Saturday, 14 January 2017

पिंक : एक उत्तर-आधुनिक फिल्म


 ‘पिंक’ फिल्म आई और चली गई। काफी तारीफ सुन रखी थी, देखने का मन बना लिया था, आज-कल करते-करते समय बीत गया और फिल्म परदे से उतर गई। यह आधुनिक टेक्नालॉजी का कमाल है कि एक फिल्म बनती है, एक शहर में एक साथ कई टॉकीजों में दिखाई जाती है और एक सप्ताह या अधिक से अधिक दो सप्ताह चलकर वापिस चली जाती है। मुझे अब वैसे भी फिल्म देखने का पहले जैसा शौक नहीं रहा और फिर दूरदराज बने मल्टीप्लेक्स जाने में भी कोई खास आनंद नहीं आता। खैर! यह तो आपबीती हुई, पाठकों को इससे क्या मतलब! आप तो यह जानना चाह रहे होंगे कि मैंने फिल्म की चर्चा ही क्यों छेड़ी। हुआ कुछ ऐसा कि कुछ दिन पहले टीवी पर चैनल सर्फिंग करते-करते एकाएक पाया कि ‘पिंक’ दिखाई जा रही है। एक अच्छा मौका मिल गया यह जानने का कि जो तारीफ सुन रखी थी उसमें कितना दम था। फिल्म प्रारंभ हुए पांच या सात मिनट हो चुके थे किन्तु इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि यह फिल्म धीरे-धीरे करके ही खुलती है।

मुझे ‘पिंक’ का कथानक सबसे अधिक जोरदार लगा। मेरी जितनी समझ है उस हिसाब से तकनीकी दृष्टि से फिल्म में कोई खास बात नहीं थी। एक अनुमान हुआ कि इसे काफी कम लागत में बनाया गया है। इसमें जितने अभिनेता थे, उनमें से अधिकतर के न तो नाम मालूम थे, न अन्य फिल्मों में उनके किरदार की कोई जानकारी थी और न इतनी तफ़सील में जाने में मेरी कोई रुचि थी। फिल्म में सुपर हीरो अमिताभ बच्चन हैं और कथानक को चरमोत्कर्ष पर वे ही ले जाते हैं। लेकिन अपने अभिनय में चाहे जितनी विविधता लाने की कोशिश करें, वे एंग्री यंग मेन की छवि से बाहर नहीं निकल पाते। इससे पहले जो उनकी फिल्म आई थी ‘पीकू’ वही शायद एक अपवाद थी जिसमें वे एक उम्रदराज व्यक्ति का स्वाभाविक रोल निभाते हैं। वह फिल्म भी उनके ऊपर केन्द्रित थी। ‘पिंक’ में इसकी बहुत गुंजाइश नहीं थी यद्यपि सारे समय पर्दे पर वे ही छाए रहे।

इस लेख के शीर्षक में मैंने ‘पिंक’ को एक उत्तर-आधुनिक फिल्म की संज्ञा दी है। उत्तर-आधुनिकता एक समाजशास्त्रीय अवधारणा है, जो विगत चार दशक से चल रही है। इसका उदय पश्चिम में हुआ व इसको लेकर बहुत शास्त्रार्थ हो चुका है। हमारे यहां भी इस अवधारणा को आए बीसेक साल हो चुके हैं। अनेक बुद्धिजीवी इस पर माथा खपाते हैं। वह सब फिलहाल हमारी विवेचना का विषय नहीं है। आज जो है वह आधुनिक है; जो कल होगा यदि उसकी भविष्यवाणी यदि कर सकें, तो फिर उसे उत्तर-आधुनिक कहा जा सकता है। परन्तु जो आने वाले कल में होगा वह उस दिन के लिए आधुनिक हो जाएगा। यहां पहेलियां बुझाने के बजाय कहा जा सकता है कि जो आने वाले कल में संभावित है, किन्तु जिसकी कल्पना आज कर ली गई है वह उत्तर-आधुनिक है। दूसरे शब्दों में हम आज और कल के बीच विद्यमान एक खाई की बात कर रहे हैं।

हर समाज आज की तारीख में कुछेक परंपराओं, प्रथाओं और रीतियों से संचालित हो रहा है। यहां आज से आशय एक दिन से नहीं बल्कि एक कालखंड से है, जिसमें समाज अपरिवर्तनशील रहता है। ध्यान रखें कि परिवर्तन की रफ्तार लगातार बढ़ रही है। ‘पिंक’ फिल्म की व्याख्या करें तो स्पष्ट समझ आता है कि भारतीय समाज में वर्तमान में जो रीतियां और प्रथाएं विद्यमान हैं यह फिल्म उनको चुनौती देती है, तोड़ती है, परिवर्तन का आह्वान करती है और एक नई सोच को जन्म देती है। इस फिल्म का अंत जिस बिन्दु पर होता है वह आज के भारतीय समाज को स्वीकार नहीं है। इसमें परिवर्तन की जो आहट है वह आज की सामान्य बुद्धि और सामूहिक कल्पना से परे है। आज के समाज में औरत की जो दुर्दशा है वह किसी से छिपी हुई नहीं है। उसे कदम-कदम पर निंदा, प्रताडऩा और धिक्कार का सामना करना पड़ रहा है। उसे पुरुष के सामने झुक जाना चाहिए, अगर नहीं तो सजा भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। उस पर जो अनकथ अत्याचार जो हो रहे हैं उनके बारे में कुछ कहूं तो दोहराना ही होगा।

इस स्त्रीविरोधी समय में ‘पिंक’ की औरत बराबरी की बात करती है, अपनी देह पर पूरा अधिकार रखती है, पिता, भाई, अथवा पुत्र के संरक्षण में रहने की हिदायत को खारिज करती है। ‘पिंक’ की नायिका भारत की वह स्त्री है जो पुरुष प्रधान समाज में वर्चस्ववादी सोच को ठुकराते हुए साहसपूर्वक अपने लिए समान अधिकार मांगती है। एक वकील की भूमिका निभा रहे अमिताभ बच्चन इसमें स्त्री अधिकारों के पैरोकार बनकर सामने आते हैं। अमिताभ के रूप में एक ऐसा पात्र है, जो किंचित कौतूहल के साथ बदलते हुए समय को समझने की कोशिश कर रहा है। वह अलसुबह पार्क में अकेले जागिंग करती लडक़ी को विस्फारित  नेत्रों से लंबी देर तक देखता है। वह शायद समझना चाहता है कि समय किस तरह बदल रहा है। वह उनके साथ कुछ हिचकिचाहट के साथ सहानुभूति भी रखता है, यह तब पता चलता है जब वह मुसीबत में पड़ी लड़कियों के फ्लैट में जाकर उन्हें बिन मांगी कानूनी सलाह दे आता है।

इन दोनों दृश्यों में निर्देशक ने बहुत खूबसूरती के साथ मितभाषिता से काम लिया है। वकील साहब यहीं नहीं रुकते जब अन्य वकील "इन बिगड़ी हुई लड़कियों" का केस लडऩे से इंकार कर देते हैं। हमें फिर यह भी पता चलता है कि वकील साहब की पत्नी भी उनकी ही तरह विचारवान हैं। वे मृत्युशैया पर हैं, लेकिन अपने पति को लड़कियों की पैरवी करने के लिए प्रेरित करती हैं। यहां तक कि अस्पताल में उन्हें बुलाकर अपना आशीर्वाद भी देती हैं। इस तरह से ये पति-पत्नी आधुनिक समाज के वे प्रतिनिधि हैं जो कूपमंडूक न होकर खुले विचारों के हैं, जिन्हें आने-वाले समय का अहसास है, जो अपनी वृद्धावस्था में भी नए विचारों का स्वागत करने का साहस रखते हैं। अदालत में पैरवी करते हुए अमिताभ वकील की भूमिका में विस्तारपूर्वक तर्क करते हैं और विद्वान न्यायाधीश उनसे सहमत होते हुए उन लड़कियों के पक्ष में फैसला देते हैं, जो आज की नहीं, बल्कि आने वाली कल की लड़कियां हैं।

भारत में या बॉलीवुड में बनी यह पहली उत्तर-आधुनिक फिल्म नहीं है। भारतीय सिनेमा के सौ साल के इतिहास पर नज़र दौड़ाई जाए तो पता चलता है कि पहले भी ऐसी फिल्में बनी हैं जो ‘पिंक’ की ही तरह अपने समय से आगे की बातें थीं। अशोक कुमार-देविका रानी की फिल्म ‘अछूत कन्या’ सन् 1939 में बनी थी। उसमें सवर्ण और दलित के प्रेम का वर्णन था। ‘दुनिया न माने’ एक अन्य फिल्म थी जिसमें बूढ़ा व्यक्ति स्वयं ही बेमेल विवाह को खारिज कर देता है। तपन सिन्हा की बांग्ला फिल्म ‘अदालत उ एकटु मेये’ याने (अदालत और एक लडक़ी) में बलात्कार पीडि़त स्त्री है। शर्म से डूबने के बजाय अपने सम्मान की रक्षा के लिए अदालत का सहारा लेती है, जिसमें पुलिस इंस्पेक्टर उसका साथ देता है और अंतत: दुष्चरित्र युवकों को सजा मिलती है। विमल राय की ‘सुजाता’ का विषय भी विमल राय की सवर्ण युवक और दलित युवती का प्रेम है। इन सारी फिल्मों को आदर्शवादी कहा जा सकता है, लेकिन यह भी मानना होगा कि इनमें भविष्य में समाज का प्रतिबिंब दिखाई देते हैं।

ये फिल्में सिने जगत के बंधे-बंधाए ढांचे को तोड़ती हैं। ये कलात्मक दृष्टि से अथवा तकनीकी रूप से कितनी बेहतर हैं यह बात गौण हो जाती है जब कथानक सामने हो; किन्तु ऐसी फिल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बनाई जातीं। फिल्म एक रचनात्मक विधा है, अन्य विधाओं की तरह फिल्मों का भी एक सामाजिक मकसद हो सकता है और होना चाहिए। यह पर्याप्त नहीं है कि सामाजिक संदेश देने वाली फिल्म घिसी-पिटी लीक पर ही बने। क्योंकि ऐसी फिल्में बदलाव के भ्रम में यथास्थिति को कायम रखने से अधिक कुछ नहीं करतीं। आदर्श परिवार, आज्ञाकारी पुत्र, गृहलक्ष्मी, स्नेहिल, माता-पिता, दुष्ट सास-ननद इन सबको भारतीय दर्शक पिछले सौ साल से देखते आए हैं। फिल्मों में कलात्मक प्रयोग भी हुए हैं, लेकिन वह रचना का निर्माण पक्ष है। इस रचना की असली ताकत तो तब है जब वह आपके मन में उथल-पुथल मचा दे और जड़ मानसिकता को तोडक़र परिवर्तन के लिए आपको तैयार करे। ‘पिंक’ कुछ ऐसी ही आशा जगाती है। जिन्होंने इस फिल्म को देखा है वे शायद मेरी बात से सहमत होंगे।
देशबंधु अवकाश अंक में 15 जनवरी 2017 को प्रकाशित