Thursday, 20 December 2012

विधानसभा नतीजों के संकेत



गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के बहुप्रतीक्षित नतीजे आ गए हैं। इन्हें समग्रता में देखा जाए तो स्पष्ट संकेत मिलता है कि न तो नरेन्द्र मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं और न ही भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय विकल्प बन पाने की कोई संभावना है।

गुजरात में भाजपा ने लगातार पांचवीं बार जीत दर्ज की है, लेकिन इस तथ्य को कैसे भुला दिया जाए कि जिन नेताओं ने प्रदेश में भाजपा का जनाधार तैयार किया, उनमें से एक पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला आज कांग्रेस में हैं तथा दो अन्य भूतपूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल व सुरेश मेहता ने अपने लिए अलग रास्ता चुन लिया है। नि:संदेह नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने गुजरात में लगातार तीसरी बार चुनाव जीते हैं, लेकिन देश के चुनावी इतिहास में यह कोई अनोखी घटना नहीं है। कांग्रेस के मोहनलाल सुखाड़िया लगातार अट्ठारह वर्षों तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे, मार्क्सवादी योति बसु पांच बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने और आज भी ओडिशा में बीजद के नवीन पटनायक व दिल्ली में कांग्रेस की शीला दीक्षित की चुनावी सफलताएं मोदी के समकक्ष ही ठहरती हैं।

हां, कोई फर्क है तो इस बात का कि नरेन्द्र मोदी की एक विराट छवि इस बीच गढ़ने की निरंतर कोशिशें हुईं जिसमें कारपोरेट घरानों व पूंजीमुखी मीडिया ने भी बढ़-चढ़ कर भूमिका निभाई। श्री मोदी को अपराजेय, लौहपुरुष, विकास पुरुष, कृष्ण, विवेकानंद जैसे विशेषणों से नवाजा गया। उनकी अशिष्टता की हद को छूती वाचालता, प्रकट नस्लवादी मानसिकता, व्यक्तिवादी अहंकार, पार्टी के ऊपर स्वयं को रखने की एक तरह की दृष्टता व प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा- इन सबको उनके गुणों के रूप में प्रचारित किया गया। ऐसा हिटलर के उदय के समय जर्मनी में भी हुआ था। आज भी इस तथ्य को सहजता से भुला दिया गया कि 182 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए नरेन्द्र मोदी को एक भी अल्पसंख्यक उम्मीदवार उपयुक्त न जान पड़ा। पिछले चुनाव के दौरान उन्होंने जहां बार-बार मुख्य चुनाव आयुक्त का पूरा नाम लेकर उनके ईसाई होने को रेखांकित किया था, इस बार उन्होंने अहमद पटेल को सप्रयोजन बार-बार अहमद 'मियां' पटेल कहकर पुकारा। इससे नरेन्द्र मोदी के अल्पसंख्यक द्वेष का प्रमाण तो मिलता ही है, भाजपा का राष्ट्रीय पार्टी होने का दावा भी कमजोर पड़ता है।

हिमाचल प्रदेश में भाजपा को पांच साल बाद फिर बेदखल होना पड़ा है। उत्तराखण्ड के बाद यह भाजपा की दूसरी पराजय है। कर्नाटक में भाजपा के बीच जो कशमकश चल रही है, उसके बारे में यादा कहने की आवश्यकता नहीं है बल्कि यह तुलना करने का लोभ होता है कि जिस तरह श्री येदियुरप्पा को पार्टी ने छोड़ दिया वैसा ही सलूक आने वाले दिनों में श्री मोदी के साथ हो सकता है। पंजाब में भाजपा अकाली दल की बैसाखियों पर है, बिहार में नीतीश कुमार के बलबूते और झारखण्ड में उसके गठबंधन की पवित्रता के बारे में कुछ भी कहना बेमानी है। कुल मिलाकर भाजपा के पास लड़खड़ाते कर्नाटक के अलावा अब सिर्फ तीन राय हैं- गुजरात, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़। गुजरात में भाजपा की जीत में बड़ा योगदान अहमदाबाद, बड़ौदा, सूरत और जामनगर जैसे बड़े शहरों का रहा है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में उसे वैसी सफलताएं नहीं मिलीं। 2013 में जिन प्रांतों में विधानसभा चुनाव होना है उसमें यह तथ्य कितना प्रासंगिक होगा, इसका विश्लेषण दोनों पार्टियों ने शुरू कर दिया होगा।

इन चुनावों के बाद 2014 में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम थम पाएगी या नहीं, मैं नहीं जानता। हो सकता है कि 'कारपोरेट इंडिया' अब किसी नए घोड़े पर दांव लगाए, लेकिन भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का समय है कि आने वाले दिनों में वह किस तरह से लोकहितकारी एजेंडे पर काम कर सकती है।

 देशबंधु में 21 दिसम्बर 2013 को प्रकाशित सम्पादकीय