Wednesday, 11 September 2013

सुई की नोंक, हल की मूठ



मध्यभारत में आदिवासी अशांति- यही विषय था महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का जो पिछली 26-27 अगस्त को सम्पन्न हुई। इस कार्यक्रम के  आयोजन में विश्वविद्यालय के कुलपति एवं चर्चित लेखक विभूति नारायण राय ने निजी दिलचस्पी ली गो कि आयोजन विश्वविद्यालय के मानव विज्ञान विभाग द्वारा किया गया था। संगोष्ठी का विषय ऐसा था जिसमें शासन और समाज के विभिन्न पक्षों की दिलचस्पी लंबे समय से बनी हुई है और आगे भी बनी रहने की संभावना है। कहने की आवश्यकता नहीं कि मध्यभारत में आदिवासी अशांति से सीधा-सीधा आशय भारत के आदिवासी बहुल प्रदेशों में व्याप्त नक्सलवाद अथवा माओवाद से है। कुछ के लिए यह समस्या है तो कुछ इसमें ही समाधान भी देखते हैं। 

वर्धा के आयोजन में अगर कोई बात विशेष थी तो यह कि देश के किसी अन्य विश्वविद्यालय में लंबे समय से इस विषय पर चर्चा की गई हो ऐसा याद नहीं पड़ता। छत्तीसगढ़ में तो इस पर सोचने की जिम्मेदारी सरकार और राजनीतिक तंत्र पर ही डाल दी गई है। अगर मेरी याददाश्त सही है तो 2007 में जामिया मिलिया में इस विषय पर एक राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित किया गया था। उसे आप चाहे तो दिल्ली का कार्यक्रम मान सकते हैं, क्योंकि वहां तो ऐसे प्रश्नों पर कहीं न कहीं परिचर्चाएं होती ही रहती हैं। वर्धा के कार्यक्रम की दूसरी विशेषता थी कि इसमें  प्रशासन, सशस्त्र बल, शिक्षा जगत, सिविल सोसायटी तथा मीडिया को एक मंच पर लाने का उपक्रम किया गया था, यद्यपि इसमें किन्हीं कारणों से कसर रह गई। इस दृष्टि से जनवरी 2007 में भोपाल में राज्य आदिवासी शोध संस्थान द्वारा आयोजित परिचर्चा कहीं ज्यादा कसी हुई थी। उसके आयोजक अकादमी के तत्कालीन निदेशक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रणबीर सिंह थे।
 
वर्धा में सबसे अच्छी बात यह हुई कि दो दिवसीय कार्यक्रम का आरंभ नृतत्वशास्त्री प्रोफेसर नदीम हसनैन के बीज वक्तव्य के साथ हुआ। उनका व्याख्यान अत्यंत विचारोत्तेजक व सारगर्भित था। उन्होंने कहा कि सत्तातंत्र के लिए यह आंतरिक सुरक्षा का मुद्दा है तो आदिवासी समाज के लिए यह सामाजिक न्याय की लड़ाई है। दो सौ साल से चली आ रही औपनवेशिक मानसिकता आज भी बदली नहीं है; कल्याणकारी राज्य की छत्रछाया में ऋणग्रस्तता, शोषण व बेदखली बदस्तूर जारी हैं। उन्होंने एक लोकगीत का हवाला देते हुए कहा कि बाहरी लोग जब आए थे तो सुई की नोक की तरह पतले थे, वे अब हल की मूठ की तरह मोटे हो गए हैं।  इसे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि लोकगीत झूठ नहीं बोलते। प्रोफेसर हसनैन ने कहा कि अस्सी के दशक में वन कानूनों में परिवर्तन होना तो शुरू हुए, लेकिन उन पर अमल नहीं हुआ। विस्थापन आज के आदिवासियों के लिए सबसे बड़ी समस्या है और विकास एक डरावना सच। पनबिजली, अभ्यारण्य,  रेलवे, कल-कारखाने आदि से कोई पांच करोड़ लोग विस्थापित हुए हैं, जिनमें से सिर्फ बीस प्रतिशत लोगों का पुर्नवास हो सका है,  लेकिन सिर्फ पुर्नवास होने से बात नहीं बनती, विस्थापन से आदिवासी की रचनात्मक क्षमता समाप्त हो जाती है और परस्पर सहयोग का तंत्र बिखर जाता है।

प्रोफेसर हसनैन ने कहा कि आदिवासी तीन तरह की हिंसाओं से जूझ रहा है - राज्य द्वारा की गई हिंसा, माओवादियों की हिंसा और सलवा जुड़ूम जैसे गिरोहों की हिंसा। अपने लंबे व्याख्यान का समापन करते हुए प्रोफेसर हसनैन ने कहा कि यह सिर्फ आंतरिक सुरक्षा का मामला नहीं है और समस्या के समाधान के लिए सिविल सोसायटी जो भूमिका निभाना चाहिए थी वह उसमें असफल रही है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय के सलाहकार और सीआरपीएफ के पूर्व महानिदेशक के. विजय कुमार ने यह माना कि नक्सलवाद या माओवाद का मुकाबला पुलिस कार्रवाई से नहीं किया जा सकता, जरूरत इस बात की है कि सरकार समाज केन्द्रित विकास की अवधारणा पर ठीक से चले। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम एकदम प्रारंभ में स्वस्फूर्त था, लेकिन आगे इसका स्वरूप कैसे बदल गया, यह एक अलग कहानी है। उनके वक्तव्य का अभिप्राय शायद यही था कि समस्या के निवारण के लिए जो राजनीतिक पहल होना चाहिए वह नहीं हो रही है, लेकिन जब राज्य के विरूध्द हथियार उठाए जाएंगे तो सरकार किसी की भी हो वह उसे बर्दाश्त नहीं करेगी।

