Thursday, 11 June 2015

मैगी : बात सिर्फ इतनी नहीं है


 


स्विट्जरलैंड स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनी नैस्ले के डिब्बाबंद उत्पाद मैगी पर भारत में एकाएक हल्ला मचा कि सिर्फ दो मिनिट में पकने वाला बच्चों को अतिप्रिय यह खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक है; आनन-फानन में कई प्रदेशों ने इसका प्रयोगशाला में परीक्षण करवाया और देखते ही देखते केंद्र सरकार ने भी मैगी को विषाक्त मानते हुए इस पर प्रतिबंध लगा दिया। उत्पादक कंपनी ने भी भारतीय बाज़ार से मैगी को वापिस ले लिया है। इस बीच यह प्रश्न भी उठा कि मैगी के हानिकारक होने का मुद्दा सबसे पहिले किसने उठाया और उसका श्रेय अन्य किसी ने कैसे ले लिया। तीन फिल्मी सितारों पर मैगी का प्रचार करने के लिए केस भी दर्ज किए गए। सच पूछिए तो विवाद की शुरुआत तो वहीं से हुई, किंतु एक हफ्ते के भीतर ही जो तूफान उठा तो फिल्म अभिनेता विवाद के केंद्र से खामोशी के साथ बाहर हो गए। फिर ट्विटर पर एक टिप्पणी आई कि आज भले ही इस नूडल या सेंवईनुमा पदार्थ पर रोक लग गई हो, बहुत जल्दी सब आरोपों से बरी होकर मैगी भारतीय बाज़ार में वापिस आ जाएगी। जनरल एच.एस. पनाग की टिप्पणी से मैं स्वयं को सहमत पाता हूं।

मुझे ध्यान आता है कि 1977 की जनता सरकार के  उद्योग मंत्री और एक समय के जुझारू मजदूर नेता जॉर्ज फर्नांडीज़ ने कोकाकोला पर इसी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। उसके बाद क्या हुआ? आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा निर्मित तमाम शीतल पेय हिंदुस्तानके बाज़ार में न सिर्फ उपलब्ध हैं, बल्कि बढ़-चढ़ कर व्यापार कर रहे हैं। ये कंपनियां देश के सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट के मैचों की शृंखलाओं का प्रायोजन करते हैं और सारे नामी-गिरामी क्रिकेट खिलाड़ी इनके नाम की टी-शर्ट और टोपी पहिनकर घूमते नज़र आते हैं। दूसरी ओर जॉर्ज साहब पर अपने जिन मित्र रमेश चौहान (पार्ले-जी वाले) के शीतल पेय व्यापार में सहायता पहुंचाने का आरोप लगाया गया था, वे उस व्यापार से पूरी तरह बाहर हो चुके हैं। उनके जैसी स्थिति अन्य देशी शीतल पेय निर्माताओं की भी हुई। तीस साल पुराने विज्ञापन में एक बच्चा खाने की मेज पर जिस शीतल पेय को देखकर मुदित हो उठता है-‘‘ओह! थम्स अप, इनस्टैड ऑफ वाटर’’ (अहा, पानी के बजाय थम्स अप), उस थम्स अप और उस जैसे 77 आदि का अब नाम भी सुनने नहीं मिलता। याने जनता को ‘मैगी’ पर प्रतिबंध लग जाने मात्र से खुश नहीं हो जाना चाहिए। यह एक वृहत्तर प्रश्न है, जिसके अनेक आयाम हैं और वक्त है कि उन पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए।

