Thursday, 20 September 2012

क्या गाँधी के विचार जीवित हैं?

 
 
 
प्रिय दीपक जी,

आपके
पत्र से जानकारी मिली कि आप किसी खास प्रयोजन से उन व्यक्तियों की सूची तैयार कर रहे हैं, जिन्होंने किसी न किसी रूप में गांधीजी के विचारों को जीवित रखा है। आपको उचित ही इस बात का एहसास है कि संपूर्णता अपने आप में एक भ्रम है इसलिए ऐसे व्यक्तियों को भी आप सूची में शामिल करना चाहते हैं जो आंशिक रूप से ही सही, इस प्रयत्न में जुटे हैं। यहां तक तो बात ठीक है, लेकिन इसके आगे मुझे आपने यह कहकर भारी उलझन में डाल दिया है कि मैं ऐसे व्यक्तियों के नाम आपको सुझाऊं। आपका पत्र मुझे करीब तीन हफ्ते पूर्व मिला था और तब से मैं लगातार सोच रहा हूं कि क्या मैं सचमुच इस योग्य हूं कि आपके इस महत्तर उद्देश्य में किसी तरह से सहयोग कर सकूं!

आपका संदेश मिलने के बाद मैंने अपने आसपास देखना प्रारंभ किया। अविभाजित मध्यप्रदेश पर नजर दौड़ाई। पूरे देश के नक्शे में ढूंढने की कोशिश की और विश्व के मानचित्र को भी सामने रखकर अपनी बुध्दि और स्मृति दोनों को कुरेदने का यत्न किया। यूं तो वर्तमान समय में गांधीवादियों की एक अच्छी-खासी सूची तैयार हो सकती है कि वे गांधी के विचारों को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं, लेकिन मैं यह साहस नहीं जुटा पा रहा हूं कि आपकी सूची में शामिल करने के लिए उनके नाम प्रस्तावित करूं। दरअसल सबसे पहले तो हमें यह तय करना चाहिए कि गांधी के विचार क्या थे और उन्हें हम किस रूप में ग्रहण करते हैं। ऐसा करते हुए यह ध्यान अवश्य देना होगा कि गांधी महासागर की तरह विस्तृत और विराट व्यक्तित्व के धनी थे।  उनके कामों और विचारों को हम चाहें जितनी कोशिश कर लें, संपूर्णता में परखने का दावा नहीं कर सकते।

आज इसलिए गांधीजी पर चर्चा करते हुए हमें वे निकष सामने रखना चाहिए जिन पर गांधीजी ने स्वयं को निर्ममतापूर्वक कसा। मोटे तौर पर ये हैं- सत्य, अहिंसा, निर्भीकता, अपरिग्रह, श्रम की महत्ता, मनुष्य मात्र की प्रतिष्ठा, समरसता, सामाजिक न्याय, स्वाधीनता इत्यादि। इन मूल्यों के आधार पर गांधीजी ने अपना जीवन कैसे जिया और उसमें कौन से अवसर थे जो इस दृष्टि से रेखांकित करने योग्य हैं, यह भी देखना होगा। यह उचित होगा कि अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए मैं कुछ उदाहरण रखूं।

गुजरात गांधीजी का गृह प्रदेश है। गांधीजी के विचारों के अनुसरण में ही पिछले साठ साल से वहां मद्यनिषेध लागू है। अगर मान लिया जाए कि गुजरात में एक भी व्यक्ति मदिरापान नहीं करता, तब भी क्या हम कह सकते हैं कि वहां का हर निवासी गांधीवादी है? इसी तरह देश में बहुत बड़ी संख्या में लोग गांधी टोपी पहनते हैं, लेकिन क्या वे गांधी के विचारों को जीवित रखने का कोई यत्न कर रहे हैं? मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूं जो पारिवारिक संस्कारों के चलते आज भी चरखा कातते हैं, उन्हें अपने आप गांधीवादी होने का खिताब भी मिल जाता है, लेकिन क्या चरखा कातना पर्याप्त है? हमारे एक मित्र हैं जो स्वयं को गांधीवाद का बहुत बड़ा अध्येता मानते हैं: उन्हें इस नाते व्याख्यान देने जगह-जगह बुलाया जाता है, लेकिन वही मित्र इन दिनों कभी भगतसिंह के रास्ते पर, तो कभी नेताजी के रास्ते पर चलने की सलाह देने लगे हैं। तो क्या गांधी के विचार सिर्फ सभा-समितियों तक सीमित रखना पर्याप्त है? एक और सज्जन  हैं जिन्होंने उड़ीसा में फादर ग्राह्म स्टेन्स की नृशंस हत्या के कुछ दिनों बाद एक पुस्तिका प्रकाशित कर यह सिध्द करने का प्रयत्न किया कि गांधीजी ईसाइयत के कितने खिलाफ थे। क्या ऐसे व्यक्ति को गांधीवादी माना जा सकता है?

