Friday, 20 October 2017

दिए जलाएं, पटाखों से दूर रहें

                                            
 भारत में पटाखों का चलन 1920 के बाद प्रारंभ हुआ जब तमिलनाडु के शिवाकाशी नगर में एक उद्यमी श्री नाडर ने देश का पहला पटाखा कारखाना स्थापित किया। सर्वोच्च न्यायालय में पटाखों पर प्रतिबंध लगाने के केस में याचिकाकर्ताओं की वकील सुश्री हरिप्रिया पद्मनाभन ने यह तर्क प्रस्तुत किया है। जिन बच्चों की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी, सुश्री पद्मनाभन का बेटा भी उनमें से एक है। आज दीवाली का दिन है और जब हम अपने बच्चों के साथ पटाखे चला रहे होंगे तब इस प्रकरण को विस्तार से जान लेना हमारी शारीरिक और मानसिक सेहत दोनों के लिए अच्छा  होगा। यह तो तय है कि जिन भी राज्यों में दीवाली धूमधाम से मनाई जाती है उनमें से अधिकतर स्थानों पर पटाखे चलेंगे। सुप्रीम कोर्ट का फैसला सीमित और आंशिक है, वह सिर्फ दिल्ली के लिए है और पाबंदी एक नवंबर तक के लिए ही लगाई गई है। यह दीगर बात है कि पंजाब से लेकर मुंबई तक कई जगहों पर स्थानीय स्तर पर रोक लगा दी गई है। उसका असर कितना होगा कहना कठिन है।
पटाखों पर रोक लगाने का फैसला देने वाले न्यायमूर्ति सीकरी ने गहरे विषाद में भरकर कहा है कि हम जानते हैं कि लोग पटाखे चलाएंगे, लेकिन इस वजह से हम अपना फैसला वापिस नहीं ले सकते। यह भी एक खिन्न कर देने वाला तथ्य है कि उन्हें इस टिप्पणी के साथ अपने धर्मप्राण होने की दुहाई देना पड़ी। यह दुर्भाग्य की बात है कि पर्यावरण की रक्षा, स्वस्थ जलवायु का अधिकार और बच्चों तथा आम नागरिकों की सेहत का सवाल जैसे मुद्दों से प्रेरित एक तर्कसंगत फैसले को संकीर्ण सोच वाले तत्वों ने साम्प्रदायिकता का रंग दे दिया। इसे अनावश्यक एवं अवांछित रूप से हिन्दू विरूद्ध अन्य धर्मों का रंग देने की कोशिश की गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बड़े-बड़े नेता भी इस दुराग्रह को आगे बढ़ाने में शरीक हो गए। इनमें से किसी ने भी शायद सबसे बड़ी अदालत के फैसले को पढ़ने की जहमत नहीं उठाई और न ही किसी ने तथ्यों की पड़ताल करने की ईमानदार चेष्टा की।  देश में लगातार भावनाओं के उफान में बहने के लिए उकसाया जा रहा है और एक वर्ग तो कम से कम ऐसा है जो इस उकसाने में आ जाता है।
यदि हम तथ्यों की बात करें तो सबसे पहले गौर करना होगा कि आज से बारह साल पहले 2005 में सर्वोच्च न्यायालय ने ध्वनि प्रदूषण संबंधी एक फैसले में कहा था कि यह आवश्यक नहीं है कि दीपावली और पटाखे साथ-साथ चलें। तब अदालत ने यह भी कहा था कि पटाखे किसी धार्मिक परंपरा का अंग नहीं है और उन्हें दीपावली से नहीं जोड़ा जा सकता। सुश्री पद्मनाभन ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में इस फैसले का उल्लेख किया है। उन्होंने आज से कोई बीस साल पहले केन्द्रीय प्रदूषण निवारण मंडल द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में दी गई दलील का भी उल्लेख किया है कि पटाखों में गंधक का उपयोग नहीं होना चाहिए, क्योंकि उसका धुआं हानिकारक होता है। ध्यान रहे कि उस समय केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। यही नहीं वाजपेयी सरकार के ही समय दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल भी पहल की थी कि घर-घर में पटाखे जलाने के बजाय सार्वजनिक स्थलों पर आतिशबाजी होना चाहिए, जिससे प्रदूषण पर नियंत्रण पाया जा सके।
