Wednesday, 25 December 2013

"सफेदपोशों का अपराध "



हम यह जानते हैं कि हिन्दी में विपुल मात्रा में साहित्य सर्जना हो रही है। उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना, अन्य विधाएं; कहीं कोई कमी नहीं दिखती। हमें यह भी पता है कि जितना लिखा जा रहा है उसका एक छोटा सा हिस्सा ही पाठकों तक पहुंच पाता है। यह भी देखने में आया है कि  हिन्दी साहित्य के पाठक अधिकतर हिन्दी के लेखक ही हैं। हम इस बात पर भी समय-समय पर चिंता करते हैं कि साहित्य आम जनता से या सामान्य पाठक से दूर होते जा रहा है। इसके लिए सामान्यत: या तो प्रकाशक को कोसा जाता है या फिर पाठक के मत्थे ही दोष मढ़ दिया जाता है कि वही अज्ञानी है। किन्तु ऐसी स्थिति बनने के पीछे स्वयं लेखक भी किसी हद तक जिम्मेदार है, इस सच्चाई को कड़वी दवाई की तरह छुपा लिया जाता है। बहुचर्चित अर्थशास्त्री, लेखक व स्तंभकार गिरीश मिश्र एवं बृजकुमार पाण्डेय द्वारा लिखित ताजा पुस्तक 'सफेदपोशों का अपराध' एक बार हमें अनायास इस कड़वे सच से साक्षात्कार करवाती है। लेखकद्वय द्वारा दो शब्द में दिया गया निम्नलिखित वक्तव्य इस संदर्भ में दृष्टव्य है:-

''पश्चिमी देशों में सफेदपोश अपराध के चरित्र, स्वरूप और किस्मों पर कई गंभीर अध्ययन उपलब्ध हैं। साथ ही साहित्यिक कृतियों में भी उन पर ध्यान दिया गया है। उदाहरण के तौर पर, डिकेंस, बाल्जाक, जोला, मार्क ट्वेन, ड्रीजर आदि ने कई उत्कृष्ट उपन्यास लिखे हैं।''

''हमारे यहां ऐसा कुछ भी नहीं है; सिर्फ मीडिया में हुई चर्चाएं, कतिपय आयोगों की रिपोर्टें, अदालती कार्यवाहियां तथा विधानमंडलों और संसद में हुई बहसें ही स्रोत सामग्रियों के नाम पर उपलब्ध हैं। इनके अतिरिक्त एन.एन. वोहरा की अध्यक्षता में बनी एक सरकारी समिति की रिपोर्ट है। यद्यपि यह रिपोर्ट बहुत ही छोटी है, फिर भी इसके द्वारा उजागर किए गए तथ्य और निष्कर्ष काफी सारगर्भित हैं। उम्मीद थी कि हमारे समाज-विज्ञानी और साहित्यकार उनको लेकर आगे जाएंगे, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।''

गिरीश मिश्र की एक अन्य पुस्तक 'बाजार : अतीत और वर्तमान' सन् 2011 में प्रकाशित हुई थी। उसकी चर्चा भी मैंने इन पृष्ठों में की थी। तब भी मुझे ऐसा अनुभव हो रहा था कि हिन्दी साहित्य किसी हद तक फॉर्मूलाबध्द हो गया है, कुछ-कुछ बॉलीवुड की फिल्मों की तरह, जहां नवाचार के लिए गुंजाइश धीरे-धीरे सिमटती जा रही है। इसके क्या कारण हैं यह पृथक चर्चा का विषय है। गाहे-बगाहे चर्चाएं हुई भी हैं, लेकिन शायद अभी हिन्दी जगत नई राह पकड़ने के लिए अपने पाठकों को पूरी तरह से तैयार नहीं कर पा रहा है। बहरहाल हमें इस बात की प्रसन्नता है कि गिरीश मिश्र जैसे समाज चिंतक अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता के साथ ले रहे हैं और हिन्दी के माध्यम से लोक शिक्षण के गंभीर काम में जुटे हैं। इस नई पुस्तक में उनके सहयोगी लेखक उनके बालसखा बृजकुमार पाण्डेय हैं जो स्वयं साहित्य जगत में सुपरिचित हस्ताक्षर हैं तथा जो प्रगतिशील लेखक संघ व विश्वशांति आंदोलन से जुड़कर सजगतापूर्वक अपने नागरिक कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं।

