Thursday, 6 June 2013

अगर नक्सली चुनाव लड़ते!



जनसामान्य, खासकर मुखर वर्ग, में यह धारणा बलवती हो गई है कि भारत की आंतरिक सुरक्षा और शांति के रास्ते में नक्सलवाद ही सबसे बड़ी बाधा है। एक तरफ कहा जा रहा है कि नक्सलवाद वह सबसे कड़ी चुनौती है, जिससे देश को जूझना है तो दूसरी ओर यह आशंका भी जतलाई जाती है कि तिरुपति से पशुपति तक कथित रूप से बन गया रेड कारीडोर कहीं पूरे देश को अपनी चपेट में न ले ले। इन दोनों धारणाओं में जो अतिशयोक्ति है उसे न भी मानें तब भी इसमें कोई शक नहीं कि समस्या विकट है। रेड कारीडोर की जहां तक बात है तो देख लिया जाय कि वस्तुस्थिति क्या है। पशुपति के वास याने नेपाल में माओवादी अब एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल हो चुके हैं। तिरुपति याने आंध्र प्रदेश में माओवादियों का नहीं फिलहाल तो वाय.एस.आर. के वंश का ही सिक्का चल रहा है। उड़ीसा, झारखंड, महाराष्ट्र व छत्तीसगढ़ में उनका असर एक छोटे भूभाग तक ही सीमित है। 

बहरहाल, हम छत्तीसगढ़ क़ी बात करें। नब्बे  सदस्य वाली छत्तीसगढ़ विधानसभा में नक्सल वर्चस्व वाले बस्तर क्षेत्र की बारह सीटें हैं। अभी विधानसभा में भाजपा के पास 51 और कांग्रेस के पास 37 और बसपा के पास 2 सीटें हैं। इनमें से बस्तर की बारह (भाजपा की 11 कांग्रेस की 1) को निकाल दें तो विधानसभा का नक्शा इस तरह होगा कि भाजपा के पास 40 और कांग्रेस के पास 36 याने दोनों बड़े दलों के पास लगभग  बराबर सीटें होंगी। ऐसे में प्रदेश में सरकार किस पार्टी की बनेगी? जाहिर है कि जिस पार्टी को बस्तर का समर्थन मिलेगा वही सरकार बना पाएगी। यहां  संभावना बनती है कि यदि नक्सली बुलेट की बजाय बैलेट पर विश्वास करें तो ये बारह की बारह सीटें उनके खाते में आ  सकती हैं। इस स्थिति में वे किसी भी पार्टी को समर्थन देने से पहले अपना एजेंडा लागू करवाने की शर्त रख सकते हैं जिसे मानना सहयोगी बड़े दल की मजबूरी होगी। इस एजेंडे में वे सारे मुद्दे हो सकते हैं जिनके बारे में नक्सली बार-बार अपना सरोकार हिंसक उपायों से जाहिर करते रहते हैं।  इस तर्क को पंचायत चुनावों पर भी लागू किया जा सकता है।

इस सुझाव को कोरी कल्पना की उड़ान मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। विश्व के अनेक देशों के साथ-साथ स्वाधीन भारत के इतिहास में भी इसके दृष्टांत देखे जा सकते हैं। एक उदाहरण उत्तर-पूर्व के आदिवासी बहुल मिजोरम प्रदेश का है। राजनीतिक इतिहास के अध्येता जानते हैं कि हमारे उत्तर-पूर्व के प्रदेश सन् 1825-30  के आसपास उपनिवेशवादी काल में भारत में शामिल हुए थे। उसके पहले नगा, मिजो ये सब एक तरह से स्वतंत्र कबीलाई राय थे। 1947 में देश की आजादी की बेला में ये कबीले भारत संघ में बने रहने के बजाय वापिस अपनी स्वतंत्र सत्ता कायम करने के इच्छुक थे। जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने भारत के विरुध्द लड़ाई छेड़ दी थी। लेकिन एक वक्त ऐसा आया जब उन्हें समझ आया कि एक अंतहीन लड़ाई लड़ते रहने से कोई लाभ नहीं होगा।

इंदिरा गांधी के कार्यकाल में एक बड़ा निर्णय तो यह ले ही लिया गया था कि असम को जनजातीय विशेषताओं के आधार पर विभाजित कर दिया जाए।  इस तरह अरुणांचल, नागालैण्ड, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम और मेघालय ये छह नए प्रांत अस्तित्व में आए। यह निर्णय पूरी तरह कारगर सिध्द नहीं हुआ तथा असंतुष्ट कबीलों की छापामार कार्रवाईयां चलती रहीं। यह एक पेचीदा विषय है जिसकी  बारीकियों में जाने का अवसर यहां नहीं है। जो तथ्य उल्लेखनीय है वह यह कि ललडेंगा के नेतृत्व में विद्रोह का झंडा उठाए मिजो जन केन्द्र सरकार से बातचीत के लिए राजी हुए। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दूतों के साथ उनकी बात चलती रही और  1986 में अंतत: वह दिन आया जब राजीव गांधी के साथे ललडेंगा ने ऐतिहासिक संधि पत्र पर हस्ताक्षर किए व मिजोरम में शांति का मार्ग प्रशस्त हुआ। आज 30 साल के भीतर मिजोरम देश के सबसे उन्नत प्रदेशों में से एक बन चुका है। मानव विकास के सूचकांकों पर वह बहुत ऊपर है। 

