Wednesday, 3 August 2016

धीरज भैया


 धीरज भैया याने धीरजलाल जैन का गत 25 जुलाई को दुर्ग में निधन हो गया। उनकी मृत्यु के साथ देशबन्धु ने अपने प्रथम सदस्य को खो दिया है। 17 अप्रैल 1959 को रायपुर से पत्र का प्रकाशन प्रारंभ होने के एक सप्ताह पूर्व धीरज भैया देशबन्धु के दुर्ग संवाददाता नियुक्त हुए थे। अखबार के दैनंदिन कामकाज से उन्होंने अवश्य अवकाश ग्रहण कर लिया था, लेकिन देशबन्धु परिवार में उनकी उपस्थिति लगातार बनी हुई थी। मैं और मेरे सहयोगी समय-समय पर अब भी उनसे मार्गदर्शन लेते थे। हम लोगों ने कभी यह ध्यान ही नहीं दिया कि वे रिटायर हो चुके हैं। अब उनके जाने के साथ सत्तावन साल से कुछ अधिक का समय इतिहास बन चुका है। दरअसल धीरज भैया देशबन्धु के परिवार के ऐसे सदस्य थे जो एक वेतनभोगी होने की परिभाषा से ऊपर थे।

आज उनके कितने ही स्मृतिचित्र एक के बाद एक आंखों के सामने आ रहे हैं। देशबन्धु एक कलमजीवी पत्रकार  याने बाबूजी ने उधार की पूंजी से शुरू किया था। इस अखबार की स्थापना ही इस विचार के साथ हुई थी कि यहां अखबार के अलावा न तो कोई व्यापार होगा और न किसी तरह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखी जाएगी। प्रारंभकाल से ही साधनों का अभाव और फिर स्वाभिमान। कुल मिलाकर नतीजा यह कि पत्र के संचालन में लगातार वित्तीय संकट की स्थितियां बनी रहीं। बाबूजी के बारे में कहा जाता था कि वे रेत में नाव खेते थे। धीरज लाल जैन उनके अनन्य सहयोगी थे। इस अर्थ में भी कि रेत में चल रही नाव को आगे कैसे बढ़ाया जाए। इस बारे में उनकी व्यवहारिक बुद्धि अनेक बार पतवार की तरह काम में आई।

मुझे याद आता है कि धीरज भैया ने ही यह युक्ति निकाली कि कैसे प्रेसकर्मियों को एक निर्धारित तिथि पर वेतन दिया जाए। उनका सुझाव मानकर अलग-अलग जिलों के प्रतिनिधियों को निश्चित तिथि पर जिले की एजेंसियों के न सिर्फ बिल की राशि एकत्र कर लाने की व्यवस्था की गई। इससे एक तरह का वित्तीय अनुशासन लागू हुआ। धीरज भैया ने स्वयं अपने लिए एक तारीख तय कर ली जिस दिन वे अविभाजित दुर्ग जिले की एजेंसियों व विज्ञापनों की रकम वसूल कर लाते थे और उस दिन प्रेस में सुचारु रूप से वेतन बंट जाता था। धीरज भैया अपने स्कूटर पर पूरे जिले का दौरा करते थे और लगभग तीस साल तक उनकी समय सारिणी में कोई व्यवधान नहीं हुआ। वे सामान्य तौर पर पाजामा और कमीज पहनते थे और एक साधारण झोले में रकम लाते थे कुछ इस तरह मानो घर का सौदा-सुसुफ लेने बाजार जा रहे हों। वे अपना हिसाब एक लाल नोट बुक में रखते थे जिसमें बड़ी सुंदर लिखावट के साथ बिना काट-छांट के विवरण दर्ज होते थे। मैंने कभी उनके लेन-देन में एक पैसे का भी फर्क नहीं पाया।

देशबन्धु के प्रदेशव्यापी नेटवर्क को सुदृढ़ करने के लिए भी उन्होंने जो उपाय सुझाया था वह बेहद कारगर सिद्ध हुआ। हमने अपना पहला ब्यूरो कार्यालय दुर्ग में ही खोला था जहां टेलीप्रिंटर आदि व्यवस्थाएं की गई थीं। धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों में भी ब्यूरो स्थापित हुए। धीरज भैया ने हर तीन माह में ब्यूरो प्रभारियों की बैठक बुलाने की योजना बनाई। यह बैठक दिन भर चलती थी। इसमें समाचार, प्रसार, विज्ञापन, हिसाब-किताब- इन सब पर अलग-अलग सत्रों में बात होती थी। शिकायतों का निराकरण और सुझावों की समीक्षा भी साथ में चलती थी। कहने का अर्थ यह कि धीरज भैया ने प्रबंधशास्त्र में भले ही कोई डिग्री हासिल न की हो लेकिन उनमें प्रबंध कौशल की सहजात प्रतिभा थी जिसका लाभ अखबार को मिला और बाद में उनके बेटों के स्वतंत्र व्यवसाय स्थापित करने में भी।

