Wednesday, 3 June 2015

मोदीजी और उनके मंत्री


एक साल पहिले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार बनाई थी तब मंत्रियों का चयन करने में उनकी अपनी इच्छा ही उसका सर्वोपरि एवं एकमात्र आधार थी। इसमें उन्होंने न तो संघ की चलने दी थी और न ही पार्टी की। श्री मोदी जिन्हें चाहते थे, पसंद करते थे, जिनकी क्षमता और निष्ठा पर भरोसा था, वे ही मंत्रीपद पा सके; जिनके प्रति उनके मन में रंचमात्र भी खुटका था, उन्हें बाहर करने में उन्होंने कोई आगा-पीछा नहीं किया। जो कथित फार्मूला लालकृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी पर लागू किया गया, उसे नज़्मा हेपतुल्लाह के प्रसंग में छोड़ दिया गया। राजनैतिक इतिहास के विद्यार्थियों को याद होगा कि 1977 में जनता पार्टी की सरकार जब बनी थी, तब जनसंघ के कोटे से किसे लिया जाए, इस पर संघ की ही मर्जी चली थी और जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो उन्हें भी संघ की मर्जी के आगे शीश नवाकर मंत्रिमंडल में फेरबदल करने पर मजबूर होना पड़ा था। नरेंद्र मोदी को खुला हाथ मिल सका तो उसका प्रमुख कारण यही था कि उनके नेतृत्व में भाजपा ने स्पष्ट विजय हासिल की थी।

बहरहाल, एक साल बीत चुका है। इस बीच प्रधानमंत्री को अपने मंत्रियों की कार्यदक्षता नापने के अनेक अवसर मिले होंगे। अपनी विजय की पहिली वर्षगांठ पर वे शायद यह मंथन भी कर रहे होंगे कि देश-विदेश में किस मंत्री के कामकाज से सरकार की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और किसके कार्य से अनुकूल संदेश नहीं गया। श्री मोदी यह अच्छी तरह जानते हैं कि जनता से उन्होंने एक बेहतर भविष्य की रचना के लिए बड़े-बड़े वायदे किए हैं और अब वक्त आ गया है कि उन पर गंभीरता के साथ अमल किया जाए। गत एक वर्ष में पहिले सौ दिन तो वैसे ही हनीमून में बीत गए थे, अगले सौ दिन भी खुमारी बनी हुई थी, लेकिन देखते ही देखते वह समय आ गया जब मतदाताओं ने पूछना शुरु कर दिया कि वायदे कब पूरे होंगे। अब आप न तो पिछली सरकारों पर सारा दोष डाल कर अपना बचाव कर सकते हैं और न ही अपनी अनुभवहीनता को कवच बना सकते हैं। अब न जुमले काम आएंगे, न नारे और न लच्छेदार भाषण। अपने कार्यकाल के  दूसरे साल में सरकार को ऐसे ठोस कदम उठाना ही होंगे जिनसे देश के संविधान की मर्यादा एवं जनांकाक्षाओं के अनुरूप तरक्की का रास्ता खुल सके।

यह स्पष्ट है कि मोदीजी ने अपने मंत्रिमंडल का गठन करते समय यथाशक्य संतुलन साधने की कोशिश की थी। एक ओर उन्होंने पार्टी के कई अनुभवी एवं वरिष्ठ सहयोगियों को सरकार में शामिल किया तो दूसरी ओर अनेक नए चेहरों को भी स्थान मिला। अनुभवहीन सदस्यों को मंत्री बनाना एक व्यवहारिक आवश्यकता भी थी क्योंकि अधिकतर सांसद पहिली बार चुनकर आए थे। सरकार में क्षेत्रीय भावनाओं का भी ध्यान रखा गया है तथा एनडीए के घटक दलों को भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया ही गया है। प्रारंभ में एक गड़बड़ी तब हुई थी जब अरुण जेटली को वित्त एवं प्रतिरक्षा दो भारी-भरकम विभाग एक साथ सौंप दिए गए थे। कालांतर में इस स्थिति को दुरुस्त करने का उपक्रम तो हुआ किंतु आभास होता है कि श्री मोदी को श्री जेटली से बढक़र भरोसा अन्य किसी पर नहीं है। मंत्रिमंडल को अधिक पुरअसर बनाने का एक प्रयत्न बीच में हुआ जब मनोहर पार्रीकर व सुरेश प्रभु क्रमश: प्रतिरक्षा एवं रेलवे मंत्री के रूप में लाए गए। ये दोनों उज्जवल छवि के धनी रहे हैं और अभी भी उम्मीद की जाती है कि ये कसौटी पर खरे उतरेंगे।

