Wednesday, 25 October 2017

बदलते समय में स्टील फ्रेम


 भारत में समय-समय पर देश के प्रशासनिक ढांचे में सुधार और बदलाव की मांग उठती रही है। इस बहस की शुरूआत 1947 में देश की आजादी के साथ प्रारंभ हो गई थी। अंग्रेजों ने ब्रिटिश इंडिया में सुचारु प्रशासन तंत्र के लिए आईसीएस अर्थात इम्पीरियल सिविल सर्विसेस की व्यवस्था लागू की थी। आईसीएस में शुरूआत में इंग्लैंड से ही अफसर आते थे, बाद में होनहार भारतीयों को भी स्थान मिलने लगा था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भी आईसीएस की परीक्षा उत्तीर्ण की थी, यद्यपि अंग्रेज सरकार की नौकरी करना उन्हें मंजूर नहीं हुआ। बहरहाल 1947 में बहस छिड़ी कि आईसीएस को कायम रखें या भंग कर दें। पंडित नेहरू और उनके गृहमंत्री सरदार पटेल दोनों का मानना था कि नवस्वतंत्र देश की व्यवस्था संभालने के लिए अनुभवी प्रशासनिक अधिकारियों की आवश्यकता है इसलिए आईसीएस को कायम रखा गया। सरदार पटेल ने तो उसे स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया की संज्ञा भी दी थी। एक सोच यह भी थी कि एक अखिल भारतीय सेवा होने से प्रशासनिक स्तर पर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में मदद मिलेगी। आगे चलकर आईसीएस का देशीकरण हुआ और आईएएस अर्थात भारतीय प्रशासनिक सेवा अस्तित्व में आई।
आज हम देखते हैं कि आईएएस का तंत्र बदस्तूर कायम है। इस बीच देश में राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक सभी मोर्चों पर अनेक बदलाव आए हैं, लेकिन भारतीय प्रशासनिक सेवा पर इन बदलावों का कोई खास असर नहीं पड़ा है। आज भी आईएएस बन जाना भारतीय समाज में गर्व का विषय होता है। यूसीएससी की परीक्षा में लाखों नौजवान हर साल शामिल होते हैं जिनमें से कुछ सौ ही उत्तीर्ण हो पाते हैं। जिन्हें आईएएस नहीं मिल पाता उनमें से एक-दो हजार को अन्य संघीय सेवाओं जैसे आईपीएस, आईआरएस, आईएफएस इत्यादि में मौका मिल जाता है। एक समय था जब भारतीय विदेश सेवा को सर्वोच्च वरीयता मिलती थी, लेकिन उसका आकर्षण पिछले सालों से कम हुआ है। आईएएस बनने का मतलब देश का राजा बन जाने जैसा है। वैसे तो आईएएस केन्द्रीय सेवा के अधिकारी होते हैं, लेकिन उन्हें जिस प्रदेश में भेजा जाता है वहां  लोक प्रशासन की परंपरा और स्थानीय वातावरण के अनुसार उन्हें सामंजस्य भी स्थापित करना होता है।
आईएएस की व्याप्ति सर्वत्र है। उन्हें प्रशासन के शिखर याने कैबिनेट सेक्रेटरी से लेकर नीचे अनुविभागीय अधिकारी या एसडीओ के पद तक काम करते हुए हम देखते हैं। इस अमले के सामने 1947 में जो चुनौतियां और जिम्मेदारियां थीं उनका स्वरूप समय के साथ बदलता गया है। अभी कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इस दिशा में पुनर्विचार की बात की। मेरी जानकारी में समय के साथ बदलाव की यह शुरूआत इंदिरा गांधी के समय में हो गई थी। उन्होंने आईएमपी या इंडस्ट्रीयल मैनेजमेंट पूल नामक एक समूह बनाया था जिसमें कुशल टैक्नोक्रेट्स को सार्वजनिक उद्यमों में प्रशासनिक जिम्मेदारियां सौंपने की पहल हुई थी। यह प्रयोग अधिक समय तक नहीं चला। लेकिन उन्हीं दिनों इंदिरा गांधी ने हिन्दुस्तान लीवर के सीईओ रहे एम.ए. वदूद खान को भारत सरकार में सचिव बनाया था। आणविक ऊर्जा, अंतरिक्ष विज्ञान आदि विभागों में भी आईएएस के बदले वैज्ञानिक ही सचिव बनाए गए थे।
श्रीमती गांधी के किए कुछ प्रयोग अभी भी सफलतापूर्वक चल रहे हैं। यद्यपि इससे आईएएस के बुनियादी ढांचे पर कोई फर्क नहीं पड़ा। राजीव गांधी ने अपने समय में जिलाधीश से लेकर भारत सरकार के संयुक्त सचिव स्तर तक के अधिकारियों के लिए पुनश्चर्या पाठ्यक्रम जैसे प्रयोग किए थे। उनका सोचना था कि अधिकारियों को निरंतर सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए। फिर कोई पन्द्रह-बीस साल पहले एक नया सुझाव आया कि जिस तरह बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई होती है या विधि का पांच वर्षीय पाठ्यक्रम लागू हो गया है उसी तरह प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए भी बारहवीं के बाद पांचसाला कोर्स प्रारंभ किया जाए। यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया। अभी कुछ दिन पहले एक प्रतिष्ठित टैक्नोक्रेटअशोक पार्थसारथी ने इस स्टील फ्रेम में सुधार के लिए कुछ ठोस सुझाव दिए हैं।  उनका सोचना है कि प्रशासनिक ढांचे को उसके विभिन्न आयामों के अनुसार समूहों में बांट दिया जाए और अधिकारियों को विकल्प दिया जाए कि वे अपनी रुचि के अनुसार जिस समूह में जाना चाहते हैं उसमें चले जाएं।
