Wednesday, 5 November 2014

नेहरू बनाम पटेल क्यों?


 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की जयंती पर कहा कि महात्मा गांधी सरदार पटेल के बिना अधूरे थे। इस वक्तव्य का निहितार्थ समझना कठिन नहीं है। श्री मोदी प्रधानमंत्री बनने के पहले से सरदार पटेल का पुनराविष्कार और पुनप्र्रतिष्ठा स्थापित करने के अभियान में लगे हुए हैं। गोया कि ऐसा करने की कोई आवश्यकता थी! वे सरदार सरोवर के बीच लौहपुरुष की लौह प्रतिमा लगवाने जा रहे हैं जो विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। उन्होंने 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस भी घोषित कर दिया है और जिस तरह गांधी जयंती पर प्रधानमंत्री के आह्वान पर देशवासी झाड़ू लेकर सड़क पर निकल आए थे उसी तरह 31 अक्टूबर को वे राष्ट्रीय एकता हेतु दौडऩे के लिए एक बार फिर सड़कों पर उतर आए। इसके अलावा नागरिकों ने राष्ट्रीय एकता कायम करने के लिए शपथ भी ली। अगर इस तरह दौडऩे और शपथ लेने मात्र से कोई उद्देश्य पूरा हो सकता हो तो फिर कहना ही क्या है। हमें ध्यान आता है कि राजीव गांधी की जयंती पर भी सरकारी कर्मचारी शपथ लेते हैं और दौडऩे का आयोजन तो साल भर बदस्तूर कहीं न कहीं चलते रहता है। कभी-कभी लगता है कि सरकारी ईवेन्ट मैनेजरों की कल्पनाशक्ति चुक गई है।

खैर! प्रधानमंत्री का यह भावातिरेक गौरतलब है कि गांधीजी सरदार के बिना अधूरे थे। दूसरे शब्दों में सरदार पटेल महात्मा गांधी के पूरक थे। हमारी समझ में यह सोच तो स्वयं सरदार की कभी नहीं रही होगी। हम जितना जानते हैं उसके अनुसार वे गांधीजी के प्रिय और विश्वस्त साथी बल्कि शिष्य थे। लेकिन क्या यही बात पंडित नेहरू पर लागू नहीं होती? महात्मा गांधी ने आज़ादी  की लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए यूं तो करोड़ों लोगों को प्रेरित किया था, लेकिन उनका जो हरावल दस्ता था उसमें नेहरू, पटेल, राजाजी, मौलाना आज़ाद, सुभाषचंद्र बोस, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद व विनोबा भावे जैसे कुछ नाम प्रमुखता के साथ लिए जा सकते हैं। इस अग्रिम पंक्ति में से एक नेताजी थे जिन्होंने कतिपय कारणों से अपना अलग रास्ता चुन लिया था, लेकिन बाकी सब तो बापू के साथ अंत तक रहे और जिसको जैसी जिम्मेदारी मिली उसका निर्वाह उसने किया।

पंडित नेहरू व सरदार पटेल के आपसी संबंधों तथा राजनीतिक कौशल अथवा क्षमताओं को लेकर कुछ भ्रांत धारणाएं जनमानस में फैलाने की कोशिश लंबे समय से की जा रही है। जो लोग इस उपक्रम में लगे हैं उनसे सबसे पहले तो यही पूछा जाना चाहिए कि महात्मा गांधी ने सरदार पटेल को अपना उत्तराधिकारी घोषित क्यों नहीं किया? या उन्हें प्रथम प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाया? यह सवाल भी उठता है कि यदि पंडित नेहरू और सरदार पटेल के बीच ऐसे गहरे मतभेद थे, तो फिर दोनों ने सरकार में साथ-साथ काम क्यों किया? यह ठीक है कि इन दोनों महान नेताओं के बीच राजकाज को लेकर विचार-वैभिन्न्य होता होगा, लेकिन यह भी देखना चाहिए कि नवस्वतंत्र देश के सामने उपस्थित बड़े मसलों पर दोनों ने एकराय होकर निर्णय लिए और उन्हें लागू किया।

सरदार पटेल को उचित ही श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने देशी रियासतों के विलीनीकरण में दृढ़ भूमिका निभाई जिसके चलते ही उन्हें लौहपुरुष के विशेषण से सम्मानित करते हैं। इसकी पृष्ठभूमि में दो कारकों का उल्लेख करना उचित होगा। एक तो यह कि सरदार पटेल स्वतंत्र भारत की सरकार के प्रतिनिधि के रूप में इस प्रक्रिया को अंजाम दे रहे थे याने शासन की शक्ति उनके पास थी। दूसरे, देशी रियासतों में लंबे समय से प्रजामंडल आंदोलन चल रहा था, जिसके अधिकतर कार्यकर्ता कम्युनिस्ट थे। रियासत में रहते हुए इन लोगों ने जो संघर्ष किया उससे भी राजे-रजवाड़े हिल चुके थे। आशय यह कि उनके सामने भारत संघ में विलय करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था।

