Wednesday, 8 November 2017

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता पर एक अधूरी किताब

 मेरे सामने सौ से कुछ अधिक पृष्ठों की एक पुस्तक है जिसका शीर्षक है- छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता: हमारे पुरोधा । पुस्तक के लेखक व संपादक परितोष चक्रवर्ती हैं। परितोष ने 1968  के आसपास देशबन्धु से अपने पत्रकार जीवन की शुरूआत की थी। वे उस समय हिंदी जगत में एकमात्र पर्यटक संवाददाता थे। गांव-गांव घूमना और वहां की तस्वीर पाठकों के सामने रखना उनका काम था जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। देशबन्धु के बाद उन्होंने कहीं और भी काम किया, फिर पत्रकारिता छोड़ जनसंपर्क के क्षेत्र में चले गए। इस बीच उनकी साहित्य यात्रा भी जारी रही। वे एक कथाकार, उपन्यासकार व अनुवादक के रूप में जाने गए। ज्ञानरंजन द्वारा संपादित वामपंथी पत्रिका पहल  में एक समय वे मानद सहयोगी संपादक रहे। देशबन्धु के लिए उन्होंने जनरल शंकर रायचौधुरी द्वारा कारगिल युद्ध पर लिखी रिपोर्टों का अनुवाद भी किया। बाद में वे रायपुर के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में स्थापित माधवराव सप्रे पीठ के पहले अध्यक्ष नियुक्त हुए। आशय यह कि छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता पर एक संदर्भ पुस्तक लिखने के वे अधिकारी पात्र थे।

मैंने बहुत उम्मीद से इस पुस्तक को पढ़ने उठाया। मेरे लिए यह खुशी की बात थी कि जिन छत्तीस जनों पर उन्होंने लिखा, उनमें से ग्यारह जन तो कम या अधिक अवधि के लिए देशबन्धु से सम्बद्ध रहे थे। परितोष ने मेरा नाम भी इस सूची में शामिल करना आवश्यक समझा, इससे भी प्रसन्नता होना ही थी। यह बताना भी उचित होगा कि इस पुस्तक की रूपरेखा जब बन रही थी, तब परितोष चक्रवर्ती ने एकाधिक बार मुझसे नामों के बारे में सलाह-मशविरा किया था। स्पष्ट कर दूं कि मैंने अपना नाम उन्हें नहीं सुझाया था। लेकिन जिस रूप में पुस्तक प्रकाशित हुई है, उसने मुझे निराश किया है। परितोष ने छत्तीसगढ़ के वृहत्तर अध्ययन की दृष्टि  से एक आवश्यक दायित्व अपने कंधों पर लिया था, लेकिन लगता है कि साधनों के अभाव, स्वास्थ संबंधी परेशानियों, जल्दबाजी या इन सबके मिले-जुले प्रभाववश वे पुस्तक का सुचारु संपादन नहीं कर पाए।
सबसे पहले पुस्तक में शामिल छत्तीस नामों को ही ले लें। यह कतई आवश्यक नहीं था कि प्रदेश का नाम छत्तीसगढ़ है, इसलिए सिर्फ छत्तीस नाम ही लिए जाएं, बत्तीस या चालीस नहीं। प्रदेश की पत्रकारिता के इतिहास से जो लोग परिचित हैं उन्हें यह समझने में देर नहीं लगेगी कि नामावली में ऐसे अनेक जनों को छोड़ दिया गया है, जिन्होंने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय व महत्वपूर्ण योगदान किया है। यदि प्रारंभ से ही बात करें तो माधवराव सप्रे व रविशंकर शुक्ल के बाद ठाकुर प्यारेलाल