Tuesday, 11 June 2013

वी.सी. शुक्ल








अदम्य जिजीविषा के धनी विद्याचरण शुक्ल लगातार अठारह दिन तक   मौत से संघर्ष करते हुए आज अंतत:  हार गए। 1957 में अपना पहला लोकसभा चुनाव जीतने वाले विद्याचरण शुक्ल ने अपने पचपन वर्ष के सुदीर्घ राजनीतिक जीवन में बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन इस बात की कल्पना शायद कोई नहीं करता था कि वे एक दिन बस्तर की एक पहाड़ी सड़क पर दुर्दान्त नक्सलियों की गोलियों का शिकार हो जाएंगे। श्री शुक्ल ने ताउम्र आक्रामक राजनीति की और मौत को भी उन्होंने बहुत आसानी से नहीं जीतने दिया। जीरम घाटी की खूनी सड़क पर शरीर में तीन गोलियां लगने के बावजूद 84 वर्षीय श्री शुक्ल कितने ही घंटों तक अकेले कार के दरवाजे से टिककर अपने को सम्भालते हुए सहायता का इंतजार करते रहे: स्थानीय टीवी पर जिन्होंने यह दृश्य देखा होगा, वे कभी उसे नहीं भूल पाएंगे।

वीसी शुक्ल को अपने अग्रजों की ही भांति राजनीति विरासत में मिली थी, लेकिन यह स्मरणीय है कि वे अपने पिता व मध्यप्रदेश की राजनीति के पुरोधा पंडित रविशंकर शुक्ल के निधन के बाद ही चुनावी राजनीति में आए और इसके बाद उन्होंने अपना जो स्थान बनाया, तो वह सिर्फ अपने राजनीतिक कौशल से। आज छत्तीसगढ़, बल्कि अविभाजित मध्यप्रदेश उनकी मृत्यु से स्तब्ध है तो इसकी एक बड़ी वजह है कि उत्तर- नेहरू युग की राजनीति में मध्यप्रदेश की यदि कोई पहचान बनी तो वह मुख्यत: वीसी शुक्ल के कारण। एक समय वे इंदिरा गांधी के विश्वासपात्र थे और उनके प्रशंसक मानते थे कि वे किसी दिन इंदिराजी के उत्तराधिकारी बनेंगे। अपनी महत्वाकांक्षा अथवा समर्थकों की शुभाकांक्षा अपनी जगह पर सही है, लेकिन कठोर वास्तविकता के धरातल पर ही उनका परीक्षण हो सकता है। श्री शुक्ल को छत्तीसगढ़ की जनता सामान्यत: विद्या भैया का प्यार भरा संबोधन देती थी। यह संबोधन उन्हें सेंत-मेंत ही हासिल नहीं हुआ था। 1957, 62 (निरस्त), 64 (उपचुनाव), 67,71, 80, 84, 89 और 91 में उन्होंने महासमुंद अथवा रायपुर से चुनाव जीतकर संसदीय राजनीति में एक लंबी पारी खेली। 1977, 1998 और 2004 में चुनाव हारे भी। वे कभी मंत्री रहे, कभी मंत्री पद से हटाए गए, कभी मंत्री नहीं भी बनाए गए- इस सबको उन्होंने चाहे-अनचाहे स्वीकार किया, लेकिन अपनी शर्तों पर राजनीति करने की जिद उन्होंने कभी नहीं छोड़ी। वे चाहते तो रायपाल बन सकते थे या फिर रायसभा में जा सकते थे, लेकिन उन जैसे जुझारू व्यक्ति को यह कबूल नहीं था। 

वीसी शुक्ल के निधन से छत्तीसगढ़ ने अपने सबसे कद्दावर नेता को खो दिया है। देश भी अपने एक अति वरिष्ठ राजपुरुष से महरूम हो गया है। भारतीय राजनीति में उनका क्या योगदान रहा, छत्तीसगढ़ को उनकी सेवाओं का क्या लाभ मिला, एकाधिक बार कांग्रेस छोड़क़र दूसरी पार्टी यहां तक कि भाजपा में शामिल होने से उनकी राजनीति किस तरह प्रभावित हुई, आपातकाल में उनकी क्या भूमिका थी, ऐसे बहुत से बिन्दुओं पर आनेवाले समय में अध्ययन होगा। आज तो इस प्रदेश ने अपने एक बुजुर्ग को खो दिया है। इसका शोक प्रत्येक नागरिक को है। ''देशबन्धु'' वीसी शुक्ल को श्रध्दांजलि देते हुए श्रीमति सरला शुक्ल व उनके परिवार के प्रति हार्दिक संवेदना व्यक्त करता है।

देशबंधु में 12 जून 2013 को प्रकाशित