Thursday, 27 December 2012

यात्रा वृत्तांत: दूसरी चीन यात्रा: कुछ नए अनुभव





चीन जैसे महाकाय देश को छह दिन के संक्षिप्त प्रवास में समझ लेना और कोई निर्णायक राय बना लेना कठिन ही नहीं असंभव है। फिर भी चीन के बारे में लंबे समय से जितना कुछ पढ़ा और सुना था उसके आधार पर अपनी दूसरी यात्रा के दौरान जो कुछ देखा उसकी कुछ छवियां पाठकों के साथ साझा करने में शायद कोई हर्ज नहीं है। मेरी पहली चीन यात्रा अक्टूबर 2005 में अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन के शिष्ट मंडल के साथ हुई थी जिसमें भारत से हम छह सदस्य थे। इस बार मैं विश्व शांति परिषद के डैलिगेशन का सदस्य बनकर गया था और भारत से मैं अकेला ही था। चीन की प्राचीन चार राजधानियों में से दो बीजिंग व शियान पहली यात्रा में देख ली थी। इस बार तीसरी प्राचीन राजधानी नानजिंग देखने का भी अवसर मिल गया।

चीन में पिछले सात सालों के दौरान कुछ बदलाव आए हैं, लेकिन मैंने जो बदलाव सबसे पहले अनुभव किया वह मौसम का था। अक्टूबर में देश का मौसम खुशगवार था, जबकि अभी दिसम्बर मध्य में वहां कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। शंघाई, नानजिंग, बीजिंग- तीनों ही शहरों में कभी शून्य, कभी शून्य से थोड़े ऊपर के तापमान के बीच बादल भी जब-तब बरस कर मौसम को और ठंडा कर रहे थे। हमारे बीजिंग पहुंचने के एक दिन पहले तक वहां बर्फ भी गिर रही थी। और जब हम पहुंचे तब जगह-जगह बर्फ हटाने का काम चल रहा था। नानजिंग से बीजिंग की हमारी ट्रेन राजधानी के कुछ किलोमीटर पहले ही रोक दी गई और बहुत सावधानी से धीमी रफ्तार के साथ आगे बढ़ाई गई ताकि कोई अनहोनी न हो जाए। बीजिंग से पचास-साठ किलोमीटर पर बादालिंग नामक स्थान है: अमूमन चीन की दीवार देखने पर्यटक यहीं आते हैं, लेकिन हमारे प्रवास के दौरान यह रास्ता बर्फ से ढंका होने के कारण बंद था और मैं चीन की दीवार दुबारा देखने से वंचित हो गया। 

2005 में शंघाई एक विकसित होता हुआ शहर था, लेकिन इन सात सालों के दरम्यान उसकी शक्ल पूरी तरह बदल गई है। नए शहर का एक हिस्सा ऐसा है, जिसकी तुलना स्वयं चीन के लोग न्यूयार्क के मैनहट्टन से करते हैं याने समृध्दि का द्वीप। शंघाई का पुराना शहर भी काफी कुछ अपने पुराने रूप में कायम है। लेकिन अब वहां भी पुरानी इमारतों को जमींदोज कर गगनचुंबी अट्टालिकाएं खड़ी हो रही हैं। बीजिंग, नानजिंग, शंघाई- सभी जगह जमीनों के भाव भी उसी अनुपात में गगनचुंबी हो चले हैं। जिन लोगों ने अपनी पुश्तैनी जमीनें रीयल एस्टेट वालों को बेच दी है, वे फिलहाल करोड़पति तो बन ही गए हैं। यह पढ़कर आपको गुड़गांव या नोएडा का खयाल आ सकता है। मैंने शंघाई में ऐसे दो स्थान देखे जिनका निर्माण 2005 के आसपास प्रारंभ हो चुका था। पहला- पुडोंग में नया विमानतल। मुझे दिल्ली का टी-3 उसके मुकाबले बेहतर प्रतीत हुआ। दूसरा- टीवी टॉवर जिसमें 259 मीटर तक ऊपर जाने की अनुमति थी। वहीं से सामने एक और इमारत दिखाई देती है, जो संभवत: 362 मीटर ऊंची है। और उसके बगल में ही चार सौ मीटर से ऊंची एक मीनार खड़ी हो रही है। 

