Wednesday, 22 June 2016

साथ-साथ चुनाव करवाने का विचार



 मोदी सरकार और भाजपा दोनों की मंशा है कि लोकसभा तथा विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाएं। मंत्रियों और नेताओं से इस आशय के बयान लगातार आ रहे हैं। सरकार का बस चलता तो इस बारे में अभी तक निर्णय ले लिया गया होता। लेकिन उसके पहले कुछ व्यवहारिक और कुछ तकनीकी अड़चनों का हल निकालना जरूरी है। इसमें पहली कठिनाई तो इस बात को लेकर होगी कि हर पांच साल में एक साथ चुनाव कराने का निर्णय जम्मू-कश्मीर प्रांत पर कैसे लागू किया जाए। वहां देश की एकमात्र ऐसी विधानसभा है जिसकी अवधि छह साल की होती है। जब तक यह  नियम न बदला जाए कम से कम एक प्रांत तो बचा ही रहेगा जहां लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनाव नहीं हो सकेंगे। देखना होगा कि मोदीजी इस संबंध में अपनी नई सहयोगी महबूबा मुफ्ती को और सुश्री महबूबा प्रदेश की जनता को किस प्रकार से राजी करा पाती हैं।

भाजपा के इस प्रस्ताव के गुण-दोषों पर विचार करने के पूर्व हम सरकार को सलाह देना चाहेंगे कि अगर इस विचार को वास्तविकता में परिणित करना है तो इस दिशा में पहला कदम अगले साल याने 2017 में उठाया जा सकता है। अगले वर्ष देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव होना है। उसके अलावा गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल व गोवा  में भी चुनाव होंगे। केन्द्र सरकार के तीन साल भी अगली मई में पूरे हो जाएंगे। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश ने दो वर्षों में जो प्रगति की है उसे विकासपर्व के रूप में अभी मनाया जा रहा है। संभव है कि अगले वर्ष उत्सव मनाने के लिए विकास के कुछ अतिरिक्त दृष्टांत भी उपस्थित हो जाएं। यही वर्ष होगा जब भाजपा शासित तीन प्रमुख प्रदेशों में विधानसभा चुनावों के लिए मात्र एक वर्ष का समय बचा रहेगा। ये प्रदेश हैं- राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़। पार्टी अगर चाहेगी तो इन तीनों में एक वर्ष पहले विधानसभा भंग कर नए चुनाव करवाना कोई मुश्किल बात नहीं होगी।

लोकसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है। वह अगले आम चुनाव में भी अपनी दुबारा विजय के प्रति खासी आश्वस्त है। अपनी तीन साल की उपलब्धि के बल पर वह मध्यावधि चुनाव में जाने का फैसला करे तो पार्टी के अपने आकलन के अनुसार उसकी जीत में कोई संदेह नहीं है। ऐसे में यदि उत्तरप्रदेश, पंजाब व गुजरात के साथ तीन अन्य बड़े प्रदेशों में तथा गोवा, उत्तराखंड व हिमाचल इन तीन लघु प्रदेशों में विधानसभा चुनाव करवाए जाएं तो पूरे न सही आधे प्रदेशों में तो चुनाव हो ही जाएंगे। इसमें भारतीय जनता पार्टी झारखंड, हरियाणा, आंध्र, असम, अरुणाचल व नगालैण्ड को भी शायद शामिल कर सकती है जहां भाजपा या उसके समर्थक दल की सरकार है। उसके बाद सिर्फ वे प्रदेश बच जाते हैं जहां कांग्रेस या अन्य विरोधी दलों की सरकारें हैं। उन्हें समय पूर्व चुनाव कराने के लिए सहमत कर पाना शायद कठिन होगा।

हमारे सामने संयुक्त राज्य अमेरिका का उदाहरण है। वहां पर हर दो साल में एक तिहाई राज्यों में गवर्नर, विधानमंडल व सीनेट के लिए चुनाव होते हैं। इस वर्ष भी राष्ट्रपति चुनाव के साथ सोलह या सत्रह राज्यों में राज्य के गवर्नर, विधानमंडल व अमेरिकी सीनेट के लिए चुनाव होंगे। हमने ऊपर जो प्रस्ताव दिया है उसमें भी लगभग ऐसी स्थिति बनती है कि लोकसभा के साथ आधे राज्यों में चुनाव हो जाएं तथा बचे आधे राज्यों में बाद में। उनको भी शायद एक साल में साथ-साथ चुनाव कराने के लिए राजी करने की कोशिश की जा सकती है। निश्चित रूप से केन्द्र सरकार एक साथ सारे चुनाव कराने की युक्ति ढूंढ़ रही होगी, किन्तु जिन राज्यों में भाजपा-विरोधी सरकारें हैं वहां समय पूर्व चुनाव करवाना टेढ़ी खीर साबित होगा, उससे देश के संघीय ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा तथा संवैधानिक प्रश्न भी उठ खड़े होंगे।

