Wednesday, 17 August 2016

आशीष अवस्थी की आत्महत्या


 स्वाधीनता दिवस से यही कोई सात-आठ दिन पहले इंदौर में आशीष अवस्थी नामक एक सत्ताईस वर्षीय दवा कंपनी प्रतिनिधि ने रेल के सामने कूद कर आत्महत्या कर ली। यह खबर जितनी दर्दनाक है, उतनी ही खौफनाक भी। एक युवक जिसके सामने पूरा जीवन पड़ा हुआ है, वह जानबूझ कर मौत को गले लगा ले तो पीड़ा होना स्वाभाविक है। किंतु जिन परिस्थितियों में, जिस कारण से वह खुदकुशी करने के लिए प्रेरित हुआ, उसने एक बड़ा सवाल भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के सामने खड़ा कर दिया है। इस सवाल का उत्तर देश के राजनैतिक तंत्र को ढूंढना है, उसके पास दिशा संकेत भी हैं, लेकिन क्या स्वार्थलिप्त, आत्ममुग्ध तंत्र इस ओर ध्यान देने के लिए तैयार है?

आशीष अवस्थी अमेरिका की बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी एबट में विक्रय प्रतिनिधि था। विगत बीस-पच्चीस वर्षों में दुनिया में दवा कंपनियों के विक्रय और विलय का खेल खूब हुआ है। बड़ी-बड़ी कंपनियां अपना मुनाफा बढ़ाने तथा अपने अंशधारकों को बेहतर लाभांश देने के नाम पर परस्पर विलय करती हैं। जाहिर है कि जो ज्यादा बड़ी कंपनियां हैं पहिले वे छोटी या कमजोर कंपनियों को खरीदती हैं। एबट ने भी भारत की कुछेक छोटी दवा कंपनियों को क्रय कर अपना आकार बढ़ा लिया है। देखना कठिन नहीं है कि इस प्रक्रिया में एकाधिकार की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है जिसका अंतत: असर दवा की बढ़ी कीमतों और जनता की जेब पर डाका डालने में होता है।

भारत में यह खेल प्रारंभ होने के पहिले भी दवा कंपनियों में विक्रय व विपणन प्रतिनिधियों की दशा बहुत अच्छी नहीं थी। उन्हें गांव-गांव, मुहल्ले-मुहल्ले जाकर डॉक्टरों से मिलता पड़ता है। रहने के लिए ठीक से होटल भी छोटे स्थान में नहीं होता। खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं। सैंपल से भरा भारी-भरकम बैग उठाए इस क्लीनिक से उस क्लीनिक घूमते रहो। डॉक्टर के चैंबर के बाहर घंटों बैठे रहो। उसे जब फुर्सत हो, तब बुलाएगा। 2-3 मिनिट में उसके सामने अपनी दवा की तारीफ करो, सैंपल दो और आगे बढ़ो। यूं हर पेशे में विक्रय प्रतिनिधि को बहुत अधिक शारीरिक-मानसिक श्रम करना पड़ता है, लेकिन डॉक्टर व प्रतिनिधि के बीच हैसियत का बड़ा अंतर होता है। दवा प्रतिनिधियों को बेहतर वातावरण मिले इसके लिए अखिल भारतीय दवा विक्रय प्रतिनिधि संघ बना। उसके आंदोलनों के कारण स्थितियों में कुछ सुधार हुआ, तथापि हर प्रतिनिधि को कंपनी द्वारा दिए गए लक्ष्य याने टारगेट तो पूरा करना ही पड़ता है।

आशीष अवस्थी की आत्महत्या का कारण बना यही टारगेट पूरा न कर पाना। इतनी सारी कंपनियों, इतनी सारी ब्रांडेड दवाईयां, उनमें भी न जाने कितनी आवश्यक और कितनी सिर्फ मरीजों की जेब काटने के लिए। आशीष के ऊपर दबाव बहुत था। लक्ष्य पूरा हो जाए तो बोनस में कुछ अतिरिक्त राशि मिल जाती है। उसका भी लोभ रहता ही है। लक्ष्य पूरा न हो तो नौकरी चली जाने का खतरा। एम.एस.सी. पास किया युवक अगर पहली नौकरी में ही नाकारा सिद्ध हो गया तो आगे काम कहां मिल पाएगा, यह बड़ा डर मन में। असफलता की शर्मिंदगी, परिवार में नालायक घोषित किए जाने की आशंका, पत्नी-बच्चों का भरण-पोषण करने का यक्ष प्रश्न, ये सारे प्रश्न इस परिस्थिति में नागफनी की तरह दंश मार सकते हैं।

लोकप्रिय लेखक आर्थर हैली ने लगभग चालीस वर्ष पूर्व उपन्यास लिखा था-द स्ट्राँग मेडिसिन। इसमें वर्णन था कि दवा कंपनियां अपने मुनाफे का मात्र 5-10 प्रतिशत शोध व अनुसंधान पर व्यय करती हैं, जबकि विक्रय-विपणन-विज्ञापन पर 30 प्रतिशत के आसपास। इसमें डॉक्टरों को कीमती सौगातें, उनकी विदेश यात्रा का भार उठाना जैसी अनैतिक गतिविधियां भी शामिल हैं। इनके दम पर ही वे भारी-भरकम मुनाफा कमाती हैं। भारत ने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के अनुसार दवाओं के दाम नियंत्रित करने के प्रयत्न किए, लेकिन आधे-अधूरे। ब्रांडेड के स्थान पर जैनेरिक दवाओं को प्रोत्साहन देने का कदम भी आधे मन से उठाया गया। अगर दवा फार्मूले के तहत मूल नाम से बिके तो ब्रांड का बाजार खत्म हो जाएगा, प्रतिस्पद्र्धा कम हो जाएगी, दवाएं सस्ती हो जाएंगी और विक्रय प्रतिनिधि को जिस मानसिक दबाव में काम करना पड़ता है, वह भी कम हो जाएगा। चूंकि सरकार ने इस बारे में गंभीरता और ईमानदारी नहीं दिखाई, इसलिए आज एक युवा दवा प्रतिनिधि की आत्महत्या करने की नौबत आई, ऐसा सोचूं तो गलत नहीं होगा।