ये तमाम उदाहरण देने का मेरा आशय यह है कि आप जो सूची बना रहे हैं उसमें कोई भी नाम शामिल करने से पहले यह जरूर देखें कि वह व्यक्ति गांधी की कसौटी पर कितना खरा उतरता है, फिर भले ही वह अपने आपको गांधीवादी न मानता हो; या सामान्य तौर पर जिसका कोई संबंध गांधीवाद से न जुड़ता हो। मैं आपको 1946 में वापिस ले जाना चाहता हूं। कृपया विचार करें कि गांधीजी ने पंडित नेहरू को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित क्यों किया।  उन्होंने यह क्यों कहा कि मेरे बाद जवाहर मेरी भाषा बोलेगा। मैं इस बात पर गौर करता हूं तो मुझे लगता है कि गांधीजी से अनेक मुद्दों पर असहमति रखने के बावजूद पंडित नेहरू में वे अनेक गुण थे जो बापू के अपने चरित्र का हिस्सा थे। पिछले पचास-साठ साल के दौरान बहुत से विद्वानों ने गांधी और नेहरू के बीच द्वैत स्थापित करने की कोशिश की है, लेकिन मेरी समझ में वे सच्चाई से मुंह मोड़ लेते हैं।

बहरहाल, आपके पत्र पर विचार करते हुए एक वृहत्तर फलक पर सिर्फ दो नाम स्मरण आते हैं, जिन्हें सच्चे अर्थों में गाँधी का उत्तराधिकारी माना जा सकता है- एक नेल्सन मंडेला और दूसरी आंग सान सू ची। इनके बाद भारत से मेरे सामने कुछ नाम आते हैं जिन्हें आप शायद गांधीजी के विचारों का पोषक न मानें, लेकिन मेरी राय में जो सचमुच गांधी के विचारों पर चलते रहे हैं। मैं सबसे पहले वे चार नाम लेना चाहता हूं जिनके बारे में मैं एकाधिक बार अपने कॉलमों में लिख चुका हूं ये हैं- डॉ. कुरियन, प्रोफेसर यशपाल, जस्टिस कृष्णा अय्यर और ई. श्रीधरन। दुर्भाग्य से डॉ. कुरियन अब हमारे बीच नहीं हैं। इन्होंने ध्येय के प्रति एकांतिक निष्ठा रखी, संकटों से विचलित होकर समझौते नहीं किए, अग्रिम पंक्ति में रहकर डटकर नेतृत्व किया, जिनके बीच ये रहे उनका आत्मबल बढ़ाने का काम किया, उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहना सिखाया और सत्यनिष्ठा व अपरिग्रह के साथ पूरा जीवन जिया। इस सूची में और नाम भी जुड़ सकते हैं बशर्ते आपको मेरी बात जंच रही हो।

यदि आप मेरे दृष्टिकोण से सहमत न हों तब एक दूसरी सूची बनाई जा सकती है। इसमें आप निम्नांकित श्रेणियों से चयन कर सकते हैं- खादी पहनने वाले, गांधी टोपी पहनने वाले, लंगोटी पहनने वाले, शराब न पीने वाले, गांधीजी पर कविता, लेख और पुस्तकें लिखने वाले, गांधीदर्शन के अध्यापकगण, गांधी के नाम पर बनी संस्थाओं के प्रमुख, गांधी जयंती और पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रमों के सूत्रधार और वित्तीय मददगार, गांधी के नाम पर वोट मांगने वाले, स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने का दावा करने वाले, सेवाग्राम और साबरमती में धूनी रमाकर बैठे लोग, स्वदेशी के मंत्रोच्चाटक, गांधीजी की मूर्तियां बनाने वाले, नीलामी में उनकी चिट्ठियां, चश्मा और घड़ी खरीदने वाले, गांधी का नाम लेकर अनशन करने वाले, मुन्नाभाई से प्रेरित गांधीगिरी करने वाले आदि-आदि। इनमें से हरेक इस बात का श्रेय ले सकता है कि वह गांधी के विचारों को जीवित रखने का काम कर रहा है।

अगर आपको मेरी बात न रुची हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूं।

आपका

ललित सुरजन
देशबंधु में 20 सितम्बर 2012 को प्रकाशित