शंघाई में होनपु नामक नदी है, जो शहर के भीतर यू आकार में बहती है और इस तरह महानगर को तीन हिस्सों में बांटती है। बीच में एक जगह नदी तट पर कोई दो किलोमीटर लंबा घाट विकसित किया गया है, जो सैलानियों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र है। पास में ही वाहनों के लिए प्रतिबंधित एक सड़क है, जिस पर चहलकदमी करते हुए आप आजू-बाजू के मॉल व मैगा स्टोर्स में और कुछ नहीं तो विंडो शॉपिंग कर सकते हैं। इस बाजार में दुनिया के हर प्रसिध्द ब्राण्ड का माल आपको मिल जाएगा। चीन विश्व की दूसरी आर्थिक महाशक्ति बन चुका है और उसे न तो केएफसी या मेकडोनाल्ड से डर लगता है और न वालमार्ट से। इस सड़क पर घूमते हुए मन में सवाल उठा कि यहां जो महंगे-महंगे सामान बिक रहे हैं इनको आखिर खरीदता कौन है। समझ आया कि देश में निश्चित रूप से ऐसा धनिक वर्ग तैयार हो चुका है, जिसके पास यह सामर्थ्य है।  दूसरे-नौजवानों को भी यह बाजार लुभा रहा है।

शंघाई से हम नानजिंग के लिए बुलेट ट्रेन में रवाना हुए। यह एकदम नया अनुभव था। शंघाई, बीजिंग और नानजिंग तीनों शहरों में हमने रेल्वे स्टेशन देखे। हर जगह चार या उससे अधिक रेल्वे स्टेशन है, जो अलग-अलग दिशाओं की सेवा करते हैं। हर रेलवे स्टेशन विमानतल की तर्ज पर बना है। तलघर में या दूर कहीं पार्किंग, फिर स्वचालित सीढ़ी या एस्केलेटर से ऊपर, प्रवेश द्वार पर एक्स-रे मशीन की सामान की जांच, यात्रियों की खानातलाशी, फिर दूसरी स्वचालित सीढी से और ऊपर लंबा गलियारा पार कर अपने बोर्डिंग गेट पर, ट्रेन आने के पन्द्रह मिनट पहले बोर्डिंग गेट खुलता है, नीचे उतरकर प्लेटफार्म पर आओ, टिकट पर बोगी नंबर लिखा है, अपने निर्धारित स्थान पर खड़े हो जाओ, ट्रेन का दरवाजा वहीं खुलेगा, दो या तीन मिनट रेलगाड़ी रुकती है। सैकड़ों यात्री, लेकिन कोई भगदड़ नहीं। प्लेटफार्म पर यात्रियों के अलावा कोई नहीं आ सकता। बूढ़े या अशक्त लोगों को किस तरह संभाला जाता है यह मैं नहीं देख पाया। शंघाई से नानजिंग चलने वाली बुलेट ट्रेन में मात्र एक घंटा बीस मिनट में तीन सौ किलोमीटर से अधिक का सफर तय कर लिया। ट्रेन यादातर समय दो सौ नब्बे किलोमीटर की औसतन रफ्तार से दौड़ती रही। इसी तरह नानजिंग से बीजिंग का एक हजार किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करने में ट्रेन ने महज चार घंटे लिए गो कि बर्फ के कारण ट्रेन आधा घंटा लेट हो गई। हमारे साथ चल रहे चीनी शांति संगठन के साथी शर्मिंदा होकर सफाई दे रहे थे, यद्यपि उसकी कोई जरूरत नहीं थी। 

