Thursday, 15 August 2013

अजीत जोगी पर असमंजस



चार हिन्दीभाषी राज्यों में विधानसभा चुनाव  होने में अब ज्यादा वक्त नहीं है। ज्यादा से ज्यादा बारह हफ्ते याने तीन माह। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में वर्तमान में भाजपा सरकार है जबकि राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस। याने अभी हिसाब बराबरी पर है। क्या इसमें कोई परिवर्तन आएगा, अनुमान लगाना कठिन है। सबकी अपनी-अपनी कोशिशें हैं और अपने-अपने दावे। कांग्रेस और भाजपा दोनों में हरेक प्रदेश में आपसी खींचतान चल रही है, लेकिन इतना तय है कि अपने-अपने प्रदेश में वर्तमान मुख्यमंत्री के नेतृत्व में ही उनकी पार्टी चुनाव लड़ेगी। छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह, दिल्ली में श्रीमती शीला दीक्षित, राजस्थान में अशोक गहलोत व मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान। चुनाव परिणाम आने के बाद इन नेताओं की भूमिकाओं में कोई फेरबदल हो तो हो। श्री चौहान को तो उनकी पार्टी व मीडिया का एक वर्ग भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहा है तो शेष तीन को भी संभव है कि आगे-पीछे सत्ता या संगठन में नई जिम्मेदारियां सौंपी जाएं।

एक राजनैतिक दल में भीतर-भीतर समीकरण बनते-बिगड़ते रहते हैं, लेकिन इन चार राज्यों में फिलहाल सबसे विकट स्थिति छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी में दिखाई दे रही है। यहां एक लंबे समय से नेतृत्व का संकट बना हुआ था जिसे दूर कर पार्टी को पुनर्जीवित करने में स्वर्गीय नंदकुमार पटेल ने जी-तोड़ प्रयत्न किए थे। 25 मई को बस्तर में हुए नक्सली हमले में उनके बलिदान के बाद पार्टी एक बार फिर वहीं पहुंच गई जहां दो ढाई साल पहले थी। चरणदास महंत को पुन: नेतृत्व सौंपकर स्थिति संभालने की कोशिश की गई, लेकिन आम जनता समझ नहीं पा रही है कि छत्तीसगढ़ में पार्टी का नेतृत्व किसके हाथों में है। यह स्थिति वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की रीति-नीति पर चलते उत्पन्न हुई है। कांग्रेस आलाकमान इस बात को लेकर असमंजस में है कि श्री जोगी की सेवाएं पार्टी के लिए किस सीमा तक लाभदायक हैं।

यूं तो सार्वजनिक तौर पर पार्टी के कर्ताधर्ता अपने भीतर किसी तरह की गुटबाजी या मतभेद की बातों से इंकार करते हैं, लेकिन समय-समय पर उनका अंतर्द्वन्द्व किसी न किसी रूप में छलक पड़ता है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि जोगी समर्थक व जोगी विरोधी, दोनों के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ लगी हुई है। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पिछले दस साल से सत्ता से बाहर है व कार्यकर्ताओं को लगता है कि अगर तीसरी बार भी चुनाव हार गए तो प्रदेश से पार्टी का सफाया ही हो जाएगा याने प्रदेश में पार्टी के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न है। अब नहीं जीते तो फिर कब जीतेंगे, यह डर सबको खाए जा रहा है। इस वस्तुस्थिति को समझकर अपनी-अपनी तरफ से उपाय सुझाए जा रहे हैं। इनमें से एक विचार है कि श्री जोगी को चुनाव की कमान नि:शर्त सौंप दी जाए। इसके विपरीत दूसरा विचार है कि श्री जोगी को पार्टी से निकाल दिया जाए, उससे कम में बात नहीं बनेगी। अब यह तो हाईकमान को तय करना है कि वह श्री जोगी के साथ क्या बर्ताव करे, लेकिन इस बहाने हम श्री जोगी की राजनीतिक यात्रा पर एक सरसरी निगाह अवश्य डाल सकते हैं।