'सफेदपोशों का अपराध' मूल रूप में अंग्रेजी में लिखी गई थी एवं इसका प्रथम प्रकाशन पच्चीस वर्ष पूर्व 1998 में हुआ था। लेखकद्वय ने यह उचित समझा कि पुस्तक हिन्दी में भी आना चाहिए और इसके लिए उन्होंने अंग्रेजी से अनुवाद नहीं, बल्कि हिन्दी में ही नए सिरे से लेखन किया। पच्चीस साल के इस लंबे अंतराल में वैश्विक परिदृश्य में जो बदलाव आए हैं उनसे लेखक भलीभांति परिचित हैं तथा वर्तमान संस्करण में उन्होंने यथासंभव नई जानकारियां जुटाई हैं व उनके आधार पर अपने निष्कर्ष निकाले हैं। इस पुस्तक को लिखने की जरूरत उन्होंने क्यों समझी इसके लिए दो शब्द से ही एक और उध्दरण देने से बात स्पष्ट हो जाएगी।

''यदि हम इतिहास में झांककर देखें तो पाएंगे कि अपराध के स्वरूप में भारी परिवर्तन हुए हैं। अपराध की नई-नई किस्में लगातार आ रही हैं। नवउदारवाद के लिए सफेदपोश अपराध आधुनिक पूंजीवाद के साथ आए हैं। नवउदारवाद आधारित भूमंडलीकरण ने उसमें ऐसे आयाम जोड़े हैं, जिनकी पहले कल्पना भी नहीं की गई थी। उदाहरण के लिए, जॉन लॉ, चार्ल्स पोंजी, बर्नार्ड मैडॉफ्फ और अब राजरत्नम् पूंजीवाद के विभिन्न चरणों के प्रतीक हैं।''

'सफेदपेशों का अपराध' में जो घटनाएं वर्णित हैं उनसे आम जनता काफी हद तक परिचित है। जिन आपराधिक प्रवृत्तियों का विश्लेषण लेखकद्वय ने किया है उनका सामना भी आम आदमी को आए दिन करना पड़ता है। देश की राजनीति हाल के दशकों में किस तरह विकृत हुई है तथा सामाजिक ताना-बाना किस कदर छिन्न-भिन्न हुआ है उसे हम रोज ही देख रहे हैं। बहुत से लोगों, जिनमें मैं भी शामिल हूं, का मानना है कि भारत में इस शोचनीय परिवर्तन की शुरूआत 1990 के दशक में हुई जब आर्थिक उदारीकरण ने हमारी दहलीज पर कदम रखा। एक संज्ञा इन तीस-पैंतीस सालों में काफी प्रचलित हो गई है, जिसे 'एलपीजी' कहा जाता है याने उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण। एलपीजी को हम एक अन्य रूप में भी जानते हैं याने घरेलू रसोई गैस। इस समानता को देखकर यह टिप्पणी भी कभी की गई है कि सिलेण्डर में विस्फोट हो जाए तो वह जानलेवा हो सकता है।