मुझे शंघाई से नानजिंग के बीच यह देखकर अचरज हुआ कि पूरे रास्ते में जितने भी गांव पड़े कहीं भी एक व्यक्ति न तो सड़क पर नजर आया और न घरों के बाहर लोग सुस्ताते, गपियाते नजर आए। क्या इसलिए कि अपरान्ह का समय था और सब कारखाने या दफ्तर में अपने-अपने काम में मशगूल थे? इस पूरे रास्ते पर जगह-जगह हमें विद्युत संयंत्र व अन्य कारखाने देखने मिले। नानजिंग से बीजिंग के लिए हम सुबह सवा सात बजे रवाना हुए थे। इस लंबे रास्ते पर भी कुछ वैसा ही दृश्य था। आधे रास्ते तक तो खेत दिखते रहे, लेकिन उसके बाद का नजारा एकदम अलग था। चारों तरफ बर्फ की चादर बिछी हुई थी। ट्रेन में हमने यह भी देखा कि लगभग सभी ट्रेन कर्मी महिलाएं ही थीं। और दूसरी बात यह नोटिस की कि दोनों यात्राओं में कोई भी टिकट चेक करने नहीं आया। शायद इसलिए कि प्लेटफार्म पर आने के पहले स्वचालित मशीन से पहले ही टिकट चेकिंग हो जाती है। मुझे ट्रेन यात्रा के दौरान  बातचीत में यह भी पता चला कि चीन में अभी भी औरतों को पचास वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त कर दिया जाता है ताकि वे अपने घर-परिवार की जिम्मेदारियां संभाल सकें।  संभवत: नौजवानों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए भी ऐसा किया जाता है।

बहरहाल अपनी इस दूसरी यात्रा में मेरा ध्यान इन दो बातों पर विशेषकर गया। एक तो मैंने यह अनुभव किया कि चीन में धनिकों का एक नया वर्ग तैयार हो जाने के बावजूद जाहिरा तौर पर वहां सामाजिक व्यवहार के स्तर पर गैर-बराबरी नहीं है। नानजिंग रेलवे स्टेशन के बोर्डिंग गेट पर पैरों से लाचार एक युवा भिक्षा मांग रहा था। थोड़ी देर में ही वह उचक कर अन्य यात्रियों के बीच कुर्सी पर बैठ गया और उस पर किसी ने भी आपत्ति नहीं की, नाक-भौं नहीं सिकोडे। रेल्वे स्टेशन पर भीख मांगी जा रही है यह एक वास्तविकता थी, और दूसरी वास्तविकता थी उस याचक का सबके साथ बराबरी के साथ बैठना। यही नहीं, छह दिनों के दौरान और भी कहीं ऐसा नहीं लगा कि सामान्य स्थिति के लोग कहीं हीनभावना से ग्रस्त हैं। दूसरी बात ये मुझे समझ आई कि युवा वर्ग की आकांक्षाओं को वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व ने भलीभांति समझा है। आज की बदलती दुनिया में नौजवान जिस तरह का जीवन जीना चाहते हैं वह उन्हें अपने देश में काफी हद तक उपलब्ध है। कम से कम तीनों शहरों में तो मुझे यही प्रतीत हुआ।

मेरे चीन पहुंचने के कुछ दिन पहले ही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का अठारहवां महाधिवेशन सम्पन्न हुआ था। एक नया नेतृत्व सामने आ गया है। चीन के नए राष्ट्रपति ने पहला निर्देश यह जारी किया है कि वी.आई.पी. के लिए ट्रैफिक दो या तीन मिनट से ज़्यादा न रोका जाए। उन्होंने औपचारिक स्वागत आदि के लिए भी मनाही की है। इसके साथ-साथ उन्होंने यह भी कहा है कि भ्रष्टाचार से लड़ना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। यह सब तो हम अपने यहां भी सुनते आए हैं। आने वाले दिनों में चीन में क्या परिवर्तन आते हैं इसे जानने में हमारी रुचि होगी। आखिरी दिन हम सब  चेयरमैन माओ की समाधि पर भी गए: उसी शाम यह खबर भी मालूम पड़ी कि चूंकि माओ व्यक्ति पूजा के खिलाफ थे इसलिए उनके पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि किए जाने पर भी गंभीरता से विचार चल रहा है।

 देशबंधु में 27 दिसम्बर 2012 को प्रकाशित