पटाखों से उठने वाला शोर और धुआं दोनों सेहत पर बुरा असर डालते हैं। इनसे दिल के मरीजों को तकलीफ होती है, अस्थमा की शिकायत बढ़ती है तथा पटाखों के शोर से कान के परदे भी खराब होते हैं। ये जो बच्चे सर्वोच्च न्यायालय में याचना करने गए वे कोई पेशेवर मुकदमेबाज नहीं थे। उन्होंने देखा था कि पिछले साल पटाखों के शोर व धुएं से दिल्ली महानगर पर कैसी विपत्ति आई। पूरे शहर के आकाश पर धुआं इस कदर छाया कि साफ होने में कई दिन लग गए। बच्चों को तकलीफ न हो, यह सोचकर स्कूलों में दो या तीन दिन की छुट्टी करने की नौबत तक आ गई। एक तो हमारे देश में वैसे ही हर तरह के भारी प्रदूषण है। यह विडंबना है कि एक तरफ प्रधानमंत्री स्वच्छता अभियान चलाते हैं, स्वच्छ भारत का नारा देते हैं और दूसरी तरफ उन्हीं के अंधसमर्थक धर्म की आड़ लेकर ध्वनि और वायु प्रदूषण फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं।
मैंने कुछ दिन पहले फेसबुक पर लिखा था कि दुनिया के अधिकतर देशों में आतिशबाजी सार्वजनिक स्थान पर कुशल और प्रशिक्षित आतिशबाजों के हाथों होती है। इसमें आतिशबाजी का आनंद भी मिलता है और निजी सुरक्षा भी बनी रहती है। अमेरिका हो या जापान, रूस हो या चीन, सब तरफ आतिशबाजी करने के साल में एक-दो अवसर आते ही हैं। ऐसे मौकों पर जहां तक संभव हो, समुद्र, नदी या तालाब के किनारे या फिर बड़े से खुले मैदान में आयोजन किया जाता है। रंगबिरंगी फुलझड़ियां आकाश में छूटती हैं, बहुत मनमोहक दृश्य होता है, उसका संचालन रिमोट कंट्रोल से किया जाता है। दर्शकगण के बैठने के लिए स्थान निर्धारित होता है, वहां से वे नजारा देख सकते हैं। इसका समय सीमित होता है। एक या डेढ़ घंटे में खेल खत्म और सब अपने-अपने घर लौट आते हैं। भारत में भी तो दस बजे रात के बाद लाउड स्पीकर और पटाखों पर प्रतिबंध है ताकि लोग उसके बाद चैन की नींद ले सकें।
हम विदेशों की बहुत बातों में नकल करते हैं। एक अच्छी परंपरा की भी नकल कर लें तो उसमें बुराई क्या है? क्या हम नहीं जानते कि घर-घर में आतिशबाजी करने से दुर्घटनाओं को न्यौता मिलता है। हमारे रायपुर शहर के सेवाभावी नेत्र चिकित्सक डॉ. दिनेश मिश्र दीपावली के दिन-रात उन बच्चों का इलाज करने में लगे रहते हैं जिनकी आंखों में बारूद चला जाता है। हाथ में लेकर अनार जलाने पर हाथ झुलस जाते हैं। पटाखों से कभी कपड़ों में आग लग जाती है तब अस्पताल के लिए भागना पड़ता है। त्यौहार की सारी खुशी तिरोहित हो जाती है। उसके बाद भी यदि हम सबक नहीं ले रहे हैं या जनता को सबक न लेने के लिए भड़काया जा रहा है तो यह सिर्फ विडंबना नहीं है बल्कि अक्षम्य अपराध है।
हमें यह भी याद कर लेना उचित होगा कि बारूद का आविष्कार आज से लगभग दो हजार साल पहले चीन में हुआ था, वहां से अरब देशों की यात्रा करते हुए फिर वह लगभग पांच सौ साल पहले भारत पहुंचा, लेकिन दीपावली तो हम बहुत पहले से मनाते आए हैं। कृषि प्रधान देश भारत में चौमासा बीतने, फसल कटने, घर में फसल की आमदनी आ जाने और साथ ही साथ शरद ऋतु के सुहावने और शीतल मौसम- इन सबका आनंद मनाने का उत्सव है दीपावली। तेल के दिए जलकर अमावस की रात वातावरण में उजास भरते हैं। घर में तुलसी चौरे पर रखा दिया या नदी में दीप प्रवाह, हमारी आंखों को शुरू से लुभाते रहे हैं। इसी तरह हमारे जीवन में उल्लास की सृष्टि करते हैं। इस निर्मल वातावरण में ये कमबख्त पटाखे कहां से आ गए!
यह एक और विडंबना है कि अब माटी के दिए लुप्त होते जा रहे हैं। उनकी जगह बिजली की झालर ने ले ली है। वह भी चीन में बनी हो तो ज्यादा अच्छा क्योंकि दाम में सस्ती पड़ती है। जो चीज हमारी परंपरा में नहीं है उसे अपनी सुविधा देखते हुए हमने अपना लिया है, लेकिन जब अपनी निजी सुविधा के बजाय सार्वजनिक सुविधा की बात आई तो हम व्यर्थ में वितंडा खड़ा करने लग गए। अरे भाई! बम फोड़ने का इतना ही शौक है तो उसके पहले शहीदे आजम भगतसिंह को याद कर लो जिन्होंने बहरी सरकार तक बात पहुंचाने के लिए बम फोड़ा था। आज तो देश में लोकतांत्रिक सरकार है। इसमें बम की जरूरत नहीं है, न लक्ष्मी बम की, न सुतली बम की, न पटाखों की लड़ी की। 
देशबंधु में 19 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित