Thursday, 15 November 2012

जेम्स बॉन्ड की राजनीति





एजेंट 007 याने जेम्स बॉन्ड को रजतपट पर अवतरित हुए एक अर्धशती पूरी हो चुकी है। 1962 में जेम्स बॉन्ड की पहली फिल्म आई थी। यह विश्व सिनेमा की एक अतुलनीय घटना है। जब से सिनेमा का आविष्कार हुआ तब से अब तक फिल्में तो हजारों बनी हैं, सैकड़ों फिल्मों ने भांति-भांति के रिकार्ड तोड़े हैं और ऐसी फिल्मों की एक लंबी सूची है जिन्होंने दर्शकों व समीक्षकों दोनों को बेइंतहा प्रशंसा बटोरी है; किंतु जेम्स बॉन्ड की फिल्मों ने जो विशेष रिकार्ड बनाया है वह बरकरार है और उसके टूटने  की दूर-दूर तक कोई संभावना नजर नहीं आती। सोचकर देखिए कि एक फिल्म चरित्र को लेकर दो दर्जन फिल्में बनें, चलें, खूब चलें और पचास साल तक दर्शकों की तीन पीढिय़ों को लुभाने में लगातार कामयाब होती रहें- क्या यह एक अनूठा रिकार्ड नहीं है!

इन तमाम फिल्मों का प्रमुख किरदार याने हीरो तो एक ही है- जेम्स बॉन्ड। लेकिन उसे परदे पर पेश करने वाले अभिनेता समय-समय पर बदलते रहे हैं- शॉन कोनेरी से लेकर डेनियल क्रैग तक। वह जिस गुप्तचर संस्था के लिए काम करता है अर्थात् ब्रिटिश विदेशी खुफिया एजेंसी एमआई-6 वह भी फिल्मों में बदस्तूर कायम है। भले ही रहस्यमय खुफिया प्रमुख 'एम' का रोल करने वाले अभिनेता या अभिनेत्री बदलते रहे हों तथा इसी तरह गुप्तचरी के औजारों का निर्माण अथवा विकास करने वाले वैज्ञानिक 'क्यू' का अभिनेता भी। गौरतलब है कि 1962 से 2012 के दरम्यान इस पांच दशकों में एक देश के रूप में ब्रिटेन और उसकी संस्था एमआई-6 के वैश्विक राजनीति में प्रभाव में कमी आने की वास्तविकता का भी कोई असर इन फिल्मों पर नहीं पड़ सका है। 

जैसा कि अधिकतर पाठक वाकिफ हैं, ब्रिटिश लेखक इयान फ्लेमिंग ने जेम्स बॉन्ड को नायक बनाकर कुछ रहस्य रोमांचपूर्ण उपन्यास लिखे थे जो अपने समय में खासे लोकप्रिय हुए। फ्लेमिंग स्वयं ब्रिटिश नौसेना के खुफिया विभाग में लंबे समय तक काम कर चुके थे। इस नाते वे गुप्तचरी की दुनिया में होने वाले घात-प्रतिघातों से अच्छी तरह वाकिफ थे और उनके उपन्यासों में यदि पाठक प्रामाणिकता का कोई अनुभव करते हैं तो उसका श्रेय लेखक के वास्तविक अनुभवों को दिया जा सकता है। मैंने इनमें से कोई भी उपन्यास नहीं पढ़ा बावजूद इसके कि जासूसी उपन्यास पढऩे में मेरी रुचि है, लेकिन जेम्स बॉन्ड की अधिकतर फिल्में मैंने देखी है सिनेमाघरों में कम, टीवी पर ज्यादा। उन फिल्मों में जो गतिशीलता और चपलता है वह दर्शक को बांधे रखती है और डेढ़-दो घंटे अच्छे से मन बहलाव हो जाता है। मैं जब जेम्स बॉन्ड की दो दर्जन फिल्मों को निर्माण के क्रम में रखकर देखता हूं तो उनमें विश्व के बदलते हुए राजनैतिक परिदृश्य के संदर्भ जैसे अपने-आप उभरकर सामने आने लगते हैं। 1962 में बनी पहली फिल्म का निर्माण उस समय हुआ था जब शीतयुद्ध अपनी चरमसीमा पर था। इसी साल अमेरिका ने क्यूबा पर 'बे ऑफ पिग्ज़' के आक्रमण की योजना बनाई थी और ऐसे किसी आक्रमण की आशंका को ध्यान में रख सोवियत संघ की नौसेना क्यूबा से लगभग बारह सौ किलोमीटर की दूरी पर तैयार खड़ी थी। ऐसा डर लग रहा था कि कहीं तीसरा विश्व युद्ध न छिड़ जाए, लेकिन कैनेडी और ख्रुश्चेव दोनों ने संयम व समझदारी का परिचय दिया और आसन्न संकट समाप्त हो गया।

मुझे फिल्मों के शीर्षक उनके निर्माण क्रम में याद नहीं है, लेकिन मोटे तौर पर कह सकता हूं कि शॉन कोनेरी अभिनीत सारी फिल्में शीतयुद्ध की भावभूमि पर ही बनी थी, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन और पश्चिमी खेमा एक तरफ है तथा दुश्मन के रूप में सोवियत संघ सामने है। कहने की जरूरत नहीं कि फिल्म परम्परा के अनुसार अंतत: नायक की ही विजय होती है। जेम्स बॉन्ड अकेला ही अप्रतिम साहस, त्वरित बुद्धि और देशभक्ति का परिचय देते हुए 'स्वतंत्र विश्व' पर आए खतरे को दूर करने में कामयाब होता है तथा ''लौह आवरण'' वाले साम्यवादी सोवियत संघ के मंसूबे नाकाम हो जाते हैं। समय बदला, शीत युद्ध समाप्त हुआ, बर्लिन की दीवार टूटी, सोवियत संघ का विघटन हुआ। ऐसे और भी परिवर्तन अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर हुए। आने वाले दिनों में हम देखते हैं कि चीन को शत्रु के रूप में पेश किया जाता है तो कभी उत्तर कोरिया को और कभी पश्चिम एशिया के किसी इस्लामी देश को। इन सारी फिल्मों में अमेरिका और इंग्लैण्ड को जनतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता का संरक्षण बनाकर पेश किया गया तथा रूस, चीन, क्यूबा, उत्तर कोरिया, आदि को ऐसे देशों के रूप में जहां किसी तरह की कोई स्वतंत्रता नहीं है और जिनकी सरकार में बैठे लोग युद्ध पिपासु हैं। फिर एक दौर ऐसा आया जब किसी एक देश को सीधे-सीधे निशाना बनाना छोड़ दिया गया।

जेम्स बॉन्ड की परवर्ती फिल्मों में हम पाते हैं कि अब दुश्मन कोई एक देश नहीं, बल्कि वहां के ध्वस्त सत्तातंत्र के कुछ ऐसे नुमाइंदे हैं, जो बदलती हुई दुनिया की वास्तविकताओं को स्वीकार करने से इंकार करते हैं। वे तथाकथित स्वतंत्र विश्व के प्रति अपनी नफरत को दबा नहीं पाते। वे एटमबम और मिसाइलें चोरी करते हैं तथा दुस्साहसपूर्ण तरीके से अपने हिसाब से दुनिया को बदल डालने के षडय़ंत्र रचते हैं। इसके बाद फिर कथा को एक नया मोड़ दिया जाता है। ऐसे खलनायक भी हमारे सामने आते हैं जो साम्यवादी नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों से आते हैं और हिटलर की तरह विश्व विजय का सपना देखते हैं। अंतिम फिल्म 'स्काई फॉल' का खलनायक जो जेम्स बॉन्ड का ही पुराना साथी है, जो खुफिया प्रमुख 'एम' से कभी प्रताडि़त होने के कारण बदला लेने पर उतारू हो जाता है।

यह विश्लेषण मैंने सूत्र रूप में ही किया है। मुझे लगता है कि जेम्स बॉन्ड की फिल्मों की निरंतर लोकप्रियता का रहस्य इन सूत्रों में खोजा जा सकता है। एक तो चूंकि नायक लगातार बदलते रहे हैं इसलिए दर्शकों को यह उत्कंठा बनी रहती है कि देखें, यह नया हीरो पुराने हीरो के मुकाबले कहां ठहरता है! फिर इसी को लेकर बहस होती है कि कोनेरी ज्यादा अच्छा हीरो था या रोज़र मूर या पियर्स ब्रेसनान। जब 'एम' के रोल में पुरुष के बजाय एक स्त्री याने जूडी डेंच आ गई तो उससे भी फिल्म की संरचना पर काफी असर पड़ा। 'एम' की सचिव मनी पैनी का चरित्र भी अभिनेत्री के साथ-साथ बदलता गया है। एक तरफ फिल्म की पटकथा राजनीतिक घटनाचक्र को ध्यान में रखकर बदलती रही है तो दूसरी तरफ जासूसी के उपकरण भी समय के साथ बदल गए हैं। शुरू का जेम्स बॉन्ड अपनी पिस्तौल और कम जटिल उपकरणों के साथ मिशन पर चल पड़ता है। वहीं बाद की फिल्मों में एक से एक अजूबे देखने मिलते हैं। एक फिल्म में तो ऐसी कार है जो किसी को दिखाई नहीं देती। स्वयं जेम्स बॉन्ड ऐसे हैरतअंगेज कारनामे करता है, जो सामान्यबुद्धि, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टि किसी पर भी ठीक नहीं उतरते, लेकिन इनसे फिल्म का रोमांच निश्चित रूप से बना रहता है।