अजीत जोगी के पक्ष में मोटे तौर पर निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं-
1.     श्री जोगी एक उच्च शिक्षित, मेधावी राजनेता हैं। वे प्रावीण्यता के साथ उत्तीर्ण इंजीनियर हैं। वे विधि स्नातक भी हैं। इसके साथ-साथ वे आईएएस में भी चुने गए थे।
2.    वे विविध और व्यापक जीवनानुभवों के धनी हैं। शासकीय इंजीनियरिंग महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक रहे, आईपीएस कर पुलिस में सेवा की, फिर आईएएस कर सोलह साल तक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे।
3.     उन्होंने राज्यसभा के माध्यम से राजनीति में प्रवेश किया, फिर दो बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए और तीन बार विधानसभा के लिए।
4.     वे छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री निर्वाचित हुए तथा तीन साल तक इस पद पर रहे।
5.     वे चाहे जिलाधीश रहे हों या मुख्यमंत्री, उनकी मजबूत पकड़ प्रशासन पर हर समय रही। जब मुख्यमंत्री बने तब सुबह सात बजे भी फोन खुद उठा लेते थे।
6.     वे त्वरित निर्णय लेने में सक्षम हैं। मुख्यमंत्री बनने के तीन-चार दिन के भीतर छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल का गठन कर उन्होंने अपनी कार्यशैली का प्रभावी परिचय दिया था।
7.     वे एक अध्ययनशील व्यक्ति हैं। हिन्दी, छत्तीसगढ़ी, अंग्रेजी पर उनका समान रूप से अधिकार है तथा एक लेखक के रूप में अपनी पहचान बनाने की कोशिश उन्होंने कभी की थी।
8.     प्रदेश के वंचित समुदायों के प्रति उनकी संकल्पबध्दता समय-समय पर व्यक्त होती रही है।
9.     वे जीवट के धनी व्यक्ति हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान गंभीर रूप से घायल हो जाने के बावजूद मृत्यु के मुंह से जाकर लौटे तथा शारीरिक बाध्यता के बावजूद दस साल से प्रदेश की राजनीति में प्रखरता के साथ अपनी उपस्थिति निरंतर दर्ज करते आए हैं।

इसके बरक्स उनके विरुध्द निम्नानुसार तर्क दिए जा सकते हैं-

1.     वे एक तरह से मूर्तिभंजक हैं और इस बात की परवाह नहीं करते कि कौन उनके साथ है या नहीं।
2.     वे अपनी शर्तों पर राजनीति करते हैं और संभवत: कांग्रेस आलाकमान को छोड़कर अन्य किसी नेता की परवाह नहीं करते। क्या यह उनका आत्मविश्वास का अतिरेक है, कहना कठिन है।
3.     उन्हें नए प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बनने का दुर्लभ अवसर मिला था, लेकिन तीन साल बीतते न बीतते उनके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा। यह स्थिति क्यों उत्पन्न हुई?
4.     2008 में एक बार फिर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत हाथ आते दिखाई दे रही थी, लेकिन दुबारा हार हुई और पार्टी के भीतर इसका दोष फिर श्री जोगी के मत्थे डाला गया ।
5.     यद्यपि एक अत्यंत कुशल प्रशासक के रूप में उनकी छवि थी, लेकिन एक तो उन्हें विरोध बर्दाश्त नहीं है और दूसरे वे साथी या समर्थक नहीं, अंधभक्त चाहते हैं। वैसे यही आरोप उनके पूर्ववर्ती कुछ अन्य बड़े नेताओं पर भी उनके समय में लगाया जाता था।
6.     यह भी कहा जाता है कि उनकी प्रशासनिक क्षमता के बावजूद लोग उन्हें प्रेम या आदर से कम, भय की भावना से ज्यादा देखते हैं।
7.     उन पर एक आरोप अपने बेटे को राजनीति में स्थापित करने का लगाया जाता है। यह सही है कि उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही उनके सुपुत्र की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को बल मिला, लेकिन यह आरोप तो प्रदेश व पार्टी की सीमा के बाहर भी हर स्थापित राजनेता पर लगाया जा सकता है। श्री जोगी ने इस बारे में जो भी किया हो, वे सिर्फ प्रचलित प्रथा का पालन कर रहे हैं।

श्री जोगी की अच्छाईयों और कमियों को लेकर इस सूची में और भी बिन्दु जोड़े जा सकते हैं, लेकिन असली सवाल तो यही है कि आसन्न चुनावों में यदि कांग्रेस को जीतना है तो पार्टी नेतृत्व ऐसे तमाम बिन्दुओं का विश्लेषण किस तरह से करता है।

बताया जाता है कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पुर्नगठन से श्री जोगी प्रसन्न नहीं हैं। इसका इजहार वे काफी कुछ खुलकर कर चुके हैं। उनके एक समय के राजनीतिक प्रतिस्पर्धी दिग्विजय सिंह के शिष्यगण प्रदेश कांग्रेस पर हावी हैं यह बात उन्हें व्यथित करती है तथा मोतीलाल वोरा या यूं कहें तो वोरा बंधुओं से उनकी दूरी उस समय से है जब वे अविभाजित रायपुर जिला के कलेक्टर थे। अभी चर्चाएं हैं कि वे छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच के साथ मोर्चेबंदी कर सकते हैं, लेकिन इस मोर्चे में जोगी विरोधी अरविंद नेताम एक प्रमुख नेता हैं। श्री जोगी अलग हेलीकाप्टर लेकर मिनी माता स्मृति के कार्यक्रमों में शिरकत कर रहे हैं, इसे लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं। जो भी हो, यह तो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के सभी नेताओं को समझना होगा कि यदि वे एकजुट न होंगे तो प्रदेश में सचमुच कांग्रेस की दुर्गति हो सकती है। यदि आपसी लड़ाई-झगड़ों , अहंकार, महत्वाकांक्षा आदि को चुनावों तक के लिए स्थगित रखा जाए तभी कांग्रेस का भला हो पाएगा।

देशबंधु में 15 अगस्त 2013 को प्रकाशित