Thursday, 7 April 2016

भारतीय समाज : रुग्णता के लक्षण




हम सोचते थे कि मोदी सरकार ने आधार  कार्ड की आवश्यकता स्वीकार कर भारतवासियों को एक तरह से निश्चिंत कर दिया है कि तुम्हारे पास जब यह कार्ड है तो फिर और किसी अन्य तरह के पहचानपत्र की जरूरत नहीं है कि तुम भारतवासी हो या नहीं। लेकिन संघ और भाजपा के नेता जिस तरह के वक्तव्य शृंखलाबद्ध तरीके से और रोजाना किश्तों में दे रहे हैं उससे लगता है कि अपने भारतीय होने का पहचानपत्र देने के लिए हर हिन्दुस्तानी को अब सरसंघचालक द्वारा स्थापित फ्रेंचाइजी पर जाना पड़ेगा। संभव है कि कल तक योग सिखाने वाले उद्योगपति रामदेव ये फ्रेंचाइजी ले लें और पतंजलि बिस्किट, नूडल्स, केश तेल, घी इत्यादि के साथ-साथ देश भर में फैली उनकी दुुकानों पर पहचानपत्र बिक्री का भी काउंटर खुल जाए। अगर कोई कमी होगी तो अपने भक्तों के बीच श्री श्री कहलाने वाले रविशंकर या गुरमत राम-रहीम की दुकानों से उनका वितरण किया जा सकेगा।

नरेन्द्र मोदी मई 2014 में अनेक समुदायों, वर्गों और समूहों के सहयोग से चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बने थे। उस समय दावा किया गया था कि अल्पसंख्यकों ने भी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विश्वास प्रकट किया है। जफर सरेसवाला इत्यादि इसके प्रमाण के तौर पर पेश किए गए थे।  इसमें संदेह नहीं कि मोदी के चुनाव अभियान में संघ परिवार ने महत्वपूर्ण भूमिका वोटरों को घर से निकालने व बूथ प्रबंधन आदि में निभाई थी। देशी-विदेशी पूंजीपतियों ने उनके लिए अपनी तिजोरियां खोल दी थीं। किन्तु इस सबसे बढ़ कर नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए उस साधारण परिस्थिति के नागरिक ने वोट दिया था, जो भ्रष्टाचार से त्रस्त था और जिसे जीवनयापन के लिए एक छोटे से रोजगार के अवसर की आवश्यकता थी। उसे बढ़ती हुई महंगाई से निजात पाने की भी उम्मीद थी। वह साधारण नागरिक आज अपने आपको छला गया महसूस कर रहा है। प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार खत्म होने का चाहे जितना दावा करें यह सबको पता है कि बुराई पहले से कहीं ज्यादा फैल गई है। अफसरशाही आज पहले की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली और प्रबल है, शिक्षा और स्वास्थ्य में किसी तरह का सुधार नहीं हुआ है, विश्व बाजार में पेट्रोल के दाम घट जाने के बावजूद जनता को उसका कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है, महंगाई दिन-ब-दिन बढ़ रही है, आर्थिक मंदी के जो भी कारण हों कल-कारखाने बंद हो रहे हैं या उनमें उत्पादन कम हो गया है, बेरोजगारी दूर होने के बजाय बढ़ रही है तथा प्रति व्यक्ति पन्द्रह लाख रुपया और अच्छे दिन आने को भाजपा नेतृत्व स्वयं ही जुमला घोषित कर चुका है।

एक तरह से जनता मोहभंग की स्थिति में पहुंच गई है, लेकिन इससे न भाजपा को और न ही रिमोट से सरकार चलाने वाले संघ परिवार को कोई फर्क पड़ रहा है। उन्हें अपने गठबंधन के साथियों की आलोचना की भी चिंता नहीं है। अरुणाचल और उत्तराखंड में संविधान की मर्यादा का उल्लंघन करने में भी उन्होंने संकोच नहीं बरता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दरअसल लग रहा है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का यह जो एक मौका आया है उसे हाथ से फिसलने नहीं देना चाहिए। प्रधानमंत्री की मजबूरी देखिए। संघ के स्वयंसेवक होने के नाते वे अपनी पितृसंस्था का विरोध नहीं कर सकते और विरोध करें भी क्यों? लोकसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है। सरकार गिरने का कोई खतरा नहीं है। जैसे दो साल निकल गए वैसे अगले तीन साल भी निकल जाएंगे। यह तो सब जानते हैं कि श्री मोदी सत्ताप्रिय व्यक्ति हैं। देश-दुनिया में हुई तमाम आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने गुजरात का मुख्यमंत्री पद नहीं छोड़ा तो प्रधानमंत्री पद कैसे छोड़ देंगे? उनका शायद यह भी मानना हो कि जिस तरह से वे तीन बार गुजरात में चुनाव जीते, उसी तरह केन्द्र में भी दुबारा जीत जाएंगे। शायद यही उम्मीद सरसंघचालक मोहन भागवत को होगी।

हमारी चिंता मोहन भागवत अथवा नरेन्द्र मोदी के बारे में नहीं है। चिंता इस बात की है कि देश का क्या होगा? आधुनिक समय में धर्म आधारित देशों के जो हालात हमने देखे हैं, उनसे हमारी चिंता बढ़ती है। यह समझना बहुत आवश्यक है कि आज जिसे हम राष्ट्र कहते हैं वह कोई स्वाभाविक संज्ञा नहीं बल्कि एक राजनैतिक निर्मिति है। विश्व में शायद ही कोई राष्ट्र हो जहां सिर्फ एक धर्म, एक मत, एक विश्वास, एक जाति, एक रंग या एक नस्ल के लोग रहते हों। ऐतिहासिक कारणों से विभिन्न तरह के समाज पास-पास आते हैं और साथ मिलकर राजनैतिक रूप से राष्ट्र अथवा नेशन स्टेट की स्थापना करते हैं। इस राजनीतिक इकाई का अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें जो भिन्न-भिन्न समाज हैं वे बराबरी के साथ रह पाते हैं या नहीं। यदि किसी देश के सत्ताधीश अपने भीतर के सभी समुदायों के साथ समान न्याय का भाव नहीं रखेंगे तो वह राष्ट्र किसी भी समय टूट सकता है।

पाकिस्तान में बंगलाभाषियों के प्रति सत्ताधीशों ने समानता का बर्ताव नहीं किया तो देश के दो हिस्से हो गए। श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहलियों ने अल्पसंख्यक तमिलों के साथ भेदभाव रखा, तो वहां कई दशकों तक गृहयुद्ध चलता रहा। आज स्वयं भारत सरकार नेपाल में मधेशियों के प्रति समभाव रखने की सीख वहां की सरकार को दे रही है। युगांडा में ईदी अमीन ने भारतीयों को देश से निकालने की कोशिश की तब भारत ने उसका विरोध किया था या नहीं? आज अमेरिका में आतंकवादी होने के धोखे में जब किसी सिख को मार दिया जाता है तो वह बात हमें नागवार गुजरती है और जब कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो तीन कनाडाई सिखों को मंत्रिमंडल में शामिल करते हैं तो हमें प्रसन्नता होती है। आज भारत में संघ परिवार से जुड़े वे तमाम लोग जो बात-बात में अल्पसंख्यकों व उनका साथ देने वालों को चिन्हित कर उन्हें राष्ट्रद्रोही घोषित कर पाकिस्तान जाने की सलाह देते हैं, वे कृपया हमें बताएं कि क्या वे इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा, कैरेबियन देश, अफ्रीकी देश, नेपाल, बंगलादेश, श्रीलंका, म्यांमार आदि में बसे भारतवंशियों को जहाजों में भरकर भारत वापिस लाएंगे?