श्री पार्थसारथी इन्हें सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, टेक्नालॉजी, ऊर्जा, रसायन, परिवहन, ग्रामीण, विज्ञान एवं सामाजिक क्षेत्र ऐसे समूहों में बांटते हैं। वे इस तथ्य को संज्ञान में लेते हैं कि हमारे यहां अधिकारियों को बिना किसी उचित कारण के कभी भी, किसी भी महकमे में भेजा जाता है। आज जो व्यक्ति बैकिंग देख रहा है, कल उसे आप परिवार नियोजन देखने कह सकते हैं। इसमें समय और साधनों की बर्बादी ही होती है। एक अधिकारी किसी विभाग में आता है तो उसे तीन माह तो विभाग की रीति-नीति, कार्यविधि इत्यादि को समझने में लग जाते हैं। वह जब उस काम में रम जाता है तब एकाएक उसे कहीं और भेज दिया जाता है। अपने अनुभव की बात करें तो यह तर्क सटीक लगता है।
यह मजे की बात है कि जिस इंग्लैंड से हमने इस व्यवस्था को लिया है वहां ऐसा नहीं होता। सरकार के मंत्री बदलते रहते हैं, सरकार भी बदल जाती है, लेकिन विभाग के अधिकारी लंबे समय तक वहीं पर काम करते रहते हैं। वे संस्थागत स्मृति के धनी होते हैं याने उन्हें पता होता है कि अतीत में कोई नीति या निर्णय क्यों और किसलिए लिया गया था। वे अनुभवहीन मंत्री को सही सलाह देने की स्थिति में होते हैं गो कि अंतिम निर्णय तो मंत्री को ही लेना होता है। अमेरिका में आईसीएस या आईएएस तो नहीं हैं, लेकिन वहां भी अंडर सेक्रेटरी, जो हमारे विभागीय सचिव के स्तर तक के अधिकारी होते हैं, बीसियों बरस उसी विभाग में काम करते हैं। इस दृष्टि से हमारी स्थिति दुबले और दो असाढ़ वाली है। मंत्री तो आते-जाते रहते हैं, अधिकारी भी हमेशा दबाव में रहते हैं कि जाने कब जगह या विभाग बदल जाए। मंत्रियों के पास इतना धीरज भी नहीं होता कि वे अधिकारियों की बात ध्यान से सुनें। इसके चलते हमारी योजनाएं अकसर अपना निर्धारित लक्ष्य हासिल करने में असफल हो जाती हैं।
भारत में आईएएस के बारे में एक बात अच्छी है कि उनकी पोस्टिंग देश के किसी भी हिस्से में की जा सकती है। यह आवश्यक नहीं कि वे जिस प्रदेश का कैडर चाहे वही उन्हें मिल जाए। दूसरी अच्छी बात है कि उन्हें हर तरह की परिस्थिति में काम करने की ट्रेनिंग मिलती है। अपने प्रशिक्षण और कार्य दोनों के दौरान उन्हें देश के छोटे-छोटे गांव और कस्बों में भी असुविधा में रहना पड़ता है। किन्तु इन अच्छाइयों को कुछेक बुराइयों का ग्रहण लग गया है। एक तो देश या प्रदेश में जब भी राजनैतिक नेतृत्व कमजोर हुआ है आईएस ने उसका लाभ उठाया है। अपने तात्कालिक हितों के लिए राजनीतिक आकाओं से सांठगांठ करने की खबरें अब आम होने लगी हैं। उन्हें जिस निष्पक्षता,  निर्भीकता और शिष्टता का परिचय देना चाहिए उसमें शोचनीय कमी आई है। आज से चालीस साल पहले तक आईएएस अधिकारियों की ईमानदारी के चर्चे होते थे, आज उनकी बेईमानी की खबरें सुनने मिलती हैं। सुना तो यह भी है कि दहेज इत्यादि सामाजिक बुराइयों को लेकर एक पुरातनपंथी सोच भी विकसित होने लगी है।
आज इसलिए एक तरफ यदि प्रशासनिक ढांचे में संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है, तो दूसरी तरफ नेहरू और पटेल ने इनमें जो विश्वास व्यक्त किया था नए सिरे से उसे भी कायम करने की आवश्यकता है। अगर हमें स्टील फ्रेम चाहिए तो मन, वचन, कर्म से उसमें इस्पाती दृढ़ता होना आवश्यक है। सिर्फ जबानी जमा-खर्च से काम नहीं चलेगा।
देशबंधु में 26 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित