Friday, 15 June 2012

चाट भण्डार का जूठा दोना

छत्तीसगढ़ राज्य में शासन की ओर से जितने भी सम्मान और पुरस्कार दिए जाते हैं वे राज्य बनने की पहली वर्षगांठ से ही विवादों के घेरे में हैं। इस साल जो पुरस्कार घोषित किए गए हैं उनसे किसका सम्मान बढ़ रहा है, समझ पाना मुश्किल है। अब इनका मोल चाट भंडार में घूरे पर फेंक दिए गए दोने के बराबर हो गया है। डॉ. रमन सिंह प्रदेश शासन के मुखिया हैं। हम उनसे ही अपेक्षा और अपील कर सकते हैं कि जो हुआ सो हुआ। अब ऐसे तमाम पुरस्कार व सम्मान उस समय तक के लिए स्थगित कर दिए जाएं जब तक शासन इनके बारे में स्वच्छ, पारदर्शी व गुणमूलक नीति बनाने में समर्थ न हो।

ऐसे किसी भी अलंकरण में तीन पक्ष होते हैं- सम्मानदाता, निर्णयकर्ता और प्राप्तिकर्ता। इन तीनों पक्षों का अर्थपूर्ण समन्वय इस पर निर्भर करता है कि सम्मान देने की प्रक्रिया कैसी है। भारत में भांति-भांति के खिताब दिए जा रहे हैं। ये सरकार की ओर से भी दिए जाते हैं और कार्पोरेट घरानों अथवा विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रही सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा भी। जब व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा सम्मान दिए जाते हैं तो उसका उद्देश्य सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाना होता है। वे सामान्य तौर पर अतिख्याति प्राप्त व्यक्तियों को ही चुनते हैं जिसमें कोई खतरा नहीं होता। लेकिन कुल मिलाकर मकसद सीमित होता है कि चिंतनशील समाज के बीच उनकी चर्चा भी थोडे सम्मान के साथ होती रहे। सामाजिक क्षेत्र की संस्थाएं अपने निर्दिष्ट कार्य क्षेत्र में जो सम्मान देती हैं, उसमें भी वस्तुनिष्ठा का निर्वाह पूरी तरह से नहीं हो पाता। अधिकतर मामलों में इन संस्थाओं के कर्ताधर्ताओं के लिए यह निजी यश पाने का एक माध्यम होता है।

जब शासन ऐसे पुरस्कार दे तो बात अलग हो जाती है। यहां अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। राज्य द्वारा दिए गए पुरस्कार का मकसद सिर्फ व्यक्तियों का सम्मान करना नहीं होता बल्कि उसमें यह अनिवार्य संदेश होता है कि राज्य नागरिकों को अपने-अपने कर्मक्षेत्र में बेहतर से बेहतर भूमिका निभाने के लिए प्रेरित कर रहा है। उसका वृहत्तर उद्देश्य एक रचनाशील, गतिशील, प्रतिभा सम्पन्न वातावरण का निर्माण करना होता है। इस दृष्टि से यह शर्म की बात है कि छत्तीसगढ़ नया राज्य होने के बावजूद कोई स्वस्थ परंपरा स्थापित नहीं कर पाया है, जबकि एक नया राज्य होने के नाते यहां नवाचार की अपेक्षा की जाती थी। राज्य कोई पुरस्कार दे तो उसका स्वागत ही होता है, लेकिन अगर एक जनतांत्रिक सरकार राग-द्वेष से मुक्त होकर निर्णय न ले सके तो यह जनता के लिए दुर्भाग्य की ही बात है। इतिहास दृष्टि से हीन और सिर्फ वर्तमान में जीने वाली यह सोच दु:खदायी है।

