Wednesday, 11 October 2017

विश्व राजनीति के दो संकेत

                                     

 अभी हाल में यूरोप से ऐसी दो खबरें आईं जिन पर भारत में कोई खास ध्यान नहीं दिया गया। शायद इसलिए कि इन दिनों हमारा ध्यान अधिकतर अपने देश की घटनाओं पर ही लगा रहता है। शायद इसलिए भी कि जिन दो अलग-अलग देशों से ये खबरें आईं वे सामान्य तौर पर हमारी चर्चा के केन्द्र में नहीं रहते। इंग्लैंड में या सुदूर अमेरिका में चल रहे राजनीतिक घटनाचक्र के बारे में हमारी दिलचस्पी रहती है, लेकिन जर्मनी या स्पेन या अन्य बहुत सारे देशों की ओर अमूमन ध्यान नहीं जाता। मैं भी शायद इन दो खबरों को नहीं उठाता यदि इनमें विश्व राजनीति के वर्तमान और भविष्य के बारे में कुछ संकेत मेरी समझ में न आते। 
यह मेरा अनुमान है कि जर्मनी में हाल ही में सम्पन्न आम चुनाव की खबर पाठकों की निगाहों से सरसरी तौर पर गुजरी होगी। वहां वर्तमान चांसलर एंजेला मर्केल की पार्टी ने चौथी बार सर्वाधिक वोट प्रतिशत और सीटें हासिल की हैं। यद्यपि उनका वोट प्रतिशत पिछली बार के मुकाबले लगभग आठ प्रतिशत गिर गया है, जिसके कारण सुश्री मर्केल को सरकार बनाने में कठिनाई पेश आ रही है। उल्लेखनीय है कि एक समय मर्केल की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी ने समाजवादी पार्टी को अपदस्थ किया था, लेकिन स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण दोनों ने मिलकर साझा सरकार बनाई थी। इस बार भी सोशलिस्ट पार्टी दूसरे नंबर हैं, लेकिन अब वह मर्केल के साथ साझा सरकार बनाने की इच्छुक नहीं है। तीसरे नंबर पर एक उग्र राष्ट्रवादी पार्टी एएफडी आई है जिसके वोट प्रतिशत में एकाएक इजाफा हुआ है। जर्मनी के चुनाव नियमों के अनुसार इस अतिवादी पार्टी को पहली बार संसद में बैठने का मौका मिलेगा। लेकिन वह एंजेला मर्केल से विपरीत ध्रुव पर है। वे अब अन्य छोटे दलों को साथ लेकर सरकार बनाने की कोशिश में जुटी होंगी!
दरअसल, एंजेला मर्केल इस समय यूरोप की सबसे कद्दावर नेता हैं, वे सबसे अधिक अनुभवी भी हैं और उन्होंने एक विश्व नेता के रूप में अपनी छवि निर्मित की है। एक ओर जहां विश्व के अनेक देश  राजनीतिक कारणों से विस्थापित हुए जनसमूहों को शंका की दृष्टि से देखते हैं, उनका तिरस्कार करते हैं, उनके प्रति मानवतावादी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहते और उन्हें अपने देश में शरण लेने से रोकते हैं, वहीं एंजेला मर्केल सीरिया और अन्य अरब देशों से आए शरणार्थियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण का परिचय दे रही हैं। इस समय जर्मनी में बड़ी संख्या में विस्थापितों को शरण मिली हुई है। सुश्री मर्केल पर चुनाव के समय दबाव था कि वे शरणार्थियों के प्रति कठोर रुख अपनाएं अन्यथा उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा, लेकिन उन्होंने  चुनावी जीत अथवा राजनीतिक लाभ के लिए सिद्धांतों से समझौता करने से इंकार कर दिया। इस कारण उनसे बहुत से मतदाता नाराज हुए और उनको मिले वोटों में इसी वजह से कमी आई। जबकि भावनाओं को भड़काने वाले अतिवादी दल के वोटों में अच्छी खासी बढ़ोतरी हुई।
आज पश्चिम एशिया, उत्तर अफ्रीका याने अरब जगत और बहुत से अनेक देशों में जो राजनीतिक अस्थिरता व गृहयुद्ध की स्थितियां विद्यमान हैं उन्हें समझने के लिए इतिहास में जाना होगा। इनमें से अधिकतर देश उपनिवेशवाद का शिकार थे। 