सिंह का नाम आना चाहिए था। ठाकुर साहब ने साप्ताहिक राष्ट्रबन्धु की स्थापना की थी व उसमें वे नियमित लिखा करते थे। इसी तरह सुंदरलाल त्रिपाठी का नाम भी छोड़ दिया गया है, जो पं. रविशंकर शुक्ल द्वारा रायपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल से प्रारंभ उत्थान पत्रिका के संपादक थे। त्रिपाठीजी की संस्कृत बोझिल भाषा को पढ़कर इसी रायपुर में तब पंडित नेहरू ने टिप्पणी की थी कि डिस्ट्रिक्ट कौंसिल ने पत्रिका निकालकर अच्छा काम किया है, लेकिन इसकी भाषा सरल होना चाहिए थी ताकि आम जनता को समझ में आ जाए।
मेरे विचार में इस सूची में द्वारिका प्रसाद मिश्र का समावेश भी होना चाहिए था। उनका बचपन व स्कूली जीवन छत्तीसगढ़ में ही बीता था। आगे चलकर उन्होंने लोकमतश्री शारदा और सारथी जैसी पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया था। अगर उन्हें एक पल के लिए छोड़ भी दें तो उनके सहपाठी रायपुर के नयापारा मुहल्ला निवासी कन्हैया लाल वर्मा का नाम तो होना ही चाहिए था क्योंकि वे बरसों तक रायपुर में हितवाद के संवाददाता रहे। इसी तरह पी.आर. दासगुप्ता का नाम भी संपादक को ध्यान नहीं आया। पी.आर. दासगुप्ता रायपुर प्रेस क्लब के पहले अध्यक्ष थे। युगधर्म रायपुर के पहले संपादक पद्माकर भाटे भी सूची से बाहर हैं और विष्णुदत्त मिश्र तरंगी जो महाकौशल के संपादक होने के अलावा एक जाने-माने लेखक थे। क्रांतिकारी विश्वनाथ वैशंपायन उनके बाद महाकौशल के संपादक हुए। उन्हीं दिनों एम.वाई. बोधनकर हितवाद व स्टेट्समैन के संवाददाता थे। इन सबका प्रदेश की पत्रकारिता के विकास में महती योग रहा है।    
राजेन्द्रलाल गुप्ता ने कोरबा से वक्ता  टाइटल से उद्योगनगरी का पहला पत्र प्रारंभ किया था। वे भी इस पुस्तक में स्थान नहीं पा सके, न रामचन्द्र गुप्ता जिन्हें दुर्ग के पहले दैनिक चिंतक  प्रारंभ करने का श्रेय जाता है और न श्रीकिशन असावा जिन्होंने सरगुजा संभाग का पहला दैनिक अंबिकावाणी  स्थापित किया। ओम प्रकाश मिश्रा ने नवभारत से कॅरियर प्रारंभ किया था, वे आगे चलकर यूएनआई के वरिष्ठ पत्रकार रहे; के.आई. अहमद अब्बन जगदलपुर के थे, उन्होंने देशबन्धु में बरसों काम किया; फिर वे केन्द्रीय शिल्प बोर्ड में चले गए; इनके साथ देशबन्धु से ही शुरूआत करने वाले पंकज शर्मा थे, जिनकी भूटान में उपराष्ट्रपति के साथ दौरे से लौटते समय भूस्खलन में असमय मृत्यु हुई थी। उनके नाम रायपुर की पुरानी बस्ती में पंकज शर्मा उद्यान भी है। यह आश्चर्य की बात है कि परितोष इन सबको कैसे भूल गए। धीरज लाल जैन प्रदेश के ब्यूरो प्रमुखों में अग्रणी पत्रकार थे। उन्होंने लगभग साठ साल पत्रकारिता की पर उनका नाम भी नदारद है।