सन् 1967 तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही होते रहे हैं। यह व्यवस्था तब बदली जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1971 में लोकसभा की अवधि पूरी होने के एक साल पहले मध्यावधि चुनावों में जाने का फैसला कर लिया। यूं उसके पहले विधानसभाओं के समय पूर्व भंग होने के प्रसंग भी घटित हुए थे। इंदिराजी ने जो फैसला लिया वह अनोखा नहीं था। अमेरिका अवश्य एक ऐसा देश है जहां चार वर्ष की निर्धारित अवधि में निर्धारित दिन, वार और माह के मुताबिक चुनावी प्रक्रिया सम्पन्न होती है, किन्तु अन्य जनतांत्रिक देशों में ऐसी पूर्व निर्धारित व ढांचे में बंधी व्यवस्था नहीं है। इंग्लैण्ड, जापान, इटली तथा यूरोप के अन्य देशों की मिसालें इस बारे में है। इंग्लैण्ड में 1951 से 1974 के बीच पांच बार प्रधानमंत्री द्वारा संसद भंग करने की सिफारिश कर मध्यावधि चुनाव करवाने के अवसर आ चुके हैं।

इंग्लैण्ड में ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि प्रधानमंत्री या कि सदन के नेता ने संसदीय दल का बहुमत खो दिया, या उसे समय पूर्व चुनाव करवाने में दुबारा विजय मिलने का विश्वास हुआ, या फिर किसी अन्य कारण से उसने त्यागपत्र देकर संसद भंग करने की सिफारिश कर ली। जापान और इटली में तो भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण बार-बार प्रधानमंत्रियों ने इस्तीफे देकर नए चुनाव करवाने की सिफारिश कर दी। परिणामस्वरूप इन देशों में पचास साल में पचास नहीं तो चालीस बार चुनाव हो गए। इंदिरा गांधी ने एक वर्ष पूर्व संसद भंग करने की सिफारिश दो कारणों से की।  एक तो कांग्रेस का विभाजन हो जाने के कारण उनके पास सदन में क्षीण बहुमत था तथा महत्वपूर्ण अवसरों पर उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। दूसरे- उन्हें विश्वास हो गया था कि नए चुनाव करवाने से अपनी दम पर स्पष्ट बहुमत लेकर आ जाएंगी और वैसा ही हुआ।

देश की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी,  उसके अध्यक्ष व उसके प्रधानमंत्री को समझना चाहिए कि ऐसी स्थिति दुबारा कभी निर्मित हो सकती है। किसी भी दल में सत्ता में आ जाने के बाद सदस्यों की लालसाएं बढ़ जाती हैं। हर व्यक्ति अपने को योग्य समझकर कोई न कोई पद चाहता है और प्रधानमंत्री के लिए संभव नहीं होता कि वह सबकी इच्छाएं पूरी कर सके। ऐसे में आंतरिक असंतोष बढ़ता है, कलह की ओर भीतरघात की आशंका बलवती होती है। यह असंतोष कब क्या स्वरूप ले ले समय आने पर ही पता चलता है। आशय यह कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने से अगर भाजपा को विजय मिल भी जाए तो वह कितनी स्थायी होगी कहना असंभव है। मान लीजिए केन्द्र में असंतोष को आपने दबा भी लिया लेकिन क्या प्रदेशों में भी ऐसा करना संभव होगा?

अब बात उठती है चुनाव संबंधी व्यवस्था की। पहले एक सदस्यीय चुनाव आयोग था वह तीन सदस्यीय हो गया। चुनाव का जो उत्सवी माहौल था उस पर अनेक तरह के बंधन लगा दिए गए। चुनाव की प्रक्रिया अनावश्यक रूप से बहुत लंबी कर दी गई। मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। चुनावों में कोई धांधली न हो तथा कानून व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े इसके लिए पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। जब एक साथ चुनाव होंगे तो एक के बजाय दो वोट डालने में पहले से दोगुना समय तो लगेगा ही इसके लिए अमला भी दोगुना लगाना पड़ेगा। इसकी पूर्ति कहां से होगी तथा वोट डालने के लिए दोगुना समय कहां से लाया जाएगा? अगर आज की तरह दो-दो माह तक चुनाव चले तो क्या पूरे देश में सारे सरकारी काम स्थगित कर दिए जाएंगे? इन सारी बातों पर विचार कर सरकार ने अगर कोई रूपरेखा बनाई हो तो वह आम जनता के सामने आना चाहिए। उस पर जनता में खुलकर बहस होना चाहिए उसके बाद ही कोई निर्णय लेना उचित होगा।

 देशबन्धु में 23 जून 2016 को प्रकाशित