Thursday, 14 June 2018

वियतनाम : एक अधूरी यात्रा-2

                                       
वियतनाम के पूर्व में स्थित क्वांग त्री से पश्चिम में पड़ोसी देश लाओस की सीमा तक राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-9 जाता है। इस रास्ते पर क्वांग त्री शहर से कुछ दूरी पर ही एक राष्ट्रीय समाधि स्थल बना हुआ है। एक छोटी सी पहाड़ी पर अवस्थित इस स्थान में दूर से देखने पर कुछ असाधारण प्रतीत नहीं होता, लेकिन यह वियतनाम के मुक्ति संघर्ष का एक महत्वपूर्ण यादगार स्थल है। मुख्य द्वार से प्रवेश करते साथ दाहिनी ओर एक कलात्मक छतरी बनी है। इसके ठीक पीछे एक विशालकाय प्रस्तर प्रतिमा है। एक युवा सिपाही, साथ में उसकी पत्नी और गोद में एक बालक। छतरी के दोनों ओर भी कुछ छोटी प्रतिमाएं लगी हैं। छतरी के नीचे एक मंजूषा है जिसमें वहां पहुंचने वाले अगरबत्ती लगाकर प्रार्थना करते हैं। यहां से कुछ सीढ़ियां ऊपर चढ़ने के बाद दूर-दूर तक सिर्फ समाधियां ही दिखाई देती हैं। इस स्थान पर दस हजार से अधिक सैनिकों की समाधियां बनी हुई हैं जिनकी बहुत जतन के साथ देखभाल होती है।
अनेक समाधियों में सैनिक का पूरा परिचय उत्कीर्ण है। उसका फोटो भी लगा हुआ है और हर समाधि पर कमल का एक कृत्रिम फूल अवश्य चढ़ाया हुआ है। एक जगह एक बड़ी सी समाधि बनी है जिसके पास सूचनापटल में एक सौ तीस सैनिकों के नाम लिखे हैं। उनके क्षत-विक्षत अंग अलग से पहचान में नहीं आ सके इसलिए सामूहिक समाधि बनाई है। अकेले क्वांग त्री प्रांत में ऐसे सत्ताइस समाधि स्थल हैं। समूचे देश में तो इनकी संख्या अनगिनत हैं। यह एक राष्ट्रीय समाधि स्थल है और अन्य प्रांतों में भी ऐसे बड़े-छोटे स्थान हैं जहां बड़ी संख्या में सैनिक चिरशांति में सो रहे हैं। इस स्थान पर पहुंच कर मुझे हिरोशिमा और नागासाकी की याद आई जहां अमेरिकी सेनाओं ने अब तक के इतिहास में पहली बार एटम बम डालकर दो लाख लोगों को मार डाला था। क्वांग त्री के समाधि स्थल पर चिरनिद्रा में सोए सैनिक भी तो अमेरिका की उसी साम्राज्यवादी और विस्तारवादी नीति का शिकार बने।
मुझे साथ-साथ यह भी ध्यान आया कि अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में भी एक वियतनाम युद्ध स्मारक है जहां इसी हड़प नीति के चलते हजारों अमेरिकी सैनिकों को सुदूर वियतनाम में जाकर अपने प्राण गंवाना पड़े। आज भी वाशिंगटन डीसी के इस वार मेमोरियल पर मृत सैनिकों के जन्मदिन या मृत्युतिथि पर उनके परिजन आते हैं, अगरबत्ती जलाते हैं, फूल चढ़ाते हैं और शिला पर उत्कीर्ण नाम पर उंगलियां फिराते हुए नि:शब्द रोते हैं। याद करना चाहिए कि वियतनाम युद्ध के दिनों में जो भी युवक सेना में भर्ती होने से इंकार करता था उसे जेल भेज दिया जाता था। उसे देशद्रोही माना जाता था। अमेरिका के युद्धपरस्त शासकों ने उन मानवीय मूल्यों की भी कभी परवाह नहीं की जिनका उद्घोष अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणापत्र में किया गया है। मैं क्वांग त्री के राष्ट्रीय स्मारक में मृत सैनिकों की समाधि पर आए शोकाकुल परिजनों को देख रहा था और सोच रहा था कि युद्ध की कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
एक समय क्वांग त्री शहर में इसी नाम के प्रदेश की राजधानी होती थी। आज से दो सौ साल पहले वहां एक भव्य किले का निर्माण किया गया था। हम इस किले को भी देखने गए। उत्तरी और दक्षिणी वियतनाम के बीच यह प्रांत अमेरिका के कब्जे वाली दक्षिणी ताकत के पास था। 1972 में उत्तर वियतनाम की मुक्ति सेना ने जबरदस्त लड़ाई के बाद इसे मुक्त करा लिया था लेकिन छह माह के भीतर ही अमेरिकी फौजों ने क्वांग त्री पर फिर से आक्रमण किया और भयानक बमबारी कर पूरे शहर को श्मशान में बदल दिया। क्वांग त्री का किला भी नष्ट हो गया। अब वहां पुराने समय की याद दिलाती हैं किले की परिधि की खंदक और एक पुराना सिंहद्वार। किले के विशाल परिसर में हरियाली के बीच एक स्मारक है जहां लोग श्रद्धांजलि देने आते हैं। यहां मैंने एक आकर्षक मूर्ति देखी।
