Thursday, 28 November 2013

तेजपाल और केजरीवाल





"संसार
 में सबसे अधिक दंडनीय वह व्यक्ति है जिसने यथार्थ के कुत्सित पक्ष को एकत्र कर नरक का आविष्कार कर डाला, क्योंकि उस चित्र ने मनुष्य की सारी बर्बरता को चुन-चुनकर ऐसे ब्यौरेवार प्रदर्शित किया है कि जीवन के कोने-कोने में नरक गढ़ा जाने लगा।  इसके उपरांत उसे यथार्थ के अकेले सुखपक्ष को पुंजीभूत कर इस तरह सजाना पड़ा कि मनुष्य उसे खोजने के लिए जीवन को छिन्न-भिन्न करने लगा।''

भारत की अग्रणी लेखिका महादेवी वर्मा ने आज से लगभग अस्सी वर्ष पूर्व अपने कविता संकलन दीपशिखा में आत्मकथ्य लिखते हुए उपरोक्त विचार प्रकट किए थे। उन्होंने भले ही अपनी बात साहित्य और कला के संदर्भ में की हो, लेकिन आज भारत का मीडिया चुन-चुनकर जिस तरह की खबरें परोस रहा है, उसमें इन विचारों की प्रासंगिकता अपने आप स्पष्ट हो जाती है।

पिछले आठ-दस दिन से मीडिया पर एक तरफ तरुण तेजपाल और दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल और उनकी 'आम आदमी पार्टी' से संबंधित खबरें छायी हुई हैं। इनके बारे में सोचते हुए एकाएक मेरा ध्यान महादेवीजी के कथन की ओर तो गया ही, कोई आठ-नौ वर्ष पहले मैंने स्वयं भंडाफोड़ करने वाली पत्रकारिता पर जो दो लेख लिखे थे उनका भी स्मरण हो आया। याद करें कि वर्तमान समय में इस तरह की पत्रकारिता तरुण तेजपाल ने ही तहलका के माध्यम से प्रारंभ की थी। उन्होंने बंगारू लक्ष्मण व जार्ज फर्नाडीज आदि को लेकर जो स्टिंग ऑपरेशन किए थे उनकी खूब चर्चा हुई थी और देश में उन्हें बड़े पैमाने पर वाहवाही हासिल हुई थी। लेकिन मेरा तब भी मानना था कि यह तौर-तरीका पत्रकारिता के लिए ठीक नहीं है। दोनों लेखों- ''बिच्छू का डंक मार्का पत्रकारिता'' (विदुर अप्रैल-जून 2005 में प्रकाशित) तथा ''पत्रकारिता में बिच्छू, मकड़ी और ततैया'' (देशबन्धु में 22 दिसंबर 2005 को प्रकाशित) में बिना किसी लाग-लपेट के यह बात कही थी। जाहिर है कि मैं उस समय अल्पमत में था और शायद आज भी हूं।

मेरी कुछ ऐसी ही राय अरविंद केजरीवाल की राजनीति के बारे में है। यदि तरुण तेजपाल का दावा पत्रकारिता के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में व्याप्त मलिनता को दूर करने का था तो श्री केजरीवाल देश की राजनीति को साफ-स्वच्छ करने का बीड़ा उठाकर मैदान में उतरे थे। उन्होंने पहले अन्ना हजारे एवं अन्य कई लोगों के साथ मिलकर आंदोलन  किया और फिर बाहर से सफाई करते-करते सक्रिय राजनीति में प्रवेश कर अपने आपको विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर दिया। एक समय था जब अन्ना और अरविंद की जोड़ी पर देश का एक वर्ग मुग्ध हो उठा था। अन्ना के नेपथ्य में चले जाने के बाद अरविंद केजरीवाल को प्रकाश स्तंभ के रूप में देखने वालों की कमी नहीं थी। लेकिन हमें न तो उनके लोकपाल आंदोलन से कोई आशा थी और न उनकी आज की राजनीति से। हमारी राय में वे तब भी जन-भावनाओं से खेल रहे थे और आज भी उनकी यही स्थिति है।

तरुण तेजपाल की पत्रकारिता और अरविंद केजरीवाल की राजनीति दोनों का आधार, दिशा और मंतव्य एक जैसे ही थे। उनका मकसद ऐसे लोगों पर कीचड़ उछालना और आरोप लगाना था जो सार्वजनिक जीवन में किसी महत्वपूर्ण स्थान पर हों। यह पूरी तरह से व्यक्ति केन्द्रित कार्रवाई थी और सिध्दांत के नाम पर यत्र-तत्र भ्रष्टाचार उजागर करने तक सीमित थी। उन्होंने  अपनी ओर से जो बातें उजागर कीं उनमें सत्य का अंश रहा होगा, लेकिन जिस तरह दीवाली की रात फुलझड़ी जलाने से सारी रातें रोशन नहीं हो जातीं, उसी तरह ऐसे चुन-चुनकर लगाए गए आरोपों से भी सार्वजनिक जीवन में स्थायी रूप से शुचिता नहीं लाई जा सकती। होता है तो सिर्फ इतना कि कुछ लोगों का सार्वजनिक जीवन ऐसे आरोपों के घेरे में आकर समाप्त हो जाता है। इसके आगे उनकी कोई उपयोगिता नहीं है।

