Tuesday, 18 December 2012

एफडीआई : विरोध का पाखंड







देश की अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजी की भूमिका किस हद तक स्वीकार्य हो, यह निश्चित रूप से अहम् मुद्दा है जिससे न सिर्फ अर्थनीति, बल्कि राजनीति, सांस्कृतिक मूल्य, सामाजिक परिवेश, राष्ट्रीय सुरक्षा इत्यादि अनेक सवाल जुड़े हुए हैं। इसे देखते हुए आवश्यक है कि इस पर व्यापक तौर पर सार्वजनिक बहस हो। इसके पहले यह स्मरण कर लेना बेहतर होगा कि भारत में विदेशी पूंजी निवेश की ताजा स्थिति क्या है। किसी भी देश में विदेशी पूंजी मुख्यत: दो तरीकों से आती है जिन्हें प्रत्यक्ष (एफडीआई) और संस्थागत (एफआईआई) कहा जाता है। संस्थागत निवेश में जो पूंजी आती है वह दर्शनी हुंडी की शक्ल में होती है। पूंजी लगाने वाला जब चाहे तब अपनी रकम वापिस निकाल सकता है। किसी कवि ने लिखा है-''मेरा श्याम सकारे मेरी हुंडी आधी रात को।'' ऐसा निवेश बैंक खातों में सीधे जमा हो सकता है या शेयर बाजार में और जब भी विदेशी निवेशक रकम निकालता या जमा करता है तो उससे पूंजी बाजार में फेरबदल आता है। इसलिए हमारे यहां एफआईआई को पारंपरिक दृष्टि से गैर-भरोसेमंद और अवांछनीय माना जाता रहा है।

दूसरी ओर प्रत्यक्ष निवेश अथवा एफडीआई का मतलब है कि विदेशी निवेशक कल-कारखानों में, प्रतिष्ठानों में, स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण में अपनी पूंजी लगाएगा। इसमें स्वाभाविक रूप से निवेशक के लिए जोखिम है। एक तो निवेश पर उसे तुरंत कोई लाभ नहीं होता।  कारखाना हो या मेगास्टोर- उसे मुनाफे के लिए प्रतीक्षा करना पड़ती है। यह जरूरी नहीं कि धंधे में फायदा ही हो, फिर भी निवेश तो मुनाफे की उम्मीद से ही किया जाता है। अतिथि देश को इसमें यह फायदा है कि देश के भीतर स्थायी परिसंपत्तियां निर्मित होती हैं तथा पहले दिन से रोजगार के छोटे-बड़े अवसर सृजित होने लगते हैं। इसका यह अर्थ हुआ कि ऐसे एफडीआई को ही अनुमति दी जाए जो सचमुच नया रोजगार लेकर आए और मौजूदा रोजगार को कोई नुकसान न पहुंचे। इसका एक पहलू यह भी है कि देश अपने बलबूते जो निर्माण कर सकता है उसमें अनावश्यक रूप से विदेशी मेहमानों को न बुलाया जाए। यह भी देखने की जरूरत है कि जो मेहमान आना चाहते हैं उनका इतिहास-भूगोल क्या है। क्या उन पर एतबार किया जा सकता है।

सारी बातों पर विचार करें तो ध्यान आता है कि भारत ने नीतिगत तौर पर एफडीआई का विरोध कभी नहीं किया। देश में सार्वजनिक क्षेत्र में बुनियादी उद्योगों को खड़ा करने में विदेशी पूंजी निवेश और विदेशी टेक्नालॉजी ने महती भूमिका निभाई है। अगर पचास, साठ और सत्तर के दशक में मित्र देशों से यह सहायता नहीं मिलती तो भारत आज जहां है वहां नहीं पहुंच पाता। जो ताकतें उन दशकों में हासिल धीमी प्रगति का उपहास उड़ाते हुए आज जीडीपी बढ़ाने के बारे में ऊंची उडान भर रहे हैं, वे इस तथ्य को सुविधापूर्वक भुला देती हैं कि नींव पुख्ता करने में यादा समय लगता है और धीरज की मांग करता है। उसके बाद दीवारें खड़ी करने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है। अपनी हड़बड़ी में उन्हें इस बात का भी ध्यान नहीं है कि पंडित नेहरू के समय में देश की आर्थिक प्रगति की जो बुनियाद रखी गई थी उसका मकसद देश में गैर-बराबरी को मिटाना और सामाजिक न्याय स्थापित करने का था।