यह भी धीरज भैया का ही सुझाव था कि हमें आजीवन ग्राहक योजना प्रारंभ करना चाहिए। 1978-79 में प्रेस के अपने भवन निर्माण और आधुनिकीकरण की योजना पर काम शुरू हुआ था। वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेना था, किन्तु उसके लिए पच्चीस प्रतिशत मार्जिन मनी की व्यवस्था भी करना लाजिमी था। तब तेरह लाख की रकम हमारे लिए बहुत बड़ी थी और यह समझ से परे था कि इसका प्रबंध कैसे हो। ओवर इन्वाइसिंग आदि चतुराई हमें न तब आती थी और न अब आती है। ऐसे में धीरज भैया का सुझाव मानकर हम लोगों ने पूरे प्रदेश में धुधांधार दौरे किए। सहृदय पाठकों से मिले और एक साल के भीतर तेरह सौ ग्राहकों से तेरह लाख की राशि जुटाई। इस बड़े काम में बाबूजी और धीरज भैया के अलावा पंडितजी, राजू दा, सत्येन्द्र, गिरजा, शरद आदि सभी सहयोगियों ने भी खूब भागदौड़ की।

धीरज भैया को प्रबंधन के गुर चाहे जितने आते हों, वे मूलत: एक संवेदनशील पत्रकार थे तथा इस रूप में उन्होंने सिर्फ दुर्ग में अथवा देशबन्धु समूह में ही नहीं, पूरे मध्यप्रदेश में प्रतिष्ठा अर्जित की। वे जब भी कोई रिपोर्ट तैयार करते थे, तो पहले दिमाग में उसका पूरा खाका बैठा लेते थे, फिर जब लिखने बैठते तो सधी हुई कलम से छोटे-छोटे सुंदर अक्षरों में वे समाचार तैयार करते उसमें न तो कहीं व्याकरण की गलती होती और न कहीं वर्तनी की। उनका शब्द-लाघव कमाल का था। उनके लिखे हुए में एक शब्द भी काटना मुश्किल होता था। धीरज भैया ने एक लंबे समय तक अखबार में दुर्ग डायरी लिखी। इसमें वे सप्ताह भर की घटनाओं का लेखा-जोखा चुभते हुए व्यंग्य की शैली में लेते थे। यह कॉलम लोकप्रिय हुआ और इससे प्रेरणा लेकर हमारे और भी बहुत से साथियों ने जिले की डायरी लिखना शुरू किया, लेकिन धीरज भैया की बात ही कुछ और थी। वे वस्तुगत भाव से पत्रकारिता करते थे। उसमें निजी राग-द्वेष का कोई भाव नहीं होता था। वे अगर आलोचना भी करते थे तो उसमें लेखनी का संयम खूब साधते थे। दुर्ग जिला राजनीतिक दृष्टि से काफी संवेदनशील था और एक समय यहां के नेता मध्यप्रदेश की राजनीति में खासा दखल रखते थे। धीरज भैया ने उनके साथ हमेशा एक सम्मानजनक दूरी बनाकर रखी जिसके कारण उन पर कभी पक्षपात का आरोप नहीं लगा।

धीरज भैया की लेखन में रुचि अपने प्रारंभिक जीवन से ही थी। पचास के दशक में उनकी कहानियां सरिता में प्रकाशित होने लगी थीं. यही रुचि आगे चलकर उनकी पूर्णकालिक वृत्ति बन गई। अपने जीवन के पचहत्तर वर्ष पूरे करने के बाद पहले तो उन्होंने अपनी पूर्व-प्रकाशित कहानियों का संकलन प्रकाशित किया। उसी रौ में फिर वे नए सिरे से कहानी लेखन में जुट गए। जब वे अस्सी साल के हुए होंगे तब उन्होंने अपना दूसरा संकलन प्रकाशित किया। प्रसंगवश, दोनों पुस्तकों की भूमिका लिखने का दायित्व उन्होंने मुझ पर ही डाला।

अपने सबसे पुराने सहयोगी पर लिखने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन हंसा भाभी की चर्चा किए बिना बात अधूरी रहेगी।  मैं मानता हूं कि तमाम अभावों और कठिनाइयों  के बीच धीरज भैया यदि प्रतिष्ठा पा सके तो इसमें भाभी के  धैर्य, सहनशीलता व समझदारी की बहुत बड़ी भूमिका रही है। मैं प्रारंभ से ही उन्हें देशबन्धु की लक्ष्मी कहते आया हूं।

आखिरी बात एक निजी संस्मरण के रूप में। एक साल दीवाली पर (1976 में) धीरज भैया रुपयों की व्यवस्था करके आए। प्रेस में सभी साथियों को त्यौहार के पूर्व वेतन मिल गया। शाम को दुर्ग लौटते हुए धीरज भैया हमारे घर आए। अपने जेब से उन्होंने एक हजार रुपए निकालकर दिए कि आपने घर में त्यौहार मनाने के लिए तो पैसा रखा ही नहीं। बात सही थी। धीरज भैया के दिए इन रुपयों से उस बरस हमने कई साल बाद ठीक से दीवाली मनाई।

देशबंधु में 04 अगस्त 2016 को प्रकाशित