सबसे पहिले तो हमें मानना होगा कि किन्ही अर्थों में दुनिया सचमुच सिकुड़ चुकी है और उस के अनुरूप हम किसी हद तक विश्वग्राम के वासी बन चुके हैं। अब यात्राएं करना पहिले की अपेक्षा अत्यन्त सुगम है तथा सूचनाओं व वस्तुओं के विनिमय में भी अभूतपूर्व तेजी आ गई है। इस नई परिस्थिति ने मनुष्य के मन में नई इच्छाएं एवं नई लालसाएं जागृत कर दी हैं। इतिहास के पथ पर हम आगे बढ़ आए हैं और उसी रास्ते पर वापिस लौटना नामुमकिन है। इसलिए आज ऐसी बात करने का कोई अर्थ नहीं है कि भारत की जनता पाश्चात्य देशों के खाद्यान्नों का सेवन न करे। अगर इस सलाह को मान लिया तो मक्का, आलू, टमाटर बैंगन, मिर्ची, चीकू, बिही या अमरूद जैसी वस्तुओं का त्याग करना होगा, क्योंकि इनका मूलस्थान लैटिन अमेरिका में है।  हमें लीची, शक्कर या चीनी, चाय का भी सेवन बंद करना पड़ेगा, क्योंकि ये चीन से आई हैं। और क्या हमने अन्य देशों को अपने उत्पाद निर्यात नहीं किए? याने मामला दोतरफा है। जहां जिसे जो सामग्री जंच जाए, वह प्रचलन में आ जाती है। फिर वह कॉफी हो या चॉकलेट, पिज़्ज़ा हो या नूडल्स, टाकोस हो या डबलरोटी, समोसा हो या केक। अगर यह बिंदु स्पष्ट हो गया है तो मैगी प्रकरण पर चर्चा आगे बढ़ाई जा सकती है।

हमें यह भी स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि सारी दुनिया के साथ-साथ भारतीय समाज की जीवनशैली में भी भारी बदलाव आया है और आते जा रहा है। संयुक्त परिवार की सराहना अवधारणा के स्तर पर की जा सकती है, लेकिन विचार करना ही होगा कि वह आज किस सीमा तक व्यवहारिक है। प्रेमचंद ने सौ साल पहिले बेटोंवाली विधवा व अलग्योझा जैसी कहानियां लिख दी थीं, आज नाभिकीय परिवार एक जीती-जागती वास्तविकता है। इस परिवार में घर की देखभाल कौन करे, खासकर तब जबकि पत्नी भी कामकाजी स्त्री हो; भारतीय पति तो वैसे भी घर का काम करने में अपनी हेठी समझता है। फिर बच्चों का अपना संसार है। पहिले की भांति स्कूल घर के नजदीक नहीं है। अच्छे स्कूल के लालच में सुकोमल बच्चों को सुबह-शाम मिलाकर दो-दो घंटे तक स्कूल बस में बिताना पड़़ सकते हैं। इस स्थिति में पति का टिफिन, खुद का टिफिन, बच्चे का टिफिन, रात का भोजन, सब कुछ सम्हालना कितना कठिन हो गया है, कौन नहीं जानता। अगर आप अपेक्षा करें कि थकी-हारी औरत घर में सेंवई, पापड़, बड़ी, मठरी, खाजा, गुझिया भी बनाए तो क्या यह उसके साथ अन्याय नहीं होगा? ऐसे में टू-मिनिट मैगी या फिर पिज़्ज़ा की घर पहुंच सेवा ही अक्सर काम आती है।

