Wednesday, 12 September 2012

पन्द्रह मिनट की बहस





इस अखबार के पाठकों में काफी संख्या में ऐसे व्यक्ति होंगे जो टीवी के समाचार चैनलों पर प्रसारित होने वाली बहसें सुनते हैं। अगर कोई न भी सुनना चाहे तो अपने पसंदीदा कार्यक्रम के लिए सर्फिंग करते हुए किसी न किसी चैनल पर कोई न कोई बहस अनायास ही देखने-सुनने मिल जाती है। कुछ बहसें तो ऐसा होती हैं जो दिन में दस बार दिखाई जाती हैं। मसलन बीते शुक्रवार की रात महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के जोशीले सेनापति राज ठाकरे के साथ ''टाइम्स नाउ'' के अर्णब गोस्वामी ने जो साक्षात्कार लिया, पहले तो उसकी झलकियां या ट्रेलर ही-तीन बार दिखाया गया, फिर प्राइम टाइम में साक्षात्कार प्रसारित हुआ और फिर अगले दिन याने शनिवार को दिन में शायद बारह बार उसे प्रसारित किया गया। ऐसा करके ''टाइम्स नाउ'' राज ठाकरे का प्रचार कर रहा था या खुद अपना, यह सवाल पूछा जा सकता है।

बहरहाल ऐसी तमाम बहसों को जब आप देखते सुनते हैं तो कुछ बारीकियों पर आपका ध्यान जरूर जाता होगा। एक तो कोई भी बहस आधा घंटे से ज्यादा की नहीं होती, बल्कि बाइस या चौबीस मिनट की ही होती है। इसमें भी कम से कम चार-चार मिनट के दो ब्रेक लिए जाते हैं। कोई वक्ता अपनी बात कहने को होता है कि उसे रोक दिया जाता है कि हम ब्रेक के बाद इस पर बात करेंगे। फिर ऐसी बहसों में अमूमन चार से ज्यादा भागीदार आमंत्रित होते हैं कई बार तो छह या सात भी। अब आप हिसाब लगाकर देखिए कि किसी गंभीर मुद्दे पर ज्यादा से ज्यादा पन्द्रह मिनट बात हो रही है तो उसमें एक प्रतिभागी के हिस्से में तीन या चार मिनट से ज्यादा का समय कहां मिलता होगा।

यह टीवी बहसों की तकनीकी सच्चाई है। एक पार्टी प्रवक्ता या विषय विशेषज्ञ से उम्मीद की जाती है कि वह लोकमहत्व के बडे से बड़े प्रश्न पर तीन मिनट में अपना पक्ष प्रस्तुत कर दे। इसमें भी यह पेंच छिपा हुआ है कि चैनल जिस पार्टी या व्यक्ति को पूर्व-निर्धारित सोच से कटघरे में खड़ा करना चाहता है, उसे कार्यक्रम का सूत्रधार अधिक बोलने ही नहीं देता, बीच-बीच में रोक देता है और कई बार तो सूत्रधार के बजाय वह जज बन जाता है। इसमें यह भी होता है कि जिस पार्टी पर आक्रमण किया गया है उसका प्रवक्ता एक होता है, जबकि बाकी तीन-चार या पांच प्रतिभागी विपक्ष के होते हैं। कुल मिलाकर एक को मिलते हैं दो या तीन मिनट और बाकी को बारह या तेरह मिनट। स्पष्ट है कि इस तरह की आभासी बहस में संतुलन और निष्पक्षता की कोई गुंजाइश नहीं होती। इस सच्चाई को जानने के बावजूद इसे हमारे राष्ट्रीय जीवन की विडम्बना ही मानना चाहिए कि जिन मुद्दों पर जनता व्यथित और चिंतित है, उनके स्पष्टीकरण अथवा निराकरण के लिए वह टीवी जैसे एक घोर अगंभीर माध्यम पर भरोसा किए बैठी रहती है। इसके चलते हम समय-सिध्द संस्थाओं, मंचों और अवसरों की ओर दुर्लक्ष्य करने लगे हैं। 

