Wednesday, 5 July 2017

जीएसटी : संघीय ढाँचे पर प्रहार?


 यह पहेली आम जनता तो क्या, अच्छे-अच्छे पंडित भी नहीं सुलझा पा रहे हैं कि केन्द्र सरकार ने जीएसटी लागू करने में हठीलेपन और किसी हद तक जल्दबाजी का सहारा क्यों लिया। सर्वविदित है कि जीएसटी की अवधारणा अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में सामने आ चुकी थी। मनमोहन सिंह सरकार में इसे अमलीजामा पहनाने की कोशिशें शुरु हुईं। चूंकि इस केन्द्रीय कानून को बनाने के लिए राज्य सरकारों की सहमति आवश्यक थी इसलिए स्वाभाविक तौर पर प्रक्रिया धीरे चली। अधिकतर राज्य जीएसटी तंत्र लाने के लिए सहमत हो गए थे, लेकिन दो राज्यों ने इसका पुरजोर विरोध किया था, जिनमें एक था गुजरात और दूसरा मध्यप्रदेश। इन दोनों प्रदेशों के तत्कालीन मुख्यमंत्री उस वक्त तक प्रधानमंत्री बनने के लिए अपना अभियान भी शुरू कर चुके थे। दोनों शायद चाहते थे कि जब प्रधानमंत्री बनें तभी यह कानून लागू हो और उसका श्रेय लेकर वे इतिहास में अपना नाम अमर कर सकें! नरेन्द्र मोदी के तब के और अब के वक्तव्यों में जो उत्तर और दक्षिण ध्रुव का फासला दिखाई देता है उसका कारण शायद इस मनोभाव में ढूंढा जा सकता है!
बहरहाल कानून तो लागू हो गया है। मेरी अल्पबुद्धि कहती है कि मोदीजी ने दो कारणों से अपने पुराने रुख को छोड़ कर जीएसटी कानून बनाने की पहल की। एक तो शायद उनकी यह मंशा है कि देश का संघीय ढांचा खत्म होकर उसकी जगह पर एक केन्द्रवर्ती और केन्द्र-निर्भर शासन व्यवस्था पर देश चलने लगे। दूसरा कारण संभवत: यह है कि मोदीजी विश्वग्राम के चातुर्देशिक अर्थतंत्र के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था की सगाई मुकम्मल करना चाहते हैं। उचित होगा कि हम पहले बिन्दु को यहां स्पष्ट कर लें। पाठकों को यह स्मरण कराने की आवश्यकता नहीं है कि श्री मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के साथ सहकारी संघवाद का नारा उछाल दिया था। यह सहकारी संघवाद क्या है, यह समझना बहुत कठिन है, कुछ उसी तरह जैसे एकात्म मानवतावाद को भी आम जनता नहीं समझ पाती। बस एक लुभावनी संज्ञा है जिसके फेर में लोग पड़ जाते हैं। यह विचार भारतीय जनता पार्टी और उसकी पितृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों के अनुकूल है कि देश में एक केन्द्रीय सत्ता स्थापित हो।
भारत का संविधान अपने देश की कल्पना एक संघीय गणराज्य के रूप में करता है। ऐसा देश जिसमें एक केन्द्रीय सरकार तो हो, लेकिन जिसमें राज्यों को पर्याप्त अधिकार दिए गए हों। संविधान ने राजकाज के विषयों की तीन सूचियां स्पष्ट निर्देशित की हैं- केन्द्रीय सूची, राज्यों की सूची और तीसरी समवर्ती सूची जिसमें केन्द्र और राज्य को मिलजुल कर या परस्पर सहमति से निर्णय लेना है। नरेन्द्र मोदी भारत के संविधान को अपने तईं सबसे पवित्र पुस्तक घोषित कर चुके हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि संविधान में जो लिखा है उस पर उनका