Wednesday, 21 August 2013

इजिप्त : बिगड़ते हालात



दो साल पहले सोशल मीडिया को माध्यम बनाकर अरब जगत में बसंत का जो स्वप्न देखा गया था वह चकनाचूर हो चुका है। पिछले कुछ दिनों से इजिप्त में सैनिक शासन और अपदस्थ मुस्लिम ब्रदरहुड के बीच भीषण संघर्ष चला हुआ है, जिसमें अब तक कोई सात-आठ सौ लोग मारे जा चुके हैं। जो अध्येता इजिप्त अथवा मध्यपूर्व की राजनीति को जानने का दावा करते हैं वे भी अनुमान लगाने में असमर्थ हैं कि भविष्य क्या होगा?  टयूनीशिया, जहां से 'अरब बसंत' का आगाज् हुआ, वहां हालात अस्थिर बने हुए हैं। यमन और बहरीन में भी आंदोलनकारी जनता सड़कों पर उतरी थी लेकिन कुछ दिनों की हलचल के बाद फिर वही पुरानी स्थिति कायम हो गई। सीरिया में अमेरिका और उसके पिछलग्गू देश बसर-अल-असद को अपदस्थ करने की पुरजोर कोशिशों में लगे हैं, लेकिन कोई सिरा मिलता नज़र नहीं आता। विश्व के एक बड़े भू-भाग में विद्यमान यह वातावरण विश्वशांति की दिशा में एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने है।

स्मरणीय है कि 2011 में टयूनीशिया व इजिप्त में मुख्यत: सोशल मीडिया के माध्यम से सत्ता परिवर्तन की मांग उठी थी। इस मांग को देखते ही देखते भारी जनसमर्थन मिला और दोनों देशों में नई सरकारें स्थापित हो गईं। इसमें इजिप्त की ओर राजनीतिक पर्यवेक्षकों का ध्यान विशेषकर गया इसलिए कि एक तरफ अफ्रीकी महाद्वीप और दूसरी तरफ अरब जगत, दोनों में लंबे समय से इजिप्त का विशेष महत्व रहा है। यदि इजिप्त अपने प्राचीन सांस्कृतिक वैभव के लिए जाना जाता है तो दूसरी तरफ स्वेज नहर के माध्यम से वह एशिया और यूरोप के बीच व्यापार सेतु का काम भी करता है। उपनिवेशवाद के दौर की समाप्ति के बाद गुटनिरपेक्ष देशों के आंदोलन में भी उसकी महती भूमिका थी। आज वही देश लहूलुहान हो रहा है।

आज के इजिप्त को देखकर विश्वास नहीं होता कि यह वही देश है जिसकी पुनर्रचना की नींव गमाल अब्दुल नासिर के क्रांतिकारी नेतृत्व में रखी गई थी। इसके लिए एक तरफ अगर पूर्व राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक की तीस साल लंबी तानाशाही को दोष दिया जा सकता है तो दूसरी ओर वर्तमान में जो राजनीतिक शक्तियां सक्रिय हैं उनके क्रियाकलापों से भी दूरदर्शिता का परिचय नहीं मिलता। मुबारक के प्रति लंबे समय से जनता के मन में गुस्सा उमड़ रहा था और उन्हें तो एक न एक दिन जाना ही था, लेकिन उनके जाने के बाद देश की राजनीति को एक नई दिशा कैसे दी जाए, इस बारे में कोई विचार ही नहीं किया गया!

यह साफ-साफ दिखाई दे रहा था कि मुबारक के हटने के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड का नई ताकत के साथ उभार होगा। इजिप्त में ब्रदरहुड का एक लंबा इतिहास है। वह एक जड़वादी संगठन है और उसे नियंत्रित करने की कोशिशें पिछले सौ साल से चलती रहीं। उसके नेताओं को लंबी जेल यात्राएं करना पड़ी और संगठन को कई बार प्रतिबंधित भी किया गया। हुस्नी मुबारक यूं तो निर्वाचित राष्ट्रपति थे, लेकिन मूलत: वे सेना के जनरल थे और उनके तीस साल के दौरान सेना का खासा दखल प्रशासन में था, इस वजह से आम जनता के बीच वे कभी मन से स्वीकार नहीं किए गए। उनकी अमेरिकापरस्ती भी जनसामान्य के बीच उनकी स्वीकार्यता में आड़े आती थी। उनमें अगर कोई एक गुण था तो यही कि शासन घोषित रूप से धर्मनिरपेक्ष था तथा कॉप्टिक ईसाइयों को, जो कि आबादी का दस प्रतिशत हैं नीतिगत तौर पर सुरक्षा हासिल थी।

