Thursday, 5 December 2013

तीसरे प्रेस आयोग की जरूरत


जनवरी 1973 का कोई एक दिन। मध्यप्रदेश के कुछ जिलों का दौरा करते हुए मैं उस दिन रीवा में था और कुछ समय पूर्व रायपुर से तबादले पर पहुंचे एक परिचित सज्जन से मिलने गया था। बातचीत के दौरान मैंने उन्हें जबलपुर के एक साप्ताहिक अखबार के स्वामी-संपादक के निधन की जानकारी दी तो उक्त परिचित अधिकारी की पहली प्रतिक्रिया थी- '' थैंक्स गॉड''। यह सुन कर मुझे कोई हैरानी नहीं हुई। जिस दिवंगत पत्रकार का जिक्र मैंने छेड़ा था वे एक शासकीय विभाग के कारनामों का भंडाफोड़ करने या उसके एवज में अच्छी-खासी वसूली करने के लिए चर्चित थे। ऐसा करने वाले वे अकेले पत्रकार नहीं थे। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, रायपुर, जबलपुर- सब जगह दो-चार ऐसे अखबार निकलते ही थे। सबने अपने-अपने कार्यक्षेत्र भी बांट रखे थे। कोई लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की खबरें छापता या दबाता, तो कोई सिंचाई विभाग की। किसी के निशाने पर राज्य विद्युत मंडल था, तो कोई शिक्षा विभाग से ही संतुष्ट था।

इन तमाम अखबारों में जिस प्रकृति की खबरें छपती थीं उनके चलते इन्हें पीत पत्रकारिता की संज्ञा दी जाती थी। ये अगर सामने पड़ जाएं तो लोग इनसे बचने की कोशिश करते थे। नहीं बच पाए तो बेमन से दुआ-सलाम करना पड़ती थी। न जाने कब, किसके बारे में, क्या छाप दें। पीठ पीछे उनकी तारीफ करने वाला कोई नहीं था। मर गए तो घरवालों को छोड़कर कोई आंसू बहाने वाला भी नहीं होता था। कालांतर में ऐसे अखबार और भी फले-फूले। एक जगह से निकलने वाले पत्र के कई-कई कथित संस्करण हो गए। जहां कहीं सरकारी प्रोजेक्ट चल रही हो, वहां ये भी मौजूद रहने लगे। अधिकारियों ने भी समझदारी दिखाई। खबर छप जाए या उसे दबाने के लिए दौड़-धूप करना पड़े इससे अच्छा कि हर महीने निश्चित राशि का लिफाफा संपादकजी को भेंट कर दिया जाए।

जाहिर है कि इन अखबारों में प्रकाशन के लिए आई सामग्री संबंधित दफ्तर के भीतर से ही आती होगी। दफ्तरों में होने वाली राजनीति के लिए ये अखबार एक तरह से मोहरा बन जाते थे। इस सच्चाई को समझने में राजनेताओं ने भी देर नहीं की। देखते ही देखते नेताओं द्वारा प्रायोजित दर्जनों अखबार सामने आ गए। ट्रेडल या सिलेण्डर मशीन पर छपने वाले साप्ताहिक तो अपनी जगह पर कायम रहे, राजनीति से प्रायोजित नए अखबार नयी सजधज के साथ बाजार में आए। वैसे बाजार में आए कहना गलत होगा, सीमित संख्या में छपने वाली इन पत्र-पत्रिकाओं का वितरण राजनीति के गलियारों तक ही सीमित रहा है। इनका उपयोग अपने राजनीतिक विरोधियों पर वार करने के लिए किया गया। कोई खबर या लेख जैसे ही छपा उसकी फाइलें तैयार हो गईं ताकि वक्त पड़ने पर पार्टी हाईकमान के सामने पेश की जा सकें।

मुझे 1982-83 का एक प्रसंग ध्यान आता है। भोपाल के जनसंपर्क विभाग में पत्रकार अधिमान्यता समिति की बैठक कुछ देर पहले समाप्त हुई थी। मैं जनसंपर्क संचालक के कक्ष में उनके साथ चाय पीने के लिए रुक गया था। इतने में एक सान धड़धड़ाते हुए भीतर आए। कडक़ आवाज में पूछा- हमारा काम हो गया। संचालक ने जवाब दिया- मुझे पता नहीं, मैं बैठक में नहीं था, अभी अतिरिक्त संचालक मेरे पास रिपोर्ट देने नहीं आए। उन सज्जन ने लगभग धमकाने के स्वर में कहा कि इस बार मेरा काम नहीं हुआ तो ठीक नहीं होगा। वे चले गए। संचालक ने बताया कि इन महाशय की पत्नी एक साप्ताहिक अखबार निकालती हैं। ये स्वयं किसी सार्वजनिक उद्यम में क्लर्क के पद पर हैं, लेकिन इन पर किसी बड़े राजनेता की कृपादृष्टि है। उन्हें अधिमान्यता की पात्रता नहीं थी सो हमारी कमेटी ने उनका आवेदन निरस्त कर दिया था। इसके बाद क्या हुआ मुझे नहीं पता, लेकिन इस प्रसंग का जिक्र इसलिए किया कि पत्रकारिता में भी कैसे अलग-अलग रंग देखने मिलते हैं।