इस समय संघ परिवार भारत में जो हिन्दू राष्ट्र निर्मित करने की कोशिश कर रहा है तब यह याद कर लेना मुनासिब होगा कि यही कोशिश हिटलर और मुसोलनी ने की थी, जिसकी परिणति द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में हुई थी। आज जब ग्लोबल विलेज की बात हो रही है तब किसी भी देश में गृहयुद्ध की स्थिति कितना विकराल रूप ले सकती है उसकी कल्पना मात्र से हर समझदार व्यक्ति को डर लगना चाहिए। अयातुल्ला खुमैनी ने इरान को एक शिया धर्म राज्य में रूपांतरित करने की जो पहल की उसका परिणाम यह हुआ कि इरान विकास की दौड़ में कम से कम एक सदी पिछड़ गया।  इस्लामिक स्टेट द्वारा खिलाफत की पुनस्र्थापना के लिए जो अकल्पनीय हिंसा की जा रही है उसके कारण पश्चिमी एशिया और उत्तर अफ्रीका के तमाम देश बेहाल हो रहे हैं। इस क्षेत्र की राजनीति का गहन अध्ययन अथवा ऐसी परिस्थितियों का विश्लेषण जिन्होंने किया है उनके कुछ उद्धरण यहां प्रस्तुत करने से मेरी बात और स्पष्ट हो सकती है।

यूएनडीपी ने अरब मानव विकास रिपोर्ट 2003 में लिखा था-''शोधकर्ताओं का मानना है कि अरब देशों में जो पढ़ाया जा रहा है वह स्वतंत्र तर्कबुद्धि व विचारशीलता बढ़ाने के बजाय व्यक्ति को अधीनता, आत्मसमर्पण, आज्ञाकारिता और परवशता के लिए प्रेरित करता है।" इसे उद्धृत करते हुए पूर्व राजदूत एवं दार्शनिक राबर्ट तोस्कानो कहते हैं कि-''जो सत्ताधीश पूर्ण नियंत्रण रखना चाहते हैं वे मुक्त, बहुलतावादी, नवाचारयुक्त विचारसरणि को पनपने से रोकते हैं। इसका दुष्प्रभाव अर्थव्यवस्था एवं समाज व्यवस्था दोनों में देखने मिलता है। इससे उदारवादी जनतंत्र के बजाय अनुदार जनतंत्र का उदय होता है जिससे शांतिपूर्ण विकास एवं परिवर्तन की संभावना खत्म हो जाती है।"

अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'कैपिटल' में ऐसे वातावरण की चर्चा करते हुए कहते हैं कि ''पूंजीवाद एकतरफा और गैरटिकाऊ असमानताओं को जन्म देता है जिससे जनतांत्रिक समाज के बुनियादी मूल्य खंडित होते हैं।" यह आश्चर्य की बात नहीं है कि पूंजीपति वर्ग हमेशा से धर्म आधारित व्यवस्था का समर्थन करते आया है। उसे सर्वाधिक लाभ वहीं मिलता है। आक्सफैम की एक ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि विगत बीस वर्ष में विश्व के सबसे धनी एक प्रतिशत लोगों की आमदनी साठ गुना बढ़ गई है।

मैं अंत में सुप्रसिद्ध राजनैतिक विचारक अन्तोनियो ग्राम्शी को उद्धृत करना चाहूंगा। उन्होंने कहा था कि ऐसे संकट की जड़ इस तथ्य में है कि अतीत की व्यवस्था मर रही है और नूतन का जन्म होते नहीं दिख रहा है। इस संधि-बेला में विभिन्न कोटियों की रुग्णता के लक्षण समाज में परिलक्षित होते हैं।

यह दायित्व भारत के नौजवानों पर है कि वे एक रुग्ण मानसिकता के साथ जीना पसंद करेंगे या एक नए भारत का निर्माण करना चाहेंगे!!

देशबन्धु में 07 अप्रैल 2016 को प्रकाशित