1 नवम्बर को भारत सहित विश्व के तमाम देशों में 'स्काय फॉल' का उद्घाटन हआ। मीडिया में इस पर खूब चर्चाएं हुईं। लंबे-लंबे लेख लिखे गए। किंतु मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इयान फ्लेमिंग के उपन्यासों का जो राजनैतिक संदर्भ था, जिसे इन फिल्मों से व्यक्त किया गया, उस पर कोई चर्चा नहीं हुई। फ्लेमिंग के मूल उपन्यासों में संशोधन कर नई पटकथाएं भी लिखी गईं। उनके राजनीतिक निहितार्थों पर भी शायद गौर नहीं किया गया। ''स्काय फॉल'' में 'एम' अपने ही एक भूतपूर्व एजेंट के हाथों मारी जाती है तथा जेम्स बॉन्ड स्कॉटलैण्ड में अपनी पुश्तैनी घर ''स्काय फॉल'' में ही आखरी लड़ाई लड़ता है। इसे लेकर ही अनेक टिप्पणियां की गईं जिनका प्रमुख स्वर एक ही था कि जेम्स बॉन्ड अपने घर लौट रहा है या नहीं और कि इंग्लैण्ड अपने आपको नए सिरे से खोज रहा है। जाहिर है कि ये टिप्पणियां अधिकतर ब्रिटिश समीक्षकों ने ही की है।

भारत में फिल्मों के समाजशास्त्र को लेकर पर्याप्त चर्चा हुई है। जैसा कि हम जानते हैं आमिर खान की फिल्म 'लगान' को तो भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद (आईआईएएम) ने अपने किसी पाठ्यक्रम में भी शामिल किया। देश में ऐसे अनेक सुधी समालोचक हैं जिन्होंने भारतीय फिल्मों के आयामों पर अकादमिक अध्ययन किया है। मेरी राय में इसी कड़ी में जेम्स बॉन्ड की फिल्मों का भी एक नए दृष्टिकोण से विश्लेषण किया जाना अभीष्ट है। प्रसिद्ध समाजचिंतक नोम चॉम्स्की की एक प्रसिद्ध पुस्तक है- 'मैन्युफैक्चरिंग कंसेन्ट'। इसका हिन्दी अनुवाद 'आम राय का निर्माण' किया जा सकता है। चॉम्स्की अपनी पुस्तक में उन तमाम तौर-तरीकों की समीक्षा करते हैं जो पूंजीवादी दुनिया के बाकी हिस्सों में अपना दबदबा कायम करने के लिए प्रयुक्त किए हैं। उनकी पुस्तक में अखबारों, पुस्तकों व टीवी के कार्यक्रमों का प्रचुर उल्लेख है। इसी संदर्भ में जेम्स बॉन्ड जैसी फिल्मों को भी देखा जाना चाहिए।

अंग्रेजी में ऐसे अनेक उपन्यास लिखे गए हैं तथा मुख्यत: हॉलीवुड में ऐसी अनेक फिल्मों का निर्माण हुआ है जो येन-केन-प्रकारेण पूंजीवादी विचारधारा की न सिर्फ श्रेष्ठता स्थापित करती है बल्कि उसे विश्व के उद्धारक के रूप में भी प्रस्तुत करती हैं। ऐसी पुस्तकों व फिल्मों में गैर-पूंजीवादी देशों की खिल्ली उड़ाई जाती है, उन्हें कमजोर व कमअक्ल सिद्ध किया जाता है तथा हर तरह से उन्हें नीचा दिखाया जाता है। केन फॉलेट के उपन्यास हों या महाबली रैम्बो की फिल्में या फिर डॉमिनिक लॉपियर व लैरी कॉलिन्स का जासूसी उपन्यास द ''फिफ्थ हॉर्समेन'' ही क्यों न हो। ये दोनों वही लेखक हैं जिन्हें हम 'फ्रीडम एट मिडनाइट' व 'कैलकटा: द सिटी ऑफ जॉय' जैसी पुस्तकों के लेखक के नाते जानते हैं। ऐसे में मैं उम्मीद करना चाहूंगा कि फिल्मों का कोई गंभीर अध्येता या फिर अंग्रेजी साहित्य अथवा मास मीडिया का कोई शोधार्थी जेम्स बॉन्ड की फिल्मों का विधिवत अध्ययन कर हमें बताएगा कि इन फिल्मों ने हमारा सिर्फ मनोरंजन किया या ब्रेन वाशिंग भी की!!

देशबंधु में 15 नवम्बर 2012 को प्रकाशित