Wednesday, 12 June 2013

अडवानी या मोदी : फर्क क्या है?




यह बहुप्रचारित है कि भारतीय जनता पार्टी भारतीय संस्कृति की संरक्षक, संवाहक और संपोषक है। उसकी यह छवि पिछले पचास-साठ साल में बड़ी मेहनत से संघ के उन स्वयंसेवकों ने बनाई थी, जो नागपुर से निकलकर अथवा नागपुर से दीक्षा प्राप्त कर देश के दूरदराज के हिस्सों में जाकर संघ के उद्देश्यों के लिए काम करते हुए अपना पूरा जीवन खपा देते थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने आपको भले ही सांस्कृतिक संगठन मानता रहा हो, लेकिन यह उसे शुरु से पता था कि राजनीतिक सत्ता हासिल किए बिना भारत को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने का उसका सपना कभी पूरा नहीं हो सकता। यदि संघ के गठन के तुरंत बाद उसने हिन्दू महासभा का इस्तेमाल अपने राजनीतिक मंच के रूप में किया तो बाद में भारतीय जनसंघ का गठन भी इसी मकसद से हुआ। जनसंघ से जनता पार्टी से होते हुए भाजपा के विकास तक की यात्रा में संघ के स्वयंसेवकों एवं पूर्णकालिक प्रचारकों ने महती भूमिका निभाई, इसमें दो राय नहीं। आज उनके दिल पर क्या गुजर रही होगी, वे ही जानते होंगे!

1952 के पहले आम चुनाव से लेकर 2009 के चुनावों तक संघ के इस राजनीतिक मंच ने बहुत से उतार-चढ़ाव देखे हैं। एक राजनीतिक दल के रूप में जब कभी भी उसे सत्ता में आने का अवसर मिला, उसने एक तरफ तो संघ के एजेंडा को लागू करने के लिए जो भी प्रयत्न किए जाना चाहिए थे किए, लेकिन दूसरी तरफ सत्ता में बैठे उसके नेता उन आकर्षणों और प्रलोभनों से नहीं बच सके जो सत्ताधीशों को सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिन्ह भले ही कमल हो, लेकिन  दुर्भाग्य से उसके नेता और कार्यकर्ता सत्ता के कीचड़ से उठकर स्वयं कमल नहीं बन सके। कल-परसों टीवी की एक बहस में भाजपा के किसी प्रवक्ता ने बेहद हास्यास्पद तरीके से पहले तो लालकृष्ण अडवानी की तुलना महात्मा गांधी से की कि उनके घोषित उम्मीदवार पट्टाभि सीतारम्मैया त्रिपुरी कांग्रेस (1939) में सुभाषचंद्र बोस से हार गए थे। इसके बाद उन्होंने अडवानीजी की तुलना ज्योति बसु से की जो पार्टी के आदेश को मानकर प्रधानमंत्री नहीं बन पाए।

जाहिर है कि इन दोनों तुलनाओं का कोई औचित्य नहीं था। महात्मा गांधी स्वयं  अपने लिए चुनाव नहीं लड़ रहे थे। उनका नेताजी से मतभेद सैध्दांतिक स्तर पर था। इसी तरह ज्योति बाबू ने पार्टी के आदेश के खिलाफ विद्रोह नहीं किया था। दरअसल, पिछले पांच-सात दिन में भाजपा के भीतर जो उठापटक देखने मिल रही है, उसका पार्टी या संघ परिवार की नीति, सिध्दांत या परंपरा से कोई लेना-देना नहीं है। मोदी बनाम अडवानी की यह लड़ाई येन-केन-प्रकारेण प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो जाने की महत्वाकांक्षा से उपजी है। इस लड़ाई का हश्र क्या होगा, यह अनुमान तो भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता ही लगा सकते हैं, लेकिन एक आम नागरिक का जहां तक सवाल है उसकी नजर में न तो श्री मोदी की प्रतिष्ठा बढ़ी है और न श्री अडवानी की।

लालकृष्ण अडवानी आज याने अब तक भारतीय जनता पार्टी के सर्वाधिक वरिष्ठ नेता हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की असाध्य बीमारी के चलते उन्हें यह अवसर मिला है। वे पार्टी के सर्वाधिक वयप्राप्त नेता भी हैं। वे अपनी इस वरीयता का लाभ उठाकर सहानुभूति व समर्थन जुटाना चाहते हैं किन्तु इसकी ओट में वे अपने अतीत को छिपा नहीं सकते। राजनीति के अध्येता जानते हैं कि श्री अडवानी एक महत्वाकांक्षी नेता हैं तथा पिछले पच्चीस वर्षों से वे प्रधानमंत्री बनने की फिराक में लगे हुए हैं। 1990 में उनकी रथयात्रा का मकसद आखिरकार क्या था? इसके उपरांत एनडीए सरकार बनने पर उन्होंने कोशिश कर अपने लिए उपप्रधानमंत्री का दर्जा हासिल किया ताकि वे खुद को सरदार पटेल के समकक्ष खड़ा कर सकें। वे महज केबिनेट मंत्री बनकर संतुष्ट नहीं थे। इसके बाद 2003 में वाजपेयीजी की अस्वस्थता को मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री बनने के लिए जोर लगाया। वह तो जब आमसभा में वाजपेयीजी ने ''न टायर न रिटायर'' का जुमला कसा तब अडवानीजी के तेवर ठंडे हुए। बात यहीं नहीं रुकी। उन्होंने 2004 में समय पूर्व चुनाव करवाने की पहल भी की, लेकिन पांसा फिर एक बार गलत पड़ा। 2005 में अडवानीजी पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर गए और पाकिस्तान के मरहूम संस्थापक को धर्मनिरपेक्ष होने का प्रमाण दे आए, शायद यही सोचकर कि अपने इस करतब से वे भारत के दक्षिण-उदारवादी तबके का समर्थन हासिल कर लेंगे, उसी तरह जैसा कि वाजपेयीजी को मिला था। अडवानीजी की राजनीतिक यात्रा के ये प्रसंग जिसे भी याद हैं, उसकी सहानुभूति उनके प्रति नहीं हो सकती।

