Wednesday, 23 April 2014

चुनावों में बदजुबानी


 
दुश्मनी लाख सही, खत्म न कीजे रिश्ते
दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए।
                                -निदा फ़ाज़ली


एक पुरानी कहावत है- बोया पेड़ बबूल का आम कहां से पाएं। यह कहावत हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों पर सटीक बैठती है। पिछले कुछ बरसों में हमने देखा है कि निर्वाचित सदनों का कीमती वक्त किस तरह से शोर-शराबे की भेंट चढ़ जाता है तथा लोकमहत्व के मुद्दों पर या तो चर्चा हो ही नहीं पाती और अगर होती है तो उसे आनन-फानन में निपटा लिया जाता है। इसकी वजह क्या यह नहीं है कि हमने ऐसे लोगों को चुनकर लोकसभा और विधानसभा में भेजा जिसके वे सुपात्र नहीं थे? आम चुनावों की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है तब यह आशंका भी बलवती हो रही है कि क्या सोलहवीं लोकसभा में मर्यादाहीनता के पुराने सारे रिकार्ड टूट जाएंगे? इन दिनों चुनाव अभियान के दौरान जिस तरह से उम्मीदवार एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं उसे देखकर तो यही लगता है। प्रश्न है कि राजनैतिक व्यवहार में ऐसी गिरावट क्यों आई है? इसके अनेक कारण हैं।

आज अगर विभिन्न दलों के उम्मीदवार शिष्टता की सारी सीमाएं तोड़ रहे हैं तो उसके लिए सबसे बड़े दोषी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी हैं। इस बारे में बहुत कयास लगाए गए हैं कि स्थापित परंपराओं को त्यागकर एक व्यक्ति को चुनाव पूर्व ही प्रधानमंत्री पद का दावेदार क्यों घोषित किया गया। जो भी हो, ऐसा होने से यह स्थिति बनी कि चुनाव व्यक्ति केंद्रित बना दिया गया। जब कांग्रेस ने प्रत्युतर में अपनी ओर से किसी की उम्मीदवारी घोषित नहीं की तो भाजपा के उकसावे पर मीडिया ने खुद होकर राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी का प्रतिस्पर्धी घोषित कर दिया। उधर अरविंद केजरीवाल भी उसी रास्ते का अनुसरण करते हुए मंच पर अवतरित हो गए। इस परिदृश्य में भाजपा और नरेंद्र मोदी दोनों के लिए यह आवश्यक हो गया कि जैसे भी हथकंडे अपनाना पड़ें, श्री मोदी को एक अजेय योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया जाए और वही हो रहा है।

नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं में बार-बार जिस शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं वह असंसदीय भले न हो, लेकिन यह तो स्पष्ट है कि उससे अनावश्यक कटुता उत्पन्न हो रही है। आज जब भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी को भुला दिया है तब उसे यह याद दिलाना उचित होगा कि दूसरी लोकसभा में नवनिर्वाचित सदस्य वाजपेयीजी ने जब अपना प्रथम वक्तव्य दिया तो प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उन्हें स्वयं होकर बधाई व उज्जवल भविष्य की शुभकामनाएं दी थीं। एक क्षण के लिए कल्पना करें कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए हैं तो क्या वे इसी तरह राहुल गांधी को उनके भाषण पर बधाई देने में विशाल हृदयता का परिचय दे सकेंगे? जिस तरह से श्री मोदी बार-बार राहुल गांधी और उनके परिवार पर कटाक्ष कर रहे हैं उसे देखकर ऐसी कोई उम्मीद रखना व्यर्थ है।

यदि भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार अपने विरोधियों पर विष बुझे तीर छोड़ रहे हैं तो कांग्रेस, सपा, बसपा, आप आदि के नुमाइंदे भी अपनी वाणी पर संयम नहीं रख पा रहे हैं। ऐसा लगता है मानो चुनकर संसद में जाने के पहले ही सारा हिसाब-किताब बराबर कर लेंगे। ऐसा नहीं कि प्रत्याशीगण ऐसा आचरण भावावेश में कर रहे हों बल्कि अनुमान होता है कि वे अच्छी तरह से जानबूझकर ही अशिष्ट और अनर्गल भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। इसमें उन्हें दो तरह से फायदा दिखाई देता है। एक तो उन्हें लगता है कि इससे मतदाताओं पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा और वे उनकी बहादुरी के कायल हो जाएंगे और दूसरे कि इससे मीडिया में उनका नाम बिना खास मेहनत किए सुर्खियों में आ जाएगा। तीसरे यह भी संभव है कि इसके लिए उन्हें दल के बड़े नेताओं से सराहना मिलती हो।

यह जो परिस्थिति उत्पन्न हुई है इसकी कुछ जिम्मेदारी चुनाव आयोग को भी स्वीकार करना चाहिए। वह इसलिए कि आम चुनाव की प्रक्रिया बहुत लंबी खिंच गई है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है किंतु व्यक्ति केन्द्रित हो जाने से उसका दुष्प्रभाव कुछ अधिक गहरा गया है। हम जानते हैं कि चुनाव आयोग के सामने तकनीकी सीमाएं हैं। जब मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही हो, मतदान का प्रतिशत भी बढ़ रहा हो, चुनाव में घपलेबाजी रोकना हो, नयी तकनीकी का प्रयोग करना हो, मतदाताओं को निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के प्रति आश्वस्त करना हो तो इतनी व्यवस्थाएं करने में समय तो लगना ही है, किंतु अब चुनाव आयोग को विचार करना होगा कि  कीचड़ उछालने के इस खेल को कैसे रोका जाए।  कई-कई चरणों में मतदान होने से पार्टियों का अपने विरोधियों पर आक्रमण करने का एक नया अवसर हर दो दिन में मिल जा रहा है, इस पर विराम कैसे लगाया जाए।

आज एक नेता एक जगह भाषण देता है, अगले हफ्ते दूसरी जगह जाकर वह उसी बात को दोहरा देता है इस तरह से मर्यादाहीनता लगातार आगे बढ़ती जाती है। चुनाव आयोग ने शिकायत मिलने पर अपनी तरफ से कार्रवाईयां जरूर कीं, लेकिन वे पर्याप्त सिद्ध नहीं हुईं। अमित शाह का उदाहरण लें। चुनाव आयोग ने उन पर लगी बंदिश क्या सोचकर हटा दी।  हमें लगता है कि ऐसे प्रकरणों में आयोग को और ज्यादा सख्ती दिखाना चाहिए। बयान पर विरोधी पक्ष से शिकायत आए उससे पहले आयोग को स्वयं होकर संज्ञान लेना चाहिए। आखिरकार उसके पर्यवेक्षकों का क्या काम है? और जब एक बार आयोग कोई कार्रवाई करे तो वह चुनावी नतीजे आने तक लागू रहे। अमित शाह, आजम खां, गिरिराज सिंह, इमरान मसूद या कोई और, ये सब आयोग की कठोर कार्रवाई से ही वश में आ सकते हैं।

देश के इलेक्ट्रानिक मीडिया को भी अपना उत्तरदायित्व समझने की बेहद आवश्यकता है। प्रिंट मीडिया याने अखबार में छपी बात तो एक सीमित दायरे में ही फैलती है, लेकिन टीवी पर वही बात दैत्याकार रूप ग्रहण कर लेती है। एक तो चैनलों की संख्या बहुत ज्यादा है। उन सब पर एक ही समय में खबर फूटती है, फिर बार-बार का प्रसारण होने से वह बात चर्चा में लगातार बनी रहती है। कोई अच्छी बात टीवी के माध्यम से दूर-दूर तक पहुंचे तब तो उसका स्वागत है, लेकिन जनता को अभद्र, अश्लील, अनर्गल, अशिष्ट चर्चाएं सुनने के लिए अभिशप्त क्यों किया जाए? इसमें यह बिन्दु भी है कि एक चुनाव क्षेत्र में कही गई बात बचे पांचसौ चालीस क्षेत्रों तक अनावश्यक रूप से पहुंच जाती है, जिनका उससे कोई लेना-देना नहीं होता। मुझे गुरुनानक की बोधकथा का ध्यान आता है कि एक लड़ाई-झगड़े वाले गांव के  सारे लोग उसी गांव में रहे आएं ताकि उनका बुरा आचरण वहीं तक सीमित रहे, जबकि समझदारों के गांव के सारे लोग बिखर जाएं ताकि वे दूर-दूर जाकर  समझदारी फैला सकें।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चर्चा करते हुए उसके एक अन्य रूप याने सोशल मीडिया की अनदेखी नहीं की जा सकती। टीवी में तो फिर भी गुंजाइश है कि उंगली दिखाकर कहा जा सके कि दोषी कौन है, किन्तु फेसबुक व ट्विटर पर सही-गलत खबरें फैलाने वालों की शिनाख्त करना कठिन क्या, असंभव ही है। इन माध्यमों से उम्मीदवारों के बयानों के अलावा दबे-छुपे तरीके से जो दुष्प्रचार किया जा सकता है, किया जा रहा है, उसकी रोकथाम आसान नहीं है। जनता को पिछले दो सालों में बताया गया है कि सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता हैं और वे ही इसका सबसे बेहतर इस्तेमाल करते हैं। अगर यह बात सही है तो फिर यह अनुमान भी तार्किक रूप से लगाया जा सकता है कि उनके समर्थक-प्रशंसक-कारिंदे ही दुष्प्रचार में भी सबसे आगे होंगे! हम समझते हैं कि चुनाव आयोग को इस पहलू पर भी गौर करना चाहिए कि चुनाव के समय सोशल मीडिया पर ऐसी कोई सामग्री न परोसी जा सके जिससे माहौल प्रदूषित होने का खतरा पैदा होता हो।

जब कभी नेता या प्रत्याशी आपत्तिजनक बातें कहते हैं, तब पार्टी प्रवक्ता यह कहकर बात को उड़ाने की कोशिश करते हैं कि चुनावों के समय ऐसा स्वाभाविक हो जाता है। जनता को यह तर्क स्वीकार नहीं करना चाहिए। जो लोग चुनाव लड़ते हैं, उन्हें देश के संविधान की रक्षा करने के योग्य माना जाता है। अगर वे ही लक्ष्मण रेखा लांघेंगे तो संविधान की महिमा कैसे कायम रख पाएंगे?

देशबन्धु में 24 अप्रैल 2014 को प्रकाशित