Monday, 9 December 2013

विरासत संरक्षण में तकनीकी की भूमिका



विरासत
अथवा धरोहर की सरल शब्दों में व्याख्या करना हो तो मैं कहूंगा कि यह एक बहुमूल्य और  बहुत जल्दी नष्ट न होने वाला खजाना है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को अनुपम उपहार के रूप में हस्तांतरित होता है। अपने निजी व पारिवारिक जीवन में विरासत के महत्व को हम भलीभांति जानते हैं। उसके विस्तार में जाने की आवश्यकता यहां नहीं है। यह महत्व कई गुणा बढ़ जाता है जब हम देश, दुनिया या समाज के परिप्रेक्ष्य में विरासत की बात करते हैं। विशेषज्ञ इस सामाजिक विरासत राशि को मुख्यत: तीन भागों में बांटते हैं- प्राकृतिक, निर्मित व सांस्कृतिक। सांस्कृतिक पक्ष में एक अंश निर्मित विरासत का भी है, जिसकी हम आगे चर्चा करेंगे। प्राकृतिक विरासत की अनेक श्रेणियां हैं- जैसे नदी, झरने, पहाड़, वनस्पति, पशु-पक्षी इत्यादि। निर्मित विरासत में हजारों या सैकड़ों साल पहले बनाई गई इमारतें जैसे धर्मस्थल, किले, महल या फिर उद्योग, औद्योगिक उपकरण, अन्य औजार आएंगे। सांस्कृतिक विरासत में साहित्य, चित्रकला, संगीत, नृत्य, सिनेमा, कृषि, मेले, पर्व, वस्त्राभूषण आदि शामिल किए जा सकते हैं।


प्रश्न उठता है कि इस प्रचुर विरासत के संरक्षण की आवश्यकता क्यों है? इसका उत्तर खोजते हुए मुझे लगता है कि जब हम विरासत का संरक्षण करते हैं तो बात वहीं तक सीमित नहीं रह जाती बल्कि उसमें सभ्यता के प्रारंभ से लेकर अब तक मनुष्य जीवन का जो तंतु-जाल है उसके संरक्षण की बात भी अपने आप शामिल हो जाती है। यही नहीं, इस पृथ्वी पर जो जैव विविधता है उसका संरक्षण विरासत के बारे में सम्यक ज्ञान होने से ही किया जा सकता है। मैं एक उदाहरण लेना चाहूंगा। आज के युग में चॉकलेट एक आनंददायक स्वादिष्ट उपभोक्ता वस्तु है। इस चॉकलेट के उत्पादन में साल एवं अन्य कुछ वृक्षों से निकलने वाले तेल का बड़ी मात्रा में इस्तेमाल किया जाता है। हमारा छत्तीसगढ़ खासकर बस्तर अपने साल वनों के लिए प्रसिध्द रहा है। आज यदि साल या ऐसे अन्य वृक्ष नष्ट हो जाएं तो चॉकलेट उत्पादन के लिए तेल कैसे मिलेगा और यदि चॉकलेट नहीं रहेगी तो विज्ञापन की भाषा में ''कुछ मीठा हो जाए'' का विकल्प क्या होगा? कहने का आशय कि घने जंगलों में उगे साल के वृक्ष से लेकर उपभोक्ता बाजार तक एक अटूट श्रृंखला बनी हुई है, जो विरासत का ज्ञान होने पर ही बनी रह सकती है।

आइए, इसी बात को कुछ और विस्तार में समझने की कोशिश करते हैं। विरासत अथवा धरोहर के बारे में सही समझ हमारे लिए कई मायनों में उपयोगी होगी। सबसे पहले तो कोई भी विरासत हमें अहसास दिलाती है कि यह मेरी चीज है, मैं इसका अधिकारी हूं। यह ठीक उसी तरह की भावना है जैसे दादा-दादी या माता-पिता ने हमें कोई ऐसी भेंट दी हो जिसे हम हमेशा संभालकर रखने की इच्छा रखते हैं। दूसरे, विरासत से हममें उचित गर्व या अभिमान का भाव जागृत होता है। श्रीनगर की डल झील हो या जैसलमेर का किला, ताजमहल हो या अजंता के चित्र, इन सबके बारे में सोचते हुए हमारा मन फूल जाता है। हम अपनी नजरों में ही कहीं ऊंचे उठ जाते हैं। इसका विपर्यय भी हमें नहीं भूलना चाहिए। बाज वक्त हम यह कहने से नहीं चूकते कि अमेरिका की संस्कृति चार सौ साल पुरानी है, जबकि हमारी हजारों साल पुरानी। ऐसी तुलना करना और ऐसी भावना रखना थोथे अहंकार व मानसिक अपरिपक्वता को दर्शाता है।