यहां एक नया प्रश्न खुलता है- नूडल्स या पिज़्ज़ा ही क्यों? इसके उत्तर के दो पक्ष हैं। एक-जो हमारे देसी फास्ट फुड व्यंजन हैं, क्या वे सचमुच पौष्टिक व स्वास्थ्यवद्र्धक हैं? क्या समोसा खाना पिज्काा खाने के मुकाबले बेहतर है? आहार विशेषज्ञ बताते हैं कि भारतीय व्यंजनों में भी तेल-मसालों का बहुतायत से प्रयोग होता है जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। हमारे चिकित्सक एवं आहार विशेषज्ञ फल व सलाद का सेवन करने की सलाह देते हैं। किंतु क्या कार्बाइड में या रसायनों में पके आम व केले नुकसानदेह नहीं हैं? घर में ताजा काटी गई सलाद तक तो ठीक है, लेकिन होटलों एवं दावतों में परोसी गई सलाद को तो छूना भी नहीं चाहिए। न जाने कैसे पानी में, कैसे हाथों से सुधारी जाती है! दो- हम स्वयं विज्ञापनों से आकर्षित एवं प्रभावित होते हैं। बच्चों का प्रभावित होना तो फिर स्वाभाविक ही है। जिन खाद्य पदार्थों के विज्ञापन टीवी पर आते हैं, वे ब्रांडेड होते हैं। जितना अच्छा विज्ञापन, उतना बढिय़ा प्रभाव, उतनी उम्दा खपत। अगर मुझे ठीक याद है तो 1950 के दशक में यूनिलीवर के डालडा के विज्ञापन के साथ ब्रांडेड सामग्री का प्रचार प्रारंभ हुआ था। रेडियो सीलोन पर प्रति बुधवार रात प्रसारित बिनाका गीतमाला उस प्रारंभिक समय में प्रभावशाली विज्ञापन का एक दूसरा उदाहरण था।
मुझे याद आता है कि किसी समय सुप्रसिद्ध अभिनेता अशोक कुमार जबलपुर में निर्मित शेर छाप बिड़ी नं. 7 के विज्ञापन में अवतरित होते थे। इसलिए आज यदि अमिताभ बच्चन, माधुरी दीक्षित अथवा प्रीति जिंटा मैगी का विज्ञापन कर रहे हैं तो वे एक स्थापित परंपरा का ही पालन कर रहे हैं। लेकिन क्या इनका ऐसा करना उचित है? हमारे देश में फिल्म और क्रिकेट के सितारों को जनता सिर-आंखों पर बैठाकर चलती है। वे हमारे लिए नवयुग के देवता हैं। वे चूंकि पत्थर के देवता नहीं हैं, इसलिए उनसे यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि किसी भी वस्तु या विषय का प्रायोजन करने में अपने विवेक का इस्तेमाल करेंगे। वे अपनी सामान्य सूझबूझ को ताक पर रखकर पैसे के मोह में गलत वस्तु का प्रचार करने लगेंगे, ऐसा उनके बारे में तो हम नहीं सोचते। लेकिन कटु वास्तविकता यही है कि मैगी इत्यादि का विज्ञापन करते समय हमारे इन नायक-नायिकाओं ने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया। एक समानांतर उदाहरण ले लीजिए- अमिताभ, सचिन, ऐश्वर्या इत्यादि ने सहारा समूह के ब्रांड एम्बेसेडर के बतौर काम किया। आज सहारा के कत्र्ता-धर्ता कहां हैं? ये तमाम सितारे अरबपति न सही, करोड़पति तो अवश्य हैं, फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि बिना छान-बीन किए ये किसी के भी लिए विज्ञापन  करने तैयार हो जाते हैं? इस मनोवृत्ति को धिक्कार है।

अब बात उठती है सरकार की जिम्मेदारी की।  वर्तमान प्रधानमंत्री ने पद सम्हालते साथ सुशासन का वायदा किया था। सुशासन का एक अनिवार्य पक्ष है कि जनता स्वस्थ रहे। यदि किसी भी भोज्य पदार्थ से सेहत पर विपरीत असर पड़ता है तो उसकी रोकथाम सरकार को ही करना होगी। खाद्यान्नों की गुणवत्ता जांचने के लिए नगरीय निकायों से लेकर केंद्र तक यथोचित व्यवस्थाएं होना चाहिए। मैं याद करता हूं कि 1969-70 मुंबई के एक बाहर से साधारण दिखने वाले रेस्तोरां को ग्रेड-1 भोजनालय का दर्जा प्राप्त था, जबकि एक जगमग रेस्तोरां को ग्रेड-2 का। महानगरपालिका ने चकाचौंध की बजाय भोजन की गुणवत्ता को प्राथमिकता दी थी। अब ऐसा कड़ा परीक्षण कहीं भी नहीं होता। पांच सितारा होटलों तक का खाना खाकर लोग बीमार पड़ते हैं। सच कहें तो आजकल हर स्तर के सरकारी कर्मचारी सिर्फ अपने लिए जीते हैं। वेतन मानों उनका मौलिक अधिकार है। काम करने की फीस अलग से लगती है। इस व्यवस्था में चौपाटी व फुटपाथ के ढाबे, रेस्तोरां, चाट भंडार, ठेले अपनी हैसियत के अनुरूप सरकारी अमले को खुश करके रखते हैं तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां तथा अन्य नामी उत्पादक अपने स्तर पर सारा प्रबंध कर लेते हैं। शीतल पेयों में भूजल से आए कीटनाशक की मिलावट होती है तो होती रहे और मैगी खाने से स्वास्थ्य बिगड़ता है तो बिगड़े, यहां परवाह किसे है? जिस सरकार ने उपभोक्ता को एक विशिष्ट दर्जा देकर उपभोक्ता अदालतें कायम कीं लेकिन बरसों-बरस न्यायाधीश नियुक्त नहीं किए तो उससे कितनी उम्मीद रखें?
 

देशबन्धु में 11 जून 2015 को प्रकाशित