वर्तमान माहौल पहले से काफी कुछ बदला हुआ नज़र आ सकता है, लेकिन विश्लेषण करें तो सवाल उभरता है कि आज जो धूम-धड़ाके की पत्रकारिता हो रही है उसके बीज कहीं पुराने समय की पीत पत्रकारिता में तो नहीं छिपे हैं! आज के अखबारों या मीडिया पोर्टलों के नामकरण से ही कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। पहले डमडम डिगा डिगा, एटम, स्पुतनिक, भंडाफोड़- जैसे नामों के अखबार होते थे तो आज भी बुलंद, दबंग, गुलेल, तहलका, कोबरा- जैसे नाम सामने हैं। मैंने ऊपर मुख्यत: हिन्दी पत्रकारिता की चर्चा की है, लेकिन ऐसा नहीं कि उस दौर में अंग्रेजी अखबार इस चलन के परे थे। ब्लिट्ज् और करंट का इतिहास तो पत्रकारिता के सुधी अध्येता जानते ही हैं। स्टारडस्ट नाम की एक फिल्मी पत्रिका भी निकलती थी, जिसमें फिल्मी हस्तियों के बारे में आपत्तिजनक हद तक चटपटी खबरें छापी जाती थीं। यही क्यों, पहले खुशवंत सिंह और फिर प्रीतिश नंदी के संपादन में इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया में भी भंडाफोड़ मार्का फीचर छपने लगे थे। कहना होगा कि वह प्रवृत्ति न सिर्फ बढ़ गई है, बल्कि बंधनहीन भी हो गई है।

आज जब तरुण तेजपाल प्रकरण के चलते आम जनता में न सही, मीडिया जगत में एक किस्म से तहलका मचा हुआ है तब हम पत्रकारों को तो कम से कम अपना इतिहास देख लेना चाहिए। ब्लिट्ज्, करंट और वीकली- सब हमारे देखते-देखते बंद हो चुके हैं। अगर उनकी कहीं चर्चा होती भी है तो उनके द्वारा पूर्व में की गई वस्तुपरक पत्रकारिता के कारण, न कि बाद के समय की विषयपरक सामग्री के कारण। पत्रकारिता की कक्षा में जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसमें इनका नाम कहीं दूर-दूर तक भी नहीं आता, जबकि अपने समय में इनका रुतबा देखते ही बनता था। वर्तमान में पत्रकारिता के तीन रूप देखे जा सकते हैं- पारंपरिक एवं वस्तुनिष्ठ, सनसनीखेज और विषयनिष्ठ तथा प्रचारनिष्ठ। तीसरी श्रेणी याने प्रचारनिष्ठ से आशय उन चमकीली-भड़कीली पत्रिकाओं से है, जो सत्ता प्रतिष्ठान की मेहरबानी से निकलती हैं और उन्हीं से अपना आजीविका पाती हैं। रायपुर में ही ऐसी कोई एक दर्जन पत्रिकाएं निकलने लगी हैं, लेकिन इन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता।

सनसनीखेज और विषयनिष्ठ पत्रकारिता का उदाहरण न सिर्फ तहलका, बल्कि बहुत से समाचार चैनल भी हैं। भारतीय समाज में हाल के बरसों में जो अंग्रेजीपरस्ती आई  है उसके चलते इनका कारोबार चल रहा है। मुझे यह देखकर दु:ख होता है कि सामाजिक उदारवाद (लिबरलिज् म) के नाम पर देश में एक अंग्रेजीदाँ वर्ग तैयार हो गया है जो दिल्ली में, सत्ता किसी की भी हो, उसके आसपास मंडराता रहता है। वह देश में नीति-निर्धारण में भी हस्तक्षेप कर रहा है, लेकिन जिसका देश की आम जनता के साथ कोई लेना-देना नहीं है। इस वर्ग ने सामाजिक न्याय के लिए चल रही लड़ाई में सिर्फ जबान से काम लिया है और निजी तौर पर खतरे उठाने से बचते रहा है।
वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता की जहां तक बात है, ऐसे अखबारों और पत्रकारों की कमी नहीं है, जो पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों का आज भी पालन कर रहे हैं। सच तो यह है कि हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में ऐसे पत्रकारों की ही संख्या ज्यादा  है और अंग्रेजी में भी उनके लिए जगह पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आशंका इस बात की है कि नवपूंजीवाद के इस युग में मीडिया भी पूंजी आधारित, पूंजी आश्रित और पूंजीमुखी हो गया है। इससे कैसे बचा जाए, सिर्फ पत्रकारों के लिए नहीं, बल्कि व्यापक समाज और कल्याणकारी राज्य के सोचने का भी विषय है। शायद वक्त आ गया है कि तीसरे प्रेस आयोग का गठन किया जाए जो देश में पत्रकारिता के समक्ष मौजूदा खतरों और चुनौतियों का अध्ययन कर बेहतर विकल्प सुझा सके!

देशबंधु में 5 दिसम्बर 2013 को प्रकाशित