Wednesday, 11 January 2017

मीडिया : साख का सवाल


 पाठकों के लिए तीन सलाहें: 
1. घटनाओं की वृहत्तर तस्वीर पाने के लिए सीमित समाचार स्रोतों पर आश्रित न रहें बल्कि व्यापक स्रोतों तक जाएं।
2. जब तब किसी समाचार की प्रामाणिकता के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त न हों तब तक उसे शेयर न करें। ऐसा करने से अपुष्ट, भ्रामक समाचार फैलाने में हम सहभागी बन जाते हैं।
3. किसी समाचार के छपने के पीछे क्या कारण अथवा प्रयोजन है उसे जानने-समझने का प्रयत्न करें। हमें समाचारों की संतुलित खुराक की आवश्यकता है और इसके लिए उसका स्रोत क्या है यह समझना बेहद महत्वपूर्ण है।
उपरोक्त तीनों सलाहें मार्टिना चैपमैन ने दी हैं। वे बीबीसी में विभिन्न पदों पर दो दशकों से अधिक समय तक काम कर चुकी हैं और फिलहाल उत्तरी आयरलैंड में स्वतंत्र मीडिया परामर्शदाता के रूप में सेवाएं दे रही हैं। उनका एक साक्षात्कार कुछ दिन पूर्व एक अंग्रेजी समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ। जहां से मैंने यह सोचकर इसे उठाया है कि वर्तमान में यह परामर्श आवश्यक है।
मैं इसी सिलसिले में पाठकों का ध्यान साध्वी खोसला की ओर दिलाना चाहता हूं। पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी की अभी हाल में एक पुस्तक आई है जिसकी बहुत चर्चा हो रही है। इस पुस्तक का शीर्षक ही है- आई एम ए ट्रॉल: इनसाइट बीजेपी'ज़ सीक्रेट डिजिटल आर्मी।जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है पुस्तक में बीजेपी द्वारा सोशल मीडिया या डिजिटल मीडिया का उपयोग या दुरूपयोग कैसे किया जा रहा है, इसकी चर्चा की गई है। इसमें स्वाति चतुर्वेदी ने सुषमा स्वराज व मेनका गांधी जैसे मंत्रियों की प्रशंसा भी की है, अर्थात स्वाति कट्टर बीजेपी-विरोधी नहीं हैं, किन्तु पुस्तक मुख्य रूप से चर्चा में जिस कारण से आई वह है साध्वी खोसला का लेख। सुश्री खोसला ने रहस्योद्घाटन किया है कि भारतीय जनता पार्टी के सोशल मीडिया प्रभाग में किस तरह से विरोधियों पर सही-गलत आरोप लगाने व उनकी छवि धूमिल करने की योजनाएं बनाई जाती हैं। उनके लेख से खलबली तो मची लेकिन मीडिया में इसे शायद जानबूझ कर ही कोई खास तवज्जो नहीं दी गई।
साध्वी खोसला कहती हैं कि वे नरेन्द्र मोदी से प्रभावित थीं और इसीलिए दिसंबर 2013 में मोदी जी के 272 प्लस अभियान से जुड़ गई थीं। उनके काम को देखकर उन्हें दो महीने बाद फरवरी 2014 में बीजेपी के गूगल हैंगआउट ग्रुप में शामिल कर लिया गया था। अब भाजपा उनके पार्टी से किसी भी तरह से जुड़े रहने की बात से इंकार करती हैं, लेकिन साध्वी के अनुसार उन्होंने स्वयं ही 2015 की शुरूआत में भाजपा से मोह भंग होने के बाद रिश्ता तोड़ लिया था। उन्हें इस बात पर घोर आपत्ति थी कि शाहरुख खान और आमिर खान जैसे नेताओं को मुसलमान के रूप में प्रदर्शित कर उन पर आक्रमण किए जाएं, जबकि अब तक देश उन्हें जाति-धर्म से परे लोकप्रिय अभिनेता के रूप में देखते आया था। साध्वी का कहना है कि कांग्रेस और आप भी सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, किन्तु इस मामले में भाजपा उनसे आगे है। ट्विटर और फेसबुक दोनों पर भाजपा का वर्चस्व है जबकि कांग्रेस इस मामले में कमजोर है और गाली-गलौज वाली पोस्टें अधिकतर भाजपा के लोग ही करते हैं।