जब नया राज्य बना तो हमारे मन में उत्साह था कि प्रदेश में कुछ नई परंपराएं डलेंगी जो भावी पीढ़ियों के पथ-प्रदर्शन में काम आएंगी। लेकिन यह नायाब मौका देखते न देखते गंवा दिया गया। प्रदेश के विश्वविद्यालयों में जो मानद उपाधियां दी गईं उसमें यह बात स्पष्ट हुई कि प्रतिभाओं को सम्मानित करने के मामले में हमारी सोच कितनी नीचे चली गई है। पहले राज्योत्सव के समय से ही जो पुरस्कार दिए गए उसमें भी सम्मान के बजाय अवमानना का भाव ही प्रकट हुआ। एक तो पुरस्कार किनके नाम पर दिए जाएं, इस बारे में ही कोई सुविचारित नीति नहीं बनी। फिर जो चयन समितियां बनाई गईं उनमें भी बेहद चलताऊ तरीके से काम लिया गया। पुरस्कार के लिए आवेदन करने का नियम बना दिया गया वह पहले जितना बेहूदा था आज भी उतना है। अगर चयन समिति में विषय विशेषज्ञ हों तो उनके ज्ञान व विवेक पर निर्णय छोड़ा जाना चाहिए था। जब सार्वजनिक आवेदन मांगे जाने लगे तो हर कोई अपने आपको सुपात्र मानने लगा। ये ''सुपात्र'' फिर इस-उस दरवाजे कैनवासिंग करते घूमने लगे। मतलब एक अरुचिकर स्थिति निर्मित कर दी गई। इतना जैसे पर्याप्त नहीं था तो जूरी के निर्णय को भी सरकारी इशारों पर बदलने के प्रसंग भी सामने आए। 2001 से 2009 तक यह सिलसिला चल रहा है और साल दर साल इसमें गिरावट आती जा रही है।

हम कहना चाहते हैं कि राज्य द्वारा स्थापित सम्मान, पुरस्कार, फेलोशिप व राज्य के विश्वविद्यालयों द्वारा प्रदत्त मानद उपाधि आदि अलंकरणों को इतने हल्के ढंग से नहीं लेना चाहिए। जब किसी अपात्र का चयन होता है तो जिस व्यक्ति के नाम पर पुरस्कार स्थापित किया गया है उसकी स्मृति धूमिल होती है। जिसे पुरस्कार मिलता है वह स्वयं पुरस्कार की गरिमा की रक्षा करने में असमर्थ रहता है। जिस कार्य के लिए पुरस्कार दिया गया है उस क्षेत्र में काम कर रहे सुयोग्य व्यक्तियों का आत्मसम्मान आहत होता है। आम जनता के बीच में प्रतिकूल प्रतिक्रिया होती है तथा अंतत: राजसत्ता की विश्वसनीयता पर इसके कारण एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लग जाता है। कायदे से तो सरकार को जनता से शाबाशी मिलनी चाहिए कि आप कितना अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन होता इसके विपरीत है। मतलब पुरस्कार स्थापित करने की मूल भावना ही समाप्त हो जाती है।

ऐसा नहीं कि सिर्फ छत्तीसगढ़ सरकार की प्रतिष्ठा पर ही आघात पहुंच रहा है। अन्य प्रदेशों के हालात भी बहुत अच्छे नहीं हैं। केन्द्र शासन द्वारा प्रदत्त पद्म अलंकरण तो संदिग्ध हो ही चुके हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि छत्तीसगढ़ सरकार भी अपना रवैया न बदले। हम और किसी से तो नहीं लेकिन डॉ. रमन सिंह से जरूर यह उम्मीद कर सकते हैं कि वे इस भर्राशाही को आगे न चलने दें। वे चाहे तो इस बारे में कठोर निर्णय ले सकते हैं। एक बार सारे पुरस्कारों की बेबाक समीक्षा होनी चाहिए। 

एकाध साल के लिए सारे पुरस्कार स्थगित कर दिए जाएं तो भी कोई हर्ज नहीं। कुछ पुरस्कार तो ऐसे हैं जिनकी जरूरत ही नहीं है। कुछ पुरस्कारों में नाम व काम का कोई तालमेल नहीं है। जिस पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। छत्तीसगढ़ में साहित्य और पत्रकारिता के नाम पर राष्ट्रीय पुरस्कार देना है तो मुकुटधर पाण्डेय व माधवराव सप्रे से बढ़कर कोई दूसरा व्यक्ति नहीं हो सकता। अहिंसा का पुरस्कार गौशालाओं को देने में कोई तुक नहीं है। बख्शी जी और मुक्तिबोध जी के नाम पर शिक्षक पुरस्कार दिए जाएं, यह बेतुकी बात है। सम्पन्न समाज के दबाव में अथवा मंत्रियों-अफसरों के दबाव में कोई भी पुरस्कार स्थापित करना हमारी दृष्टि में अनुचित है। इसी तरह राज्य सरकार में सेवारत व्यक्तियों को सम्मानित करना एक अस्वस्थ परंपरा को जन्म देना है। हमें विश्वास है कि यदि कठोर कदम उठाए जाते हैं तो जनता के बीच उसकी अच्छी प्रतिक्रिया होगी। अगर पुरस्कार ढंग से दिए जाएंगे तो इससे राज्य और राज्य के मुखिया का भी सम्मान बढ़ेगा।

  देशबंधु में 19 नवम्बर 2009 को प्रकाशित