र में बुनियादी उद्योगों को खड़ा करने में विदेशी पूंजी निवेश और विदेशी टेक्नालॉजी ने महती भूमिका निभाई है। अगर पचास, साठ और सत्तर के दशक में मित्र देशों से यह सहायता नहीं मिलती तो भारत आज जहां है वहां नहीं पहुंच पाता। जो ताकतें उन दशकों में हासिल धीमी प्रगति का उपहास उड़ाते हुए आज जीडीपी बढ़ाने के बारे में ऊंची उडान भर रहे हैं, वे इस तथ्य को सुविधापूर्वक भुला देती हैं कि नींव पुख्ता करने में यादा समय लगता है और धीरज की मांग करता है। उसके बाद दीवारें खड़ी करने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है। अपनी हड़बड़ी में उन्हें इस बात का भी ध्यान नहीं है कि पंडित नेहरू के समय में देश की आर्थिक प्रगति की जो बुनियाद रखी गई थी उसका मकसद देश में गैर-बराबरी को मिटाना और सामाजिक न्याय स्थापित करने का था।

आज खुदरा बाजार में एफडीआई को लेकर हो-हल्ला तो खूब मचाया जा रहा है, लेकिन उससे किसी परिणाम की आशा रखना व्यर्थ है, क्योंकि सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जो हो रहा है वह छाया युध्द से अधिक कुछ नहीं है। लोकसभा व राज्यसभा में चाहे जितने आरोप-प्रत्यारोप लगाए गए हों, टी.वी. पर चाहे जितने दावे-प्रतिदावे किए गए हों, यह स्पष्ट है कि इस मुद्दे पर सभी पार्टियों का नजरिया लगभग एक समान है और एफडीआई को रोकने की मंशा किसी की भी नहीं है। अगर कोई फर्क है तो इस बात का कि जहां कांग्रेस व कुछ अन्य दल सीधे किसान, मजदूर की हित की बात कर सकते हैं, वहीं भाजपा के पार्टीहित व्यापारी वर्ग के साथ जुड़े हुए हैं। वे ही उसके वोटर हैं, वे ही उसके फंड दाता हैं और वे ही छोटे-छोटे कस्बों तक संघ की गतिविधियों को चलाने में मददगार होते हैं। जब सुषमा स्वराज ने जोर देकर कहा कि आढ़तिए किसान के लिए एटीएम होते हैं,  तब वे अपनी पार्टी व छोटे-मंझोले व्यापारियों के बीच के रिश्ते को ही रेखांकित कर रही थीं। यही नहीं, भाजपा स्वयं लंबे समय से आर्थिक उदारीकरण की पक्षधर रही है। सार्वजनिक क्षेत्र की कारखानों का विनिवेश उसी से शुरू किया था तथा अन्य बहुत से मुद्दों पर उसकी नीतियां वैश्विक विश्वपूंजीवाद के समर्थन में रही हैं। 

दूसरे, खुदरा बाजार में एफडीआई का प्रवेश अपने आप तक सीमित नहीं है। वह एक व्यापक नीति का हिस्सा है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद से ही भारत में आर्थिक उदारीकरण की नीतियां धीरे-धीरे लागू करना प्रारंभ हो गया था। राजीव गांधी के कार्यकाल में छोटी सी पहल हुई। वी.पी. सिंह के समय में उसे बढ़ावा मिला और पी.वी. नरसिम्हाराव के समय में तो कांग्रेस ने नेहरू की नीतियों को पूरी तरह से तिलांजलि ही दे दी। जो नई नीतियां अमल में आना शुरू हुईं, उनसे भाजपा की कोई असहमति नहीं थी। समाजवादियों को भी उनसे कोई खास तकलीफ नहीं थी और तो और वामदलों ने भी इन नीतियों का कोई ठोस विरोध नहीं किया।

हम याद करना चाहेंगे कि पिछले बीस सालों में शायद ही कोई मुख्यमंत्री ऐसा हुआ हो, जिसने विदेशी निवेशकों को आमंत्रित करने के नाम पर विदेश यात्रा न की हो। जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री जॉन मेजर भारत आए तो वामपंथी सरकार ने कलकत्ता की सड़कों से फेरीवालों और गुमटीवालों को रातोंरात हटा दिया था। कांग्रेस और भाजपा के तमाम मुख्यमंत्री अपने प्रदेश के विकास के लिए विदेशी पूंजी निवेश का झुनझुना बजाते रहे हैं। सोचने की बात है कि नरेन्द्र मोदी की जापान यात्रा का इतना ढिंढोरा क्यों पीटा गया और ब्रिटिश राजदूत के गुजरात प्रवास पर भाजपा ने इतनी खुशियां क्यों जाहिर कीं।