यह आरोप भी लगाया जाता है कि नेहरू जी के कारण कश्मीर का मामला उलझ गया। जिन्हें इतिहास की जानकारी नहीं है वे ही ऐसा कह सकते हैं। कश्मीर में राजा हिन्दू, बहुसंख्यक प्रजा मुस्लिम; इसके विपरीत हैदराबाद में निजाम याने राजा मुसलमान और प्रजा हिन्दू। यदि राजा द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर को पूर्ण मान्यता दी जाती तो निजाम को पाकिस्तान के साथ मिलने से कैसे रोका जाता? यदि हैदराबाद की हिन्दू प्रजा भारत में मिलने की इच्छुक थी तो कश्मीर की मुस्लिम आबादी को पाकिस्तान के साथ जाने से कैसे रोका जाता? इसके अलावा एक और उल्लेखनीय तथ्य है कि आज जिसे हम पाक अधिकृत कश्मीर कहते हैं उसे राजा हरिसिंह ने चंद बरस पहिले 1938-39 में खरीदा था। याने उस इलाके की जनता का इधर के कश्मीर के साथ या भारत के साथ कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं था। पंडित नेहरू और सरदार पटेल दोनों इन सारे तथ्यों को जानते थे। उन्हें यह भी पता था कि उस तरफ के हिस्से को अगर सैन्य बल से जीत भी लेते तो उसे ज्यादा दिन साथ नहीं रख सकते थे। याद कीजिए कि 1971 में भारतीय सेनाएं लाहौर के दरवाजे तक पहुंच चुकी थीं, फिर भी उसे लौटना पड़ा।

एक अन्य आरोप बार-बार लगाया जाता है कि नेहरू-गांधी परिवार के शासनकाल में सरदार पटेल और नेताजी जैसे शीर्ष नेताओं की जानबूझ कर उपेक्षा की गई क्योंकि वे नेहरूजी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे। यह भी एक अनर्गल आरोप है। नेताजी ने तो गांधीजी से नाराज होकर कांग्रेस से अपना नाता तोड़ लिया था। फिर वे भारत की आज़ादी में सहयोग लेने के लिए जर्मनी में हिटलर और जापान में जनरल तोजो के पास भी चले गए थे। 1945 में विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया था। इन तथ्यों की रोशनी में पंडित नेहरू के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता का कोई प्रश्न ही नहीं था। सरदार पटेल और नेहरूजी के संबंधों की चर्चा हम ऊपर कर आए हैं। यहां एक स्मरणीय तथ्य है कि सरदार पटेल की सेवाएं स्वतंत्र देश को मात्र तीन वर्ष तक ही मिल सकीं। 1950 में तो उनका निधन ही हो गया। फिर भी सरदार पटेल हों या नेताजी, मैं नहीं समझता कि इन दोनों का सम्मान करने में देश की जनता ने या जनता के द्वारा चुनी सरकार ने कोई कोताही बरती हो। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि कांग्रेस ने सरदार पटेल की सुपुत्री मणिबेन एवं सुपुत्र डाह्या भाई पटेल दोनों को पहिले लोकसभा में फिर राज्यसभा में भेजा। मणिबेन तो गुजरात प्रदेश कांग्रेस की उपाध्यक्ष भी रहीं। आज से पैंसठ साल पहले मैं जब स्कूल का विद्यार्थी था तब भी इन दोनों महापुरुषों की जीवनी सरकारी स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में शामिल थीं और जहां तक मेरी जानकारी है आज भी वही स्थिति है।

इन दोनों का उल्लेख सिर्फ पाठ्य पुस्तकों में होता हो यह भी नहीं है। स्कूल, कॉलेज, सरकारी दफ्तर इत्यादि अनेक सार्वजनिक स्थानों पर गांधीजी के साथ नेहरू, पटेल और सुभाष- इन तीनों की मढ़ी हुई तस्वीरें पहले भी देखने मिल जाती थीं और आज भी। इनके अलावा भगत सिंह और विवेकानन्द के चित्र भी देखने मिलते हैं। इनकी प्रतिमाएं भी देश के कोने-कोने में स्थापित की गई हैं। रायपुर में तो गांधीजी के पहले सुभाष बाबू की प्रतिमा लग चुकी थी, जबकि नेहरूजी की प्रतिमा बहुत बाद में लगी। याद कीजिए, कि मध्यप्रदेश में सचिवालय का नया परिसर निर्मित हुआ तो उसका नाम वल्लभ भवन रखा गया। राष्ट्रीय पुलिस अकादमी का नामकरण भी उनकी स्मृति में किया गया है। गुजरात में वल्लभ विद्यानगर बसाया गया है। कुल मिलाकर इनके योगदान को भुलाने के लिए, इन्हें जनस्मृतियों से विलोपित करने के लिए कोई षडय़ंत्र किया गया हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। फिर भी मैं माननीय प्रधानमंत्रीजी का आभार मानना चाहता हूं कि उनके कारण मुझे इन प्रात: स्मरणीय नेताओं के बारे में एक बार फिर विचार करने का अवसर मिला।
देशबन्धु में 06 नवंबर 2014 को प्रकाशित