मिजोरम का यह उदाहरण है जो सिध्द करता है कि किसी भी समाज की प्रगति के लिए शांति और स्थिरता अनिवार्य तत्व हैं। नि:संदेह उत्तर-पूर्व भारत की स्थिति पूरी तरह से संतोषजनक नहीं कही जा सकती। वहां नगा विद्रोहियों के साथ अभी भी वार्ताएं चल रही हैं जो वृहत्तर नगालिम की मांग पर अड़े हुए हैं। इसका असर मणिपुर की राजनीति पर भी पड़ रहा है। असम में भी क्षेत्रीय अस्मिता को लेकर हिंसक आंदोलन थमे नहीं हैं। इसके बावजूद कहा जा सकता है कि मिजोरम अपने पड़ोसी प्रदेशों के लिए एक बेहतर उदाहरण के तौर पर मौजूद है। हमारी बात  पूर्वोत्तर रायों तक सीमित नहीं है। एक दौर था जब तमिलनाडु में (तत्कालीन मद्र्रास प्रांत) द्रविड पृथकतावादी आंदोलन चला हुआ था। इस बात को भी यादा वक्त नहीं बीता है कि पंजाब में खालिस्तान की मांग हो रही थी। काश्मीर में भी पृथकतावादी तत्व अब भी मौजूद हैं और अपनी उपस्थिति का अहसास करवाते रहते हैं।

इन तमाम प्रांतों व छत्तीसगढ़ में दो-तीन फर्क हैं। काश्मीर, पंजाब और उत्तर-पूर्व ये सभी सीमावर्ती राय हैं और यहां के विद्रोहियों को सीमा पार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मदद मिलते रही है। दूसरे, जम्मू-काश्मीर व पंजाब प्रांत आदिवासी बहुल नहीं है जबकि पूर्वोत्तर राय आदिवासी बहुल होने के बावजूद वहां शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की स्थितियां पहले से ही छत्तीसगढ़ के मुकाबले बेहतर रही हैं। इस तरह देखें तो छत्तीसगढ़ में बस्तर के आदिवासियों को अपना कोई आंदोलन चलाने के लिए बाहर से सहायता मिलने की कोई गुंजाइश नहीं है और दूसरे पूर्वोत्तर जैसी राजनीतिक चेतना न होने के कारण अन्याय का मुकाबला करने के लिए किसी हद तक उदासीन रहे हैं। कहा जा सकता है कि इन दोनों कमियों को आंध्र प्रदेश व अन्य  प्रान्तों  से आए नक्सल नेताओं ने पूरा किया है!

इस पृष्ठभूमि में कुछ अन्य सवाल उभरते हैं। राय के सशस्त्र बलों और नक्सली दस्ते के बीच मुठभेडाें का सिलसिला लगातार बना हुआ है। कितने ही नक्सली नेता मारे जा चुके हैं। यह भी हम जानते हैं कि जो हैं उनमें से अधिकतर किसी तरह के आदर्शवाद से प्रेरित नहीं हैं। इन मुठभेड़ों के बारे में सरकारी दावे पूरी तरह से पूरे सच न हाें तब भी यह दिखाई देता है कि महाराष्ट्र, आंध्र और सीमावर्ती क्षेत्र से नक्सली पहले के मुकाबले कमजोर हुए हैं। वे बस्तर के आदिवासियों के बीच राजनीतिक चेतना विकसित करने में सफल हुए हैं, ऐसा मानना गलत होगा। आदिवासियों के बीच शोषण से मुक्तिदाता की उनकी जो छवि थी वह भी खंडित हो चुकी है। दूसरे शब्दों में आदिवासी इस तस्वीर में सिर्फ प्रसंगवश हैं। असली लड़ाई तो सरकार और नक्सलियों के बीच हो रही है और इसमें नक्सली कभी जीत पाएंगे, ऐसा  मुमकिन नज् ार नहीं आता। इस लड़ाई से अंतत: किसे फायदा होगा, इसका जिक्र मैं कुछ समय पहले कर चुका हूं। उसे यहां दोहराने की जरूरत नहीं है। मैं इस लेख के प्रारंभ में उठाए गए बिंदु पर लौटता हूं कि यदि आज के नक्सली और उनसे बौध्दिक सहानुभूति रखने वाले बस्तर में जनतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के बारे में सोचें, वे भले ही अपनी ही पार्टी बना लें और बारह की बारह सीटें जीतें, इससे उन्हें आदिवासियों के अधिकार एवं सम्मान की रक्षा का एजेण्डा लागू करने के लिए जो अवसर मिलेगा, वह बंदूक की गोली से कभी नहीं मिल सकता।


देशबंधु में 06 जून 2013 को प्रकाशित