1950 व 1960 के दशक में इन्हें स्वतंत्रता मिली भी तो वहां या तो साम्राज्यवादी शक्तियों की कठपुतली सरकारें बन गईं या फिर जनतांत्रिक परंपराओं से अनभिज्ञ कबीलाई नेताओं के हाथ में सत्ता आ गई। जो उपनिवेशवादी ताकतें पहले से ही इन देशों के प्राकृतिक संसाधनों को लूटते आई थीं उनके लिए ऐसी व्यवस्था अनुकूल थी ताकि लूट-खसोट का व्यापार अबाध गति से चलता रहे। इस तरह जो माहौल निर्मित हुआ उसमें हर तरह से वंचित समाज में धर्म अथवा कबीले के नाम पर आंतरिक अशांति पनपने लगी, कबीलाई मानसिकता हावी हो गई, गृहयुद्ध होने लगे और बहुत बड़ी संख्या में निरीह जनता को अपना वतन छोड़कर शरणार्थी बनना पड़ा। जिस यूरोप के अनेक देशों ने अतीत में उपनिवेश स्थापित किए थे, दूसरे देशों को गुलाम बनाया था, जिसने पहले और दूसरे विश्व युद्ध की विभीषिका झेली थी उसी यूरोप ने कुछ तो शायद प्रायश्चित करने के लिए या कुछ शायद जनतांत्रिक मूल्यों से प्रेरित होकर इन शरणार्थियों को अपने देश में जगह दी, समय के साथ उन्हें नागरिकता प्रदान की और बराबरी का दर्जा भी दिया। इंग्लैंड, फ्रांस, नीदरलैंड, नार्वे, जर्मनी आदि अनेक देशों में तुर्की, अल्जीरिया, सोमालिया, सीरिया, पोलैण्ड इत्यादि से आकर लोग बसे और कालांतर में शहर के मेयर से लेकर संसद सदस्य तक बने।
एक तरह से कहा जा सकता है कि यूरोप के एक बड़े हिस्से ने अपने अतीत पर पश्चाताप करते हुए एक नए विश्व समाज के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाए, जो शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित हो। एंजेला मर्केल ने इसमें जो भूमिका निभाई उसी के चलते उन्हें विश्व स्तर पर सम्मान मिला। लेकिन यह कटु वास्तविकता अपनी जगह पर है कि हर देश व समाज में एक ऐसा वर्ग भी होता है जो अपने आपको महासागर का हिस्सा बनाने के बजाय कुआं या डबरी बना रहना पसंद करता है। जो अतिवादी दल जर्मनी में तीसरे स्थान पर आया वह इसी सोच को प्रतिबिंबित करता है। इंग्लैंड में जिन्होंने ब्रेक्जाट की वकालत की वे भी इसी सोच को दर्शाते हैं। इ•ारायल 1948 से आज तक यही कर रहा है कि उसके और फिलीस्तिनियों के बीच में कांक्रीट की अभेद्य दीवार खड़ी हो जाए। अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसी प्रजाति के हैं। एक समय इंग्लैंड में इनॉक पॉवेल और अमेरिका में बैरी गोल्डवाटर जैसे राजनेता थे, जो इसी संकीर्ण मानसिकता के प्रतिनिधि थे, लेकिन वे हमेशा हाशिये पर बने रहे। आज दुर्भाग्य से उसी तरह के लोग हाशिये से केन्द्र में आ रहे हैं।
इस बीच एक और नई परिस्थिति निर्मित हुई है। विश्व के अनेक देशों में क्षेत्रीय अस्मिता प्रबल होने लगी है। स्काटलैंड में ग्रेट ब्रिटेन से अलग होने की मांग लगातार उठ रही है। वहां दो बार जनमत संग्रह भी हो चुका है। कुछ वर्ष पूर्व इंडोनेशिया से अलग होकर तिमोर ल एस्ते नामक नया देश बन चुका है। भारत में भी कश्मीर घाटी में पृथकतावादी ताकतें सक्रिय हैं। नेपाल में मधेशियों का एक वर्ग स्वतंत्र देश की मांग कर रहा है। श्रीलंका में तमिल अस्मिता और सिंहली वर्चस्ववाद का द्वंद्व चल रहा है। स्पेन के कैटोलनिया प्रांत में भी आत्मनिर्णय की आवाज लंबे समय से उठती रही है। पिछले दिनों वहां एकाएक गैर सरकारी तौर पर जनमत संग्रह का आयोजन किया गया, जिसमें कैटोलेनिया को अलग देश बनाने के प्रस्ताव को प्रचंड बहुमत मिला। स्पेन के प्रधानमंत्री ने कहा है कि वे इस जनमत संग्रह को अवैध मानते हैं, स्पेन की अखंडता के साथ कोई समझौता नहीं होगा और कैटोलेनिया को अलग देश नहीं बनने दिया जाएगा।
स्पेन की यह घटना सोचने पर मजबूर करती है कि क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल इस तरह क्यों उठ रहे हैं। जैसा कि हम जानते हैं राष्ट्रवाद की अवधारणा यूरोप से ही आई है। वहां के छोटे-छोटे समाज भी अपने आपको राष्ट्र निरूपित करते हैं। कुछ वर्ष पूर्व स्पेन के सर्वोच्च न्यायालय ने भी निर्णय दिया था कि कैटोलेनिया एक राष्ट्र तो है, लेकिन वह एक सार्वभौम देश का हिस्सा है, वह अलग देश नहीं बन सकता। मैं जहां तक समझता हूं जब किसी भी देश या समाज में वर्चस्ववादी या बहुमतवादी मानसिकता हावी हो जाती है तब क्षेत्रीय, जातीय या राष्ट्रीय अस्मिता के ऐसे सवाल उठते हैं। यह सत्ताधीशों के विवेक पर निर्भर करता है कि वे सबको साथ लेकर चल सकते हैं या नहीं।
देशबंधु में 12 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित