Wednesday, 11 July 2012

राष्ट्रपति चुनाव: वामपंथ की उलझन

आसन्न राष्ट्रपति चुनाव को लेकर यूपीए और एनडीए के बीच जो मतभेद हैं वे तो जनता के सामने आ ही गए हैं, वाममोर्चा भी इस मुद्दे पर एक राय कायम करने में असफल रहा है। इस बारे में मोर्चे के दो प्रमुख दलों याने माकपा और भाकपा के अपने-अपने तर्क हैं और अपनी-अपनी दृष्टि हैं। माकपा के राष्ट्रीय महासचिव प्रकाश करात ने पिछले दिनों एक लेख प्रकाशित किया है (देखिए देशबन्धु 4 जुलाई, राष्ट्रपति चुनाव और वामपंथ) जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने के पीछे कारण गिनाए हैं। माकपा यह मानती है कि प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने या न बनने से यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियों में कोई बदलाव आने वाला नहीं है, लेकिन पार्टी मुख्य तौर पर धर्मनिरपेक्ष नीतियों के आधार पर एनडीए के बजाय यूपीए उम्मीदवार को समर्थन देना बेहतर समझ रही है।

श्री करात ने अपने लेख में इस बात को खुलकर ही स्वीकार किया है कि पश्चिम बंगाल में अपने घटते हुए जनाधार को थामने के लिए और वहां मतदाताओं के बीच वापिस अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए स्थानीय भावनाओं का आदर करते हुए श्री मुखर्जी का समर्थन करना माकपा के लिए एक तरह से आवश्यक हो गया है। माकपा महासचिव के इन तर्कों में दम है, लेकिन एक तो वे इस बात का खुलासा नहीं करते कि पश्चिम बंगाल में ही पार्टी का युवा वर्ग इस निर्णय से सहमत नहीं है। माकपा के एक ओजस्वी प्रवक्ता प्रसेनजीत बसु ने खुलकर विद्रोह करते हुए इसी बिना पर पार्टी से इस्तीफा दे दिया है; वहीं पार्टी की छात्र इकाई स्टूण्डेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के एक वर्ग ने मुखर्जी को समर्थन दिए जाने के खिलाफ कोलकाता में प्रदर्शन किए हैं। अभी यह बात भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है कि माकपा के जनाधार वाले दूसरे राज्य याने केरल में इस पर क्या रुख है। खैर इतना तो तय है कि माकपा के शत-प्रतिशत वोट  श्री मुखर्जी को मिलेंगे। यहां इस विडंबना की ओर ध्यान जाए बिना नहीं रहता कि यह वही पार्टी है जिसने सोलह साल पहले अपने सबसे कद्दावर नेता ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था। उस समय प. बंगाल में निरंतर दो तिहाई बहुमत पा रही पार्टी के प्रकाश करात जैसे नेताओं ने यह सोचने की तकलीफ नहीं उठाई थी कि प्रदेश में पार्टी का जनाधार बनाने में ज्योति बाबू की कितनी अहम् भूमिका थी। अब दूसरे के घोड़े पर दांव लगाकर पार्टी खुशी का सामान जुटाने में लगी है। 

जहां तक भाकपा का सवाल है अब तक के संकेत यही हैं कि पार्टी किसी भी उम्मीदवार का समर्थन न कर मतदान का बहिष्कार करेगी। दो अन्य घटक दलों में फॉरवर्ड ब्लाक यदि माकपा के साथ है तो आरएसपी भाकपा का साथ दे रही है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मतदान से दूर रहने का निर्णय क्यों लिया, इस बारे में पार्टी की ओर से कोई अधिकृत  बयान जारी हुआ हो तो वह मैं नहीं देख सका हूं। लेकिन इस बारे में कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि कांग्रेस और भाकपा के बीच संबंध सामान्य तौर पर अच्छे ही रहे हैं। दरअसल कांग्रेस यदि नेहरू के रास्त पर चले तो उसमें और भाकपा में व्यवहारिक तौर पर काफी समानताएं देखी जा सकती हैं। 