ऐसा भी क्यों है कि बिल गेट्स और वॉरेन बफेट भारतीय कारपोरेट जगत की आँखों के सितारे बने हुए हैं? ऐसा भी क्यों है कि भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में रोजगारोन्मुख पाठयक्रम खोलने पर इतना जोर दिया जा रहा है? एमबीए की इतनी मांग क्यों हो रही है और जब बच्चे एमबीए कर लेंगे तो उन्हें नौकरी कहां मिलेगी? क्या उन्हें इन्हीं सुपर बाजारों में नौकरी करने के लिए तैयार नहीं किया जा रहा है? आज के भारतीय युवाओं के सामने इंदिरा नुई और विक्रम पंडित आदि को रोल मॉडल बनाकर पेश किया जाता है। ऐसे में एफडीआई का विरोध क्या एक पाखंड बन कर नहीं रह जाता? इस तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी गौर करना चाहिए। दलित समाजचिंतक चन्द्रभान प्रसाद और मिलिंद कांबले इत्यादि वालमार्ट आदि के आगमन का उत्साहपूर्वक स्वागत कर रहे हैं। उनका मानना है कि इससे दलित युवाओं को बिना भेदभाव के रोजगार मिलेगा और जातिप्रथा टूटने में मदद मिलेगी।

संसद में इस मुद्दे पर सरकार को जीत मिली, लेकिन मैं कहूंगा कि भाजपा के लिए यह एक बड़ी हार थी। वोटिंग की मांग उन्होंने ही की थी। हारने के बाद नैतिकता का प्रश्न उठाना अपने आप में अनैतिक है क्योंकि आपने अपनी शर्तों पर मोर्चा खोला था। वामदल इस मुद्दे पर भाजपा का साथ देकर अपनी स्थिति और कमजोर कर रहे हैं। मुलायम सिंह और मायावती ने अपने पत्ते ठीक से खेले। वे उत्तरप्रदेश में भाजपा को पैर जमाने का मौका नहीं देना चाहते। कुल मिलाकर आज के आर्थिक- राजनैतिक माहौल में खुदरा बाजार हो या अन्य कोई गतिविधि विदेशी पूंजी निवेश रोकना संभव नहीं है। इसके लिए जिस राजनीतिक सोच व लंबी लड़ाई की जरूरत है उसके लिए कोई भी पार्टी तैयार नहीं दिखती।


 देशबंधु में 13 दिसम्बर 2012 को प्रकाशित 

Thursday, 6 December 2012

आई.के. गुजराल : कुछ निजी यादें






मास्को  31 जनवरी, 1978। इन्द्रकुमार गुजराल सोवियत संघ में भारत के राजदूत थे। भारत-सोवियत मैत्री संघ का एक शिष्टमंडल सोवियत संघ की सद्भावना यात्रा पर था। विभिन्न गणरायों का भ्रमण करने के बाद यात्रीदल उस सुबह मास्को पहुंचा था और राजदूत महोदय ने दल को रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया था। मैं दल का सबसे युवा सदस्य था। गुजराल साहब से जब औपचारिक परिचय करवाया गया और मैंने उन्हें बताया कि मैं मायाराम सुरजन का पुत्र हूं तो गुजरालजी ने प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा अच्छा, वे तो हमारे मित्र हैं। मैं यद्यपि गुजराल साहब को और भी पहले से जानता था, लेकिन उनसे ठीक-ठीक परिचय पाने का यह पहला मौका था।