अगर हम पिछले कुछ दशकों की राजनैतिक, आर्थिक सामाजिक स्थितियों का अध्ययन करें तो यह बात आईने की तरह साफ हो जाती है कि एलपीजी के चलते देश और दुनिया में अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ी है। गरीब की संघर्षशीलता और संघर्ष क्षमता में कमी आई है, जबकि अमीर पहले की अपेक्षा कहीं ज्य़ादा उच्छृंखल व्यवहार करने लगे। एक समय सम्पन्न लोग तिनके की ओट बराबर ही सही अपने वैभव का प्रदर्शन करने से संकोच करते थे तो वह तिनका भी न जाने कब का उड़ चुका है। अगर थोड़ा बारीकी में जाएं तो यह तथ्य भी समझ आने लगता है कि जो नई सम्पन्नता आई है वह मेहनत के बल पर नहीं बल्कि किसी हद तक अपराधों के बल पर हासिल की गई है।

लेखकद्वय ने अपनी पुस्तक को ग्यारह अध्यायों में बांटा है। ये अध्याय स्वतंत्र हैं तथा अपने आपमें एक सुदीर्घ निबंध की तरह इनमें से प्रत्येक को पढ़ा जा सकता हौ। लेखकों ने अर्थशास्त्र व विश्व साहित्य दोनों का गहरा अध्ययन किया है जिसके बल पर वे सभ्यता के प्रारंभ से लेकर अब तक अपराधों का विकास कैसे हुआ है इस पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डालने में सक्षम हैं। इसके लिए वे संस्कृत के क्लासिक साहित्य के साथ-साथ विश्व साहित्य से भी प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। ऐसा करने में उन्होंने सामान्यत: उन महान कृतियों को लिया है, जो अंग्रेजी में उपलब्ध हैं। चार्ल्स डिकेंस, बौदलेयर, एमिल जोला, मार्क ट्वेन, बाल्ज़ाक जैसे महान साहित्यकारों की कृतियों को उन्होंने उध्दृत किया है और वर्तमान में आते हुए वे बहुत परिश्रम से उन अपराधिक घटनाओं के दृष्टांत जुटाते हैं जो पिछले सौ-पचास वर्षों के भीतर घटी हैं।

इस पुस्तक के प्रथम अध्याय का शीर्षक है- 'ऊंचे लोगों के गुनाह'। इसमें वे बताते हैं कि सफेदपोशों द्वारा किए गए अपराध अन्य अपराधों से कैसे अलग होते हैं। एक निर्धन व्यक्ति अपनी दारुण जीवन परिस्थितियों के चलते कैसे अपराध की तरफ बढ़ता है और कैसे उसी को अपराध का आदि व अंत मान लिया जाता है यह लेखक हमें विस्तारपूर्वक बतलाते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि सफेदपोशों पर पुलिस कड़ी नज़र नहीं रखती, उन्हें समाज के लिए खतरा नहीं माना जाता तथा उन्हें घृणा की दृष्टि से भी नहीं देखा जाता, जबकि नकली दवाई, जाली सामान, मिलावटी खाद्य सामग्री जैसे प्राणलेवा अपराध ये सफेदपोश ही करते हैं। लेखक सी.एस. लिविस को उध्दृत करते हुए सफेदपोश अपराधियों के सुसज्जित कार्यालयों की तुलना नरक से करते हैं।

'कार्पोरेट जगत में अपराध' शीर्षक अध्याय में लेखक शेयर बाजार की हेराफेरी, कंपनी की फर्जी बैलेंस शीट बनाना, बैंक घोटाले, चिटफंड स्कीम, पिरामिड स्कीम इत्यादि का उल्ले्ख करते हैं तथा अमेरिकी ठग मेडॉफ से लेकर सत्यम कम्प्यूटर के रामालिंगम राजू के उदाहरणों से अपने तर्क की पुष्टि करते हैं। हमें यहां एक नया प्रकरण याद आता है। हाल ही में पता चला है कि भारतीय बैंकों की चार लाख करोड़ से अधिक की पूंजी 'एनपीए' या नॉन परफार्मिंग असेट के खाते में फंस गई है। 'एनपीए' एक भ्रामक संज्ञा है। इसका असली मतलब है कि बैंकों ने जो कर्ज दिए हैं उसमें से इतनी बड़ी राशि डूबत खाते में चली गई है। यह भी पता चलता है कि देश के बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों ने किस तरह से बैंकों से रकम उड़ाई और उसे हड़प कर गए।