2004 में भाकपा यूपीए सरकार में शामिल होने तक के लिए तैयार थी, लेकिन माकपा के विरोध के चलते उसने यह अवसर हाथ से जाने दिया। यह तर्क दिया गया कि ऐसा उसने वामपंथी एकजुटता के लिए किया। मेरे जैसे अध्येताओं की राय में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देने के बाद माकपा की यह दूसरी गलती थी। खैर जो हुआ सो हुआ। 2007 में जब राष्ट्रपति चुनाव हुआ तो ऐसा समझा जाता है कि प्रतिभा पाटिल का नाम तय करने में भाकपा  के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव ए.बी. बर्ध्दन की भी भूमिका थी। यूं उनकी पहली पसंद शायद अर्जुन सिंह या प्रणब मुखर्जी ही थे। वैसे भाकपा भले ही यूपीए सरकार का विरोध करती रही हो, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर श्री मुखर्जी के साथ पार्टी के संबंध लगातार ठीक रहे। फिर ऐसी क्या बात है कि भाकपा  श्री मुखर्जी का समर्थन नहीं कर रही है?

दरअसल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एक लंबे समय से आदिवासी क्षेत्रों में अपना प्रभाव स्थापित करने में लगी हुई है। स्मरणीय है कि भाकपा के युवा नेता मनीष कुंजाम इन दिनों अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के अध्यक्ष हैं। आंध्र, उड़ीसा, झारखंड नागालैण्ड, छत्तीसगढ़, विदर्भ इत्यादि आदिवासी बहुल इलाकों में सीपीआई चुनाव भले ही न जीत पाती हो, इन जगहों पर जनांदोलनों में वह अग्रणी भूमिका निभा रही है। छत्तीसगढ़ में तो उसे विकट स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ उसके कार्यकर्ता भाजपा सरकार और सुरक्षा बलों के  निशाने पर रहते हैं, तो दूसरी तरफ उसे नक्सलियों का विरोध झेलना पड़ता है। इस तस्वीर को यूं भी देखा जा सकता है कि आज अगर आदिवासियों के जीवन मूल्यों और व्यावहारिक हितों की पैरवी करने वाली कोई पार्टी है तो वह भाकपा ही है। इस स्थिति में पार्टी के लिए यह मुश्किल है कि वह राष्ट्रपति पद के आदिवासी उम्मीदवार पी.ए. संगमा का सीधे-सीधे विरोध करे। चूंकि श्री संगमा को एनडीए ने दत्तक ले लिया है इसलिए वह उनका समर्थन भी नहीं कर सकती। इस वास्तविकता के मद्देनजर मतदान से अलग रहना ही पार्टी को एक सुविधाजनक विकल्प समझ आया होगा। यह संभव है कि आने वाले दिनों में संगमा, आदिवासियों का मंच बनाकर अपने लिए किसी और भूमिका की तलाश करें तब भाकपा के साथ उनकी युति शायद किसी न किसी रूप में जम जाए!

आगे चलकर जो भी हो अभी तो श्री मुखर्जी और श्री संगमा दोनों जोर-शोर से अपने-अपने प्रचार में लगे हुए हैं। दोनों प्रत्याशी एक-एक प्रदेश में जाकर विधायकों से अपने लिए समर्थन मांग रहे हैं। यह एक नया ही नजारा देखने में आ रहा है। हमें लेकिन इस बात का अफसोस है कि श्री मुखर्जी के विरोध को अनावश्यक रूप से खींचा जा रहा है। 2007 में श्रीमती पाटिल के बारे में तरह-तरह की अंफवाहें उड़ाई गई थीं। इस बार ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं जिन्हें स्तरहीन ही कहा जा सकता है। मुझे सबसे ज्यादा हैरत तो स्टेट्समेन में वरिष्ठ पत्रकार सैम राजप्पा के लेख को पढ़कर हुई जिसमें उन्होंने कहा है कि सोनिया गांधी ईसाई को राष्ट्रपति बनाना चाहती हैं और उनके एक इशारे पर पाँसा पलट सकता है। मैं नहीं जानता कि इस तरह की चर्चाएं फैलाने से किसका भला हो रहा है!!


देशबंधु में 12 जुलाई 2012 को प्रकाशित