अभी कुल मिलाकर यह दिखता है कि राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, मेनका गांधी व अरुण जेटली जैसे वरिष्ठ व अनुभवी मंत्री पार्टी की नीतियों के मुताबिक अपना-अपना काम ठीक से सम्हाल रहे हैं। मैंने उपरोक्त नाम वरिष्ठता क्रम में लिए हैं, महत्व के क्रम में नहीं। इसी तरह वैंकया नायडू व नितिन गडक़री आदि पार्टी वरिष्ठों को जो विभाग सौंपे गए हैं, उनके बारे में भी सामान्यत: धारणा अनुकूल बनी हुई है। इसमें एक और अनुभवी मंत्री रामविलास पासवान का नाम भी जोड़ा जा सकता है जो घटक दल से हैं। ध्यान रखें कि इनमें से किसी के भी विभाग की विस्तृत चर्चा करना यहां मेरा अभीष्ट नहीं है। ये सब भारतीय राजनीति के जाने-पहिचाने चेहरे हैं और कहना होगा कि इन्हें स्वयं को चर्चा में बनाए रखने की कला भी आती है।इनमें से एक मेनका गांधी को छोडक़र बाकी सब की सक्रिय उपस्थिति रंगमंच पर बनी हुई है। इन्हें आप यदा-कदा पार्टी/सरकार के प्रवक्ता के रूप में भी देख सकते हैं। इस प्रकार कोई एक दर्जन मंत्रियों को छोडक़र मोदी सरकार में और कौन-कौन मंत्री हैं, किसके पास क्या विभाग हैं और वे क्या कर रहे हैं, इस बारे में जनता लगभग अनभिज्ञ है। प्रतीत होता है जैसे फिल्मों में एक्स्ट्रा होते हैं, कुछ वैसी ही भूमिका अधिकतर मंत्रियों को निर्माता निर्देशक द्वारा सौंप दी गई है।

यदि वरिष्ठ मंत्रियों की सूची में मेनका गांधी के इस समय नेपथ्य में चले जाने का अनुमान होता है तो मानों उस कमी की भरपाई करने के लिए दो अन्य नेत्रियां याने स्मृति ईरानी एवं निर्मला सीतारमन मंच पर सक्रिय भूमिका में दिखाई दे रही हैं। श्रीमती सीतारमन के पास जो विभाग है, उसका आम जनता से सीधा कोई लेना-देना नहीं है और न ही उसका रोजमर्रा के जीवन पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव है, फिर भी जब अवसर मिलता है, वे अपने राजनैतिक कौशल का परिचय देने में नहीं चूकतीं। दूसरी ओर स्मृति ईरानी का विभाग ही ऐसा है, जहां हर दिन उन्हें जनता के सामने जवाब देना होता है। शिक्षा याने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अलावा एक और विभाग है जिसका प्रत्यक्ष सरोकार इस प्राचीन देश की विरासत, परंपरा व सोच से जुड़ता है। इसे हम संस्कृति एवं पर्यटन विभाग के नाम से जानते हैं। इसे फिलहाल पहिली बार सांसद बने डॉ. महेश शर्मा सम्हाल रहे हैं। हमें वह समय याद है जब शिक्षा और संस्कृति के विषय एक ही मंत्रालय के अधीन थे। जिसके मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसा शीर्ष स्थानीय नेता थे। आगे चलकर राजीव गांधी के कार्यकाल में पी.वी. नरसिम्हाराव मानव संसाधन विकास मंत्री  बने तथा शिक्षा व संस्कृति के अलावा स्वास्थ्य एवं रोजगार विभाग भी उन्होंने सम्हाला।

