Wednesday, 17 January 2018

यात्रा वृत्तांत : आरंग से बारंग तक

                                          

 आपको यह शीर्षक अटपटा लग रहा होगा। जानना चाहते होंगे कि अ से ब की यह तुक मैंने क्यों मिलाई है! यह रहस्य कुछ देर में खुलेगा। अभी इतना जान लीजिए कि निरन्तर चलती यात्राओं के क्रम में पिछले दिनों मैं एक दिन के लिए भुवनेश्वर हो आया। वह भी साल के आखिरी दिन अर्थात 31 दिसम्बर 2017 को। सुबह पहुंचा और रात की रेल से रायपुर के लिए वापिस रवाना। कुल जमा चौदह घंटे का प्रवास। पिछले चालीस सालों में कई बार ओडिशा जाना हुआ है। उस समय से जब नक्शे पर उसका नाम उड़ीसा था। जब भी गया हूं, कुछ न कुछ नया देखने-समझने मिला है। 1977 में जब सुपर साईक्लोन आया, तब मैं सपरिवार पुरी में था। धुआंधार बारिश के बीच पुरी से भुवनेश्वर, चिलका, बरहामपुर, कोरापुट होते हुए रास्ते में दो रात बिताकर जगदलपुर किसी तरह पहुंच पाए थे। पहुंचते साथ अखबार का शीर्षक- उड़ीसा में साईक्लोन से सात हजार मृत- देखकर कलेजा कांप उठा था। रास्ते में दो रातें, पहली घने जंगल के बीच मोहाना के डाक बंगले में, दूसरी जैपुर-जगदलपुर के बीच हाईवे पर बोरीगुमा के रेस्ट हाउस में मूसलाधार वर्षा के बीच कैसे बीती थीं, याद कर आज भी रोमांच हो आता है।
बाद की लगभग सभी यात्राएं निरापद ही बीतीं। इस बार की ही तरह। रायपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्मों पर लगीं लिफ्टें काम कर रही है। इतने व्यस्त स्टेशन पर सिर्फ छह लोगों के लिए बनी लिफ्ट पर्याप्त नहीं है, लेकिन एक नई सुविधा तो जुट ही गई है। अब जब स्टेशन पर भारवाहक मिलना दुर्लभ हो गया है, तब इस सुविधा का महत्व समझ आता है। दुर्ग से चलने वाली ट्रेन रायपुर आते-आते दस मिनिट लेट हो गई और प्लेटफार्म भी बदलना पड़ा, लेकिन इन छोटी-मोटी तकलीफों के हम अभ्यस्त हो चुके हैं। दिक्कत तब हुई जब मालूम पड़ा कि प्रसाधन कक्ष में पानी नहीं है। मैंने रेल मंत्री को ट्विटर किया लेकिन कोई उत्तर नहीं आया। वहां सिर्फ प्रायोजित ट्विटर का ही जवाब दिया जाता है, यह मैं अनुभव से जान चुका हूं। खैर, काटाभांजी स्टेशन पर पानी भर दिया गया। यह प्रसन्नता की बात थी कि डिब्बा नया नकोर था, साफ-सुथरा और कंबल, चादर, टावेल भी एकदम नए थे। कटक के पहले तक ट्रेन बिलकुल समय पर चल रही थी, लेकिन कटक-भुवनेश्वर की 20-25 किमी की दूरी तय करने में पैंतालीस मिनिट अतिरिक्त लग गए। भुवनेश्वर एक व्यस्त स्टेशन है, वहां प्लेटफॉर्म अक्सर खाली नहीं रहते और ट्रेनें इस वजह से लेट हो ही जाती हैं।
मैं भुवनेश्वर गया था एक साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेने। भुवनेश्वर साहित्य समाज नामक संस्था दिसंबर के अंतिम रविवार को अपना वार्षिकोत्सव मनाती है। संयोग से इस साल 31 दिसंबर को ही रविवार था। साल का आखिरी दिन, वह भी रविवार और फिर लगभग उसी समय ओडिशा साहित्य परिषद का एक वृहत् कार्यक्रम। संस्था के अध्यक्ष सुकवि सूर्य मिश्र से चर्चा करते हुए मन में आशंका हुई कि मुझे शायद लगभग खाली सभाकक्ष में ही अपना व्याख्यान देना होगा। किन्तु मेरी आशंका निर्मूल थी। सुबह साढ़़े दस बजे ओडिशा औद्योगिक विकास निगम का सुसज्जित सभाकक्ष तीन-चौथाई भर चुका था। दो सौ से अधिक की सभा में आधी नहीं तो एक तिहाई से ज्यादा महिलाओं की उपस्थिति प्रीतिकर थी। मेरे लिए अपने पुराने मित्रों कथाकार जापानी और कवि तरुण कानूगो से काफी समय के बाद भेंट होना भी प्रसन्नता का कारण था।
भुवनेश्वर साहित्य समाज के इस आयोजन में भाग लेना एक ताजगीभरा अनुभव था। मैंने अपने वक्तव्य में कहा कि जब एक पूरा साल सुख-दुख, आशा-निराशा, क्षोभ-हताशा के बीच झूलते हुए बीत गया हो, तब कम से कम साल का अंतिम दिन समानधर्मा मित्रों के साथ बीतना आश्वस्त करता है कि नया साल पूर्वापेक्षा बेहतर गुजरेगा। इस कार्यक्रम की कुछ झलकियां पाठकों के लिए रुचिकर होंगी। भुवनेश्वर के रचनाकारों की यह संस्था मुख्यत: ओडिआ भाषी लेखकों की है, लेकिन इस बीच उसने ओडिआ रचनाओं के हिंदी अनुवाद की तीन पुस्तकें प्रकाशित की हैं। एक कहानी संकलन और दो कविता संग्रह। मुझे 'तपती रेत पर हरसिंगार' शीर्षक कविता संग्रह को लोकार्पित करने का सुखद सुयोग मिला। इसमें ओडिआ के सौ कवियों की एक-एक कविता संकलित है। ये सारी कविताएं आधुनिक भावबोध की हैं और संपादक राधू मिश्र ने इन्हें नई सदी की कविताएं निरूपित किया है। कविताओं को पढ़कर ओडिआ साहित्य के प्रति मेरी समझ विकसित होने में सफलता मिली है, ऐसा कहूं तो अतिशयोक्ति न होगी। भुवनेश्वर साहित्य समाज ने इसी तरह अपने लेखकों की रचनाओं के तीन अंग्रेजा अनुवाद भी प्रकाशित किए हैं।