इसके पहले का एक प्रसंग याद आता है।  अखिल भारतीय समाचारपत्र संपादक सम्मेलन में लघु और मध्यम समाचारपत्रों की स्थिति का आंकलन करने के लिए एक कमेटी बनाई। बाबूजी सम्मेलन के उपाध्यक्ष थे। वे ही इस अध्ययन कमेटी के अध्यक्ष बने। एक साल की मेहनत के बाद रिपोर्ट बनकर तैयार हुई। 1972 में जालंधर में सम्मेलन का त्रिवार्षिक अधिवेशन हुआ, जिसमें श्री गुजराल केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री होने के नाते बतौर मुख्य अतिथि  आमंत्रित थे। बाबूजी ने यह रिपोर्ट उन्हें औपचारिक रूप से सौंपी। गुजराल साहब ने पहले तो नाखुशी जाहिर की: संपादक सम्मेलन में अखबारों को दीगर समस्याओं पर बात क्या? बाबूजी ने स्पष्ट किया कि अधिकतर भाषायी समाचारपत्र मध्यम अथवा लघु हैं तथा उनमें अधिकतर में संपादक ही पत्र के संचालक हैं। उनकी व्यवहारिक अड़चनों पर सरकार को ध्यान देना ही चाहिए।  इस तर्क को उन्होंने स्वीकार किया और उनके कार्यकाल में समस्याओं को दूर करने के लिए कुछ प्रयत्न भी किए गए।

बहरहाल, गुजराल साहब से मेरी दूसरी मुलाकात तब हुई जब वे सोवियत संघ से भारत वापस आ चुके थे और राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका एक तरह से स्थगित थी। मैं उनसे संभवत: संसद के सेंट्रल हॉल में मिला होऊंगा।  मैंने जब अपना परिचय दिया तो उन्होंने कहा कि आपको मैं पहचानता हूं। यह बात उनकी विनम्रता की द्योतक थी या उन्होंने मुझे सचमुच याद रखा था, यह मैं नहीं समझ पाया। यद्यपि अपने अनुभव से मैं जानता हूं कि राजनीति या अन्य कोई क्षेत्र सफल व्यक्तियों की याददाश्त बहुत तेज होती है और वे हजारों लोगों के नाम याद रख सकते हैं। जो भी हो, गुजराल साहब मुझसे बहुत स्नेहपूर्वक मिले और काफी देर तक राजनीतिक मसलों पर मेरे पास चर्चा करते रहे। मैंने उनसे इस तरह संसद में मिलना जारी रखा और ऐसे अवसर भी आए जब उन्होंने मुझे महारानी बाग स्थित अपने निवास पर आमंत्रित किया।  उनके परिवार में वैवाहिक प्रसंगों पर निमंत्रण पत्र भी मुझे बदस्तूर भेजे जाते रहे।

गुजराल साहब के साथ इस परिचय का एक लाभ मैंने 1987-88 में उठाया। कटक के गोविन्दचन्द्र सेनापति (रिटायर्ड डीजी पुलिस) रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3260 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे। इसके अंतर्गत उड़ीसा और पूर्वी मध्यप्रदेश (छत्तीसगढ़ सहित) का समावेश था। हम लोग दिल्ली में रोटरी इंटरनेशनल के एक कार्यक्रम में साथ-साथ थे, जिसमें डॉ. कर्णसिंह व्याख्यान देने आए थे।  सेनापतिजी ने डॉ. कर्णसिंह के वक्तव्य से प्रभावित हो अपनी डिस्ट्रिक्ट कांफ्रेंस में मुख्य अतिथि के नाते आमंत्रित करने का विचार किया, लेकिन डॉ. कर्णसिंह निर्धारित तिथियों पर उपलब्ध नहीं थे। फिर मैंने गुजराल साहब से सम्पर्क स्थापित किया और मेरे अनुरोध की रक्षा करते हुए वे हमारे कार्यक्रम में कटक आने को राजी हो गए। जनवरी 1988 में श्री एवं श्रीमती गुजराल दोनों कटक आए व गुजराल साहब ने अपने विद्वतापूर्ण भाषण से सबको बेहद प्रभावित किया।

इसी तरह का एक मौका 1995 में दोबारा लगा। रोटरी की डिस्ट्रिक्ट कांफ्रेंस संबलपुर में होना था। डिस्ट्रिक्ट गवर्नर घनश्याम रथ वहीं के निवासी थे। उनके आग्रह पर मैंने एक बार पुन: गुजराल साहब से सम्पर्क किया और वे संबलपुर आने के लिए राजी हो गए।  कार्यक्रम इस तरह बना कि वे हवाई जहाज से रायपुर आएंगे तथा मैं उन्हें साथ लेकर कार से संबलपुर जाऊंगा। दुर्भाग्य से 31 दिसम्बर 1994 को बाबूजी का निधन हो गया। जबलपुर में कांफ्रेंस पांच-छह दिन बाद ही होना था, जिसमें अब मेरे शामिल होने का सवाल ही नहीं था। मेरे एक रोटरी बंधु पी.एस. बहल ने रायपुर में गुजराल साहब की अगवानी की और उनके साथ संबलपुर गए। दिल्ली वापस जाने के पहले गुजराल साहब रायपुर हमारे घर आए और इस पारिवारिक दुख की घड़ी में हम लोगों को ढाढस बंधाया।