अटूट भरोसा है। तब फिर संविधान में लिखी बात को एक किनारे कर अर्थात संघीय गणराज्य की अवधारणा को नकार कर सहकारी संघवाद कहने से क्या प्रयोजन सिद्ध होता है? इसे सुनकर तो यही अनुमान होता है कि वे देश का एक नया राजनीतिक ढांचा तैयार करने के उपक्रम में जुटे हैं जिसमें जीएसटी कानून मददगार हो सकता है; ठीक वैसे ही जैसे विमुद्रीकरण से नेहरूवादी आमराय को खत्म करने का प्रयास किया गया (देखें विक्रम सिंघल का तारीख 12 जून का इसी पृष्ठ पर लेख)।
यहां एक पुराने दृष्टांत की चर्चा करने से बात और स्पष्ट होगी। श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में शहरी चुंगीकर समाप्त करने का प्रस्ताव कांग्रेस सरकार ने दिया था। इसमें फैसले लेने का जिम्मा राज्य सरकारों पर छोड़ा गया था। मध्यप्रदेश पहला राज्य था जहां मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल ने 1976 में चुंगी कर या ऑक्ट्रॉय खत्म कर दिया था। इससे जनता को थोड़ी राहत तो मिली कि वे नगरपालिका के चुंगी कर्मियों द्वारा की जा रही अवैध वसूली से निजात पा गए, किन्तु दीर्घकालीन परिणाम अच्छा नहीं रहा। प्रदेश सरकार ने तय किया था कि नगरीय निकायों को चुंगी क्षतिपूर्ति राशि दी जाएगी। यह व्यवस्था चालीस साल से चल रही है। दुष्परिणाम यह हुआ है कि नगरीय निकाय अपनी आर्थिक सेहत के लिए राज्य सरकार के मोहताज हो गए। रायपुर की एक कांग्रेसी महापौर किरणमयी नायक को सरसंघचालक पर पुष्पवर्षा करने के लिए विवश होना पड़ा था। आज वर्तमान महापौर प्रमोद दुबे भी सरकारी दबाव के आगे नतमस्तक नज़र आते हैं।

आज स्थिति ये है कि रायपुर सहित सभी नगर निगमों के स्कूल सरकार के अधीन कर दिए गए हैं। रायपुर का बूढ़ा तालाब मुंबई की किसी निजी कंपनी को सौंप दिया गया है। स्मार्ट सिटी के नाम पर अरबों रुपए का कर्ज लिया जा रहा है जिसमें नगर के मात्र दो-ढाई वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का कथित विकास होगा और शहरवासियों की अगली पीढिय़ां कर्ज चुकाएंगी। रायपुर में ईएसी कालोनी के मकान ध्वस्त कर वहां बगीचा बन रहा है और रामसागरपारा के खाली पड़े मैदान में शॉपिंग काम्पलेक्स के टेंडर निकल रहे हैं। जो रायपुर का, वही हाल अन्य नगरों का भी। इतने विस्तार से यह बात इसलिए कहना पड़ी कि आने वाले वर्षों में राज्य अपनी आर्थिक स्थिति संभालने के लिए पूरी तरह केन्द्र पर निर्भर हो जाएंगे। जीएसटी प्रावधान के तहत राज्यों को पांच साल तक वाणिज्य कर इत्यादि की क्षतिपूर्ति मिलेगी, लेकिन उसके बाद क्या होगा? जब केन्द्र सरकार ही सारी टैक्स वसूली करेगी तो राज्य अपने लिए संसाधन कहां से जुटाएंगे? इसमें तो यह भी होगा कि भाजपा के मुख्यमंत्री भी केन्द्रीय सत्ता के सामने चूं-चपड़ नहीं कर पाएंगे। मैं नहीं जानता कि कितनी राज्य सरकारों ने इस बिन्दु पर गंभीरता से विचार किया है।
