Wednesday, 20 January 2016

सम-विषम : सफल प्रयोग, आगे क्या?


 दिल्ली में केजरीवाल सरकार द्वारा प्रायोगिक तौर पर प्रारंभ किया गया सम-विषम फार्मूला 15 जनवरी को स्थगित हो गया है। अब आगे क्या होगा इस बारे में विचार-विमर्श चल रहा है। इस प्रयोग से जो कुछ मुख्य बातें उभर कर आईं उन्हें शायद इस प्रकार रखा जा सकता है-
1. सम-विषम फार्मूला के कारण उन पंद्रह दिनों में दिल्ली की सड़कों पर प्रतिदिन दस लाख वाहन कम उतरे। इससे सड़कों पर भीड़ कम हुई व ट्रैफिक जाम जैसी समस्या अमूमन देखने नहीं मिली।
2. पर्यावरण के मुद्दे पर गंभीर काम करने वाली संस्था सीएसई ने दावा किया कि इस एक पखवाड़े में दिल्ली में प्रदूषण के स्तर में कमी आई। संस्था की साख को देखते हुए इस पर विश्वास करना चाहिए।
3. भारतीय जनता पार्टी व कांग्रेस दोनों ने इस प्रयोग का विरोध करने अथवा मजाक उड़ाने में कोई कमी नहीं की। उन्होंने यह नहीं बताया कि प्रदूषण कम करने के लिए इन पार्टियों के पास क्या फार्मूला है।
4. कार्पोरेट मीडिया में भी अधिकतर इस प्रयोग का उपहास ही किया गया। गोकि बाद-बाद में दबे स्वर में उसने स्वीकार किया कि यह प्रयोग सही दिशा में था।
5. सम-विषम प्रयोग को देश के सर्वोच्च न्यायालय का जो समर्थन मिला वह निश्चय ही मनोबल बढ़ाने वाला था। दिल्ली उच्च न्यायालय में किसी की याचिका स्वीकार होने के बाद संशय होने लगा था, लेकिन अंतत: उसने भी इस मामले में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया।
6. देश की राजधानी के सुविधाभोगी वर्ग को इस प्रयोग से सबसे अधिक परेशानी हुई। यह वही वर्ग है जो सार्वजनिक यातायात के लिए बस कॉरीडोर का विरोध करते रहा है। इन्हें लगता है कि सड़कें सिर्फ इन्हीं के लिए बनाई गई हैं।
7. यह एक छोटा सा प्रयोग था जिसकी अवधि थी मात्र पंद्रह दिन की। इसमें भी वीआईपी समेत कईयों को छूट दे दी गई थी। अमेरिका सहित अनेक दूतावासों ने प्रयोग का स्वागत किया, किन्तु एक भी वीआईपी ने अपना विशेषाधिकार छोडऩा उचित नहीं समझा।
8. इस अवधि में बसों और मेट्रो के फेरे बढ़ाए गए याने निजी वाहनों को कम कर सार्वजनिक यातायात को बढ़ावा दिया गया।

प्रदूषण के दैत्य से दिल्लीवासियों को बचाने के लिए अरविंद केजरीवाल को दीर्घकालीन व स्थायी उपायों पर विचार करने की आवश्यकता है। सच तो यह है कि यह समस्या न तो सिर्फ श्री केजरीवाल की है और न सिर्फ दिल्लीवासियों की। भारत सरकार के अलावा विभिन्न राज्यों की सरकारों व सभी पार्टियों को इस बारे में मिल-बैठ कर सोचने की आवश्यकता है। सत्तारूढ़ भाजपा व प्रमुख विपक्ष कांग्रेस पर तो इसका मुख्य दायित्व तो है ही; समस्या के वैज्ञानिक व तकनीकी पक्ष को समझने वाले विशेषज्ञों को भी विचार और निर्णय की प्रक्रिया में शामिल करने से ही आगे का रास्ता निकलेगा। एक उदाहरण दिया जा सकता है। दिल्ली में ही प्रदूषण कम करने के लिए बसों में डीजल की जगह सीएनजी उपयोग करने हेतु सीएसई ने सुप्रीम कोर्ट तक जाकर लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की। इसका लाभ लंबे समय तक दिल्ली को मिला। दिल्ली साइंस फोरम जैसी संस्थाएं भी इस दिशा में निरंतर काम कर रही हैं। प्रोफेसर दिनेश मोहन व सुनीता नारायण जैसे विशेषज्ञों की सेवाएं लेना हर तरह से लाभकारी है।

अभी जैसे एक बात उठी कि कार से जितना वायु प्रदूषण होता है उससे कई गुना अधिक सड़कों पर उडऩे वाली धूल से होता है। बात दुरुस्त है। लेेकिन इस बात पर किसी ने गौर नहीं किया कि वाहनों की तेज रफ्तार के कारण सड़क पर जो घर्षण होता है उससे सीमेंट और डामर के जो कण उड़ते हैं वे ही बड़ी सीमा तक धूल में बदल जाते हैं। आशय यह कि यदि सड़कों पर गाडिय़ां कम हैं तो धूल भी उतनी ही कम उड़ेगी। इसे विस्तारपूर्वक समझना हो तो किसी विशेषज्ञ के पास ही जाना होगा। इसी तरह डीजल की बात है। डीजल वाहनों से धुआं भी अधिक उड़ता है और उससे कैंसर का खतरा भी बढ़ता है। यूरोप में डीजल कारों के लिए जो पैमाने लागू हैं वे भारत में नहीं हैं। यूरोपीय मानक हासिल करने के लिए क्या करना पड़ेगा, नीति निर्धारकों को यह बात भी समझना होगी।

