Wednesday, 14 June 2017

शिक्षा और परीक्षा



एक कोई वक्त था जब 31 मार्च तक सारी परीक्षाएं निपट जाती थीं। शालाओं के परीक्षाफल 30 अप्रैल तक और विश्वविद्यालय के मई के दूसरे सप्ताह तक घोषित हो जाते थे। विद्यार्थियों को मई-जून दो माह का पूरा अवकाश मिलता था, जिसका सदुपयोग करने के लिए बहुत सी योजनाएं होती थीं। बहुत से बच्चे अपने गांव या मामा गांव जाते थे, एक नया माहौल जिसमें सीखने के लिए काफी कुछ होता था, जिनको सुविधा होती थी वे देशाटन पर जा सकते थे और कुछ नहीं हुआ तो गर्मी की दोपहरें घर के भीतर परिवार के सदस्यों तथा मित्रों के साथ भांति-भांति के खेल खेलने में बीत जाती थीं।जिन्हें पढऩे का शौक होता था वे लाइब्रेरी से किताबें लेकर आ जाते थे। यही समय खासकर उत्तर-भारत में शादियों का सीजन होता था तो उसका आनंद भी घराती या बराती बनकर बच्चे उठाते थे। कुल मिलाकर छुट्टियों के दिन, छुट्टियों की तरह बीतते थे जिसका बेहद मनोरंजक चित्र अजीत कुमार ने अपने लघु उपन्यास 'छुट्टियां’ में किया है।
उस बीते हुए समय की तुलना में आज का दृश्य देखता हूं तो कोफ्त होने के साथ-साथ गुस्सा भी आने लगता है। एक तरफ लगता है कि हमने अपनी शिक्षा व्यवस्था का मजाक बनाकर रख दिया है, तो दूसरी तरफ यह देखकर मन को पीड़ा होती है कि हमने कैसे अपने युवजनों को मशीन में तब्दील कर दिया है। एक तो वैसे ही साल भर परीक्षाएं होते रहती हैं, कभी वीकली टेस्ट, कभी मंथली टेस्ट, कभी प्रोजेक्ट वर्क, कभी कुछ और।बच्चों को अपने लिए मानो समय ही नहीं मिलता। फिर मां-बाप के सपने कि उनकी संतान सर्वगुण सम्पन्न हो, जो पढ़ाई में अव्वल, खेलकूद में सबसे आगे और नृत्य, संगीत, चित्रकला सबमें प्रवीण हो। स्कूल में होमवर्क दे दिया जाता है, उसका बोझ तो रहता ही है, ऐसे में हॉबी क्लास के लिए समय कब निकले, तो अक्सर शनिवार, रविवार का अवकाश उसकी भेंट चढ़ जाता है। अब पहले वाली बात तो है नहीं कि एक तिमाही, एक छमाही और एक वार्षिक परीक्षा में काम चल जाए। तब हॉबी पूरी करने के लिए भी समय मिल जाता था और खेलकूद तो स्कूल शिक्षा का अंग ही था।
जब हम पढ़ रहे थे, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, आईआईटी, आईआईएम तब भी थे। सिविल सर्विसेस की परीक्षाएं भी होती थीं, जिनकी अभिलाषा उस ओर होती थी, वे उसकी तैयारी करते थे। लेकिन अभी जैसी आपाधापी मची है इसकी कल्पना हमने नहीं की थी। शायद जमाना आगे निकल गया है और मुझ जैसे लोग पीछे रह गए हैं।ऐसा नहीं कि आज से साठ साल पहले सब कुछ अच्छा ही अच्छा था। परीक्षाओं में नकल होती थी, नकलची छात्र झगड़ा करने पर उतारू भी होते थे, कितने सारे साथी परीक्षा के दिनों में हनुमानजी के मंदिर पर मत्था टेकने जाते थे, फेल होने पर छात्रों द्वारा आत्महत्या करने के दु:खद प्रसंग भी सामने आते थे, कई बार गुंडानुमा छात्र भी छात्रसंघ का अध्यक्ष बन जाते थे। इस सबके बावजूद सामाजिक ताना-बाना काफी मजबूत था और नौजवानों में अपने भविष्य को लेकर इतनी अधिक दुश्चिंता और हताशा नहीं थी। एक विश्वास था कि सब कुछ समाप्त नहीं हो गया है। उस समय न तो बुजुर्ग पीढ़ी आत्मकेन्द्रित थी और न नई पीढ़ी। समाज में सामूहिकता की एक छाया थी, जिसमें ठहरने का वक्त मिल जाता था।