इसके पूर्व गुजराल साहब कांग्रेस छोड़कर जनमोर्चा में शामिल हो चुके थे। 1989 में वी.पी. सिंह के मंत्रिमण्डल में वे विदेशमंत्री बने। जुलाई 1990 में वी.पी. सिंह सोवियत संघ की यात्रा पर गए।  प्रधानमंत्री के यात्रीदल में एक पत्रकार के रूप में मैं भी शामिल था। इस चार-पांच दिन की यात्रा के दौरान प्रतिदिन गुजराल साहब के साथ बातचीत करने का कोई न कोई मौका निकल ही आता था। यह कहने की जरूरत नहीं कि विश्व राजनीति और खासकर सोवियत संघ के बारे में उनकी जानकारी अथाह थी। प्रधानमंत्री की इस सोवियत यात्रा के क्या आयाम व क्या महत्व हैं, यह समझने में मुझे स्वाभाविक ही गुजराल साहब के साथ चर्चाओं में मदद मिली। उनके विदेश मंत्री रहते हुए कभी साउथ ब्लाक के दफ्तर में, तो कभी संसद के केन्द्रीय कक्ष में मुलाकातों का यह सिलसिला जारी रहा। 

गुजराल साहब जब सोवियत संघ में राजदूत के पद से निवृत्त होकर भारत लौटे और उसके बाद जब मेरी पहली भेंट हुई, तभी शायद मैंने उनसे देशबन्धु के लिए लिखने का आग्रह किया।  उनके लेख अंग्रेजी अखबारों में तो छपते ही थे। उसकी कॉपी साथ-साथ देशबन्धु को भी मिलने लगी और उनका हिन्दी अनुवाद कर देशबन्धु में प्रकाशन प्रारंभ हो गया। यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा। उनकी सहधर्मिणी श्रीमती शीला गुजराल की कविताएं व लेख भी देशबन्धु व अक्षर पर्व में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे।  1997 में गुजराल साहब प्रधानमंत्री बने। मैं अगले दिन ही दिल्ली पहुंचा।  वे तब महारानी बाग के निजी निवास पर ही थे। मैंने बधाई दी तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया और अंग्रेजी में कहा कि - ''ललित जी, आई वैल्यू योर फे्रण्डशिप।'' यह दिल को छू लेने वाली बात उनके स्वभावगत सौजन्य का ही परिचायक थी।

हमने जब देशबन्धु लाइब्रेरी को सार्वजनिक पुस्तकालय में परिवर्तित किया तब मैंने गुजराल साहब से इस लाइब्रेरी के लिए अपनी निजी लाइब्रेरी से पुस्तकें देने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया।  आज देशबन्धु लाइब्रेरी में विशेष रूप से स्थापित आई.के. गुजराल खण्ड है, जिसमें उनके द्वारा भेंट की गई लगभग एक हजार पुस्तकें हैं।  वे हमेशा नई से नई और बढ़िया पुस्तकें निकालकर अलग रखते।  कभी हमारे दिल्ली कार्यालय के मार्फत भिजवा देते या मैं जाता तो मेरी गाड़ी में रखवा देते।

बहुत सी यादें हैं। लिखने के लिए बहुत कुछ है। उनके कृतित्व, व्यक्तित्व, राजनीतिक योगदान सब पर बहुत कुछ लिखा गया है, बहुत कुछ लिखा जाएगा। वे जब प्रधानमंत्री बने थे तब सुप्रसिध्द इतिहासवेत्ता अर्नाल्ड टॉयनबी को उद्धृत करते हुए मैंने लिखा था कि - ''राजनीति को अपनी प्रामाणिकता सिध्द करने के लिए ऐसे व्यक्तियों की जरूरत होती है।'' मैं इस कथन को ही दोहराना चाहता हूं।  गुजराल साहब जिन गुणों के धनी थे उनका प्रत्यक्ष अभाव आज की राजनीति में दिखाई देता है।  ऐसे में गुजराल साहब की याद बार-बार आती रहेगी।

देशबंधु में 6 दिसम्बर 2012 को प्रकाशित 








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Lalit Surjan
Chief Editor
DESHBANDHU
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