विरासत की समझ से हमें इतिहास की समझ भी मिलती है और अतीत से स्वयं को जोड़ने का अवसर भी। गुजरात के समुद्र तट पर सोमनाथ के मंदिर को देखकर एक विदेशी आक्रांता का स्मरण सहज हो जाता है, लेकिन सोमनाथ से मात्र सौ किलोमीटर दूर उसी पश्चिमी समुद्र तट पर द्वारिका का मंदिर अक्षुण्ण देखकर यह प्रश्न अपने आप मन में आता है कि इसे आक्रांताओं ने क्यों छोड़ दिया। इसी तरह एक ओर जलियांवाला बाग की गोलियों से छलनी दीवार औपनिवेशिक क्रूरता की याद दिलाती है, तो 1911 में तामीर मैसूर का भव्य राजप्रासाद सोचने पर बाध्य करता है कि राजे-महाराजे किस तरह से विदेशी शासकों की ताबेदारी कर रहे थे। इस बात को समेटते हुए कहा जा सकता है कि ऐसी प्राचीन विरासतों का संरक्षण करना इतिहास की सही समझ विकसित करने के लिए न सिर्फ सहायक बल्कि आवश्यक भी है।

आज के समय में बहुत से जिज्ञासु जन टीवी पर डिस्कवरी व हिस्ट्री चैनल आदि देखकर अपनी ज्ञान पिपासा शांत करने की कोशिश करते हैं। यह अच्छी बात है। मेरा कहना है कि विरासत संपदा स्वयं ज्ञान प्राप्ति का बेहद महत्वपूर्ण साधन है। पहाड़ की चोटी पर बने किसी मंदिर में लगे भीमकाय पाषाण खंडों को देखकर जिज्ञासा होती है कि ये बड़े-बड़े पत्थर इतने ऊपर कैसे लाए गए। देलवाड़ा, हॉलीबिड, बेलूर आदि के मंदिरों में जो अनुपम संगतराशी की गई है, वह प्रश्न उठाती है कि हजार-बारह सौ साल पहले इस देश में पत्थर काटने वाले यंत्र कैसे आए होंगे। जब ऐसे प्रश्न मन में उठते हैं तो फिर सृजनशील मन में सहज ही कल्पना की नई लहर उठने लगती है। क्या आज भी इस तरह का निर्माण संभव है। इसके लिए क्या करना होगा, ऐसे विचार उमड़ने लगते हैं।

अपनी विरासत का बोध मनुष्य का पर्यावरण के प्रति लगाव को बढ़ाता भी है। यदि रायपुर निवासी को यह मालूम हो कि घर के नल में आए जिस पानी को वह पी रहा है वह खारून नदी से आया है तो नदी के प्रति उसका ममत्व भाव जागृत हो सकता है। अपने घर के आसपास के पेड़-पौधे छत पर या सामने किसी पेड़ पर बसेरा करने वाले पक्षी हमें आह्लादित करते ही हैं। कहना न होगा कि उपरोक्त सारी बातें हमारी सृजनशीलता को आगे बढ़ाती हैं। हमारे जीवन में अगर ये सब निधियां न हो तो सोचिए कि किस विषय पर कविता लिखी जाएगी, चित्र में क्या उकेरा जाएगा! इन उपादानों के बिना कलाओं का स्वरूप इकहरा हो जाएगा। आज हमारी जैसी जीवन शैली हो गई है, इसमें ''अंधेरे बंद कमरे'' जैसा उपन्यास तो लिखा जा सकता है, लेकिन ''मेघदूत'' नहीं।

आज इस परिसर में ''विरासत संरक्षण में तकनीकी का योगदान'' पर चर्चा करते हुए मैं यह सोचने की कोशिश कर रहा हूं कि एक प्रबुध्द तकनीकी शिक्षक के रूप में इस दिशा में आपकी क्या भूमिका हो सकती है। मुझे चार बिन्दु मोटे तौर पर ध्यान आते हैं- एक तो शिक्षक होने के नाते निजी व संस्थागत तौर पर आप विरासत के बारे में समाज को जागरूक करने का काम कर सकते हैं। दूसरे तकनीकीविद् होने के नाते आप सदियों पुरानी तकनीकों का विश्लेषण कर बतला सकते हैं कि आज के समय में उनकी उपयोगिता कहां तक है। इसी तरह वैज्ञानिक विधि से शोध कर आप हमारी धरोहरों को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखने के लिए नई तरकीबें ईजाद कर सकते हैं। आप ही बता सकते हैं कि भोपाल के बड़े तालाब का अस्तित्व बचाने के लिए क्या किया जाना चाहिए। चौथे आज की नई प्रविधियों का उपयोग करते हुए विरासत निधियों का सूचीकरण व दस्तावेजीकरण करने में भी आपकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