एक अन्य अध्याय में लेखकद्वय बतलाते हैं कि सफेदपोश अपराधी जनता की संपत्ति पर डाका डालने में कोई हिचक नहीं दिखलाते। देश के प्राकृतिक संसाधन याने जल, जंगल, जमीन को ये लोग येन-केन-प्रकारेण हासिल कर लेते हैं। यहां तक कि प्राकृतिक आपदाओं के समय असहाय लोगों तक पहुंचने वाली सहायता को भी ये हड़प जाते हैं। इसमें स्वाभाविक रूप से नेता, अफसर, व्यापारी, बिचौलिए सब शामिल होते हैं। इस अध्याय में लेखकों ने केयर संस्था द्वारा पोषण आहार के रूप में वितरित दूध, दलिया भी हड़प जाने का जिक्र किया गया है। मुझे याद है कि रायपुर-जबलपुर मार्ग पर एक ढाबे की खीर बहुत प्रसिध्द थी। बाद में पता चला कि केयर द्वारा गरीब बच्चों के लिए दिए गए दूध पावडर से ही यह खीर बनती थी।

अगले कुछ अध्यायों में लेखकद्वय सफेदपोश अपराधों को बढ़ावा देने में मीडिया के सहयोग, स्वयं मीडिया मालिकों का इन अपराधों में लिप्त होना, तथाकथित अवतारी पुरुष और साधु-संत, महात्मा, शिक्षा जगत के अपराध व प्रशासनिक भ्रष्टाचार आदि पर विस्तार से व प्रमाणों के साथ अपनी बात सामने रखते हैं। मीडिया की बात करते हुए वे साफ कहते हैं कि खोजी पत्रकारिता के लिए जिस प्रतिभा, मेहनत व दक्षतापूर्ण  विश्लेषण की आवश्यकता होती है इसका हमारे यहां सर्वथा अभाव है। हम इसके आगे जान रहे हैं कि स्वयं को खोजी पत्रकार के रूप में स्थापित करने वाले तरुण तेजपाल आज कहां हैं? अवतारी पुरुषों की तो बात ही क्या है! चन्द्रास्वामी के किस्से पुराने पड़ गए। सत्य सांई बाबा के निधन के बाद उनके निजी कक्ष से प्रचुर मात्रा में धन राशि बरामद हुई, उसकी  वहां क्या जरूरत थी? बाबा रामदेव के किस्से अभी सबके सामने हैं और आसाराम के बारे में तो बात करने से भी घिन आती है।

कुल मिलाकर 'सफेदपोशों का अपराध' एक अत्यंत पठनीय पुस्तक है। मुझे इसमें कुछ कमियां भी दिखाई दीं- जैसे कुछेक पुराने संदर्भों में जो परवर्ती तथ्य जुड़े उन्हें छोड़ दिया गया। पुस्तक में माफिया के बारे में भी काफी विस्तार से जानकारी दी गई है किन्तु मैं समझता हूं कि हाजी मस्तान जैसे अपराधी को सफेदपोशों की श्रेणी में नहीं रखे जाना चाहिए और अमेरिकी माफिया भी उस तरह से सफेदपोश नहीं हैं जो कि पुस्तक का केन्द्रीय आधार है। दानिश बुक्स दिल्ली से यह पुस्तक प्रकाशित हुई है। इसे अगर पेपरबैक में उपलब्ध कराया जाए तो एक बड़े पाठक वर्ग तक आसानी से पहुंच सकेगी। इस पुस्तक के दोनों लेखक और प्रकाशक बधाई के पात्र हैं।
अक्षर पर्व दिसंबर 2013 अंक में प्रकाशित