मैं अभी देख रहा हूं कि एक तरफ वार्षिक परीक्षाओं के नतीजे आ रहे हैं और दूसरी ओर विद्यार्थी हर दूसरे दिन एक नई परीक्षा देने की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं। यह सुनने में ही विचित्र लगता है कि परीक्षा में आजकल सौ प्रतिशत तक अंक मिल रहे हैं। देश की राजधानी के कॉलेजों में कटऑफ होता है जिसके तहत तिरानबे-चौरानबे प्रतिशत से कम अंक पाने वाले विद्यार्थियों को दाखिला ही नहीं मिल पाता। यह परीक्षापद्धति अपनी समझ में नहीं आती। बताते हैं कि आजकल ऑब्जेक्टिव मैथड से परीक्षा ली जाती है। होती होगी।इस तरह के प्रयोगों के चलते परीक्षा में बैठने वाले बच्चों का खाना-पीना तक मुहाल हो जाता है। साल भर तैयारी करते रहो, चार विकल्प में से एक उत्तर सही है उसे याद करो, और अपना पूरा दिमाग उसी में लगा दो। मैं नहीं जानता कि इसमें विद्यार्थियों के स्वतंत्र मानसिक विकास का कितना अवसर होता है। वे इस कठिन परीक्षा पद्धति की तैयारियों के बीच देशकाल के बारे में कितना ज्ञान हासिल कर पाते हैं। उनके कोमल हृदय का रस कहीं ये परीक्षा पद्धति सोख तो नहीं लेती है?
एक बात समझ आती है कि देश में बहुत सी अन्य बातों के साथ शिक्षा जगत में भी जो परिवर्तन नज़र आते हैं उसका बहुत कुछ श्रेय नवपूंजीवादी विश्वव्यवस्था को है। कभी-कभी महसूस होता है कि सारी दुनिया जैसे किसी दौड़ में भाग ले रही है, एक के पीछे एक लोग भागे जा रहे हैं, क्यों, कहां, किसलिए यह शायद किसी को पता नहीं। आजकल तो हर किसी मौके पर दौड़ों का आयोजन होने लगा है- रन फॉर दिस, रन फॉर दैट, शायद इसी सोच का प्रतिबिंब है।इधर हाल में बहुत सी कॉमेडी फिल्में आई हैं जैसे वेलकम आदि। उनमें भी सब लोग इसी तरह यहां से वहां दौड़ लगाते नज़र आते हैं, लेकिन अंत में हासिल कुछ नहीं होता। ये फिल्में भी एक तरह से इस नई सोच को ही दर्शाती हैं। अब चूंकि भारत भी विश्व ग्राम का अंग बन चुका है, जिसका पहला प्रमाण हमारे सामने पुराने गुडग़ांव और नए गुरुग्राम के रूप में सामने है, तो स्वाभाविक ही हम दौड़ में किसी से पीछे नहीं रहना चाहते। इसका परिणाम है कि शिक्षा का निजीकरण प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में हो रहा है। बहुत सारे निजी विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, तकनीकी संस्थान इत्यादि प्रत्यक्ष उदाहरण हैं किंतु परोक्ष निजीकरण का मामला एकदम से समझ नहीं आता।