यह हम जानते हैं कि वायु प्रदूषण सिर्फ वाहनों से नहीं होता, कारखानों की चिमनियों से उठने वाला धुआं भी इसका एक बड़ा कारण है। दिल्ली में ही जो ताप विद्युत संयंत्र लगे हैं वे राजधानी की वायु को प्रदूषित करते हैं। क्या इन कारखानों को बंद किया सकता है अथवा इन्हें कहीं दूर स्थानांतरित किया जा सकता है? यह भी एक प्रश्न है। हमें ध्यान आता है कि कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली के अनेक उद्योग इसी बिना पर अदालती आदेश से बंद कर दिए गए थे। उन कारखानों को संभवत: दिल्ली की सीमा से बाहर राजस्थान में जगह दे दी गई। यहां एक साथ तीन-चार सवाल खड़े होते हैं- 1. क्या स्वच्छ वायु पर सिर्फ दिल्ली का ही अधिकार है? 2. अगर कारखाने बाहर कहीं जाकर लगाए जा रहे हैं तो वहां के पर्यावरण का क्या होगा? 3. कारखानों से जिनकी रोजी-रोटी चल रही है, उनके जीवनयापन का क्या होगा? ध्यान रहे कि अनेक कारखाने लघु आकार के हैं। 4. अगर ताप विद्युत संयंत्रों को बंद कर दिए जाएं तो देश को बिजली कहां से मिलेगी? 5. परमाणु बिजली को स्वच्छ पर्याय बताया जाता है, लेकिन उसमें जो खतरे निहित हैं क्या उनकी अनदेखी की जा सकती है?

भारत में जब कम्प्यूटर युग आया तब आमतौर पर एक विश्वास था कि अब दफ्तरों को फाइलों और कागजों से मुक्ति मिल जाएगी। पेपरलेस ऑफिस की कल्पना लोग करने लगे थे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कम्प्यूटर मोबाईल और स्मार्ट फोन के बावजूद कागज की खपत कार्यालयों में लगातार बढ़ ही रही है। अब तो बल्कि एक या दो लाइन का भी कोई संदेश हो तो ए-4 आकार का पूरा प्रिंटआउट निकालना पड़ता है। दूसरी ओर कम्प्यूटर व अन्य संसाधनों के कारण जो ई-कबाड़ उत्पन्न हो रहा है वह भी पूरी दुनिया में चिंता का विषय बनते जा रहा है। एक दूसरे संदर्भ में यही बात टीवी पर लागू होती है। देश मेें इस वक्त विभिन्न भाषाओं को मिलाकर कोई एक हजार चैनल चल रहे होंगे। जिस टीवी को लोक शिक्षण का माध्यम माना गया था वह आज ट्वन्टी फोर सेवन के चलते ध्वनि प्रदूषण फैलने का माध्यम बन गया है।

ऐसी ही कुछ स्थिति पर्यटन को लेकर हो रही है। कम से कम इस देश की सरकारें मानकर चलती हैं कि टूरिज्म एक ग्रीन इंडस्ट्री है। याने कि पर्यटन उद्योग पर्यावरण अनुकूल है। यह एक बड़ा झूठ है। जिस रफ्तार से पर्यटन बढ़ रहा है उस रफ्तार से हर तरह का प्रदूषण भी हमारे देश में ही नहीं, दूसरे देशों में भी बढ़ रहा है। तो बात चाहे ट्रैफिक की हो, चाहे कारखाने की, चाहे कम्प्यूटर की, चाहे पर्यटन की और चाहे ऐसे ही किसी अन्य विषय की, सब तरफ शासन और जनता दोनों के बीच एक लापरवाही की भावना विद्यमान प्रतीत होती है। इसमें सरकारों का जितना दोष है, उससे कम दोष जनता का नहीं है। एक स्वच्छ पर्यावरण के लिए आम जनता को अपने भीतर एक किस्म का संयम विकसित करने की आवश्यकता है। मुझे यहां महात्मा गांधी का उदाहरण देना चाहिए- वे कागज की छोटी-छोटी पर्चियां और आलपिनें सहेज कर रखते थे और यथा आवश्यकता उपयोग करते थे।

मैं जानता हूं कि हममें से कोई गांधी नहीं हो सकता, लेकिन ऐसे कुछेक बिन्दु अवश्य हैं जिन पर ध्यान देने से भारत में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण इन तीनों पर काबू करने में सहायता मिल सकती है। चूंकि बात दिल्ली के ट्रैफिक से शुरू हुई थी तो विशेषकर उस पर केन्द्रित कर यह विचार करना चाहिए कि हमें निजी वाहन की आवश्यकता कब और कितनी है। दिल्ली के नागरिकों ने सम-विषम फार्मूले का पालन करने में गजब का अनुशासन, इच्छा शक्ति और सार्वजनिक एकजुटता का परिचय दिया है। आज उसी को आगे बढ़ाते हुए दिल्ली सरकार और केन्द्र सरकार दोनों मिलकर राजधानी में अगर सार्वजनिक परिवहन तंत्र को सुदृढ़ करें, सड़कों को साईकिल व पैदल चलने वालों के लिए सुगम व सुरक्षित बनाएं, डीजल गाडिय़ों को धीरे-धीरे खत्म करें, पुराने जर्जर हो चुके ट्रकों को बदलें, भीड़भाड़ वाले इलाके में वाहन प्रवेश बिल्कुल बंद हो तो दिल्ली की आबोहवा बदलने में देर न लगेगी। भारत के अन्य नगरों के लिए भी यह एक अनुकरणीय उदाहरण होगा।

देशबन्धु में 21 जनवरी 2016 को प्रकाशित