यह भी देख लीजिए कि चेतन भगत इस बारे में क्या कहते हैं। जैसा कि हम जानते हैं चेतन भगत हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी के गुलशन नंदा हैं। किशोर मानसिकता के युवा ही मुख्यत: उनके पाठक रहे हैं। वे भाजपा समर्थक होने के साथ, नरेन्द्र मोदी के अनन्य प्रशंसक भी हैं। विगत दो वर्षों से वे लगातार मोदी जी के पक्ष में लेख लिखते रहे हैं। लेकिन अब उन्हें भी डर सता रहा है कि मोदीजी के अंधभक्त न सिर्फ उनकी छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं बल्कि भारत के जनतांत्रिक ढांचे को भी तार-तार कर रहे हैं। चेतन भगत ने ट्विटर पर एक सर्वे किया था कि भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए अगर मोदी आपातकाल लगाएं तो क्या लोग उसका समर्थन करेंगे? करीब दस हजार लोगों ने जवाब दिए व सत्तावन प्रतिशत लोगों का उत्तर हाँ में था। मुझ जैसे लोगों ने तो ऐसा सर्वे किए जाने पर ही प्रश्न उठाए थे, लेकिन सर्वे का नतीजा आने पर चेतन भगत कह रहे हैं कि मोदी चाटुकारों और मुसाहिबों से घिर गए हैं और यह खतरनाक बात है।
मेरा प्रयोजन इस समय नरेन्द्र मोदी या मोदी सरकार के कामों की विवेचना करना नहीं है, बल्कि मैं पाठकों का ध्यान मीडिया के वृहत्तर परिदृश्य की ओर ले जाना चाहता हूं। ऐसा नहीं है कि मीडिया में कभी कोई स्वर्णयुग था। ‘हमारे जमाने में ऐसा होता था’ जैसे उद्गार सिर्फ अपने मन को दिलासा देने के लिए व्यक्त किए जाते हैं। उदाहरण के लिए यह सच है कि अंग्रेजीराज के दौरान बहुत से अखबारों ने निर्भीकता के साथ माध्यम का उपयोग किया तथा इसके लिए जो भी कीमत चुकाना पड़ी वे उससे पीछे नहीं हटे, किन्तु उस दौर में भी उपनिवेशवादी सरकार की सरपरस्ती में बहुत से अखबार प्रकाशित होते थे। कलकत्ता का द स्टेट्समेन तो अंग्रेजों का ही था। लखनऊ से प्रकाशित पायोनियर के मालिक अवध के धनी जमींदार और तालुकेदार थे। इस परंपरा में और भी बहुत से पत्र थे। आज़ादी के बाद भी दो तरह के अखबार स्थापित हुए। एक जिनका व्यवसायिक हित सर्वोपरि था और दूसरे वे जो राष्ट्र निर्माण में भागीदार निभाने के इच्छुक थे।
आज जो स्थिति सामने है वह मुख्यत: इसलिए है कि मीडिया का कल्पनातीत विस्तार और विकास हुआ है। अखबार तो थे ही, अब रेडियो, टीवी और डिजिटल मीडिया भी हैं। पहले कुछेक चुने हुए केन्द्रों से समाचार पत्र निकलते थे, अब तहसील मुख्यालयों से भी निकल रहे हैं। डिजिटल मीडिया को किसी स्थान विशेष के आधार की आवश्यकता ही नहीं है। दूसरी बात यह हुई है कि अखबार में संपादक मंडल के पास समाचार सामग्री को संपादित करने का पर्याप्त अवसर होता था; दूसरी ओर अखबार पढऩे के बाद पाठक को भी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के पहले सोच-विचार का समय मिल जाता था। आज टीवी और डिजिटल मीडिया दोनों में समय का यह आवश्यक और वांछित अंतराल पूरी तरह समाप्त हो गया है। त्वरित समाचार और त्वरित प्रतिक्रिया यह वर्तमान नियम है। तीसरे, अखबार व टीवी मेें संपादक नाम का प्राणी आज भी होता है, लेकिन डिजिटल मीडिया में जिसके मन में जो आए लिख सकता है।
यह इस समय की सबसे बड़ी समस्या है। हमने साध्वी खोसला व चेतन भगत के अनुभवों से जाना कि डिजिटल मीडिया में राजनीतिक पार्टियां किस तरह हस्तक्षेप कर सकती हैं। और सिर्फ राजनीतिक पार्टियां ही क्यों? निहित स्वार्थों वाली कोई भी शक्ति डिजिटल मीडिया के प्लेटफार्म पर आकर अपनी इच्छानुसार सामग्री पोस्ट कर सकती हैं, फिर वह सच हो या झूठ, या आगे चलकर उसका परिणाम चाहे जो क्यों न हो। दिलचस्प बात यह है कि इसे मीडिया का जनतंत्रीकरण कहा जा रहा है। सूचनाओं का अंबार घास के ढेर की तरह लगा है और उसमें से सत्य की सुई को खोज पाना लगभग असंभव हो चला है। ऐसा जनतंत्रीकरण किस काम का? इसे कहा जाए कि बंदर के हाथ में उस्तरा दे दिया गया है तो गलत नहीं होगा।
अपने देश की जनता मीडिया पर बहुत विश्वास करती है। यह समझ उसमें  स्वाधीनता संग्राम के दौरान तिलक, गांधी, लाजपत राय, नेहरू इत्यादि द्वारा स्थापित अखबारों को देख-पढक़र विकसित हुई होगी। वह परंपरा चली आ रही है।  लोग अखबारों के अलावा टीवी, फेसबुक, ट्विटर व्हाट्सएप आदि पर प्रसारित संदेशों पर भी उसी भोलेपन के साथ विश्वास कर लेते हैं। जनता के इस विश्वास का बड़े पैमाने पर पहला दुरुपयोग बीस वर्ष पूर्व गणेशजी को कथित तौर पर दूध पीने की घटना में किया गया था। मेरे विचार में यह दुरुपयोग नहीं दुरभिसंधि का प्रयोग था। उसी की परिणति आज जनसंचार माध्यमों में देखने मिल रही है। अगर समाज परिपक्व बुद्धि से काम नहीं लेगा, तो वह इस षडय़ंत्र को नहीं समझ पाएगा। मैं अंत में यही कहूंगा कि मार्टिना चैपमैन ने जो सलाह दी है जनता उस पर ध्यान दे।
देशबंधु में 12 जनवरी 2017 को प्रकाशित