यह खबर खौफनाक एक अन्य कारण से भी है। पिछले कुछ बरसों में हमने किसानों द्वारा आत्महत्या करने की खबरें बारंबार पढ़ी हैं। इस हद तक कि नागर समाज ने तो उनकी तरफ ध्यान देना, उस बारे में बात करना तक बंद कर दिया है। लेकिन किसान मर रहे हैं, यह सच्चाई अपनी जगह कायम है। अब  एक मध्यमवर्गीय युवा सेल्समैन द्वारा हताशा में खुदकुशी कर लेना देश के युवा वर्ग में बढ़ रही बेचैनी, हताशा, असुरक्षा, अनिश्चित भविष्य इत्यादि की प्रवृत्ति की ओर इशारा कर रहा है। उस युवा वर्ग में जिसे भारत अपनी सबसे बड़ी पूंजी याने असैट मानकर चल रहा है। बारंबार कहा जा रहा है कि आने वाले दशकों में भारत की युवा आबादी विश्व में सर्वाधिक होगी इत्यादि। इन युवजनों को लुभाने के लिए तरह-तरह के सरंजाम कारपोरेट जगत कर रहा है- मॉल और मल्टीप्लैक्स से लेकर लाखों की बाईक, फ्यूज़न फूड, फ्यूज़न म्यूज़िक, स्मार्टफोन, मोबाइल एप्प आदि तक। लेकिन इन युवाओं को पढ़ाई पूरी करने के बाद भविष्य क्या होगा, ये जब कौशल विकास का प्रशिक्षण पा लेंगे, उसके बाद इन्हें रोजगार कैसे मिलेगा जैसे बुनियादी मुद्दों पर क्या गंभीरता से सोचा गया है?

ध्यान से देखें तो किसानों और युवाओं की आत्महत्या के बीच एक गहरा नाता है। दोनों नवपूंजीवाद के मारे हुए हैं। किसान जब खुदकुशी करता है तो किस्म-किस्म के कारण गिना दिए जाते हैं। वह बीमार था, पेट दर्द से परेशान था; तो फिर उसका इलाज समय पर और सही रूप में क्यों नहीं हुआ? वह गृहकलह से परेशान था; अच्छा, तो इस गृहकलह का कारण क्या था? वह शराब पीकर मरा; तो उसके लिए गांव-गांव में शराब दूकानें किसने खोलीं? सच तो यह है कि अधिकतर अंचलों में किसान ने मौत का वरण इसलिए किया कि वह जिस पारंपरिक खेती का अभ्यस्त था, उससे उसे विमुख कर ऐसे नए प्रयोग करने कहा गया जो उसकी सामथ्र्य के परे थे। उसे अपनी फसल का सही दाम नहीं मिलता, सरकार से मिलने वाले खाद-बीज- कीटनाशक में मिलावट तथा कमी होती है, जो कृषि साधन खरीदने उसे मजबूर किया जाता है वे सब बहुराष्ट्रीय या देशी कारपोरेट द्वारा उत्पन्न तथा मुहैय्या कराए जाते हैं।

भारत में एक वर्ग आर्थिक साम्राज्यवाद पर बेतरह फिदा है। देश को सुखी-संपन्न बनाने का एक ही मंत्र उसने रट लिया है कि वैश्विक पूंजी के गुण गाते रहो। हमारी कंपनियां देश में कमाए धन से विदेशों में कारखाने खरीदें, फिर भले ही आगे चलकर उनमें घाटा क्यों न हो, और विदेश कंपनियां भारत में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष निवेश कर यहां के कल-कारखानों पर कब्जा कर लें। यहां तक कि प्रतिरक्षा कारखाने भी उनके हवाले कर दिए जाएं। एक समय नंदन निलेकनी भी इसी सोच के हामी थे। अनुदारपंथी अर्थशास्त्री थॉमस एल. फ्रीडमैन ने अपनी पुस्तक ‘द वर्ल्ड इज़ फ्लैट’ का आरंभ ही उनकी सराहना से किया था। आज वही निलेकनी मोदी सरकार को चेता रहे हैं कि मेक इन इंडिया नहीं मेक फॉर इंडिया की बात कीजिए। विदेशियों, विदेशी पूंजी, विदेशी बाजार से हमारा भला नहीं होगा, बल्कि हमें देश के भीतर देशवासियों के लिए उत्पादन, उपयोग व रोजगार के अवसर सृजित करना होंगे।

वामपंथी किंवा उदारपंथी विचारकों की बात जाने दीजिए। जब फ्रांसिस फुकुयामा और नंदन निलेकनी जैसे विचारक भी अपनी पूर्व धारणाओं में संशोधन करने लगें, तब इस देश के नीति-निर्माताओं को भी थोड़ा ठहर कर अपनी नीतियों पर पुनर्विचार कर लेना चाहिए। अन्यथा भविष्य क्या होगा, यह सोचने में भी डर लगता है।

देशबंधु में 18 अगस्त 2016 को प्रकाशित