फिलहाल हम यदि संसद और विधानसभाओं की बात न भी करें तो भी यह याद कर लेना अच्छा होगा कि एक समय विश्वविद्यालय, छात्रसंघ, श्रमिक संघ, यहां तक कि गणेशोत्सव और दुर्गोत्सव जैसे मंच नागरिकों को उपलब्ध थे, जिनमें वलंत मुद्दों पर खुली व खरी चर्चा हो सकती थी। अपने ही प्रमाद में हमने इन्हें तिरस्कृत कर दिया है। हमारी व्यवस्था में इस बात की भी भरपूर गुंजाइश है कि राजनीतिक दल  आम सभाएं करें और उनके माध्यम से समाज के जरूरी प्रश्नों पर लोक शिक्षण करें। ऐसी सभाएं जब आम चुनाव के पहले होती हैं तब उनका स्वर अलग होता है। उस समय वोट बटोरने के लिए लच्छेदार बातें की जाती हैं, लेकिन जब चुनाव का मौका न हो तब इन मंचों का उपयोग तर्कपूर्ण बहसों के लिए होना चाहिए। लेकिन हमें याद नहीं पड़ता कि पिछले बीस साल में कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा अन्य किसी दल ने इन अवसरों का उपयोग लोक शिक्षण अथवा जनजागरण के लिए किया हो। इस अवधि के दौरान कांग्रेस, भाजपा व क्षेत्रीय दलों ने अगर आम सभाएं की हैं तो संकीर्ण और तात्कालिक लाभ पाने की दृष्टि से।

अब हम अपना ध्यान संसद और विधानसभाओं पर केन्द्रित कर सकते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि इन निर्वाचित सदनों की कार्यप्रणाली पर विगत तीन दशकों के दौरान लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। ये हमारी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर रहे, इनकी विश्वसनीयता क्षीण होती गई है और इनकी कार्यप्रणाली को लेकर प्रबुध्द वर्ग ही नहीं, आम जनता में भी गहरा असंतोष पनपने लगा है। हम जब सांसदों और विधायकों को चुनते हैं तो उनसे सहज उम्मीद करते हैं कि वे सदन में जन आकांक्षाओं को वाणी देंगे तथा देश-प्रदेश की प्रगति के लिए ईमानदारी के साथ अपना कर्तव्य निभाएंगे, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। साल दर साल सत्र छोटे होते गए हैं, बैठकों के दिनों में कटौती होती गई है और जितने दिन सदन बैठता है उसका एक बड़ा हिस्सा निरर्थक बहसों और अवांछनीय दृश्यों में चला जाता है। तिस पर यह विरोधाभास कि सांसद और विधायक अपने लिए सुविधाएं साल-दर-साल बढ़ाते गए हैं। गोया, जिस जनता ने उन्हें चुनकर भेजा है उसके प्रति अब उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है।

संसद के हाल में सम्पन्न मानसून सत्र के दौरान हमने इसका प्रत्यक्ष अनुभव किया। सत्र प्रारंभ होने के पहले विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने टि्वटर पर लिखा था कि वे कौन-कौन से मुद्दे सदन में उठाने वाली हैं। मैंने इस पर उन्हें अपनी टिप्पणी भेजी थी कि कृपया सुनिश्चित कीजिए कि सदन की कार्रवाई चलती रहे। इसका कोई उत्तर पाने की अपेक्षा मैंने नहीं की थी, और वह आया भी नहीं। लेकिन जो हुआ वह सबके सामने है। कोयला घोटाले पर सत्तारूढ़ दल को बहुत अच्छे से घेरा जा सकता था। सरकारी पक्ष याने यूपीए का जितना संख्या बल है लगभग उतना ही संख्या बल संयुक्त विपक्ष का भी है: अगर सदन का बहिष्कार न कर बहस की जाती तो सरकार पर आक्रमण करने में भाजपा का साथ वामदलों ने व बीजू जनतादल ने भी दिया होता। लेकिन हुआ यह कि मात्र 140 सदस्य संख्या वाली भाजपा ने संसद को एक तरह से बंधक बना लिया। इस कारण न सिर्फ सत्तारूढ़ यूपीए अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं कर पाया, बल्कि वामदल, बीजद, जदयू, झारखण्ड विकास पार्टी आदि भी अपनी बात सदन में सामने नहीं रख पाए। भाजपा की इस हठधर्मिता का परिणाम यह हुआ कि जनता को अंतत: पन्द्रह मिनट बहस वाले टीवी चैनल पर निर्भर करना पड़ा। इससे चैनलों को चाहे जो फायदा हुआ हो, भाजपा को तो बिलकुल नहीं हुआ। प्रधानमंत्री ने सत्र समाप्ति के बाद सच ही कहा कि यह सत्र पूरी तरह से व्यर्थ चला गया। यह सोचकर तकलीफ होती है कि आगे भी ऐसा ही होगा।

देशबंधु में 13 सितम्बर 2012 को प्रकाशित