Thursday, 1 September 2016

सीकरी में संत


 हरियाणा विधानसभा का वर्तमान मानसून सत्र 26 अगस्त को दिगंबर जैन सम्प्रदाय के बहुचर्चित मुनि तरुण सागर के प्रवचन के साथ प्रारंभ हुआ। अपनी तरह के अनूठे इस आयोजन को लेकर बहुत से प्रश्न उठते हैं-
1.     हरियाणा विधानसभा ने एक धर्मनेता को प्रवचन देने के लिए आमंत्रित क्यों किया?
2.     विधानसभा का एजेंडा सामान्यत: विधानसभा अध्यक्ष सदन के नेता याने मुख्यमंत्री के परामर्श से तय करते हैं;  मुनिजी को आमंत्रित करने के पीछे उनकी क्या सोच थी?
3.     क्या यह आयोजन करना संवैधानिक दृष्टि से उचित था और इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे?
4.     क्या जैन मुनि को यह आमंत्रण स्वीकार करना चाहिए था?
5.     उन्होंने विधानसभा में जो विचार व्यक्त किए उनसे क्या निष्कर्ष निकलते हैं?
6.     अगर मुनिजी को बुलाने का निर्णय सत्तारूढ़ दल का था, तो विपक्ष ने उनका विरोध क्यों नहीं किया?

भारत में इस समय जो राजनीतिक वातावरण है उसे देखते हुए हरियाणा की विधानसभा में मुनि तरुण सागर का प्रवचन आयोजित होने से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। मुझे जो जानकारी है उसके अनुसार किसी विधानसभा में किसी धर्मनेता को बुलाने का यह पहला अवसर नहीं था। ऐसा एकाध आयोजन अतीत में हुआ है जिसके ब्यौरे मेरे पास फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन यह पुरानी बात है जबकि जनसंचार माध्यमों का इतना विस्तार नहीं हुआ था। अगर हरियाणा का यह आयोजन पहला भी है तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है। इसे हमको इस दौर की सामाजिक परिस्थितियों और सत्ताधारी वर्ग की सामान्य मनोवृति से जोड़ कर देखना होगा। यह कहना बहुत आसान होगा कि भाजपा चूंकि धर्म की राजनीति करती है इसलिए उसने यह आयोजन करवाया, किन्तु क्या यही बात अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं पर उतनी ही सच्चाई से लागू नहीं होती?

यह ठीक है कि कांग्रेस, समाजवादी और साम्यवादी पार्टियां सैद्धांतिक धरातल पर धर्मनिरपेक्ष हैं, लेकिन क्या उनके अधिकतर नेताओं के व्यक्तिगत आचरण में धर्मनिरपेक्षता की कोई झलक दिखलाई देती है? सच तो यह है कि कांग्रेस पार्टी में प्रारंभ से ही धार्मिक कर्मकांडियों का वर्चस्व रहा है। एक जवाहर लाल नेहरू थे, जो वैज्ञानिक सोच और तर्क की बात करते थे जिसके कारण उनका व पार्टी संगठन का भीतर ही भीतर विरोध होता था। यही लोग थे जिनके कारण हिन्दू कोड बिल पारित होने में विलंब हुआ जिससे क्षुब्ध होकर डॉ. आम्बेडकर ने मंत्री पद छोड़ दिया था। राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने बनारस में पंडितों के पैर धोए थे तथा सरदार पटेल की प्रेरणा से के.एम. मुंशी के नेतृत्व में सोमनाथ में नए मंदिर का निर्माण किया गया था। गोविंद वल्लभ पंत मुख्यमंत्री थे जब कलेक्टर नैय्यर ने रातोंरात बाबरी मस्जिद में रामलला की मूर्तियां रखवा दी थीं।

दरअसल, पंडित नेहरू की धर्मनिरपेक्ष सोच भारतीय राजनीति से उनके जाने के बाद ही धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी थी। श्रीमती इंदिरा गांधी में बेशक बहुत सी खूबियां थीं, लेकिन वे कर्मकांड में विश्वास करती थीं और किसी हद तक अंधविश्वासी थीं। वह दृश्य बहुत लोगों को याद होगा जब देवरहा बाबा के पैर के नीचे इंदिरा गांधी ने अपना मस्तक रख दिया था। इस बीच बहुत से नए संतों का भी पदार्पण हो चुका है और उनके आश्रमों में राजनेता, आईएएस अधिकारी, न्यायाधीश, राजदूत, सेना के जनरल आदि सब हाजिरी देने जाते हैं। एक तरफ हमारे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी धार्मिक अनुष्ठानों में उत्साह के साथ शिरकत करते हैं, तो दूसरी तरफ गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंड्या राज्यसभा में मनोनयन स्वीकार कर लेते हैं। यह अलग बात है कि इस पर पुनर्विचार करने के बाद उन्होंने त्यागपत्र दे दिया।