उसके बाद विभिन्न सत्रों में बहुत सारी बातें उठीं, बहुत से विचार सामने आए। नागपुर के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश खैरनार और भुवनेश्वर के प्रफुल्ल सामंत राय ने लगभग एक जैसी बातें कही। उन्होंने मुख्य तौर पर यही कहा कि नागरिक अशांति को दूर करने में सुरक्षातंत्र कभी भी कामयाब नहीं हो सकता, लेकिन सत्ता के मद में डूबी अफसरशाही इसके आगे सोच नहीं पाती। देश के अलग-अलग इलाकों से आए प्राध्यापकों की बातों में भी एक हद तक समानता थी। उन सबका मानना था कि विकास और विस्थापन जुड़वा भाई की तरह हैं, दोनों एक साथ आते हैं इनके कारण आदिवासियों का ज्ञान, संसाधन, परंपराएं, संस्कार, विश्वास, उत्सव आदि समाप्त होते जा रहे हैं। इनके अनुसार जमीन से बेदखली ही अशांति का मूल कारण है। ध्यान रहे कि ये निष्कर्ष इन विद्वानों के आदिवासी अंचलों में किए गए शोध पर आधारित है।

सुपरिचित कवि और समाज चिंतक महेन्द्र कुमार मिश्र ने कहा कि सरकार एक तरफ दमन का इस्तेमाल करती है और दूसरी तरफ वह सुधार की प्रक्रिया भी चलाती है, लेकिन उसे समझना चाहिए कि आदिवासी विस्थापन व निष्कासन के विरूध्द लड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी लड़ाई में सफलता या असफलता मायने नहीं रखती: आने वाले समय के लिए वह क्या संदेश दे पाती है, यह समझने की बात है। सीआईएसएफ के पूर्व विशेष महानिदेशक और कभी रायपुर में एसपी रहे विजय रमन ने माना कि नक्सल समस्या खुद हमारे द्वारा पैदा की गई है। कोई भी शासन सशस्त्र विद्रोह बर्दाश्त नहीं करेगा, लेकिन दोनों पक्ष अहंकार छोड़कर बातचीत करें तो रास्ता निकलना कठिन नहीं है।

दो दिवसीय संगोष्ठी में अनेक शोधार्थियों ने भी अपने पर्चे पढ़े। इनकी संख्या सौ से ऊपर ही थी। इनमें कुछ नई या कमज्ञात जानकारियां सामने आईं । रायपुर के जितेन्द्र कुमार प्रेमी का आलेख अपने आप संपूर्ण व सटीक था (उसे अलग से प्रकाशित करेंगे)। अन्य प्रस्तुतियों से जो बातें उभरीं उनमें से कुछ इस तरह हैं- (1) खूंटी, सिमडेगा (झारखंड) से भारी संख्या में मानव तस्करी हो रही है। माओवाद के बिना भी यहां दारुण स्थिति है (2) ग्राम सभा के प्रति न जागरूकता है न माहौल (3) बाहरी लोग सृष्टिपूजक आदिवासी और ईसाई आदिवासी में फर्क पैदा कर रहे हैं (4) मीडिया सरकारी दमनचक्र का समर्थन कर रहा है (5) प्रोजेक्ट टाइगर आदि के कारण आदिवासी विस्थापित हो रहे हैं (6) झारखंड में युवा आदिवासी मनोरोग का शिकार हो रहे हैं (7) मध्यप्रदेश में कोरकू आदिवासी कुपोषण का शिकार हैं (8) छत्तीसगढ़ के कंवर रक्ताल्पता के रोगी हैं (9) 1998 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम संशोधित में आपत्ति की अवधि तीस दिन से घटाकर छह दिन कर दी गई और गांव में मुनादी करना बंद हो गया (10) झारखंड के आदिवासी को कोयला चोर बनने मजबूर होना पड़ा (11) छत्तीसगढ़ में आदिवासी मतदान केन्द्र दूर होने के कारण वोट नहीं डाल पाते (12) महाराष्ट्र के मेलघाट में आदिवासी साहूकार के शोषण का शिकार हैं (13) जादूगुड़ा यूरेनियम खदान से तीस हजार लोग विकिरण के शिकार हुए हैं (14) मध्यप्रदेश में बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां अपने टीकों और दवाईयों का  प्रायोगिक परीक्षण आदिवासियों पर कर रही हैं (15) मध्यप्रदेश में ही आदिवासी औरतें बड़ी संख्या में सरोगेट मांएं बनाई जा रही हैं।

मेरे विचार पाठक समय-समय पर पढ़ते ही रहे हैं, इसलिए उनकी चर्चा फिलहाल नहीं। बेहतर होता कि कार्यक्रम दो दिन की बजाय तीन दिन का होता। शोधार्थियों के वक्तव्य पहले सुने जाते और फिर हम जो दस-बारह लोग विषय विशेषज्ञ के रूप में आमंत्रित थे उनके बीच एक गोलमेज संवाद जैसी कोई व्यवस्था होती तो कार्यक्रम को एक दिशा मिलती और संयुक्त वक्तव्य जैसी कोई पहल संभव हो पाती।

देशबंधु में 12 सितम्बर 2013 को प्रकाशित