एक घने वृक्ष की छाया में स्थापित यह प्रतिमा एक बैठे हुए सैनिक की है। वह आराम की मुद्रा में है। उसकी बंदूक कंधे पर न होकर गोद में है। उसके होठों पर हल्की सी मुस्कान है। शिल्पी ने इसे बनाने में अद्भुत कल्पनाशीलता का परिचय दिया है। शांत मुद्रा में बैठा हुआ सैनिक मानों कह रहा हो कि मैंने अपना काम कर दिया है, मैं भी अब कुछ पल के लिए विश्राम करना चाहता हूं। तुम इतनी दूर मुझे ढूंढते हुए आए, इसके लिए धन्यवाद। वियतनाम की जनता भी मानो इस सैनिक की भावना को अच्छे से समझ रही है। युद्ध समाप्त हुआ। अब देश का नवनिर्माण करना है। किले से निकलकर हम थोड़ी दूर पर स्थित नदी तट पर गए। वहां एक पक्का घाट बना हुआ है। घाट पर एक छोटा सा बौद्ध मंदिर है। वहां से नीचे सीढ़ियां उतरकर हमने मोम के दिए जलाए और उन्हें धीरे से नदी में प्रवाहित कर दिया। नदी में दीप प्रवाहित करने की यह मनोहारी परंपरा मुझे भारत से लेकर जापान तक हर जगह दिखी। फर्क सिर्फ इतना मिला कि हिरोशिमा और क्वांग त्री की नदियां स्वच्छ थीं, भारत की नदियों की तरह प्रदूषित नहीं।
वियतनाम और भारत के बीच परंपरा में ही नहीं, प्रकृति में भी काफी कुछ समानताएं ढूंढी जा सकती हैं। बरगद और पीपल- ये दो वृक्ष वहां बहुतायात में हैं। क्वांग त्री के राष्ट्रीय समाधि स्थल पर चार का पेड़ भी लगा हुआ था जिससे चिरौंजी निकलती है। हम जहां रुके थे वहां चारों तरफ अमलतास और गुलमोहर के पेड़ों पर बहार आई हुई थी। वियतनाम में आम भी खूब फलता है। लेकिन वे उसे पूरा पक जाने के बजाय खटमिठ्ठा खाना पसंद करते हैं, वह भी नमक व लाल मिर्च लगाकर। हां, खानपान में जरूर भारतीयों को दिक्कत हो सकती है। वियतनाम का मुख्य भोजन चावल है और साथ में शोरबा जिसमें हर तरह का मांस और अनेक सब्जियां होती हैं। गेहूं के आटे के बजाय वे मैदे के बने नूडल्स खाते हैं। मुझे अपना काम ब्रेड से ही चलाना पड़ा। जिसे वे शाकाहारी सूप कहते हैं उसमें भी क्या है, जानना-समझना मुश्किल होता है।
मैं जिस उद्देश्य से वियतनाम गया था, उसकी विस्तारपूर्वक चर्चा अगली किश्त में करूंगा। अभी एक रोचक जानकारी पाठकों के साथ साझा करना चाहूंगा। मुझे क्वांग त्री में लाओस के एक पुराने शांति कार्यकर्ता और पत्रकार मित्र श्री मिसाई मिले। उनके दाहिने हाथ में मौली जैसा कुछ बंधा हुआ था। इस बिन्दु पर बातचीत चल पड़ी तो उन्होंने बताया कि वियतनाम में जहां बौद्ध धर्म का प्रभाव है वहीं लाओस में ब्राह्मणवाद का; और एक तरह से उनके देश में बौद्ध और ब्राह्मण दोनों परंपराओं के बीच तालमेल बैठा दिया गया है। उनके गले में लॉकेट था। उसमें एक तरफ भगवान बुद्ध थे और दूसरी तरफ किसी अन्य देवता की छवि। मालूम पड़ा कि कोई शुभ कार्य होने पर बौद्ध पुजारी आता है और वैदिक परंपरा से अनुष्ठान कराता है। यह मौली भी उसी की देन है। एक दिलचस्प जानकारी उन्होंने और दी कि चंपा लाओस देश का राष्ट्रीय पुष्प है। भारत का पूर्वी एशिया के साथ कितने स्तरों पर सांस्कृतिक विनिमय हुआ है इस बारे में अभी हमें बहुत कुछ जानना बाकी है।
वियतनाम, लाओस और कम्बोडिया इन तीनों की एक विशेषता है।  इन्हें मिलाकर बनने वाले क्षेत्र को हिन्दचीन कहा जाता है। चीन तो खैर इनका निकटतम पड़ोसी है। भारत भी बहुत दूर नहीं है। इन दोनों बड़े देशों की संस्कृतियों का हिन्दचीन पर कहीं कम, कहीं ज्यादा प्रभाव पड़ा है। इन तीन देशों  ने एक देश की नहीं, बल्कि दोहरी गुलामी झेली है। पहले फ्रांस  और फिर अमेरिका की। इन्होंने अमेरिका से लंबी लड़ाई लड़ी, स्वतंत्रता हासिल की। इसमें सबसे घना, सबसे लंबा और सबसे भीषण संघर्ष वियतनाम में हुआ। साम्राज्यवादी ताकतों ने देश को दो हिस्सों में बांट दिया। स्वतंत्रता और एकीकरण के लिए वियतनाम की जनता ने बहुत दिलेरी के साथ लड़ाई लड़ी और अंतत: विजय हासिल की। आज भी वियतनाम एक शांतिप्रिय विकासशील देश के रूप में आगे बढ़ रहा है और चाहता है कि दुनिया में अब कहीं भी युद्ध की नौबत नहीं आना चाहिए।
देशबंधु में 14 जून 2018 को प्रकाशित