केन्द्र सरकार के जीएसटी के प्रति उत्साह का दूसरा बिन्दु ध्यानयोग्य है। यह तो सरकार स्वयं कह रही है कि दुनिया के एकसौ साठ से अधिक देशों में जीएसटी लागू है। इसलिए हमें भी यह रास्ता अपनाना था। एक तरह से बात ठीक है। यह नवसाम्राज्यवाद का दौर है और नवपूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत सारा व्यापार संचालित हो रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां, बल्कि राष्ट्रों की सीमा का अतिक्रमण कर व्यवसाय करने वाली कंपनियां (सुप्रा नेशनल कार्पोरेशन अथवा सीएनसी और ट्रांस नेशनल कार्पोरेशन अथवा टीएनसी) व्यापार में सुगमता के मानदंड पर किसी देश में व्यापार करती हैं। वे देखती हैं कि किस देश में उन्हें कितनी ज्यादा सहूलियतें हैं। भारत का बाज़ार बहुत बड़ा है, यहां विनिर्माण क्षेत्र कमजोर है, इन दो वजहों से ये कार्पोरेट भारत में व्यापार तो करना चाहती हैं, लेकिन सुगमता का वातावरण (ईज़ ऑफ बिजनेस) न होने से बिदक जाते हैं।
पाठकों को याद होगा कि कुछ वर्ष पूर्व मोबाइल सेवाप्रदाता वोडाफोन को आयकर संबंधी किसी बड़ी पेचीदगी में फंसना पड़ा था। यह अभी कुछ दिन पहले की खबर है कि जनरल मोटर्स ने भारत में अपना काम समेटा तो नहीं है पर सीमित कर लिया है। हमने जो अमेरिका इत्यादि के साथ आणविक करार किए हैं उनमें भी मुआवजे को लेकर देश में काफी हो-हल्ला हो चुका है। ऐसे सारे प्रकरण भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में बाधक बनते हैं जबकि विदेशी निवेशकों का अधिकतर पैसा यहां संस्थागत निवेश के नाम पर सट्टेबाजी के लिए आता है। व्यापार में सुगमता के मुद्दे पर एक दूसरी बाधा भ्रष्टाचार के रूप में विद्यमान है। ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल नामक संस्था भ्रष्टाचार का रिपोर्ट कार्ड बनाती है उसमें भी भारत की स्थिति अच्छी नहीं है। यह संस्था भी जहां तक मेरा अनुमान है वैश्विक पूंजी घरानों के द्वारा ही संचालित हैं। इस स्थिति में भारत में विदेशी पूंजी आए तो कैसे आए? जीएसटी बिल व्यापार सुगमता में सहायक हो सकता है, इससे कार्पोरेट घराने भी खुश होंगे और वे ताकतें भी जो देश को मिश्रित अर्थव्यवस्था से मुक्त कर पूरी तरह से पूंजीवादी व्यवस्था लाना चाहेंगी।
यह तो भविष्य ही बताएगा कि मेरा सोचना किस हद तक सही है, लेकिन जीएसटी बिल पारित होने के तमाम घटनाचक्र में मुझे कुछ बातें अटपटी और अस्वीकार्य लगीं। प्रथमत: जीएसटी को मनी बिल के रूप में लाया जाना संसदीय परिपाटी के विपरीत था। ऐसा करके सरकार ने राज्यसभा के बहुमत का तिरस्कार किया। दूसरे 30 जून की अर्धरात्रि को संसद के सेंट्रल हॉल में एक विशेष आयोजन करना और उसके लिए संसद भवन को रोशनी में नहलाने का कोई औचित्य नहीं था। जीएसटी यदि स्वागत योग्य है तो भी वह आर्थिक सुधार के एक बड़े कदम से बढ़कर कुछ नहीं है। उसे देश की आर्थिक आज़ादी की संज्ञा देना अतिशयोक्ति का भी अपमान है। यह सरकार नेहरू और गांधी को तो झूठा ठहराने पर तुली हुई है, क्या वह 1947 को मिली आज़ादी को भी झूठा साबित करना चाहती है?
देशबंधु में 06 जुलाई 2017 को प्रकाशित