मैं यद्यपि तकनीकी व्यक्ति नहीं हूं तथापि टेक्नालॉजी के प्रयोग से विरासत संपदा को कैसे बचाया जा सकता है इस बारे में अपने कुछ विचार मैं आपके साथ बांटने की अनुमति चाहता हूं। एक तो मैं ऐसा सोचता हूं कि हमारी तकनीकी ज्ञान परंपरा में ही ऐसा बहुत कुछ है, जो विरासत की श्रेणी में आता है। मसलन दस-बारह सदी पूर्व बने मंदिरों में पत्थर की खुदाई की विधि, छठवीं-सातवीं शताब्दी में ईंट पकाने की विधि, उन्हें जोड़ने के लिए प्रयुक्त मसाला बनाने की विधि या फिर वे बारीक यंत्र जिनसे ग्रेनाइट में छेद करना संभव था। इसी तरह हम प्राचीन वाद्य यंत्र, वाहन, वस्त्र निर्माण आदि बहुत-सी बातों को ले सकते हैं। इनका विधिवत सूचीकरण करने से पता लगेगा कि हमारे देश में तकनीकी का विकास कैसे हुआ। दूसरे, वर्तमान में विरासत संरक्षण में तकनीकी का इस्तेमाल। यह ऐसा मुद्दा है, जो आपसे गंभीर विचार की अपेक्षा रखता है।

हम पहले प्राकृतिक विरासत के संरक्षण की बात करें। यह सबको पता है कि देश की कितनी ही नदियां धीरे-धीरे कर मर रही हैं। गंगा और यमुना की जो दुर्गति है वह किसी से छुपी नहीं है। इनके लिए योजनाएं भी बनाई गई हैं, लेकिन उनमें समन्वित प्रयास का अभाव दिखाई देता है। शायद वक्त आ गया है कि हमारे नीति निर्माता तकनीकी विशेषज्ञों को अपेक्षित स्वायत्तता व सम्मान दें ताकि वे ऐसी योजनाओं को सही ढंग से लागू कर सकें। जर्मनी में राईन व अन्य नदियों को सफलतापूर्वक प्रदूषण मुक्त किया गया है। उसी तरह हमें अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त करने की जरूरत है, उनमें कारखानों व नगरों का अपशिष्ट डालना रोकना है, उनके स्वाभाविक प्रवाह को रोकने में सावधानी बरतना है तथा नदियों की जो अपनी पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता है उसे बचाना है। कुछ यही बात तालाबों पर भी लागू होती है। तालाबों को पाटकर उस भूमि का जो बेहिसाब व्यवसायिक उपयोग किया जा रहा है उसे समय रहते रोकना आवश्यक है। हमारे जंगलों में फिर वैसा परिवेश लाने की जरूरत है, जिसमें बहुमूल्य वृक्षों और वनस्पतियों के पुनरोत्पादन की संभावना बनी रहे। इसमें आदिवासी एवं वन्य क्षेत्र के अन्य निवासियों का सहयोग कैसे सुनिश्चित किया जाए यह विचारणीय है। वन्य जीवों व पक्षियों के बारे में भी इसी तरह विचार करना आवश्यक है। मेरा मानना है कि तकनीकीविदों को इन सब मामलों में निरपेक्ष नागरिक की नहीं बल्कि सक्रिय नेतृत्वकारी भूमिका निभाना चाहिए।

जहां तक निर्मित धरोहरों की बात है आप स्वयं इस विषय के विशेषज्ञ हैं। आप जहां एक तरफ नए-नए प्रयोग, नए-नए निर्माण कर नई-नई ऊंचाईयों को हासिल कर रहे हैं, वहीं आपके ज्ञान व अनुभव का लाभ प्राचीन धरोहरों के संरक्षण को भी मिलना चाहिए। पुरानी इमारतों को मौसम की मार से कैसे बचाया जाए, उन्हें प्रदूषण से क्षति न पहुंचे, जो भवन खंडित हो रहे हैं उन्हें मूल रूप में कैसे वापिस लाया जाए, इनकी साज-सज्जा कैसी हो, आज के समय में इनका उपयोग किस तरह से किया जाए यह आपके विचार का ही विषय है। हमारी खेती में कौन सी पुरानी पध्दतियां आज भी कारगर हो सकती हैं, भोजन और औषधि के लिए वनस्पतियों का सम्यक उपयोग कैसे हो, विलुप्त होती भाषाओं को कैसे बचाया जाए, पुराने वाद्य यंत्र और गायन पध्दतियों को जीवित रखने क्या किया जाए- इस सबमें भी आपके तकनीकी ज्ञान व परामर्श की बेहद जरूरत है। मैं यही उम्मीद कर सकता हूं कि आप भारत की समृध्द विरासत को एक सामान्य सैलानी की नज़र से नहीं बल्कि एक जागरुक अध्येता की दृष्टि से देखेंगे और उसके संरक्षण में सक्रियतापूर्वक योगदान करेंगे।

(राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान भोपाल में 5 अगस्त 2013 को 'विरासत संरक्षण में तकनीकी का योगदान' विषय पर किए गए व्याख्यान का परिवर्ध्दित रूप)

अक्षर पर्व नवम्बर 2013 अंक में प्रकाशित