भाजपा की इस ताजा अर्न्तकलह के दूसरे मुख्य पात्र हैं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी। इस पद पर कार्य करते हुए पिछले बारह साल में उनकी जो उपलब्धियां रही हैं उन्हें देखते हुए ऐसा कोई भी व्यक्ति उन्हें अपना वोट नहीं दे सकता, जो जनतंत्र, समाजवाद व धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी उसूलों में विश्वास रखता हो। अगर अटल बिहारी वाजपेयी की बात सुनी गई होती तो 2002 में ही नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री के पद से हट जाना चाहिए था। यह विडंबना है कि जिन अडवानी ने मोदी का बचाव किया था वे ही आज अपने आपको  ठगा महसूस कर रहे हैं। इस प्रसंग से यह जाहिर होता है कि श्री मोदी और श्री अडवानी दोनों राजधर्म की कसौटी पर खरे नहीं उतरे। इसलिए इन पर से किसी पर भी विश्वास करना देश के संविधान के साथ धोखा करना है।

नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में गुजरात में 2002 का नरसंहार ही नहीं हुआ, उसके बाद का घटनाचक्र भी उनकी कोई  बेहतर छवि पेश नहीं करता। आज उन्होंने अडवानीजी को किनारे लगाया है, लेकिन इसके बहुत पहले वे गुजरात में भाजपा की नींव मजबूत करने वाले केशुभाई पटेल व सुरेश मेहता जैसे नेताओं को दरकिनार कर चुके हैं। याने अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति में वे व्यक्तिगत संबंधों की परवाह नहीं करते। अपने ही एक मंत्री हरेन पंडया की हत्या को लेकर उनकी भूमिका पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। दूसरी तरफ वे हत्या के आरोपी अमित शाह को पार्टी महासचिव बनवाते हैं और सरेआम बंदूक का डर दिखाने वाले विट्ठल रादडिया को भाजपा प्रवेश कर उन्हें लोकसभा का टिकट देते हैं। याने उन्हें इस बात की तनिक भी परवाह नहीं है कि उनके साथी-सहयोगियों का चरित्र क्या है। नरेंद्र मोदी अपनी लोकप्रिय छवि बनाने के लिए निरंतर उपाय करते रहे हैं। इसके बावजूद सोहराबुद्दीन हत्याकांड, इशरत जहां हत्याकांड और एहसान जाफरी की हत्या जैसे दुखदायी प्रसंग भूत बनकर उनका पीछा कर रहे हैं। माया कोडनानी सहित उनके कुछ और कट्टर साथी जेल में सजाएं भुगत ही रहे हैं। ऐसे प्रकरणों पर पर्दा डालते हुए श्री मोदी अपने छवि निर्माण के लिए विराट सम्मेलन करते हैं, लेकिन वे उस क्षण बेनकाब हो जाते हैं जब वे मुसलमान फकीर द्वारा दी गई टोपी पहनने से खुले मंच पर इंकार कर देते हैं। दूसरे शब्दों में दीनदयाल उपाध्याय के जिस एकात्म मानवतावाद का मंत्र लेकर अटल बिहारी वाजपेयी आगे बढ़े थे उसके लिए नरेंद्र मोदी के विचार और कार्य में कोई जगह नहीं है।

दरअसल नरेंद्र मोदी की आज की जो विराट छवि जनता के सामने पेश की गई है वह एक छलावा है, मायाजाल है और उसे बुनने-बिछाने का काम कारपोरेट घरानों और उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया ने किया है। टाटा और अंबानी से लेकर छोटे-छोटे औद्योगिक घराने भी आज नरेंद्र मोदी पर उसी तरह न्यौछावर हो रहे हैं जिस तरह 1932-36 के दौरान जर्मनी के पूंजीपति हिटलर पर मुग्ध हो रहे थे। श्री मोदी के लिए तो कारपोरेट मीडिया भी पर्याप्त नहीं है। जैसा कि हम जानते हैं वे पिछले छह साल से अमेरिका के एप्रो नामक उस पब्लिक रिलेशन फर्म की सेवाएं ले रहे हैं जिसमें रूस में येल्तसिन और यूक्रेन आदि अनेक देशों में कुछ और तानाशाहों ने अपनी सेवाएं दी थीं।

भाजपा और संघ दोनों इस सच्चाई से परिचित हैं। इसके बावजूद अगर वे कच्ची भावनाओं को उभाड़ने का खेल खेलना चाहते हैं तो हमें विश्वास है कि अगले चुनाव में देश की परिपक्व जनता उन्हें इसका माकूल जवाब देगी।

देशबंधु में 13 जून 2013 को प्रकाशित