जैसा कि पाठक जानते हैं हाईवे चैनल प्रदेश का पहला संपूर्ण सांध्य दैनिक है। उसके प्रथम संपादक प्रभाकर चौबे भी सूची से बाहर हैं और विनोदशंकर शुक्ल भी जिन्होंने नवभारत से पत्रकारिता शुरू की और वर्षों तक छत्तीसगढ़ कॉलेज में पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष रहे। दूसरी ओर कुछ नामों का समावेश क्यों हुआ है यह समझ में नहीं आता। बैरिस्टर छेदीलाल अप्रतिम स्वाधीनता सेनानी थे, लेकिन वे पत्रकार भी थे इसका कोई परिचय पुस्तक में शामिल उनके जीवनवृत्त से नहीं मिलता। पंडित रविशंकर शुक्ल ने उत्थान  और महाकौशल आरंभ किए थे, इस नाते उन्हें शामिल किया गया है, लेकिन यह महत्वपूर्ण तथ्य अंकित नहीं हुआ कि शुक्ल जी ने ही नागपुर टाइम्स  की स्थापना की थी। भवानी सेनगुप्ता इस अंग्रेजी अखबार के संपादक थे, उन्होंने बाद में चाणक्य सेन छद्मनाम से मुख्यमंत्री  शीर्षक उपन्यास लिखा था जो बहुचर्चित हुआ।
लेखक ने गजानन माधव मुक्तिबोध को छत्तीस पत्रकारों में शामिल किया है। वे निश्चित रूप से एक सजग पत्रकार थे, लेकिन वे अपने जीवन के अंतिम वर्षों में अध्यापक के रूप में राजनांदगांव आए थे, अर्थात छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में उनका कोई योगदान नहीं था। उधर बिलासपुर के लोकप्रिय नेता बी.आर. यादव को भी स्थान मिला है, अपने कैरियर के प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने पत्रकारिता की थी, लेकिन हमारे सामने उनकी छवि राजपुरुष की है, पत्रकार की नहीं। यदि उन्हें शामिल करना था तो मोतीलाल वोरा को क्यों छोड़ दिया गया, इस प्रदेश की पत्रकारिता में थोड़ा-बहुत योगदान तो उनका भी है।
पुस्तक का संयोजन भी किसी हद तक बेतरतीब है। ऐसी व्यक्तिचित्र वाली पुस्तकों में सामान्यत: दो तरह से सूचीकरण किया जाता है। या तो अकारादि क्रम से या फिर आयु की वरिष्ठता से। परितोष ने आयु की वरिष्ठता के अनुसार सूचीकरण किया है। ऐतिहासिक कालक्रम की दृष्टि से यह किसी हद तक ठीक था, लेकिन वे इसका पूरी तरह निर्वाह नहीं कर पाए। जैसे जून 1930 में जन्मे बी.आर. यादव का परिचय, दिसंबर 1931 में जन्मे श्रीकांत वर्मा से पहले आना चाहिए था। इसी तरह शरद कोठारी का नाम गुरुदेव काश्यप के पहले होना उचित था। श्यामलाल चतुर्वेदी, गोविंदलाल वोरा, बसंत अवस्थी, सत्येन्द्र गुमाश्ता, किरीट दोषी इनके परिचय भी सही क्रम में नहीं हैं। पत्रकारों के जीवनवृत्त भी आधे-अधूरे प्रतीत होते हैं। एक शोधपूर्ण कार्य में इस तरह की लापरवाही मैं क्षम्य नहीं मानता। 
बारह-बारह पत्रकारों के परिचय की दो संक्षिप्त पुस्तिकाएं भी विश्वविद्यालय ने प्रकाशित की थी। यह पुस्तक उस परियोजना की एक तरह से पूर्णाहुति है, लेकिन इसमें कहीं भी विश्वविद्यालय का नाम नहीं है। ऐसा क्यों कर हुआ इसका स्पष्टीकरण परितोष चक्रवर्ती ही दे सकते हैं। फिलहाल मुझे लग रहा है कि इस विषय पर पूरी तरह शोध करके नए सिरे से प्रकाशन होना चाहिए अन्यथा इस पुस्तक की उपयोगिता संदिग्ध बनी रहेगी।
देशबंधु में 09 नवंबर 2017 को प्रकाशित