इसी आयोजन में मेरे सामने यह भी स्पष्ट हुआ कि ओडिआ में महिला रचनाकारों की एक समृद्ध परंपरा है। कार्यक्रम में जो देवियां उपस्थित थीं, उनमें से स्वाभाविकत: अधिकतर साहित्य-प्रेमी थीं, किंतु लेखिकाओं की संख्या कम नहीं थी। हिंदी में अनूदित कविता संग्रह में अनेक रूपांतर भी उनके ही किए हुए हैं। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि कार्यक्रम का मुख्य पर्व लगभग एक बजे समाप्त हो गया था। उसके बाद काव्य पाठ होना था। मंच पर पांच कवि विराजमान थे और वे बारी-बारी से मंच संचालन कर रहे थे। मैं कुछ देर ठहरकर लौट आया था। बाद में मालूम पड़ा कि कविता पाठ का सिलसिला शाम पांच बजे तक चलता रहा। करीब पचास कवियों ने अपनी कविताएं पढ़ीं। इससे पता चलता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। कोई बिरला ही होगा, जो मंच पर जाकर कविता सुनाने का लोभ संवरण कर पाता हो। फिर भी मैंने जितना उन कवियों को समझा उससे अनुमान लगाता हूं कि वहां कविता के नाम पर जोकराई नहीं हुई होगी, चुटकुले नहीं सुनाए गए होंगे।
भुवनेश्वर मुझे हमेशा से एक उनींदा नगर प्रतीत होते रहा है। जब पहली बार गया था तो दोपहर का भोजन नसीब नहीं हुआ था। सारे होटलों के दरवाजे बंद थे। वही हाल बाजार के। दोपहर एक से चार तक भुवनेश्वर विश्राम किया करता था। अब समय बदल गया है। रविवार को सामान्यत: बाजार बंद रहता है। इस बार शायद इकतीस दिसंबर के कारण खुला हुआ था और अच्छी-खासी चहल-पहल थी। पुरी-भुवनेश्वर पर्यटन के बड़े केंद्र हैं इसलिए रेलवे स्टेशन, होटल, रेस्तोरां सब में पर्यटकों की भी आवाजाही खूब थी। विदेशी सैलानी तो इक्का-दुक्का ही दिखे, किंतु देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए पर्यटक रेलगाड़ी में भी थे और होटल में भी। यह कहना होगा कि ओडिशा ने पर्यटन व्यवसाय को गंभीरतापूर्वक बढ़ावा दिया है। भुवनेश्वर में हर श्रेणी के होटल और रेस्तोरां हैं, हस्तशिल्प और हाथकरघे की मार्केटिंग भी भली-भांति हो रही है। 
अब बात इस लेख के शीर्षक की। भुवनेश्वर का तेजी के साथ कायाकल्प हो रहा है। एक नया शहर कटक की ओर बढ़ते जा रहा है। वर्षों पूर्व आईआरसी नगर (इंडियन रोड कांग्रेस) उस संस्था के अधिवेशन के नाम पर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बसाया गया था, वह शहर के बीच में आ गया है। उदयगिरि, खंडगिरि और नंदनकानन भी अब महानगर का हिस्सा बन चुके हैं, उधर पुरी की दिशा में धौली भी। कटक और भुवनेश्वर के बीच एक नया रेलवे स्टेशन बन रहा है- भुवनेश्वर न्यू स्टेशन। इस पर आठ या बारह प्लेटफॉर्म होंगे तथा आधी गाड़ियां पुराने स्टेशन के बजाय यहां रुका करेंगी। पटिया नाम का एक छोटा सा गांव था, अब वहां पटिया पैसिंजर हॉल्ट स्टेशन बन गया है।
भुवनेश्वर के पुराने स्टेशन पर लिफ्ट है, जिसमें बीस लोग सवार हो सकते हैं। वहां जुडिशरी, मीडिया और पे्रस का विशेष पार्किंग स्थल भी है। मंचेश्वर नामक एक और स्टेशन विस्तार ले रहा है। अब रहस्योद्घाटन। रायपुर से रवाना हुआ तो थोड़ी देर में आरंग स्टेशन आया। भुवनेश्वर पहुंचने को हुआ तो नगर सीमा पर बारंग स्टेशन पड़ा। हिंदी से ओडिआ। छत्तीसगढ़ से ओडिशा। 'अ' से 'ब' तक का सफर यूं पूरा हुआ। रायपुर पहुंचा तो चलित सीढ़ी याने एस्केलेटर से नीचे उतरा। यह एक अतिरिक्त सुविधा देखी। लेकिन कार पार्किंग की जो दुर्दशा देखी, उससे मन खिन्न हुआ। ऐसा लगा कि स्वच्छ भारत अभियान की सफलता के लिए स्वयं नरेन्द्र मोदी को रायपुर रेलवे स्टेशन आना पड़ेगा।
देशबंधु में 18 जनवरी 2018 को प्रकाशित