उधर मुस्लिम ब्रदरहुड के प्रति जनता में सहानुभूति  इसलिए जागी कि उसके नेता लंबे समय से जेल में बंद थे। इस नाते स्वतंत्र चुनाव का अवसर आने पर उन्हें व्यापक जनसमर्थन मिलना अवश्यम्भावी था। ठीक उस समय दो महत्वपूर्ण बिन्दुओं की अनदेखी कर दी गई। एक तो यह कि इजिप्त का बहुसंख्यक समाज धर्मपरायण भले हो, कट्टरपंथी नहीं है, उसका चरित्र उदारवादी है व राजनीतिक स्तर पर  धर्मनिरपेक्ष है। दूसरे  कि इसको आधार बनाकर एक नया राजनैतिक प्लेटफार्म बनाने पर जो ध्यान दिया जाना था वह नहीं दिया गया। बुतरस-बुतरस घाली, मोहम्मद अलबरदेई और अमरू मूसा जैसे उदारवादी राजनेता किसी दिन होस्नी मुबारक की जगह लेंगे, तथाकथित  'अरब बसंत'  आने के पहले ही इस बारे में इजिप्त में खुलकर चर्चाएं होने लगी थीं। मैंने ऊपर जिन तीन नेताओं के नाम लिए, ये तीनों अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त व्यक्ति हैं और बड़े-बड़े ओहदों पर काम कर चुके हैं। इन जैसे अनुभवी नेताओं से यह उम्मीद की जा रही थी कि वे सैन्यतंत्र और धार्मिक जड़वादिता दोनों के विरूध्द एक उदारवादी जनतांत्रिक राजनैतिक विकल्प पेश कर सकेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

 ध्यातव्य है कि इजिप्त में जब आम चुनाव हुए तब मुस्लिम ब्रदरहुड को जनता की सहानुभूति भले ही मिली हो, अपेक्षित संख्या में वोट नहीं मिले। मुझे अगर ठीक याद है तो मुस्लिम ब्रदरहुड को 30 प्रतिशत से कम ही वोट मिल पाए, जबकि उदारवादी दलों के वोट आपस में बंट गए। दूसरे शब्दों में अगर उदारवादी दलों ने एकजुटता दिखाई होती, वे जनता के बीच गए होते,  एक विश्वसनीय घोषणापत्र और कार्यक्रम पेश किया होता तो मोहम्मद मुर्सी को राष्ट्रपति बनने का मौका न मिला होता।

मुस्लिम ब्रदरहुड और उसके नेता मुर्सी ने भी चुनाव जीतने के बाद राजनीतिक विवेक का अपेक्षित परिचय नहीं दिया। उन्हें लगा कि वे इजिप्त को एक इस्लामी गणतंत्र में रातोंरात तब्दील कर सकते हैं। मुर्सी के संक्षिप्त कार्यकाल में संकीर्ण सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया, जिसका शिकार कॉप्टिक ईसाई हुए। सरकार ने नासिर के समय से चली आ रही उदारवादी नीतियों को भी बदलने की कोशिश की। यह रवैया जनता को पसंद नहीं आया तथा मुर्सी के खिलाफ असंतोष का माहौल बनने लगा। सत्ता से वंचित सेना को मानो इसी मौके  की ही तलाश थी।

अब स्थिति यह है कि मुस्लिम ब्रदरहुड मुर्सी की रिहाई और बहाली के लिए उग्र आंदोलन छेड़े हुए है तो सेना बंदूक की गोलियों से उसका मुकाबला करने में लगी है। ऐसे में सेना का यह दावा  निरर्थक हो जाता है कि वह जनतंत्र की बहाली करना चाहता है। इस सैनिक शासन में अलबरदेई ने उपराष्ट्रपति पद संभाल लिया था, लेकिन सेना के साथ मुठभेड़ में बड़े पैमाने पर हुई मौतों के बाद उन्होंने न सिर्फ पद त्याग कर दिया, बल्कि देश छोड़कर भी चले गए।

अभी आगे कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है, लेकिन मेरा सोचना यही है कि इजिप्त के उदारवादी तबके को हिम्मत के साथ सामने आकर नेतृत्वकारी भूमिका का परिचय देना चाहिए तभी देश के ऊपर छाया अंधेरा दूर होगा। इसके साथ यह याद रख लेना भी उचित होगा कि सोशल मीडिया से सच्ची क्रांति नहीं होती।

देशबंधु में 22 अगस्त 2013 को प्रकाशित