Friday, 15 June 2012

राजा और विदूषक

भारतीय रंगमंच में विदूषक एक खास महत्व रखता है। चाहे संस्कृत के क्लासिक नाटक हों या हिन्दी फिल्में या फिर लोकनाटय ही क्यों न हो, विदूषक के बिना कहीं भी काम नहीं चलता। ये विदूषक कभी नाटक में विषय की गंभीरता से उपजी बेचैनी का शमन करते हैं तो कभी खुद ही हल्के-फुल्के ढंग से गहरे तक वार करने वाली बात कह जाते हैं। 

जो रंगमंच पर है वही जीवन में भी है। भारतीय राजनीति का लगभग तीन हजार साल का इतिहास बतलाता है कि कोई भी राजदरबार विदूषक के बिना पूरा नहीं होता। सारा राजकाज निपटाने के बाद जब सभा उठ जाती है और बाकी दरबारी घर लौट जाते हैं तब भी विदूषक राजा के साथ ही रहता है। उसकी पहुंच अक्सर अंत:पुर तक भी होती है। शासन के जटिल प्रश्नों को सुलझाते-सुलझाते राजा के थके मन को बहलाने में विदूषक की बुध्दि ही काम आती है। जब बादशाह अकबर का नाम लिया जाता है तो उनके साथ बीरबल का नाम अपने आप ध्यान आ जाता है। राजा कृष्णदेव राय के दरबार की कल्पना बिना तेनालीराम के नहीं की जा सकती। यह शोध का विषय हो सकता है कि राज्य में बड़े-बड़े विद्वानों के होते हुए विदूषक को ही क्यों इतना महत्व मिलता है। वह राजा का मित्र, सखा और विश्वस्त होता है तथा वक्त आने पर ऐसी बुध्दिमता का परिचय देता है कि त्रिकालदर्शी पंडित भी दांतों के नीचे उंगली दबाने पर मजबूर हो जाएं। 

आज के जनतांत्रिक भारत में इस परंपरा का निर्वाह बदस्तूर हो रहा है। वे लोग नादान ही कहे जाएंगे जो राजसभा में विदूषक की उपस्थिति पर ऐतराज जतलाते हैं। आज के समय में ''विदूषक'' शब्द उतना प्रचलित नहीं है। उसका स्थान हास्य कवि ने ले लिया है। पुराने दरबारों में चारण भी होता था जो कविता करना जानता था। चारण के चरित्र से कविता निकल जाने के बाद अब उसे निखालिस देशज शैली में चमचा आदि कहा जाने लगा है। आज के समय में यह भी संभव है कि एक ही व्यक्ति दोनों रोल निभा रहा हो। 

इस पृष्ठभूमि को याद रखने में मानसिक संताप से मुक्ति एवं आत्म-सुख है। जब छत्तीसगढ़ राज्य बना तो पहले मुख्यमंत्री ने एक हास्यकवि को अपना सांस्कृतिक सलाहकार बनाया। जब सरकार बदल गई तो दूसरी पार्टी के राज्य में भी वे हास्यकवि दरबार में उसी ठसन के साथ बने रहे। हम जैसे लोगों ने इसे सरकार की सांस्कृतिक नासमझी के रूप में देखा तथा बार-बार यह अपेक्षा की कि सरकार साहित्य और संस्कृति के मामले में ऐसे हल्के-फुल्के ढंग से न ले। इसका कोई असर नहीं पड़ा क्योंकि हमने भारत की ऐतिहासिक परंपरा को ध्यान में ही नहीं रखा। अब ऐसा ही कुछ दिल्ली प्रदेश में देखने मिल रहा है। अशोक चक्रधर प्रदेश की हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष बना दिए गए और अब उनके खिलाफ मुहिम चल रही है।विरोधियों को इस तथ्य से संतोष करना चाहिए कि श्री चक्रधर ने मुक्तिबोध पर पीएचडी की है और वे हिंदी साहित्य के प्रोफेसर हैं। इसके बाद वे हास्य कविता में क्यों गए, ये वही बेहतर जानते होंगे। 


रायपुर हो या दिल्ली- बात यह है कि बादशाह यदि सारे समय चिंतकों और विचारकों से घिरा रहेगा तो अपना मनबहलाव कब करेगा। याद रखना चाहिए कि हास्य कवि सम्मेलनों में कवि राजनीति और राजनेताओं को जी भरके गालियां देते हैं और कवि सम्मेलन में हाजिर नेता- मंत्री उनकी फुलझड़ियों पर तालियाँ बजाते हुए लोटपोट होते रहते हैं। कहते हैं कि विदूषक को सात खून माफ होते हैं।


अपने मित्रों से हमारा यही कहना है कि राजसत्ता का साहित्य के साथ यही सलूक चलता रहेगा और अपने विरोध से इसमें कुछ होना-जाना नहीं है। वह इसलिए भी कि साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में जिस सैध्दांतिक आधार पर विरोध किया जाना चाहिए उससे हम अक्सर कतराते हैं। हिन्दी जगत में चलने वाली ज्यादातर उठापटक व्यक्ति केन्द्रित होती है तथा निजी लाभालाभ का आकलन ही उसका आधार बनता है। कितना सारा समय तो नए-नए पुरस्कारों और पदों की स्थापना और फिर उन्हें हासिल करने की जोड़-तोड़ में ही बीत जाता है। हिन्दी में इस समय ढेरों पत्रिकाएं निकल रही हैं। उनमें अपवादस्वरूप दो-चार पत्रिकाएं होंगी जो लेखकों के आपसी विवादों से खुद को दूर रखती हैं, वरना अधिकांश अपने पन्नों का उपयोग निजी हिसाब-किताब चुकाने में करती हैं।

इस माहौल में साहित्य के उद्देश्य पर बातचीत होती है तो सिर्फ ऊपर-ऊपर। लेखक और रचना के बारे में बात होती है तो अपनों को चीन्ह-चीन्ह कर। पद और पुरस्कार देने में अपने पराए का फर्क बेहद सतर्कता के साथ किया जाता है। राजसत्ता के साथ अब छायायुध्द ही लड़े जाते हैं। रिकार्ड दुरुस्त रखने के लिए इतना कहना आवश्यक है कि यह माहौल एक दिन में नहीं बना है। पिछले पचास-साठ साल से यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे कर विकसित हुई है। पहले संस्थाएं और अवसर कम थे तो प्रदूषण भी कम था। जैसे-जैसे अवसर बढ़े हैं उसी अनुपात में अभिलाषा और कुंठा भी बढ़ी है।

अब यदि साहित्यकार राजा-रानियों को कोई सलाह देना भी चाहे तो किस बलबूते पर दे। वे भी जानते हैं कि आप उनके पास अपने स्वार्थ-साधन के लिए आए हैं। ऐसे में उन्हें वे हास्य कवि, चारण, चमचे, विदूषक ही बेहतर प्रतीत होते हैं जिन्हें कोई बौध्दिक अहंकार नहीं, जिनकी आकांक्षाएं महान लेखकों की तुलना में बहुत छोटी हैं और जो अवसर पड़ने पर अपने पालक अथवा संरक्षक की विरुदावली बिना किसी ग्लानि या संकोच के लिखने के लिए तत्पर होते हैं। इस प्रपंच से दूर रहकर जो एकांतिक भाव से रचनाधर्म का पालन कर रहे हों, हम उन्हीं को प्रणाम करते हैं।


 देशबंधु में 13 अगस्त 2009 को प्रकाशित