दरअसल भारत का सुविधाभोगी समाज ऐसी प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। यह वह वर्ग है जिसे अपने लिए जीवन की सारी नेमतें चाहिए। इसके लिए वह समझौते भी करता है। इस वर्ग को बीच-बीच में प्रायश्चित बोध होता है तब वह किसी मसीहा  की तलाश करता है, जो एक ऐसी नई व्यवस्था लागू कर दे जिसमें सुविधाभोगी समाज को बिना समझौते किए, बिना अपने मन पर बोझ लादे, आराम से वह सब कुछ हासिल हो सके जिसकी उसने ख्वाहिश की हो। भारत में आर्थिक उदारवाद आने के बाद से यह भावना कुछ यादा ही तेजी से पनपी। ऐसा शायद माना जा सकता है कि टी.एन. शेषन इन तथाकथित मसीहाओं के आदि देव थे। किन्तु एक समय आता है जब ये खुद अपने ही बनाए हुए जाल में फंस जाते हैं और इनकी प्रतिमा खंडित हो जाती है। टी.एन. शेषन से लेकर तेजपाल और केजरीवाल तक यही हुआ है।

फिलहाल श्री केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी ''मीडिया सरकार'' नामक पोर्टल के द्वारा किए गए स्टिंग ऑपरेशन के चलते कुछ परेशानी में पड़ गई है। अब वे और उनके साथी खुद ही अपनी जांच कर खुद को पाक-साफ होने का प्रमाणपत्र दे रहे हैं। वे इसके लिए अन्य राजनीतिक दलों को जिम्मेदार भी ठहरा रहे हैं। देखा जा सकता है कि जो कडवी दवा वे दूसरों को पिलाना चाहते थे अब उनके हलक में आकर बेचैनी पैदा कर रही है। उधर तरुण तेजपाल अपने पहले स्टिंग ऑपरेशन के बाद कुछ समय के लिए दृश्य से ओझल हो गए थे। लेकिन देखते न देखते वे वापिस लौटे और मीडिया में एक बड़ी ताकत बनकर उभरे। राष्ट्रीय स्तर पर श्री तेजपाल की छवि उदारवादी विचारधारा के एक दु:साहसी प्रवक्ता के रूप में बनी। आश्चर्यजनक रूप से यह सवाल किसी ने नहीं उठाया कि इतने कम समय में इतने बड़े पैमाने पर उद्यम खड़ा करने के लिए उन्हें धनराशि कहां से मुहैया हुई! आज जब उनका निजी जीवन शोचनीय विवादों के घेरे में है, तब उनके धन के स्रोतों व व्यवसायिक  गतिविधियों के बारे में नए-नए खुलासे हो रहे हैं। एक तरफ जहां देश में उन्हें उदारवादी माना जाता है, वहीं छत्तीसगढ़ में उन्होंने जिनको तहलका की फ्रेंचाइजी दी है उनका संबंध भाजपा से होने की चर्चा यहां के मीडियाकर्मियों में हुई है।

इससे हमें फिलहाल सरोकार नहीं है कि श्री केजरीवाल और उनकी पार्टी का चुनावों में क्या हश्र होता है। श्री तेजपाल के अपनी महिला सहकर्मी के साथ यौन प्रताड़ना के मामले में अंतत: क्या होगा, इसके बारे में भी हम कोई अनुमान नहीं लगाना चाहते। लेकिन इन दोनाें प्रकरणों को लेकर कुछ बुनियादी सवाल उठाना जरूरी हैं। इन दिनों कुछ ऐसा माहौल बन गया हैं मानो देश में घोटालों और स्कैण्डलों के अलावा कुछ होता ही नहीं है। राजनीति को देखें तो वहां विचारों को जैसे भुला ही दिया गया है; अब बात होती है तो सिर्फ व्यक्तियों की और उसमें भी किसी भी तरह की मर्यादा का पालन करना जरूरी नहीं समझा जाता। पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों के इस दौर में यह प्रवृत्ति बार-बार देखने आई है। इसमें वह पार्टी सबसे आगे है जो कल तक चाल, चेहरा और चरित्र की बात करती थी। सोचकर ही दहशत होती है कि अभी यह हाल है तो लोकसभा चुनावों के समय क्या नजारा बनेगा!

अफवाहों, अर्ध्दसत्यों एवं गैरजरूरी  मुद्दों को खबरों व बहसों के केन्द्र में लाकर मीडिया अपनी पीठ थपथपा सकता है, थपथपा रहा है, लेकिन उसे इस सच्चाई का अहसास नहीं है कि इस रास्ते पर चलकर वह खुद अपनी विश्वसनीयता किस तरह खो रहा है। एक दौर था जब अखबारों को उनके संपादकों के नाम से जाना जाता था और वे स्वयं अखबार में जो लिखते थे उसे पाठक गंभीरतापूर्वक पढ़ते थे।  अब कुछेक अपवादों को छोड़कर संपादक नाम की संस्था ही विलुप्त हो चुकी है। चैनलों के जो संपादक हैं उनके विचारों का उथलापन तो तुरंत ही प्रकट हो जाता है। पूंजीमुखी राजनीति से संचालित मीडिया और पूंजीवादी मीडिया से संचालित राजनीति- यह आज की पीड़ादायक वास्तविकता है।

 देशबंधु में 28 नवंबर 2013 को प्रकाशित