1991 में पी.वी. नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अपने पुराने विभाग का दायित्व अर्जुनसिंह को सौंपा। श्री सिंह तब महज तीन साल ही मंत्री रहे, लेकिन उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को एक नई पहचान व ऐसी ऊंचाई दी कि वाजपेयी सरकार में मुरली मनोहर जोशी ने अपनी वरिष्ठता को आधार बनाकर, यही मंत्रालय स्वयं होकर लिया। इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक नितांत अनुभवहीन व्यक्ति को इस भारी-भरकम विभाग का मंत्री क्यों बनाया, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। ऐसी चर्चा सुनने में आई थी कि सुषमा स्वराज का कद कम करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया था। दूसरे, यह भी हो सकता है कि प्रधानमंत्री को सुश्री ईरानी ने अपनी वाक्पटुता, चपलता और जुझारू तेवरों से प्रभावित किया हो। जो भी हो, आज यह सोचने का माकूल अवसर है कि स्मृति ईरानी अपने दायित्व का निर्वहन अपेक्षा के अनुरूप कर पा रही हैं या नहीं! यहां स्मरणीय है कि डॉ. मनमोहन सिंह ने अर्जुन सिंह के विभाग में काट-छांटकर संस्कृति विभाग को अलग कर दिया था। आज यह जिम्मा डॉ. महेश शर्मा पर है। अत: सुश्री ईरानी के साथ-साथ डॉ. शर्मा के कार्य की समीक्षा भी प्रधानमंत्री कर लें तो उचित होगा।

यह हम मानते हैं कि एक सत्तारूढ़ दल को अपने सिद्धांतों के अनुसार राजकीय नीति व कार्यक्रम बनाने का अधिकार है, विशेषकर तब जबकि उसके पास स्पष्ट जनादेश है। लेकिन जनतंत्र की खूबसूरती इसमें है कि अल्पमत रखने वालों की भावनाओं का भी समादर किया जाए, अन्यता बहुमत बहुसंख्यकवाद में तब्दील होते देर नहीं लगेगी। इस दृष्टि से वर्तमान भाजपा सरकार की अनेक नीतियों एवं कार्यक्रमों से एक बड़े वर्ग का मतभेद हो सकता है और है। फिलहाल उस सैद्धांतिक विमर्श की चर्चा न भी करें तो भी यह प्रश्न तो उठता ही है कि जिन दो विभागों को लेकर केंद्र सरकार की लगातार आलोचना हो रही है, जिनमें स्वीकृत प्रक्रियाओं का बारंबार उल्लंघन होने के कारण असंतोष फैल रहा है एवं सरकार की नीयत तक पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनके बारे में प्रधानमंत्री का क्या रुख है? मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ही बात करें तो सरकार को यह बताना चाहिए कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में नियुक्ति के लिए बनी अनिल काकोडक़र समिति की सिफारिशें किस आधार पर खारिज की गईं। अगर सरकार श्री काकोडक़र की विद्वता व अनुभव का समादर नहीं कर सकती तो फिर और कौन बचता है? फिर ऐसा क्यों है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों आदि में शीर्ष पदों पर नियुक्तियां एक साल से रुकी हुई हैं? इन प्रकरणों से यही संदेश जाता है कि स्मृति ईरानी शब्दवीर भले हों, कर्मवीर तो बिल्कुल नहीं हैं।

संस्कृति मंत्रालय को देखें तो राज्यसभा के पिछले सत्र में ही ललित कला अकादमी के अध्यक्ष को गलत तरीके से हटा देने का मामला उठा। जिस पद पर नियुक्ति स्वयं राष्ट्रपति करते हों, क्या उनसे बिना परामर्श के उस अधिकारी को हटाया जा सकता है? ऐसा करने से किसका हित साधन हो रहा है? इसी भांति राष्ट्रीय संग्रहालय के निदेशक को भी यकबयक हटा दिया गया। स्वयं मंत्री ने कहा कि निदेशक सक्षम व्यक्ति थे। फिर उन्हें हटाने की आवश्यकता क्यों आन पड़ी? सबसे विचित्र निर्णय तो स्मृति ईरानी के मंत्रालय में नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष पद को लेकर हुआ। मोदी सरकार चाहती तो संघ या भाजपा के प्रति निष्ठा रखने वाले किसी गुणी सुपात्र यथा नरेंद्र कोहली या प्रभाकर श्रोत्रिय को एनबीटी का अध्यक्ष बना सकती थी, लेकिन बनाया भी तो बलदेवभाई शर्मा को जो अनुभवी पत्रकार हैं किंतु जिनकी साहित्य जगत में किंवा पुस्तकों की दुनिया में कोई पहचान नहीं है। अगर ऐसे तमाम निर्णय प्रधानमंत्री की इच्छा से हो रहे हैं तो हम सिर्फ विरोध प्रकट कर सकते हैं, किंतु फिर इससे उनकी अपनी छवि में कोई इज़ाफ़ा नहीं होता।
देशबन्धु में 4 जून 2015 को प्रकाशित