इस वृहत्तर पृष्ठभूमि में यदि हरियाणा विधानसभा ने मुनि तरुण सागर को आमंत्रित किया तो इसमें आश्चर्य अथवा विरोध की बात कहां उत्पन्न होती है? मुनिजी अपने प्रवचनों के लिए काफी लोकप्रियता हासिल कर चुके हैं। दूसरे संत जहां शांत स्वर और कोमल पदावली में श्रोताओं को परलोक सुधारने की प्रेरणा देते हैं वहीं तरुण सागर ‘कड़वे वचन’ के अंतर्गत तीखे स्वर और भाषा में अपनी बात रखते हैं। वे सुनने वालों को तिलमिला देने की कोशिश करते हैं जैसे चिंउटी काटने से कोई सोया हुआ व्यक्ति जाग जाए। मुझे धार्मिक प्रवचनों में कोई रुचि नहीं है, लेकिन तरुण सागर की प्रशंसा मैंने बहुत लोगों से सुनी है और यह भी जानकारी है कि उनके प्रवचनों के कैसेट बाजार में उपलब्ध हैं।

मुनि तरुण सागर संभवत: इन दिनों चौमासा चंडीगढ़ में व्यतीत कर रहे हैं। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में दिगंबर जैन संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बहुत बड़ी है। हरियाणा में भाजपा ने हिसाब लगाया होगा कि मुनिजी का प्रवचन करवाने से उसे राजनीतिक लाभ होगा। दूसरे पार्टी की अपनी जो राजनीतिक दृष्टि है उसमें हिन्दू धर्म (जिसमें शायद जैन धर्म भी शामिल है) का उत्थान करने का एजेंडा तो पहले से शामिल है। नेतागण चुनाव के समय और अन्य अवसरों पर भी देवालयों में और सिद्ध पुरुषों की ड्यौढ़ी पर मत्था टेकने जाते हैं। अभी सिर्फ यही फर्क हुआ कि मुनिजी चलकर राजनीति के प्रांगण में आ गए। कहने का आशय यह कि भाव और विचार वही पुराने है, सिर्फ स्थान परिवर्तन हुआ है इसलिए व्यर्थ का हो-हल्ला मचाने से क्या लाभ?

अब सवाल यह उठता है कि मुनि तरुण सागर ने विधानसभा में जो बातें कहीं उनका किस तरह से विश्लेषण किया जाए? उनकी यह टिप्पणी काफी चर्चित हुई कि धर्म पति है और राजनीति पत्नी, कि पति पत्नी का संरक्षण करे और पत्नी पति के अनुशासन में रहे। अगर राजनीति पर धर्म का अंकुश न हो तो वह मदमस्त हथिनी हो जाती है। प्रवचन का यह अंश किसी धर्मसभा में तो शायद स्वीकार हो सकता है, लेकिन विचारणीय है कि क्या यह भारतीय संविधान की भावना और आधुनिक समय की सोच के अनुकूल है? किन्तु मुनिजी जब धर्म की बात कर रहे हैं तो उनसे उनका आशय क्या है? इसकी विवेचना होनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी ने अभी कुछ समय पहले कहा था कि संविधान हमारा सबसे पवित्र ग्रंथ है। पाठकों को यह भी स्मरण होगा कि उन्होंने लोकसभा में प्रवेश करने के पूर्व संसद की देहरी पर माथा नवाया था।

यदि मुनिजी का आशय संविधान में वर्णित मूल्यों से है तब तो उनकी बात स्वीकार करने योग्य हो जाती है। क्योंकि मेरा मानना है कि भारतीय राजनीति को अपने सबसे पवित्र ग्रंथ याने संविधान के मुताबिक ही चलना चाहिए। राजनीति के लिए धर्म के पालन का इसके अलावा और कोई अर्थ नहीं है। तथापि इस टिप्पणी में मुनिजी ने पति-पत्नी के रिश्ते को जैसा परिभाषित किया है वह असहजता उत्पन्न करता है। आधुनिक समय में कोई भी समाज प्राचीन परिपाटियों को अटल और शाश्वत मानकर नहीं चल सकता। भारतीय नारी या पत्नी को भी अब अठारहवीं सदी की बेडिय़ों में नहीं रखा जा सकता और न रखा जाना चाहिए। मुनिजी जब राजनीति के मदमस्त हथिनी बन जाने के खतरे की तरफ संकेत करते हैं तो यह भी विचारणीय है कि पारंपरिक अर्थों में जिसे धर्म कहा जाता है उस पर भी कहीं अंकुश की आवश्यकता है या नहीं!

मुनि तरुण सागर ने अपने प्रवचन में एक स्पष्टीकरण भी दिया है कि इस आमंत्रण को स्वीकार कर लेने के बाद उन्हें भाजपा समर्थक या मोदी समर्थक मान लेने की आशंका बन सकती है, लेकिन ऐसा नहीं है। वे राजनीति में किसी का समर्थन करते हैं या नहीं, ये वही जानें। हम उनके ध्यान में अकबर के समय के सुप्रसिद्ध भक्त कवि कुम्भनदास का यह पद लाना चाहते हैं:-संतन को कहा सीकरी सो काम/ आवत जात पन्हैयां टूटीं, बिसरी गयो हरि नाम/ जिनको मुख देखे दुख उपजत, तिनको करिबे परि सलाम/ कुम्भन दास लाल गिरधर बिनु और सबै बेकाम।

देशबंधु में 01 सितम्बर 2016 को प्रकाशित