आज खुदरा बाजार में एफडीआई को लेकर हो-हल्ला तो खूब मचाया जा रहा है, लेकिन उससे किसी परिणाम की आशा रखना व्यर्थ है, क्योंकि सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जो हो रहा है वह छाया युध्द से अधिक कुछ नहीं है। लोकसभा व राज्यसभा में चाहे जितने आरोप-प्रत्यारोप लगाए गए हों, टी.वी. पर चाहे जितने दावे-प्रतिदावे किए गए हों, यह स्पष्ट है कि इस मुद्दे पर सभी पार्टियों का नजरिया लगभग एक समान है और एफडीआई को रोकने की मंशा किसी की भी नहीं है। अगर कोई फर्क है तो इस बात का कि जहां कांग्रेस व कुछ अन्य दल सीधे किसान, मजदूर की हित की बात कर सकते हैं, वहीं भाजपा के पार्टीहित व्यापारी वर्ग के साथ जुड़े हुए हैं। वे ही उसके वोटर हैं, वे ही उसके फंड दाता हैं और वे ही छोटे-छोटे कस्बों तक संघ की गतिविधियों को चलाने में मददगार होते हैं। जब सुषमा स्वराज ने जोर देकर कहा कि आढ़तिए किसान के लिए एटीएम होते हैं,  तब वे अपनी पार्टी व छोटे-मंझोले व्यापारियों के बीच के रिश्ते को ही रेखांकित कर रही थीं। यही नहीं, भाजपा स्वयं लंबे समय से आर्थिक उदारीकरण की पक्षधर रही है। सार्वजनिक क्षेत्र की कारखानों का विनिवेश उसी से शुरू किया था तथा अन्य बहुत से मुद्दों पर उसकी नीतियां वैश्विक विश्वपूंजीवाद के समर्थन में रही हैं। 

दूसरे, खुदरा बाजार में एफडीआई का प्रवेश अपने आप तक सीमित नहीं है। वह एक व्यापक नीति का हिस्सा है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद से ही भारत में आर्थिक उदारीकरण की नीतियां धीरे-धीरे लागू करना प्रारंभ हो गया था। राजीव गांधी के कार्यकाल में छोटी सी पहल हुई। वी.पी. सिंह के समय में उसे बढ़ावा मिला और पी.वी. नरसिम्हाराव के समय में तो कांग्रेस ने नेहरू की नीतियों को पूरी तरह से तिलांजलि ही दे दी। जो नई नीतियां अमल में आना शुरू हुईं, उनसे भाजपा की कोई असहमति नहीं थी। समाजवादियों को भी उनसे कोई खास तकलीफ नहीं थी और तो और वामदलों ने भी इन नीतियों का कोई ठोस विरोध नहीं किया।

हम याद करना चाहेंगे कि पिछले बीस सालों में शायद ही कोई मुख्यमंत्री ऐसा हुआ हो, जिसने विदेशी निवेशकों को आमंत्रित करने के नाम पर विदेश यात्रा न की हो। जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री जॉन मेजर भारत आए तो वामपंथी सरकार ने कलकत्ता की सड़कों से फेरीवालों और गुमटीवालों को रातोंरात हटा दिया था। कांग्रेस और भाजपा के तमाम मुख्यमंत्री अपने प्रदेश के विकास के लिए विदेशी पूंजी निवेश का झुनझुना बजाते रहे हैं। सोचने की बात है कि नरेन्द्र मोदी की जापान यात्रा का इतना ढिंढोरा क्यों पीटा गया और ब्रिटिश राजदूत के गुजरात प्रवास पर भाजपा ने इतनी खुशियां क्यों जाहिर कीं।

ऐसा भी क्यों है कि बिल गेट्स और वॉरेन बफेट भारतीय कारपोरेट जगत की आँखों के सितारे बने हुए हैं? ऐसा भी क्यों है कि भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में रोजगारोन्मुख पाठयक्रम खोलने पर इतना जोर दिया जा रहा है? एमबीए की इतनी मांग क्यों हो रही है और जब बच्चे एमबीए कर लेंगे तो उन्हें नौकरी कहां मिलेगी? क्या उन्हें इन्हीं सुपर बाजारों में नौकरी करने के लिए तैयार नहीं किया जा रहा है? आज के भारतीय युवाओं के सामने इंदिरा नुई और विक्रम पंडित आदि को रोल मॉडल बनाकर पेश किया जाता है। ऐसे में एफडीआई का विरोध क्या एक पाखंड बन कर नहीं रह जाता? इस तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी गौर करना चाहिए। दलित समाजचिंतक चन्द्रभान प्रसाद और मिलिंद कांबले इत्यादि वालमार्ट आदि के आगमन का उत्साहपूर्वक स्वागत कर रहे हैं। उनका मानना है कि इससे दलित युवाओं को बिना भेदभाव के रोजगार मिलेगा और जातिप्रथा टूटने में मदद मिलेगी।

संसद में इस मुद्दे पर सरकार को जीत मिली, लेकिन मैं कहूंगा कि भाजपा के लिए यह एक बड़ी हार थी। वोटिंग की मांग उन्होंने ही की थी। हारने के बाद नैतिकता का प्रश्न उठाना अपने आप में अनैतिक है क्योंकि आपने अपनी शर्तों पर मोर्चा खोला था। वामदल इस मुद्दे पर भाजपा का साथ देकर अपनी स्थिति और कमजोर कर रहे हैं। मुलायम सिंह और मायावती ने अपने पत्ते ठीक से खेले। वे उत्तरप्रदेश में भाजपा को पैर जमाने का मौका नहीं देना चाहते। कुल मिलाकर आज के आर्थिक- राजनैतिक माहौल में खुदरा बाजार हो या अन्य कोई गतिविधि विदेशी पूंजी निवेश रोकना संभव नहीं है। इसके लिए जिस राजनीतिक सोच व लंबी लड़ाई की जरूरत है उसके लिए कोई भी पार्टी तैयार नहीं दिखती।


 देशबंधु में 13 दिसम्बर 2012 को प्रकाशित