शिक्षा के क्षेत्र में एकाएक कितनी तो परामर्शदात्री एजेंसियां काम करने लगी हैं। वे बताती हैं कि देश की शिक्षा व्यवस्था को विश्व स्तर पर लाने के लिए आपको क्या करना चाहिए। उनके ब्रीफकेस में आपके लिए अनगिनत प्रोजेक्ट रिपोर्टें हैं। मसलन, बिना अध्यापकों के शिक्षा संस्थान को कैसे चलाएं, इंटरनेट की सहायता लेकर ऑनलाइन पढ़ाई कैसे की जाए, वर्चुअल क्लासरूम क्या है, ई-क्लासें कैसे चलती हैं, संस्था की ग्रेडिंग क्यों और कैसे हो, पाठ्यक्रम में क्या तब्दीली लाई जाए, नैक, नैट, स्लेट, जीईई मेन, जीईई एडवांस जैसे फार्मूले एक के बाद एक भानुमति के पिटारे से निकलते रहते हैं।मंत्रालय में बैठे अफसर इन सुझावों से बहुत खुश होते हैं और वे मंत्री के दस्तखत लेकर आदेश जारी कर देते हैं जिन्हें मानना वाइस चॉन्सलर से लेकर प्रायमरी स्कूल के शिक्षाकर्मी तक का पुनीत कर्तव्य बन जाता है।
मुझे लगभग साठ साल पहले लिखी गई किताब का ध्यान आता है। ' अग्ली अमेरिकन’ शीर्षक इस पुस्तक में व्यंग्य में बताया गया था कि कैसे अमेरिकी विशेषज्ञ किसी विकासशील देश में आकर वहां के लोगों को मुर्गीपालन कैसे किया जाता है सिखाते हैं। उस समय वैश्वीकरण का यह दौर प्रारंभ नहीं हुआ था, लेकिन यह पुस्तक उसका एक प्रारंभिक संकेत देती है। आज वही सब हो रहा है। भारत के स्कूल कैसे चलें, कॉलेजों में पढ़ाई कैसे हो, तकनीकी संस्थानों की क्या भूमिका हो, यह सब नवपूंजीवाद के पंडे-पुरोहित हमें सिखा रहे हैं।भारत में मार्च तक परीक्षाएं क्यों खत्म हो जाती थीं, उसके पीछे क्या कारण था, इसे बिना समझे हमने शिक्षा सत्र की समय सारिणी बदल दी, परीक्षा लेने के जो सीधे-सरल तरीके थे, उनको अनावश्यक रूप से दीर्घ सूत्रीय और जटिल बना दिया, बच्चे बचपन में ही सारा ज्ञान हासिल कर लें, इसलिए उन पर भारी-भरकम बस्ते का बोझ लाद दिया और भी न जाने क्या-क्या...
इस सबमें सबसे अधिक नुकसान हुआ है शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता का और साथ-साथ शिक्षकों की प्रतिष्ठा का। विद्यार्थियों का नुकसान तो कई तरह से हो ही रहा है। मेरा पक्का मानना है कि अगर हमें अपनी नई पीढ़ी का सच्चे मन से अच्छा भविष्य बनाना है तो उसके लिए शिक्षा जगत में स्वायत्ता कायम होगी। कोई भी शिक्षण संस्थान अपने शिक्षकों के बल पर अपनी पहचान बनाता है।  यदि वे शिक्षक  समय राजनीतिक अथवा प्रशासनिक दबाव में रहेंगे तो कभी भी अपना काम ठीक से नहीं कर पाएंगे। विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न आयामों में दी जाने वाली शिक्षा की पद्धति व मूल्यांकन का तरीका क्या हो, ऐसे सारे निर्णय शिक्षा संस्थानों के प्रमुख ही आपस में मिलकर तय करें। उसमें लालफीताशाही का दखल न हो यह बहुत आवश्यक है। उन्हें यह स्वतंत्रता होगी तो वर्तमान में विद्यार्थियों के मन मस्तिष्क पर अनुचित दबाव डालने वाली परीक्षा पद्धति से उन्हें मुक्ति मिलेगी और वे निद्र्वन्द्व भाव से अपने भविष्य के बारे में फैसला कर सकेंगे।
देशबंधु में 15 जुलाई 2017 को प्रकाशित